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<title>Latest News</title>
<link>http://qalamlib.com/</link>
<description>Latest news from Qalam library</description>
<language>en-us</language><item>
<title>Test</title>
<link>http://qalamlib.com/news/420</link>
<description>&lt;p&gt;qweqwe&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نسخه کامل نرم افزار کتابخانه قلم- ویندوز</title>
<link>http://qalamlib.com/news/409</link>
<description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot;&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;امکانات ویژه، طراحی دلنواز، حجم پایین&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با توجه به تقاضای بسیاری از کاربران عزیز، نسخه کامل نرم افزار کتابخانه قلم&amp;nbsp;که کتاب&amp;zwnj;های فارسی&amp;nbsp;در آن از قبل دانلود شده است جهت دانلود&amp;nbsp; قرار داده شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;راهنمای دانلود و نصب این نسخه از نرم افزار:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;1-&lt;/strong&gt; ابتدا نسخه خالی برنامه را از لینک زیر دانلود کرده و نصب کنید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://qalamlib.com/book/download/1732/pdf&quot;&gt;لینک دانلود نسخه خالی نرم افزار&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;2-&lt;/strong&gt; بکاپ نرم افزار که حاوی همه کتاب های متنی است را با حجم 144 مگابایت از لینک زیر دانلود کرده و از زیپ خارج&amp;nbsp;کنید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://qalamlib.com/book/download/1732/doc&quot;&gt;لینک بکاپ نرم افزار (حاوی نسخه متنی کتاب های سایت)&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;3-&lt;/strong&gt; نرم افزار کتابخانه قلم را از منوی استارت یا از طریق میانبر آن بر روی دسکتاپ اجرا کنید و به منوی &lt;strong&gt;&amp;quot;کتاب ها و امکانات&amp;quot;&lt;/strong&gt; رفته و گزینه &lt;strong&gt;&amp;quot;پشتیبانی و بازگردانی&amp;quot;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; را انتخاب کنید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;4-&lt;/strong&gt; گزینه &lt;strong&gt;&amp;quot;بازگردانی پشتیبان&amp;quot;&lt;/strong&gt; را انتخاب کرده و بر روی آیکون &lt;strong&gt;&amp;quot;شروع عملیات&amp;quot;&lt;/strong&gt; کلیک کنید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;5-&lt;/strong&gt; فایل بکاپ را که قبلا دانلود کرده و از زیپ خارج کردید&amp;nbsp;انتخاب کنید و کمی منتظر بمانید تا عملیات بازگردانی بکاپ به پایان برسد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;6-&lt;/strong&gt; نسخه متنی همه کتاب ها به برنامه اضافه گردید.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>نرم افزار قلم اندروید، آی او اس و ویندوز</title>
<link>http://qalamlib.com/news/408</link>
<description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;امکانات ویژه، طراحی دلنواز، حجم پایین&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مژده به دوستان خوب و همراهان سایت عقیده&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بعد از ماه&amp;zwnj;ها تلاش شبانه&amp;zwnj;روزیِ بخش فنیِ مجموعه موحدین، بالاخره نسل جدید نرم&amp;zwnj;افزار قلم برای سیستم عامل اندروید، آی او اس و ویندوز منتشر شد. تلاش ما در طراحی این نرم&amp;zwnj;افزار بر آن بوده است تا امکانات اختصاصی این برنامه را به بهترین شکل در اختیار پژوهشگران و علاقمندان قرار دهیم. برنامه&amp;zwnj;ای که هم اکنون در اختیار شماست، در طول سال گذشته، بارها تغییر کرده و بهبود یافته و ـ ان شاء الله ـ در چند ماه آینده نیز شاهد بهینه&amp;zwnj;سازی&amp;zwnj;های دیگری خواهیم بود.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از امکانات منحصر به فرد این نرم&amp;zwnj;افزار، می&amp;zwnj;توان به دریافتِ نسخه متنی کتابها اشاره کرد. نسخه متنی، علاوه بر حجم بسیار کم، در مقایسه با سایر نسخه&amp;zwnj;های کتاب، امکانات بی&amp;zwnj;نظیری را در اختیار کاربران نرم افزارهای اندروید و آی او اس قرار می&amp;zwnj;دهد؛ از جمله:&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جستجو در متن تمام کتابها؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;مشخص کردن بخشهای دلخواه در متن کتاب؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;حاشیه&amp;zwnj;نویسی برای کتاب؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;بازنشر چکیده یا قسمتی از متن کتاب در برنامه&amp;zwnj;های دیگر یا شبکه&amp;zwnj;های اجتماعی؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;تغییر نوع و اندازه قلم.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نرم&amp;zwnj;افزار کتابخانه قلم، تجربه&amp;zwnj;ای بسیار متفاوت از مطالعه کتاب&amp;zwnj;های الکترونیک در اختیار خوانندگان قرار خواهد داد؛ تجربه&amp;zwnj;ای که هرگز در دنیای کتاب&amp;zwnj;های کاغذی نمی&amp;zwnj;توان بدان دست یافت. پس نرم&amp;zwnj;افزار کتابخانه قلم را دانلود کنید و از امکانات بی&amp;zwnj;نظیرِ آن لذت ببرید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=com.mowahedin.alqalam&amp;amp;hl=fa&quot;&gt;&lt;strong&gt;نسخه اندروید&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://itunes.apple.com/il/app/pen-library-ktabkhanh-qlm/id921166915?mt=8&quot;&gt;&lt;strong&gt;نسخه آی او اس (آیفون و آیپد)&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://qalamlib.com/book_files/pdf/fa/Qalam-Library-Lite.exe/&quot;&gt;&lt;strong&gt;نسخه ویندوز&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>غداً سأحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/407</link>
<description>&lt;h1 dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#cc0000&quot;&gt;&lt;strong&gt;غداً سأحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#3333ff&quot;&gt;&lt;strong&gt;الشيخ ناصر العلي&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
جامعة أم القرى&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;وُلِد الهُدى فالكائنات ضياءُ * وفَمُ الزمانِ تبسُّمٌ وسناءُ&lt;br /&gt;
يا خيرَ من جاء الوجودَ تحيةً * من مُرْسَلِين إلى الهدى بك جاؤوا&lt;br /&gt;
يومٌ يَتِيهُ على الزمان صباحُهُ * ومساؤه بِمُحمَّدٍ وضَّاءُ&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;سألت نفسي سؤالاً:&lt;/strong&gt; لماذا لا أحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم؟ أيعقل أن كل المحتفلين به على خطأ؟!&lt;br /&gt;
لماذا لا نعلن حُبَّنا للرسول صلى الله عليه وسلم مثلهم؟! ونثبت لهم أننا نحبه.&lt;br /&gt;
فهم يتهموننا أننا لا نحبه!!&lt;br /&gt;
أستغفر الله .. معاذ الله .. أن يتهم مسلمٌ مسلماً أنه لا يحب النبي صلى الله عليه وسلم؟!&lt;br /&gt;
فكَّرت وقدَّرت.. ثم قرَّرت أن أحتفل رغم كون الفكرة لم تَحْظَ بقناعتي حتى الآن، لكني سأحتفل.&lt;br /&gt;
ولماذا لا أحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم؟&lt;br /&gt;
دعونا نحتفل! فقد يكون الحق والصواب مع المحتفلين؟&lt;br /&gt;
لديَّ عقلٌ وإدراك، وقد درست الشريعة وعرفت بعضاً من أحكامها، و لا أدعي إحاطتي بعلومها.&lt;br /&gt;
ولكن بما لدي من بصيص علم - ولاسيما القواعد الكلية والمبادئ العامة للشريعة - سأجرب أن أحتفل.&lt;br /&gt;
يا تُرى كيف سيكون احتفالي؟!&lt;br /&gt;
سأحاول وأنا أحتفل بالمولد ألَّا أرتكب منكرًا وألَّا أغشى زُوْرًا.&lt;br /&gt;
غداً هو يوم الثاني عشر من ربيع الأول،&lt;br /&gt;
وسأبدأ فيه احتفالي أولاً بقراءة كتب السيرة النبوية والشمائل المحمدية صلى الله عليه وسلم.&lt;br /&gt;
ولكني لن أتغنى بقصيدة البُرْدَة للبُوْصِيْري, فقد درستُ العقيدة وعلمت بأن فيها ما يناقض التوحيد والعقيدة والعياذ بالله.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حسنًا.. سأبدأ بقراءة كتاب &amp;quot;الرحيق المختوم&amp;quot;&lt;br /&gt;
لكني لما قرأته تفاجأت إذ وجدت مكتوباً فيه: &lt;span style=&quot;color:#0000FF&quot;&gt;((ولد سيد المرسلين صلى الله عليه وسلم بشِعْبِ بني هاشم بمكة في صبيحة يوم الاثنين التاسع من شهر ربيع الأول))&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;
قلت في نفسي: المشهور المعروف عند الناس أنه وُلِد صلى الله عليه وسلم في يوم الثاني عشر من ربيع الأول؟!&lt;br /&gt;
فعرَّجْت على كتبٍ أخرى في السيرة كالإمام ابن كثير الشافعي وغيره، فإذا بها تذكر اختلافاتٍ شتى في تاريخ مولده: أكانت ولادته صباحاً أم مساءً؟ أكانت في ربيع الأول أم ربيع الآخر أم في صفر أم في رمضان؟ وبكلٍّ قيل، بل اختلفوا في تحديد عام ولادته؟.&lt;br /&gt;
اختلف علماء السير والتاريخ في تحديد سنة ولادته وشهر ميلاده ويومه وساعته.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ولما علمتُ أن عمر رضي الله عنه أرَّخ بهجرة المصطفى صلى الله عليه وسلم بإقرارٍ من الصحابة، ولم يؤرِّخْ بمولده صلى الله عليه وسلم، أدركتُ أن الصحابة رضي الله عنه لم يكونوا يعلمون جزماً يوم ولادته، بل لم يكونوا يرون أنّ ضبط تاريخ مولده صلى الله عليه وسلم له أهميةٌ يترتَّب عليها حكمٌ شرعي.&lt;br /&gt;
فقلت: إذن لماذا أحتفل في الثاني عشر ولا يوجد سند تاريخي يؤيده!! فتضعضعت قناعتي.&lt;br /&gt;
ولكني سأستمر في القراءة والبحث والاحتفال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إن كتب السير والتاريخ بل وكتب الحديث الشريف أجمعت على أن ولادته صلى الله عليه وسلم كانت يوم الإثنين، وكان حبيبنا صلى الله عليه وسلم يصومه شكراً لله؛ ولمَّا سئل عن ذلك ؟ قال &amp;laquo;ذَاكَ يَوْمٌ وُلِدْتُ فِيهِ وَيَوْمٌ بُعِثْتُ أَوْ أُنْزِلَ عَلَىَّ فِيهِ&amp;raquo; رواه مسلم.&lt;br /&gt;
ولم أجد فيها أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يتحرَّى صيام الثاني عشر من ربيع الأول مرةً في السنة، بل كان يصوم كل إثنين بمناسبة ولادته وبعثته فيه.&lt;br /&gt;
لكنَّ كثيرًا من المحتفلين بالمولد في كل عام مرة أو أكثر! ربما لا يحرصون على صوم يوم الإثنين من كلِّ أسبوع! أليس هذا قلباً للحقائق؟! &lt;span style=&quot;color:#008000&quot;&gt;﴿أَتَسْتَبْدِلُونَ الَّذِي هُوَ أَدْنَى بِالَّذِي هُوَ خَيْرٌ﴾&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;
ثم إن صاحب المولد صلى الله عليه وسلم لم يُضِفْ إلى الصيامِ احتفالاً كاحتفال أرباب الموالد من تجمعاتٍ ومدائحَ وذبائحَ وحلوى وحمص وأذكارٍ وصلواتٍ عليه صلى الله عليه وسلم بألفاظٍ غريبةٍ ومحدثة.&lt;br /&gt;
ثم سألت نفسي: أفلا يكفي الأمةَ ما كفى نبيَّها، ألسنا نحب المصطفى صلى الله عليه وسلم؟ &lt;span style=&quot;color:#008000&quot;&gt;﴿وَمَا آتَاكُمْ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُوا وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ﴾&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ومن عجيب ما قرأت ورأيت في بعض البلدان العربية والإسلامية أنهم يحتفلون بالمولد بإقامة حفلات غنائية أو إنشادية تصحبها دفوف ومعازف موسيقية.&lt;br /&gt;
فقلت في نفسي: أليس المصطفى صلى الله عليه وسلم قال &amp;laquo;ليكونن من أمتي أقوام يستحلون الحر والحرير والخمر والمعازف&amp;raquo;. رواه البخاري تعليقا ووصله غيره، وهو صحيح.&lt;br /&gt;
لقد رأيتهم يتراقصون ويتمايلون ويتواثبون، لقد كانوا رجالا ونساء، أيعقل هذا ؟!.تساءلت أيرضى أحدهم أن يراه رسول الله صلى الله عليه وسلم بهذه الحال؟!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يا راقصا أو زاحفا لتَعَبّدٍ ** ما كان هذا من صنيع محمد&lt;br /&gt;
ما كان يرقص بالدفوف عبادة ** أو كان يزحف للقبور بمسجد&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ثم أعدت السؤال على نفسي مرة أخرى:&lt;br /&gt;
لماذا لا أحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم بطريقة أخرى؟ بلا معازف، ولا رقص، ولا بردة.&lt;br /&gt;
سأفرح بيوم ميلاده صلى الله عليه وسلم، وسأحتفل &amp;ndash; كما احتفل صاحب المولد صلى الله عليه وسلم - كل إثنينٍ بصيامه كل أسبوع قدر استطاعتي.&lt;br /&gt;
حسنا.. أمسكت بكتاب آخر عن الشمائل المحمدية وبدأت أقرأ فيه، فاليوم هو الثاني عشر من ربيع الأول.&lt;br /&gt;
لكن عقلي شرد سابحا في تفكير عميق: يا ترى هل سأقتصر على قراءة كتب السير والشمائل المحمدية في هذا اليوم السنوي فقط؟!&lt;br /&gt;
يا ألله! هل حبي وكثرة ذكري للنبي صلى الله عليه وسلم فقط في هذا اليوم؟!..ألست أحبه وأذكره كل يوم؟! أيُّ معنىً لتخصيص يومٍ واحدٍ في السنة نتذكر فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم؟.&lt;br /&gt;
هل نسيناه حتى نتذكره؟!&lt;br /&gt;
هل يجوز ألَّا نفرح به صلى الله عليه وسلم إلا مرة واحدة في السنة؟&lt;br /&gt;
هل هذه الطريقة فيها توقير للمصطفى صلى الله عليه وسلم أم أنها إجحاف بحضرة النبي صلى الله عليه وسلم؟&lt;br /&gt;
هل أصبحت محبة النبي صلى الله عليه وسلم يوماً في السنة؟! وهو القائل: &amp;laquo;البخيلُ مَنْ ذُكِرتُ عنده ولم يُصَلِّ عليَّ&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
فبالله عليكم! أي بخل تصفون به من يقول نخصص للنبي صلى الله عليه وسلم يوماً واحداً أو يومين أو ثلاثًا أو عشرًا أو عددًا محدودًا في السنة نحتفل به صلى الله عليه وسلم ونقرأ سيرته، ونصلي عليه صلى الله عليه وسلم؟ أليس هذا بُخلاً وإجحافًا في حقِّ نبينا الهادي صلى الله عليه وسلم؟!.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يجب على الأمة المسلمة أن تجعل سيرة النبي صلى الله عليه وسلم نصب أعينها في كل حين، وأن تتعلم من سيرته وسنته وآدابه ما استطاعت إلى ذلك سبيلاً.&lt;br /&gt;
ينبغي أن نذكر النبي صلى الله عليه وسلم في صلاتنا، وإذا سمعنا الأذان، وإذا دخلنا المسجد، ونذكره في أوقات كثيرة، بل يكون ذكره صلى الله عليه وسلم برؤية من يمتثل سنته صلى الله عليه وسلم.&lt;br /&gt;
فمثلاً إذا رأيتَ شاباً مؤمناً يتمثل في مظهره سنة صلى الله عليه وسلم معفياً لحيته، مقصراً ثوبه، مستاكاً بأراكه، فإنك سرعان ما تتذكر النبي صلى الله عليه وسلم.&lt;br /&gt;
وإذا رأيت القرآن تذكرت النبي صلى الله عليه وسلم، لأنه هو الذي جاءنا بهذا القرآن، فمتى يغفل المؤمن عن ذكرى النبي صلى الله عليه وسلم!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فيجب علينا أن تكون محبته صلى الله عليه وسلم تملك شغاف قلوبنا، وكل أمر من أمورنا نزنها بميزانه، ونطبقه على سنته صلى الله عليه وسلم، فيكون تذكرنا له في الحقيقة في كل وقت، وفي كل عمل.&lt;br /&gt;
فإذا رأيت امرأة في الطريق أو على الشاشة أتذكر أنه صلى الله عليه وسلم أمرني أن أغض بصري، فأغضه. وإذا أردتُ أن أخيط ثوباً عند خياطٍ أتذكر نهي النبي صلى الله عليه وسلم عن إسباله، فأقصره. وإذا تعاملت مع الجمهور أتذكر نبيي صلى الله عليه وسلم المبسام، فأبتسم في وجوههم. وفي البيت وبين أهلي أتذكر حبيبنا صلى الله عليه وسلم كيف كان خيرنا لأهله.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وهكذا يا حبيب رسول الله في كل أمر من الأمور نحن ملزمون باتباع هدي النبي صلى الله عليه وسلم &lt;span style=&quot;color:#008000&quot;&gt;﴿لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيراً﴾&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;
ثم كرَّةً بعد مرَّة أسائل نفسي: لماذا لا أحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم؟&lt;br /&gt;
وقبل أن أجيب، جال بخاطري سؤال وأنا أفكر في الاحتفال بمولد النبي صلى الله عليه وسلم، وهو:&lt;br /&gt;
هل نحن لمّا نحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم نبتغي بذلك أجراً وثواباً وقربى من الله أو أننا نحتفل لمجرد العادات وأكل الحلوى والرز بالحمص والتلهي بالألحان الشجية المطربة؟&lt;br /&gt;
أظن في الناس خيراً، إنهم ينشدون بفعلهم هذا الأجر من الله تعالى.&lt;br /&gt;
عندئذ تذكرت حديث المصطفى صلى الله عليه وسلم: &lt;span style=&quot;color:#0000FF&quot;&gt;&amp;laquo;من أحدث في أمرنا هذا ما ليس فيه فهو رد&amp;raquo;&lt;/span&gt; رواه الشيخان. وقوله: &lt;span style=&quot;color:#0000FF&quot;&gt;&amp;laquo; مَنْ عَمِلَ عَمَلاً لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدٌّ&amp;raquo;&lt;/span&gt; متفق عليه.&lt;br /&gt;
نعم تذكرت هذين الحديثين، وتذكرت ما قرره العلماء من أن جميع العبادات توقيفية، أي لا نعبد الله ولا نتقرب إليه إلا بما أمرنا به صلى الله عليه وسلم؛ لأنه قال: &amp;laquo;ما تركتُ شيئاً يُقربكم إلى الله إلا وأمرتكم به&amp;raquo; رواه الطبراني.&lt;br /&gt;
فالقاعدة في العبادات أن نتعبد الله بما شرع لا بالبدع، حتى لو بدا العمل حسنا، فهو مردود على صاحبه.&lt;br /&gt;
وسمعت أرباب الموالد يقولون: إن المولد بدعة حسنة.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لكني قرأت حديث النبي صلى الله عليه وسلم الذي كان يردده ويفتتح به خطبه، يقول:&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000FF&quot;&gt;&amp;laquo;أما بعد: فإن أصدق الحديث كتاب الله، وأحسن الهدي هدي محمد صلى الله عليه وسلم، وشر الأمور محدثاتها، وكل محدثة بدعة، وكل بدعة ضلالة، وكل ضلالة في النار&amp;raquo;&lt;/span&gt; رواه النسائي وغيره. قال: &amp;quot;كل بدعة ضلالة&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وتذكرتُ قول إمام دار هجرة المصطفى صلى الله عليه وسلم وهو عالم المدينة في عصره الإمام مالك بن أنس رحمه الله، قال: ((من ابتدع في الإسلام بدعة يراها حسنة، فقد زعم أن محمداً صلى الله عليه وسلم خان الرسالة )). هذا شيء خطير جداً، ما الدليل على ذلك يا إمام؟ قال الإمام مالك: (( اقرؤا إن شئتم قول الله تعالى: &lt;span style=&quot;color:#008000&quot;&gt;﴿الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْأِسْلامَ دِيناً﴾&lt;/span&gt; فما لم يكن يومئذٍ ديناً لا يكون اليومَ ديناً)). متى قال الإمام مالك هذا الكلام؟ قاله في القرن الثاني من الهجرة، أحدِ القرون المفضلةِ المشهودِ لها بالخيرية! فما بالكم بالقرن الخامس عشر؟!&lt;br /&gt;
هذا كلامٌ يُكتب بماء الذهب، لكننا عن أقوال الأئمة الذين نزعم أننا نقتدي بهم غافلون.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تذكرت كل هذه المعاني فخفت والله أن أكون مبتدعا في احتفالي.&lt;br /&gt;
خفت أن ينطبق فيَّ قول الله تعالى: &lt;span style=&quot;color:#008000&quot;&gt;﴿ قُلْ هَلْ نُنَبِّئُكُمْ بِالْأَخْسَرِينَ أَعْمَالاً * الَّذِينَ ضَلَّ سَعْيُهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَهُمْ يَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ يُحْسِنُونَ صُنْعاً﴾&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;
وخشيت أن يصدق فيَّ قول ابن مسعود رضي الله عنه &lt;span style=&quot;color:#0000FF&quot;&gt;((كم من مريد للخير لا يصيبه!!))&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;
فقررت أن أترك الاحتفال بمولد النبي صلى الله عليه وسلم.&lt;br /&gt;
لكني واصلت قراءة سيرة المصطفى العطرة صلى الله عليه وسلم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وعدت واتهمت نفسي بالقصور في العلم، وطفقت أبحث عن فعل النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه والأئمة الأربعة (أبي حنيفة ومالك والشافعي وأحمد) عليهم رحمة الله، فهالني أنني لم أجد حديثاً واحداً لا صحيحًا ولا ضعيفًا بل ولا موضوعًا أن النبي صلى الله عليه وسلم احتفل بمولد نبيٍّ من الأنبياء، ولم أجد أثراً واحداً لا صحيحًا ولا ضعيفًا بل ولا موضوعًا عن صحابيٍّ واحدٍ أنه احتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم ، بل لم أجد إماماً واحداً من الأئمة الأربعة فعل ذلك.&lt;br /&gt;
فقلت يا سبحان الله!&lt;br /&gt;
أمرٌ لم يفعله رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا صحابته الكرام رضي الله عنهم ولا إمامٌ من الأئمة الأربعة المتبوعين، وأفعله أنا، لا والله.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ومع ذلك أكملت قراءتي وأنهيت قراءة الغزوات وفتح مكة، و ها أنا ذا قاربت من نهاية كتاب السيرة الذي بين يدي.&lt;br /&gt;
إنها اللحظات الأخيرة الحرجة في حياته صلى الله عليه وسلم, إنها الساعة التي أظلم فيها كل شيء، ساعة وفاته صلى الله عليه وسلم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إنها الداهية العظمى والمصيبة الكبرى التي قال لنا فيها صلى الله عليه وسلم: &lt;span style=&quot;color:#0000FF&quot;&gt;&amp;laquo; إِذَا أَصَابَ أَحَدَكُمْ مُصِيبَةٌ فَلْيَذْكُرْ مُصِيبَتِهِ بِي فَإِنَّهَا مِنْ أَعْظَمِ الْمَصَائِبِ&amp;raquo;&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;
حقًّا إنه يوم الخسران الأكبر، يوم أن انقطع الوحي الشريف، وانقطعت السماء عن الأرض.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;يقول أنس رضي الله عنه : &lt;span style=&quot;color:#0000FF&quot;&gt;((لما كان اليومُ الذي دخل فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينةَ أضاء منها كلُّ شيء، فلمّا كان اليوم الذي مات فيه أظلم منها كلَّ شيء، وما نفضنا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم الأيديَ حتى أنكرنا قلوبنا))&lt;/span&gt; رواه الترمذي بسند صحيح.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لقد فاضت روحه الشريفة صلى الله عليه وسلم إلى الرفيق الأعلى في الثاني عشر من ربيع الأول في السنة الحاديةَ عشرةَ للهجرة.&lt;br /&gt;
هنا لم تختلف كتب السير في تحديد يومِ وفاته كما اختلفت في تحديد يوم ولادته.&lt;br /&gt;
ربطتُ بين المناسبتين، مناسبة الوفاة المجزوم بها مع مناسبة الولادة المظنون بها في شهر واحد وفي يوم واحد.&lt;br /&gt;
فصرختُ: يا إلهي!! كيف لي أن أحتفل بيوم وفاته صلى الله عليه وسلم؟!&lt;br /&gt;
كيف لعقلٍ أن يجمع بين فرح وسرور وحزن وألم في نفس الوقت ؟!&lt;br /&gt;
يا إلهي!! أ يجوز لأحد يُحِبُّ النبي صلى الله عليه وسلم أن يحتفل بموته صلى الله عليه وسلم ؟!&lt;br /&gt;
بل لو دعا إنسانٌ إلى جعل يوم الثاني عشر من ربيع الأول يوم حزن لكانت شبهته أقوى من شبهة المحتفلين بذلك اليوم، لماذا؟&lt;br /&gt;
لأن الأحزان غَلَّابةٌ على الأفراح، فلو قُدِّر أنه توفي والد أحد الزوجين في ليلة عرسهما، لعُدَّ احتفالهم تلك الليلة ضربا من الجنون. وهكذا لو مات ولدك يوم العيد، لانقلب فرح العيد حُزْنًا ومأتماً وعزاءً.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;إن أعداء المسلمين سيضحكون علينا:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فإن نحن ابتهجنا وفَرِحْنَا بولادته صلى الله عليه وسلم قالوا: انظروا إلى المسلمين إنهم يفرحون بوفاة نبيهم!&lt;br /&gt;
وإن نحن حَزِنَّا وصَنَعْنا مأتماً لوفاته صلى الله عليه وسلم قالوا: انظروا إلى المسلمين إنهم يحزنون لولادة نبيهم.&lt;br /&gt;
فماذا نفعل؟&lt;br /&gt;
الأمر يسير، إننا لسنا بحاجة إلى احتفاء أو عزاء، إنما اتباع للنبي صلى الله عليه وسلم.&lt;br /&gt;
ولهذا لا غرابة أن كان العُبَيْديون الرافضة هم أول من أحدث بدعة المولد. فهل هؤلاء أهل للاقتداء والائتساء؟!.&lt;br /&gt;
إلى هنا وسأستريح قليلا عن قراءة السيرة بعدما تبينت لي الأمور، وانكشفت لي الحقائق.&lt;br /&gt;
هل سأحتفل بمولد النبي صلى الله عليه وسلم؟&lt;br /&gt;
لا، لن أحتفل بالمولد بعد اليوم.&lt;br /&gt;
إن احتفالي الحقيقي هو أن أسير على خطاه صلى الله عليه وسلم، وأن أحيي سنته، وأن أدافع عنها, وأن أُحِبَّه وأحبَّ آلَ بيته الطيبين الطاهرين وصحابته الغر الميامين.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اللهم إنا نُشهدك يا الله بأننا نحب عبدَك ونبيَّك سيدَنا محمداً صلى الله عليه وسلم، اللهم ارزقنا بمحبتنا له شفاعةً تنجينا بها من عذاب أليم، وتُدخِلُنا بها جنتك ياربَّ العالمين. وصلى الله عليه وعلى آله وصحبه وسلم.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>english news test</title>
<link>http://qalamlib.com/news/406</link>
<description>&lt;p dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;No one can deny that Islam is very much in the spotlight today. In spite of extremely negative portrayals by Western media (or perhaps because of them), increasing numbers of people are seeking to find out more about it. And more often than not, they are being pleasantly surprised by the fruits of their research. In fact, more people are embracing Islam today than they did prior to September 11, 2001. However, there does remain a great deal of misconception and misunderstanding on the subject, frequently fuelled by political policies which deem it in their interest to support Islam&amp;rsquo;s enemies. In addition, Muslims themselves, at first shocked and confused by the events of recent years, did not really know how to respond to the challenge. Now they have been rudely awakened to the urgency of refuting the many false claims and accusations being spread against their way of life and of defending the truth, and accordingly, the rights and honour of Muslims everywhere on earth.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>انتشار نسخه آزمایشی طراحی جدید سایت کتابخانه عقیده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/405</link>
<description>&lt;p&gt;با سلام خدمت کاربران محترم سایت عقیده&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سایت با تغییراتی گسترده در راستای خدمت گذاری به شما بازدیدکننده محترم به روز شد.&amp;nbsp;تلاش کرده ایم تا از آخرین فناوریهای وب و طراحی سایت بهره ببریم تا&amp;nbsp;دسترسی به امکانات سایت به شیوه ای ساده فراهم گردد. در نسخه جدید سایت، امکانات بیشتری را برای شما فراهم کرده ایم و به تدریج این امکانات به بهره برداری خواهد رسید. آپدیت سایت شامل تغییرات زیادی است که&amp;nbsp;در ادامه به برخی از آنها اشاره می کنیم:&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
1. تغییر در قالب وب سایت، و رسپانسیو بودن نسخه جدید (قابلیت نمایش بهینه بر روی موبایل و تبلت)&lt;br /&gt;
2. اضافه شدن امکان ثبت نام در سایت و همگام سازی تنظیمات&amp;nbsp;شخصی&amp;nbsp;شما در دستگاه های مختلف و سایت&lt;br /&gt;
3.&amp;nbsp; اضافه نمودن قابلیت جستجوی هوشمند با امکان جستجو در متن کتاب ها، عناوین کتاب ها، نویسندگان و&amp;nbsp;مترجمین&lt;br /&gt;
4. اضافه امکانات ویژه به بخش مطالعه متن کتاب ها، همانند ساخت قفسه شخصی، هایلایت متن، نمایه گذاری و ...&lt;br /&gt;
5. افزایش امنیت و سرعت سایت&lt;br /&gt;
و سایر تغییرات دیگر &amp;hellip;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;البته این نسخه بعنوان نسخه نهایی سایت نمی باشد و مسلما طی هفته های آتی باز هم تغییرات زیادی روی آن اعمال خواهد شد و بخش های دیگری به آن اضافه می شود. لذا در صورتی که با مشکلی در نسخه فعلی سایت مواجه شدید و یا نظر خاصی دارید حتما ما را از نقطه نظرات خود مطلع نمایید. مطمئنا هدف اصلی ما در درجه اول تسهیل کاربری سایت و کسب رضایت کاربران سایت می باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;توجه&lt;/strong&gt;:&amp;nbsp;نسخه قبلی سایت را بصورت موقت بر روی&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://old.aqeedeh.com&quot;&gt;این آدرس&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;قرار داده ایم تا اگر کاربری نیاز داشت امکان استفاده از نسخه قبلی&amp;nbsp;برایش فراهم باشد.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نرم افزار قلم اندروید، آی او اس و ویندوز</title>
<link>http://qalamlib.com/news/404</link>
<description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;امکانات ویژه، طراحی دلنواز، حجم پایین&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مژده به دوستان خوب و همراهان سایت عقیده&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بعد از ماه&amp;zwnj;ها تلاش شبانه&amp;zwnj;روزیِ بخش فنیِ مجموعه موحدین، بالاخره نسل جدید نرم&amp;zwnj;افزار قلم برای سیستم عامل اندروید، آی او اس و ویندوز منتشر شد. تلاش ما در طراحی این نرم&amp;zwnj;افزار بر آن بوده است تا امکانات اختصاصی این برنامه را به بهترین شکل در اختیار پژوهشگران و علاقمندان قرار دهیم. برنامه&amp;zwnj;ای که هم اکنون در اختیار شماست، در طول سال گذشته، بارها تغییر کرده و بهبود یافته و ـ ان شاء الله ـ در چند ماه آینده نیز شاهد بهینه&amp;zwnj;سازی&amp;zwnj;های دیگری خواهیم بود.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از امکانات منحصر به فرد این نرم&amp;zwnj;افزار، می&amp;zwnj;توان به دریافتِ نسخه متنی کتابها اشاره کرد. نسخه متنی، علاوه بر حجم بسیار کم، در مقایسه با سایر نسخه&amp;zwnj;های کتاب، امکانات بی&amp;zwnj;نظیری را در اختیار کاربران نرم افزارهای اندروید و آی او اس قرار می&amp;zwnj;دهد؛ از جمله:&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جستجو در متن تمام کتابها؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;مشخص کردن بخشهای دلخواه در متن کتاب؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;حاشیه&amp;zwnj;نویسی برای کتاب؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;بازنشر چکیده یا قسمتی از متن کتاب در برنامه&amp;zwnj;های دیگر یا شبکه&amp;zwnj;های اجتماعی؛&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;تغییر نوع و اندازه قلم.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نرم&amp;zwnj;افزار کتابخانه قلم، تجربه&amp;zwnj;ای بسیار متفاوت از مطالعه کتاب&amp;zwnj;های الکترونیک در اختیار خوانندگان قرار خواهد داد؛ تجربه&amp;zwnj;ای که هرگز در دنیای کتاب&amp;zwnj;های کاغذی نمی&amp;zwnj;توان بدان دست یافت. پس نرم&amp;zwnj;افزار کتابخانه قلم را دانلود کنید و از امکانات بی&amp;zwnj;نظیرِ آن لذت ببرید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=com.mowahedin.alqalam&amp;amp;hl=fa&quot;&gt;&lt;strong&gt;نسخه اندروید&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://itunes.apple.com/il/app/pen-library-ktabkhanh-qlm/id921166915?mt=8&quot;&gt;&lt;strong&gt;نسخه آی او اس (آیفون و آیپد)&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;نسخه ویندوز (به زودی)...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;به زودی نسخه آفلاین این نرم افزار که حاوی همه کتابهای متنی سایت است نیز در دسترس کاربران قرار خواهد گرفت.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>مطالعه آنلاین کتاب‌های سایت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/403</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پس از ماهها تلاش، توانستیم فرایندی ایجاد کنیم که از طریق آن، بتوانیم نسخه متنی کتابها را به سایت اضافه کنیم و با حجمی کم، امکانات بی&amp;zwnj;نظیری را در اختیار خوانندگان عزیز قرار دهیم. بدین صورت، امکان مطالعه آنلاین بسیاری از کتابهای سایت فراهم آمده و به زودی نیز نسخه متنی کتابهای دیگر نیز به این مجموعه اضافه خواهد شد. در حال حاضر، علاقمندان می&amp;zwnj;توانند بیش از 300 کتاب را به صورت آنلاین مطالعه نمایند و ان شاء الله به زودی نسخه متنی کتاب&amp;zwnj;های دیگر نیز به آن افزوده خواهد شد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به لطف الله متعال، در آینده&amp;zwnj;ای نه چندان دور، با بهینه سازی طراحی سایت، امکانات پژوهشی ویژه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ای برای مطالعه آنلاین کتاب ها در اختیار شما قرار خواهد گرفت. ضمناً، علاوه بر مطالعه آنلاین کتابها، امکان دانلود این نسخه در نرم&amp;zwnj;افزارهای اندروید و آی او اس نیز فراهم شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;راهنمای مطالعه آنلاین کتاب:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

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<title>نرم افزار کتابخانه قلم آیپد و آیفون آپدیت شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/402</link>
<description>&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;نرم افزار کتابخانه قلم&amp;nbsp;آیفون و آیپد آپدیت شد&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;**با ما باشید با تجربه ای نوین از کتابخوانی**&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;کتابخانۀ قلم، بزرگترین کتابخانه اسلامی به زبان فارسی است. این پژوهشکدۀ دیجیتال، بیش از 1600 کتاب، مقاله و نشریه را در قالب هشتاد موضوع مختلف در خود جای داده است.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;تغییرات این نسخه:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li style=&quot;line-height: 20.8px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;بازسازی طراحی و جلوه های چشمگیر و دلنواز&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;نمایش فایل های PDF در برنامه و امکان مشاهده فهرست آنها با امکان همرسانی فایل پی دی اف از طریق ایمیل و غیره.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;تغییر برنامه نویسی برنامه و سازگاری با اندازه های iphone6, iphone6 plus.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;بهره برداری از برخی از خواص جدید در iOS8.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;اضافه بخش مدیریت کتاب های دانلود شده.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong style=&quot;font-family: nazli; font-size: 18px; line-height: 18px;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://itunes.apple.com/us/app/pen-library-mktbt-alqlm/id921166915?mt=8&quot;&gt;دانلود نرم افزار کتابخانه قلم&lt;/a&gt;&amp;nbsp;(آیفون و آیپاد)&lt;/strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;strong style=&quot;font-family: nazli; font-size: 18px; line-height: 18px;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=com.mowahedin.alqalam&quot;&gt;دانلود نرم افزار کتابخانه قلم&lt;/a&gt;&amp;nbsp;(اندروید)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.8px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;توسط: کانال تلگرام رسمی مجموعه موحدین و سایت عقیده&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 20.8px; text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;https://telegram.me/mowahedin&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.8px; text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;تماس با سایت عقیده:&lt;br /&gt;
Book@aqeedeh.com&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>کانال تلگرام مجموعه موحدین راه اندازی شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/400</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 20.8px;&quot;&gt;مژده مژده&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong style=&quot;color: rgb(0, 100, 0); font-size: 16px; line-height: 25.6px; text-align: center;&quot;&gt;لینک کانال تلگرام مجموعه موحدین&lt;/strong&gt;&lt;br style=&quot;color: rgb(0, 100, 0); font-size: 16px; line-height: 25.6px; text-align: center;&quot; /&gt;
&lt;a href=&quot;https://Telegram.me/mowahedin&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 100, 0); font-size: 16px; line-height: 25.6px; text-align: center;&quot;&gt;https://Telegram.me/mowahedin&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 20.8px;&quot;&gt;کانال تلگرام مجموعه موحدین جهت نشر مطالب مفید از سایت&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 20.8px;&quot;&gt;های عقیده، صدای اسلام، اسلام تکس، ویدیوفارسی، ذکر و سایت های دیگر این مجموعه راه اندازی شد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;این کانال، تنها کانال رسمی مجموعه علمی فرهنگی موحدین می&amp;zwnj;باشد و همه پیام&amp;zwnj;های مربوط به سایت&amp;zwnj;های مجموعه موحدین &lt;strong&gt;فقط و فقط از طریق این کانال&lt;/strong&gt; منتشر خواهد شد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;لیست سایت های مجموعه موحدین به شرح زیر می باشد:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;www.mowahedin.com &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;پروژه های مجموعه موحدین&lt;br /&gt;
www.aqeedeh.com &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;کتابخانه عقیده&lt;br /&gt;
www.sadaislam.com &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;صدای اسلام&lt;br /&gt;
www.islamtxt.net &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;اسلام تکس&lt;br /&gt;
www.videofarsi.com &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;ویدیوفارسی&lt;br /&gt;
www.zekr.tv &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;ذکر&lt;br /&gt;
www.mowahed.com &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;موحد&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;راه&amp;zwnj;های تماس با مجموعه موحدین:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
contact@mowahedin.com&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;book@aqeedeh.com&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;sada@sadaislam.com&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;islamtxt@islamtxt.net&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#006400;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;لینک کانال تلگرام مجموعه موحدین&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;https://Telegram.me/mowahedin&quot;&gt;https://Telegram.me/mowahedin&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#006400;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;جهت اطمینان از صحت تعلق این کانال به مجموعه موحدین، و عدم وجود هر گونه کانال دیگری به هر اسمی، به لینک زیر در سایت عقیده مراجعه نمایید:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/news/400/&quot;&gt;http://aqeedeh.com/news/400/&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فضایل دهه ذی‌الحجه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/399</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;فضایل دهه ذی&amp;zwnj;الحجه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 1.6;&quot;&gt;ستایش پروردگار یکتا را و درود سلام&amp;nbsp;بر سید الأنبیاء&amp;nbsp;والمرسلین و آل و اصحاب بزرگوارش. برادران و خواهران مسلمان، از فضل و رحمت الله است كه در طی سال&amp;nbsp;برای بندگان صالح خود مواسمی قرار می دهد كه در آن به اعمال صالح بپردازند و یكی از&amp;nbsp;این مواسم خیر دهه ذی&amp;zwnj;الحجة است. در فضیلت و&amp;nbsp;بزرگی این دهه مبارك ادله بسیاری از قرآن و سنت وارد شده است:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1-الله سبحانه و&amp;nbsp;تعالی می فرماید:&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;والفجر ولیال عشر&amp;raquo; [الفجر:1 و 2]&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;قسم به سپیده&amp;zwnj;دم و قسم به شب&amp;zwnj;های دهگانه&amp;raquo;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابن كثیر ـ رحمه الله ـ در تفسیر خود می&amp;zwnj;گوید: &amp;laquo;منظور از این ده شب، دهۀ ذی&amp;zwnj;الحجة است&amp;raquo; (بخاری). از ابن&amp;zwnj;عباس ـ رضی الله&amp;nbsp;عنهماـ روایت است كه گفت: &amp;laquo;رسول الله ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ فرمود: &amp;laquo;هیچ ایامی نیست&amp;nbsp;كه نزد الله سبحانه و تعالی عمل صالح [در آن] محبوب&amp;zwnj;تر از این ایام باشد&amp;raquo;. پرسیدند: حتی&amp;nbsp;جهاد در راه الله؟ فرمود: &amp;laquo;و نه جهاد در راه الله؛ مگر شخصی كه با جان و مال خود خارج&amp;nbsp;شود و هیچ&amp;zwnj;كدامشان را برنگردانَد&amp;raquo;؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2-&amp;nbsp; الله سبحانه و تعالی می فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;ویذكروا&amp;nbsp;اسم الله فی أیام معلومات&amp;raquo; [الحج:28]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;و نام الله را در روزهای مشخص یاد كنند&amp;raquo;.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابن&amp;nbsp;عباس ـ رضی الله عنهماـ در تفسیر آن می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;یعنی روزهای دهگانه ذی&amp;zwnj;الحجه&amp;nbsp;(تفسیر ابن&amp;zwnj;كثیر)؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;3-&amp;nbsp; از ابن&amp;zwnj;عمر ـ رضی الله عنهماـ روایت است كه رسول الله ـ&amp;zwnj;صلی الله علیه و سلم&amp;zwnj;ـ&amp;nbsp;فرمودند: &amp;laquo;هیچ ایامی نیست كه عمل صالح در آن محبوب&amp;zwnj;تر از این ایام دهگانه باشد؛ پس&amp;nbsp;در آنها بسیار تهلیل (لا اله الا الله) و تكبیر (الله اكبر) و تحمید (الحمدلله) بگویید&amp;raquo; (روایت احمد)؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;4- وقتی كه دهه ذی&amp;zwnj;الحجة داخل می&amp;zwnj;شد، سعید بن جبیر ـ رحمه الله ـ&amp;nbsp; چنان در عبادت تلاش می&amp;zwnj;كرد كه توانش به پایان&amp;nbsp;می&amp;zwnj;رسید (روایت الدارمی)؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;5- ابن&amp;zwnj;حجر عسقلانی می&amp;zwnj;فرماید:&amp;nbsp;&amp;laquo;آنچه در فضیلت و برتری ایام ذی&amp;zwnj;الحجة نمایان است، جمع شدن تمام&amp;nbsp;عبادات در این مناسبت است؛ یعنی نماز و روزه و صدقه و حج؛ و در هیچ مناسبت دیگری&amp;nbsp;چنین نیست&amp;raquo; (فتح الباری شرح صحیح&amp;nbsp;بخاری).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;اعمال مستحب دهۀ ذی&amp;zwnj;الحجة:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1- نماز: در این ایام، زود&amp;nbsp;رفتن برای انجام فرایض در مسجد و بسیار انجام دادن نوافل مستحب است؛ زیرا این اعمال&amp;nbsp;از بهترین راههای نزدیکی به الله است. ثوبان ـ رضی الله عنه ـ می&amp;zwnj;گوید: شنیدم رسول الله ـ صلی الله&amp;nbsp;علیه و سلم ـ فرمودند: &amp;laquo;بر تو باد بسیار سجده بردن برای الله؛ [زیرا] كه تو سجده&amp;zwnj;ای برای الله&amp;nbsp;نمی&amp;zwnj;بَری مگر آنكه الله تو را به خاطر آن، درجه&amp;zwnj;ای بالا می برد و گناهی از گناهانت&amp;nbsp;پاک می كند&amp;raquo; [روایت مسلم]؛ و این فضیلت در تمام سال وجود دارد؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2- روزه:&amp;nbsp;هنیدة بن خالد ـ رضی الله عنه ـ روایت می كند كه &amp;laquo;رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ&amp;nbsp;نهم ذی الحجه و روز عاشورا و سه روز از هر ماه را روزه می گرفت&amp;raquo; (روایت امام احمد&amp;nbsp;و ابوداود و نسائی)، و امام نووی ـ رحمه الله&amp;zwnj;ـ دربارۀ روزه ایام دهگانه می&amp;zwnj;فرماید:&amp;nbsp;&amp;laquo;روزۀ&amp;nbsp;آن ایام بسیار مستحب است&amp;raquo;؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;3- تكبیر و تهلیل و تحمید: امام بخاری ـ رحمه الله ـ می&amp;zwnj;گوید: &amp;laquo;ابن عمر و ابوهریره ـ رضی الله&amp;zwnj; عنهماـ در روزهای دهگانه وارد بازار می شدند و تكبیر می&amp;zwnj;گفتند و&amp;nbsp;مردم در جوابِ تكبیر آنها تكبیر می&amp;zwnj;گفتند&amp;raquo;. ایشان همچنین نقل می&amp;zwnj;کند: &amp;laquo; عمر بن خطاب&amp;nbsp;ـ رضی الله عنه ـ در قبّه&amp;zwnj;اش در مِنی&amp;nbsp; تكبیر می&amp;zwnj;گفت و اهل مسجد تكبیر او را می&amp;nbsp;شنیدند و تكبیر می&amp;zwnj;گفتند و مردم در بازار به تكبیر آنها تكبیر می&amp;zwnj;گفتند؛ چنانكه مِنی&amp;nbsp;بر اثر تكبیر آنها به لرزه می&amp;zwnj;افتاد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شایسته است ما مسلمانان این سنت فراموش&amp;zwnj;شده را&amp;nbsp;كه متأسفانه حتی در بین اهل صلاح و خیر به فراموشی سپرده شده است، مانند آنچه در&amp;nbsp;میان سلف صالحمان بود زنده كنیم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;نحوۀ تكبیر گفتن:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الف)&amp;nbsp;الله اكبر،&amp;nbsp;الله اكبر، الله اكبر كبیرا&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ب)&amp;nbsp;الله اكبر، الله اكبر، لا اله الا الله، و الله&amp;nbsp;اكبر، الله اكبر، و لله الحمد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ج)&amp;nbsp;الله اكبر، الله اكبر، الله اكبر، لا اله الا&amp;nbsp;الله، و الله اكبر، الله اكبر، الله اكبر، و لله الحمد؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;4-روزه روز عرفه:&amp;nbsp;روزه عرفه به دلیل آنچه از رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ در مورد روزه عرفه به ثبوت رسیده است مستحب است. رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ می فرماید:&amp;laquo;(ثواب) آن را نزد الله این گونه احتساب می&amp;zwnj;كنم كه كفارۀ گناهان سال قبل و سال بعدش باشد&amp;raquo; (روایت مسلم)؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;5-فضیلت روز قربانی (نحر): در سنن ابی&amp;zwnj;داود از رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ روایت است كه فرمود: &amp;laquo;بزرگترین ایام نزد&amp;nbsp;الله سبحانه و تعالی روز نحر است، و پس از آن، روز قَرّ (روز استقرار&amp;nbsp;در منی كه یازدهم ذی&amp;zwnj;الحجه است)&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;برخی از&amp;nbsp;احكام قربانی:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اصل در قربانی آن است كه برای زنده ها مشروع است؛ اما&amp;nbsp;اینكه برخی از مردم گمان می&amp;zwnj;كنند که قربانی تنها برای مردگان است، صحیح نیست و اصل و&amp;nbsp;اساسی ندارد. قربانی برای اموات سه حالت دارد:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1- به همراه زندگان&amp;nbsp;برای آنها نیز قربانی شود؛ مانند اینكه فرد برای خود و خانواده&amp;zwnj;اش قربانی كند و&amp;nbsp;قصدش زندگان و اموات باشد (خویشاوندانش كه فوت نموده&amp;zwnj;اند)؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2- فرد بر اساس وصیت متوفی برایش قربانی&amp;nbsp;كند؛&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;3- فرد به عنوان صدقه برای اموات به طور مستقل قربانی كند. این کار جایز است، و فقهای حنبلی تقریر نموده&amp;zwnj;اند كه ثواب آن به متوفی می رسد (با قیاس بر&amp;nbsp;صدقه) اما آنچه مشخص است، این نوع قربانی، سنت و مستحب نیست به دلیل آنكه&amp;nbsp;رسول الله ـ&amp;nbsp;صلی الله علیه و سلم ـ برای هیچكدام از درگذشتگانش به طور خصوصی قربانی ننموده است؛ نه برای حمزه سیدالشهداء ـ رضی الله عنه ـ و نه برای فرزندانش كه قبل از او وفات&amp;nbsp;كردند و نه برای همسرش ام المومنین خدیجه رضی الله عنها كه از محبوب ترین همسرانش&amp;nbsp;بود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتابخانۀ عقیده&amp;nbsp;برای حجاج&amp;nbsp;محترم، حج مقبول و&amp;nbsp;بخشش گناهان، و برای عموم مسلمانان، توفیق عبادت و هدایت، از بارگاه رب العزة والجلال تمنا دارد.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نرم افزارهای اندروید، آیپد و آیفون سایت منتشر شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/398</link>
<description>&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;نرم افزارهای اندروید، آیفون و آیپد کتابخانه&amp;nbsp;منتشر شد&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;**با ما باشید با تجربه ای نوین از کتابخوانی**&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;کتابخانۀ قلم، بزرگترین کتابخانه اسلامی به زبان فارسی است. این پژوهشکدۀ دیجیتال، بیش از 1500 کتاب، مقاله و نشریه را در قالب هشتاد موضوع مختلف در خود جای داده است. از مهم&amp;zwnj;ترین ویژگی&amp;zwnj;های این کتابخانه می&amp;zwnj;توان به موارد زیر اشاره نمود:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style=&quot;color: rgb(137, 137, 137); font-family: &apos;Lucida Grande&apos;, &apos;Lucida Sans Unicode&apos;, Arial, Verdana, sans-serif; font-size: 12px; line-height: 18px;&quot; /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;سهولت در استفاده، محیط گرافیکی چشم&amp;zwnj;نواز و رابط کاربری بسیار قدرتمند&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
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	&lt;li style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;جستجو در متن کتاب&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;قابلیت دانلود کتاب به صورت &lt;strong&gt;متنی &lt;/strong&gt;یا پی دی اف&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;از مطالعه کتاب&amp;zwnj;ها لذت ببرید. با بهره&amp;zwnj;گیری از افکتی زیبا، گویا کتاب واقعی پیش روی شماست.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;قابلیت هایلایت متن، و اضافه یادداشت به کتاب دانلود شده.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;به اشتراک گذاری چکيده یا متن کتاب با دوستان خود از طریق واتساپ، ایمیل، اس ام اس و...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;و ده&amp;zwnj;ها مورد دیگر.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=com.mowahedin.alqalam&quot;&gt;دانلود نرم افزار کتابخانه قلم&lt;/a&gt;&amp;nbsp;(اندروید)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;line-height: 20.7999992370605px;&quot;&gt;&lt;strong style=&quot;font-family: nazli; font-size: 18px; line-height: 18px;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://itunes.apple.com/us/app/pen-library-mktbt-alqlm/id921166915?mt=8&quot;&gt;دانلود نرم افزار کتابخانه قلم&lt;/a&gt;&amp;nbsp;(آیفون و آیپاد)&lt;/strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:nazli;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 18px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>دعوت به همکاری</title>
<link>http://qalamlib.com/news/397</link>
<description>&lt;h1 align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/h1&gt;

&lt;h1 align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b titr;&quot;&gt;&lt;strong&gt;دعوت به همکاری&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;کتابخانه عقیده جهت گسترش فعالیت&amp;zwnj;های علمی&amp;zwnj;ـ پژوهشی خود از علاقه&amp;zwnj;مندان دعوت به همکاری می&amp;zwnj;نماید. اگر شما در زمینه&amp;zwnj;های ذیل فعالیت دارید، لطفاً مشخصات فردی و سوابق کاری خود را&amp;nbsp;به ایمیل&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;mailto:cv@aqeedeh.com&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;cv@aqeedeh.com&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;ارسال نمایید. از&amp;nbsp;کاربرانی که افرادی را در این زمینه&amp;zwnj;ها می&amp;zwnj;شناسند نیز خواهشمند است این اطلاعیه&amp;nbsp;را برای آنها ارسال کنند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;1-&amp;nbsp;طراحی جلد،&amp;nbsp;کتاب، بروشور، تبلیغات و غیره؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;2-&amp;nbsp;ترجمه از/ به زبان های فارسی، عربی، انگلیسی و غیره؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;3- بررسی و مطابقت نسخه فارسی با اصل عربی کتاب؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;4- ویرایش&amp;nbsp;متن؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;5- پژوهش و تحقیقات؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;6- تایپ و صفحه&amp;zwnj;آرایی کتاب؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;7- اسکن کتابهای چاپ&amp;zwnj;شده&amp;zwnj;ای که در سایت کتابخانه موجود نیستند؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;8-&amp;nbsp;معرفی کتاب به سایت؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;9-&amp;nbsp;پیشنهاد کتاب جهت ترجمه همراه با طرح توجیهی آن؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;10- فیلمنامه&amp;zwnj;نویسی و فیلم&amp;zwnj;سازی؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;11- گویندگی و صدابرداری؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;12- برنامه&amp;zwnj;نویسی یا ارائه طرح برای ساخت نرم&amp;zwnj;افزارهای مختلف دستگاه&amp;zwnj;های هوشمند یا کامپیوتر؛&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;13- تبلیغ برای فعالیتها از طرق مختلف همچون ساخت بنر و نشر آن در واتساپ، تبلیغات رایگان در سایتها، نشر کاغذی و غیره.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:28px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;&lt;strong&gt;لطفا این مشخصات را برای ما ارسال نمایید:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:28px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;الف: نام و نام خانوادگی&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:28px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;ب: تاریخ تولد&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:28px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;ج: محل سکونت&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:28px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;د: زمینه فعالیت و سابقه یا نمونه کاری&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:28px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;هـ: تحصیلات&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:26px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;cv@aqeedeh.com&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;margin-right:4.5pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:b nazanin;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;واتساپ سایت عقیده:&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;یکی از مهم&amp;zwnj;ترین دغدغه&amp;zwnj;های بسیاری از متقاضیان خدمات حقوقی، دریافت &lt;a href=&quot;https://www.datikan.com&quot;&gt;مشاوره حقوقی&lt;/a&gt; دقیق پیش از تشکیل پرونده و اقدام حقوقی است.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>درباره رده‌بندی کتاب‌های سایت عقیده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/396</link>
<description>&lt;p&gt;درباره رده&amp;zwnj;بندی کتاب&amp;zwnj;های سایت عقیده&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;امروز تمام کتابخانه&amp;zwnj;های دنیا- هرقدر هم که کوچک باشند- بدون بهره&amp;zwnj;مندی از یک سامانة رده&amp;zwnj;بندیِ مناسب و استاندارد استفادة چندانی ندارند. به بیان دیگر، اگر رده&amp;zwnj;بندی را از یک کتابخانه- چه سنتی باشد، چه دیجیتال- حذف نماییم جز سردرگمی و جستجوهای ناقص، چیزی دستگیرِ کتابجویان و کتابخوانان نخواهد شد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در رده&amp;zwnj;بندی کتابخانه&amp;zwnj;ای، کتاب&amp;zwnj;ها براساس موضوعات اصلی و سپس فرعی تقسیم&amp;zwnj;بندی می&amp;zwnj;گردند. اصلی&amp;zwnj;ترینِ این سامانه&amp;zwnj;ها رده&amp;zwnj;بندیِ کتابخانة کنگرة آمریکا و رده&amp;zwnj;بندی دیویی هستند. هر چند این رده&amp;zwnj;بندی&amp;zwnj;ها هر دو پرکاربرد و پرطرفدار هستند، رده&amp;zwnj;بندیِ دیویی آسان&amp;zwnj;تر و فراگیرتر است و این دلیل پیاده&amp;zwnj;سازیِ سامانة دیویی در کتابخانة سایت عقیده است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در فرایند پیاده&amp;zwnj;سازی و اِعمال کدهای دیویی برای کتاب&amp;zwnj;های فارسی، از ترتیب&amp;zwnj;بندی موضوعی&amp;zwnj;ای استفاده شد که کتابخانة ملی ایران در دوران پهلوی بومی&amp;zwnj;سازی و اجرا نموده است. ذکر این نکته ضروری است که کتابخانه ملی، گرایش مذهبی خاصی را ترجیح نداده؛ با وجود این، عقاید مذهبی&amp;zwnj;ای را که شیعیان به دین اسلام افزوده&amp;zwnj;اند، در این سامانة بومی&amp;zwnj;شده لحاظ کرده&amp;zwnj;اند؛ بدین معنا که مفاهیمی همچون امامت، سیرة چهارده&amp;zwnj;معصوم و خمس را در آن گنجاند&amp;zwnj;ه&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در این شرایط، جامعیت و فراگیریِ این رده&amp;zwnj;بندی فارسی، استفاده از آن را ایجاب می&amp;zwnj;کرد، اما وجود مفاهیم و موضوعات بدعت&amp;zwnj;آلود، مانعِ اجرای آن بود. این امر، باعث اتخاذ روشی بینابینی و ابداعی شد؛ بدین معنا که اساس و پایه این سامانه حفظ شد و موضوعات نادرست و بدعیِ آن، تبدیل و تعدیل گردید. برای مثال، &amp;laquo;سیره چهارده معصوم&amp;raquo; به &amp;laquo;سیره اهلبیت&amp;raquo; تغییر یافت و ردة &amp;laquo;امامت&amp;raquo; و &amp;laquo;خمس&amp;raquo; به کتاب&amp;zwnj;هایی تخصیص داده شد که به بررسی و رد اندیشه امامت و خمس شیعی پرداخته بودند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خوانندگان محترم با نگاهی اجمالی به فهرست موضوعات دیویی سایت عقیده، می&amp;zwnj;توانند به سادگی از موضوع کتاب آگاهی اجمالی به دست آورند. لازم به ذکر است که کدهای جدید کتابخانه عقیده از سه دسته کد تشکیل شده است: 654/33/297 که در این مجموعه، عدد اول (297) رده کتاب&amp;zwnj;های اسلامی در سامانة دیویی است؛ عدد دوم (33) شماره موضوع می&amp;zwnj;باشد که بر اساس آن می&amp;zwnj;توان از موضوع کتاب، اطلاعی اجمالی و نسبی پیدا کرد؛ عدد سوم (654) نیز عدد ردیف کتاب در کتابخانه عقیده است. چنانچه می&amp;zwnj;بینیم، پیاده&amp;zwnj;سازی این رده&amp;zwnj;بندی در سایت عقیده علاوه بر استاندارد کردنِ این کتابخانه دیجیتال، جستجو و دسترسی موضوعی به کتاب&amp;zwnj;ها را آسان&amp;zwnj;تر و سریع&amp;zwnj;تر می&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نسخه جدید نرم افزار سایت عقیده (نسخۀ ویندوز) منتشر گردید</title>
<link>http://qalamlib.com/news/395</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;h1 style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 102, 0); &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 36px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt;&amp;nbsp;نسخه &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color:#FF0000;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 36px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt;&lt;strong&gt;دوم &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 102, 0); &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 36px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt;نرم افزار سایت عقیده&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-size:38px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt;&lt;sup&gt;منتشر گردید&lt;/sup&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;h2 style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 22px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Nazli; &quot;&gt;تنها با کلیک ماوس، بیش از هزار کتاب که دست یافتن به آن&amp;zwnj;ها آرزوی هر دانشور و طالب علم و معرفتی است بر صفحه کامپیوتر شما به نمایش در می‫آید.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;

&lt;h2&gt;&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;

&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;کتابخانه عقیده؛ بزرگترین میراث فرهنگی قرن معاصر ما، خدمت ویژه‫ای را به دوستداران کتاب تقدیم داشته است. شما با دانلود نرم افزار &amp;laquo;کتابخانۀ قلم&amp;raquo;، امکان دانلود کتاب&amp;zwnj;های دلخواهتان را خواهید داشت.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;h3&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0); &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;از مزایای نسخۀ دوم نرم افزار:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;1- امکان دانلود نسخه متنی کتاب ها با حجم بسیار کم&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;2- جستجو در متن همه کتاب های دانلود شده&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;3- دسترسی به فهرست و چکیدۀ همۀ کتاب&amp;zwnj;های سایت&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;2- امکان دانلود نسخه متنی&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;و نسخۀ پی دی اف (PDF) کتاب&amp;zwnj;ها بدون نیاز به فیلترشکن&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;3- جستجوی کتاب&amp;zwnj;ها بر اساس عنوان کتاب، مؤلف و موضوع آن&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;4- اطلاع یافتن از کتاب&amp;zwnj;های جدید و امکان دانلود آنها&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;5- یادداشت نویسی برای کتاب&amp;zwnj;ها توسط کاربران&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;6- بکاپ گرفتن از برنامه و همچنین آپدیت به نسخه های بعدی&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;ومزایای دیگری که خودتان با دانلود این نسخه از نرم افزار به آنها پی خواهید برد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 20px; &quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Nazli; &quot;&gt;پس، پیش به&amp;zwnj;سوی علم و دانش و معرفت، و افروختن شمع هدایت و رستگاری در کالبد خویشتن و دیگران...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.tk/book_files/pdf/fa/Qalam-Library-Lite.exe/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;دانلود نسخۀ سبک (بدون کتاب، و با امکان دانلود کتاب&amp;zwnj;های دلخواه) با حجم 59 مگابایت&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.tk/book_files/pdf/fa/Qalam-Library-Full.rar&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;دانلود نسخۀ کامل&amp;nbsp;(حاوی همه کتاب های متنی سایت) با حجم 334 مگابایت&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;

&lt;p&gt;تذکر: نسخه اندروید نیز به زودی به روزآوری خواهد شد.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>بار الها از رمضان محروممان مگردان!...</title>
<link>http://qalamlib.com/news/394</link>
<description>&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;بار الها از رمضان محروممان مگردان!...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	د/ نور محمد امرا&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	پس از مسیری طولانی از جذر و مد در میان گردباد سراسیمه زندگی پر سر و صدا، و ستیز در پی بقا و یا کسب زرق و برق و کمالیات بدور از سیمای سترگ توحید در دلهای پریشان انسانهای آلوده به گناه، رمضان با شعارهای روشن و گویای خود از راه می‫رسد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	- &amp;laquo;من صام رمضان إيمانا ً واحتساباً غفر له ما تقدم من ذنبه&amp;raquo; ( متفق علیه)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;هر کس رمضان را بر مبنای ایمان و با شعور و احساس دائم به مراقبت الهی روزه گرفت گناهان پیشین او بخشوده خواهند شد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	- &amp;laquo;من قام رمضان إيماناً واحتساباً غُفر له ما تقدم من ذنبه&amp;raquo;. (متفق علیه)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;هر کس رمضان را با ایمانی راسخ و احساس به مراقبت همیشگی پروردگارش به نماز و عبادت ایستاد گناهان او بخشوده می‫شوند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	- &amp;laquo;مَن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا، غُفر له ما تقدَّم من ذنبه&amp;raquo;. (متفق علیه)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;هر کس شب قدر را با ایمانی راستین و شعور به مراقبت الله به عبادت زنده نگه داشت گناهانی که از او سرزده آمرزیده می‫گردند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	شرط پذیرفته شدن تمام عبادتها و نیایشها و روزه‫ها در وهله اول ایمان است. ایمانی که مراقبت الهی را در بر دارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	ایمانی که قلب تپنده مؤمن را توان زندان کردن آن نیست، تنها پژواک تقوای آن در قلب می‫ماند و حرکت وجودیش در حرکات و واکنشهای مؤمن تجلی می‫کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	در امالی بن بشران از رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) آورده شده &amp;quot;لَيْسَ الإِيمَانُ بِالتَّمَنِّي، وَلا بِالتَّحَلِّي، لَكِنْ مَا وَقَرَ فِي الْقَلْبِ ، وَصَدَّقَهُ الْفِعْلُ ...&amp;quot;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;ایمان آرزو و شعار ویا شکل و قیافه نیست، ایمان چیزی است که از اعماق قلب پذیرفته می‫شود و فعالیت&amp;zwnj;های فرد آنرا تأیید می‫کند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;با فرا رسیدن ماه مبارک رمضان شایسته است به چند نقطه توجه داشته باشیم:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;1) &lt;/strong&gt; ماه رمضان ایستگاه پر فروغ سال است که پیامبر اکرم (صلی الله علیه وسلم) از دو ماه پیش از آن، از خداوند طول عمر و آمادگی برای دریافت رمضان را درخواست می‫کردند: &amp;quot;اللهم بارك لنا في رجب وشعبان وبلغنا رمضان&amp;quot;. (به روایت البزار،و الطبراني في الأوسط (3939)). &amp;laquo;بارالها در ماه رجب و شعبان ما برکت ده، و ما را زنده نگه دار تا رمضان را دریابیم&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	چه بسا افرادی که رمضان سال پیش را در کنار ما بودند والآن از این جهان فانی رخت بربسته‫اند. و چه زیادند آنهایی که طوفان مشقت بار سفرهای طولانی و خارهای تیز فرسودگی عمر، و یا بیماریهای جان سوز آنها را از نعمت پربار روزه بازداشته است. و با اشکهای حسرت و چشمهای امید به روزه‫داران سعادتمند می‫نگرند. و ما را خداوند مهربان با نعمت روزه نوازیده، پس شکر گویم مر خدای را که شکر نعمت نعمتت افزون کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكُمْ لَئِن شَكَرْتُمْ لَأَزِيدَنَّكُمْ وَلَئِن كَفَرْتُمْ إِنَّ عَذَابِي لَشَدِيدٌ &amp;raquo;﴿ابراهيم: ٧﴾ &amp;laquo;و وقتی که خدا اعلام فرمود که شما بندگان اگر شکر نعمت به جای آرید بر نعمت شما می&amp;zwnj;افزایم و اگر کفران کنید عذاب من بسیار سخت است&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;2) &lt;/strong&gt; با عهد و پیمان صادقانه با خدایمان و نیت جازم و تصمیم قوی خود را برای ماهی پر از سرشت نیکو و گفتار شایسته و کردار خوب آماده گردانیم. نشاید ناقوس مرگ ما را در میان راه غافل گیر کند، و از اجر و پاداش ادامه مسیر محروم گردیم. با نیت خود می‫توانیم اجر و پاداش کامل ماه مبارک را برچینیم ولو اینکه ماهمان به پایان نرسد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;3) &lt;/strong&gt; نصیحت گهربار رسول هدایت و پیام آور رستگاری را گوشواره گوشها و توتیای چشمانمان گردانیم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	- &amp;laquo;إِذَا كَانَ يَوْمُ صَوْمِ أَحَدِكُمْ فَلا يَرْفُثْ، وَلا يَسْخَبْ، فَإِنْ سَابَّهُ أَحَدٌ أَوْ شَاتَمَهُ أَوْ قَاتَلَهُ فَلْيَقُلْ: إِنِّي امْرُؤٌ صَائِمٌ&amp;raquo; (به روایت امام بخاری) &amp;laquo;اگر روز روزه کسی از شما بود، از حرکتها و حرفهای زشت و ناسزاگویی دوری جوید، و اگر کسی او را زیر باران دشنام و ناسزا گرفت، بگوید: من روزه دارم&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;4) &lt;/strong&gt; فرصت طلائی بازگشت و توبه به خداوند است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	در رمضان که سدهای سترگ آلایش ایمانی وسوسه‫های شیطانهای بشری را کم رنگ می‫کند و شیطانهای جنی غل و زنجیر زده می‫شوند اگر کسی توبه نکند پس کی توبه خواهد کرد؟!&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	خداوند بخشاینده و مهربان است بر تمامی انسانهای گناهکار.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) از پروردگار عالمیان چنین آورده است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	- &amp;laquo;يا ابن آدم! لو بلغت ذنوبك عنان السماء ثم استغفرتني غفرت لك ولا أبالي&amp;raquo; (به روایت ترمذی، آلبانی حدیث را صحیح شمرده است). &amp;laquo;ای بنی آدم اگر گناهانت تا سقف آسمان بالا روند سپس از من آمرزش بخواهی همه آنچه از سر تو سرزده را می‫بخشم&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;5) &lt;/strong&gt; ازمهمترین چیزهایی که قبل از رمضان باید بدانها اهمیت دهیم؛ آموزش احکام رمضان، روزه و آداب و شروط، و واجبات و سنن آن و هر آنچه از احکام فقهی که به روزه و رمضان ارتباط دارد است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	- &amp;laquo;من يرد الله به خيرا يفقهه في الدين&amp;raquo; ( به روایت الترمذی، وآنرا حسن صحیح برشمرده)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;هر کسی که خداوند خیری برای او بخواهد او را در دین فقیه می‫گرداند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;6) &lt;/strong&gt; خانواده‫مان را رمضانی گردانیم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	محبت زن و فرزند با فطرت انسانی سرشته شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;زُيِّنَ لِلنَّاسِ حُبُّ الشَّهَوَاتِ مِنَ النِّسَاءِ وَالْبَنِينَ...&amp;raquo; (آل عمران/14)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{برای انسان، محبّت شهوات (و دلبستگی به امور مادی) جلوه داده شده است، از قبیل: عشق به زنان و فرزندان ...}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	فرزندان و خانواده خود را با مفاهیمی چون نماز جماعت، تراویح، تربیت بر روزه، آموزش رحمت و فروتنی و تواضع، نشست با بینوایان، وقت شناسی، مشارکت در درسهای رمضانی، تشویق کنیم. و در این راستا حلم و بردباری وصبر به نمایش گذاریم:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	خداوند منان می‫فرمایند: &amp;laquo;وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا نَّحْنُ نَرْزُقُكَ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ&amp;raquo;﴿طه: ١٣٢﴾&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{خانواده&amp;zwnj;ی خود را به گزاردن نماز دستور بده (چرا که نماز مایه&amp;zwnj;ی یاد خدا و پاکی و صفای دل و تقویت روح است) و خود نیز بر اقامه&amp;zwnj;ی آن ثابت و ماندگار باش. ما از تو روزی نمی&amp;zwnj;خواهیم، بلکه ما به تو روزی می&amp;zwnj;دهیم. سرانجام (نیک و ستوده) از آن (اهل تقوا و) پرهیزگاری است. }&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	و می‫فرمایند: &amp;laquo;يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قُوا أَنفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَارًا وَقُودُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ عَلَيْهَا مَلَائِكَةٌ غِلَاظٌ شِدَادٌ لَّا يَعْصُونَ اللَّـهَ مَا أَمَرَهُمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ&amp;raquo; ﴿التحريم: ٦﴾&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{ای مؤمنان! خود و خانواده خویش را از آتش دوزخی بر کنار دارید که افروزینه&amp;zwnj;ی آن انسانها و سنگها است. فرشتگانی بر آن گمارده شده&amp;zwnj;اند که خشن و سختگیر، و زورمند و توانا هستند. از خدا در آنچه بدیشان دستور داده است نافرمانی نمی&amp;zwnj;کنند، و همان چیزی را انجام می&amp;zwnj;دهند که بدان مأمور شده&amp;zwnj;اند.}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	و از این فرصت طلایی برای آشتی وبرقراری روابط حسنه با خویشان خود استفاده کنیم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	رسول هدایت و رستگاری می‫فرمایند: &amp;laquo;إِنَّ اللَّهَ تَعَالَى خَلَقَ الْخَلْقَ، حَتَّى إِذَا فَرَغَ مِنْهُمْ قَامَتِ الرَّحِمُ فَأَخَذَتْ بِحَقْوِ الرَّحْمَنِ، فَقَالَ: مَهْ، فَقَالَتْ: هَذَا مَكَانُ الْعَائِذِ مِنَ الْقَطِيعَةِ؟ قَالَ : نَعَمْ، أَمَا تَرْضَيْنَ أَنْ أَصِلَ مَنْ وَصَلَكِ، وَأَقْطَعَ مَنْ قَطَعَكِ؟ قَالَتْ : بَلَى، قَالَ : فَذَاكَ لَكِ، ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: اقْرَءُوا إِنْ شِئْتُمْ: (فَهَلْ عَسَيْتُمْ إِن تَوَلَّيْتُمْ أَن تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ وَتُقَطِّعُوا أَرْحَامَكُمْ ﴿٢٢﴾ أُولَـٰئِكَ الَّذِينَ لَعَنَهُمُ اللَّـهُ فَأَصَمَّهُمْ وَأَعْمَىٰ أَبْصَارَهُمْ ﴿٢٣﴾ أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ أَمْ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقْفَالُهَا ﴿٢٤﴾)(سوره محمد) &amp;raquo; ( به روایت امام بیهقی در شعب الإیمان)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{خداوند خلایق را آفرید، چون آفریدگان آفریده شدند، رحم برخواست و عرض کرد: من از قطع روابط خویشاوندی به تو پناه می‫جویم. خداوند شکایتش را پذیرفته عرض نمود: آیا راضی می‫شوی من رابطه‫ام را با کسی که به تو رسیدگی کرد برقرار کنم، و با کسی که صله رحمش را قطع کرد رابطه‫ام را قطع کنم. رحم گفت: بلی. پروردگار فرمودند: این وعده من با توست.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	سپس پیامبر اکرم (صلی الله علیه وسلم) فرمودند: اگر خواستید در این آیه بیندیشید:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	(آیا اگر (از قرآن و برنامه&amp;zwnj;ی اسلام) روی&amp;zwnj;گردان شوید، جز این انتظار دارید که در زمین فساد کنید و پیوند خویشاوندی میان خویش را بگسلید؟ ( ۲۲) آنان کسانیند که خداوند ایشان را نفرین و از رحمت خویش بدور داشته است، لذا گوشهایشان را (از شنیدن حق) کر، و چشمانشان را (از دیدن راه هدایت و سعادت) کور کرده است. (۲۳) آیا درباره&amp;zwnj;ی قرآن نمی&amp;zwnj;اندیشند (و مطالب و نکات آن را بررسی و وارسی نمی&amp;zwnj;کنند؟) یا این که بر دلهائی قفلهای ویژه&amp;zwnj;ای زده&amp;zwnj;اند؟)}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;7) &lt;/strong&gt; به شیوه رسول الله (صلی الله علیه وسلم) نماز و تهجد برپا داریم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	آن حضرت (صلی الله علیه وسلم) می‫فرمودند: &amp;laquo;عليكم بقيام الليل، فإنه دأب الصالحين قبلكم، وقربة إلى الله تعالى، ومنهاة عن الإثم، وتكفير للسيئات&amp;raquo; (به روایت امام ترمذی وامام احمد و تصحیح آلبانی)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	شبها را با نماز زنده دارید، چرا که این شیوه نیکان و صالحان پیش از شما بوده است، و شما را نزد پروردگارتان عزیز می‫گرداند، و از گناهان باز می‫دارد، و لغزشهایتان را جبران می‫کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) در هنگام نماز بر هر آیه قرآن کریم لختی درنگ می‫فرمودند؛ اگر آیه‫ای که مؤمن را بیم می‫داد تلاوت می‫کردند از خشم خداوندی به رحمت الهی پناه می‫بردند، و اگر آیه‫ای که در آن ذکری از نعمتهای الهی می‫رفت تلاوت می‫کردند از پروردگار منان آن نعمتها را درخواست می‫نمودند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	نماز شب در رمضان و تلاوت آیات ملکوتی کلام رحمان در آن، بیدرنگ شب ما را با شب نزول قرآن که شبی مبارک از شبهای ماه نور بود پیوند می‫دهد:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	فرموده حق تعالی است: &amp;laquo;إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ&amp;raquo; ﴿القدر: ١﴾&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{ما قرآن را در شب با ارزش &amp;laquo;لیلةالقدر&amp;raquo; فرو فرستاده&amp;zwnj;ایم}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo; إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةٍ مُّبَارَكَةٍ &amp;hellip; &amp;raquo;﴿الدخان: ٣﴾&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{ما قرآن را در شب پرخیر و برکتی فرو فرستاده&amp;zwnj;ایم&amp;hellip;}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;8) &lt;/strong&gt; شب قدر را از دست ندهیم&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	لیلة القدر شب نزول قرآن، شبی که بر هزاران ماه برتری دارد، شب نزول فرشتگان، شب سلامتی و نجات از عذاب الهی، شبی که خداوند در ذکر وصفش سوره‫ای کامل در قرآن کریم اختصاص داده است&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ ﴿١﴾ وَمَا أَدْرَاكَ مَا لَيْلَةُ الْقَدْرِ ﴿ ٢﴾ لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍ ﴿٣﴾ تَنَزَّلُ الْمَلَائِكَةُ وَالرُّوحُ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِم مِّن كُلِّ أَمْرٍ ﴿٤﴾ سَلَامٌ هِيَ حَتَّىٰ مَطْلَعِ الْفَجْرِ ﴿ ٥﴾&amp;raquo;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{ما قرآن را در شب با ارزش &amp;laquo;لیلةالقدر&amp;raquo; فرو فرستاده&amp;zwnj;ایم)۱(تو چه می&amp;zwnj;دانی شب قدر کدام است (و چه اندازه عظیم است؟)(۲( شب قدر شبی است که از هزار ماه بهتر است) ۳(فرشتگان و جبرئیل در آن شب با اجازه&amp;zwnj;ی پروردگارشان، پیاپی (به کره&amp;zwnj;ی زمین و به سوی پرستشگران و عبادت کنندگان شب زنده&amp;zwnj;دار) می&amp;zwnj;آیند برای هرگونه کاری (که بدان یزدان سبحان دستور داده باشد) (۴( آن شب، شب سلامت و رحمت (و درود فرشتگان بر مؤمنان شب زنده&amp;zwnj;دار) است تا طلوع صبح)۵)}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	مادر مؤمنان عایشه صدیقه می‫فرمودند: در دهه آخر رمضان در پی یافتن شب قدر باشید.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	- و رسول الله (صلی الله علیه وسلم) می‫فرمودند: &amp;laquo;&amp;laquo;مَن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا، غُفر له ما تقدَّم من ذنبه&amp;raquo;(متفق علیه)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	هر کس شب قدر را با پشتوانه ایمان و شعور مداوم بر مراقبت الهی زنده نگه داشت گناهانی که از او سر زده شده است بخشیده خواهند شد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;9) &lt;/strong&gt; رمضان ماه دعا و نیاش است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	پروردگار یکتا به پیامبرش می‫فرمایند: &amp;laquo;وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ فَلْيَسْتَجِيبُوا لِي وَلْيُؤْمِنُوا بِي لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ&amp;raquo; ﴿البقرة: ١٨٦﴾&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{و هنگامی که بندگانم از تو درباره&amp;zwnj;ی من بپرسند (که من نزدیکم یا دور. بگو:) من نزدیکم و دعای دعاکننده را هنگامی که مرا بخواند، پاسخ می&amp;zwnj;گویم (و نیاز او را برآورده می&amp;zwnj;سازم). پس آنان هم دعوت مرا (با ایمان و عباداتی همچون نماز و روزه و زکات) بپذیرند و به من ایمان بیاورند تا آنان راه یابند (و با نور ایمان به مقصد برسند)}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) می‫فرمودند: &amp;laquo;إِنَّ لِلصَّائِمِ عِنْدَ فِطْرِهِ لَدَعْوَةً مَا تُرَدُّ&amp;raquo;( ابن ماجه)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;روزه دار را در هنگام افطارش دعایی است مستجاب درگاه الهی..&amp;raquo;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	وقتهایی است که دعا در آن از لذت خاصی برخوردار است و درصد استجابت آن بسیار بالاست، از آن جمله است:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;أ&amp;zwnj;) &lt;/strong&gt; دعا در دل شب:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) می‫فرمایند: &amp;laquo; إِنَّ فِي اللَّيْلِ لَسَاعَةً لا يُوَافِقُهَا رَجُلٌ مُسْلِمٌ يَسْأَلُ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ فِيهَا خَيْرًا مِنْ أَمْرِ الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ إِلا أَعْطَاهُ ، وَذَلِكَ كُلَّ لَيْلَةٍ&amp;raquo; ( به روایت مسلم)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	در هر لحظه‫ای است که هر فرد مسلمانی در آن ساعت از خداوند متعال خیری از دنیا یا آخرت را درخواست کند خداوند بدو ارزانی می‫دارد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;ب&amp;zwnj;) &lt;/strong&gt; وقت سحر:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	پروردگار منان افرادی که در ساعات سحر در لذت نیایش بسر می‫بردند را ستوده است: &amp;laquo;الصَّابِرِينَ وَالصَّادِقِينَ وَالْقَانِتِينَ وَالْمُنفِقِينَ وَالْمُسْتَغْفِرِينَ بِالْأَسْحَارِ&amp;raquo; ﴿آل عمران: ١٧﴾.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{و همان کسانی که (در راه طاعت و عبادت، و دوری از گناه و معصیت، و تحمّل مشقّات و ناملایمات) بردبار، و (در نیّت و کردار و گفتار) درستکار، و (با خشوع و خضوع بر طاعت و عبادت) مداوم و ماندگار، و (از آنچه می&amp;zwnj;توانند و بدان دسترسی دارند) بخشاینده، و در سحرگاهان آمرزش خواهند}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;وَبِالْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ&amp;raquo; ﴿الذاريات: ١٨﴾&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	{و در سحرگاهان درخواست آمرزش می&amp;zwnj;کردند.}&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;ت&amp;zwnj;) &lt;/strong&gt; شبهای رمضان:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	از فرموده رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) است که؛ &amp;laquo;إِنَّ لِلَّهِ عُتَقَاءَ في كُلِّ يَوْمٍ وَلَيْلَةٍ، لِكُلِّ عَبْدٍ مِنْهُمْ دَعْوَةٌ مُسْتَجَابَةٌ&amp;raquo; (حدیث صحیح به روایت امام احمد)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;در هر روز و هر شب خداوند افرادی را از آتش سوزان جهنم رهایی می‫بخشد، و هر یک از آنها را دعایی است مستجاب&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;ث&amp;zwnj;) &lt;/strong&gt; در سجده:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) در وصف سجده فرموده‫اند: &amp;laquo;أقرب ما يكون العبد من ربه وهو ساجد، فأكثروا الدعاء&amp;raquo;. (به روایت امام مسلم، احمد، نسائی، ابوداود)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&amp;laquo;نزدیکترین حالتی که بنده به پروردگارش نزدیک می‫شود هنگامی است که او در سجده است. در این حالت بسیار دعا کنید&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;ج&amp;zwnj;) &lt;/strong&gt; بین اذان و برپایی نماز&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	از فرموده‫های گهربار پیک رسالت است:&amp;laquo;الدعاء لا يرد بين الأذان والإقامة فادعوا&amp;raquo; (صحیح ابن خزیمه)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	دعا در بین اذان و اقامت نماز رد نمی‫شود پس دعا کنید.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;ح&amp;zwnj;) &lt;/strong&gt; در روزهای جمعه:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	از فرامین رسول الله است: &amp;laquo;في يوم الجمعة ساعة لا يوافقها مسلم وهو قائم يصلي يسأل الله خيرًا إلا أعطاه&amp;raquo; (متفق علیه) &amp;laquo;در روز جمعه ساعتی است که هیچ بنده مؤمن در حال نماز در آن لحظه از خداوند خیری درخواست نمی‫کند مگر اینکه خداوند آنرا بدو می‫بخشد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	اما باید یادمان نرود دعای فردی که ثروتش از حرام، و غذایش از حرام، و پوشاکش نیز حرام باشد پذیرفته نخواهد شد، و همچنین کسی که بر قطع صله رحم، و یا دل پر از شوق گناه دست به دعا بلند می‫کند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	و در کمال تواضع و فروتنی &amp;quot;عمر&amp;quot; گونه رفتار کنیم که می‫فرمودند: درد من درد قبولیت دعا نیست، آنچه مرا بخود مشغول داشته دعا کردن است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;10) &lt;/strong&gt; خود را بر جود و سخاوت تربیت کنیم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	رسول اکرم (صلی الله علیه وسلم) فرمودند: &amp;laquo;أفضل الصدقة صدقة في رمضان&amp;raquo;. ( به روایت ترمذی)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	بهترین صدقه؛ صدقه در ماه رمضان است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	ومی‫فرمودند: &amp;laquo;من فطَّر صائماً، كان له مثلُ أجره، غير أنه لا ينقص من أجر الصائم شيئاً&amp;raquo; (حسن صحیح به روایت ترمذی)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	کسی که روزه داری را افطاری دهد، او راست اجر و پاداشی برابر با اجر و پاداش آن روزه دار بدون اینکه از پاداش روزه دار چیزی کاسته شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;11) &lt;/strong&gt; رمضان ماه برداشت اجر و پاداش است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	پیام آور توحید در حدیثی قدسی از پرودگار عالم می‫فرمایند: &amp;laquo;كُلُّ عملِ ابنِ آدمَ لَهُ يُضَاعفُ الحَسَنَة بعَشرِ أمثالِها إلى سَبْعِمائِة ضِعْفٍ، قَالَ الله تعالى إِلاَّ الصَومَ فإِنه لِي وأَنَا أجْزي به يَدَعُ شهْوَتَه وطعامه من أجْلِي.&amp;raquo; ( به روایت امام مسلم)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	انسان در مقابل تمام کارهایش اجر و پاداش دریافت می‫کند؛ در مقابل هر خوبی ده تا پاداش تا هفتصد برابر. خداوند متعال فرمودند: مگر روزه که از آن من است، و من پاداش آنرا می‫دهم. چرا که روزه دار شهوت و خورد و نوشش را از بهر رضایت من ترک گفته است.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	و در روایت متفق علیه : &amp;laquo;...والَّذِي نَفْسُ محمدٍ بِيَدهِ لخَلُوفُ فمِ الصَّائم أطيبُ عند الله مِن ريح المسك، لِلصائمِ فَرْحَتَانِ يَفْرَحُهما؛ إِذَا أفْطَرَ فرحَ بِفطْرهِ، وإِذَا لَقِي ربَّه فرح بصومِهِ&amp;raquo;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	قسم بدانکه جان محمد در اختیار اوست؛ بوی دهان روزه دار نزد خداوند از عطر مسک باصفاتر است. روزه دار را دو شادی است برای شادمانی؛ چون افطار کند به فطرش شاد شود. و روزی که پروردگارش را ملاقات کند به روزه‫اش شادمان می‫گردد.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;12) &lt;/strong&gt; روزه خود را روزه بهترینان کنیم.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	اهل علم و معرفت روزه را به سه دسته تقسیم می‫کنند:&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;1- &lt;/strong&gt; روزه عوام: بازداشتن خود از خورد و نوش و شهوت.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;2- &lt;/strong&gt; روزه خواص: در کنار دوری از خورد و نوش و شهوت، تمام اعضای جسم نیز لب به روزه برمی‫بندند؛ گوش و چشم و دهان و بینی، دست و پا و ابرو و ... همه از کردار زشت و گفتار بد و هرگونه انحراف و لغزشی روزه می‫شوند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	حضرت جابر (رضی الله عنه) از شاگردان مکتب رسالت می‫فرمایند؛ اگر روزه گرفتی، شنوایی و بینائیت نیز روزه گیرند، و سیمای با وقار و آرامی بخود گیر. و اجازه نده روزی که روزه‫ای با سایر روزهایت همسنگ شود.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;3- &lt;/strong&gt; روزه ویژگان ( خواص خاصان)&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	این روزه در کنار آنچه روزه عامه مردم و روزه خواص بود روزه قلب و حواس را نیز دربر می‫گیرد. روزه‫ای که در آن قلب و دل، از هر آنچه غیر خداست و انسان را از خداوند باز می‫دارد پاک می‫شوند.&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	ماه رمضان فرصتی است طلایی تا لذت این شیوه روزه را بخود بچشانیم...&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
	***&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;strong&gt;جهت مطالعۀ کتاب های سایت عقیده با موضوع روزه و رمضان، بر روی لینک های زیر کلیک کنید:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/tag/%D8%B1%D9%88%D8%B2%D9%87&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;strong&gt;روزه&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;
	&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/tag/%D8%B1%D9%85%D8%B6%D8%A7%D9%86&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;strong&gt;رمضان&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>انتشار نرم افزار سایت عقیده (نسخۀ ویندوز) - به زودی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/393</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h1 style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 102, 0); &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 36px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt;&amp;nbsp;نسخه اول نرم افزار سایت عقیده با 1257 کتاب &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 36px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:28px;&quot;&gt;&lt;sup&gt;به زودی&lt;/sup&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 22px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Nazli; &quot;&gt;تنها با کلیک ماوس، بیش از هزار کتاب که دست یافتن به آن&amp;zwnj;ها آرزوی هر دانشور و طالب علم و معرفتی است بر صفحه کامپیوتر شما به نمایش در می‫آید.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;h2&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;
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&lt;h3&gt;
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&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;1- امکان مشاهدۀ چکیدۀ همۀ کتاب&amp;zwnj;های سایت&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;2- امکان مشاهدۀ فهرست کتاب&amp;zwnj;ها&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;3- امکان دانلود و مشاهدۀ نسخۀ پی دی اف (PDF) کتاب&amp;zwnj;ها&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;4- جستجوی کتاب&amp;zwnj;ها بر اساس اسم کتاب، مؤلف و موضوع آن&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;5- امکان یادداشت نویسی برای کتاب&amp;zwnj;ها توسط کاربران&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;6- سهولت در تماس با سایت از طریق برنامه&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;ومزایای دیگری که خودتان با دانلود این نسخه از نرم افزار به آنها پی خواهید برد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 20px; &quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Nazli; &quot;&gt;پس، پیش به&amp;zwnj;سوی علم و دانش و معرفت، و افروختن شمع هدایت و رستگاری در کالبد خویشتن و دیگران...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
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</item><item>
<title>دکتر عبد الکریم زیدان درگذشت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/392</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;دکتر عبد الکریم زیدان دار فانی را وداع گفت&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;دانشمند معروف جهان اسلام، علامه بزرگوار، شیخ دکتر عبدالکریم زیدان در سن ۹۷ سالگی در صنعاء پایتخت یمن دارفانی را وداع گفت.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;دکتر عبدالکریم زیدان، دانشمند و متفکر مشهور اسلامی، یکی از علمای اهل سنت عراق و یکی از پیشگامان علم اصول فقه و فقه اسلامی بود. ایشان از صاحب نظران میدان دعوت اسلامی و فعالان عرصه علم و ادب به شمار می&amp;zwnj;رود، &amp;zwnj;دارای تألیفات و تصنیفات فراوانی در زمینه علوم مختلف اسلامی است.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;دکتر سامی الجنابی، یکی از شاگران عبدالکریم زیدان در بیان گوشه&amp;zwnj;ای از بیوگرافی این دانشمند جهان اسلام می&amp;zwnj;گوید: &amp;laquo;علامه دکتر عبدالکریم زیدان از قبیله &amp;ldquo;المحامدة&amp;rdquo;، که یکی از شاخه&amp;zwnj;های قبیله دیلم می باشد، در سال ۱۹۲۱م در بغداد دیده به جهان گشود. دکتر زیدان ۳ ساله بود که پدرش را از دست داد. وی دروس ابتدایی را در مدرسه &amp;ldquo;دارالمتعلمین&amp;rdquo; بغداد تکمیل نمود و پس از فراغت، در همان مدرسه مشغول تدریس شد. علامه زیدان سپس به دانشکده الشریعة&amp;zwnj; الاسلامیة وابسته به دانشگاه قاهره ملحق شده و پس از اخذ مدرک کارشناسی ارشد در این دانشکده، مدرک دکترای خود را در سال ۱۹۶۲م از دانشگاه قاهره دریافت نمود.&amp;raquo;&lt;br /&gt;
دکتر عبدالکریم زیدان علوم مختلف اسلامی را از محضر علمای برجسته عراق و مصر همچون؛ شیخ امجد الزهاوی، شیخ عبدالقادر الخطیب، شیخ نجم الدین الواعظ، شیخ محمد محمود الصواف، شیخ علی الخفیف، شیخ محمد ابو زهرة و شیخ حسن مأمون فرا گرفت.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;و ایشان زمان حیاتشان پست&amp;zwnj;های علمی متعددی نیز عهده&amp;zwnj;دار شدند، از آن جمله: استاد فقه اسلامی و رئیس بخش فقه اسلامی در دانشکده حقوق دانشگاه بغداد. استاد فقه اسلامی و رییس بخش دین در دانشکده&amp;zwnj;ی ادب در دانشگاه بغداد. استاد متمرس (لقبی که در عراق به ندرت به استادی داده میشود) دانشگاه بغداد، ناظر کل اخوان المسلمین عراق.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;دکتر عبدالکریم زیدان رحمه الله در زمینه تالیف و تصنیف از توانایی ویژه و بالایی برخوردار بود، به طوری که تالیفات و تصنیفات فراوانی در علوم مختلف از ایشان بر جای مانده است. از آنجمله:&lt;br /&gt;
1- أحكام الذميين والمستأمنين في دار الإسلام.&lt;br /&gt;
2- المدخل لدراسة الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
3- الكفالة والحوالة في الفقه المقارن.&lt;br /&gt;
4- أصول الدعوة.&lt;br /&gt;
5- الفرد والدولة في الشريعة.&lt;br /&gt;
6- المفصل في أحكام المرأة وبيت المسلم في الشريعة الإسلامية، (در ۱۱ جلد).&lt;br /&gt;
7- الوجيز في شرح القواعد الفقهية في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
8- الشرح العراقي للأصول العشرين.&lt;br /&gt;
9- نظرات في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
10- أثر القصود في التصرفات والعقود.&lt;br /&gt;
11- اللقطة وأحكامها في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
12- أحكام اللقيط في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
13- حالة الضرورة في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
14- الشريعة الإسلامية والقانون الدولي العام.&lt;br /&gt;
15- الاختلاف في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
16- عقيدة القضاء والقدر واثرها في سلوك الفرد.&lt;br /&gt;
17- العقوبة في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
18- حقوق الأفراد في دار الإسلام.&lt;br /&gt;
19- القيود الواردة على الملكية الفردية للمصلحة العامة في الشريعة الإسلامية&lt;br /&gt;
20- نظام القضاء في الشريعة الإسلامية.&lt;br /&gt;
21- موقف الشريعة الإسلامية من الرق.&lt;br /&gt;
22- المستفاد من القصص القرآني در دو مجلد.&lt;br /&gt;
و دهها تالیف و مقاله علمی سودمند دیگر.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;قابل ذکر است که بعضی از تألیفات ایشان به زبان فارسی نیز ترجمه شده است، از آن جمله:&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/665/&quot;&gt;1- آشنایی با ادیان در قرآن&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/399/&quot;&gt;2- احکام سوگند و نذر&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1202/&quot;&gt;3- حقوق و تکالیف زن در اسلام&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/863/&quot;&gt;4- سنت الهی در پیکار میان حق و باطل&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/698/&quot;&gt;5- قضا و قدر و تأثیر آن در سلوک و رفتار انسان.&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>به مناسبت واقعه غدیر خم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/391</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران محترم!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از دیرباز در بین&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; تشیع&amp;zwnj; سخن&amp;zwnj; در مورد &amp;laquo;غدیر خُم&amp;zwnj;&amp;raquo; جریان&amp;zwnj; دارد و همین&amp;zwnj; مسئله&amp;zwnj; مبنای&amp;zwnj; عقیده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; &amp;laquo;امامت&amp;zwnj;&amp;raquo; و نیز &amp;laquo;طعن&amp;zwnj;&amp;raquo; و &amp;laquo;لعن&amp;zwnj;&amp;raquo; جمع&amp;zwnj; زیادی&amp;zwnj; از شاگردان&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj;الله صلى الله علیه وآله وسلم قرار گرفته&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. اما بیان&amp;zwnj; این&amp;zwnj; قضیه&amp;zwnj; در سال&amp;zwnj;های&amp;zwnj; اخیر داغ&amp;zwnj;تر شده&amp;zwnj; و &amp;zwnj; شیعیان رافضى با انتشار كتاب&amp;zwnj;ها و رساله&amp;zwnj;هایی&amp;zwnj; در مناطق&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj;، و نیز برگزاری&amp;zwnj; همایش&amp;zwnj;ها و سمینارهایی&amp;zwnj; با عنوان&amp;zwnj; &amp;laquo;غدیر&amp;raquo;، ذهن&amp;zwnj; جوانان&amp;zwnj; جامعه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj; را دچار شبهه&amp;zwnj; نموده&amp;zwnj;اند. در این&amp;zwnj; برهه&amp;zwnj; از زمان&amp;zwnj; به&amp;zwnj; علّت&amp;zwnj; نیاز مبرم&amp;zwnj;، ضروری&amp;zwnj; می&amp;zwnj;باشد كه&amp;zwnj; دیدگاه&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj; در مورد این&amp;zwnj; واقعه&amp;zwnj; بیان&amp;zwnj; گردد تا عزیزان دچار سردرگمی&amp;zwnj; نشوند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شیعیان &amp;nbsp;می&amp;zwnj;گویند: &amp;quot;حضرت محمد صلى الله علیه وآله وسلم در آخرین سال عمر با برکت خویش به سفر حج رفتند و در بازگشت، کاروان عظیم همراه خود را در محلی بنام غدیر خم متوقف کردند و سپس در جمع آنها اعلان فرمودند که الله جل جلاله علی را بعد از من رهبر شما تعیین فرموده&amp;zwnj;است و علی جانشین من است&amp;quot;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شیعیان می&amp;zwnj;گویند: &amp;quot;پس از این اعلان مردم به علی (رضی الله عنه) تبریک گفتند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;به روایت اهل تشیع 70 روز بعد از این حادثه، حضرت محمد صلى الله علیه وآله وسلم دار فانی را وداع گفته و به جهان باقی شتافتند. و اصحاب او بلا فاصله حکم را تغییر دادند و علی را کنار زدند و ابوبکر را بر کرسی خلافت نشاندند، و به این نیز بسنده نکردند و به خانه علی هجوم برده و در خانه را سوزانده و وارد خانه شدند و به گردن علی ریسمان انداختند و او را کشان کشان به مسجد بردند و در این گیرو&amp;zwnj;دار پهلوی فاطمه شکست و عمر یا غلام عمر فاطمه را که پشت در گیر کرده بود با فشار دادن در له کرد تا آنجا که حضرت فاطمه سقط حمل نمود و جنین شیشماهه&amp;zwnj;اش مرده به دنیا آمد!&amp;quot;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به روایت اهل تشیع &amp;quot;عمر و یارانش همچنان علی را کشان کشان به داخل مسجد بردند و هر چی سعی کردند علی دست مشت کرده خود را باز نکرد و به همین اکتفا کردند که دست علی به دست ابوبکر بخورد و بیعت انجام گیرد!&amp;quot;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پس از این واقعه به روایت شیعه حضرت علی 25 سال سکوت کرد تا مردم او را خلیفه کردند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما اهل سنت می&amp;zwnj;گویند: نه خیر، این داستان از پایه دروغ است. نه حضرت محمد صلى الله علیه وآله وسلم در غدیر خم علی رضی الله&amp;nbsp;عنه&amp;nbsp;را جانشین خود کرده، نه کسی ایشان را مجبور به بیعت کرده، نه به خانه فاطمه رضی الله عنها&amp;nbsp;حمله شده، نه پهلوی فاطمه شکسته است. همه این حرفها دروغ، است! و داستانی خیالیست پایه و اساس و ریشه ندارد!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;براى اینكه این قضیه خلافى براى برادران وخواهران مسلمان ما بیشتر آشكار شود كتابخانه عقیده تصمیم گرفت به مناسبت سالروز واقعۀ غدیر خم &amp;nbsp;کتابهایی را که دربارۀ این واقعه نوشته شده معرفی نماید تا باشد که با مطالعه آن عاقلان و خردمندان بخود آیند و جاهلان و&amp;nbsp;&amp;nbsp;کینه دلان در غیض و بغض و کینه خود بمیرند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برای دریاقت کتابها بر روی اسم کتاب فشار دهید&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
عقیده امامت و حدیث غدیر&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاهراه اتحاد یا بررسی نصوص امامت&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
راهی دیگر براى کشف حقیقت&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
غدیر خم&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;منات- نقد و بررسی واقعه غدیر خم&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;آلفوس - پاسخ عقلی به دروغهای تاریخی در فرهنگ شیعه&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خلافت و امامت&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خلافت و امامت 2&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امامت در پرتو نصوص&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تئوری امامت درترازوی نقد&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حـدیـث&amp;zwnj; غـدیـر، مولای&amp;zwnj; مؤمنان&amp;zwnj; و ما اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ولایت و امامت&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تکامل فکر سیاسی شیعه از شورا تا ولایت فقیه&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
نقد و بررسی اصول و پایه های مذهب شیعه دوازده امامی&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
خلافت و انتخاب&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;درسی از ولایت&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
چرا نام حضرت علی رضی الله عنه در قرآن نیست؟&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تهمت به علی در نهج البلاغه&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
ای شیعیان جهان بیدار شوید&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شیعه در دادگاه وجدان و عقل&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرا رسیدن عید سعید قربان بر همه مسلمانان جهان مبارک باد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/390</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;آداب عید قربان&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;از انس رضی الله عنه روایت است که فرمود: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;هنگامی که پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم به مدینه آمدند دو روز داشتند که به بازی و سرگرمی مشغول می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شدند و جشن می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;گرفتند، پیامبر صلی الله علیه وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;الله متعال بجای آنها، دو روز بهتری برای شما قرار داده است. روز عید فطر و روز عید قربان&lt;/span&gt;) &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 9pt&quot;&gt;( حدیث صحیح/ سنن نسائی شماره1556) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;اذکار و فضائل روز عرفه و ایام التشریق (11 و 12 و 13 ذی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;الحجه)&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از عبدالله بن عمر رضی الله عنه روایت است که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;هیچ روزی باشکوه&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;تر و محبوبتر در انجام اعمال نیک نزد خداوند از 10 روز اول ذی الحجه وجود ندارد پس در این روزها &amp;laquo; لا اله إلا الله و الله أکبر و الحمد لله&amp;raquo; را زیاد بگویید&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ مسند احمد شماره 6154)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم روز اول ذی&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;الحجه را روزه می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گرفتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن ابوداود شماره 2437)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در مورد روزه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ی روز عرفه فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;گناهان سال گذشته و سال آینده را محو می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 1162)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;بهترین چیزی که پیامبران در روز عرفه گفته&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;اند و من نیز آن را می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گویم : &amp;laquo; لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِیک لَهُ، لَهُ الْمُلْک وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى کلِّ شَیءٍ قَدِیرٌ &amp;raquo; می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;باشد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ معجم الطبرانی شماره 3274 - سلسله صحیحه شماره 1503)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;روایت است که عبدالله بن عباس رضی الله عنه و دیگر اصحاب رسول الله صلی الله علیه وسلم تکبیر عید قربان را بعد از نماز صبح روز عرفه شروع می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;نمودند و بعد از نماز عصر آخرین روز از ایام تشریق به پایان می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رسانیدند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 6072) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ابوهریره، عمر, عبدالله بن مسعود و عبدالله بن عمر رضی الله عنهم در بازار، بعد از نمازها، وقت خواب، نشستن و پیاده رفتن خود را مشغول تکبیر گفتن &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;نمودند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری/ شماره970 - 969)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;عبدالله بن عمر رضی الله عنه می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;فرماید که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به همراه اصحاب در هر دو عید تکبیر گویان با صدای بلند به سوی نماز می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رفتند.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 5925)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;الفاظ تکبیر&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;الله اکبر الله اکبر ، لا اله الا الله ، والله اکبر الله اکبر ، و لله الحمد.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 7pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 5925) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;الله اکبر الله اکبر الله اکبر لا اله الا الله والله اکبر الله اکبر و لله الحمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(امام مالک و امام شافعی این لفظ را نیز جائز می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;دانند ) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;آداب و سنتهای عید قربان&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از ام سلمه رضی الله عنها روایت است که رسول الله صلی الله علیه وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;هرگاه هلال ماه ذی الحجه را مشاهده نمودید و قصد قربانی کردن را داشتید تا حیوان را قربانی نکرده&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;اید چیزی از مو&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;rlm;, ناخن و موهای زاید خود را کوتاه نکنید&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 1977)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 10pt&quot;&gt;رعایت نظافت ، استعمال بوی خوش، مسواک زدن و غسل زدن چنانچه در روز جمعه تأکید شده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از عبدالله بن عباس رضی الله عنه روایت است که پیامبر صلی الله علیه وسلم در یکی از جمعه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ها فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;الله جل جلاله این روز را برای شما مسلمانان &amp;laquo;عید&amp;raquo; قرار داده است پس کسی که به نماز جمعه آمد، غسل بزند، و اگر بوی خوش دارد استفاده کند و مسواک بزند&lt;/span&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن ابن ماجه شماره 1098) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;(&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;بهترین لباس خود را بپوشد&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( صحیح بخاری شماره 948)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم در روز عید قربان قبل از نماز چیزی نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خورد تا از نماز برمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشت&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن ترمذی شماره 542)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;نظر علما بر این است که بعد از نماز عید غذای خود را با گوشت قربانی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;اش شروع کند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(فتح البای شرح حدیث 955 صحیح بخاری)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;اهمیت نماز عید و تأکید پیامبر به رفتن به نماز عید&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از ام عطیه رضی الله عنها روایت است که فرمود: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وسلم به ما فرمودند که دختران بکر ( ازدواج نکرده ) و زنان قاعده را به مصلی ببریم تا در کار نیک و دعای مسلمانان شریک باشند و زنان قاعده از مصلی کناره می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گرفتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری شماره 324 )&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;حال وقتی پیامبر صلی الله علیه وسلم به زنان چنین توصیه می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;کند مطمئناً این اهمیت و تأکید پیامبرصلی الله علیه وسلم شامل حال مردان بیشتر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم پیاده به مصلی می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رفتند و بر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ سنن ابن ماجه شماره 1294 ) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم در روز عید از راهی به مصلی می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رفتند و از راه دیگر باز می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( صحیح بخاری شماره 986 )&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;برای مأمومین مستحب است که برای نماز عید زود به مصلی بروند اما برای امام سنت است دیرتر به مصلی برود&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( بخاری شماره 956)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبرصلی الله علیه وسلم قبل از نماز عید سنتی نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خواند ولی وقتی به منزلشان برمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشتند دو رکعت می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خواندند&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;. (حدیث حسن/ ابن ماجه شماره1293)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ولی طبق دستور پیامبر صلی الله علیه وسلم وقتی وارد مسجد شدیم می توانیم دو رکعت سنت تحیه مسجد بخوانیم&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 714)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;نماز عید دو رکعت است که بصورت زیر خوانده می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;شود&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پس از تکبیرة الحرام دعای استفتاح (وجهت) را می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;خوانیم و سپس هفت تکبیر دیگر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;گوییم، در رکعت دوم بعد از تکبیر انتقال ( بالا آمدن از سجود ) پنج تکبیر دیگر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;گوییم در هر رکعت پس از تکبیرات دعای تعوذ ( اعوذ بالله &amp;hellip; ) و سوره حمد می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;خوانیم - در بین تکبیرات حمد و ثنای خدا را گفته و او را مورد مجد و تعریف قرار می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;دهیم ( سبحان الله و الحمد لله و لا اله الا الله و الله اکبر ) و بر رسول الله صلی الله علیه وسلم صلوات می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;فرستیم. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ معجم الکبیر الطبرانی شماره 9519 )&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کسانی که به نماز عید همراه امام نرسند و همچنین زنانی که در خانه هستند می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;توانند نماز عید را بجا آورند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری شماره987)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;در صورت نرسیدن به نماز جماعت ( نماز عید) تعداد رکعات نماز و چگونگی آن هیچ تغییری نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کند آن طور که از انس رضی الله عنه روایت شده است&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ سنن بیهقی شماره 6031)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;تبریک و تهنیت گفتن به یکدیگر&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از جبیر بن نفیر رضی الله عنه روایت است که: &lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;اصحاب رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم&lt;/span&gt; &lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;هنگامی که روز عید همدیگر را ملاقات می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کردند به یکدیگر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گفتند:&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &amp;laquo; &lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;تَقَبَّلَ اللهُ مِنَّا وَ مِنْک&lt;/span&gt; &amp;raquo; (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;الله از ما و شما قبول بگرداند&lt;/span&gt;) &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ فتح الباری شرح حدیث 952 صحیح بخاری)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;آداب اجتماعی روز عید&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;همانا الله بلند مرتبه به من وحی نمودند که نسبت به یکدیگر فروتن و متواضع باشید تا یکی بر دیگری ظلم و تعدی ننموده و فخر و تکبر نورزد&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره2865)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;اگر سوزن آهنی در سر یکی از شما فرو برده شود برای او بهتر از این است که زن نامحرمی را لمس کند&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ معجم الکبیرطبرانی شماره 486)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;ذلت و حقارت بر کسی قرار داده شده است که با دستور من مخالفت کند و هرکس خود را به قوم و گروهی شبیه کند پس او از همان قوم محسوب می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;شود&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ مسند احمد شماره 5115)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم مردانی که خود را شبیه زنان و زنانی که خود را شبیه مردان می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;سازند، لعنت نمودند و فرمودند: آنها را از خانه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;هایتان بیرون کنید&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری شماره 5547)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;زنانی که لباسهای نازک می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پوشند و نیمه برهنه به نظر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رسند و (موی) سرشان ماند کوهان شتر (برآمده) است خودشان منحرف هستند و دیگران را هم منحرف می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;سازند، دوزخیانی هستند که من آنها را ندیده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ام، وارد بهشت نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;شوند و بوی بهشت به مشامشان نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رسد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt; (صحیح مسلم شماره 2128)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;بخورید، بنوشید، بپوشید، و به یکدیگر صدقه دهید اما اسراف نکنید و تکبر نورزید&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ابن ماجه شماره 3605)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;
	&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;کسی که می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خواهد روزیش وسیع گردد و بقیه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی عمرش پر خیر و برکت باشد باید صله&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی رحم را بجای آورد. و در روایتی قطع کننده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی (ترک کننده) صله&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی رحم وارد بهشت نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;شود&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 2557ـ2556)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>همراه با رسول اکرم  صلى الله عليه وآله وسلم  در رمضان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/389</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام ابن قیم (رحمه الله) مى فرمايد: رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;بهترین روش و کاملترین نمونه استفاده از فرصت طلائی رمضان بود. ایشان به بهترین صورت وبا آسانترین و دلچسب‫ترین روش بیشترین فایده‫های ایمانی را از این ماه مبارک می‫بردند.&lt;br /&gt;
روزه ماه مبارک رمضان در دومین سال هجرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;به مدینه بر مسلمانان فرض شد. و پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در سال یازدهم هجری چشم از جهانی فانی بربستند. ایشان 9 رمضان را در زندگی پرفروغشان روزه گرفتند.&lt;br /&gt;
در ابتدا روزه بصورت اختیاری فرض شده بود. هر کس می‫خواست روزه می‫گرفت و هر کس نمی‫خواست بجای آن بینوائی را غذا می‫داد. سپس اختیار برداشته شد و روزه بر همگان واجب قرار داده شد.&lt;br /&gt;
تنها به خانمها و پیرمردان این فرصت داده شد، که در صورت ناتوان بودن از&amp;nbsp;روزه گرفتن، بجای هر روز روزه یک بینوا و یا مستمندی را غذا دهند.&lt;br /&gt;
و همچنین به بیماران و مسافرها این رخصت داده شد، که روزه نگیرند، و پس از شفا یافتن، و استقرار یافتن به تعداد روزهایی که افطار کرده، و روزه نگرفته‫اند روزه بگیرند.&lt;br /&gt;
و همچنین زنان حامله و یا شیر دهی که روزه گرفتن برای آنها مضر است، روزه نمی‫گیرند و پس از رفع خطر قضاء روزهایی که روزه خورده‫اند را بجای می‫آورند.&lt;br /&gt;
و در حالتی که خطر متوجه صحت خود آنها نباشد، و تنها از اینکه مبادا خطری متوجه فرزندشان شود روزه نمی‫گیرند، همراه با بجای آوردن قضاء روزه، می‫بایستی بجای هر روزی نیز یک فقیری را غذا دهند. چونکه ترک روزه از بابت خطر بیماری نبوده، تنها برای مراعات صحت چون افطار آدم صحتمند در اول اسلام می‫باشد.&lt;br /&gt;
سعی بسیار در بجای آوردن انواع عبادتها&lt;br /&gt;
از روش عبادت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;این بود که در ماه رمضان بسیار می‫کوشید تا از هر نوع عبادت در حد امکان بجای آورد. حضرت جبرئیل ـ علیه السلام ـ نیز در رمضان خدمت آن حضرت می‫آمد و با ایشان&amp;nbsp;قرآن می‫خواند. پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;همیشه از همه‫ی انسانها سخاوتمندتر و بخشنده‫تر بود، و در رمضان بیش از پیش سخاوت می‫نمود، و وقتی با جبرئیل ملاقات می‫نمود از نسیم وزان نیز با سخاوت‫تر و بخشنده‫تر می‫شد. آن حضرت در رمضان بیش از همیشه صدقه و خیرات می‫داد، و به همگان نیکی می‫کرد و قرآن تلاوت می‫نمود، و نماز بجای می‫آورد و همواره مشغول ذکر و عبادت الله متعال بود، و در مسجد به اعتکاف می‫نشست.&lt;br /&gt;
ماه رمضان را بکلی به عبادت مشغول بود، و آنچنان که در ماه مبارک رمضان به طاعت و عبادت و بندگی الله متعال می‫پرداخت در هیچ ماه دیگری از سال چنین نمی‫کرد. تا جائیکه برای ضایع نشدن لحظه‫ای از شب و روزش چند روز متوالی را بدون اینکه افطار کند روزه می‫گرفت تا فرصت بیشتری برای عبادت داشته باشد.&lt;br /&gt;
البته صحابه و یارانش را از روزه‫ی متواصل منع می‫کرد. آنها می‫گفتند: شما بطور متواصل روزه می‫گیرید، و چند روز متوالی افطار نمی‫کنید، ما نیز می‫خواهیم چون شما باشیم. آن حضرت به آنها می‫فرمودند:&amp;quot; من چون شما نیستم، من نزد پروردگارم می‫باشم و او مرا غذا می‫دهد و سیراب می‫کند&amp;quot;.(به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری)&lt;br /&gt;
و از روی رحمت و شفقت پیروان و امتش را از استمرار روزه منع می‫نمودند. و به کسانی که بسیار اصرار دارند اجازه دادند افطارشان را تا وقت سحر بتأخیر اندازند.&lt;br /&gt;
در صحیح بخاری از ابو سعید خدری آمده است که ایشان از پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;شنیدند که آن حضرت می‫فرمودند:&amp;quot; روزه‫یتان را با روزه روز دیگر وصل نکنید. حالا اگر کسی از شما خواست روزه‫اش را استمرار دهد، تنها تا وقت سحر ادامه دهد&amp;quot;. این می‫تواند نوعی استمرار و بهم‫پیوستن روزه‫ها و آسانترین روش برای روزه‫دار باشد. و در حقیقت آن شام روزه دار است که آنرا با کمی تأخیر در وقت سحر میل می‫فرماید. و روزه دار در شبانه‫روز یک وعده غذا دارد، حالا اگر آنرا در سحر میل بفرماید چون کسی است که شامش را بجای اول شب در آخر شب میل می‫کند.&lt;br /&gt;
روش پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در هلال اول ماه&lt;br /&gt;
پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;روزه‫ی ماه مبارک را پس از دیدن هلال اول ماه، و یا گواهی دادن یک شاهد که ماه را دیده، شروع می‫کرد. باری روزه‫ی ماه مبارک را با اعتماد به گواهی ابن‫عمر، و یک بار دیگر با گواهی یک صحرانشین شروع کرد. و از آنها قسم نخواست. فقط به اطلاع رسانی آنها اعتماد نمود، اگر چه این خبر رسانی گواهی و شهادتی از سوی آنها بود، پیامبر از آنها نخواست که سوگند بخورند. واگر هلال اول ماه را نمی‫دید و کسی گواهی نمی‫داد که هلال را دیده، آن حضرت&amp;nbsp;سی‫روز ماه شعبان را کامل می‫نمود، و سپس روزه‫ی رمضان را شروع می‫کرد.&lt;br /&gt;
و اگر چنانچه آسمان ابری می‫بود، و امکان دیدن ماه نمی‫بود، سی‫روز شعبان را کامل می‫نمود، سپس روزه رمضان را شروع می‫کرد.&lt;br /&gt;
آن حضرت نه روز ابری را روزه می‫گرفت، و نه به روزه گرفتن آن دستور می‫داد، بلکه دستور داد در صورت ابری بودن آسمان شعبان را سی‫روزه حساب کنند، سپس رمضان را شروع کنند. و این با این فرموده پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;که:&amp;quot; اگر چنانچه آسمان ابری شد حسابش را بجای آورید&amp;quot;.(&amp;quot;فَإِنْ غُمَّ عَلَيْكُمْ فَاقْدُرُوا لَهُ&amp;quot; [به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری].)&lt;br /&gt;
هیچگونه تضادی ندارد. چرا که؛ قدر بمعنی: حساب اندازه گرفته شده است، یعنی اینکه اگر چنانچه هوا ابری بود ماه شعبان را کامل ـ سی روز ـ حساب کنید. آنگونه که در حدیث ثابت دیگری که امام بخاری روایت نموده آمده است:&amp;quot; ماه شعبان را کامل کنید&amp;quot;.(&amp;quot;فَأَكْمِلُوا&amp;nbsp;عِدَّةَ شَعْبَانَ&amp;quot;.[به روایت امام بخاری].) و ماه؛ سی روزه کامل می‫شود.&lt;br /&gt;
روششان در پایان دادن ماه&lt;br /&gt;
همانطور که اشاره شد آن حضرت مسلمانان را با گواهی یک فرد مسلمان به روزه امر می‫کرد. ولی در پایان دادن به ماه مبارک رمضان دو گواه را به شهادت می‫طلبید.&lt;br /&gt;
اگر چنانچه گواهان یا دو شاهد با تأخیر می‫رسیدند، یعنی در روز اول عید و بعد از وقت نماز عید، گواهیشان را می‫پذیرفت و به مسلمانان دستور می‫داد افطار کنند، و در فردای آن روز نماز عید را در وقتش بجای می‫آورد.&lt;br /&gt;
با پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در افطارشان&lt;br /&gt;
امام ابن قیم (رحمه الله) آورده‫اند: آن حضرت&amp;nbsp;&amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در اول وقت افطار می‫کردند و مسلمانان را تشویق می‫نمودند تا در وقت افطار عجله کنند، و سحر نیز میل می‫فرمودند و مؤمنان را به سحر خوردن و تأخیر دادن آن تا آخر وقت تشویق می‫کردند.&lt;br /&gt;
از کمال شفقت و مهربانیشان بر پیروانشان این بود که آنها را تشویق می‫کردند با خرما افطار کنند، و اگر خرمایی در دسترس نبود با آب.&lt;br /&gt;
چرا که معده‫ی خالی چیز شیرین را بهتر قبول می‫کند، و آن برای سلامتی بسیار مفیدتر است، بخصوص برای چشم و قدرت بینائی بسیار مفید است.&lt;br /&gt;
و اما آب: جگر بر اثر روزه کمی خشک می‫شود، و وقتی با آب ‫تر می‫گردد، بهتر می‫تواند پس از آن از غذا استفاده ببرد. برای همین برای تشنه‫ی گرسنه بهتر است قبل از میل کردن غذا کمی آب بنوشد، و بعد از آن غذا بخورد.&lt;br /&gt;
اینها همه بجانب آن فوائد و خاصیتهایی که خرما و آب در پاک نمودن قلب دارند. البته اینها را جز اهل دل و عرفان درک نمی‫کنند.&lt;br /&gt;
ـ آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;قبل از نماز افطار میل می‫فرمودند.&lt;br /&gt;
ـ افطار آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;چند دانه رطب بود ـ البته اگر می‫یافتند ـ و اگر رطبی نمی‫بود چند دانه خرما میل می‫فرمودند. و اگر چیزی از آن نمی‫یافت، با مقداری آب افطار می‫کردند.&lt;br /&gt;
ـ از ایشان آورده‫اند که چون افطار می‫نمودند، می‫فرمودند: &amp;quot;ذَهَبَ الظَّمَأُ, وَابتَلَّتِ العُروقُ، وَثَبَتَ الْأجْرُ إِنْ شَاءَ اللهُ تَعَالى&amp;quot;([به روایت امام ابوداود سیستانی].).&lt;br /&gt;
( تشنگی رفت، روده‫ها تر شد، و به خواست الله متعال پاداش نوشته شد).&lt;br /&gt;
و از ایشان آورده‫اند که می‫فرمودند:&amp;quot; برای روزه‫دار در هنگام افطار کردنش دعائی است که رد نمی‫شود&amp;quot;.(&amp;quot;إِنَّ لِلصَّائِم عِنْدَ فِطْرِه دَعْوةً مَا تُرَدُّ&amp;quot; [به روایت ابن ماجه].)&lt;br /&gt;
و از ایشان ثابت است که می‫فرمودند:&amp;quot; اگر شب از آنسو بیاید، و روز از این سو برود، روزه دار افطار کرده است&amp;quot;.(&amp;quot;إِذَا أَقْبَل اللَّيْلُ مِنْ هَاهُنَا، وَأَدْبَرَ مِنْ هَاهُنَا, فَقَدْ أَفْطَرَ الصَّائِمُ&amp;quot; [به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری].)&lt;br /&gt;
در شرح فرموده‫ی ایشان گفته‫اند که؛ اگر چه روزه‫دار نیت نکرده باشد، در حقیقت با وارد شدن وقت افطار، انگار که افطار کرده است. همانگونه که با طلوع خورشید ما وارد صبح می‫شویم و با غروب آن وارد شب.&lt;br /&gt;
آداب روزه‫دار..&lt;br /&gt;
پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;روزه‫دار را از دشنام دادن، و بدگویی، و دعوا و مرافه براه انداختن بشدت برحذر داشته، و حتی از اینکه جواب دشنام و ناسزا را بدهد منع کرده، و به او دستور داده تا در مقابل بد زبانها و کسانی که به او توهین می‫کنند و ناسزایش می‫گویند تنها ـ و با کمال افتخار ـ بگوید: من روزه دارم. (&amp;quot;إِنِّي صَائِمٌ&amp;quot; [به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری].)&lt;br /&gt;
برخی گفته‫اند: با زبان بگوید.&lt;br /&gt;
برخی گفته‫اند: به خودش یادآوری کند، و در دلش بگوید تا دچار غرور و خودپسندی نگردد.&lt;br /&gt;
برخی گفته‫اند: اگر روزه‫اش فرض بود؛ با زبان بگوید، چرا که میدان خودستائی نیست. و اگر روزه‫اش نفلی بود در دلش بخودش بگوید تا دچار ریا و خودنمایی نگردد.&lt;br /&gt;
سنت پیامبر در سفرهای رمضان&lt;br /&gt;
پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;بارها در ماه مبارک رمضان به سفر رفته‫اند، احیانا روزه گرفته و احیانا روزه نگرفته‫اند، و یارانش را نه به روزه گرفتن وادار کرده و نه از روزه خوردن بازداشته است.&lt;br /&gt;
و در جنگها وقتی به دشمن نزدیک می‫شدند به آنها دستور می‫داد روزه‫یشان را بخورند تا در جنگ با دشمن نیرومندتر و قویتر باشند.&lt;br /&gt;
اما اگر در سفر جنگی و یا ستیزی نمی‫بود آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;می‫فرمودند که افطار نمودن رخصتی است. هر کس خواست آنرا اختیار کند، و هر کس خواست روزه بگیرد هیچ اشکالی ندارد.&lt;br /&gt;
برخی از باشکوهترین نبردهای بین حق و باطل در این ماه مبارک بوقوع پیوسته است، چون؛ غزوه‫ی بدر و غزوه فتح مکه.&lt;br /&gt;
و آن حضرت در همه‫ی این سفرها هرگز طول مسافت سفر را برای روزه خوردن مسافر معین نکرده است، و هیچ حکم ثابتی در این زمینه از آن حضرت روایت نشده است.&lt;br /&gt;
صحابه و یاران آن حضرت نیز وقتی تصمیم سفر می‫گرفتند، بدون در نظر گرفتن بیرون رفتن از محوطه‫ی&amp;nbsp;خانه‫های شهر روزه‫یشان را می‫خورده‫اند، و می‫گفتند که این راه و روش پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;بوده است.&lt;br /&gt;
عبید فرزند جبر می‫گوید: با ابوبصره غفاری از یاران رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در ماه رمضان با کشتی‫ای از شهر فسطاط به قصد سفر حرکت کردیم، قبل از اینکه از خانه‫های شهر دور شویم، گفت تا سفره را پهن کردند. و به من گفت: بفرما. گفتم: آیا خانه‫های شهر را نمی‫بینی؟ ایشان با تعجب پرسیدند: آیا مخالفت سنت و روش رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;می‫کنی؟([به روایت امام احمد و ابو داود سیستانی].)&lt;br /&gt;
محمد بن کعب می‫گوید: خدمت انس بن مالک؛ یار و خدمتگذار رسول اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در ماه رمضان رسیدم، ایشان لباس سفر پوشیده آماده سفر بودند، و چهارپایانش را آماده حرکت کرده بود. درخواست غذائی کرد و شروع کرد به خوردن.&lt;br /&gt;
من از ایشان پرسیدم: آیا این از سنت پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;است؟! ایشان فرمودند: بله، این سنت رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;است. سپس سوار شده حرکت کردند. ([امام ترمذی این حدیث را حسن شمرده است].)&lt;br /&gt;
این روایات بطور واضح، روشن می‫سازد کسی که در ماه مبارک رمضان قصد سفر می‫کند، می‫تواند روزه‫اش را بخورد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
بوسه در رمضان&lt;br /&gt;
بارها اتفاق می‫افتاد که وقت فجر می‫رسید در حالیکه ایشان از همبستری با همسرشان در حالت جنابت بودند، بعد از فجر ـ یعنی بعد از اذان ـ غسل می‫گرفتند و روزه می‫گرفتند.&lt;br /&gt;
و همسرانشان را در روزهای رمضان با زبان روزه می‫بوسیدند، و می‫گفتند: آنگونه که مضمضمه کردن ـ شستن دهان در وقت وضو ـ روزه را باطل نمی‫کند بوسه نیز روزه را باطل نمی‫کند. (البته شاید اشاره به این نکته لازم باشد که فقهاء بوسه را برای کسانی که خودشان را نمی‫توانند کنترل کنند ناپسند و مکروه شمرده‫اند)&lt;br /&gt;
دستور پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;برای کسی که از روی فراموشی چیزی بخورد یا بنوشد.&lt;br /&gt;
و از دستورات آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;است: بر کسی که از روی فراموشی چیزی بخورد یا بنوشد قضاء روزه لازم نیست، و در حقیقت او در مهمانی الله متعال بوده، و الله متعال او را غذا داده و آب نوشانیده، و این خورد و نوش به او نسبت داده نمی‫شود.&lt;br /&gt;
و تنها در صورت تصرفی که از خود انسان انجام می‫گیرد روزه‫اش باطل می‫شود. و خوردن و نوشیدن در فراموشی چون خورد و نوش در خواب است، و کسی که در خواب است و یا آدمی که در فراموشی است، مسئولیت تصرفاتشان را ندارند.&lt;br /&gt;
آنچه روزه را باطل می‫کند&lt;br /&gt;
از آن حضرت ثابت است که؛ خوردن، و نوشیدن،(و آنچه در حکم خورد و نوش است. چون؛ آمپولهای خوراکی یا مقوی.) و استفراغ و حجامه (خارج کردن خون فاسد از جسم) باعث باطل شدن روزه‫ی روزه‫دار می‫شود.&lt;br /&gt;
وبه حکم قرآن جماع (همبستری با همسر) نیز روزه را چون خوردن و نوشیدن باطل می‫کند. و در مورد سرمه بچشم زدن هنگام روزه هیچ حکم ثابتی از پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;روایت نشده. و از ایشان ثابت شده که با دهان روزه مسواک می‫زده‫اند.&lt;br /&gt;
ـ و امام احمد آورده است که آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در حالیکه روزه داشتند آب روی سرشان می‫ریختند.&lt;br /&gt;
ـ و با دهان روزه مضمضه و استنشاق (شستن دهان و بینی در هنگام وضوء و غسل) می‫کردند، البته روزه‫دار را از زیاده روی در استنشاق منع می‫کردند. (تا مبادا آب از راه بینی‫ وارد حلق شود).&lt;br /&gt;
ـ امام احمد می‫گوید: هیچ روایت درستی در دست نیست که نشان دهد پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;با دهان روزه حجامه می‫کرده‫اند. (خارج کردن خون فاسد از جسم)&lt;br /&gt;
ـ همچنین هیچ روایت درستی نیست که نشان دهد آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;از مسواک زدن در اول روز یا آخر آن منع کرده باشد.&lt;br /&gt;
اعتکاف پیامبر &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم&lt;br /&gt;
رسول اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;همیشه تا آخر عمر مبارکشان ده روز آخر رمضان را در مسجد به اعتکاف می‫نشستند، تنها یک بار اتفاق افتاد که اعتکافشان در رمضان ترک شد، که بجای آن در ماه شوال به اعتکاف نشستند.&lt;br /&gt;
و یکبار نیز برای رسیدن به پاداش شب قدر ده روز اول رمضان را به اعتکاف نشستند، سپس ده روز وسط آنرا، و سپس ده روز آخر را، آنگاه دریافتند که شب قدر یکی از شبهای دهه‫ی آخر رمضان است، از آنروز تا روزی که به الله متعال پیوست همیشه ده روز آخر ماه مبارک را به اعتکاف می‫نشستند.&lt;br /&gt;
ـ دستور می‫دادند با پارچه‫ گوشه‫ای از مسجد را خیمه زنند، تا در آن دور از مردم با پروردگارش به راز و نیاز پردازد.&lt;br /&gt;
ـ و روزی که می‫خواست به اعتکاف بنشیند، نماز فجر را می‫خواند و داخل خیمه‫ی اعتکافشان می‫شد.&lt;br /&gt;
ـ ایشان هر ساله ده روز به اعتکاف می‫نشستند، و در سالیکه وفات کردند بیست روز به اعتکاف نشستند.&lt;br /&gt;
ـ جبریل هر سال یک بار قرآن را بر پیامبر &amp;nbsp;اسلام صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;عرضه می‫کرد، تنها در سالیکه رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;وفات نمودند دو بار قرآن را با رسول الله خواندند.&lt;br /&gt;
ـ وقتی می‫خواست به اعتکاف بنشیند تنها داخل خیمه خود می‫شد.&lt;br /&gt;
ـ در حال اعتکاف مگر برای احتیاجات ضروری یک فرد به خانه‫اش نمی‫رفت.&lt;br /&gt;
ـ و احیانا تنها سرشان را از مسجد به داخل خانه‫ی همسرشان عائشه صديقه رضي الله عنها (که کنار مسجد بود) دراز می‫کردند، و ایشان در حالیکه عادت ماهانه داشتند سر آن حضرت را می‫شستند و شانه می‫زدند.&lt;br /&gt;
ـ احیانا برخی از همسرانشان شبانه در اعتکاف بدیدن آن حضرت می‫آمدند، و وقتی می‫خواستند برگردند، آن حضرت آنها را تا خانه‫هایشان بدرقه می‫کردند.&lt;br /&gt;
ـ با هیچ یک از همسرانش در حال اعتکاف همبستری نکرده‫اند و نه کسی از آنها را بوسیده‫اند.&lt;br /&gt;
ـ وقتی به اعتکاف می‫نشستند، رخت خوابشان را در جای اعتکافشان پهن می‫کردند.&lt;br /&gt;
ـ و اگر در اعتکاف می‫بود و برای ضرورتی از مسجد خارج می‫شد، و در راه خبر بیماری را می‫شنید، برای بیمارپرسی و عیادت راهش را تغیر نمی‫داد.&lt;br /&gt;
ـ باری پیامبر محبوبمان صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در خیمه‫ای ترکی که بر درش حصیری آویزان کرده بود به اعتکاف نشستند. با گوشه‫نشینی و دوری از مردم می‫خواستند روح اعتکاف و اهداف آنرا دریابند. در حقیقت اعتکاف پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;با آنچه بسیاری از نادانان انجام می‫دهند که اعتکافشان جای دید و بازدید، و گفت و شنود، و بخور و ببر است بکلی متفاوت است. این گونه اعتکافها چیزی است غیر از اعتکاف آن مقام والای رسالت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم .&lt;br /&gt;
الله متعال همه‫ی مؤمنان را توفیق دهد تا به نحو احسن از دستورات و فرامین و سنت آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;پیروی کنند.&lt;br /&gt;
سايت عقيده افتخار دارد كه مجموعه كتابهاى مفيدى را دربارۀ این&amp;nbsp;ماه پر فیض و برکت و احكام&amp;nbsp;روزه خدمت شما عزیزان معرفى نماید که در بخش فقه و احکام كتابخانه عقيده نشر گردیده است امیدواریم این ماه، ماه رحمت و مغفرت و رهایی از آتش جهنم برای همۀ مسلمانان باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گنجینه رمضان&lt;br /&gt;
رمضان مبارک و فضایل آن&lt;br /&gt;
ماه مبارک رمضان شاهراه رستگاری&lt;br /&gt;
فقط برای جوانان در رمضان&lt;br /&gt;
باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;br /&gt;
حکمت و فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه سپر پارسایان&lt;br /&gt;
فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه - فضائل، فوائد، احکام و آداب&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرارسیدن ماه خیر و برکت مبارک باد!</title>
<link>http://qalamlib.com/news/388</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;
	&lt;strong&gt;فرارسیدن ماه خیر و برکت، رمضان مبارک باد!&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	ماه رمضان، ماه بزرگ و با عظمتی است، در این ماه روزه كه پديدآورنده&amp;zwnj; تقوى&amp;zwnj; است، بر مسلمانان فرض گردیده است:&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;﴿&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;يَٰاأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبلِكُم لَعَلَّكُم تَتَّقُونَ&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;﴾ [البقرة: &amp;nbsp;١٨٣]&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;laquo;اي&amp;zwnj; مؤمنان&amp;zwnj;!!، بر شما روزه&amp;zwnj; فرض&amp;zwnj; گردانيده&amp;zwnj; شد همان&amp;zwnj;گونه&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; بر آنان&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; پيش&amp;zwnj; از شما بودند، فرض&amp;zwnj; شده&amp;zwnj; بود. باشد كه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; تقوی&amp;zwnj; گراييد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;در این ماه پرفیض و برکت، قرآن، آخرین کلام رب العالمین برای نجات بشریت، نازل گردیده است:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;﴿&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;شَهرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِي أُنزِلَ فِيهِ ٱلقُرءَانُ هُدى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰت مِّنَ ٱلهُدَىٰ وَٱلفُرقَانِ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهرَ فَليَصُمهُ&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;﴾ [البقرة: ١٨٥]&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
	&amp;laquo;(آن چند روز محدود و اندک) ماه رمضان است (ماهی) که قرآن در آن نازل شده است، (کتابی) که راهنمای مردم است، و (در بردارنده) نشانه&amp;zwnj;ها و دلایل آشکار و روشن از هدایت و جدا کننده&amp;zwnj;ی حق از باطل است. پس هر کس از شما این ماه را (در حضر) دریابد، باید که آن را روزه بدارد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;خداوند قرآن را در شبی از شب&amp;zwnj;های رمضان نازل نمود که خیر و برکت آن از هزار ماه بیشتر است،&lt;/strong&gt; همان&amp;zwnj;گونه که خداوند عزوجل می&amp;zwnj;&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید:&lt;br /&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;﴿&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;إِنَّا أَنزَلنَٰهُ فِي لَيلَةِ ٱلقَدرِ *&lt;/span&gt; &amp;nbsp;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;وَمَا أَدرَىٰكَ مَا لَيلَةُ ٱلقَدرِ *&lt;/span&gt; &amp;nbsp;&lt;span dir=&quot;RTL&quot;&gt;لَيلَةُ ٱلقَدرِ خَير مِّن أَلفِ شَهر&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;﴾ [القدر:۱-۳]&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;laquo;ما (قرآن را) در شب قدر نازل کردیم و &amp;rlm; تو چه مي&amp;zwnj;داني شب قدر كدام است (و چه اندازه عظيم است&amp;zwnj;؟) &amp;rlm;شب قدر از هزار ماه ارجمندتر است&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	یعنی عبادت در آن - اگر مورد قبول واقع شود- از عبادت 83 سال و 3 ماه برتر است.&lt;br /&gt;
	&lt;br /&gt;
	&lt;strong&gt;منظور از نزول قرآن در این&amp;zwnj;جا، نزول یک&amp;zwnj;باره به &amp;laquo;بیت العزة&amp;raquo; در آسمان دنیا در شب قدر است،&lt;/strong&gt; تا بعداً به صورت تدریجی در مدت زمان نبوت بر اساس رویدادها و مراحلی&amp;zwnj;که پیش روی دعوت بود، بر پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- نازل گردد.&lt;br /&gt;
	ابن کثیر -رحمه الله- در تفسیرش آورده است: &amp;laquo;و اما قرآن یک&amp;zwnj;باره به &amp;laquo;بیت العزة&amp;raquo; از آسمان دنیا نازل شده، و این اتفاق در شب قدر از ماه رمضان روی داده است، همان&amp;zwnj;گونه که خداوند عزوجل می&amp;zwnj;&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: ﴿إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ﴾ و پس از آن به صورت تدریجی و بر اساس حوادث بر پیامبر- صلی الله علیه وآله وسلم- نازل گردیده است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
	ابن عباس -رضی الله عنهما- فرموده است: &amp;laquo;قرآن در شب قدر از ماه رمضان، در شبی مبارک نازل گردیده، سپس به صورت منظم و هماهنگ در طول ماه&amp;zwnj;ها و ایام نازل شده است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
	شب قدر بنا بر فرمودۀ پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- در شب&amp;zwnj;های فرد ده آخر رمضان طلب می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- می&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: &amp;laquo;تَحَرَّوْا لَيْلَةَ القَدْرِ فِي الوِتْرِ، مِنَ العَشْرِ الأَوَاخِرِ مِنْ رَمَضَانَ&amp;raquo;. &amp;laquo;شب قدر را در شب&amp;zwnj;های فرد از دهة آخر رمضان جستجو کنید&amp;raquo;. [صحیح بخاری]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;در این ماه دروازه&amp;shy;های بهشت گشوده و درهای جهنم بسته می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، و شیاطین به بند و زنجیـر کشیده می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند،&lt;/strong&gt; چنان&amp;zwnj;که در حدیث، پیامبر- صلی الله علیه وآله وسلم- فرموده است:&lt;br /&gt;
	&amp;laquo;إِذَا جَاءَ رَمَضَانُ، فُتِّحَتْ أَبْوَابُ الْجَنَّةِ، وَغُلِّقَتْ أَبْوَابُ النَّارِ، وَصُفِّدَتِ الشَّيَاطِينُ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
	&amp;laquo;با فرا رسیدن ماه رمضان، در&amp;zwnj;های بهشت گشوده و درهای آتش بسته می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود و شیاطین به زنجیر کشیده می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند&amp;raquo;. [صحیح بخاری و صحیح مسلم]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	همچنین می&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: &amp;laquo;إِذَا كَانَ أَوَّلُ لَيْلَةٍ مِنْ شَهْرِ رَمَضَانَ صُفِّدَتِ الشَّيَاطِينُ، وَمَرَدَةُ الجِنِّ، وَغُلِّقَتْ أَبْوَابُ النَّارِ، فَلَمْ يُفْتَحْ مِنْهَا بَابٌ، وَفُتِّحَتْ أَبْوَابُ الجَنَّةِ، فَلَمْ يُغْلَقْ مِنْهَا بَابٌ، وَيُنَادِي مُنَادٍ: يَا بَاغِيَ الخَيْرِ أَقْبِلْ، وَيَا بَاغِيَ الشَّرِّ أَقْصِرْ، وَلِلَّهِ عُتَقَاءُ مِنَ النَّارِ، وَذَلكَ كُلُّ لَيْلَةٍ&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
	&amp;laquo;با فرارسیدن شب اول از رمضان، شیاطین و جن&amp;zwnj;های سرکش به زنجیـر کشـیده می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند و تمامی در&amp;zwnj;های جهنم بسته می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، به طوری&amp;zwnj;که دری باز باقی نمی&amp;shy;ماند و تمامی درهای بهشت گشوده می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، به طوری&amp;zwnj;که دری بسته نخواهد بود، و کسی ندا می&amp;zwnj;&amp;shy;دهد: ای خواهان خیر و ثواب! به سوی خدا و عبادت روی آور، و ای خواهان شر و بدی و فساد! دست بردار، و در این ماه خدا آزاد شدگانی از آتش دارد و این ندا و آزاد شدن در تمامی شب&amp;zwnj;های ماه رمضان است&amp;raquo;. [صحیح سنن ترمذی]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;در این ماه گناهان بخشیده می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود&lt;/strong&gt; چنان&amp;zwnj;که در حدیث صحیح، پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- فرموده است: &amp;laquo;مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کس رمضان را با ایمان، و به نیت اجر و پاداش قیامت روزه بگیرد، گناهان گذشتة او بخشیده خواهد شد&amp;raquo;. [صحیح بخاری و مسلم]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	و می&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: &amp;laquo;وَرَمَضَانُ إِلَى رَمَضَانَ، مُكَفِّرَاتٌ مَا بَيْنَهُنَّ إِذَا اجْتُنِبَتِ الْكَبَائِرَ&amp;raquo;. &amp;laquo;رمضان تا رمضان سبب کفارۀ گناهان بین آن دو است به شرطی&amp;zwnj;که از گناهان کبیره خودداری شود&amp;raquo;. [صحیح مسلم]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;در فضیلت روزه به طور عموم احادیث زیادی روایت شده است، از جمله:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
	فرمودۀ پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;مَنْ صَامَ يَوْمًا فِي سَبِيلِ اللهِ جَعَلَ اللَّهُ بَيْنَهُ وَبَيْنَ النَّارِ خَنْدَقًا كَمَا بَيْنَ السَّمَاءِ وَالأَرْضِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کس روزی در راه خدا روزه باشد، خداوند بین او و آتش، خندقی به فاصلۀ آسمان و زمین قرار می&amp;zwnj;&amp;shy;دهد&amp;raquo;. [صحیح سنن الترمذی]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	و فرمودۀ پیامبر -صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;مَنْ صَامَ يَوْمًا فِي سَبِيلِ اللهِ زَحْزَحَهُ اللَّهُ عَنِ النَّارِ سَبْعِينَ خَرِيفًا&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کس، روزی در راه خدا روزه باشد، خداوند او را هفتاد سال از آتش دور می&amp;zwnj;&amp;shy;گرداند&amp;raquo;. [صحیح سنن الترمذی]&lt;br /&gt;
	و از ابو أمامه -رضی الله عنه- روایت است که: &amp;laquo;به پیامبر خدا -صلی الله علیه وسلم- گفتم: ای رسول خدا، مرا به عملی ارشاد کن که با انجام آن به بهشت وارد شوم. پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- فرمود: &amp;laquo;عَلَيْكَ بِالصَّوْمِ؛ فَإِنَّهُ لَا مِثْلَ لَهُ&amp;raquo;. وفي رواية: &amp;laquo;عَلَيْكَ بِالصَّوْمِ؛ فَإِنَّهُ لَا عِدْلَ لَهُ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;روزه بگیر، زیرا هیچ چیز مثل و مانند روزه نیست&amp;raquo;. و در روایتی دیگر &amp;laquo;روزه بگیر که هیچ چیز با آن برابری ندارد&amp;raquo;. [صحیح سنن النسائی]&lt;br /&gt;
	و فرمودۀ پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;كُلُّ عَمَلِ ابْنِ آدَمَ يُضَاعَفُ، الْحَسَنَةُ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا إِلَى سَبْعِمِائَةِ ضِعْفٍ إِلَى مَا شَاءَ اللَّهُ، يَقُولُ اللَّهُ: إِلَّا الصَّوْمَ؛ فَإِنَّهُ لِي وَأَنَا أَجْزِي بِهِ، يَدَعُ شَهْوَتَهُ وَطَعَامَهُ مِنْ أَجْلِي، لِلصَّائِمِ فَرْحَتَانِ: فَرْحَةٌ عِنْدَ فِطْرِهِ، وَفَرْحَةٌ عِنْدَ لِقَاءِ رَبِّهِ. وَلَخُلُوفُ فَمِ الصَّائِمِ أَطْيَبُ عِنْدَ اللَّهِ مِنْ رِيحِ الْمِسْكِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کردار نیکوی انسان ده تا هفتصد برابر ثواب و پاداش دارد، خداوند متعال فرموده است: جز روزه، چون روزه برای من است و من پاداش آن&amp;zwnj;را می&amp;zwnj;&amp;shy;دهم، شهوت و طعامش را به خاطر من رها می&amp;zwnj;&amp;shy;سازد و برای فرد روزه دار دو شادمانی هست: شادمانی در هنگام افطارش و شادمانی در هنگام ملاقات پروردگارش، به خدا سوگند بوی دهان روزه&amp;zwnj;دار در نزد خداوند خوشبوتر از بوی مشک است&amp;raquo;. [مسند احمد و صحیح بخاری و صحیح مسلم با الفاظ متفاوت و مختلف]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	و فرمودۀ پیامبر -صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;الصِّيَامُ وَالْقُرْآنُ يَشْفَعَانِ لِلْعَبْدِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ، يَقُولُ الصِّيَامُ: أَيْ رَبِّ، مَنَعْتُهُ الطَّعَامَ وَالشَّهَوَاتِ بِالنَّهَارِ، فَشَفِّعْنِي فِيهِ، وَيَقُولُ الْقُرْآنُ: مَنَعْتُهُ النَّوْمَ بِاللَّيْلِ، فَشَفِّعْنِي فِيهِ&amp;raquo;، قَالَ: &amp;laquo;فَيُشَفَّعَانِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;روزه و قرآن در روز قیامت برای بنده شفاعت می&amp;zwnj;&amp;shy;کنند، روزه می&amp;zwnj;&amp;shy;گوید: پروردگارا .. او را از خوراک و شهوت باز داشتم، پس شفاعت مرا در بارة او بپذیر و قرآن می&amp;zwnj;&amp;shy;گوید: او را از خواب شبانه باز داشتم، پس شفاعتم را در بارة او بپذیر، پیامبرr فرمود: شفاعت آنان پذیرفته خواهد شد&amp;raquo;. [مسند احمد، مستدرک حاکم، و شعب الإیمان بیهقی. آلبانی می&amp;zwnj;گوید: حسن و صحیح است]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	همچنین فرمودۀ پيامبر -صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;إِنَّ فِي الْجَنَّةِ بَابًا يُقَالُ لَهُ الرَّيَّانُ، يَدْخُلُ مِنْهُ الصَّائِمُونَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يَدْخُلُ فِيهِ أَحَدٌ غَيْرُهُمْ، فَإِذَا دَخَلُوا أُغْلِقَ عَلَيْهِمْ فَلَمْ يَدْخُلْ فِيهِ أَحَدٌ غَيْرُهُمْ فَإِذَا دَخَلَ آخِرُهُمْ أُغْلِقَ، مَنْ دَخَلَ فِيهِ شَرِبَ وَمَنْ شَرِبَ لَمْ يَظْمَأْ أَبَدًا&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;در بهشت دروازه هست کـه بـه آن &amp;laquo;ریـان&amp;raquo; گفتـه می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، در روز قیـامت تنها روزه&amp;zwnj;داران از آن در وارد بهشت می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند، از آن در، هیچ کس دیگری جز روزه&amp;zwnj;داران وارد نمی&amp;zwnj;شود، آخرین نفر از روزه&amp;zwnj;دارن که وارد بهشت شد، آن در نیز بسته خواهد شد و هر کس از آن در وارد شود، می&amp;zwnj;&amp;shy;نوشد و هر کس بنوشد هرگز تشنه نخواهد شد&amp;raquo;. [بخاری و مسلم و نسایی با الفاظ مختلف]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	پس عبادت روزه، راهی است برای رسیدن به تقوا و پرهیزگاری. و در مدرسه روزه است که مرد مؤمن با کاروان متقیان و پرهیزگاران همسفر می‫شود، و اساسنامه هدایت (قرآن کریم) را به دست گرفته پله پله تا ملاقات خداوند به پیش می‫رود.&lt;br /&gt;
	و در سایه تقوا انسان درمی‫یابد که پروردگارش کیست، و سر سجده و بندگی به درگاه حق فرود آورده بزرگی و عضمت او بدرستی در کالبدش تجلی می‫کند، و زبان و وجودش شکر و سپاس و ثنای او می‫شود، تنها اویی؛ که مؤمن سرگردان را به شرف هدایت نایل گردانید.&lt;br /&gt;
	ماه رمضان؛ ماه قرآن و مدرسه دعا و نیایش و بندگی برای مؤمنان راستین است. شایسته است مؤمن در پرتو این ماه مبارک دریابد که تنها پناهگاه و تنها یار و یاور او پروردگاریست که او را آفریده. پس دست از امام زاده‫ها و قبرها و پیرها و مزارها شسته، از تمام مظاهر شرک و بت پرستی خود را رها کرده، بسوی پروردگارش پر کشد، ودستان نیایش و دعا بسوی او، و تنها او، دراز کند. و با تمام توان از او، و تنها او، بخواهد، و از گزند آفات و ضرر و زیانها به او ، و تنها او، پناه جوید.&lt;br /&gt;
	رمضان بر همه شما مبارک بادا، و طاعات و عبادات و دعاهایتان قبول درگاه حق...&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;برادران و خواهران عزیز!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
	سايت کتابخانه الکترونیکی عقيده مفتخر است كه مجموعه كتاب&amp;zwnj;هاى مفيدى را دربارۀ این ماه پر خیر و برکت و احكام روزه خدمت شما عزیزان معرفى نماید که در این سایت نشر گردیده است. امیدواریم این ماه، ماه رحمت و مغفرت و رهایی از آتش جهنم برای همۀ مسلمانان باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;
	&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1668/&quot;&gt;گنجینه رمضان&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;
	&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=891&quot; style=&quot;font-size: 14px; line-height: 28px; font-family: Tahoma; text-align: center; text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;رمضان مبارک و فضایل آن&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;font color=&quot;#800080&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=868&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ماه مبارک رمضان شاهراه رستگاری&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;font color=&quot;#800080&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=856&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;فقط برای جوانان در رمضان&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=418&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=397&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;حکمت و فقه روزه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=368&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#800080&quot;&gt;روزه سپر پارسایان&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=892&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;فقه روزه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; &quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=653&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;روزه - فضائل، فوائد، احکام و آداب&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>اصلاح شيعه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/387</link>
<description>&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;اصلاح شيعه، ڈاكٹر موسى المسوى/ابو مسعود آل امام&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;كيا آپ نے كبھى شيعه مذهب&amp;nbsp; كى حقيقى تصوير اور شيعه كا أپنے مذهب سے &amp;quot;حسن سلوك&amp;quot; اور اس پر عمل كا انداز&amp;nbsp; ملاحظه كياهے ،وه بھى كسى صاحب علم ونظر شيعه محقق كے قلم سے جوشيعه علماء كے گھرانے ميں پيدا هوا&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;اگر آپ پڑھنا چاهيں اهل تشيع كى اپنے مذهب سے تصادم كى تاريخ ايك نامور شيعه عالم كے قلم سے&lt;br /&gt;
محترم بھائيو اور بهنو عقيده ويب سائٹ انتهائى مسرت كے ساتھ شيعه مذهب كى حقيقى تصوير كے بارے ميں اردو زبان ميں سب سے بهترين،&amp;nbsp; لاجواب اور منفرد كتاب آپ كے سامنے پيش كرنے كى سعادت حاصل كر رهى هے&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;شيعه كے اپنے عقائد و اعمال سے انحراف كے تاريخى پسِ منظر علمى و تنقيدى جائزے اور قابل عمل اصلاحى تجاويز پر مشتمل يه كتاب ايك بلند پايه شيعه محقق عالم كى تصنيف هے جس كا مطالعه شيعه وسنّى عوام و خواص سب كے لئے يكساں مفيد هے ۔&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب كا تعارف:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
صاحب كتاب كهتے هيں : يه كتاب اسلام ، انسان اور عقل كا دفاع كرتى هے ۔ ميں اس كے ذريعے الله كى رضا، مدد اور مغفرت كا طلب گار هوں ۔&lt;br /&gt;
ميرے مخاطب هر مكان و زمان كے شيعه هيں، ميرى يه كتاب هر اس شخص كے نام هے جو ندائے تصحيح و اصلاح پر&amp;nbsp; كان دھرے اور اس كے اُصول و مقاصد كے لئے جدوجهد كرے ۔&lt;br /&gt;
ذيل ميں كتاب كے اهم موضوعات پر كتاب سے اقتباسات جن سے ان موضوعات كے حوالے سے مؤلف كے مؤقف كو سمجھنے ميں آسانى هوگى.&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ امامت و خلافت:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
شيعيّت اور شيعه كے مابين پهلا معركه اس وقت برپا هوا جب انهوں نے تشيّع كے معنى ميں تحريف كرتے&amp;nbsp; هوئے سيّدنا على رضى الله عنه اور اهلبيت كى محبّت كى بجائے خلفائے راشدين كى مذّمت اور براه راست ان پر اور بالواسطه سيدنا على رضى الله عنه پر اور ان كے اهلِ بيت پر نكته چينى كا نام تشيّع ركھ ديا.&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ تقيه:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
ميرا پخته اعتقاد هے كه دُنيا ميں ايسا كوئى گروه موجود نهيں جس نے اپنى تذليل و توهين اس حدتك كى هو جس قدر شيعه نے خُود اپنى تقيه كا نظريه قبول كركے اور اس پر عمل پيرا هو كر كى هےٹ ميں اخلاص كے ساتھ الله كے حضور دعا گو هوں اور اس دن كا منتظر هوں جب شيعه اس پر عمل تو دركنار اس&amp;nbsp; كے تصور سے بھى نفرت كريں گے.&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ امام مهدى:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
آل محمد صلى الله عليه وسلم ميں سے ايك ايسے آدمى كے ظهور كا نظريه جو زمين كو عدل وانصاف سے بھر دے گا بڑا خوبصورت اور نيك اميدوں سے بھرا هوا نظريه هے، ليكن شيعه علماء نے امام مهدى كے نظريه كے ساتھ دو پَر بھى نتھى كردئيے هيں ، يه پَرهيں:&lt;br /&gt;
(1) كاروبار كے منافع ميں سے خمس وصول كرنے كى بدعت۔&lt;br /&gt;
(2) ولايت فقيه كى بدعت۔&lt;br /&gt;
ان ميں سے پهلى بدعت ، خمس ، شرعى جواز اور كسى دليل كے بغير ٹيكس سے عبارت هے۔&lt;br /&gt;
اور دوسرى كا معنى هے انسان كا انسان كے لئے غير مشروط بنده و غلام بن جانا۔&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ غلو:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
غلو كے كئى مظاهر هيں جو نظرياتى غلو سے شروع هوتے اور عملى غلو پر منتج هوتے هيں ۔ مختصر ترين الفاظ ميں غلو كسى انسان كا كسى انسان كے متعلق يه عقيده ركھنا كه وه ايسى كرامات يا معجزات يا خارقِ عادت غير معمولى امور پر قادر هے جنهيں عام لوگ نهيں كرسكتے۔ اور عملى غلو&amp;nbsp;&amp;nbsp; ائمه سے دنيوى واخروى حاجات طلب كرنے اور ان سے براه راست مدد مانگنے كى صورت ميں سامنے آتا هے، اسى طرح قبروں كو بوسے دينا اماموں اور اولياء كو آرامگاهوں ميں يكساں طور پر عام هے۔&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ قبور&amp;nbsp; آئمه كى زيارت:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
ميں نے آج تك اپنے فقهاء سے (الله انهيں معاف كرے) مخلوق كے كلام كى خالق كے كلام پر افضليت كے بارے ميں كوئى شافى جواب نهيں سنا۔&lt;br /&gt;
٭ عاشوراء محرم كے روز ماتم&lt;br /&gt;
عاشوراء محرم كو سنگينوں اور زنجيروں سے ماتم كرنا&amp;nbsp;&amp;nbsp; ، كسى مقدس انقلابى تحريك كى صورت اس طرح نهيں بگاڑى گئى جس طرح شيعه نے حسين رضى الله عنه كى تحريك كا حليه محبت حسين كے ذريعے بگاڑا۔&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ اذان ميں تيسرى شهادت:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
شيعه فقهاء كا اس پر اجماع هے كه جو شخص اس اعتقاد سے (اذان ميں) تيسرى شهادت كهتا هے كه وه شريعت ميں وارد هے ، وه حرام عمل كا مرتكب هوا.&lt;br /&gt;
سيّد مرتضىٰ جو پانچويں صدى هجرى كے اكابر علماء شيعه اماميه ميں سے هيں ۔ فرماتے هيں جس نے نمازوں كى اذان ميں (اشهد ان عليّا ولى الله ) كها اس نے حرام عمل كا ارتكاب كيا ۔&lt;br /&gt;
مؤلف لكھتے هيں كه:&amp;nbsp; اس سلسلے ميں دلچسپ اور باعث تعجب بات يه هے كه همارے فقهاء سامهم الله كا اس پر مطلق و مكمل اجماع هے كه اس شهادت كا اذان ميں اضافه عصر ائمه كے دير بعد هوا هے اور چوتھى صدى تك اسے كوئى نهيں جانتا تھا اور اس پر سب فقهاء متفق هيں كا أگر امام على رضى الله عنه بقيد حيات هوتے اور اپنے بارے ميں سن ليتے كا ان كا نام اذان ميں پكارا جاتا هے او ايسا كهنے والے پر شرعى حد نافذ كرتے ۔&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ متعه ( عارضى نكاح):&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
كوئى ايسى امت أپنى ماؤں &amp;ndash; جن كے قدموں ميں الله نے جنّت ركھى هے &amp;ndash; كے شرف و وقار كا تحفّظ كيونكر كر سكتى هے جو نكاح متعه كو جائز كهتى اور اس پر عمل بھي كرتى هو.&lt;br /&gt;
متعه سے مراد وقتى نكاح هے جس پر ايران ميں شيعه عمل كرتے هيں هو سكتا هے&amp;nbsp; جن دوسرے علاقوں ميں وه آباد هيں اگر كوئى سبيل نكلتى هو تو وهاں بھى كرتے هوں ۔&lt;br /&gt;
تفسير و فقه كى كتب ان&amp;nbsp; فقهى&amp;nbsp; جدل كےمباحث سے بھرى پڑي هيں ليكن ان سے كسى فائدے كى اميد نهيں هے يهاں ميں ان فقهى جدل كى مختصر روئيداد ذكر كركے اس كے بعد ان هولناك خطرات كى نشاندهى كروں گا جو شيعه كو اس بدترين نظريه كو سرے سے ختم نه كرنے كى صورت ميں اجتماعى ، اخلاقى اور انسانى مسائل كے گرداب ميں پھنسا سكتے هيں ، ميں اول و آخر شيعه نوجوان نسل كو اس پر خار اور بدنما راستے پر چلانے كى تمام تر ذمه دارى فقهاء پر ڈالتا هوں اس كى تمام مسئوليت و جواب دهى انهيں كے كندھوں پر هے ۔&lt;br /&gt;
شيعه فقهاء كهتے هيں كه متعه عهد نبوى ، عهد خليفه ابو بكر اور عمر كے نصف خلافت ميں مباح&amp;nbsp; اور جائز تھا عمر بن خطاب&amp;nbsp; رضى الله عنهم نے اسے حرام كر ديا اور مسلمانوں كو اس سے باز رهنے كا حكم ديا اس پر وه ان روايتوں&amp;nbsp; سے استدلال كرتے هيں جو كتب شيعه اور بعض كتب اهل السنة ميں مروى هيں ۔&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ خاكِ كربلاء پر سجده:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
خاك كربلاء پر يه سجده شيعه اور شيعيت كے درميان معركے كے عهدِ دوم ميں شروع هوا پھر وسيع تر آفاقى سطح پر پھيل گيا اور تمام شيعوں ميں عام هو گيا ۔&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭&amp;nbsp; دهشت گردى:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
صرف شيعه هى ايك ايسا اسلامى گروه هے جس نے اپنے آپ كو بغير كسِى قيد و شرط كے مذهبى قيادت كے سپرد كر ركھا هے، مذهبى قائدين جيسے چاهتے هيں پاؤں كى ٹھوكر سے كبھى انهيں لڑائى كے ميدانوں ميں دھكيل ديتے هيں تو كبھى دهشت گردى اور قتل وغارت گرى كے خار زار ميں.&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ نماز جمعه:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
ميں پخته عقيده ركھتا هوں كه همارے فقهاء نے نص صريح كے مقابلے ميں اجتهاد كيا جس كا واحد سبب يه تھا كه وه عظيم متحده اسلامى صف ميں ايك نيا فرقه پيدا كر كے شيعه كو اس بات پر آماده كرنا چاهتے تھے كه وه نمازِ جُمعه ميں ديگر اسلام فرقوں كے ساتھ شركت سے باز رهيں ۔&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ تحريفِ قرآن:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
تحريف قرآن كا قائل هونا اس پر ايمان كے منافى هے ۔&lt;br /&gt;
اس موضوع پر انصاف پسندى سي غور كرنے والا شخص بخوبى جان سكتا هے كه شيعه محدثين جو بخوشى تحريف قرآن كے قائل هوئے تو اس كا سبب ان آيات سے استدلال تھا جو سيدنا على رضى الله عنه كى امامت پر نص تھيں انهى مزعومه محرف آيات كى بنياد پر بعض بڑے شيعه علماء اس بات كى ترديد كرتے هيں كه قرىن ميں امامت على رضى الله عنه پر كسى نص الٰهى كا وجود نهيں هے ۔&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ جمع بين الصلاتين:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
شيعه اماميه حضر ميں بھى ظهر و عصر اور مغرب و عشاء كى نمازوں كو جمع كركے پڑھنے كے قائل هيں اور وه اس مؤقف ميں تمام اسلامى فرقوں ميں منفرد هيں.&lt;br /&gt;
اس فقهى اختلاف ميں ميرا مؤقف دوسرے فقهى مسائل كى نسبت بالكل مختلف هے ، مگريه طرز عمل جس كے ساتھ شيعه منفرد هيں وسيع اسلامى اتحاد كو نقصان پهنچانے كا سبب بن سكتا هے خصوصاً جبكه شيعه فقهاء كى اكثريت مقرره اوقات ميں نماز پڑهنے كے مستحب هونے كا فتوىٰ ديتى&amp;nbsp; هے ليكن عملى طور پر جمع كر كے هي پڑهتے هيں اور شيعه كى مساجد ميں عادةً&amp;nbsp; اس كے مطابق عمل هو رها هے۔&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;strong&gt;٭ رجعت&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ٭ بداء:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
جب ديومالائى كهانياں عقائد كے ساتھ اور اوهام حقائق ميں خلط ملط هو جائيں تو ايسى بدعتيں ظهور پذير هوتى هيں جو ايك هي وقت ميں هنساتى هيں اور رُلاتى بھى-!&lt;br /&gt;
دو موضوع ايسے هيں جو شيعه اماميه كے عقائد ميں بهت بڑا مقام نهيں ركھتے اور ان كا شيعه كى فكرى اور اجتماعى زندگى پر كوئى اثر بھى نهيں هے سوائے اس كے كه جب بھى كوئى گروه هر چھوٹے بڑے فرق كو شمار كرنے بيٹھ جاتا هے تو يه دونوں موضوع شيعه مذهب كے متعلق بحث و جدال كو خوب هوا ديتے هيں :&lt;br /&gt;
1: رجعت : (يه عقيده كه تمام ائمه شيعه دُنيا ميں دوباره آئيں گے).&lt;br /&gt;
2: البداء : (يه عقيده كه بسا اوقات الله تعالىٰ پر كسى واقعه كے پيش آنے كے بعد نئى صورتحال كا انكشاف هوتا هے جس كا اسے پهلے سے علم نهيں هوتا).&lt;br /&gt;
هم اپنى اس كتاب ميں ان كے تذكرے سے پهلو تهى كرنا چاهتے تھے ليكن بعد ازاں ميں نے سوچا كه ان ميں سے هر ايك كے لئے مختصر طور پر مستقل اور خاص فصل قائم كرنا بهتر هے خصوصاً ماضى قريب ميں شيعه مذهب كے متعلق مقالات اور باتوں كى اشاعت كے بعد جبكه بهت سے قلم اور جرائد شيعه، ان كے مذهب اور ان سے منسوب امور پر كافى روشنى ڈال&amp;nbsp; چكے هيں۔&lt;br /&gt;
جيسا كه هم نے كها رجعت اور بداء كے موضوعات شيعه عقائد ميں اهم اور نيادى حيثيت كے حامل نهيں هيں حتىٰ كه شيعه مذهب كے بعض اعيان نے ان دونوں نظريوں كى ترديد كى هے ، شيعه كى غالب اكثريت ان كے متعلق كچھ نهيں جانتى اور نه ان كے ته منظر سے واقف هے ۔&lt;br /&gt;
غلطى كى غلط تفسير كرنا&amp;nbsp; يا عذر گناه بد تر از گناه كامطلب مسلسل غلطى اور گناه كرنا هے اور تا قيامت اس سے نكلنے كى صورت پيدا نهيں هو سكتى ، ميرا (مؤلف) مطلب اس سے يه هے كه اگر همارے بعض علماء كى نيّت خالص ، ذهن صاف اور رائے صائب هوتى اور وه&amp;nbsp; علمى جرات سے كام ليتے تو وه من گھڑت كلام ، جمله يا ايسے نظريه كى تفسير كے لئے ايسا خار دار راسته اختيار نه كرتے جو واضح طور پر بيك وقت اُصولِ عقيده&amp;nbsp; اور عقلى مسلّمات كے خلاف هے . نظريه &amp;quot;بداء&amp;quot; اختيار كرنا&amp;nbsp; اور پھر اس پر ڈٹے رهنا كتبِ &amp;quot;زيارات&amp;quot; اور&amp;nbsp; كتبِ &amp;quot;روايات&amp;quot; ميں اسے باقى ركھنا يه اس امر كا مكمل نمونه هے كه يه لوگ گناه پر اصرار كرتے هيں اور ان پر عزّت نفس غالب آجاتى هے ، جب صورتٍِ حال&amp;nbsp; ايسى هو تو وهم و گمان سے نجات حاصل كرنا بهت مشكل هوتا هے . توفيق الٰهى بھى ايسے لوگوں كے شامل حال نهيں هوتى جن كے بَارے ميں ارشاد هوتا هے : وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يُجَادِلُ فِي اللهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُنِيرٍ {الحج:8} ترجمه: &amp;quot;اور بعض لوگ ايسے هيں كه الله كے بارے ميں جھگڑتے هيں ، نه علم ركھتے هيں، نه هدايت اور نه كتابِ روشن&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;٭ تحريك ِ اصلاح كا جائزه:&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
تحريك اصلاح و تصحيح كاميابى اور ناكامى كا جائزه&lt;br /&gt;
افكار و آراء كى هلاكت خيز اور غير فطرى دسيسه كاريوں كى اصلاح كو قرآن كريم ، سُنّتِ رسول صلى الله عليه وسلم، عقل اور فطرت سليمه سبھى فرض قرار ديتے&amp;nbsp; هيں ، بلا شبه جن پُر تأثير پند ونصائح&amp;nbsp; كے سوتے ان مصفّىٰ چشموں سے پھوٹيں گے ، يقيناً صاف دلوں&amp;nbsp; اور آماده بكار نفوص كو اپنى طرف كھينچ ليں گے اور ايسے قلب ومزاج كے لوگ فوج در فوج رشد وهدايت سے بهره ور هوں گے.&lt;br /&gt;
الله كرے شيعه حضرات كو اس كتاب كے مطالعے سے نُور هدايت نصيب هو اور حقائق و خرافات ميں تمييز كى توفيق ارزانى هو. والله هو الموفق.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000cd;&quot;&gt;&lt;strong&gt;مؤلف كا تعارف:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
ڈاكٹر موسىٰ الموسوى&amp;nbsp; (مؤلف كتاب ھذا) مشهور شيعه عالم الامام الاكبر سيّد ابو الحسن الموسوى الاصفهانى كے پوتے هيں۔&lt;br /&gt;
1930ء ميں بمقام &amp;quot;نجف اشرف&amp;quot; پيدا هوئے اور وهيں يونيورسٹى ميں مروجه تعليم مكمل كى ،&amp;nbsp; اور اجتهاد كے موضوع پر فقه اسلامى ميں ايم-اے كى ڈگرى حاصل كى۔&lt;br /&gt;
1955ء ميں طهران يونيورسٹى سے اسلامى قانون ميں ڈاكٹر يٹ كى ڈگرى حاصل كى.&lt;br /&gt;
1959ء ميں پيرس يونيورسٹى سے فلسفه ميں پى ايچ ڈى كى.&lt;br /&gt;
1960ء سے 62ء تك بغداد يونيورسٹى ميں اقتصاد اسلامى كے پروفيسر رهے۔&lt;br /&gt;
1968ء سے 78ء تك بغداد&amp;nbsp; يونيورسٹى ميں اسلامى فلسفه كے پروفيسر رهے ۔&lt;br /&gt;
1973ء سے 74 ء تك هاله يونيورسٹى جمهوريه جرمنى ميں ، طرابلس يونيورسٹى ميں ، مهمان استاذ (Visiting Professor) رهے۔&lt;br /&gt;
1975ء سے 76ء تك هارڈورڈ يونيورسٹى امريكه ميں استاذ باحث ((Research Professor كى حيثيت سے كام كيا۔&lt;br /&gt;
1978ء ميں لاس اينجلس يونيورسٹى ميں مهمان استاذ هو كر گئے۔&lt;br /&gt;
1979ء سے مغربى امريكه ميں &amp;quot;المجلس الاسلامى الاعلٰى&amp;quot; كے منتخب صدر نشين هيں۔&lt;br /&gt;
موصوف كى 1990ء تك نو عربى كتب طبع هو چكى تھيں۔&lt;br /&gt;
آپ بڑے بُلند پايه شيعه محقق هيں ، ايرانى انقلاب كا انهوں نے نه صرف قريب سے مشاهده كيا بلكه اس كے لئے بھر پور جدوجهد بھى كى، آيت الله خمينى كے ساتھ ان كے قريبى روابط رهے، جلاوطنى كے ايّام ميں انهوں نے بارها ان كى دست گيرى كى ، ڈهارس بندھائى&amp;nbsp; اور ان كے كام آئے ، خمينى كے مقتول بيٹے مصطفى خمينى كے ساتھ ان كے خصوصى تعلّقات تھے۔&lt;br /&gt;
مؤلف نے اپنى ديگر تصانيف ميں خمينى كى شخصيت سے بھى پرده اٹھايا هے۔&lt;br /&gt;
ڈاكٹر موسىٰ موسوى كى تمام كتب قابلِ مطالعه هيں اور اپنے اپنے موضوع پر جِدّت كا رنگ لئے هوئے هيں ۔ قارئين كرام اس كتاب ميں ايك منصف مزاج ، عدل پسند، روشن خيال، صاحب علم ونظر شيعه محقق كے قلم سے تشيّع كى تصوير اور شيعه كا أپنے مذهب سے &amp;quot;حسن سلوك&amp;quot; اور اس پر عمل كا انداز ملاحظه فرمائيں گے۔&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1501/&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:14px;&quot;&gt;آپ مذكوره كتاب كو&amp;nbsp; اس لنك پر پڑھ اور ڈاؤن لوڈ كر سكتے هيں&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>جوانان شیعہ کو راہِ حق پر گامزن کرنے والے چند سوالات</title>
<link>http://qalamlib.com/news/386</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;جوانان شیعہ کو راہِ حق پر گامزن کرنے والے چند سوالات&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;اگر آپ راه حق كى تلاش ميں هيں&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
	تو جوانان شیعہ کو راہِ حق پر گامزن کرنے والے چند سوالات... پڑهئے&lt;br /&gt;
	اگر آپ جاننا چاهيں كه اهل بيت كا اظهار كرنے والے&amp;nbsp; حقيقتا اهل بيت كى توهين كرتے هيں اور صحابه كرام رضوان الله عليهم اجمعين سے بغض و عداوت ان كے مذهب كى بنياد هے&lt;br /&gt;
	وہ اہم سوالات جو&amp;nbsp; متلاشیانِ ٍحق نوجوانوں کوراہِ حق سے ہم کنارکرنے میں بڑاعظیم کردارہے!&lt;br /&gt;
	محترم بھائيو اور بهنو عقيده ويب سائٹ انتهائى مسرت كے ساتھ گمراه&amp;nbsp; انسانوں كو كتاب وسنت كے قريب لانے كے&amp;nbsp; حوالے&amp;nbsp; سے اردو زبان ميں ايك بهترين اور منفرد&amp;nbsp; كتاب آپ كے سامنے پيش كرنے كى سعادت حاصل كر رهى هے.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
	نام&amp;nbsp; كتاب: جوانان شیعہ کو راہِ حق پر گامزن کرنے الے چند سوالات.&lt;br /&gt;
	مؤلف: سليمان بن صالح الخراشى&lt;br /&gt;
	ترجمه و توضيح: فضل الرحمن&amp;nbsp; رحمانى الندوى&lt;br /&gt;
	عددِ صفحات: 136&lt;br /&gt;
	سؤالات كى تعداد : 185&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
	&lt;br /&gt;
	رسول الله صلى الله عليه وسلم نے فرمايا: &amp;quot;بے شك بنى اسرائيل اكهتر گروهوں ميں بٹ گئے تھے اور ميرى امت تهتر گروهوں ميں بٹ جائے گى ۔ سبھى دوزخ ميں جائيں گے سوائے ايك كے&amp;quot; ۔ پوچھا گيا اے الله كے رسول صلى الله عليه وسلم ! وه ايك كون سا هوگا ؟ تو فرمايا&amp;nbsp; &amp;quot;جس پر ميں اور&amp;nbsp; ميرے اصحاب هيں&amp;quot; ۔&lt;br /&gt;
	يه الله تعالىٰ كے ارداۀ تكوينى ميں سے تھا كه مسلمان مختلف مذاهب اور مسالك ميں بٹ جائيں گے ان ميں سے بعض ، بعض كا دشمن بن كر اس كے خلاف چاليں چلے گيں يه معامله اس وقت در پيش هو گا جب وه اپنے اختلافات كے وقت هوائے نفس كى پيروى كرتے هوئے كتاب الله وسنت رسول الله صلى الله عليه وسلم كو پس پشت ڈال ديں گے بلكه الله كے حكم كى سراسر خلاف ورزى ان كا شيوۀ زندگى بن جائے گا۔&lt;br /&gt;
	حالانكه الله رب العالمين نے كسى بھى معاملے ميں اختلاف كے حل كے لئے جائے پنا ه قرآن و حديث كو قرار ديا ، فرمان إلٰهى هے: &amp;quot;[فَإِنْ تَنَازَعْتُمْ فِي شَيْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللهِ وَالرَّسُولِ إِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللهِ وَاليَوْمِ الآَخِرِ ذَلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا ] {النساء:59} .&lt;br /&gt;
	ترجمه : &amp;quot; اگر تم كسى چيز ميں اختلاف كرو تو اسے الله اور اس كے رسول كى طرف لوٹاؤ اگر تم الله پر اور قيامت كے دن پر ايمان ركھتے هو۔ يه بهت بهتر هے اور باعتبار انجام كے بهت اچھا هے&amp;rdquo;۔&lt;br /&gt;
	امت كى وحدت اور شيراز بندى كے خواهاں حضرات پر لازم هے كه اس امت كو حق پر جمع كرنے كے ليے محنت اور لگن سے كام كريں اور اسے اسى نهج پر استوار كرنے كا عزم كرليں جس نهج پر وه عهد نبوى صلى الله عليه وسلم ميں بطور عقيده، شريعت اور اخلاق آراسته تھى ، لهذا اهم ترين كام يه هے كه جو فرقے كتاب و سنت سے بهت دور هيں ان كے پيروكاروں كے انحرافات كو واضح كيا جائے كيونكه يهى انحرافات هدايت كى راه ميں حائل هيں ، اسى سلسلے ميں فاضل مؤلف نے&amp;nbsp; زير نظر كتاب&amp;nbsp; ميں شيعه&amp;nbsp; اثنا عشريه كے نوجوانوں كى خدمت ميں چند سوالات اور ان كے مختصر جوابات پيش كيے هيں تا كه ان ميں عقل مند اور ذى شعور حق كى طرف پلٹ آئيں ، كيونكے جب وه ان سوالات پر غور فكر كريں گے ان كے سامنے كوئى راه فرار هوگى اور نه ان سے چٹكارا ممكن هوگا لهٰذا وه لازما كتاب الله و سنت رسول الله صلى الله عليه وسلم كى دعوت كو سينه سے لگائيں گے جس ميں كوئى تضاد نهيں۔&lt;br /&gt;
	ان سوالات ميں سے چند بطور نمونه&amp;nbsp; درج ذيل ميں دئيے جا رهے هيں ان كو پڑهئے اوراپنا اور اپنے دوستوں كا جائزه لىجئے كه هم ميں سے كون كون راه حق سے هٹا هوا هے اور اس كو راه حق پر لانے كے لئے هم كيا كر سكتے هيں۔&lt;br /&gt;
	نوٹ: ذيل ميں دئيے گئے سوالوں كے نمبر كتاب ميں دئيے گئے نمبروں كے اعتبار سے دئے گئے هيں۔&lt;br /&gt;
	شيعه حضرات كا عقيده هے كه حضرت على&amp;nbsp; رضى الله عنه&amp;nbsp; امام معصوم هيں اور&amp;nbsp; هم يه بھى ديكھتے هيں كه وه اپنى صاجزادى ام كلثوم&amp;nbsp;&amp;nbsp; كى شادى عمر بن خطاب سے كى جو كه حسن و حسين رضى الله عنهم كى حقيقى بهن تھيں ، اور اس بات كا شيعه حضرات كے كبار علماء نے اپنى كتب ميں كيا هے (مثلا كلينى ، طوسى اور ديگر كئى حواله جات كے لئے ديكھئے كتاب هذا ، صفحه نمبر : 14، حاشيه نمبر : 1) ، اور اپنے اس اعتراف كى بنياد پر دو صورتوں ميں سے كسى ايك صورت كو قبول كرنے پر مجبور هيں۔&lt;br /&gt;
	سوال 1 : سيدنا على رضى الله عنه غير معصوم هيں كيونكه انھوں نے اپنى بيٹى كى شادى كافر سے كى هے! اور يه چيز شيعه مذهب كے عقائد اساسى كے منافى هے ۔&amp;nbsp; بلكه اس سے يه بھى پته چلا كه كوئى امام بھى معصوم نهيں كيونكه وه بھى تو انهى كى اولاد ميں سے هيں۔&lt;br /&gt;
	سوال 2: سيدنا على رضى الله عنه نے برضا ورغبت سيدنا عمر رضى الله عنه كو اپنا داماد بنايا هے ، لهٰذا يه ان كے مسلمان هونے كى واضح دليل هے ۔&lt;br /&gt;
	سوال نمبر 6: اهل تشيع كے بهت بڑے عالم علامه كلينى نے اپنى معروف و مشهور كتاب الكافى ميں ذكر كيا هے كه ائمه عليهم السلام جانتے هيں كه وه كب مريں گے اور جب مريں گے اپنے اختيار سے هى مريں گے۔&lt;br /&gt;
	اور شيعه عالم &amp;quot;علامه مجلسى &amp;quot; نے اپنى كتاب &amp;quot;بحار الانوار &amp;quot; ميں ايك حديث بيان كرتے هيں كه كوئى ايك امام ايسا نهيں هے جو فوت هوا هو بلكه ان ميں سے هر ايك مقتول هو كر دنيا سے رخصت هوا هے ۔ تفصيل كے لئے كتاب هذا صفحه نمبر&amp;nbsp; 20.&lt;br /&gt;
	سوال 11: اگر زنجير زنى ، نوحه خوانى اور سينه كوبى ميں عظيم اجر و ثواب هے جيسا كه شيعه حضرات كا دعوىٰ هے تو شيعان اهل بيت كهلانے والوں&amp;nbsp; كے مذهبى رهنما اور ان كے ملا و ذاكر زنجير زنى كيوں نهيں كرتے هيں؟&lt;br /&gt;
	سوال&amp;nbsp; 14: عوديت صرف الله تعالىٰ كى ذات كے لئے خاص هے ، ارشاد بارى تعالىٰ هے : ((بَلِ اللهَ فَاعبُد)) (الزمر:39) بلكه تو الله هى كى عبادت كر ۔ شيعه حضرات اپنى برادرى كے لوگوں كو عبد الحسين ، عبد على ، عبد الزاھراء اور عبد الامام وغيره ناموں سے موسوم كرتے هيں ؟ ليكن ائمه نے بچوں كے نام عبد على اور عبد الزھراء وغيره نهيں ركھے تھے ۔&lt;br /&gt;
	سوال 18: شيعه كا دعوىٰ هے كه امير معاوية رضى الله عنه كافر تھے ، ليكن تاريخ گواه هے كه سيدنا حسين بن على رضى الله عنه نے ان كے حق ميں خلافت سے دست بردارى كا اعلان كيا ، حالانكه حسين امام معصوم هيں لهٰذا&amp;nbsp; يا تو&amp;nbsp; امام معصوم نهيں تھے يا معاويه رضى الله عنه كافر نهيں تھے دونوں ميں سے ايك صورت كو بهر حال تسليم كرنا پڑے گا۔&lt;br /&gt;
	سوال 44 : كيا رسول الله صلى الله عليه وسلم پر قرآن كريم كے علاوه اور دوسرى كتابوں كا بھى نزول هوا هے ؟ جن كتابوں كو رسول الله صلى الله عليه وسلم نے سيدنا على رضى الله عنه كے ليے خاص كردياتھأ ؟! اگر&amp;nbsp; شيعه حضرات يه كهيں كه ايسا نهيں هے تو&amp;nbsp; پھر وه مندرجه ذيل اپنى روايات كا كيا جواب دينا پسند كريں گے:&lt;br /&gt;
	(1)الجامعه ۔ (2)صحيفة الناموس ۔(3 )صحيفة العبيطة (4) صحيفة ذؤابة السيف (5) صحيفة على (6) صحيفة الجفر (7) صحيفة الفاطمة (8) توراة اور انجيل و زبور . ان روايات كى تفصيل كے لئے ديكھئے كتاب هٰذا كے صفحه نمبر :42 تا 48 .&lt;br /&gt;
	سوال&amp;nbsp; 50 : شيعه حضرات كهتے هيں كه سيدنا حسين رضى اله عنه كى ياد ميں رونا دهونا مستحب هے ! هم كهتے هيں كه يه استحباب بربنائے دليل هے يا صرف هوائے نفسانى كى بنا پر؟ اگر يه مبنى بر دليل هے تو دليل كيا هے ؟&lt;br /&gt;
	اگر ايسا هى هے تو ائمه اهل بيت&amp;nbsp; رحمهم الله تعالى نے اس كام كو كيوں نهيں كيا جن كى اتباع اور پيروى كرنے كے تم دعويدار هو؟&lt;br /&gt;
	سوال 51: شيعه كا اعتقاد هے كه سيدنا على رضى الله عنه اپنے بيٹے سيدنا حسين رضى الله عنه سے افضل هيں تو پھڑ ان كى شهادت پر رونا دهونا&amp;nbsp; كيوں نهيں؟ اور كيا نبى كريم صلى الله عليه وسلم ان دونوں شخصيتوں سے افضل نهيں آپ صلى الله عليه وسلم پر رونا دهونا ان سے بڑھ كر كيوں نهيں؟&lt;br /&gt;
	سوال 54: شيعه حضرات نماز جمعه كيوں چھوڑتے هيں .....؟&lt;br /&gt;
	سوال&amp;nbsp; 89: شيعوں كے امام مهدى المنتظر كے بارے ميں متضاد اقوال : امام مهدى المنتظر كى ماں كون هے ؟ ولادت كب هوئى ؟ ظهور كب هو گا ، كس عمر ميں هوگا اور اس طرح كے بهت سے مسكت سوال&amp;nbsp; ملاحظه فرمائے كتاب كے صفحه نمبر:80 تا 84.&lt;br /&gt;
	سوال نمبر 97: شيعه حضرات فرقه زيديه كو كافر قرار ديتے هيں حلانكه يه فرقه آل بيت عليهم السلام سے موالاة ركھتا هے تو اس سے هميں يه معلوم هوا كه شيعوں كى اصل بنياد صحابه كرام اور سلف صالحين سے بغض وعداوت هے نه كه آل بيت سے محبت ، جس طرح وه دعوى كرتے هيں ۔&lt;br /&gt;
	يه چند ايك سوالات كتاب سے بطور نمونه هم نے ذكر كئي هيں مزيد تفصيل كے لئے كتاب كا مطالعه كيجئے اور اپنے ساتھيوں كو بھى بتلايئے تاكه سب پر حق اور باطل ميں فرق واضح هو&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
	&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1069/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#0000ff;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:14px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;آپ مذكوره كتاب كو&amp;nbsp; اس لنك پر پڑھ اور ڈاؤن لوڈ كر سكتے هيں&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;جزاك الله خيرا ( الله آپ كو جزائے خير عطاء فرمائے)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فاطمه زهراء رضی الله عنها و توهین روافض به صحابه و اهل بیت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/385</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این روزها در ایام فاطمیه، توهین و افتراء از هر سو در رسانه ها، مطبوعات و سایتها به مقدسات اهل سنت و جماعت شیوع پیدا کرده است.&lt;br /&gt;
بدون&amp;zwnj; تردید احترام&amp;zwnj; به&amp;zwnj; خانه&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; زهرا رضی&amp;zwnj;الله عنها احترام&amp;zwnj; به&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; اكرم&amp;zwnj;(صلی الله علیه وآله وسلم) است&amp;zwnj; و هتك&amp;zwnj; حرمت&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; زهرا رضی&amp;zwnj;الله عنها، توهین&amp;zwnj; به&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; اكرم&amp;zwnj;(صلی الله علیه وآله وسلم) و خاندان&amp;zwnj; او محسوب&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گردد، كه&amp;zwnj; هیچ&amp;zwnj; مسلمانی&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; را جایز نمی&amp;zwnj;داند.&lt;br /&gt;
اما بر خلاف&amp;zwnj; آنچه&amp;zwnj; كه روافض ادعا می&amp;zwnj;نمایند، عموم مسلمانان معتقدند كه&amp;zwnj; همه ی&amp;zwnj; صحابه&amp;zwnj; و خصوصاً حضرت&amp;zwnj; ابوبكر و عمر رضی&amp;zwnj;الله عنهما با دخت&amp;zwnj;گرامی &amp;zwnj;رسول&amp;zwnj; اكرم (صلی الله علیه وآله وسلم) رفتاری&amp;zwnj; شایسته&amp;zwnj; داشته&amp;zwnj;اند و احترام&amp;zwnj; خانه&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; بانوی&amp;zwnj; بزرگوار را كاملاً مراعات&amp;zwnj; نموده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
چنانچه&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; ابوبكر(رضی الله عنه) توصیه&amp;zwnj; فرمودند: ارقبوا محمداً(صلی الله علیه وآله وسلم) فی أهل&amp;zwnj; بیته&amp;zwnj; (صحیح بخاری)&lt;br /&gt;
حال&amp;zwnj; محمد (صلی الله علیه وآله وسلم) را درباره&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیتش&amp;zwnj; مراعات&amp;zwnj; كنید.&lt;br /&gt;
و فرمودند: والذی&amp;zwnj; نفسی بیده&amp;zwnj; لقرابة&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; الله(صلی الله علیه وآله وسلم) احب&amp;zwnj; الی&amp;zwnj;ّ أن&amp;zwnj; أصل&amp;zwnj; من&amp;zwnj; قرابتی (صحیح بخاری)&lt;br /&gt;
قسم&amp;zwnj; به&amp;zwnj; ذاتی كه&amp;zwnj; جانم&amp;zwnj; در دست&amp;zwnj; اوست &amp;zwnj;ارتباط&amp;zwnj; و خویشاوندی&amp;zwnj; با خاندان&amp;zwnj; پیامبر(صلی الله علیه وسلم) نزد من&amp;zwnj; دوستدارتر از آن&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; با خویشاوندان&amp;zwnj; خویش&amp;zwnj;، خویشاوندی&amp;zwnj; نمایم&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
و از طرفی&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; ابوبكر(رضی الله عنه) جدّ برخی&amp;zwnj; از ائمه&amp;zwnj; محسوب&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گردد چنانكه&amp;zwnj; امام&amp;zwnj; صادق&amp;zwnj;(رحمه الله)؛ كه&amp;zwnj; مادرش&amp;zwnj; ام&amp;zwnj; فروه&amp;zwnj; نواده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; محمد وعبدالرحمن&amp;zwnj;، پسران&amp;zwnj; ابوبكر(رضی الله عنه) بود می&amp;zwnj;فرمود: من&amp;zwnj; از دو سو نواده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; ابوبكرم&amp;zwnj; (ولدنی ابوبكر مرتین)&amp;zwnj; (أعیان الشیعة، ج1، ص: 659)&lt;br /&gt;
حضرت&amp;zwnj; عمر فاروق&amp;zwnj;(رضی الله عنه) نیز به&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیت&amp;zwnj; پیامبر(صلی الله علیه وآله وسلم) احترام&amp;zwnj; خاصی&amp;zwnj; قایل&amp;zwnj; بودند. و خطاب&amp;zwnj; به&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; فاطمه&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj;الله عنها فرمودند: (یا فاطمة&amp;zwnj; والله ما رأیت&amp;zwnj; أحداً أحب&amp;zwnj; إلی رسول&amp;zwnj; الله(صلی الله علیه وآله وسلم) منك&amp;zwnj; والله ما كان&amp;zwnj; أحدٌ من&amp;zwnj; الناس&amp;zwnj; بعد أبیك&amp;zwnj;(صلی الله علیه وسلم) أحب&amp;zwnj; إلی &amp;zwnj;ّ منك&amp;zwnj;). (مستدرک حاکم)&lt;br /&gt;
ای&amp;zwnj; فاطمه&amp;zwnj;! بخدا قسم&amp;zwnj; من&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; را محبوبتر از تو نزد پیامبر خدا نیافتم&amp;zwnj; و به خدا قسم&amp;zwnj; هیچ&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; بعد از پدر بزرگوارت&amp;zwnj; نزد من&amp;zwnj; محبوبتر از شما نیست&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
عقیده&amp;zwnj; و اراده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; خاص&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; عمر فاروق(رضی الله عنه) به&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیت&amp;zwnj; پیامبر(صلی الله علیه وسلم)، سبب&amp;zwnj; شد تا ایشان&amp;zwnj; از ام&amp;zwnj; كلثوم&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj;الله عنها دختر گرامی&amp;zwnj;حضرت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; و فاطمه&amp;zwnj; زهرا رضی&amp;zwnj;الله عنهما خواستگاری&amp;zwnj; نمایند و سیدنا علی رضی الله عنه هم دختر خود ام&amp;zwnj; كلثوم&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj;الله عنها را كه از بطن فاطمه زهراء به دنیا آمده بود به ازدواج سیدنا عمر رضی الله عنه در آورد.&lt;br /&gt;
&amp;middot;اما روافض با قبول روایات و دروغ های شهادت حضرت زهراء رضی الله عنها ناخواسته توهین و جسارت بزرگی نسبت به علی رضی الله عنه روا داشته و او را بسیار ضعیف و کم&amp;zwnj;جرأت نشان داده اند، علی&amp;zwnj;ای که در این روایت و چند روایت دیگر این همه ضعیف است، چگونه در روایاتی دیگر این همه شجاع و غیرتمند جلوه می&amp;zwnj;نماید؟!&lt;br /&gt;
&amp;middot;چطور ممکن است که علی رضی الله عنه با آن همه شجاعتی که از او سراغ داریم به عمر رضی الله عنه یا به خدمت&amp;zwnj;گزارش قنفذ فرصت دهد تا به همسرش که دختر رسول خداص است صدمه&amp;zwnj;ای وارد کنند و سبب سقط جنینی بنامی محسن بشوند؟!&lt;br /&gt;
&amp;middot;آیا علی رضی الله عنه تا آن حد ضعیف بود که نتواند از حریم خانوادگی خود دفاع کند؟! اگر چنین شخصیتی داشت، چگونه می&amp;zwnj;توانست ادعای خلافت و رهبری جامعه مسلمانان را بنماید؟! چگونه می&amp;zwnj;توانست از امپراطوری پهناور و نوپای اسلام دفاع کند و آن را اداره نماید؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;آورده اند: زمانی که فاطمه توسط عمر رضی الله عنه مورد ضرب و شتم قرار گرفت، فاطمه فریاد می&amp;zwnj;زد: ای پسر أبی طالب! جنینم را کشتند! اما علی نظاره&amp;zwnj;گر این ماجرا بود و برای حمایت از همسرش کاری نمی&amp;zwnj;کرد!&lt;br /&gt;
&amp;middot;آیا این سخنان ناسره افراطی&amp;zwnj;ها با شأن و مقام علی رضی الله عنه شیرخدا و شهسوار اسلام و قائل عمرو بن عبدودها! سازگار است؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;آیا این راویان اخبار و طوطیان شکرشکن! فکر می&amp;zwnj;کنند، خادم اسلام و مسلمین اند؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;آیا این جسارت&amp;zwnj;ها و هتک حرمت&amp;zwnj;ها به علی و فرزندانش گناه نیست؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;آیا عمری که پهلوی فاطمه دختر پیامبر خدا را شکسته و بر صورتش سیلی زده و خانه&amp;zwnj;اش را به آتش کشیده؛ سزاوار است که با دختر فاطمه&amp;nbsp;و نواده&amp;zwnj;ی پیامبر ازدواج کند، و خود علی رضی الله عنه بزرگ&amp;zwnj;ترین قاضی صدر اسلام ولی و عقد نکاحش باشد؟!.&lt;br /&gt;
به فرض محال اگر چنان کاری از حضرت عمر سر زده بود، علی رضی الله عنه هرگز &amp;laquo;ام کلثوم&amp;raquo; دختر خود و فاطمه و خواهر تنی حسن و حسین و زینب را به نکاح عمر رضی الله عنه درنمی&amp;zwnj;آورد، نه خود ام کلثوم و نه حسنین نیز هرگز حاضر نمی&amp;zwnj;شدند، قاتل مادرشان را به عنوان عضوی از خانواده خویش قبول کنند!.&lt;br /&gt;
آری، به شهادت منابع شیعه و سنی علی رضی الله عنه دخترش ام کلثوم را به همسری عمر رضی الله عنه درآورد و یک پسر به نام &amp;laquo;زید&amp;raquo; ثمره&amp;zwnj;ی ازدواج&amp;zwnj;شان بود که ام کلثوم وفرزندش زید هردو پس از شهادت عمر رضی الله عنه در یک روز فوت کردند.&lt;br /&gt;
آری برادران و خواهران مسلمان! روافض معتقدند که عمر و اطرافیان او به خانه ای که فاطمه در آن بوده، هجوم برده اند و درب منزل را سوزانده اند و باعث شهادت فاطمه زهرا و حتی جنین داخل شکمش شده اند که نامش محسن بوده است.&lt;br /&gt;
سوالی که اکنون از این جاهلان باید شود این است لطفاً صحت این روایت را ثابت کنید و فراموش نکنید منظور ما تنها و تنها اثبات موارد زیر بطور کامل است نه چیزی دیگر که بصورت مبهم و گوشه و کنایه باشد:&lt;br /&gt;
1- آتش زدن منزل یا درب منزل.&lt;br /&gt;
2- سقط جنین.&lt;br /&gt;
3- شهادت فاطمه زهرا بخاطر این هجوم.&lt;br /&gt;
حتی روایاتی که در کتب اهل سنت پیرامون این مسئله موجود است و علمای شیعه نیز دائم به آنها اشاره دارند تنها تهدید به سوزاندن منزل را بیان می کنند نه اینکه اینکار عملی شده باشد و همچنین سقط جنین و شهادت فاطمه نیز در آنها نیست. و آیت الله قزوینی در مدت 8 شب مناظره در شبکه المستقله با وجود اصرار شدید علمای اهل سنت نتوانست حتی یک روایت صحیح در باره این اعتقاد رافضه از کتب علمای خودشان بیاورد.....&lt;br /&gt;
و به این مناسبت کتابخانه عقیده برخی از کتابهایی را که در این مورد و سیرت حضرت فاطمه رضی الله عنها نوشته شده خدمت شما عزیزان معرفی می کند:&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;فاطمه الزهراء رضی الله عنها، رحلت یا شهادت؟&lt;br /&gt;
فضائل اهل بیت و منزلت والای آنان از دیدگاه اهل سنت&lt;br /&gt;
عصمت حضرت زهرا رضی الله عنها از دیدگاه اهل سنت&lt;br /&gt;
فاطمه زهرا از خود دفاع می كند&lt;br /&gt;
دفاع از آل و اصحاب پیامبر&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
همچنین برای اطلاع از مکانت و منزلت اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم در نزد اهل سنت به بخش اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم مراجعه نمایید.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب الکترونیک چیست؟</title>
<link>http://qalamlib.com/news/384</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب الکترونیک چیست؟&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;e-book&lt;/span&gt; یا کتاب الکترونیک، پدیده&amp;zwnj;ای است نو که انقلابی در نظام آموزش و اطلاع&amp;zwnj;رسانی جهان ایجاد کرده است. کتاب الکترونیک، تنها شامل نسخه&amp;zwnj;های دیجیتال کتاب&amp;zwnj;های مکتوب نیست، بلکه مجموعه&amp;zwnj;ای از اطلاعات وسیع اعم از متن، تصویر، فایل صوتی و غیره را شامل می&amp;zwnj;شود. به علاوه می&amp;zwnj;تواند در قالب&amp;zwnj;هایی مانند &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;WORD, PDF, HTML&lt;/span&gt; و &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;TEXT&lt;/span&gt; اجرا شود. سادگی اجرا، سادگی جستجو در متن، قالب زیباتر، منسجم&amp;zwnj;بودن مطالب، امکان عرضه یا فروش ساده&amp;zwnj;تر و سریع&amp;zwnj;تر، قابلیت افزودن امکانات مالتی مدیا و... از جمله ویژگی&amp;zwnj;های کتاب الکترونیک به عنوان یک رسانه&amp;zwnj;ی رو به رشد هستند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در حال حاضر بیش از دو میلیون عنوان کتاب الکترونیک بر روی شبکه&amp;zwnj;ی جهانی وجود دارد که برخی را می&amp;zwnj;توان به صورت رایگان دانلود کرد اما برای باقی عنوان&amp;zwnj;ها باید پول پرداخت کنید، و البته قیمت آن از کتاب&amp;zwnj;های معمولی ارزان&amp;zwnj;تر است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;کتاب دیجیتال فضای زیادی اشغال نمی&amp;zwnj;کند، در یک دستگاه کتاب&amp;zwnj;خوان می&amp;zwnj;تواند تعداد هزار و پانصد کتاب را یکجا داشته باشید، و بدیهی است که با یک حافظه&amp;zwnj;ی جانبی می&amp;zwnj;توانید این تعداد را چندین برابر کنید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;کتاب الکترونیک هم اکنون به دو شکل برای زبان فارسی در دسترس است:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;1- E-PUB&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;E-Pub&lt;/span&gt; (&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;Electronic Publication&lt;/span&gt;) فرمتِ مخصوص کتاب الکترونیک است. کاربر می&amp;zwnj;تواند در محیطی بسیار زیبا کتاب را به صورت آن&amp;zwnj;لاین خریداری کرده و مطالعه نماید. با نصب اپلیکیشنِ &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;ibooks&lt;/span&gt; بر روی &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iPad&lt;/span&gt; و &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iphone&lt;/span&gt; می&amp;zwnj;توانید به راحتی کتاب مورد نظر خود را از &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iBookstore&lt;/span&gt; دریافت نمایید. این نرم&amp;zwnj;افزار برای آیفون و آی&amp;zwnj;پاد که مجهز به سیستم عاملِ &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;IOS 4.2&lt;/span&gt; به بالا هستند، قابل نصب می&amp;zwnj;باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;با استفاده از نرم&amp;zwnj;افزار &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;ibooks&lt;/span&gt; می&amp;zwnj;توانید تغییرات دلخواه را در کتاب الکترونیک ایجاد کنید. برای مثال می&amp;zwnj;توانید کتاب را با فونت مورد علاقه&amp;zwnj;ی خود بخوانید. همچنین می&amp;zwnj;توانید کلمات را جست&amp;zwnj;وجو کنید یا قطعاتی را هایلایت کنید. شما می&amp;zwnj;توانید اندازه&amp;zwnj;ی فونت کتاب را نیز بزرگ&amp;zwnj;تر یا کوچک&amp;zwnj;تر کنید. تعداد صفحات کتاب برحسب ابعاد بزرگ&amp;zwnj;تر یا کوچک&amp;zwnj;تری که برای کاراکترها انتخاب کردید بیشتر یا کمتر می&amp;zwnj;شود. در ضمن شما به آسانی می&amp;zwnj;توانید مطالعه را از آخرین صفحه&amp;zwnj;ای که خوانده&amp;zwnj;اید از سر بگیرید. تاریکی مطلق مانع مطالعه نمی&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;برای نمونه، تصور کنید که در اتاق خود در حال خواندن کتاب از طریق &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iPad&lt;/span&gt; یا &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iphone&lt;/span&gt; هستید و در این میان باید برای کاری به بیرون از منزل بروید. در چنین موقعیتی با قراردادنِ یک نشانه (بوک مارک) بر روی کتاب، محل قطعِ مطالعه را مشخص می&amp;zwnj;کنید و سپس در تاکسی در پشت ترافیک دستگاه خود را باز کرده و خواندن کتاب را از همان جایی که نشانه گذاشته بودید از سر می&amp;zwnj;گیرید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;قابلیت جالب دیگر این است که وقتی یک کتاب را از فروشگاهِ &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iTunes&lt;/span&gt; خریداری یا دانلود می&amp;zwnj;کنید این کتاب به صورت خودکار وارد آیفون و آیپادِ شما نیز می&amp;zwnj;شود و علاوه بر هماهنگ&amp;zwnj;سازی فایل&amp;zwnj;ها، اطلاعات اختصاصی شما بر روی کتاب نیز بین این دستگاه&amp;zwnj;ها مشترک می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;با گسترش تبلت&amp;zwnj;ها و کتاب&amp;zwnj;خوان&amp;zwnj;ها و استفاده&amp;zwnj;ی هرچه بیشتر از گوشی&amp;zwnj;های هوشمند، این فرمت لذت مطالعه&amp;zwnj;ی کتاب بر روی این دستگاه&amp;zwnj;ها را فراهم کرده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;همچنین ابزارهایی که از سیستم عامل آندروید استفاده می&amp;zwnj;کنند می&amp;zwnj;توانند به مددِ برنامه&amp;zwnj;ی از پیش نصب شده توسط شرکتِ سازنده&amp;zwnj;ی ابزار و یا نصب یک کتاب&amp;zwnj;خوان، به سادگی از کتاب&amp;zwnj;هایی که با این فرمت در دسترس هستند استفاده کنند. &amp;laquo;سونی ریدر&amp;raquo; و &amp;laquo;آمازون کیندل&amp;raquo; و سایر کتاب&amp;zwnj;خوان&amp;zwnj;ها نیز به صورت کامل از این فرمت پشتیبانی می&amp;zwnj;کنند. شرکت&amp;zwnj;های آپل و گوگل با توسعه&amp;zwnj;ی سیستم عامل&amp;zwnj;های خود و ارائه&amp;zwnj;ی تبلت&amp;zwnj;ها، یک کتابخانه&amp;zwnj;ی دیجیتال بر روی این ابزارها به وجود آورده&amp;zwnj;اند. به زودی با همکاری گوگل امکان خواندن ای&amp;zwnj;پابِ فارسی نیز بر روی تبلت&amp;zwnj;های آندرویدی فراهم خواهد شد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;در حال حاضر برای خواندنِ ای&amp;zwnj;پابِ فارسی سه ابزار وجود دارد:&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iPad&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iphone&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;برای مطالعه&amp;zwnj;ی ای&amp;zwnj;پابِ فارسی بر روی رایانه&amp;zwnj;ی شخصی خود باید از &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;Firefox&lt;/span&gt; استفاده کنید. برای این کار باید برنامه&amp;zwnj;ی &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;EPUBReader&lt;/span&gt; را دانلود کنید.&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://addons.mozilla.org/en-US/firefox/addon/epubreader/&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;https://addons.mozilla.org/en-US/firefox/addon/epubreader/&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;2- PDF&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;قابلیت خواندن کتاب الکترونیک به صورت فایل &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;pdf&lt;/span&gt; تقریباً بر روی تمام دستگاه&amp;zwnj;ها از جمله &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iphone, iPad, Android, Linux, PC, MAC&lt;/span&gt; گوشی&amp;zwnj;های مجهز به سیستم عامل&amp;zwnj;های &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;Windows Mobile, Java, Blackberry, Symbian&lt;/span&gt; و نیز بر روی کلیه&amp;zwnj;ی دستگاه&amp;zwnj;های کتاب&amp;zwnj;خوان وجود دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;با استفاده از کتاب&amp;zwnj;خوان&amp;zwnj;ها می&amp;zwnj;توانید صدها کتاب را همیشه همراه خود داشته باشید و در هر لحظه با استفاده از جستجوی قوی به مطالب خود دسترسی پیدا کنید. باتریِ دستگاه نیز با هر بار شارژ معمولاً به مدت یک هفته دوام خواهد داشت.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;یک کتاب&amp;zwnj;خوان الکترونیک دارای صفحاتی است که کاغذ الکترونیک نامیده می&amp;zwnj;شود، یعنی کاغذی که با استفاده از فناوری می&amp;zwnj;تواند تصویر جوهر بر روی کاغذ معمولی را تقلید کند. برای ساخت کاغذ الکترونیک فناوری&amp;zwnj;های مختلفی وجود دارد، اما همه&amp;zwnj;ی آن&amp;zwnj;ها وجوه مشترکی دارند که از آن جمله می&amp;zwnj;توان به قابلیت خوانده&amp;zwnj;شدن در نور مستقیم آفتاب اشاره کرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;جوهر الکترونیک (&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;e-Ink&lt;/span&gt;) که در این کتاب&amp;zwnj;خوان&amp;zwnj;ها به کار رفته به هیچ وجه باعث آزار چشم نمی&amp;zwnj;شود و بازتاب (&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;reflect&lt;/span&gt;) نور ندارد و برخلاف مانیتور، می&amp;zwnj;توان ساعت&amp;zwnj;ها بر روی این دستگاه&amp;zwnj;ها مطالعه کرد بدون آن که چشم احساس خستگی کند. این ابزار حسی شبیه به کاغذ را به خواننده منتقل می&amp;zwnj;کند. به همین دلیل کتاب&amp;zwnj;خوان&amp;zwnj;هایی که با سیستم &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;e-Ink&lt;/span&gt; کار می&amp;zwnj;کنند فقط در حضور نور خارجی قابل استفاده هستند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;مهم&amp;zwnj;ترین مزایای ابزارهای کتاب&amp;zwnj;خوان الکترونیک، قابل حمل&amp;zwnj;بودن، قابلیت مطالعه حتی در نور آفتاب، و نیز عمر طولانیِ باتری است. در حال حاضر بازار این نوع دستگاه&amp;zwnj;ها در اختیار شرکت&amp;zwnj;های سونی، آمازون و سامسونگ است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;امکان خواندن فایل&amp;zwnj;های &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;pdf&lt;/span&gt; در نرم&amp;zwnj;افزارهای &lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;iBooks&lt;/span&gt; نیز وجود دارد. با دانلود نسخه پی دی اف کتاب های سایت عقیده نیز میتوانید آنها را در ایپد یا موبایل های اندروید مطالعه کنید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/userfiles/images/iPad01.jpg&quot; style=&quot;width: 300px; height: 433px;&quot; /&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; src=&quot;/userfiles/images/iPad02.jpg&quot; style=&quot;width: 500px; height: 723px;&quot; /&gt;&lt;strong&gt;کتاب&amp;zwnj;خوان&amp;zwnj;های پیشنهادیِ ما:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;Sony Reader Touch Edition&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;Sumsung ebook reader&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;Bookeen Cybook Opus&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;</description>
</item><item>
<title>توفي الشيخ د-أحمد بن سعد الغامدي رحمه الله</title>
<link>http://qalamlib.com/news/383</link>
<description>&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;توفي اليوم الشيخ د-أحمد بن سعد الغامدي كان استاذا بالجامعة الاسلامية ثم انتقل الى جامعة ام القرى وعمل بها استاذا للدراسات العليا ..&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;اللهم اغفر له وارحمه وعافه واعف عنه. انا لله وإنا اليه راجعون نعزي اهله وانفسنا، وطلبته.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;strong&gt;وهذه بعض كتبه:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
	&lt;li&gt;
		كتاب اعتقاد أهل السنة لللالكائي&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		الوحدة الإسلامية: أسسها ووسائل تحقيقها&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		الترف المادي والفكري وأثره&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		آيات الصفات&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		الإسلام الدين الحق&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		الإيمان العملي&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		توحيد العبادة&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		منهج تقرير العقيدة وحوار المخالفين&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		حكم أقوال الصحابة في الاعتقاد&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		الأمن العقدي&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		حوار مع شيعي اثني عشري&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;
		الضوابط الفقهية للتعامل مع المخالف&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;</description>
</item><item>
<title>وفات پروفسور احمد الغامدی رحمه الله</title>
<link>http://qalamlib.com/news/382</link>
<description>&lt;p&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size:14px;&quot;&gt;پروفسور احمد الغامدی در شهر مکه مکرمه روز چهار شنبه 1 جمادی الاولی 1434 برابر با 23 اسفند 1391 و 13 مارس 2013&amp;nbsp;وفات یافتند، و امروز بر ایشان در مسجد الحرام نماز خوانده می شود، ایشان متولد شهر الظفیر منطقه الباحه در جنوب عربستان می باشند، از دانشگاه اسلامی مدینه منوره مدرک لیسانس را گرفته اند، سپس در دانشگاه ام القری مکه مکرمه ادامه تحصیل داده و فوق لیسانس و دکترا را در مکه مکرمه تکمیل نمودند، سپس در دانشگاه اسلامی مدینه مشغول تدریس شدند، بعد از مدتی به مکه مکرمه منتقل شدند و استاد تحصیلات عالی دانشگاه ام القری مکه مکرمه بودند، بر دهها پایان نامه دکترا و فوق لیسانس نظارت داشته و زیر نظر ایشان انجام شده است، همچنین به کشورهای زیادی در شرق و غرب سفر نموده و به تبلیغ دعوت دین اسلام می پرداخته اند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;span style=&quot;font-size:14px;&quot;&gt;از خصوصیت های بارز ایشان، تواضع و حکمت، خوشرو بودن، مهمان نوازی به طوری که مجلس ایشان به روی همه باز بود، انصاف در تعامل با شیعیان اثنی عشری و دعوت آنها به سوی حق و پذیرایی از آنها در خانه و مناظرات و گفتگوهای آرام با آنها.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;span style=&quot;color:#b22222;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;استادان ایشان:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	1- شیخ عبدالعزیز بن باز رحمه الله، مفتی سابق عربستان سعودی&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	2- شیخ عبدالمحسن العباد&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	3- شیخ ابوبکر الجزائری&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	4- شیخ حماد الانصاری&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	5- شیخ عبداللطیف آل شیخ&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	6- شیخ محمد مختار شنقیطی&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	7- شیخ محمد امین شنقیطی&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	8- شیخ عبدالقادر شیبه الحمد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	9- شیخ عطیه محمد سالم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	10- شیخ محمد الغزالی&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;span style=&quot;color:#b22222;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;آثار و دست نوشته های استاد:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	1-عقيد ختم النبوة بالنبوة المحمدية ( رسالة ماجستير )&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	2-تحقيق كتاب شرح أصول اعتقاد أهل السنة والجماعة لأبي القاسم اللالكائي نصفه تقريباً ( رسالة دكتوراه )والباقي بعد ذلك (8:ج)&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	3-تحقيق كتاب الكرامات لأبي القاسم اللالكائي .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	4-فطرية المعرفة وموقف المتكلمين منها.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	5-المجتمع الإسلامي من خلال سورة الفاتحة.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	6-الوحدة الإسلامية: أسسها ووسائل تحقيقها.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	7-الترف المادي والفكري وأثره على المجتمع البشري.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	8-نقد كتاب الأعلام في صدر الإسلام .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	9-رسالة في تحقيق حديث بئر بضاعة .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	10-آيات الصفات .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	11-الإسلام الدين الحق .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	12-الإيمان العملي .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	13-توحيد العبادة .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	14-منهج تقرير العقيدة وحوار المخالفين.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	15-حكم أقوال الصحابة في الاعتقاد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	16- الأمن العقدي.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	17-حوار مع شيعي اثنی عشری&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;span style=&quot;color:#b22222;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:16px;&quot;&gt;کتاب های استاد در سایت عقیده:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/writer/list/245//&quot;&gt;http://www.aqeedeh.com/writer/list/245//&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	1- گفتگوهای عقلانی با شیعیان اثنی عشری منابع شیعه در میزان نقد علمی&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	2-&amp;nbsp;گفتگویی آرام با دکتر محمد حسینی قزوینی شیعه اثنا عشری&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;
	&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>دراسة لفكرة التقريب بين السنة والشيعة في تصريحات القرضاوي والزحيلي</title>
<link>http://qalamlib.com/news/381</link>
<description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:times new roman;&quot;&gt;دراسة لفكرة التقريب بين السنة والشيعة في تصريحات القرضاوي والزحيلي&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;font-size:18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;د. لطف الله بن ملا عبد العظيم خوجه&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;font-size:22px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic;&quot;&gt;الوحدة الإسلامية هدف مطلوب؛ ذلك لأن:&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;- فيها تحقيقا للأمر الإلهي بالاجتماع وعدم التفرق: {واعتصموا بحبل الله جميعا ولا تفرقوا}.&lt;br /&gt;
- وبها تتزل الرحمة الإلهية على الناس، التي تحل بهم جزاء رضاه عنهم بهذه الطاعة.&lt;br /&gt;
- وبها يتراحم المسلمون، وتحدث لهم القوة، والعزة، والمنعة؛ فبدونها يتباغضون، ويذلون.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
غير أن هذه الوحدة - وكأية وحدة أو صورة للاجتماع - لا بد لها أسس وشروط تقوم عليها، وهذا أمر لا يجادل فيه أحد؛ فعدم الأسس يعني عدم الوحدة، وكلام عن الوحدة من غير أسس صحيحة واضحة: خدعة، أو غفلة. لذا دائما ما يسعى المتوحدون إلى سرد الأسس التي يتفقون عليها، ويؤمنون بها، ويعملون؛ لأجل ترسيخ الوحدة، ومنع التفكك.&lt;br /&gt;
إذن، في شأن الوحدة الإسلامية، فلا بد أن تكون على أسس، يتفق عليها ولا يختلف فيها.&lt;br /&gt;
فمن أين تُستقى أسس الوحدة ؟.&lt;br /&gt;
بما أن الكلام على المسلمين، فأول وارد على الذهن، مما يظن أنه أساس هو: القرآن الكريم. يليه: السنة. فكلاهما وحي من الله تعالى، باللفظ والمعنى، وبالمعنى دون اللفظ.&lt;br /&gt;
فوحدة تقوم على هذين الأساسين هي الوحدة الإسلامية، وأي خلاف في أحدهما فهو إبطال للوحدة.&lt;br /&gt;
ثم إن فيهما التنبيه على أساس ثالث، هو منهما لا يخرج عنهما، لكنه يذكر ويخصص لفائدة، وحسما لفتنة. هو: اتباع الصحابة رضوان الله عليهم في مسائل الدين، والعمل بأقوالهم، ومذاهبهم، ثم التابعين، ثم من تبعهم، لتفضيلهم في النصوص، كقوله عليه الصلاة والسلام:&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;- (خير الناس قرني، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم..).&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فهذه أسس الوحدة الإسلامية بين المسلمين، بها تتحقق وحدتهم، وآثار هذه الوحدة.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* * *&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ثم إنه، ومنذ آونة من الزمن، والشيعة يدعون إلى الوحدة بين المسلمين؛ السنة والشيعة. وإلى التقارب بين الطائفتين. وهي دعوة تتوافق مع روح الإسلام، وتطلعات المسلمين..&lt;br /&gt;
لكن هل تفتقر إلى الأسس الصحيحة لبناء الوحدة الإسلامية ؟.&lt;br /&gt;
منذ البدء، اختلف علماء السنة في هذه الدعوة الشيعية، فتوجست منها طائفة، وأقبلت عليها طائفة، وكان الفريقان على الضد بل النقيض، حتى آل بهم الحال إلى التشنيع:&lt;br /&gt;
- فالمتوجسون قالوا في المقبلين: إنهم غافلون لا يعرفون حقيقة الشيعة، ولا حقيقة الدعوة إلى التقارب. فما هي إلا تقية، فهي حيلة لتشييع السنة، وتضييع السنة، ليغدو الشيعة أكثرية، بينما هم اليوم أقلية لا تتجاوز 15% من المسلمين. فأكثروا فيهم وقالوا ما قالوا.&lt;br /&gt;
- والمقبلون قالوا عن المتوجسين: إنهم مخدعون، مثقلون بالتاريخ، يسيئون الظن بكل شيء، ويسلطون اليهود والنصارى، ويشتتون الأمة، ويفرقونها.&lt;br /&gt;
وهكذا هم منذ بدأت فكرة التقارب وإلى اليوم.&lt;br /&gt;
والملاحظة الجديرة بالنظر والعناية: أن جمعا من الذين ذهبوا مع فكرة التقارب زمنا، عادوا يخبرون بفشل هذه الفكرة، ويحملون الشيعة هذه التبعة:&lt;br /&gt;
أنهم لا يبتغون التقارب والاجتماع، إنما يريدون مكاسب طائفية، يحقق لهم التمكن بين السنة.؟!!!.&lt;br /&gt;
وكان آخر هؤلاء عالمين من أعلام التقارب، هما: الدكتور يوسف القرضاوي، والدكتور وهبة الزحيلي.&lt;br /&gt;
فأما الدكتور القرضاوي فقد أعلنها صريحة في نقابة الصحفيين المصريين قبل أشهر: أن أغلب الشيعة يؤمنون بأن القرآن ناقص، وأنهم لا زالوا يتقربون إلى الله بسب ولعن الصحابة رضوان الله عليهم.&lt;br /&gt;
في خطوة لم تكن متوقعة، من عالم ما فتئ يدعو بإخلاص إلى اجتماع السنة والشيعة، ويرفض نقد الشيعة وبيان مخالفتهم للسنة. وكان الذي دعاه إلى هذا التصريح: ما حصل من اختراق شيعي لمصر. كما صرح الشيخ نفسه، الأمر الذي أغضبه، وطالبهم ألا يبشر أحد بمذهبه في البلاد الخالصة في المذهب الآخر.&lt;br /&gt;
قام بعدها أمين عام الاتحاد العالمي لعلماء المسلمين، الدكتور: محمد سليم العوا. بمحاولة تعديل سياق هذا التصريح، والتخفيف من حدته، وتبرع بتفسير كلام الشيخ القرضاوي، الواضح أصلا !!، لكن بطريقة تبطل المعنى الواضح، وتجبر على قبول المعنى الذي أراده العوا وليس القرضاوي..؟!!.&lt;br /&gt;
غير أن الشيخ أعاد التصريح بطريقة أخرى، مستنكرا موقف الشيعة من الاختراق، في ندوة حضرها في جامعة أم القرى منذ أسابيع قريبة، كان يعلق فيها على مداخلة من الدكتور وهبة الزحيلي، الذي حذر فيها - هو أيضا - من اختراق الشيعة لسوريا، ونعت فكرة التقارب بأنها:&lt;br /&gt;
ذر الرماد في العيون. وأن مقصودها تشييع السنة.&lt;br /&gt;
وأن هذا هو ما خرج به من نتيجة، بعد عشرة أعوام في لجان التقريب بين السنة والشيع.&lt;br /&gt;
فوافقه على ذلك الشيخ القرضاوي، وزاد أن الدكتور وهبة كان قد دعي إلى إيران، وأعطي جائزة.&lt;br /&gt;
وأخبار الاختراق الشيعة لمناطق السنة في تزايد، آخرها ما أعلنته الحركات الإسلامية في السودان: أنصار السنة المحمدية، والإخوان، وغيرهم.. أن الشيعة يعملون على تشييع القرى، وبناء الحسينيات والمراكز.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* * *&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هذه المعركة الدينية والفكرية بين السنة والشيعة تحمل على طرح السؤال التالي:&lt;br /&gt;
إذا كانت الوحدة الإسلامية مطلبا، والشيعة يعلنون هذا المطلب، وينادون به، ويحرصون عليه، وأنهم والسنة سواء مسلمون، متحدون، لا خلاف بينهم في الأصول، إنما في الفروع، ويتهمون من يتكلم فيهم بالطائفية، وبالعداء للوحدة الإسلامية.. فنشاطهم في تشييع أهل السنة على ماذا يدل ؟!.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إن الذي يدرس كتب السنة وكتب الشيعة، ليخرج بحقيقة لا مفر منها: أن الفريقين يختلفان في الأصول:&lt;br /&gt;
- فالشيعة يقررون أن القرآن محرف، ومن تلطف منهم قال: إنه ناقص. ليس بكامل. وإعلانهم بأن هذا افتراء عليهم، غير مفيد في دفع هذا الظن بهم، لأمور ظاهرة منها:&lt;br /&gt;
o أن المتقاربين معهم شهدوا عليهم بمثل هذا، كما مر معنا في تصريح القرضاوي.&lt;br /&gt;
o ومنها: أنهم لا يعدون القول بتحريف القرآن كفرا. مع مصادمته للوعد الإلهي بحفظه.&lt;br /&gt;
- وهم يكفرون عامة الصحابة، وفي مقدمهم أبو بكر وعمر وعثمان رضي الله عنهم، وعائشة أم المؤمنين رضي الله عنها، ويرمونها بالفاحشة، ولا يتقون في هذه القضية تقيتهم في قضية القرآن، وهم بذلك يسقطون السنة عن الاحتجاج.&lt;br /&gt;
وقد تقدم أن أساس الوحدة الإسلامية هو: القرآن، والسنة. ثم فهم الصحابة لهما.&lt;br /&gt;
وكل هذه الأسس يخالف فيها الشيعة، وغيرها كثير، مثل اعتقاداتهم في الأئمة: أنهم يعلمون الغيب، ويدبرون الكون، وأنهم معصومون عن مجرد الخطأ.. فكيف إذن تتحقق الوحدة ؟!.&lt;br /&gt;
هم يعرفون هذه الحقيقة؛ لذا مدوا في الظاهر أيديهم للتقارب، وتكلموا بألسنتهم، لكن من وراء ذلك يخططون لتشييع أهل السنة، وما ذاك إلا لعلمهم أنه لا اجتماع بين الفريقين إلا في حالة واحدة هي عندهم: إذا تشيع أهل السنة.&lt;br /&gt;
وكذلك هو عند أهل السنة، لكن بالنقيض: لا وحدة إلا إذا تسنن أهل التشيع.&lt;br /&gt;
ومن هنا: فإن فكرة التقريب فاشلة، والشيعة يعرفون هذا أكثر من السنة، الذين يدفعهم حب الوحدة بصدق وإخلاص إلى عدم فحص القضايا بالدقة والنظر، ليقعوا في فخاخ تصنع لهم، فيخسرون، ويضرون أهل السنة؛ فهل كان الشيعة قادرين على تشييع بعض السنة، لو لم يحيدوا هذه الطائفة من العلماء، فاستغلوا سكوتهم عن نقد التشيع، لا بل دفاعهم عنه باسم الوحدة، فانطلقوا مخترقين ؟.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* * *&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إن خوف الطائفية؛ أي الاقتتال، تحمل بعض علماء السنة على محاولة جمع الكلمة بين الشيعة والسنة.&lt;br /&gt;
وهو هدف نبيل، لكن ههنا أمر مهم، هو:&lt;br /&gt;
أن منع قتال كل من ثبت له اسم الإسلام؛ بشهادته أن لا إله إلا الله، وأن محمدا رسول الله، وبصلاته قبل الكعبة صلاة المسلمين، وأكله لذبائح المسلمين: أمر واجب محتم. لقوله صلى الله عليه وسلم:&lt;br /&gt;
- (من صلى صلاتنا، واستقبل قبلتنا، وأكل ذبيحتنا، فذلك المسلم، له ما لنا، وعليه ما علينا).&lt;br /&gt;
فعامة الشيعة خصوصا العوام منهم، ومن كان منهم لا يقبل بهذه الأفكار المنحرفة في القرآن والصحابة هم من المسلمين؛ لأنهم محققون لشروط الإسلام الآنفة، مع ما هم فيه، مما يخالفون فيه السنة.&lt;br /&gt;
فمثل هذا كيف يقاتل ؟.&lt;br /&gt;
ثم الذين غلوا بمثل المقالات الآنفة، فإنهم لا يقاتلون كذلك، بل يجادلون بالتي هي أحسن لعلهم يهتدون.&lt;br /&gt;
فلا يجوز إذن قتالهم تحت دعوى الطائفية، بل إن الكافر الأصلي لا يقاتل حتى يحارب ويعتدي.&lt;br /&gt;
إذن، فإن بيان اختلاف الشيعة عن السنة في الأصول لا يلزم منه قتالهم، أو العدوان بين الفريقين، كما لايلزم من بيان كفر اليهود والنصارى، قتالهم والعدوان عليهم. فبيان الحق له سبب، والقتال له سبب.&lt;br /&gt;
بيان الحق سببه أمرٌ أمر الله تعالى به عباده العالمين: أن يبينوا للناس الحق ولا يكتمونه، وأن يعملوا على هداية الضالين عن السبيل.&lt;br /&gt;
والقتال سببه العدوان والظلم، أُذن للمسلمين أن يدفعوا عن أنفسهم إذا هم ظلموا.&lt;br /&gt;
فإذا بان وظهر اختلاف الأمرين، وأنه لا رابط بينهما: بطل زعم من ظن أن الكلام في الشيعة نقدا يورث فتنة طائفية، وقتالا. كلا، بل لا يزال أهل السنة منذ ظهر التشيع في القرن الأول، وهم يكتبون ويحذرون من هذه البدعة الغالية، ولم نسمع أحدا قال منهم: قاتلوهم، وعذبوهم.&lt;br /&gt;
منهج أهل السنة مع المخالفين: بيان خلافهم للسنة، وخروجهم عن الحق الذي كان عليه الصحابة. وعند هذا الحد يقفون. لا يوقدون حربا من أجل أن أمة قد: تشيعت، أو تصوفت، أو تمشعرت. بل جهادهم في هذا القلم واللسان، وليس السيف والحراب. يدعون من أخطأ ومن ضل بالكلمة، والموعظة الحسنة.&lt;br /&gt;
ومع هذا الوضوح في المواقف، فلا وجه للسكوت على مخالفة الشيعة للكتاب والسنة.؟!!.&lt;br /&gt;
ففي السكوت فرصة لتجهيل المسلمين عن هذا الواقع، وهو الذي سهل ويسهل تشييعهم..!!&lt;br /&gt;
فما أسهله من طريق؛ أن يُغرى المسلم العامي الموحد المحب لرسول الله صلى الله عليه وسلم ولآل البيت: بأن التشيع هو المذهب الحق؛ لأنه مذهب آل بيت رسول الله صلى الله عليه وسلم.!!.&lt;br /&gt;
لتكون الخطوة التالية: الطعن في الصحابة بأنهم أعداء آل البيت، وأنهم حرموهم حقهم في الخلافة، وآذوا فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم رضي الله عنها.!!.&lt;br /&gt;
وهكذا يخرج أهل السنة بهذه الفرية، من السنة إلى التشيع..!!.&lt;br /&gt;
وإذا ما استمر سكوت العلماء، خصوصا الذين عرفوا حقيقة الدعوة إلى التقارب، عن بيان حقيقة التشيع. وإذا ما تمسك بعضهم بموقفه من تحسين مواقف الشيعة، والإصرار أنه لا فرق بين الفريقين:&lt;br /&gt;
فإنه يوشك أن تنقلب النسبة ليكون أهل السنة أقلية.؟!!.&lt;br /&gt;
وليست المشكلة في الأقلية أو الأكثرية: إنما في أن يعم ويسود الأمة:&lt;br /&gt;
- اعتقاد تحريف القرآن، والقول بنقصانه. إن يفضي حتما إلى إهماله والإعراض عنه.&lt;br /&gt;
- تكفير الصحابة، واتهام أمهات المؤمنين بالفاحشة. ليعلن لعنهم على المنابر.&lt;br /&gt;
فهل يطيق مسلم هذا ؟!.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* * *&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لا يكفي مجرد التحذير من الاختراق..!!.&lt;br /&gt;
ما قيمة هذا التحذير، في مقابل القول: بأنا أمة واحدة، لا خلاف بيننا وبينهم، إلا في الفروع ؟!.&lt;br /&gt;
فإذا كان الأمر كذلك حقا، فلم الانزعاج من تحول السنة إلى التشيع ؟!.&lt;br /&gt;
إذا كانوا أمة واحدة لا فرق ولا خلاف، فهذا المتشيع ما زاد على أن انتقل من طرف إلى طرف، ضمن الدائرة نفسها، كما ينتقل من مذهب فقهي إلى آخر.&lt;br /&gt;
هكذا يفهم المسلم السني العامي، خصوصا إذا رأى علماءه وقادته يزينون التشيع بمثل هذه الطريقة، وقد يعجب من تحذيرهم اليوم، ولا يراه منسجما مع دعاوى الوحدة، والأمة الواحدة.&lt;br /&gt;
ليس من طريق لمنع هذا الاختراق إلا ببيان الأمر على ما هو عليه: من يكون الشيعة، وما هي معتقداتهم، وموقفهم من السنة تحديدا، فإن لهم من السنة موقفا، أقل ما فيه يقال: إنهم يبغضونهم، ويفسقونهم .!!.&lt;br /&gt;
وهؤلاء العلماء لم يحذروا من هذا الاختراق أخيرا، إلا لعلمهم بالتناقض الفكري والعقدي العميق بين الفريقين، فعليهم إذن أن يبينوا هذا التناقض لعموم الناس، ولا يسكتوا، فإن سكوتهم مضر؛ إذ كانوا ينطقون بالتقريب والثناء على الشيعة والتوحد معهم زمنا، فلما تبين لهم صدق قول من حذر ونصح: ما زادوا على التحذير ؟!!.&lt;br /&gt;
فالناس لهم حق أن يتساءلوا عن سبب هذا التحذير من الاختراق الشيعي لمصر، وسوريا، والسودان ..؟.&lt;br /&gt;
فإن لم يبينوا لهم أن ذلك لأجل التناقض العقدي، ومخالفة الشيعة للإسلام في أصول كبرى: فإن السؤال يبقى عالقا، ولا ينفع التحذير.&lt;br /&gt;
الشيعة مخالفون لأصول كبرى. نعم، ومع ذلك فإن عامتهم مسلمون؛ ذلك لأن منهم من لا يدرك حقيقة هذه المخالفة، فمعذور بالجهل، وبالإكراه، وبالتأويل. وعندهم ما يثبت لهم أصل الإسلام، كما تقدم. ومن الشيعة من هو بريء من كثير من هذه المخالفات الغالية. غير أن الذين يخترقون هم الغالون منهم.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نقد نسبت دادن کتاب الإمامة والسیاسة به امام ابن قتیبه دینوری رحمه الله</title>
<link>http://qalamlib.com/news/380</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;نقد نسبت دادن کتاب الإمامة و السیاسة به امام ابن قتیبه دینوری رحمه الله&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بقلم : دکتر محمد زمان زمانی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;اسم کتاب مذکور &amp;laquo;الإمامة و السياسة&amp;raquo; می&amp;zwnj;باشد؛ اسم کامل ابن قتیبه ابو محمد عبد الله بن مسلم بن قتیبه الدینوری می&amp;zwnj;باشد که یکی از بزرگان اهل سنت بوده و تالیفاتی زیادی دارد؛ ایشان در سال 276 هجری قمری از دنیا رفته اند. ولی کتاب مذکور به هیچ عنوان نمی&amp;zwnj;تواند تالیف این بزرگوار باشد؛ شخصیتی که در تمام کتابهایش عقیده&amp;zwnj;ی اهل سنت را تایید کرده و به بحث و بررسی پرداخته و تمام اهل سنت ایشان را از بزرگان قلمداد نموده که با افکار رافضه نیز مبارزه کرده است. چگونه ممکن است چنین شخصیتی اینگونه کتابی را تالیف کند؛ بنابراین این کتاب به دروغ به این عالم جلیل القدر نسبت داده شده است، و مولف کتاب یا واقعا اسمش ابن قتیبه بوده که در این صورت تشابه اسمی رخ داده و یکی از بزرگان  اهل سنت و دیگری از کوردلان رافضه می&amp;zwnj;باشد؛ یا اینکه از این اسم به علت شهرتش سوء استفاده کرده است تا بتواند افکار خود را در جامعه رواج دهد. &lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;دکتر علی نفیع العلیانی&lt;/strong&gt; در کتابی که به عنوان عقیده امام ابن قتیبه تالیف کرده است در مورد کتاب الإمامة والسیاسة چنین می&amp;zwnj;گوید: بعد از اینکه این کتاب را با دقت مطالعه کردم به این نتیجه رسیدم که مولف کتاب شخصی رافضی و خبیث است که خواسته این کتاب را در بین کتاب&amp;zwnj;های ابن قتیبه جای دهد و به نام ایشان تمام کند؛ و علت انتخاب این امام نیز زیاد بودن تالیفات و شهرتش نزد مردم بوده که همیشه از عقیده&amp;zwnj;ی اهل حدیث دفاع کرده است؛ و احتمالا از رافضه&amp;zwnj;ی مغرب می&amp;zwnj;باشد؛ چون ابن قتیبه در مغرب جایگاهی رفیعی دارد؛ &lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;و دلایلی که رافضی بودن مولف کتاب الإمامة والسیاسة را ثابت می&amp;zwnj;کند عبارتند از: &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
1- مولف کتاب الإمامة والسیاسة از علی بن ابی طالب رضی الله عنه چنین نقل می&amp;zwnj;کند که ایشان خطاب به مهاجرین فرمود: &amp;laquo;الله الله يا معشر المهاجرين لا تخرجوا سلطان محمد في العرب عن داره وقعر بيته إلى دوركم وقعر بيوتكم، ولا تدفعوا أهله مقامه في الناس وحقه، فو الله يا معشر المهاجرين لنحن أحق الناس به لأنا أهل البيت، ونحن أحق بهذا الأمر منكم.. والله إنه لفينا فلا تتبعوا الهوى فتضلوا عن سبيل الله. ولا أحد يرى أن الخلافة وراثية لأهل البيت إلا الشيعة&amp;raquo;. &amp;laquo;ای مهاجرین شما را به الله قسم می&amp;zwnj;دهم تا قدرت محمد در بین عرب را از خاندانش و نوادگانش به خاندان و نوادگان خود منتقل نسازید؛ و با انتقال قدرت به مردم حق پیامبر صلی الله علیه وسلم و اهل بیتش را ضایع نکنید؛ به الله قسم ای مهاجرین که ما اهل بیت از هر شخص دیگری به قدرت اولاتر هستیم؛ و ما از شما به خلافت اولاتر هستیم؛ به الله قسم که خلافت سهم ما است؛ پس از هوای نفس پیروی نکنید که از راه الله گمراه خواهید شد&amp;raquo;. و شیعه تنها کسانی هستند که به موروثی بودن خلافت باور دارند؛ بلکه یکی از اساسی&amp;zwnj;ترین اعتقادات آنها می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
2- مولف کتاب الإمامة والسیاسة سخنان توهین&amp;zwnj;آمیزی به صحابه رسول الله صلی الله علیه وسلم نسبت داده که فقط از رافضه و شیعه بر می&amp;zwnj;آید، مثلا عمر بن خطاب رضی الله عنه را انسانی ترسو معرفی می&amp;zwnj;کند، و سعد بن ابی وقاص را انسانی حسود جلوه می&amp;zwnj;دهد، و در مورد محمد بن مسلمه چنین نقل می&amp;zwnj;کند که به دلیل کشته شدن مرحب یهودی در جنگ خیبر توسط علی بن ابی طالب رضی الله عنه بر ایشان خشم گرفت. و می&amp;zwnj;گوید که  عایشه رضی الله عنها دستور قتل عثمان را صادر کرده است. و موضوع نسبت دادن چنین اموری به شاگردان رسول الله صلی الله علیه وسلم یکی از مهمترین ویژگیهای رافضه می&amp;zwnj;باشد؛ هر چند خوارج نیز در اصل این موضوع با رافضه مشترک هستند ولی خوارج همه&amp;zwnj;ی صحابه را مورد هجوم خود قرار نمی&amp;zwnj;دهند بلکه تعدادی از آنها را مورد مذمت قرار می&amp;zwnj;دهند به خلاف رافضه که عموم صحابه را به کفر و شرک و ... نسبت می&amp;zwnj;دهند مگر افرادی کمتر از تعداد انگشتان دو دست.&lt;br /&gt;
3- مولف کتاب الإمامة والسیاسة چنین نقل می&amp;zwnj;کند که مختار بن ابی عبید به این دلیل توسط مصعب بن الزبیر به قتل رسید که مردم را به پیروی از اهل بیت پیامبر صلی الله علیه وسلم دعوت می&amp;zwnj;کرد، در صورتی که هیچ اشاره&amp;zwnj;ای به علت اصلی قتل او نکرده است؛ مختار دچار خرافات زیاد بود و در نهایت ادعای پیامبری نمود؛ و این علت اصلی قتلش توسط مصعب بن الزبیر می&amp;zwnj;باشد؛ ولی رافضه مختار بن ابی عبید ثقفی را با تمام خرافات و کفریاتش به این دلیل دوست دارند که از قاتلین حسین رضی الله عنه انتقام گرفت؛ و این در صورتی است که ابن قتیبه رحمه الله در کتاب&amp;zwnj;های مختلفش مختار را یکی از جلمه شورشیان بر علیه سلطان وقت معرفی می&amp;zwnj;کند؛ و صراحتا به این مساله نیز پرداخته که او ادعای نزول جبریل علیه السلام بر خویش را داشته است.&lt;br /&gt;
4- مولف کتاب الإمامة والسیاسة در کتابش در مورد سه خلیفه&amp;zwnj;ی اول فقط 25 صفحه مطلب نوشته است؛ در صورتی که در مورد فتنه&amp;zwnj;هایی که بین صحابه رخ داده 200 صفحه مطلب نوشته است؛ در حقیقت مولف با این کار تاریخ روشن خلفا را به شدت خلاصه کرده است و صفحات زیادی را به روایاتی آلوده کرده است که تعداد زیادی از این روایات ثابت نیست. و این روش نیز یکی دیگر از ویژگیهای بارز رافضه می&amp;zwnj;باشد. &lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;یکی&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt; دیگر از اشخاصی که منسوب بودن این کتاب به امام ابن قتیبه را باطل دانسته و برای این ادعا ادله نیز ارائه کرده است شیخ مشهور حسن سلمان یکی از برجسته ترین شاگردان شیخ آلبانی می&amp;zwnj;باشد که ادله&amp;zwnj;ی ایشان به شرح زیر است:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
1- تاریخ نویسانی که زندگی&amp;zwnj;نامه&amp;zwnj;ی ابن قتیبه را نوشته&amp;zwnj;اند و تمام تالیفات این امام را بر شمرده اند هیچ اشاره&amp;zwnj;ای به چنین کتابی نکرده اند؛ فقط قاضی ابو عبد الله توزی معروف به ابن شباط که در فصل دوم از باب سی و چهارم در کتابش صلة السمط نقل قول کرده است که ممکن است فریب نسبت کتاب را خورده باشد.&lt;br /&gt;
2- مولف کتاب الإمامة والسیاسة در جایی از کتاب می&amp;zwnj;گوید که او در شهر دمشق بوده است؛ در صورتی که ابن قتیبه که ساکن بغداد بوده فقط از بغداد به دینور رفته است و هرگز دمشق را به چشم خود ندیده است.&lt;br /&gt;
3- راوی کتاب الإمامة والسیاسة ابو لیلی است، و ابو لیلی قاضی سال 148 هجری قمری قاضی شهر کوفه بوده است؛ یعنی 65 سال قبل از به دنیا آمدن ابن قتیبه، و چگونه ممکن است شخصی کتابی را از مولفی روایت کند که بیش از 50 سال بعد از او به دنیا آمده است.&lt;br /&gt;
4- مولف الإمامة والسیاسة ماجرای فتح اندلس از زبان زنی که ابن قتیبه آن زن را دیده است نقل می&amp;zwnj;کند؛ و همه می&amp;zwnj;دانند که فتح اندلس 120 سال قبل از به دنیا آمدن ابن قتیبه رخ داده است.&lt;br /&gt;
5- مولف الإمامة والسیاسة ماجرای فتح مراکش توسط موسی بن نصیر را بازگو می&amp;zwnj;کند، و این در صورتی است که شهر مراکش توسط یوسف بن تاشفین در سال 455 هجری قمری ساخته شده است، و ابن قتیبه در سال 276 هجری قمری فوت کرده است؛ یعنی 179 سال قبل از ساخت مراکش ابن قتیبه از جهان رفته و هیچ وقت نه اسم مراکش را شنیده و نه مراکش در آن زمان وجود خارجی داشته است.&lt;br /&gt;
6- کتاب مذکور پر از نادانی و رکت کلام و دروغ و جعل است؛ مثلا در این کتاب ابوالعباس و السفاح دو شخصیت متفاوت و مستقل از هم ذکر شده&amp;zwnj;اند؛ و هارون الرشید خلیفه&amp;zwnj;ی بلافاصله&amp;zwnj;ی مهدی ذکر شده است؛ و اینکه رشید ولی عهدی را به مامون سپرد؛ و این اشتباهات تاریخی حتی تاریخ نویسان تازه کار نیز مرتکب آن نمی&amp;zwnj;شوند؛ چه رسد به شخصیت برجسته&amp;zwnj;ای مانند امام ابن قتیبه؛ عالمی که ابن تیمیه در مورد ایشان می&amp;zwnj;فرماید: اهل مغرب مقام ایشان را بزرگ می&amp;zwnj;داشتند؛ و می&amp;zwnj;گفتند: هر کس ابن قتیبه را مورد ناسزا گفتن قرار دهد به نفاق متهم می&amp;zwnj;شود؛ و می&amp;zwnj;گفتند: منزلی که در آن کتابی از ابن قتیبه نباشد هیچ خیری در آن نیست. &lt;br /&gt;
7- مولف کتاب الإمامة والسیاسة روایات زیادی را از دو عالم سرشناس مصر روایت می&amp;zwnj;کند؛ و این در صورتی است که ابن قتیبه هرگز وارد مصر نشده و در هیچ کتابی از این دو عالم مصری روایت نمی&amp;zwnj;کند. به همین دلیل با قاطعیت می&amp;zwnj;توان ادعا کرد که کتاب مذکور تالیف ابن قتیبه نیست و به دروغ به ایشان نسبت داده شده است. &lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;البته شخصیتهای دیگری نیز باطل بودن این نسبت را در کتاب&amp;zwnj;های خود ثبت کرده اند که عبارتند از:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt; 1- محب الدين الخطيب در مقدمه&amp;zwnj;ی كتاب ابن قتيبة الميسر والقداح ص 26-27.&lt;br /&gt;
2- ثروت عكاشة در مقدمه&amp;zwnj;ی كتاب ابن قتيبة المعارف ص 56.&lt;br /&gt;
3- عبد الله عسيلان در رساله&amp;zwnj;ی به عنوان: كتاب الإمامة والسياسة في ميزان التحقيق العلمي، که در این کتاب 12 دلیل بر باطل بودن این نسبت ذکر کرده است. &lt;br /&gt;
4- عبد الحميد عويس در كتابش بنو أمية بين الضربات الخارجية والانهيار الداخلي ص 9-10&lt;br /&gt;
5- سيد إسماعيل الكاشف در كتابش مصادر التاريخ الإسلامي ص33.&lt;br /&gt;
6- السيد أحمد صقر در مقدمه یتحقيق تأويل مشكل القرآن ص32، ایشان می&amp;zwnj;گوید: الإمامة والسياسة کتاب معروفی است که وجه معروف بودن آن به باطل بودن نسبتش به امام ابن قتیبه بر می&amp;zwnj;گردد.&lt;br /&gt;
7- الجندي در كتابش عن ابن قتيبة  169-173.&lt;br /&gt;
8- فاروق حمادة در  مصادر السيرة النبوية  ص91 .&lt;br /&gt;
9- شاكر مصطفى در  التاريخ العربي والمؤرخون 1/241-242.&lt;br /&gt;
10- الإمامة والسياسة دراسة وتحقیق، در دانشگاه اردن دانشکده&amp;zwnj;ی آداب در سال 1978 میلادی رساله&amp;zwnj;ای به عنوان الإمامة والسياسة دراسة و تحقيق توسط یکی از دانشجویان مرحله&amp;zwnj;ی فوق لیسانس نوشته شده که در پایان می&amp;zwnj;گوید: با توجه به بررسی&amp;zwnj;های انجام شده در این رساله مشخص شده که ابن قتیبه&amp;zwnj;ی دینوری فاصله&amp;zwnj;ی زیادی باکتاب الإمامة والسياسة دارد، و این در صورتی است که مولف واقعی کتاب قابل شناسایی نیست، ولی می&amp;zwnj;توان وفاتش را به صورت تقریبی مشخص نمود؛ او تقریبا در نیمه&amp;zwnj;های قرن سوم هجری فوت کرده است. و کتابی که مولف واقعی آن مشخص نباشد و با این وضعیت پر از انحرافات و گمراهی باشد هیچ وزن و قیمت علمی ندارد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>سلام بر عظمت مصطفی (علیه الصلاة والسلام)</title>
<link>http://qalamlib.com/news/379</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 16px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;سلام بر عظمت مصطفی (علیه الصلاة والسلام)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;دکتر مهاجر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;درباره شاعر پر آوازه عرب &amp;quot;ابوالطیب المتنبی&amp;quot; آورده‫اند؛ که چهل شاعر زمان خود را زنده بگور کرد!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;بدین معنی که در زمان او چهل شاعر و ادیب ورزیده بود که اگر همزمان با &amp;quot;المتنبی&amp;quot; نمی‫زیستند نام و نشانی می‫یافتند، ولی توان ادبی و شخصیت کاریزمایی او آنها را از اذهان بکلی ناپدید کرد. و قدرت شاعریش بر شعر و ادب آن شاعران چیره گشت. درست چون نور خورشید که چون تابیدن گیرد اثری از ستارگان تابان در آسمان نمی‫گذارد.&lt;br /&gt;
همه شخصیت&amp;zwnj;های تاریخی چنین وضعی دارند، هر چند بدانها نزدیک شوی به همان اندازه کوچک وهیچ می‫شوی!&lt;br /&gt;
تنها شخصیتی که نزدیکی به بزرگی و عظمت او مقام آفرین است شخصیت آقا و سرورم؛ رسول الله &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم، و جانم فدایش &amp;ndash; است، که نزدیکی به آفتاب وجودش تو را ماه می‫گرداند. عظیمی که در مکتبش عظمای تاریخ را تربیت نمود.&lt;br /&gt;
تاجرانی گمنام چون ابوبکر، عمر، عثمان و عبدالرحمن بن عوف را در لابلای کوه&amp;zwnj;های خشک و بی‫آب و علف مکه، و ابوذرهای گم در صحرای بی‫ساحل عرب، و صدها افرادی چون مالک، شافعی، ابوحنیفه و احمد بن حنبل و ابن تیمیه‫ها را چه کسی می‫شناخت؟!&lt;br /&gt;
صحابه و یاران و دست پروردگان آن مقام سعادت، و پس از آنها هر یک از مؤمنان تا بروز قیامت، با بیش نزدیک شدن به پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه وسلم &amp;ndash; بیش از پیش بها و ارزش یافتند، و به همان اندازه که به مقام عظمت پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; نزدیکتر می‫شوند بر عظمت خود می‫افزایند، درست چون ماه که نور خود را از خورشید به عاریه می‫گیرد!&lt;br /&gt;
و شأن و مقام صحابه و یاران پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; بخودی خود گواهی است بر عظمت و مقام آنحضرت &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم -. افرادی که بازتاب عظمت پرتو پیامبر از هر یک از آنها ستاره‫ای درخشان ساخت که می‫تواند برای بشریت راهیاب باشد.&lt;br /&gt;
برای شناخت هر شخص کافی است به اطرافیان و دوستان و افراد بسیار نزدیک و وابسته به او نگاهی بیندازی. اگر گروهی شیاد و جاه طلب، زر اندوز و چپاولگر، منافق و خودخواه، چاپلوس و بی‫شخصیت را دور و بر او دیدی می‫توانی دریابی که چنین شخصیتی حتما به اینگونه افراد تمایل دارد و چنین صفات زشتی بر او چیره است.&lt;br /&gt;
در مقابل؛ وجود افرادی وارسته، ایثارگر، مؤمن و با تقوا، پارسا و علم اندیش، عابد در محراب عبادت و مجاهد در میدان نبرد، در کنار هر فردی گواهی است بر شخصیت برازنده آن انسان.&lt;br /&gt;
شیاطینی که چشم دیدن تابش آفتاب نبوت را ندارند، همواره برای خورده گیری از مقام والای نبوت در پی ویران ساختن شخصیت صحابه و یاران و نزدیکان او بوده‫اند، تا با ترور شخصیتی آنها بسوی عظمت پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; و بزرگی و مقام او سنگ پرانی کنند!&lt;br /&gt;
عجب مقامی است تو را ای رسول هدایت و رستگاری که انعکاس تابش صداقتت بر قلب راهزنی در دل صحرای سوزان او را &amp;quot;ابوذر&amp;quot;؛ زبان تلخ حق، و بر قلب پسر ابوقحافه او را صدیق؛ یار غار، و بر دل هیزم‫شکنی گمنام او را عمر فاروق؛ ترازوی سنجش حق و باطل، و بر قلب سنگدل نیزه پرانی، او را خالد؛ شمشیر بران خدا، و بر دل پسر ابوطالب او را علی مرتضی؛ داماد رسول خدا، و بر سینه صحرا نوردی شکارچی او را حمزه؛ اسد الله و سید الشهداء ... ساخت!&lt;br /&gt;
حقا که پرتو نور وجودت معجزه آفرین است. اگر برادرت عیسی با دمیدن روح معجزه مرده را به یاری خداوند زنده می‫کرد تو امتی را از هیچ بوجود آوردی!..&lt;br /&gt;
أَخوكَ عيسى دَعــــــا مَيتـاً فَقـامَ لَـهُ وَأَنتَ أَحيَيـتَ أَجيــــــالاً مِـنَ العدمِ&lt;br /&gt;
یا سبحان الله!..&lt;br /&gt;
بنگرید به عظماء و بزرگان تاریخ!..&lt;br /&gt;
البته بسیاری از این بزرگان و نامداران از مقام بزرگی هیچ نداشتند، تنها منافع افرادی شیاد بدانها گره خورده، که برای رسیدن به خواسته‫های خود با آب و تاب از کاهی کوهی ساخته‫اند.&lt;br /&gt;
چه بسا که اعلام و رسانه‫های گروهی برای رسیدن به برخی منافع سیاسی و یا اقتصادی کسی را به عنوان یک شخصیت عظیم و وارسته معرفی می‫کند. و یا سجاده نشینان مذهب فروش برای چاپیدن ثروت، دست به دوشیدن نادانی و جهالت مردم زده، امام زاده و قبر و مزاری دست و پا کرده کرامات تراشی و بزرگ سازیها می‫کنند!&lt;br /&gt;
و این تنها رسول خدا &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; است که بنا به امر قرآن کریم بدور از خودنمایی بدان چیزی افتخار می‫ورزد که در عرف سایر فرزندان آدم هیچ ویژگی خاصی بشمار نمی‫آید:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;قُلْ إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ&amp;zwnj; مِّثْلُكُمْ..&amp;raquo; [الکهف: 110] - بگو که من هم مانند شما بشری هستم..-.&lt;br /&gt;
&amp;quot; إنما أنا عبدالله ورسوله&amp;quot; &amp;ndash; من بنده و فرستاده پروردگارم-. [صحیح بخاری]&lt;br /&gt;
و زیباترین لقب نزد او بر زبان پروردگارش &amp;quot;بندگی&amp;quot; است. &amp;laquo;سُبْحَانَ الَّذِي أَسْرَ&amp;zwnj;ىٰ بِعَبْدِهِ ...&amp;raquo; [الإسراء: 1] - پاک و منزه است خدایی که در شبی بنده خود را سیر داد...-&lt;br /&gt;
این برده الهی چون افرادی را می‫بیند که در مقابل هیبت و بزرگی او بلرزه می‫افتند به آرامی خود را به دلهای آنها نزدیک کرده می‫فرماید: &amp;laquo;هَوِّنْ عَلَيْكَ فَإِنِّي لَسْتُ بِمَلِكٍ، إِنَّمَا أَنَا ابْنُ امْرَأَةٍ مِنْ قُرَيْشٍ كَانَتْ تَأْكُلُ الْقَدِيد&amp;raquo;. (آرام باش، من پادشاه نیستم. من پسر زنی قریشی هستم که گوشت &amp;ndash; نان - خشک می‫خورد). [سنن ابن ماجه، طبقات ابن سعد، وأخلاق النبی، ابوالشیخ اصفهانی]&lt;br /&gt;
و چون در روز تشیع جنازه پسرش &amp;quot;ابراهیم&amp;quot; خورشید گرفتگی روی داد، و برخی این حادثه فلکی را به بزرگی و مقام او ربط دادند. چون عظماء دروغین از آن سوء استفاده نکرده هیچ، با این تصوری که می‫توانست بر &amp;quot;بشریت&amp;quot; او لطمه وارد کند به مقابله برخواسته فرمود: &amp;laquo;إِنَّمَا الشَّمْسُ وَالْقَمَرُ آيَتَانِ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ لا يُخْسَفَانِ لِمَوْتِ أَحَدٍ وَلا لِحَيَاتِهِ&amp;raquo; خورشید و ماه دو نشانه از نشانه‫های عظمت و قدرت الهی می‫باشند. برای مرگ و زندگی کسی کسوف و خسوف نمی‫کنند! [صحیح بخاری و صحیح مسلم]&lt;br /&gt;
و چون دخترکی خوش آواز در وصف ایشان سرود؛ &amp;laquo;وفینا نبی یعلم ما فی غد&amp;raquo; [صحیح بخاری] - در میان ما پیامبری است که از فردا خبر دارد &amp;ndash; با پرخاش اصلاحگر او را از این حرفهای بی‫اساس باز داشته فرمودند که من از غیب هیچ اطلاعی ندارم، و این تنها خداوند متعال است که از غیب خبر دارد.&lt;br /&gt;
&amp;laquo;قُل لَّا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّـهُ ۚ وَلَوْ كُنتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ ۚ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ&amp;raquo; ﴿الأعراف/١٨٨﴾&lt;br /&gt;
{بگو که من مالک نفع و ضرر خویش نیستم مگر آنچه خدا خواسته، و اگر من از غیب (جز آنچه به وحی می&amp;zwnj;دانم) آگاه بودم بر خیر و نفع خود همیشه می&amp;zwnj;افزودم و هیچ&amp;zwnj;گاه زیان و رنج نمی&amp;zwnj;دیدم، من نیستم مگر رسولی ترساننده، و بشارت دهنده گروهی که اهل ایمانند.}&lt;br /&gt;
و با وجود اینکه سرور عالمیان و سید بشر بودند، می‫فرمودند:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;لَا تُطْرُونِي كَمَا أَطْرَتِ النَّصَارَى عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ ، فَإِنَّمَا أَنَا عَبْدُ اللَّهِ وَرَسُولُهُ..&amp;raquo;. [صحیح بخاری]&lt;br /&gt;
&amp;quot;چون مسیحیان مرا وصف و ثنای بی‫جا نکنید. من تنها بنده خدا و فرستاده او هستم&amp;quot;.&lt;br /&gt;
و در کمال تواضع و فروتنی می‫فرمودند: &amp;quot;لا تخيروني على موسى&amp;quot; &amp;ndash; مرا بر حضرت موسی برتری ندهید -. [بخاری و مسلم]&lt;br /&gt;
و همچنین می‫فرمودند: &amp;quot;لا ينبغي لعبد أن يقول: أنا خير من يونس بن متى&amp;quot;. [بخاری و مسلم] &amp;laquo;شایسته نیست کسی بگوید؛ من از یونس فرزند متی بهترم!&amp;raquo;&lt;br /&gt;
ضرب المثل چینی می‫گوید: اگر خواستی به فکر سال آینده‫ات باشی برنج بکار، و اگر در فکر 20 سال آینده هستی درخت بکار، و اگر در فکر قرنهای آینده هستی انسان بکار!..&lt;br /&gt;
پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه وسلم &amp;ndash; برای رهایی بشریت انسان کاشت. انسان&amp;zwnj;هایی که در پرتو تعالیم انسان ساز او چون ستارگان هدایت و رستگاری در آسمان می‫درخشند، و دل تاریکیها را دریده، روشنی هدایت را به جهان و جهانیان ارمغان می‫دهند.&lt;br /&gt;
آخرین آیه سوره فتح، که گویا نمادی است از بزرگترین فتح رسول اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه وسلم &amp;ndash; که همان فتح دلها باشد از آن درختان تنومند و بلند قامت سخن می‫گوید:&lt;br /&gt;
(مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ اللَّـهِ ۚ وَالَّذِينَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ ۖتَرَاهُمْ رُكَّعًا سُجَّدًا يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّـهِ وَرِضْوَانًا ۖ سِيمَاهُمْ فِي وُجُوهِهِم مِّنْ أَثَرِ السُّجُودِ ۚ ذَٰلِكَ مَثَلُهُمْ فِي التَّوْرَاةِ ۚ وَمَثَلُهُمْ فِي الْإِنجِيلِ كَزَرْعٍ أَخْرَجَ شَطْأَهُ فَآزَرَهُ فَاسْتَغْلَظَ فَاسْتَوَىٰ عَلَىٰ سُوقِهِ يُعْجِبُ الزُّرَّاعَ لِيَغِيظَ بِهِمُ الْكُفَّارَ ۗ وَعَدَ اللَّـهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا). [الفتح/٢٩].&lt;br /&gt;
{محمد (صلی اللّه علیه و آله و سلم) فرستاده خداست و یاران و همراهانش بر کافران بسیار قویدل و سخت و با یکدیگر بسیار مشفق و مهربانند، آنان را در حال رکوع و سجود نماز بسیار بنگری که فضل و رحمت خدا و خشنودی او را می&amp;zwnj;طلبند، بر رخسارشان از اثر سجده نشانه&amp;zwnj;های نورانیّت پدیدار است. این وصف حال آنها در کتاب تورات و انجیل مکتوب است که (مثل حال آن رسول) به دانه&amp;zwnj;ای ماند که چون نخست سر از خاک برآورد جوانه و شاخه&amp;zwnj;ای نازک و ضعیف باشد بعد از آن قوّت یابد تا آنکه ستبر و قوی گردد و بر ساق خود راست و محکم بایستد که دهقانان را (در تماشای خود) حیران کند (همچنین محمد صلی اللّه علیه و آله و سلم و اصحابش از ضعف به قوّت رسند) تا کافران عالم را (از قدرت و قوّت خود) به خشم آرند. خدا وعده فرموده که هر کس از آنها ثابت ایمان و نیکوکار شود گناهانش ببخشد و اجر عظیم عطا کند.}.&lt;br /&gt;
همه عظماء و بزرگان تاریخ؛ چه آنهایی که افرادی برای رسیدن به منافع خاص خود با به کار گذاشتن آینه‫های مقعر و محدب از آنها عظماء و بزرگان ساخته‫اند، و چه آنهایی که سوار بر همت و اراده خود قامتی بالا کشیده‫اند، چون موشک هر چه از ما دور می‫شوند از بزرگی آنها کاسته می‫شود و با مرور زمان خبری از آنها بجای نمی‫ماند! و این تنها رسول الله &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; است که هر چند گذر زمان او را از ما دور ‫کند بر بزرگی و عظمت او افزوده می‫گردد، و بشریت هر روز بیش از پیش او را می‫شناسد و به جوانبی از عظمت و بزرگی و شموخ مقام او پی می‫برد!..&lt;br /&gt;
بنازم بزرگیت را ای رسول خدا &amp;ndash; صلی الله علیه وسلم -!&lt;br /&gt;
آن بزرگی و مقامی که در شب معراج پرده‫های تجلی عظمت را دریده، در کمال بندگی از بلندی ملایک گذشته به سدرة المنتهی رسید، و پس از ثبت این مقام والا و همکلام شدن با پروردگار و آفریدگارش، کمال بزرگی و عظمت خویش را بیش از پیش نمایان نموده آن بلندای عظمت را رها کرده به زمین بازگشت تا با وجود آن شخصیت بی‫مانندش، معلم انسان پر از کم و کاستی گردد. راه را به چوپانان بیسواد، و صحرا نشینان زمخت طبع و بشریت غافل تا بروز ازل بنمایاند!&lt;br /&gt;
باز بنازم استادیت را!..&lt;br /&gt;
استادان بزرگ را توان تحمل شاگردان کوچک نیست. تنها نخبگانند که حرفهای آنها را می‫توانند درک کنند، این تنها محمد مصطفی &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; است که استاد همه اقشار بشر بود. نخبگان و عامه مردم تا بروز قیامت از هر رنگ و بومی که باشند از دریای بی‫ساحل او بقدر نیاز و ظرفیت خود می‫توانند بهره گیرند.&lt;br /&gt;
معلمی که از محضر درسش همانطور که ابن مسعودها و ابوهریره‫ها درهای سفته حکمت و درایت جمع ‫کردند، آن صحرانشین جاهلی که در کنجی از مسجد خواست ادرار کند، و آن اعرابی زمخت و بی‫فرهنگی که گریبان استاد را چاک کرده بر او داد کشید: بده به من از این ثروت که این نه مال توست و نه مال پدرت! همه بهره‫ها برده، علم و اندرز آموختند..&lt;br /&gt;
همه اطیاف مردم با تمام طبائع و خصالها می‫توانستند از پرتو تربیت و حکمت او استفاده‫ها برند. و آن دلهایی که از کینه و حقد لبریز شده در پی ترور او خنجر زیر بغل گرفته بودند، چون به محضر استادیت او نزدیک می‫شدند به یکباره شیفته اخلاق و بزرگی او گشته، تمام عمر پروانه‫وار دور شمع وجودش می‫چرخیدند.&lt;br /&gt;
مگر نه این بود که گرمای مقامش یخچالهای روی هم انباشته حقد و کینه عمری را ذوب نمود و آن پادشاه حقد و اهریمن دین‫ستیز را در یک آن؛ اسیر عشق و محبت و اخلاق والای خود ساخته چون فرشتگان اهریمن ستیز نمود؟!.. تا بدانجا که عمر شد معیار شناخت حق و باطل!.. هر آنکه با عمر است؛ حق است. و هر آنکه از عمر گریزان؛ شیطان!..&lt;br /&gt;
معلمی که برای جهانیان رحمت و شفقت و مهر &amp;laquo;رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ&amp;raquo; بود، و برای مؤمنان مهربان و مشفق؛ &amp;laquo;رَءُوفٌ رَّحِيمٌ &amp;raquo;.&lt;br /&gt;
با وجود اینکه آرامش و راحتیش را در راز و نیاز با خدایش می‫یافت و به عزیزش بلال؛ برده سیاه حبشی که شرف دین بدو مژده بهشت در دنیا بخشیده بود، می‫فرمود: &amp;quot;&amp;quot;أرحنا بها يا بلال&amp;quot; &amp;ndash; نماز را بر پا دار تا در لذت مناجات آرامش یابیم! چون به نماز می‫ایستاد و صدای گریه کودکی را می‫شنید؛ جوشش رحمت قلبش به آن کودک گریان، و دلسوزیش برای مادر دلباخته کودک، باعث می‫شد نماز که معراج اوست بسوی پروردگارش، و راز و نیازش با خالق و معبودش را خلاصه کند!..&lt;br /&gt;
سلام بر عظمت و بزرگیت!..&lt;br /&gt;
هر چند به بزرگ و عظیمی نزدیکتر شوی صفات و ویژگیهایش کمرنگتر شده، کاستیها و عیبهایش چشمگیرتر می‫شوند، و در نتیجه بالا رفتن درک و فهم شما، از عظمت او نزدتان کاسته می‫شود!&lt;br /&gt;
و این تنها پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه وسلم &amp;ndash; است که هر چه بیشتر به او نزدیک شوی بیش از پیش شیدایش گشته غرق وجودش می‫گردی.&lt;br /&gt;
عجبا این رسول هدایت را!...&lt;br /&gt;
کتابی بود باز باز.. بیست و چهار ساعت شبانه روز زیر رقابت اجتماعی جامعه قرار داشت. یک لحظه از زندگی ایشان را نمی‫یابی که چشمان مخالفان و دشمنان ستیزه‫جو و یا دوستان و پیروان از او غافل باشند. در بازار، خانه، مسجد، سفر، شب و روز زیر چشم‫های خورده بین است، و هیچ دوست و دشمنی هرگز بر او خرده نگرفته!&lt;br /&gt;
نه دشمن توانست عیبی در او بیابد و نه دوست توانست همه خوبیهایش را ببیند..&lt;br /&gt;
می‫گویند؛ هیچ بزرگی در خانه خود بزرگ نیست و هیچ پهلوانی در بین خویشانش پهلوان نیست!&lt;br /&gt;
مگر آقا و سرورم رسول الله &amp;ndash; صلی الله علیه وسلم -!.. در خانه‫اش بین همسرانش که 12 تا بودند، و در روز رحلتشان بسوی پروردگارشان 9 همسر در خانه‫اش بود در کمال عظمت و بزرگی یاد می‫شدند. قهرمانی و هیبت آمیخته به تواضع و فروتنی ایشان نقل مجلس نزدیکان قبل از دیگران..&lt;br /&gt;
گواهی مادران مؤمنان؛ زنانی که هر یک برای دیگری هوو بود، در حق نماد عدل و سنبل خوبیها و الگوی هدایت به تنهایی خود برهانی است روشن بر عظمت و بزرگی و مقام او.. چه که هووها &amp;ndash; هم زنها &amp;ndash; حتی بخاطر انتقام از همدیگر حرفهای یکدیگر را رد می‫کنند و یا اینکه پس از مرگ شوهر بخاطر سرد کردن دلهایشان پرده از عیبهای او برمی‫کشند، و تنها این همسران پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه وسلم- بودند که جز خوبی از این پادشه خوبان هیچ ندیدند. و جز میوه کمال هیچ از رخسار جمالش نچیدند:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;از دم صبح ازل تا بقیام عرصات = بر سر و پای دلارای محمد صلوات&lt;br /&gt;
شکند تیغ زبانم همه دم شاخ نبات = باد بر قامت رعنای محمد صلوات&lt;br /&gt;
فرض عینست می‫&amp;zwnj;بگویم تا وقت ممات = دم بدم بر گل رخسار محمد صلوات&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;برادران و خواهران گرامی برای آشنا شدن با سیرت و اخلاق والای پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم می توانند به بخش سیرت و سنت نبوی در کتابخانه عقیده مراجعه نمایند. این بخش شامل 58 کتاب مفید در این موضوع می&amp;zwnj;باشد که شما می&amp;zwnj;توانید هر کتابی را که بخواهید به راحتی داونلود نمایید.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 16px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بخش سیرت و سنت نبوی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>سالنامه‌ی پیامبر اکرم ـ عليه الصلاة والسلام ـ</title>
<link>http://qalamlib.com/news/378</link>
<description>&lt;h1 align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;سالنامه ی &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;پیامبر اکرم&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; ـ عليه الصلاة والسلام ـ.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; border=&quot;1&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;
    &lt;tbody&gt;
        &lt;tr&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;1&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;میلاد با سعادت&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;9 ربیع الأول52 سال قبل از هجرت/ 20 آوریل 571م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;در روایت مشهور 12 ربیع الأول&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
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            &lt;/td&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;در آغوش حلیمه&amp;zwnj;ی سعدیه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;16/ ربیع الأول&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
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            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;وفات آمنه مادر پیامبر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;47 سال قبل از هجرت/ 577م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;4&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;وفات پدر بزرگشان عبد المطلب &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;44 سال قبل از هجرت/579م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;5&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اولین سفر تجاری&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;ایشان به شام&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;40 سال قبل از هجرت/583م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;در سن 12 سال&amp;nbsp; ودوماهگی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;6&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;مشارکت در جنگ فجار&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;37 سال قبل از هجرت/ 586م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;7&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
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            &lt;/td&gt;
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        &lt;/tr&gt;
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            &lt;/td&gt;
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            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;سفر دوم به شام وملاقات با راهب مسیحی نسطورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;28 سال قبل از هجرت/ 595 م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;9&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ازدواج با خدیجه&amp;zwnj;ی کبری&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;27 سال قبل از هجرت/ 595 م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;در 25 سالگی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;10&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ولادت فرزند اولشان &amp;quot;قاسم&amp;quot;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;25 سال قبل از هجرت/ 598 م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;11&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ولادت دخترشان &amp;quot;زینب&amp;quot;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;23 سال قبل از هجرت/ 600 م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;12&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ملقب شدن به &amp;quot;الأمین&amp;quot;ـ راستگو ـ در مکه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;22 سال قبل از هجرت/ 601م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;13&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ولادت دخترشان &amp;quot;رقیه&amp;quot;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;20 سال قبل از هجرت/ 603م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;14&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ولادت دخترشان &amp;quot;ام کلثوم&amp;quot;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;19 سال قبل از هجرت/ 604م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;15&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;باز سازی کعبه و قضاوت پیامبر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;18 سال قبل از هجرت/ 605م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;16&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ولادت دخترشان فاطمه الزهراء&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;18 سال قبل از هجرت/ 605م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;17&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;طلوع آفتاب نبوت&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;9 ربیع الأول 12 سال قبل از هجرت/ 2 فوریه 610م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;18&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فرض شدن دو نماز صبح وشام&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;18 رمضان 12 سال قبل از هجرت/ 14 اوت 610م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td rowspan=&quot;2&quot; style=&quot;width:37px;height:39px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;19&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;height:39px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ابتدای دعوت پنهانی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;height:39px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;18 رمضان 12 سال قبل از هجرت/ 14 اوت 610م.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;width:598px;height:30px;&quot;&gt;
            &lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;( ایمان آوردن خدیجه، ابوبکر، علی وزید بن حارثه رضی الله عنهم)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;20&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;دعوت مردم مکه از روی تپه ی صفا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;11 سال قبل از هجرت/ 611م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;21&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اسلام آوردن حمزه عموی پیامبر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;سال 6 بعثت/616م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;22&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اسلام آوردن عمر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;سال 6 بعثت/617م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;23&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;مقاطعه &lt;/strong&gt;ی&lt;strong&gt; اقتصادی در شعب ابی طالب&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;سال 7 بعثت&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;24&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;وفات حضرت خدیجه&amp;zwnj;ی کبری&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;10 بعثت/620م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td rowspan=&quot;2&quot; style=&quot;width:37px;height:31px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;25&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;height:31px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;وفات ابو طالب عموی پیامبر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;height:31px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;10 بعثت 2ماه بعد از وفات خدیجه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;width:598px;height:25px;&quot;&gt;
            &lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;(این سال به عام الحزن ـ سال اندوه ـ نام گذاری شد)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;26&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;دعوت شهر طائف به اسلام&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;10 بعثت /620م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;27&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ازدواج با عائشه ی صدیقه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;10 بعثت /620م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;28&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;حادثه&amp;zwnj;ی معراج&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شب 27 رجب&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;29&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فرض شدن نمازهای پنجگانه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;27 رجب در معراج&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;30&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;بیعت عقبه&amp;zwnj;ی اول&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;12 بعثت/621م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;31&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;بیعت عقبه&amp;zwnj;ی دوم&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;13 بعثت/622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;32&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;هجرت به مدینه (از مکه به غار ثور)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;27 صفر 13 بعثت/ 10 سبتامبر 622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;33&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;هجرت به مدینه ( از غار ثور به مدینه)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اول ربیع الأول 13 بعثت/ 13 سپتامبر622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;height:18px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;34&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;height:18px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;رسیدن به قبا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;height:18px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;8 ربیع الأول13 بعثت/ 20 سپتامبر 622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;height:24px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;35&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;height:24px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;بناء مسجد قبا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;height:24px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;8-11 ربیع الأول 13 بعثت/1هجری/23-20 سبتامبر 622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;36&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اولین نماز جمعه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;12 ربیع الأول 1 هجری/ 24 سپتامبر 622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;37&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;تشریف فرمایی به مدینه&amp;zwnj;ی منوره&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;12 ربیع الأول 1 هجری/ 24 سپتامبر 622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;38&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;بناء مسجد نبوی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ربیع الأول 1 هجری/ اکتبر 622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;39&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اولین اذان&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ربیع الأول 1 هجری/ اکتبر 622م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;40&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;پیمان برادری بین انصار ومهاجرین(مؤاخا&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;ة)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;1 هجری/ 623م/6 ماه بعد از هجرت&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;41&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;معاهده&amp;zwnj;ی مدینه ( با یهودیان اطراف مدینه)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;1 هجری&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;42&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اجازه&amp;zwnj;ی جهاد&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;12 صفر 2 هجری/15 اوت 623م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;43&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;تغییر قبله از بیت المقدس به مکه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شعبان 2 هجری/ فوریه 624م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;44&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فرض شدن روزه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شعبان 2 هجری/ فوریه 624م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;45&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی أبواء&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;صفر 2 هجری/ اوت 623م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;46&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی بواط&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ربیع الأول 2 هجری/ سپتامبر623م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;47&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی بدر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;17 رمضان 2 هجری/624م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;48&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فرض شدن زکات&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شوال 2هجری/ آوریل 624م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;49&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اولین نماز عید فطر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;1شوال 2هجری/آوریل 624م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;50&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;اولین نماز عید قربان&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ذی الحجه 2هجری/ ژوئن 624م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;51&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی احد&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شوال 3هجری/ مارس 625م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;52&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;حرام شدن شراب&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ربیع الأول 4هجری/سپتامبر 625م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;53&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی احزاب ( غزوه&amp;zwnj;ی خندق)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شوال 5 هجری/ مارس 627م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;54&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;صلح حدیبیه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شوال 6هجری/ مارس 628م. ودر روایتی ذی قعده 6 هجری&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;55&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی خیبر&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;محرم 7هجری/مه628م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;56&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فتح مکه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;رمضان 8هجری/ژانویه 630م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;57&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی حنین&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;شوال 8هجری/ ژانویه630م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;58&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;غزوه&amp;zwnj;ی تبوک&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;رجب9 هجری/اکتبر 630م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;59&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فرض شدن حج&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ذی القعده 9هجری/مارس 631م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;60&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فرستادن ابوبکر بعنوان امیر حج&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ذی القعده 9هجری&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;61&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;حرام شدن ربا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ذی الحجه 9 هجری/مارس 631م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;62&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;حرکت پیامبر بسوی حج&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;25 ذی القعده 10 هجری/22 فوریه 632م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;63&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;ورود پیامبر به مکه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;4 ذی الحجه 10 هجری/ ا مارس 632م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;64&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;حرکت بسوی عرفات&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;9 ذی الحجه 10هـ/6مارس 632م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;65&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;بازگشت از منا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;13ذی الحجه 10هـ/10 مارس 632م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;66&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;بیماری پیامبر اکرم&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;29 صفر 11هـ/ 25مه632م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;67&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;فرمان به ابوبکر كه به مردم نماز دهد&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;11 ربیع الأول 11هـ/6 ژوئن 632م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
        &lt;tr&gt;
            &lt;td style=&quot;width:37px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;68&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:271px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;وفات پیامبر اکرم&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
            &lt;td style=&quot;width:327px;&quot;&gt;
            &lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;12 ربیع الأول 11هـ/7 ژوئن 632م&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
            &lt;/td&gt;
        &lt;/tr&gt;
    &lt;/tbody&gt;
&lt;/table&gt;
&lt;div style=&quot;clear:both;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;وصلى الله عليه وعلى آله وأزواجه وصحبه وسلم&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>سخنی چند در باره‌ آیت الله شریعت سنگلجی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/377</link>
<description>&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;از: تیمسارسرتیب جهانبگلو&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;h1 dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;سخنی چند در باره&amp;zwnj;ی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;h1 dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;آیت الله شریعت سنگلجی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;بنام خداوند جان و خرد&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;سرگذشت حال بزرگان را از آنجهت باید نوشت که چه خدماتی به عالم بشریت نموده و در راه اصلاح جامعه چه فداکاری&amp;zwnj;هایی کرده&amp;zwnj;اند و مصلحین و دانشمندانی بشر را از آن سبب معرفی می&amp;zwnj;نمایند که هم نسبت به آن بزرگواران قدرشناسی به عمل آمده باشد، زیرا خداوند متعال در قرآنکریم می&amp;zwnj;فرماید: ﴿وَأَمَّا بِنِعۡمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثۡ ١١﴾ &amp;laquo;نعمت&amp;zwnj;های الهی را تعریف کن&amp;raquo;. و بطور قطع و یقین وجود رجال علمی و حکمای الهی و مصلحین و خیرخواهان انسانیت خود نعمت بزرگی است و باز قرآن فرموده است: اگر شکر نعمت بجای آوردید آن نعمت را زیادتر خواهم کرد. ﴿لَئِن شَكَرۡتُمۡ لَأَزِيدَنَّكُمۡ﴾ و از طرفی معرفی مردان حق و فضیلت و مجاهدین در راه تقوی و عدالت و دانشمندان احیاکننده روح و جسم بشریت موجب تشویق و ترغیب افرادی که در درون&amp;zwnj;شان استعدادهای سرشاری نهفته است می&amp;zwnj;باشد که از ذکر مدایح و خدمات دیگران مشتمل و گوهرهای تابناک درونی خود را به منصه بروز و ظهور می&amp;zwnj;رسانند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;البته بر خداوند متعال است که از راه لطف و به سبب رحمانیت در هر عصری پیامبرانی جهت هدایت بشر مبعوث و بعد از نبی، اولیاء و بزرگانی جهت ترویج و توجیه آن کیش و آئین مأمور می&amp;zwnj;فرماید که حجت بر خلق تمام گردد مخصوصاً در زمانی که بدعت جای سنت را گرفته و خرافاتی داخل اصول عقاید و مسلمات و ضروریات آن دین نموده باشند که بقول شاعر:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;بسکه بر آن بسته شده برگ و ساز &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;گر تو به&amp;zwnj;بینی نشناسیش باز&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;و چون خرافات و بدعت&amp;zwnj;ها مخرب دین و گمراه&amp;zwnj;کننده اجتماع است لذا در این موقع است که مصلحی متدین و دانشمندی معتقد به آن دین قیام الی الله نموده با بدعت&amp;zwnj;ها و خرافات و با آلوده&amp;zwnj;گی&amp;zwnj;های اجتماع مبارزه نموده خود را فدیه راه حق و حقیقت می&amp;zwnj;نماید که در کلیه ادیان الهی نظایرشان بسیارند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;آنانــکه ره عشــــــق گزیـــدند همــــه &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;در کوی شهادت آرمیدند همه&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;در معرکه دو کون فتح از عشق است &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;هر چند سپــاه او شهیدند همه&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ضمناً ناگفته نماند که معرفی و نوشتن شرح بزرگان کاریست بس&amp;zwnj;دشوار، زیرا به حکم منطق معرف یا باید اجلی و بالاتر از معرف باشد یا لااقل مساوی، ولی بر اشخاصی که معاصر و خوشه&amp;zwnj;چین مکتب آن مصلح و دانشمند بزرگ بوده&amp;zwnj;اند فرض و واجب است که به اندازه ادراک و فهم&amp;zwnj;شان مشهودات و محسوسات شان را شرح دهند که البته در این ادای دین مأجور خواهند بود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;یکی از بارقه&amp;zwnj;های درخشان آسمان دانش و ایمان این عصر، شادروان علامه بزرگوار مرحوم حاج شریعت سنگلجی بوده است، البته سرگذشت بزرگان از آن جهت مفید معنای حالت است که چه خدماتی به عالم بشریت نموده و در راه اصلاح جامعه چه فداکاری&amp;zwnj;ها کرده&amp;zwnj;اند و الا ذکر زمان تولد و نحوه زندگانی و چگونگی طبیعت و محل و مکان زیست و تاریخ فوت چه نفعی برای جامعه خواهد داشت؟&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;مرحوم شریعت سنگلجی از نوادر زمان و نوابغ دوران و مردی متبحر در علوم دینی و متخصص در تفهیم و تفهم قرآن حکیم و سنت حتمیه پیمبر اسلام و فرموده&amp;zwnj;های ائمه سلام الله علیهم أجمعین بوده و در اصول و کلام و فلسفه و عرفان عالمی متبحر و فاضلی بی&amp;zwnj;نظیر بود و چون به آنچه را که می&amp;zwnj;دانست ایمان و ایقان داشت، جهاد در راه جهل و نادانی و ابطال خرافات و مبارزه با بی&amp;zwnj;دینی و بدعت و ترویج کفر و زندقه و مخالفت با اخبار مجعولی که نسبت به اولیاء دین داده بودند ابراهیم وار با تبر بت&amp;zwnj;شکنی مسلح و شب و روز برای دستگیری گم&amp;zwnj;کردکان راه حقیقت با تن رنجور و علیل فداکاری&amp;zwnj;ها نموده و از ستوران زمان لگدها خورد تا شاید عده&amp;zwnj;یی از طالبین حقایق دین را آگاه سازد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;صبر بسیار بباید پدر پیر فلک را &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;تا دگر مادر گیتی چو تو فرزند بزاید&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;table align=&quot;right&quot; border=&quot;0&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;
	&lt;tbody&gt;
	&lt;/tbody&gt;
&lt;/table&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;استاد محترم جناب آقای عبدالرحمن قرامرزی در شماره 31 روزنامه کیهان مورخه سه شنبه 20 دی ماه 1322 شمسی راجع به مرحوم شریعت سنگلجی مقاله مرقوم و اشعار داشته&amp;zwnj;اند:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;laquo;به نظر من شریعت سنگلجی نه تنها از محمد عبده مفتی معروف مصر و علمدار نهضت اصلاحی اسلامی کمتر نبود بلکه اگر محیطی را که سنگلجی در آن پرورش یافته با محیط محمد عبده و استادان او مقایسه کنیم اذعان خواهیم کرد که از وی بزرگ&amp;zwnj;تر بود. من در میان علماء اسلام جز غزالی نظیری برای او پیدا نمی&amp;zwnj;کنم. هرکس این حرف را مبالغه می&amp;zwnj;شمارد گو چند ساعتی کتب سنگلجی را با کتب غزالی مقایسه کند&amp;raquo;.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;مرحوم شریعت سنگلجی نیز از همان مصلحینی بود که حیات و زندگانی خود را وقف اعلام کلمه توحید و جهاد بر ضد بدع و خرافات نمود و در صدد بسر آمد که با تیغ زبان و نوک خامه در سایه شجاعت و ایمان و صراحت لهجه پرده ضخیمی را که جهال و.... بر اسلام کشیده بودند دریده و اسلام را آنطور که هست و به همان نحوی که بر پیغمبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم به وسیله وحی نازل شده است به دنیا و بخصوص به هموطنان خود معرفی نماید تا حقایق دین مبین اسلام بر همه کس روشن گردد ومسلماً بذری را که آن مرحوم در مزرعه دل&amp;zwnj;های پاک و بی&amp;zwnj;آلایش پاشیده سبز و خرم گردیده و روزی هموطنان گرامی از ثمره&amp;zwnj;اش بهره&amp;zwnj;مند می&amp;zwnj;گردند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;آری، شریعت سنگلجی آفتابی بود که طلوع آن به منزله افول ستاره عمر خرافاتیان و سودجویان و دکانداران شریعت محمدی - صلی الله علیه وآله وسلم- بود. او دانشمندی روشن بین و فیلسوفی دقیق و مسلمانی پاک نهاد و متفکر بود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;روح زمان را درک کرده اصول تعلیم و تربیت دینی را منطبق با صدر اسلام می&amp;zwnj;نمود و خداپرست و انسان دوست بود، در دعوت برای او سفید و سیاه، فقیر و غنی، دهری، کلیمی، مسیحی، زردشتی، هندو و غیره فرقی نمی&amp;zwnj;کرد میل وافری داشت همه ابناء بشر را باید به جاده حق و حقیقت و صراط آدمیت سوق داد در یک جلسه دانشمندان غربی را معتقد به توحید و سپس نبوت خاتم انبیاء و معاد می&amp;zwnj;نمود و با فضلاء نامی شرق مانند تاگور فیلسوف هندی در مسائل فلسفی مباحثه فرموده است.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;شریعت سنگلجی در 1269 شمسی در خانواده بزرگ&amp;zwnj;ترین و قدیمی&amp;zwnj;ترین علماء امامیه (مرحوم حاج شیخ حسن سنگلجی معاصر و رفیق و همراز مرحوم حاج شیخ هادی نجم آبادی) پا به عرصه وجود گذارده در ایام صباوت در حجره پدر آنهم چنان پدری تربیت&amp;zwnj;یافته و سپس در محضر فضلاء و دانشمندان عصر مانند حاج شیخ عبد النبی زمخشری زمان و مرحوم میرزا حسن کرمانشاهی و مرحوم میرزا هاشم اشکوری و مرحوم شیخ علی نوری به کسب علوم عصری پرداخته و سپس به اتفاق برادر والاگهرش آیت الله و علامه شهیر جناب استاد محمد سنگلجی جهت تکمیل علوم به نجف مشرف و پس از مراجعت به تهران به تبلیغ و تدریس و ارشاد خلایق مشغول، مسجدش مملو و مشحون از اجتماع علماء و مجتهدین و فضلاء و نویسندگان و تشنگان آب حیات معنویت بود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;در ساعت 5/2 بامداد پنجشنبه 15 دیماه 1322 شمسی جانش از دست رجاله&amp;zwnj;صفتان و دشمنان دین و ایمان آسوده و در نتیجه چند روز ابتلاء به تیفوس روحش به عالم بالا پرواز و شمع وجودش افول و مشمول آیه کریمه: ﴿يَٰٓأَيَّتُهَا ٱلنَّفۡسُ ٱلۡمُطۡمَئِنَّةُ (٢٧) ٱرۡجِعِيٓ إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةٗ مَّرۡضِيَّةٗ (٢٨) فَٱدۡخُلِي فِي عِبَٰدِي (٢٩) وَٱدۡخُلِي جَنَّتِي (٣٠)﴾ واقع گردید.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;آثار قلمی آن بزرگوار آنچه یاد دارم عبارتست، &lt;/strong&gt;از: کلید فهم قرآن، توحید عبادت، محو الموهوم، تلخیص الفلسفه به عربی که هریک در جای خود محتاج یک کتاب شرح می&amp;zwnj;باشد، بوده و در حال حاضر کتب مزبور بکلی نایاب و طالبان حقیقت از مطالعه آن&amp;zwnj;ها محروم می&amp;zwnj;باشند مگر دوستان و خیرخواهان متدین اقدام به تجدید چاپ کتب نامبرده بنمایند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;مصدر:&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 1.6em;&quot;&gt;نشریه فرهنگ و هنر &amp;laquo;مهر&amp;raquo; دوره سیزدهم - فروردین 1346 - شماره 1،&amp;nbsp;(72 تا 74)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;***&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;strong style=&quot;line-height: 1.6em;&quot;&gt;شایان ذکر است سایت کتابخانه عقیده دو اثر از آثار ایشان را در سایت منتشر کرده است. لطفا&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;strong style=&quot;line-height: 1.6em;&quot;&gt;برای دریافت این دو کتاب بر روی آنها کلیک کنید:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1175/&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;کلید فهم قرآن&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1175/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;توحید عبادت&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: right;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>رُحَماء بينهم، تألیف مولانا محمد نافع</title>
<link>http://qalamlib.com/news/376</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 16px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;رُحَماء بينهم، تألیف مولانا محمد نافع&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كيا آپ نے صحابه  كى آپس ميں محبتوں الفتوں كى حقيقى تصوير ديكھى هے&lt;br /&gt;
اگر آپ پڑھنا چاهيں فرمان الٰهى &amp;quot;رحماء بينهم&amp;quot; كى تفسير&lt;br /&gt;
محترم بھائيو اور بهنو عقيده ويب سائٹ انتهائى مسرت كے ساتھ &amp;quot;رحماء بينهم&amp;quot; كے موضوع پر اردو زبان ميں سب سے بهترين،  لاجواب اور منفرد كتاب آپ كے سامنے پيش كرنے كى سعادت حاصل كر رهى هے.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;صورى ومعنوى خوبيوں سے آراسته صحابه كى آپس ميں محبتوں كا حسين گلدسته  اور اس كى طرف آنے والے هر قسم كے تمام تيروں كے سامنے آهنى ديوار جس ميں:&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt;&amp;bull;	مؤلف كتاب  نے سيّدنا صديق اكبر، سيّدنا فاروق اعظم اور سيّدنا عثمان غنى ، تينوں خلفاء كے ساتھ سيّدنا على اور اولادِ على رضى الله عنهم اجمعين كے حُسن سلوك، باهمى تعاون، خانگى مراسم، نسبى تعلقات اور امور خلافت ميں بھرپور اعانت كو كم وبيش دوسو سے زائد شيعه وسنى قديم وجديد كتب كے حواله جات سے مزين روزِ روشن كى طرح واضح كيا هے۔ يه كهنا بے جا نهيں كه اس موضوع پر اس دور ميں يه پهلى مدلّل تحقيقى كتاب هے جو ساده، رواں اور عام فهم اردُو ميں لكھى گئى هے۔&lt;br /&gt;
&amp;bull;	زير نظر كتاب خلفاء اربعه كے  آپس ميں تعلقات  وروابط كے بارے ميں كم وبيش 1500  صفحات اور 4 جلدوں  پر تفصيلى اور واضح  حواله جات سے مزين  خوبصورت اور جديد انداز ميں پيش كيا گياهے۔&lt;br /&gt;
&amp;bull;	شيعه حضرات كى طرف سے سيدنا ابوبكر، عمراور عثمان رضى الله عنه پراهل بيت وديگر حوالوں سے  لگائے گئے تمام الزامات كا  محققانه اندازكتب اهل السنة واهل الشيعه سے مسكت جواب&lt;br /&gt;
&amp;bull;	عبارت  ساده، عام فهم، اندازِ بيان مثبت اور صلح جويانه۔&lt;br /&gt;
&amp;bull;	حواله كى هر كتاب كى اصل عبارت اور ترجمه اس خوبى كے ساتھ كيا گيا هے كه مطالعه سے بے شمار شكوك و شبهات خود بخود رفع هو جاتے هيں۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;مؤلف نے كتاب كو تين حصوں اور چار جلدوں ميں تقسيم كيا هے ذيل ميں هر جلد كا عليحده تعارف ذكر كيا جارها هے:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: rgb(255, 255, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;جلد اول: (حصه صديقى)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اس ميں كتاب وسنّت اسلامى تاريخ كى روشنى ميں سيّدنا صديق اكبر وسيدنا على المرتضى اور سيّده فاطمه رضى الله عنهم كے درميان عمده تعلقات اور بهترين مراسم وروابط جديد انداز ميں پيش كيے گئے هيں۔&lt;br /&gt;
پيش لفظ  - آغاز كتاب - چند تمهيدى امور كے بعد كتاب كو پانچ ابو اب ميں تقسيم كيا گيا هے۔&lt;br /&gt;
باب اول: خانگى مراسم۔ &lt;br /&gt;
باب دوم: صديقى ومرتضوى تعلقات۔&lt;br /&gt;
باب سوم: سيدنا على رضى الله عنه كا اُمور مملكت ميں صديق اكبر رضى الله عنه سے مكمّل تعاون۔&lt;br /&gt;
باب چهارم:فضائل صديق وعمر، على رضى الله عنهم كى زبانى۔&lt;br /&gt;
باب پنجم: علوى خاندان كےصدّيقى خاندان سے تعلقات۔&lt;br /&gt;
صورى و معنوى جمله خوبيوں سے آراسته اپنے انداز كى پهلى كتاب۔&lt;br /&gt;
خليفه اول سيّدنا صدّيق اكبر رضى الله عنه كے خانواده نبوت، سيدنا على وحسنين شريفين  رضى الله عنهم اور ديگر افراد اهل بيت كے ساتھ حُسن سلوك , حقوق كى ادائيگى، باهمى بهترين مراسم اور عمده تعلقات كو جامع و مانع انداز ميں پيش كيا گيا هے ۔&lt;br /&gt;
اهل سنت كى 93 كتب اور اهل تشيُّع كى 46 كتب سے استفاده كرتے هوئے حسن ترتيب كا لا جواب شاهكار۔&lt;br /&gt;
عبارت  ساده، عام فهم، اندازِ بيان مثبت اور صلح جويانه۔&lt;br /&gt;
حواله كى هر كتاب كى اصل عبارت اور ترجمه اس خوبى كے ساتھ كيا گيا هے كه مطالعه سے بے شمار شكوك و شبهات خود بخود رفع هو جاتے هيں۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: rgb(255, 255, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;جلد دوم: (حصه فاروقى)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اس ميں كتاب وسنّت اسلامى تاريخ كى روشنى ميں سيّدنا فاروق اعظم وسيدنا على المرتضى اور سيّده فاطمه اور حسنين شريفين رضى الله عنهم كے درميان عمده تعلقات اور بهترين مراسم وروابط جديد انداز ميں پيش كيے گئے هيں۔&lt;br /&gt;
كتاب كے اجمالى مضامين ذيل ميں ملاحظه فرمائيں:&lt;br /&gt;
پيش لفظ &amp;ndash;چند تمهيدى امور( جن كى روشنى ميں كتاب مرتب كى گئى )  ذكر نے كے بعد كتاب كو پانچ ابواب ، اور ان كے ذيل ميں فصول  ميں ترتيب ديا گياهے ۔ ابواب اور فصول درج ذيل هيں:&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 51, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب اول:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
فصل اول : فاروق اعظم رضى الله عنه كے ساتھ على المرتضى رضى الله عنه كا بيعت كرنا&lt;br /&gt;
فصل دوم: سيّدنا على المرتضى رضى الله عنه كى زبانى فاروق اعظم رضى الله عنه كے فضائل ومناقب اور فاروق اعظم رضى الله عنه كى زبانى على المرتضى رضى الله عنه كى تعريف و توصيف&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب دوم:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فصل اول : فاروقى دور ميں شعبه جات كى تقسيم اور قضاء و اِفتاء حضرت على رضى الله عنه كے سپرد كرنا ۔&lt;br /&gt;
فصل دوم: مسائل شرعيه ميں فاروق و مرتضى كے باهمى مشورے اور باهمى تلقين واعتماد۔&lt;br /&gt;
فصل سوم: انتظامى اُمور ميں فاروق و مرتضى كے باهمى مشورے&lt;br /&gt;
فصل چهارم: سيّدنا على المرتضى كے ليئے سيّدنا فاروق اعظم رضى الله عنهما كى طرف سے مالى مراعات و عطيات۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب سوم:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فصل اول : خانواده نبوّت (اهل بيت) سے عقيدت و محبّت&lt;br /&gt;
فصل دوم: أُم كلثوم بنت على رضى الله عنه سے نكاح سميت تعلقات كے پانچ امور ذكر كيے گئے هيں&lt;br /&gt;
فصل سوم : فاروق اعظم اور حسن و حسين رضى الله عنهم كے باهمى خوشگوار تعلقات كے چار خاص واقعات&lt;br /&gt;
فصل رابع:فاروق اعظم كے آخرى لمحات كے بارے ميں سيدنا على رضى الله عنه كے بيانات۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب  چهارم:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فصل اول : فاروق اعظم اور عمِّ رسول عباس رضى الله عنهما كے مراسم&lt;br /&gt;
فصل دوم: فاروق اعظم اور عبد الله بن عباس رضى الله عنهم كے باهمى مراسم&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب پنجم:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فصل اول : امام حسن كا بيان كه فاروق ومرتضىٰ رضى الله عنهم ميں مخالفت نه تھى&lt;br /&gt;
فصل دوم: حضرت زين العابدين كا بيان كه شيخين حضور نبى مكرم صلى الله عليه وسلم سے هميشه قريب هيں۔&lt;br /&gt;
فصل سوم :   امام محمد باقر كے بيانات فاروق اعظم رضى الله عنه كے بارے ميں &lt;br /&gt;
فصل چهارم: شيخين كے بارے ميں امام جعفر صادق كے بيانات&lt;br /&gt;
فصل پنجم: سيدنا على رضى الله عنه كے بيٹوں اور ان كى اولاد ميں &amp;quot;عمر&amp;quot; نام مروج رها هے&lt;br /&gt;
الختام بالخير--- مراجع كتاب(از كتب اهلِ سنت &amp;quot;80كتب&amp;quot;) ---- مراجع كتاب ( از كتب شيعه&amp;quot;41كتب&amp;quot;)&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: rgb(255, 255, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;جلد سوم: (حصه عثمانى)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خليفه ثالث سيّدنا عثمان اور سيّدنا على المرتضى رضى الله عنهما اور ان كے خاندان كے درميان نسبى روابط اور ديگر مراسم اور تعلقات جديد انداز ميں پيش كيے گئے هيں جو قبل ازيں اس دور ميں سامنے نهيں آسكے۔&lt;br /&gt;
تينوں جلديں پانچ پانچ ابواب پر مشتمل هيں اور جدت مضامين كے اعتبارسے هرطبقه كے افراد كے لئے مفيد هے۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;افتتاحيه كلام&lt;/strong&gt;--- مختصر تمهيدات---&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب اول:&lt;/strong&gt;  (خاندانى ونسبى تعلقات) يهاں سات عدد رشتے درج هوں گے&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب دوم:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
مسئله بيعت ( على المرتضى كا عثمان رضى الله عنهما سے بيعت كرنا) اكابر علماء كى كتب سے آٹھ حوالے اور اس كى تائيد ميں شيعه كتب سے چار حوالے ، اس حوالے سے ديگر اعتراضات و روايات پر نقد۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب سوم:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
سيدنا عثمان وعلى رضي الله عنهما كا ايك دوسرے كے ساتھ حسن سلوك اعانت اور دعوت طعام وغيره كے واقعات&lt;br /&gt;
سيدنا عثمان رضى الله عنه كى صفات وديگر فضائل بزبان سيدنا على وحسن بن على وعبد الله بن عباس رضى الله عنهم وديگر بنو هاشم  اور آل على ميں سے سيدنا زين العابدين وابو جعقر صادق وغيره، شيعه وسنى كتب كى نصوص مع حواله جات بيان كيے گئے هيں۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب  چهارم:&lt;/strong&gt; كا اجمالى نقشه چھ عنوانات كى شكل ميں&lt;br /&gt;
عنوان اول:اِجراء احكام ميں سيدنا عثمان وعلى رضى الله عنهما كا عملى تعاوُن&lt;br /&gt;
عنوان دوم: عثمانى خلافت ميں هاشمى حضرات كے عهدے اور مناصب&lt;br /&gt;
عنوان سوم: عدالت عثمانى كى طرف هاشميوں كا رجوع كرنا اور فيصله طلب مقدمات ميں باهمى مشوره اور عثمانى فيصلوں كى تصديق وتائيد&lt;br /&gt;
عنوان چهارم: امير المؤمنين سيّدنا عثمان بن عفان كا هاشمى حضرات كى عظمت واحترام كو ملحوظ ركھنا اور هاشميوں كے جنازے پڑھانا&lt;br /&gt;
عنوان پنجم: خلافت عثمانى ميں هاشمى حضرات كا شريك جهاد هونا&lt;br /&gt;
عنوان ششم: سيّدنا عثمان ذوالنورين رضى الله عنه كى خلافت ميں نبى كريم صلى الله عليه وسلم كے رشته داروں كے مالى حقوق&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;باب پنجم: محاصره عثمانى سے لے كر شهادت تك&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
محاصره عثمانى كے متعلقات، نيابت حج كے لئے ابن عباس رضى الله عنه كا انتخاب، شيعه مؤرخين سے اس كى تائيد، سيدنا على اور آل على رضي الله عنهم كى مدافعانه كوششيں، محاصره كے واقعات كے لئے مزيد حواله جات 15 امور كى صورت، مدافعانه واقعات ميں حسن بن على رضى الله عنه كا زخمى هونا، اور ديگر واقعات۔&lt;br /&gt;
درج بالا اجمالى تذكره موضوعات كتاب سي يه واضح هوتا هے كه مؤلف نے :&lt;br /&gt;
خليفه سوم سيّدنا عثمان رضى الله عنه كے سيّدنا على رضى الله عنه اور خانواده نبوت نيز بنو هاشم كے ساتھ مراسم اور نسبى تعلقات بيان كيے گئے هيں۔ اور عثمانى دَور خلافت ميں ان حضرات كے ساتھ كس قدر تعاون رها هے۔ نيز خاندانى تعلقات كس قدر گهرے تھے۔&lt;br /&gt;
ايسے بے شمار واقعات قديم وجديد كتبِ اهلِ سُنّت اور كتب شيعه انساب اور تاريخ كى كتابوں سے جمع كيے گئے هيں۔ مزيد برآں ان مطاعن كے تحقيقى جوابات ديے گئے هيں جن كا سيّدنا عثمان غنى كى طرف غلط انتساب كيا گيا هے۔ صورى ومعنوى خوبيوں سے آراسته صحابه كى محبتوں كا حسين گلدسته ۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: rgb(255, 255, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;جلد چهارم: مسئله اقرباء نوازى ( ملحق  بكتاب رحماء بينهم حصه عثمانى)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب هذا ميں خليفه راشد سيّدنا عثمان ذوالنورين رضى الله عنه سے اقرباء نوازى كے طعن كو صاف كرنے كى مخلصانه كوشش كى گئى هے اور ثابت كيا گيا هے كه حضرت عثمان رضى الله عنه كا دامنِ خلافت اس ميں داغدار نهيں اور عثمان رضى الله عنه حدِ جواز سے متجاوز نهيں۔ نيز عثمانى خلافت كى ايك گونه مختصر تاريخ اس ميں آگئى هے اور عثمان رضى الله عنه كے عهده دار و منصب يافته رشته داروں كى خدمات اور كردار كو صحيح كريقه سے پيش كيا گيا هے۔&lt;br /&gt;
زير نظر جلد ميں  ابتدائى معروضات وتمهيدات كے بعد كتاب كو پانچ بحثوں ميں تقسيم كيا گياھے  جن كے مشتملات مختصرا ذيل ميں پيش كئے گئے هيں:&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بحث  اول:&lt;/strong&gt; اس ميں عهدِ عثمانى كے حكام اور مناصب  اور ان كا باهمى تناسب بيان كىا گيا اور اموى حكام كتنے تھے اور غير اموى حكام كتنے تھے  يعنى سيدنا عثمان رضى الله عنه كے اقرباء كتنى تعداد ميں تھے جن كى بنياد پر آپ كو طعن كيا جاتا هے۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بحث ثانى:&lt;/strong&gt; اس ميں ان حضرات كى لياقت اور صلاحيت وكردار كا مسئله سامنے ركھا گيا هے۔ اور ان كى دينى  اور ملّى خدمات كا تذكره  كيا گيا هے۔ جن ميں سے چند ايك درج ذيل هيں: &lt;br /&gt;
وليد بن عقبه رضى الله عنه كے متعلقات&lt;br /&gt;
سعيد بن العاص رضى الله عنه كے متعلقات&lt;br /&gt;
عبد الله بن عامر رضى الله عنه كے متعلقات&lt;br /&gt;
امير معاويه رضى الله عنه كے متعلقات&lt;br /&gt;
عبد الله بن سعد بن ابى سرح كے متعلقات&lt;br /&gt;
مروان بن الحكم كے متعلقات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;بحث ثالث: &lt;/strong&gt;اس بحث ميں مسئله اقرباء نوازى كے حوالے سے دو سوال اور ان كا جواب ديا گيا هے:&lt;br /&gt;
سوال  اول : &amp;quot;اقرباء نوازى&amp;quot; كى شرعى حيثيت كيا هے؟ شرعاً كس طرح محمود هے اور صحيح؟ اور كن كن صورتوں ميں مذموم اور قبيح هے؟&lt;br /&gt;
سوال ثانى:واقعات كے اعتبار سے اس مسئله كو معلوم كيا جائے كه دورِ عثمانى سے گذشته ادوار عهد نبوى ، عهد صديقى اور عهد فاروقى اور  اس كے بعد يعنى عهد مرتضوى ميں رشته داروں كو مناصب دينے ميں كيا طرز اختيار كيا گيا اور عهده جات كى  ميں قبيله والوں كى رعائيت ركھى گئ هے يا نھيں؟&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بحث رابع:&lt;/strong&gt; اقرباء كے ليئے مالى عطيّات كى بحث &lt;br /&gt;
اس بحث ميں يه ثابت كيا گيا هے كه سيدنا عثمان رضى الله عنه كے حق ميں نا جائز طريقه سے تقسيم مال كے اعتراضات بے اصل هيں۔ انھوں نٍے جو اموال اپنے اقرباء كو ديئے تھے ان كا شرعاً جواز موجود هے۔ حدودِ شرعى سے متجاوز هونے كا پروپيگنڈا بالكل غلط هے۔ سيدنا عثمان رضى الله عنه نے اس سلسله ميں كوئى غلط كام نهيں كيا جس كى وجه سے انهيں مطعون قرار دياجائے۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بحث خامس: &lt;/strong&gt;عثمانى دور كے آخرى مراحل اور ان كا متعلقه كلام &lt;br /&gt;
عهد عثمانى پر بنيادى اعتراضات يه هيں: 1- اقرباء كو بڑے بڑے مناصب سے نوازنا۔ 2- اقرباء كو   بيت المال سے ناجائز  عطايا دينا۔ 3- بعض لوگوں كے نزديك :شريعت ميں كئى قسم كے بدعات پيدا كرنا۔&lt;br /&gt;
مذكوره الزامات كو منظم طريقه سے پھيلايا گيا اور قبائل ميں نفرت اور تعصب پيدا كر كے قتل عثمان رضى الله عنه كے لئے مناسب ماحول فساديوں و فاسقوں كى طرف سے پھيلايا گيا۔&lt;br /&gt;
بحث خامس ميں عثمانى دور كے ابتدائى  باره سال كے بعد وقوع پذير هونے والے واقعات كو ترتيب سے بيان كيا گيا هے۔ درج بالا الزامات اور فتنه شروع هونے سے لے كر  شهادت عثمان رضى الله عنه پر  بحث كى گئ هے۔&lt;br /&gt;
كتاب كے مضامين پر اجمالاً نظر كرنے سے واضح هو رها هے كه اقرباء نوازى كے مسئله ميں سيدنا عثمان رضى الله عنه حق سے منحرف نهيں هوئے اور نه هى حدِ جواز سے متجاوز هوئے۔ ان كا كردار ان كى خلافت كے دوران معيارِ عدل سے نهيں هٹا۔ اور سيدنا عثمان رضى الله عنه كے خاندان كى ملّى خدمات اسلام كے ليے نهايت سُود مند اور فائده بخش ثابت هوئيں ( جيسا كه تاريخ كے اوراق سے مصنف نے  پيش كيا  هے)۔ &lt;br /&gt;
كتاب ميں مذكور حقاق كے پيش نظر سيدنا عثمان رضى الله عنه كے خلاف اس پروپيگنڈا كى كوئى حقيقت نهيں كه اپنے اقرباء كے حق ميں ان كى غلط پاليسى كى وجه سے اس دَور ميں قبائلى عصبيّت پيدا  هوئى جس كے نتائج ميں يه تمام فتنه اور فساد برپا هوا۔ &lt;br /&gt;
اس نظريه كے خلاف واقعه هونے پر هم نے ساابقه مباحث ميں تاريخى مواد پيش كر ديا هے اس كو ملاحظه فرما كر منصف طبائع اور حقائق پسند حضرات اطمينان  حاصل كر سكيں گے۔&lt;br /&gt;
الله تعالىٰ تمام مسلمانوں كو هدايت نصيب فرمائے اور اتفاق واتحاد كى نعمت سے سرفراز فرمائے۔ اور تمام صحابه كرام اور خاندانِ نبوى رضوان الله عليهم اجمعين كے ساتھ حسنِ عقيدت اور ان كى اتباع كى توفيق بخشے اور خاتمه بالايمان نصيب فرما كر ان كى اخروى معيت سے بهره ور فرمائے۔ آمين برحمتك يا ارحم الراحمين۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1266/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;&lt;strong&gt;آپ مذكوره كتاب كو  اس لنك پر پڑھ اور ڈاؤن لوڈ كر سكتے هيں&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>حكم تجليل از روز كريسمس</title>
<link>http://qalamlib.com/news/375</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;&amp;nbsp;حكم تجليل از روز كريسمس&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;مسیحی&amp;zwnj;ها به جشن گرفتن عید میلاد مسیح علیه السلام عادت گرفته&amp;zwnj;اند، این عید هم در روزی که گمان می&amp;zwnj;کنند عیسی علیه السلام متولد شده است صورت می&amp;zwnj;گیرد، که روز 25 کانون اول (دسامبر) آخرین ماه سال میلادی می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
راه و رسم&amp;zwnj; آنها در این روز و عید این است که چراغ&amp;zwnj;های زیادی را روشن می&amp;zwnj;کنند، کلیساها را تزیین می&amp;zwnj;نمایند، خانه&amp;zwnj;ها، خیابان&amp;zwnj;ها، بازارها را زینت می&amp;zwnj;دهند، انواع شمع&amp;zwnj;های رنگارنگ و انواع چیزهای زینتی دیگر را به کار می&amp;zwnj;برند.&lt;br /&gt;
مراسم این عید را به طور رسمی و دولتی برگزار می&amp;zwnj;کنند، و در تمام دولت&amp;zwnj;هایی که دین مسیحیت دارند برای برگزاری آن اجازه رسمی داده می&amp;zwnj;شود، و مردم به این مناسبت جشن و شادی می&amp;zwnj;کنند.&lt;br /&gt;
در دین مسیحیت تشکیل مراسم عید میلاد مسیح علیه السلام کاری نوآور و بدعت می&amp;zwnj;باشد، برگزاری عید در چنین روزی بدعت است که بعد از حواریون [پیروان حضرت عیسی علیه السلام می&amp;zwnj;باشند] پیدا شده است، نه حضرت مسیح علیه السلام و نه حواریون چنین چیزی را سفارش نکرده و انجام نداده&amp;zwnj;اند. [به کتاب الجواب الصحیح، تأْلیف ابن تیمیه، (2/230) و مجموعه فتاوی ایشان، (28/611) مراجعه شود].&lt;br /&gt;
و بسیاری از مسلمانان هم در کشورهای اسلامی به این مراسم و جشن گرفتن در آن روز مبتلا شده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
تشکیل مراسم عید میلاد مسیح علیه السلام تنها به مسیحی&amp;zwnj;ها مربوط نمی&amp;zwnj;شود، بلکه بعضی از مسلمانان هم در آن شرکت می&amp;zwnj;کنند، آن مسلمانانی که در واقع شهوات نفس و هوا و هوس و شیطان آنها را برای این کار دعوت می&amp;zwnj;کند، چون در این مراسم&amp;zwnj; زنان با مردان اختلاط پیدا می&amp;zwnj;کنند، و پردة حیا و شرم به کلی زدوده می&amp;zwnj;شود، نوشیدن مسکرات، رقص زنان با مردان و سایر کارهای دیگری که گوینده از بیان آنها شرم دارد در آن صورت می&amp;zwnj;گیرد. به همین صورت است تقلیدهای کورکورانه از مسیحی&amp;zwnj;ها، و این تقالید را تقدم و پیشرفت می&amp;zwnj;&amp;zwnj;دانند، شرکت کردن با مسیحی&amp;zwnj;&amp;zwnj;ها در این جشن&amp;zwnj;ها را صورتی از صورت&amp;zwnj;های تمدن به حساب می&amp;zwnj;آورند، به همین دلیل برای حضور در این مجالس عجله می&amp;zwnj;کنند و علاقه نشان می&amp;zwnj;دهند، و این مناسبت را به مسیحی&amp;zwnj;ها تبریک و تهنیت می&amp;zwnj;گویند.&lt;br /&gt;
همة این کارها به خاطر ضعیف بودن آگاهی دینی آنها می&amp;zwnj;باشد، چون این کار آنها مخالف فرمان پیامبر صلی الله علیه وسلم می&amp;zwnj;باشد که می&amp;zwnj;فرماید که از تشبه به کفار خودداری کنید و از این معاصی و گناهان که در این مراسم&amp;zwnj;ها صورت می&amp;zwnj;گیرد نهی کرده است.&lt;br /&gt;
خداوند متعال می&amp;zwnj;فرماید: (&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;لَا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ أُولَئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الْإِيمَانَ وَأَيَّدَهُمْ بِرُوحٍ مِنْهُ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ أُولَئِكَ حِزْبُ اللَّهِ أَلَا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ) &lt;/span&gt;[مجادله: 22] &amp;laquo;مردمانی را نخواهی یافت که به خدا و روز قیامت ایمان داشته باشند ولی کسانی را به دوستی بگیرند که با خدا و پیغمبرش دشمنی ورزیده باشند، هر چند که آنان پدران یا پسران یا برادران و یا قوم و قبیلة ایشان می&amp;zwnj;باشند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
وروى البيهقي بإسناد جيد عن عبد الله بن عمرو أنه قال: &lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;(من مَرَّ ببلاد الأعاجم فصنع نيروزهم ومهرجانهم وتشبه بهم حتى يموت وهو كذلك حشرمعهم يوم القيامة).&lt;br /&gt;
بیهقی از عبد الله بن عمرو روایت می&amp;zwnj;کند که او گفت: (کسیکه به کشورهای غیر مسلمان برود ودر نوروز و دیگر اعیاد و خوشی های دینی آنها شرکت کند و مانند آنها خود را بسازد و در همان حالت بمیرد، در روز قیامت با آنها حشر خواهد شد).&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;شیخ الإسلام ابن تيميه رحمه الله &lt;/span&gt;در کتاب خود (اقتضاء الصراط المستقيم مخالفة أصحاب الجحيم) می&amp;zwnj;گوید: &amp;ldquo;مشابهت و خوشی در عیدها (وروزهای مخصوص غیر مسلمین) آنها را قلبا خوشحال می&amp;zwnj;سازد و فکر می&amp;zwnj;کنند که دین باطل شان حق است، و بیشتر بر دین باطل خود تمسک می جویند. و این امر ایشان را جرأت می&amp;zwnj;دهد تا مسلمانان ضعیف الایمان و بی بندوبار را به سوی دین باطل خود بکشانند&amp;rdquo;.&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;و ابن قیم رحمه الله در کتاب &amp;rdquo;أحکام أهل الذمة&amp;rdquo; بیان می&amp;zwnj;دارد، &lt;/span&gt;علما متفقند که تبریک جشن کریسمس و میلاد مسیح علیه السلام به کفار، حرام است. او می&amp;zwnj;فرماید: &amp;ldquo;علماء متفقند که تبریک شعائر مخصوص کفار، مانند تبریک عید یا روزه&amp;zwnj;ی ایشان، حرام است. اگر بگوید: عیدتان مبارک باد، یا نسبت به عیدشان ابراز شادی نماید، قائل به این سخن اگر کافر نشود، در واقع کار حرامی را انجام داده است. مثل این است که به شخص در حال سجده بردن برای صلیب تبریک بگوید، بلکه گناه این کار پیش الله عظیم&amp;zwnj;تر ازوقتی است که شراب خواری کند، یا بی&amp;zwnj;گناهی را به قتل برساند، و یا عمل زنا انجام دهد و به او تبریک گفته شود. بیشتر اشخاصی که دین برایشان اهمیتی ندارد دچار این گناه می&amp;zwnj;شوند، و نمی&amp;zwnj;دانند که چه عمل زشتی مرتکب شده&amp;zwnj;اند، کسی که به سبب گناهی یا بدعتی و یا کفری، به شخصی تبریک بگوید، خود را مورد خشم و غضب خداوند قرار داده است.&amp;rdquo;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;یکی از علمای حنفی بنام شیخ ابوحفص نسفی حنفی می&amp;zwnj;گوید: &lt;/span&gt;کسی که به منظور بزرگداشت این روز، تخم مرغی را به عنوان هدیه به مشرکی بدهد، او به خداوند متعال کافر شده است.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;علامه ابن عثیمین رحمه الله می&amp;zwnj;گوید: &lt;/span&gt;&amp;laquo;تبریک گفتن اعیاد دینی به کفار به این علت حرام است، چون باعث ثبات و ماندگاری ایشان بر شعائر کفر و رضایت بدان می&amp;zwnj;شود. هرچند شخص مسلمان راضی به آن کفر نباشد، برای مسلمانان حرام است که نسبت به شعائر کفر راضی باشد یا به غیر مسلمانان تبریک بگوید. سپس می&amp;zwnj;گوید: همچنین برای مسلمان حرام است که با برگزاری جشن (بدین منظور) و هدیه دادن و هدیه گرفتن از آنها، و پخش شیرینی و مهیا نمودن سفره و تعطیل نمودن کار و&amp;hellip;. خود را بدیشان شبیه نماید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;دکتر یوسف قرضاوی می&amp;zwnj;گوید: &lt;/span&gt;بزرگداشت این روز حرام است، همچنان او اضافه می&amp;zwnj;کند که حتی تولد عیسی علیه السلام در این روز نه شده، اول اینکه نصاری (عیسویان) در بین خود هم در این رابطه به دو گروه تقسیم شده اند:&lt;br /&gt;
گروه اول می&amp;zwnj;گوید که تاریخ تولد عیسی علیه السلام 25 دسمبر است، وگروه دوم تاکید می&amp;zwnj;کند که 7 جنوری است، در حالیکه هر دو گروه به خطا وغلط هستند، زیرا که تولد عیسی علیه السلام اصلا در زمستان نه بوده بلکه در روشنی قرآن این سخن آنها غلط است، الله جل جلاله در سوره مریم می&amp;zwnj;فرماید: (وَهُزِّي إِلَيْكِ بِجِذْعِ النَّخْلَةِ تُسَاقِطْ عَلَيْكِ رُطَبًا جَنِيًّا) (و تنه درخت&amp;rlm;خرما را به طرف خود بتكان بر تو خرماى تازه مى &amp;rlm;ريزد). چون در زمستان خرمای تازه در نخل نه می&amp;zwnj;باشد.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;حضور در مراسم&amp;zwnj; کریسمس و دیگر مناسبت&amp;zwnj;های مذهبی کفار، هدیه و کادو دادن به آنها، شادی، خوشحالی به مناسبت این روزها و تطعیل کردن کارهای دینی یا دنیایی حرام و خلاف شریعت، و نوعی مشابهت با آنهاست. رسول خدا صلی الله علیه وسلم می&amp;zwnj;فرمایند: &amp;laquo;من تشبه بقوم فهو منهم&amp;raquo;. &amp;laquo;کسی که خود را با شبیه قومی کند، از همان قوم بشمار می&amp;zwnj;رود&amp;raquo;. [سنن ابوداود، ابن تیمیه می&amp;zwnj;گوید: سند آن جید و خوب است و ابن حجر می&amp;zwnj;گوید: سند آن حسن است]. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 12px;&quot;&gt;به&amp;zwnj;همین مناسبت، کتابخانه عقیده تصمیم گرفت مجموعه&amp;zwnj;ای از کتاب&amp;zwnj;های مرتبط به مسیحیت را خدمت شما عزیزان تقدیم نماید تا حقیقت این دین تحریف شده برای همه آشکار گردد.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار دادن به روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;مسیحیت در آینه حقایق&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;مسیحیت را بشناسید&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;سالگردها و مناسبت های ناروا&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;ماهیت مسیحیت و کشف اسرار آن&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;رازهای پس برده کلیسا&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;صلیب شکسته&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;مسجد یا کلیسا&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;از آهنگ پاپ به آهنگ ناب&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 14px;&quot;&gt;مسیحیت در ادوار تاریخ&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>جواد الخالصي: أئمة المذاهب الأربعة لم يكونوا مخالفين لأهل البيت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/374</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;أوضح آية الله الشيخ جواد الخالصي أن أئمة المذاهب الأربعة السنية لم يكونوا يختلفوا في أصولهم عن منهج الصادق وأئمة أهل البيت رحمهم الله، وأن أئمة المذاهب السنية كانوا من تلاميذ الإمام الصادق الأوفياء.&lt;br /&gt;
جاء ذلك في خطبة الجمعة بالمدرسة الزهراء في جامعة مدينة العلم للإمام الخالصي الكبير &amp;nbsp;في الكاظمية ببغداد بتاريخ 27شوال &amp;nbsp;1430ه ـ الموافق 16 تشرين الأول &amp;nbsp;2009م، حيث استعرض آية الله الشيخ جواد الخالصي رأيين متضادين تنقلهما الروايات، الأول يشير إلى أن أئمة أهل السنة كانوا على وفاق مع الصادق وأهل البيت رحمهم الله، والثاني يشير إلى نقيض ذلك، ثم قال الخالصي: &amp;quot;لو أخذنا هذه الروايات على ظاهرها فأيهما الأصلح؟... أن تؤخذ روايات الوفاق والوئام... أم تؤخذ روايات الشقاق والاختلاف؟... لا شك أن الأصلح هو الأخذ بروايات الوفاق والوئام&amp;quot;، وقال: &amp;quot; لا شك أن العقلاء والصالحين يأخذون بروايات الوفاق والالتئام والإتباع الحسن&amp;quot;.&lt;br /&gt;
كما ذكر الشيخ جواد الخالصي في الخطبة بأنّ أتباع المذاهب الأربعة من أهل السنة والشيعة اليوم لا يخرج منهجهم جميعاً عن طريق أهل البيت، وقال الخالصي: &amp;quot;فأنني أعتقد بأمر قد يكون غريباً على كثير من الناس، وان كان الشياع المطبق على معارضته قد بدأ بالانحسار منذ زمن لا بأس به، ومن الغريب أنني سمعته من بعض كبار العلماء الذين يُحسبون على المدرسة التقليدية من الذين لا يتوقع منهم أن يقولوا مثل هذا الكلام... والقول هو بشكل مختصر: أن الذي بقي عند المسلمين اليوم ممن يسمّون بالسنة أو الشيعة هو طريق واحد.... هو طريق آل البيت (عليهم السلام)... وان اختلفت بعض الروايات وبعض الأحكام، فان الفقهاء والأئمة من الذين اتبعوا فيما يعرف اليوم بمذاهب المسلمين، طبعاً نحن لا نعترف بشيءٍ اسمه المذاهب في الإسلام -والحديث لايزال للخالصي ثم قال:- هؤلاء جميعاً كانوا من تلاميذ مدرسة أهل البيت ومن أتباعهم&amp;quot;.&lt;br /&gt;
من جهة أخرى بيّن الشيخ جواد الخالصي بأن أئمة المذاهب السنية كانوا مثل أئمة أهل البيت في عدم مداهنة الطغاة وسلاطين الجور، وقال: &amp;quot;والحقيقة أنهم لم يكونوا في يوم من الأيام على وفاقٍ مع المُلك العضوض وأصحاب المُلك العضوض... وهذا هو منهج الأئمة من آل البيت (عليهم السلام)، وهذه واحدة من تجليات إتّباعهم لائمة الهدى من آل محمد (صلى الله عليه واله وسلم)... فلا يقال إن فقهاء الأمة كانوا وعاظ سلاطين، بل على العكس تماماً، بل هم على المنهج العام الذي يقترب من منهج أهل بيت رسول الله (صلى الله عليه واله وسلم)&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
الشيخ جواد الخالصي من مواليد منطقة الكاظمية، ببغداد عام 1952م، وهو من أسرة علمية معروفة فوالده المراجع محمد الخالصي وجدّه المرجع محمد مهدي الخالصي ولكل واحد منهما بصماته التي تركها على الساحة، كما أن جواد الخالصي أمين عام التنظيم الإسلامي المعروف باسم (الحركة الإسلامية في العراق)، ويشرف على كلية مدينة العلم الجامعية بالكاظمية التي تأسست عام 2004م، وهو معروف بمواقفه المعتدلة والدعوة إلى وحدة المسلمين ونبذ الطائفية.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نص الخطبة:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;bull; تمر علينا في هذه الأيام ذكرى عظيمة وجليلة وهي واحدة من ذكريات العلم والهدى والإيمان والتقوى والصلاح، وهي ذكرى وفاة إمامنا وإمام الأمة وهادي البشرية إلى دين نبيها جدِّه المصطفى محمد(صلى الله عليه واله وسلم).... وهو الإمام جعفر بن محمد الصادق (عليهما السلام )، وقد سمعنا وسمعتم أن بعض المتكلمين من الذين يريدون أن يمدحوه (عليه السلام) كتبوا على بعض اللافتات التي رفعوها هنا وهناك بأنه سلام الله عليه مؤسس مذهب الإمامية أو الجعفرية إلى آخر هذه الأوصاف.... نحن نقول وهو الحق (إن شاء الله): أن سيدنا ومولانا أبا عبد الله جعفر الصادق (عليه السلام) لم يؤسس مذهباً ولم يَقمْ تلامذته وأتباعه والسائرون على منهجه ممن سُمّوا بأئمة المذاهب بعمل من هذا القبيل.... أي أن النعمان بن ثابت والشافعي ومالك واحمد بن حنبل والأوزاعي والثوري والليث بن سعد وكثير من الفقهاء &amp;nbsp;لم يؤسسوا شيئاً اسمه مذهب وإنما هم فقهاء يجتهدون في كتاب الله وسنة رسوله(صلى الله عليه واله وسلم) وقد شاع بين الناس أن أئمة وفقهاء المذاهب الإسلامية كانوا على النقيض من سياسة وتوجهات الأئمة من آل البيت (عليهم السلام)... وخصوصاً الإمام جعفر بن محمد الصادق (عليه السلام)، ونُقل عنهم أيضا أشياء تدل على إتباعهم واقتدائهم والتزامهم بخط الأئمة من أهل البيت، ونحن اليوم بالخيار على فرض أننا سنقبل الروايات المختلفة ولا نناقش الأسانيد ولا الدلائل ولا ظروف الروايات لكي نراها هل هي صحيحة أم خطأ!... لو أخذنا هذه الروايات على ظاهرها فأيهما الأصلح؟... أن تؤخذ روايات الوفاق والوئام... أم تؤخذ روايات الشقاق والاختلاف؟... لا شك أن الأصلح هو الأخذ بروايات الوفاق والوئام....فإذا كان هنالك إنسان من الفقهاء قد تربى في مدرسة جعفر بن محمد الصادق (عليه السلام) وتتلمذ عليه وقال (لولا السنتان لهلك النعمان)... وجاء فقيه آخر متهم بقيادة الحزب العلمي في اليمن فيُساق من هناك مكبلاً إلى بغداد ليعرض على (محكمة الثورة) آنذاك وقد اقترب هذا الرجل من الموت وكاد أن يقتل على أيدي أولئك الظالمين، لولا أن الله تعالى انطقه بكلمات معينة وتشفّع له أناس فنجي من القتل، وآخر يقول أن عمل أهل المدينة ليس المقصود منهم السقاءين والحمّالين والكسبة وضعاف الناس من عباد الله، وهم عباد مكرّمون ومحترمون، ولكن لا دور لهم في الاستدلال الفقهي حتى يكونوا مقصودين بقول هذا الرجل وهو من الفقهاء.... المقصود بأهل المدينة هم آل رسول الله (صلى الله عليه واله وسلم)، ومَنْ تتلمذ على أيديهم ومدرستهم وسار على منهجهم. وآخر يقول أن علياً (عليه السلام) قد زيّن الخلافة ولم تزينْه الخلافة، وان ما قاله رسول الله (صلى الله عليه واله وسلم) في علي (عليه السلام) لم يقله في أحد من أصحابه، والآخر يقول أن من شرف المرء أن يكون خادماً عند آل البيت.... وأحد الفقهاء قد وقف من الثوار من آل البيت كمحمد النفس الزكية وأخيه إبراهيم وقبلهما مع زيد بن علي بن الحسين (عليه السلام) وساندوا سيرة آل البيت وسُجنوا وعذبوا واضطهدوا وشردوا.... فهل من الأفضل أن نأخذ هذه السيرة الظاهرة القطعية، أو أن نأخذ بعض الروايات التي تقول أنهم قد خالفوا أهل البيت في كل شيء؟... حتى أن احدهم قال : خالفت جعفر بن محمد في كل شيء ولا أدري هل يفتح عينيه في السجود حتى أغمضهما أو يغمضهما حتى افتحهما!... هذا الكلام ليس كلام عالم ولا كلام عاقل لان العناد لا يُبنى به دين ولا تُنشأ عليه أحكام.... فما هو الصحيح الذي ينبغي أن يؤخذ من هذه الروايات التي قد تبدوا أنها مختلفة؟ ... لا شك أن العقلاء والصالحين يأخذون بروايات الوفاق والالتئام والإتباع الحسن، وعلى هذا فأنني أعتقد بأمر قد يكون غريباً على كثير من الناس، وان كان الشياع المطبق على معارضته قد بدأ بالانحسار منذ زمن لا بأس به، ومن الغريب أنني سمعته من بعض كبار العلماء الذين يُحسبون على المدرسة التقليدية من الذين لا يتوقع منهم أن يقولوا مثل هذا الكلام... والقول هو بشكل مختصر: أن الذي بقي عند المسلمين اليوم ممن يسمّون بالسنة أو الشيعة هو طريق واحد.... هو طريق آل البيت (عليهم السلام)... وان اختلفت بعض الروايات وبعض الأحكام، فان الفقهاء والأئمة من الذين اتبعوا فيما يعرف اليوم بمذاهب المسلمين (( طبعاً نحن لا نعترف بشيءٍ اسمه المذاهب في الإسلام))...هؤلاء جميعاً كانوا من تلاميذ مدرسة أهل البيت ومن أتباعهم... وقد سجنوا وعُذبَ بعضهم من أجل الموقف الصائب الذي اقتنعوا بلزوم الالتزام به....وإذا رويت روايات مخالفة فيمكن أن تحمل على محمل (( التقية)). وهذا أمر عجيب أن هشام بن الحكم وهو من تلاميذ إمامنا الصادق وغير هشام نُقلت عنهم أمور غريبة بعضها فيه التجسيم وبعضها فيه الغلو وبعضها فيه المخالفة القطعية، ولكن الرواة يقولون أن هذا الكلام الذي نقل عن هشام وعن أمثال هشام من أصحاب الأئمة (عليهم السلام) إنما قالوه تقية لكي لا يظهروا أنهم من أتباع الأئمة، لان الذي يتهم بأنه من أتباع الأئمة من أهل البيت (عليهم السلام) سيكون محكوماً عليه بالفناء وبالمتابعة والمراقبة وكتابة التقارير والإشاعات، وقد يصل الأمر إلى القتل من قبل حكام الجور والظلم ...... كان الوضع شديد الخوف وشديد الإرباك للناس كافة وبعض الفقهاء كما في كل زمان ومكان.... يوجد مصطلح معروف بين الناس عن بعض العلماء زمن الاحتلال البريطاني الأول: أنهم كانوا يسمونهم (( علماء الأوفيس)) وتعني باللغة الانكليزية الدائرة أو المكتب. فكان هؤلاء يراجعون دوائر الاحتلال البريطاني... ثم ألا يوجد (علماء) في هذا الزمان يُسمون بعلماء الاحتلال الحالي؟... وبدأ الناس يسخرون ويستهزئون بهم وينسبون فلاناً وفلاناً إلى فلان من أئمة الضلال والاحتلال... فبعض الناس في ذلك الوقت حتى من أدعياء العلم صاروا من علماء السلطان، ولكن كان هنالك علماء صالحون في كل زمان وفي كل وقت رفضوا أن يذعنوا ورفضوا أن يستسلموا ورفضوا أن يقرّوا للسلطان الطاغي الظالم بأية ولاية على المسلمين، فضلاً عن ولاية الكافر المحتل الذي جاء إلى بلادنا غصباً وظلماً وعدواناً ..... هذه صور من الحقائق التي كانت خافية على الناس سنين طويلة... وفي كل فترة كان هنالك حكام يريدون أن تبقى هذه الجهالة على وضعها لأنهم هم المستفيدين من هذه الجهالة، فإذا اعتبر الإمام أبو حنيفة والشافعي وغيرهم من الأئمة مؤيدين للسلطان العضوض المتوارث فهذا لمصلحة المُلك العضوض وأصحاب المُلك العضوض، والحقيقة أنهم لم يكونوا في يوم من الأيام على وفاقٍ مع المُلك العضوض وأصحاب المُلك العضوض... وهذا هو منهج الأئمة من آل البيت (عليهم السلام)، وهذه واحدة من تجليات إتباعهم لائمة الهدى من آل محمد (صلى الله عليه واله وسلم).&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;bull; &amp;nbsp;كان الإمام الصادق (عليه السلام) يحذر الناس من الانحراف بكل الألوان والأشكال، ويدعوهم إلى كتاب الله وسنة رسول الله وإتباع منهج الحق وإلى الخوف من الله وعدم الانحياز للظالمين.... والآية الكريمة كانت هي الشعار (( وَلاَ تَرْكَنُواْ إِلَى الَّذِينَ ظَلَمُواْ فَتَمَسَّكُمُ النَّارُ)). لا تقترب من الظالم &amp;nbsp;لان نار العذاب التي تصيبه ستصيبك أنت حين تقترب منه وتتملق له .... فالإمام الصادق (عليه السلام) كان يحذّر من الدخول في دواوين الظالمين والتعامل معهم... وقصة صفوان الجمال مشهورة ومعروفة.... صفوان الجمال كانت عنده مجاميع من الجمال يحمل عليها المسافرين، وكان يسمى بهذه المهنة...صفوان الجمّال... ذهب إلى الإمام (عليه السلام) فقال له يابن رسول الله أريد أن أُكري هذه الجمال للحاكم ليذهب عليها إلى الحج فما تقول؟... فقال له الإمام لا تفعل... فقال له لِمَ يابن رسول الله....فقال الإمام حين تكري جمالك لهذا الرجل وهو حاكم ظالم وجائر ألا تحب أن يبقى حتى يرجع فيعطيك أجرك؟... قال هذا الحب هو رغبة في بقاء الظلم ولو قليلاً. أحد الأئمة ( من أئمة المذاهب) يقول كلاماً لاحظوا اقترابه من هذا المفهوم: يقول لو دُعيت إلى بناء مسجد وعدَّ آجره (للسلطان طبعاً) ما فعلت، لأنه هذه إعانة للسلطان الظالم الجائر لبناء مسجد، لا يريد أن يعبد الله فيه وإنما يريد أن يخدع الناس.... هذا الكلام نابع من مدرسة آل محمد (صلى الله عليه واله وسلم) فلا يقال أن فقهاء الأمة كانوا وعاظ سلاطين، بل على العكس تماماً، بل هم على المنهج العام الذي يقترب من منهج أهل بيت رسول الله (صلى الله عليه واله وسلم).&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;bull; الإمام الصادق (عليه السلام) كان يعطي المواقف الفكرية والسياسية ويدعو الأمة إلى العودة إلى الله على أساس الوعي والإقناع والإفهام ومواجهة المدارس الوافدة. ناقش الفلاسفة والدهريين، وجادل الملاحدة، جلس معهم في بيت الله يناقشهم وله رواية مشهورة نقلها أحد أصحابه حول التوحيد وكيف كان يجادل المنكرين لوجود الله تعالى .... بعض الملاحدة أو الزنادقة كما يعرفون في ذلك الوقت، اتفقوا على معارضة القرآن لسنة قادمة بعد تلك السنة... جاءوا وجلسوا والتقوا في مكة، تصوروا أيها الأخوة...المؤامرة تجري على القرآن في مكة، فاعترف كل منهم انه بذل جهداً لسنة كاملة ليأتي بسورة أو يأتي بآية ليعارض بها القرآن فوجد نفسه مشغولاً طوال السنة ببلاغة آية واحدة من القرآن لم يغادرها إلى غيرها وهي قوله تعالى {وَقِيلَ يَا أَرْضُ ابْلَعِي مَاءَكِ وَيَا سَمَاء أَقْلِعِي وَغِيضَ الْمَاء وَقُضِيَ الأَمْرُ وَاسْتَوَتْ عَلَى الْجُودِيِّ وَقِيلَ بُعْدًا لِّلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ}...كانوا في اجتماعهم السري لا يعلم بهم احد فمرّ عليهم الإمام الصادق (عليه السلام) فقرأ قوله تعالى { قُل لَّئِنِ اجْتَمَعَتِ الإِنسُ وَالْجِنُّ عَلَى أَن يَأْتُواْ بِمِثْلِ هَذَا الْقُرْآنِ لاَ يَأْتُونَ بِمِثْلِهِ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ ظَهِيرًا } هذا هو الدور العظيم للأئمة عليهم السلام في كونهم أمناء الكتاب والسنة والذي هو :&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
1. الحفاظ على الكتاب والسنة من التحريف والتزييف .&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
2. الحفاظ على العدالة من ظلم الظالمين وتسلط الجائرين .&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
3. الحفاظ على الأمة من مدارس الملاحدة التي تأتي من هنا وهناك .&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
4. الحفاظ على وحدة الأمة مع الحفاظ على الكتاب والسنة .&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;bull; نستنكر بشدة تكرر الجرائم البشعة التي تصيب أهلنا في العراق وإخواننا في كل مكان، هذه الجرائم تارة تكون بالانفجارات التي لا يشك احد في أن الفاعلين لها يملكون غطاءاً ونفوذاً يمكّنهم من الوصول إلى أهدافهم!... لان أي إنسان خارج مناطق النفوذ لا يستطيع ولا يملك القدرة أن يفعل هذا الشيء... وكل المبررات التي تذكر ليس لها معنى ولا يقبلها احد من الناس... ولكن هنالك جرائم أصبحت تمسّ كثيراً من الناس، وتمسّ المجتمع وتجري دون أن يعلم أهلها أين وصل التحقيق ومَنْ هو المجرم الفاعل؟... في الجرائم التفجيرية الكبيرة يمكن أن يقال أن المجرم يتستر على نفسه، ولكن جرائم القتل والاغتيالات التي تحصل في أماكن مختلفة هي الأخرى لا تصل إلى نتيجة .... قبل فترة وجيزة دخل مجموعة على صاغة من طائفة الصابئة فقتلوهم وسرقوا مالهم، وقال بعض المسؤولين أننا وجدنا هؤلاء وأمسكنا بهم... ولكن لا أحد يدري هل أمسكوا فعلاً أم أن هذا الإعلان كبقية الإعلانات للتخدير والإسكات... وقبل أيام حصل في جوار مدينة الكاظمية شيء مهول مماثل لما جرى آنفاً ... حيث جاء أناس بملابس شبه رسمية وبسيارات لا يملكها أحد من المستضعفين والسرّاق الصغار، إنما تملكها جماعات عليها غطاء واضح، دخلوا على بعض الأسواق فقتلوا أُناساً من الأبرياء من العاملين وسرقوا المحلات وفعلوا ما فعلوا وهذا يذكرنا بسرقة مصرف ( الزوية في الكرادة )... بالله عليكم هل حصل في أسوأ أيام تاريخ العراق؟... أن يقتل أناس من أجل سرقة مصرف بهذه الطريقة البشعة! ثم تحصل بعد ذلك الاتهامات المتبادلة ويضيع الحق بعدها، كأنه الغاية ليست أظهار المجرمين وإنما الصراع على الأصوات الانتخابية التي ينتظرونها. هذا أمر غريب أن يكون هنالك أناس يفكرون بالأرباح السياسية على حساب الدماء والأعراض.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;bull; قلنا مراراً وتكراراً أن الإرهاب الذي يستهدف الناس جريمة لا يمكن أن يقبلها أحد من الخلق...ولكن القوم تعمدوا الخلط بينه وبين مَنْ رفض الاحتلال. امسكوا كثيراً من الناس ليوجهوا إليهم تهمة الإرهاب وقد اعترفوا علناً أن الذي يحارب المحتلين سيعامل نفس المعاملة، يبدوا أن الإرهاب قد اصطنع اصطناعاً حتى يحاسب المقاومون.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;bull; نقدر موقف الحكومة التركية في رفضها إجراء المناورات مع الكيان الصهيوني، لان الشعب التركي يدين الجريمة التي حصلت على غزة. حبذا لو أن المسلمين اجتمعوا على موقف من هذا القبيل، ولو فعلوا لحصلوا على أشياء عظيمة.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;bull; نستنكر بشدة قرار ما يسمى بمجلس النواب العراقي تمرير الاتفاقية الأمنية مع بريطانيا. وانتم تعلمون انه عاجز عن مناقشة أي شيء، إلا فيما يتعلق برواتب أفراده وامتيازاتهم ومخصصاتهم ( وهذا دليل آخر على وطنيتهم!!! التي يدّعونها). &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;​&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>لمحات من سيرة مهدي الخالصي (الحفيد)</title>
<link>http://qalamlib.com/news/373</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;من أبرز رجال المرجعية الخالصية المعاصرين مهدي بن محمد بن محمد مهدي الخالصي.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولد الشيخ مهدي عام 1939هـ، وكان ضمن العائدين مع والده إلى العراق عام 1945م ، وقد تعلم في الحوزة ثم أكمل دراسة الحقوق في جامعة بغداد، وخدم في الجيش العراقي وحكم عليه بالإعدام لرفضه المشاركة في قتال الاكراد، فخرج من العراق عام 1979م.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ونظراً لكونه من سلالة تتبنى آراء دينية مخالفة للتيار التقليدي فقد تعرض مهدي الخالصي لمحاولة اغتيال بعد الثورة الاسلامية في إيران، وقد ذكر لي الشخ توفيق البدري-من علماء العراق- أنه لما كان في إيران سنة1983هـ قرأ بعض الكتابات التي تقول: &amp;quot;تسقط أسرة الخالصي الوهابية&amp;quot;, يقول البدري: فرأيت مهدي بن محمد الخالصي بعدها فأخبرته, ونصحته بأن يحتاط, ولم تمض مدّة يسيرة إلا وقد تعرض مهدي للاغتيال, حيث ضرب برصاص في أسفل رأسه, ومع أنه قد نجى إلا أنها أثرت عليه بشكل كبير في حركة يده وقدرته على الكلام مدّة, وقد خرج بعدها من إيران مباشرة&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;انتقل مهدي الخالصي (الحفيد) مع بعض أسرته إلى لندن، وقد عاد إلى العراق أواخر سنة 2009م ليشرف على جامعة مدينة العلوم التي أسسها والده.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويواصل مهدي الخالصي خُطى والده في تبني موقف وآراء من شأنها نزع أسس الثقافة الطائفية، فنراه يصرح في أحد خطبه بأن &amp;quot;الذين قتلوا الحسين(عليه السلام) لا يمثلون أي طائفة من طوائف المسلمين وأنما هم سلاطين جور&amp;quot;. ويقول عن قتلة الحسين رضي الله عنه &amp;quot;لا يمثلون أية طائفة من طوائف المسلمين اليوم .. وبالعكس فان كل طوائف المسلمين إلا ما شذ وندر من الأفراد يوالون ويحبون أهل البيت (عليهم السلام) لأنهم أئمة هدى ويذمون الاستعمار والاحتلال والقوى الغاشمة&amp;quot;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;لقد كانت عودة الشيخ مهدي الخاصي وبعد عودته إلى العراق خبراً مزعجاً لبعض الطائفيين ، والذي نرجوه أن يكون له دور أكبر في تخفيف الحالة الطائفية التي سيطرت على أوضاع العراق.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولنا وقفة مع الشيخ جواد الخالصي في حلقة قادمة&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>الصفونة .. مصطلح سياسي جديد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/372</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;الصفونة.. مصطلح سياسي جديد&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;فمما لا شك فيه أن بعض المصطلحات التي تظهر على الساحة السياسية لا تسلم من جذور عقائدية توغل في صفحات التاريخ، ولا أبالغ إن أدعيت أن معظم هذه المصطلحات، وفي أحيان كثيرة النظريات السياسية تتخذ من البعد العقائدي إطاراً عاماً لها، وقد حاول ابن خلدون منذ وقت مبكر التنبيه على هذا الأساس، ويسميه بـ (العصبية)، والعصبية عند ابن خلدون هي أساس القوة، ثم هي أساس التّغلب الذي هو أساس الرّئاسة، وعنها يقول: ((ولما كانت الرياسة إنما تكون في الغلب، وجب أن تكون العصبية ذلك النّصاب أقوى من سائر العصائب ليقع الغلب بها وتتم الرياسة لأهلها، فلا يمكن أبداً الامتزاج والاجتماع والدّول بعصبيّات متكافئة القوى، فالعصبيات لابدّ أن تكون واحدة منها هي الغالبة على الكل، حتى تجمعها وتؤلفها وتصيّرها عصبية واحدة شاملة لجميع العصائب، وهي موجودة في ضمنها)) وإذا أردنا أن نطبق هذه النظرية على نشأت الدول في الماضي والحاضر لاستعر​ضنا عدداً منها، ولكن يبدو ذلك جلياً في نشأت الدولة الصفوية، ومقومات قوتها وانتشارها، وسنحاول خلال هذه الصفحات بيان العلاقة بين (الدولة الصفوية) وسياسة (الصفونة) التي انتهجتها قديماً، ولازالت هذه السياسة ظاهرة للعيان، خاصة خلال العقد الأخير، وكان له أثر واضح، وانعكاسات خطيرة على الوضع في عدد من الدول الإسلامية، ولا أدعي ابتكاري لمصطلح (الصفونة) ولكني اجتهد في تأصيله من خلال الوثائق التاريخية القديمة والمعاصرة، مع أني لم أجد من تكلم عليه قديماً وحديثاً، ولم أجده في الموسوعات السياسية أو المعاجم اللغوية، عسى أن تكون كتابتي هذه أول كتابة علمية تتناول هذا المصطلح بمفهومه السياسي العام.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;نشأت الصفونة:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;لقد مر الشرق الإسلامي بحالة من الفوضى وعدم الاستقرار منذ سقوط الخلافة العباسية على يد المغول سنة 656هـ/1258م، وقد كانت الحقبة التي تلت سقوط الخلافة في بغداد مناسبة جداً لنشوء الدويلات المتنازعة والمتنافسة فيما بينها، خاصة في خراسان وبلاد ما وراء النهر، فقد كان أحفاد (تيمور لنك) يحكمون خراسان في الوقت الذي تحكم الأسرة التركمانية اليت أطلقت على دولتها (الخروف الأسود) في قزوين، وكانت مدينة تبريز المركز المهم في بلاد خراسان، وليس بعيداً عن هذه المدينة، ومن جهتها الغربية كانت مدينة (أردبيل) نشهد حركة صوفية قوية متأثرة إلى أبعد الحدود بالمد الشيعي القادم من المراكز الشيعية في العراق (النجف)، وبرز في مدينة أردبيل رجل صوفي يعرف بـ (صفي الدين الأردبيلي) وكانت له طموحات سياسية، تضاف إلى طموحاته الدينية، واستطاع أن يحقق نجاحاً بين مريديه من خلال ربط التصوف المشهور في تلك البقاع بالتشيع، ومحاولة استغلال نقاط الاتفاق والتلاقي بين التيارين المشهورين في تلك البلاد، ولم يجد بداً من الميل نحو التشيع، خاصة مع الظهور القوي للدولة العثمانية، واجتذابها للمريدين والمتصوفة، ولم يكن ذلك مناسباً لرجل طموح مثل (صفي الدين الأردبيلي)، فمال نحو التشيع بصورة أكبر وأكثر، وأسس لنا عائلة عرفت تاريخياً باسم (العائلة الصفوية) نسبة له.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;ويعتقد بعض المؤرخين أن اسس بناء هذا الفكر العقائدي والسياسي يعود بالدرجة الأساس إلى (الشيخ الجنيد) أحد أحفاد (صفي الدين) الذي أستطاع أن يحقق حلم جده من خلال دمج التصوف بالتشيع، أما الخطوة الأهم التي قام بها الشيخ الجنيد فهو تحويله مريديه من طلاب وأتباع إلى مقاتلين أشداء، كان شعارهم (القنسوة الحمراء) ذات الشقوق الاثني عشر، وفقاً لعدد الأئمة عند الشيعة الإمامية، وقد أطلق عليهم الناس في ذلك الوقت لقب (القزلباش)، وهناك من يعتقد أن أصل أفرادها هم عبارة عن قبائل مغولية سكنت خراسان بعد احتلالها، ومن من يقول أن أصلهم تركي، ومن من يقول أن أصلهم فارسي.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;والظاهر أن جنيداً شرع في تكوين فرقة شيعية غالية، متأثراً بالمشعشعين الذي كانوا في أوج مجدهم في القرن التاسع الهجري، ويعتمد فكر هذه الفرقة &amp;ndash; اعني المشعشعين - على المهدوية وحلول روح علي بن أبي طالب في زعيمهم الفعلي علي بن محمد بن فلاح، وقد حاول متصوفة ذلك العصر ثني الجنيد عن طموحاته السياسية، وأنه: كان على طريقة الملوك لا على طريقة القوم من الصوفية، حتى عقد له مجلس محاكمة في حلب، لم يحضره الجنيد، وبدأ الطامحون والطامعون يفدون عليه، وكون جيشاً كبيراً منهم، إلا أن طموحاته السياسية انتهت بمقتله وهو في طريقه إلى أردبيل.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;ولم تقم قائمة للطريقة الصفوية إلا على يد الشاه المشهور إسماعيل بن حيدر بن الجنيد الصفوي، الذي استطاع في سنة 905هـ/1500م تكوين دولة قوية على انقاض الدويلات المتصارعة في بلاد خراسان، وقد حاول جهده استغلال حالة الضعف والتشرذم التي مر بها العالم الإسلامي في ذلك الوقت ليمد نفوذه باتجاه الغرب، فاحتل العراق سنة 914ه/1508م، ثم باتجاه الشرق، فاتحل بلاد ما وراء النهر سنة 914هـ/1514م، ولم يوقف طموحاته العسكرية إلا بعد أن اصطدم بالدولة العثمانية، وتعرض لهزيمة منكرة على يدها في معرة جالديران الشهيرة سنة 920هـ/1514م.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp; ورغم أن إسماعيل الصفوي لم يعمر كثيراً بعد ذلك، إلا أنه استطاع أن يؤسس دولة قوية، تعتمد على عقائد غالية تبناها خلال حكمه، وأصبحت السمة التي ميزت هذه الدولة، ونهجها الغالي والمتطرف في التعامل مع الخصوم.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;الدولة الصفوية:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;اعتمد إسماعيل الصفوي خلال مدة حكمه على الكثير من الخرافات التي كان يطبعها في أذهان أتباعه، فقد كان يؤكد لمريديه أنه لم يكن ليتحرك إلا بمقتضى أوامر الأئمة الاثني عشر، وأنه كان معصوماً، وليس بينه وبين المهدي فاصل، وهو المشار إليه في قوله تعالى (وأذكر في الكتاب إسماعيل)، ومما يرسخ هذه الفكرة في إذهان مريديه أنه كان يظن أن كلامه ليس مثل البشر، وإنما هو وحي يوحى، وكان يغلو في علي ويأمر أصحابه بالسجود له، بوصفه خليفة الله في الأرض كآدم لما سجد له الملائكة، قال الشوكاني: ((وكان يدعي الربوية وكان يسجد له عسكره ويأتمرون بأمره)) [1].&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;ولكن الأمر المهم في سياسة إسماعيل الصفوي هي تلك القسوة التي واجه بها مناوئيه في نشر فكره وعقائده، وقد تمثلت بالمجازر الدموية التي اتسمت بها حملاته العسكرية في مدن خراسان والعراق وما وراء النهر، خاصة تجاه الأغلبية الساحقة من سكان إيران في ذلك الوقت، والتي كانت تعتنق على مذهب أهل السنة والجماعة، ويذكر لنا علي بن سلطان القاري (ت 1014هـ) قصة مؤثرة لسياسته تجاه علماء أهل السنة في إيران، والأمر المهم في هذه القصة أنها تمثل نقل شاهد عيان عاصر الحدث ونقله لنا بامانة وعلمية، حيث يقول[2]:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;وَلقد صَدقَ الصديقي[3] في مَقامِه الحقيقي، وَوَافق كلام أستاذي المرحُوم في عِلم القراءة، مَولانا معين الدين بن الحافظ زين الدينمن أهل زيارتكاه، وهوَ أول مِنْ استشهد أيام الرافضَة في سَبيلِ الله، وَذلك أنه لما ظهَر سُلطانهم المسَمى بشاه إسمِاعيل، وَفتحَ مَلك العِراق بَعدَ القالَ والقيل، وَفشوّا القِتال وَالقتِيل، أرسَلَ إلى خراسان مكتوباً فيه إظهار غلبَته في هَذا الشأن، وكَتبَ في آخِرهِ ِسَبّ بَعض الصحَابة مِنْ الأكابر والأعيان.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;وكانَ الحِافظ المذكور خَطيباً في جامع بَلد هراة المشهُور، فأمرَ بقراءتهِ فوَقَ المنبر بالاملاء عندَ حضُور العلماء والمشَائخ وَالأمَراء، ومِنْ جُملِتهم العَلامَة الوَلي شيخ الإسلام الهروي([4])، سبط المحقق الرباني مَولانا سعد الدين التفتازاني، فلما وَصَل الخطيب إلى مَحِل السَبِّ انتقل مِنه عَلى طَريق الأدب، فتعصّب كلاَب الأرفاض لهَذَا السبب، وقالوا: تركت المقصُود الأعظم وَالمطلوب الأفخم، فأعد الكلام لتكُون على وجه التمَام، وَتوقف الَخطيبُ في ذلك المقام، فأشارَ شيخ الإسلام إليه أن يقرأ ما هو المسطور لَدَيه، لأن عَندَ الإكراه لا جناحَ عَليه، فأبى عَن السبِّ وصمم عَلى اختيار العزيمة على الرخصة الذميمة، فنـزلوُه وقتلوه وحَرقوه.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp; ثُمَّ لمَا جاءَ السلطَان إلى خراسَان، وطلبَ شيخ الإسلام وسائر أكابر الزمان، وأمرَ الشيخَ بالسبِّ في ذلك المكان، أمتنعَ عَنه رضاء للرحمةِ، فاعترضَ عَليه بأنَّك أمرتَ بِهِ الخطيب سَابقاً، فكيَفَ تخالف الأمر لاحقاً، فقالَ: ذاكَ فتوى، وَهَذا كَمَا ترى تقوى، وَأيضاً ذلكَ الوُقت كانَ أيامَ الفتنة التامة، وَهجُوم الخلائق وَالعَامة، وَرأيت اليَوم في تَخت السّلطنة التي تجبُ عليك فيه العَدَالة، وَسماعَ مَا يتعَلق بِهَذِهِ المقَالَة، وَتَصحِيح مَا يكُون العَمل بِهِ أولى في هَذِهِ الحَالَة.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;فسَألَهُ عَن كيفِيته وَتحقِيق مَاهِيته وكميته ؟.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;فقالَ له: أفعلْ أحَد هذين الشيئين مِنْ الأمرَين الحسنين:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;أولهما: أني اثبت لك أنَّ مذهب أهل السنة وَالجماعَة هو الحق وغيره هُوَ البَاطِل المطلق، وذلك بأني أظهر لكَ تصَانيفَ آبائكَ وَأجدَادكَ مِنْ المَشائخ الذين سَلَفوا في بلادكَ بخطُوطهم، وَتعمل بما في سُطوُرهم وفق مَا في صدوُرهم، وإنْ كانُوا الآن في قبورهم.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;وَثانِيهما: أنَّكَ تنادي عُلماء مذهَبك وفضلاء مشربك فتبَاحثت في مَجلسكَ، فمَنْ غَلب في الحجة نَقلاً وَعقلاً، فَيُتِبع فرعاً وأصلاً.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;فشاور وزرائه وأمرَائه وعلمائه وفقهائه، فقالُوا لهُ: هَذَا عَالمٌ كبَيرٌ وفضله كثير لا يغلبه أحَدٌ منا في الكلاَمِ، وآبائكَ وَأجدَادكَ صَنفوا في زمَان السنة، وَكانَ يجبُ عَليهم التقيَّة في هَذِهِ القضِية فتبعهم وَصَارَ مِنْ أهل الطغيان وَالكفران، كفرعَونَ حَيثُ شاورَ هَامَانَ، فقتله شهيداً وجَعلهُ سَعِيداً.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;إن هذه الحادثة التي رويت على لسان شاهد عيان من أهل هراة، وعالم مشهور له مكانته العلمية في ذلك الزمان تعطي انطباعاً واضحاً للقارئ لفهم مفهوم (الصفونة)، إذ تعتمد بالدرجة الأساس على إقصاء المخالف، وفرض العقيدة الصفوية التي تبناها إسماعيل ومن جاء بعده من أولاده، ولم يكن إسماعيل الصفوي يتمتع بأي علمية فكرية تؤهله لقيادة الشيعة الاثني عشرية في إيران، خاصة مع تطرف الفكر، وامتزاجه بسياسة التوسع والسيطرة التي جبل عليها، فكان لا بد الاستعانة بعدد من علماء الإمامية لنشر المذهب، وتأسيس مدرسة جديدة تتخذ من (الصفونة) منهجاً لها.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;وقد تمت هذه الخطوة في عهد الشاه طهماسب، الذي لم يكن بمستوى والده إسماعيل، إلا أن حاشية أبيه، والمقربين إليه من أصحاب الفكر الصفوي نصحوه باستقدام علماء الشيعة إلى إيران، ورغم وجود العديد من هؤلاء العلماء في العراق والبحرين، وحتى في إيران نفسها إلا أن الشاه طهماسب حرص على اختيار عالم من علماء الشيعة، مشهود له بالتعصب والغلو، ووقع الاختيار على الشيخ علي بن عبد العالي الكركي (ت 940هـ)، الملقب عند الشيعة بالمحقق الثاني، لينهض بأعباء هذه المهمة، فاستقدمه من جبل عامل بسوريا، وأوكل إليه مهمة تأسيس مدرسة فكرية &amp;ndash; عقائدية جديدة، وفقاً لسياسة الصفونة التي تتبناها الدولة، وقد قام الكركي بهذه المهمة أفضل قيام من خلال التأكيد على عنصرية الدولة، وتم عملياً الاستغناء عن الإمام الغائب، وتوكيل الشاه بكل صلاحياته الدينية والسياسية، وفي هذه المرحلة حصل تطور كبير إذ استنتج الكركي نظرية النيابة العامة عن الامام الغائب باعتبار ان الامام الفقيه الجامع للشروط قادر على اعطاء الشرعية للسلطان، فأجاز المحقق الكركي حكم الشاه اسماعيل وبعده الى ابنه طهاسب.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;وتعد هذه النظرية من أهم دعامات الفكر السياسي الشيعي، ذلك أنها لازالت تعتمد حتى يوم الناس هذا، وإن ظهرت بإطار آخر على يد الخميني، الذي جعل لها عنواناً جديداً هو (ولاية الفقيه)، لكن ما جاء به الخميني لم يكن من بنات أفكاره، وإنما هو تطوير أو قل تحوير لنظرية الكركي في تفويض أمور الدنيا من الإمام الغائب إلى سلطة دنيوية ممكن أن تتخذ سبيلاً جديداً يحمل على عاتقه السيطرة السياسية والفكرية على شيعة العالم من خلال القاعدة نفسها التي نادى بها أرباب الدولة الصفوية، ولكن الأمر الأخطر في هذه النظرية قائم على تفضيل العنصر الفارسي على الشعوب الإسلامية الأخرى، حتى لو كانت بعض هذه الشعوب تعتنق المذهب نفسه، كما أنها حاربت على مدار قرون طويلة ما اصطلح على تسميته بـ (التشيع المعتدل) القائم على التعايش مع أهل السنة في المناطق التي تنتشر فيها بعض الأقليات الشيعية.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;سياسة الصفونة:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;من المعروف للجميع أن العالم الغربي دعم بكل ثقله، الثورة التي قادها الخميني ضد شاه إيران، ووفر له سبل النجاح والتمكين، وفعلاً قامت في إيران دولة أطلقت على نفسها بـ (الجمهورية الإسلامية) وهي لا تحمل من الإسلام إلا اسمه، وإنما الأصح أن يطلق عليها الجمهورية الصفوية، لأنها لا تقل وحشية أو دموية عن الدولة الصفوية، وريثتها، والسائرة على نهجها.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;فمنذ تلك الأيام و حتى يومنا هذا تمارس الحكومة الأستبدادية في ايران، والتي تدّعى أنها جمهورية اسلامية، تمارس أبشع أنواع الظلم والتميز ضد علماء و دعاة و شباب و مثقفي وابناء أهل السنة.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;وهذه بعض الحقائق الثابتة حول أوضاع المأساوية التي يعيش فيها أهل السنة و الجماعة في إيران في ظل نظام الخميني:-&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;1. يتكلم حكام إيران خارج إيران عن حرية أهل السنة في بيان عقائدهم وممارسة طقوسهم، وهذا كله كذب و تضليل الناس وتشويه للحقائق، فالشيعة في ايران أحرار في نشر عقائدهم وممارسة طقوسهم وتأسيس منظمات واتحادات في حين ليس لأهل السنة شيء من هذه الحقوق بل هم يظلمون و يطردون و يسجنون و يقتلون.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;2. منع أئمة وعلماء أهل السنة من إلقاء الدروس و الخطب في المدارس والمساجد والجامعات ولا سيما القاء الدروس العقائدية، والاّ يجب أن يكون بأمر من (وزارة الارشاد الإسلامي) وتحت مراقبة وزارة الأمن و الاستخبارات ويجب أن لا يخرج الامام عن الحدود المقرر له واذا خرج فيتهمونه بالوهابيّة! أو ما شابه ذلك، بينما لأئمتهم ودعاتهم الحرية المطلقة في بيان مذهبهم بل التعدي على عقيدة أهل السنة و سب الصحابة الكرام&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;3. وضع مراكز ومساجد أهل السنة تحت المراقبة الدائمة وتجسس رجال الأمن وأفراد الاستخبارات على جوامع أهل السنة لا سيما ايام الجمعة ومراقبة الخطب والأشخاص الذين يتجمعون في المساجد أو المراكز.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;4. جميع وسائل الإعلام و النشر كالإذاعة و التلفزيون و الكتب و الجرائد و المجلات مسخرة لأئمتهم وأبناء طائفتهم ليستخدمونها كما يشاءون في حين ليس لأهل السنة سهم في تلك الوسائل بل تستعمل هذه الوسائل لضربهم و تضعيفهم.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;5. حرمان شباب وأبناء أهل السنة لاسيما المثقفين منهم من تأسيس منظمات و تنظيم ندوات واجتماعات خاصة بهم مهما تكون نوعها أو حجمها.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;6. منع بيع وشراء وانتشار الكتب الاعتقادية لأهل السنة، ومنع كتب العلماء البارزين مثل كتب الامام ابن تيمية و ابن القيم ومحمد بن عبد الوهاب و علماء أخرون.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;7. منع دخول أي كتاب أو أية منشورات أو مجلات إسلامية من الدول العربية أو الإسلامية الاّ بعد أن تمرّ بـ (وزارة الارشاد الاسلامي) وتوافق هي عليها.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;8. ان أهل السنة في ايران محرومون من بناء المساجد والمراكز والمدارس في المناطق التي الأكثرية للشيعة، فمثلاّ: يعيش في طهران حوالي مليون شخص من أهل السنة ولكن ليس لديهم أي مسجد أو مركز يصلون أو يجتمعون فيه، بينما توجد كنائس للنصارى واليهود ومعابد للمجوس، كل ذلك تحت ذريعة الحفاظ على وحدة المسلمين (السنة و الشيعة) وتجنب التفرقة بينهم في حين للشيعة مساجد وحسينيات ومراكز في المناطق التي الأكثرية للسنة، ويجب أن نشير الى أن هناك مدن كبيرة ليست فيها أي مسجد لأهل السنة مثل مدن: اصفهان، يزد، شيراز، ساوة، كرمان وغيرها من المدن. والحكومة الايرانية قد قرّرت عدم السماح ببناء أي مسجد لأهل السنة في العاصمة طهران وفي مشهد وشيراز.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;9. هدم واغلاق المساجد و المدارس والمراكز الدينية لأهل السنة.، مثل: هدم مسجد (جامع شيخ فيض) الواقع في شارع خسروي في مدينة مشهد بمحافظة خراسان في 18/7/1994 م و تحويله الى حديقة للأطفال.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;10. اغلاق عشرات المساجد و المراكز الدينية مثل: مدرسة ومسجد نور الإسلام في مدينة جوانرو في كردستان، مسجد ومدرسة شيخ قادر بخش البلوشي في محافظة بلوشستان، مسجد لأهل السنة في هشت ثر في محافظة جيلان، مسجد حاج أحمد بيك في مدينة سنندج، مركز محافظة كردستان، مسجد في كنارك في ميناء ضابهار ببلوشستان، مسجد في مدينة مشهد في شارع 17 شهريور، مسجد الإمام الشافعي في محافظة كرمانشاه في كردستان، مسجد أقا حبيب الله في مدينة سنندج بكردستان، مسجد الحسنين في شيراز، مسجد ومدرسة خواجة عطا في مدينة بندر عباس بمحافظة هرمزكان، مسجد النبي في مدينة ثاوة في كردستان، مدرسة مولانا جلال الدين منصور أقايى، مدرسة خليل الله في مدينة سنندج.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;11. اعتقال وسجن عدد كبير جداَ من الشيوخ الأفاضل والعلماء البارزين وطلبة العلم والشباب المخلصين الملتزمين دون أي ذنب أو ارتكاب أية جريمة فقط لأنهم متمسكين بعقيدتهم الاسلامية ويدافعون عن الحق ويطالبون بحقوقهم الشرعية. منهم: مولانا عبدالله قهستانى، الشيخ عبد العزيز سليمى، الشيخ أحمد رحيمى، مولانا إبراهيم دامني، مولانا عبد الغني شيخ جامى، مولانا عبد الباقي شيرازي، مولانا سيد أحمد حسينى، الشيخ عبد القادر عزيزى، الشيخ عبدالله حسينى، مولانا جوانشير داوودى، مولانا نورالدين كردار، مولانا سيد محمد موسوى، الشيخ عمر شابرى السنندجى، مولانا غلام سرور سربازى، الشيخ خالد رحمتى وعدد كثير من أعضاء منظمتنا (منظمة خبات الثورية الاسلامية في كردستان ايران) و أعضاء (مكتب القرآن) و تنظيمات أسلامية أخرى.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;12. قتل أو اغتيال أو اختطاف ثم اعدام العشرات من العلماء و الدعاة البارزين و المئات بل الألاف من المثقفين و طلبة العلم و الشباب الملتزمين من أهل السنة و الجماعة. منهم: الشيخ العلامة ناصر سبحانى، الشيخ عبدالوهاب صديقى، الشيخ العلامة أحمد مفتى زادة، الشيخ الدكتور علي مظفريان، الشيخ عبدالحق، الشيخ الدكتور أحمد ميرين سياد البلوشي، الشيخ محي الدين خراسانى، المهندس فاروق فرصاد، الشيخ العلامة والقاريء الكيبر محمد ربيعي، الاستاذ ابراهيم صفي زادة، الشيخ نظر محمد البلوشي، الشيخ دوست محمد البلوشي، الشخ محمد ضيائي، الشيخ عبدالملك ملازادة، الشيخ عبدالناصر جمشيد زهي، الشيخ القاضي بهمن شكوري اضافة الى مئات من أعضاء منظمة خبات الثورية الاسلامية في كردستان ايران و التنظيمات الاسلامية الأخرى.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;أما جرائمهم ضد بيت الله الحرام في مكة المكرمة، فهي تذكرنا بما فعله من قبل أجدادهم القرامطة، فقد حاولوا طوال عشر سنوات من عمر الجمهورية الصفوية زعزعة الأمن والاستقرار في بيت الله الحرام وفي مواسم الحج، ففي عام 1406 عرض التلفزيون السعودي صور لمادة (TNT) وهي عبارة عن عجائن متفجرة أدخلوها إلى البلاد المقدسة، كما قام الرافضة ينددون بأمريكا بالسكاكين وجميع أنواع الأسلحة البيضاء أين في حرم الله الآمن في شهر الله الحرام 6/12/1407هـ.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family:Traditional Arabic,geneva,sans-serif;&quot;&gt;خلاصة القول:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;يمكن القول بصورة مجملة أن الصفونة هي عبارة عن حركة عنصرية تتخذ التشيع غطاء لها للوصول إلى تحقيق منجزات سياسية واقتصادية وفكرية، وتعتمد على تفضيل العنصر الفارسي على غيره من العناصر الأخرى، وإن كانت تشاطها العقيدة نفسها، وقد اعتمدت على أسس الحركات العنصرية التي ظهرت عبر التاريخ، خاصة فيما يتعلق بسياستها تجاه خصومها، وتركيزها على حكم (الفقيه) صاحب السلطة المطلقة المستمدة من الإمامة الغائبة، كما حملت بين طياتها عقدة الاضطهاد، المتمثلة بوجود أقليات من الشيعة في بعض البلدان الإسلامية، فكانت سياسة التدخل في شؤون الغير هي السمة الغالبة على ولاية الفقيه، وإن كانت تخفي بين طياتها طموحات توسعية، وليس أدل على ذلك مما يحدث في العراق حالياً من إقصاء التيار الشيعي المعتدل، وغالبة الغلاة على مقدرات التشيع فيه، بل غلبة العنصر الفارسي على المراجع الدينية في كل من النجف وقم، وترسيخ عقيدة الازداء ضد العرب خاصة، حتى لو كانوا من علماء الشيعة أنفسهم، ولعل افضل مثال على ذلك: الحملة التي شنت ضد محمد حسين فضل الله المرجع اللبناني المشهور، أما في العراق: فقد تم إقصاء كل المراجع العربية من أمثال: الشيخ جواد الخالصي، ومحمود الصرخي، وحسين المؤيد عن سدة الفتوى والتقليد عند عوام الشيعة وتمت محاربة جهودهم الإصلاحية للتقريب بين الشيعة وأهل السنة ووضع العراقيل أمام ظهورهم الإعلامي وبالتالي تحجيم دورهم السياسي والاجتماعي وحتى الديني عند الشيعة العرب.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;([1]) البدر الطالع: 1/271.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;([2]) شم العوارض في ذم الروافض: ص 41 وما بعدها.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;([3]) هو قطب الدين محمد بن الشيخ أبي الحسن محمد بن محمد الشافعي الأشعري المصري الصديقي البكري، يعود نسبه إلى أبي بكر الصديق، برع في الكلام والتفسير والأصول، وفاته سنة 993هـ. النور السافر: ص 369 ؛ شذرات الذهب: 4/431.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size:24px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Traditional Arabic, geneva, sans-serif;&quot;&gt;&amp;nbsp;([4]) هو سيف الدين أحمد بن محمد بن سعد الدين مسعود التفتازاني الحنفي، يعرف بحفيد التفتازاني، رئيس العلماء بهراة، قتل سنة 916هـ. هدية العارفين: 1/138.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>حقیقت عاشورا</title>
<link>http://qalamlib.com/news/371</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علاوه بر ماه مبارك رمضان، گرفتن روزه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; نفلی كه مسلمان را به خداوند نزدیك می&amp;zwnj;كند، از پیامبر بزرگوارمان حضرت محمد صلى الله علیه وآله وسلم ثابت است و امتش را نیز به آن ترغیب و تشویق نموده است چنانكه آنحضرت صلى الله علیه وآله وسلم فرموده است: &amp;laquo;كسیكه یك روز، در راه خدا (بخاطر رضای خدا) روزه بگیرد، خداوند رویش را از آتش دوزخ به اندازه&amp;zwnj;ی هفتاد سال دور نگه می&amp;zwnj;دارد&amp;raquo;. [صحیح بخاری 2/316] و در حدیث قدسی از آنحضرت صلى الله علیه وآله وسلم روایت است كه خداوند می&amp;zwnj;فرماید: &amp;raquo;هر عمل فرزند آدم برای خود اوست غیر از روزه كه آن برای من است و من پاداش آن را می&amp;zwnj;دهم&amp;laquo;. [صحیح مسلم 2/807] به همین منظور&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt; پیامبر گرامی اسلام صلى الله علیه وآله وسلم به روزه گرفتن بعضی از روزهای سال ترغیب نموده&amp;zwnj;اند تا سبب كامیابی و پیروزی بنده&amp;zwnj;ی مسلمان در آخرت گردد، و از جمله&amp;zwnj;ی این روزها، روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا كه موضوع بحث ما خواهد بود، عاشورا روز دهم ماه محرم است كه خداوند گناهان یكسال گذشته را برای روزه&amp;zwnj;دار در این روز می&amp;zwnj;بخشد،&lt;/span&gt; از ابی قتاده رضی الله عنه روایت است كه آنحضرت صلى الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;فرموده است: &amp;raquo;امیدوارم كه خداوند روزه&amp;zwnj;ی عاشورا عاشورا را سبب كفاره&amp;zwnj;ی گناهان سال گذشته قرار دهد&amp;laquo;. [صحیح مسلم 2/819]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;عاشورا در زبان عربی:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
روز دهم ماه محرم را عاشورا گویند، زیرا عدد ده را در عربی عشر می&amp;zwnj;گویند و این كلمه به چند لفظ مختلف در كتابهای لغت عربی ذكر شده است مانند عاشوراء - عشوراء - عاشورا - عشورا- عاشور بر وزن هارون در بعضی از كتاب های قاموس عربی، عاشورا روز نهم محرم را نیز گفته اند و علمای لغت در اصل كلمه&amp;zwnj;ی عاشورا اختلاف دارند، بعضی می&amp;zwnj;گویند عاشورا كلمه&amp;zwnj;ی عربی است و بعضی دیگر عاشورا را كلمه&amp;zwnj;ی عبرانی خوانده اند. [المصباح المنیر ص156، دایرة المعارف بستانی 11/445، لسان العرب 4/569،و القاموس المحیط صـ565، لسان العرب 4/569،و القاموس المحیط صـ565].&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;سبب نامگذاری عاشورا به این اسم:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
در مورد نامگذاری این روز به نام عاشورا اقوال و روایات متعددی ذكر شده است بعضی می&amp;zwnj;گویند كه سبب نامگذاری عاشورا به این نام همانا دهم ماه محرم است و این قول واضح&amp;zwnj;تر و نزدیك&amp;zwnj;تر به دهم ماه محرم است، و گفته شده است كه عاشورا روزی است كه خداوند تعالی ده پیامبرش را با ده كرامت افتخار بخشیده است كه از قرار ذیل است.&lt;br /&gt;
اول: در این روز، خداوند موسی علیه السلام را نصرت بخشید، در دریا راه را برایش باز نمود تا از چنگ فرعون نجات یافت و فرعون با لشكرش غرق گردید.&lt;br /&gt;
دوم: در این روز كشتی نوح علیه السلام با سلامتی در جودی استقرار یافت.&lt;br /&gt;
سوم: در این روز یونس علیه السلام از شكم نهنگ نجات یافت.&lt;br /&gt;
چهارم: در این روز خداوند توبه&amp;zwnj;ی آدم علیه السلام را پذیرفت.&lt;br /&gt;
پنجم: در این روز یوسف علیه السلام از قعر چاه تاریك بیرون آورده شد.&lt;br /&gt;
ششم: در این روز عیسی علیه السلام به دنیا آمد و در همین روز به آسمان برده شد.&lt;br /&gt;
هفتم: در این روز خداوند داود علیه السلام را مورد عفو و بخشش خود قرار داد.&lt;br /&gt;
هشتم: در این روز ابراهیم علیه السلام چشم به جهان گشود.&lt;br /&gt;
نهم: در این روز چشمان یعقوب علیه السلام دو باره روشن گردید و بینا شد.&lt;br /&gt;
دهم: در این روز گناهان گذشته و آینده&amp;zwnj;ی پیامبر بزرگ اسلام صلی الله علیه وآله وسلم بخشیده شد. [عمدة القاری 11/117]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;امر به روزه گرفتن عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
هنگامیكه پیامبر گرامی مان حضرت محمد صلی الله علیه وآله وسلم در ماه ربیع الاول سال اول هجری به مدینه&amp;zwnj;ی منوره هجرت كردند، و ماه محرم سال دوم هجری را در مدینه سپری نمودند، دیدند كه یهود در روز عاشورا روزه می&amp;zwnj;گیرند، زیرا پیامبرشان موسی علیه السلام این روز را روزه می&amp;zwnj;گرفت. آن حضرت صلی الله علیه وآله وسلم یارانش را به روزه گرفتن این روز امر نمود. صبح روز دهم محرم بود كه آن حضرت صلی الله علیه وآله وسلم دستور دادند تا همگی این روز را روزه بگیرند در حالیكه بعضی از مردم مانند روزهای دیگر شروع به خوردن و نوشیدن كرده بودند، آن حضرت صلی الله علیه وآله وسلم به قریه&amp;zwnj;ها و دهكده&amp;zwnj;های اطراف مدینه نیز اشخاصی فرستاد تا به مردم اطلاع دهند كه روزه بگیرند و كسانیكه در این روز شروع به خوردن و نوشیدن نموده بودند نیز از خوردن و نوشیدن امتناع ورزند و بقیه&amp;zwnj;ی روز را روزه بگیرند، در این مورد احادیث زیادی روایت شده است كه از آنجمله: از سلمه بن اكوع رضی الله عنه روایت است كه آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم به مردی از قبیله&amp;zwnj;ی اسلم امر نمود تا به مردم اعلان نماید، كسی كه تا حالا نخورده است روزه بگیرد زیرا امروز روز عاشورا است. [بخاری 2/59]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;منسوخ شدن فرضیت روزه&amp;zwnj;ی عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
در ماه شعبان سال دوم هجری، خداوند روزه&amp;zwnj;ی ماه مبارك رمضان را بر مسلمانان فرض گردانید، پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم یارانش را از روزه&amp;zwnj;ی عاشورا منع نكرد و نه دوباره چنانكه در سال اول هجری امر نموده بود امر فرمود ولی به گرفتن روزه&amp;zwnj;ی عاشورا تشویق و ترغیب می&amp;zwnj;نمود زیرا پاداش و ثواب زیادی در آن نهفته است، پس اگر كسی روز عاشورا روزه بگیرد اجر و پاداش می&amp;zwnj;گیرد و كسیكه روزه نگیرد، ایرادی بر او نیست. [فقه السنة 1/433] از پیامبر بزرگ اسلام حضرت محمد صلی الله علیه وآله وسلم روایاتی نقل است كه دلالت واضح به منسوخ بودن فرضیت روزه&amp;zwnj;ی عاشورا می&amp;zwnj;نماید بنابراین گرفتن آن اختیاری است. از آنجمله: از عایشه رضی الله عنها روایت است كه فرمود: آن حضرت صلی الله علیه وآله وسلم امر به روزه&amp;zwnj;ی عاشورا نمود ولی هنگامی كه روزه&amp;zwnj;ی رمضان بر او فرض گردید فرمود: &amp;laquo;هركسی می&amp;zwnj;خواهد، روز عاشورا روزه گیرد و هر كسیكه نمی خواهد نگیرد&amp;raquo;. [صحیح بخاری 2/58]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;تعیین روز عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
در مورد تعیین روز عاشورا سه دیدگاه وجود دارد: عده&amp;zwnj;ای گفته اند كه روز عاشورا نهم محرم است، ولی اكثر علما بر این رأی هستند كه روز دهم ماه محرم روز عاشوراست كه این دیدگاه راجح و مستدل است و رأی دیگر، روز یازدهم ماه محرم را روز عاشورا می&amp;zwnj;داند. [عمدة القاری 11/117] دلایل زیادی وجود دارد كه روز دهم محرم روز عاشورا می&amp;zwnj;باشد و نیز آنچه كه میان علمای سلف و خلف مشهور و معروف است این است كه عاشورا روز دهم ماه محرم می&amp;zwnj;باشد&amp;raquo;. [شرح مسلم از نووی 8/12]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;حكم روزه گرفتن عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
علما اتفاق دارند كه روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا سنت است. در مورد این كه آیا در ابتدای اسلام قبل از فرضیت رمضان روزه&amp;zwnj;ی عاشورا واجب بود یا مستحب؟ دو قول مشهور از علما وجود دارد كه صحیح&amp;zwnj;ترین این دو قول این است كه روزه&amp;zwnj;ی عاشورا در ابتدای اسلام واجب بود و سپس حكم آن مستحب گردید، زیرا پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم بعد از فرضیت رمضان كسی را به گرفتن روزه&amp;zwnj;ی عاشورا امر ننمود. [مجموع فتاوی از ابن تیمیه 25/311] ملاعلی قاری رحمة الله علیه می&amp;zwnj;گوید: این حدیث دلالت صریح بر واجب بودن روزه&amp;zwnj;ی عاشورا قبل از فرضیت رمضان می&amp;zwnj;نماید كه بعداً منسوخ گردید و حكم سنت را بخود گرفت.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;حكمت روزه&amp;zwnj;ی عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
عبدالله بن عباس رضی الله عنهما حكمت روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا را چنین بیان می&amp;zwnj;كند: زمانیكه پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم به مدینه منوره هجرت نمود، یهود را دید كه روز عاشورا روزه می&amp;zwnj;گیرند حضرت (علیه السلام) از آنها پرسید: &amp;raquo; این چه روزی است؟&amp;laquo; گفتند: این روز نیكی است، روزیكه خداوند بنی اسرائیل را از چنگ دشمن نجات بخشید، لذا موسی علیه السلام این روز را روزه گرفت. آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم فرمود: &amp;raquo;من از شما به موسی نزدیكترم&amp;laquo;. همین بود كه این روز را روزه گرفت و امتش را به روزه گرفتن این روز خجسته امر فرمود. [صحیح بخاری 3/58]. پس حكمت از گرفتن روزه&amp;zwnj;ی عاشورا همانا شكر گذاری خداوند بخاطر نجات موسی علیه السلام از فرعون است، و هر كه اینروز را روزه بگیرد واقعاً در شكر گذاری خداوند با موسی علیه السلام اشتراك نموده است و این اجر و پاداش بزرگ را غنیمت شمرده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;انواع روزه&amp;zwnj;ی عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
علما روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا را به چهار نوع تقسیم نموده اند كه از قرار ذیل می&amp;zwnj;باشد:&lt;br /&gt;
نوع اول: روزه گرفتن نهم، دهم و یازدهم محرم.&lt;br /&gt;
نوع دوم: روزه گرفتن نهم و دهم محرم.&lt;br /&gt;
نوع سوم: روزه گرفتن نهم و دهم یا دهم با یازدهم محرم.&lt;br /&gt;
نوع چهارم: روزه گرفتن دهم محرم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;نوع اول روزه گرفتن نهم و دهم و یازدهم محرم.&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;این نوع بهترین و افضلترین انواع فوق بشمار می&amp;zwnj;رود &lt;/strong&gt;و دلیل افضلیت آن حدیث ابن عباس رضی الله عنه است كه آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم فرمود: &amp;raquo;روز عاشورا را روزه بگیرید و با یهود مخالفت نمایید، یك روز قبل و یك روز بعدش را نیز روزه بگیرید&amp;laquo;. [شعب الامان از بیهقی 3/365]&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;نوع دوم: روزه گرفتن نهم و دهم محرم.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;دراین مورد احادیث زیادی وارد است كه بطور نمونه حدیثی را كه امام مسلم از ابن عباس رضی الله عنهما روایت كرده است ذكر می&amp;zwnj;نمائیم: هنگامیكه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم روز عاشورا را روزه گرفت و امتش را به روزه گرفتن این روز امر فرمود یاران آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: ای رسول خدا، این روز با عظمتی نزد یهود و نصاری است، آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم فرمود: &amp;raquo;هر گاه سال آینده اینروز فرا رسید إن شاءالله روز نهم را نیز روزه خواهیم گرفت. [مسلم 2/798] و در روایت دیگری چنین آمده است: &amp;raquo;اگر زنده بودیم با آنها مخالفت می&amp;zwnj;ورزیم و روز نهم را روزه می&amp;zwnj;گیریم&amp;laquo;. [طبرانی در معجم كبیر 11/131]&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;نوع سوم: روزه گرفتن نهم و دهم و یا دهم با یازدهم ماه محرم.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;دلیل این نوع حدیث ابن عباس رضی الله عنهما است كه آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم در مورد روزه&amp;zwnj;ی عاشورا فرموده است: اینروز &amp;laquo;عاشورا&amp;raquo; را روزه بگیرید و یكروز قبلش و یا یك روز بعدش را نیز روزه بگیرید و با یهود مشابهت اختیار نكنید&amp;raquo;. [شرح معانی الآثار از طحاوی 2/78]&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;نوع چهارم: روزه گرفتن دهم محرم به تنهائی.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;این مرتبه از پائین&amp;zwnj;ترین مراتب روزه&amp;zwnj;ی عاشورا می&amp;zwnj;باشد و دلیل آن حدیث عایشه رضی الله عنها است كه فرموده است: آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم روز دهم محرم را به روزه گرفتن امر فرمود. [مجمع الزواید از هیثمی 3/189] بعضی از علماء روزه گرفتن دهم محرم را به تنهائی مكروه گفته اند، مگر حكم نمودن به كراهیت آن بطور قطعی درست نبوده زیرا پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم در طول حیاتش عاشورا را بطور منفرد روزه می&amp;zwnj;گرفت و در آخر آرزو داشت تا در سال آینده روز نهم را با دهم محرم روزه بگیرد. [حاشیة ابن عابدین 2/375، معارف السنن از كشمیری 6/112، الفتاوی الهندیة 1/202]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;فضیلت روز عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;روز عاشورا روز مبارك، باعظمت و دارای فضیلت های بی شماری است كه روزه گرفتن درین روزخجسته میان همه پیامبران پیشین معروف و مروج بوده است. &lt;/span&gt;نوح علیه السلام بخاطر بجا آوردن شكر خداوند كه او را از قومش نجات داد این روز را روزه می&amp;zwnj;گرفت. همچنین موسی علیه السلام اینروز را روزه گرفته است تا شكر خداوند را بخاطر نجات یافتنش از فرعون و قومش بجا آورد، چنانكه یهود این روز را روزه می&amp;zwnj;گیرد و نصاری این روز را باعظمت می&amp;zwnj;شمارند، قریش نیز احترامی ویژه به این روز داشتند لذا پوشش كعبه در روز عاشورا صورت می&amp;zwnj;گرفت و اینروز را روزه نیز می&amp;zwnj;گرفتند، به همین منظور پیامبر بزرگ اسلام صلی الله علیه وآله وسلم روز عاشورا را گرامی می&amp;zwnj;داشت و در انتظار رسیدن اینروز میمون می&amp;zwnj;بود. از ابن عباس رضی الله عنهما روایت است كه می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;من پیامبر خدا صلی الله علیه وآله وسلم را ندیدم كه روزه&amp;zwnj;ای را بر دیگر روزه&amp;zwnj;ها بهتر بشمارد و در جستجوی آن باشد، مگر روزه&amp;zwnj;ی عاشورا و این ماه: یعنی ماه رمضان&amp;raquo;. [بخاری 2/59]&lt;br /&gt;
به این معنی احادیث زیادی روایت شده است كه همه دلالت بر فضیلت روزه گرفتن عاشورا بعد از ماه رمضان می&amp;zwnj;كند، لذا &lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم به روزه گرفتن عاشورا مداومت می&amp;zwnj;نمود،&lt;/span&gt; از حفصه رضی الله عنها روایت است كه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم چهار چیز را هیچگاه ترك نمی&amp;zwnj;كرد: روزه&amp;zwnj;ی عاشورا، روزه&amp;zwnj;ی ده روز ذی الحجه، روزه&amp;zwnj;ی سه روز از هرماه و دو ركعت نماز قبل از چاشت&amp;laquo;. [سنن نسائی 4/220]&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا گناهان سال گذشته را محو می&amp;zwnj;كند &lt;/span&gt;چنانكه از ابی&amp;zwnj;قتاده روایت است كه از رسول خداصلی الله علیه وآله وسلم در مورد روزه&amp;zwnj;ی عاشورا پرسیده شد آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم در جواب فرمود: &amp;raquo;گناهان سال گذشته را محو می&amp;zwnj;كند&amp;laquo; [مسلم 2/819] و مراد از محوگناهان همانا گناهان صغیره است، اگر گناه صغیره نداشته باشد پس امید است از گناهان كبیره&amp;zwnj;اش كاسته شود، اگر گناه كبیره نیز نداشت پس مرتبه و مقام این مؤمن ارتقا می&amp;zwnj;یابد. [مسلم 2/819]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;بدعت هایی كه در عاشورا صورت می&amp;zwnj;گیرد و باید از آن دوری جست:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
در این روز با عظمت و مبارك مردم بدعت هایی را اختراع نموده و مرتكب اعمال زشت و ناپسند می&amp;zwnj;گردند، شیخ الاسلام می&amp;zwnj;نویسد: شیطان بعد از شهادت حضرت حسین رضی الله عنه توانست دو بدعت طی آن ایجاد نماید: یكی بدعت ماتم و عزاداری و زدن به سر و صورت، و گریه و فغان و تشنگی كشیدن و مداحی و نوحه سرایی كه طی آن بزرگان صدر اسلام مورد لعن و طعن قرار می&amp;zwnj;گیرند، حتی كسانیكه در جرم شهادت حضرت حسین رضی الله عنه دست نداشتند مورد لعن و دشنام قرار می&amp;zwnj;گیرند و قصه&amp;zwnj;ها و حكایت&amp;zwnj;های كاذب و دروغینی را ساخته&amp;zwnj;اند، این اعمال باعث گردید تا در میان مسلمانان اختلاف و تفرقه ایجاد گردد. ماتم گرفتن و عزاداری كردن و گریه و فغان بر مردگان باتفاق همه&amp;zwnj;ی مسلمانان جایز نیست. و اینكه بر غم&amp;zwnj;ها و مصیبت&amp;zwnj;های گذشته، ناله و فغان صورت گیرد از گناهان بزرگ بشمار می&amp;zwnj;رود كه خداوند و پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم از آن منع نموده اند، همچنانكه بدعت شادی و سرور در روز عاشورا درست نیست و پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و خلفای بعد از ایشان اینكار را سنت نگذاشته اند، پس اینروز نه روز شادی و سرور است و نه روز غم واندوه. [منهاج سنت 2/322، مجموع فتاوی25/310 وكشاف القناع 2/396]&lt;br /&gt;
از دیگر بدعت ها در این روز پختن حبوبات و توزیع آن بر فقرا و مساكین است. و ادعا دارند كه اینكار ثواب زیادی دارد، ولی تشخیص كارهایی كه ثواب دارد دلیل قاطع كه از پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم ثابت شده باشد می&amp;zwnj;خواهد، لیكن دلیلی وجود ندارد پس این كار بدعت و گمراهی می&amp;zwnj;باشد. [دین خالص از سبكی 8/417]&lt;br /&gt;
و از دیگر بدعت های اختراع شده در این روز، پوشیدن لباس جدید، و خرج و خوراك خیلی خوب و خریدن ضروریات منزل و سرمه كشیدن و حنا كردن و غسل نمودن، دید و بازدیدها و زیارت مساجد و قبرستانها و آرامگاه&amp;zwnj;ها، و دیگر بدعتهایی كه نه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و نه خلفای راشدین و نه علمای بزرگ اسلام مانند امامان چهار مذهب اهل سنت و نه اوزاعی و ثوری و اسحق بن راهویه و لیث و غیره این اعمال را انجام داده و سنت گذاشته اند. [فتاوی شیخ الاسلام 25/312] احادیثی كه درین مورد ذكر است همه موضوع و ساختگی است.&lt;br /&gt;
از بدعت هایی كه بعضی از زنان در این روز به آن اعتقاد دارند، حنا كردن است كه گویا اگر كسی اینكار را نكرد حق عاشورا را ادا ننموده است، همچنین خریدن عنبر و چوب خوش بو و دود نمودن آن، كه گویا اگر اینكار صورت نگیرد گناه بزرگی مرتكب شده اند. عجیب اینكه همین چوب را تا سال آینده نگه میدارند و در طول سال از آن استفاده می&amp;zwnj;كنند و معتقدند كه اگر دود و بوی خوش آن به زندانی برسد از زندان رها خواهد شد. همچنین اعتقاد دارند كه این خوش بوئی علاج نظر و مرض است. چنین اعتقادی خطرناك است و دلیل قاطع و محكم می&amp;zwnj;طلبد، اما دلیلی وجود ندارد و این گونه اعمال را زنها از خودشان اختراع نموده اند.&lt;br /&gt;
پیامبرگرامیمان صلی الله علیه وآله وسلم ارتكاب هر گونه بدعت در دین خدا، و عمل نمودن به آن را به شدت منع نموده اند. و اینرا واضح كرده اند كه خداوند را باید مطابق سنت و عملكرد پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم عبادت كرد، و نه بر حسب گفته و اختراعات دیگران. چنانكه میفرمایند: &amp;laquo;هركس عملی انجام دهد كه دین ما آنرا تأیید نكند مردود است&amp;raquo;.&amp;zwnj; [متفق علیه] یعنی: هر كاری كه مطابق سنت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم نباشد مردود بوده و قابل قبول نیست.&lt;br /&gt;
پس بدعت هایی كه ذكر شد در عهد پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و یارانش و در عهد تابعین وجود نداشته، بلكه بعد از شهادت حضرت حسین رضی الله عنه در سال 61 هجری ظاهر گردید، و در سال های بعد خصوصاً در عهد دولت فاطمیان اشكال مختلفی بخود گرفت و در اكثر كشور های شیعه نشین مانند ایران، عراق و بعضی مناطق مصر و لبنان و هند و پاكستان و افغانستان بشكل عجیبی انتشار یافت.&lt;br /&gt;
پس برادر و خواهر مسلمان! باید در راه از بین بردن بدعت ها كوشا باشیم، و در روز عاشورا به هر مسلمانی كه آغشته&amp;zwnj;ی بدعت است دوستانه بفهمانیم كه این اعمال نادرست است و او را تشویق به ترك آن كنیم تا همه مان در دنیا و آخرت رستگار گردیم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;ماتم در روزعاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;شیعیان در روز عاشورا ماتم و سوگواری اعلان می&amp;zwnj;كنند، و لباس سیاه می&amp;zwnj;پوشند و اظهار غم و اندوه می&amp;zwnj;نمایند&lt;/span&gt;، در بعضی مناطق شیعه نشین مغازه ها بسته می&amp;zwnj;شود، زنان و مردان به خیابان می&amp;zwnj;آیند و خود را با زدن قمه و زنجیر زخمی می&amp;zwnj;كنند و گریه و ناله و فریاد سر می&amp;zwnj;دهند و با نوحه خوانی و با نثار كلمات زشت و لعن و نفرین گویا از قاتلین حضرت حسین رضی الله عنه انتقام می&amp;zwnj;گیرند خلاصه &lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;در این روز اعمالی صورت می&amp;zwnj;گیرد كه با عقل سلیم موافق نیست و بدعت هایی كه مخالف شرع است و با روح و تعالیم اسلام سازگاری ندارد.&lt;/span&gt; خداوندمتعال و پیامبربزرگوارمان صلی الله علیه وآله وسلم به ما نفرموده اند كه بر مرگ پیامبران پیشین ماتم و سوگواری نمائیم، پس چطور بر مرگ كسانیكه مرتبه&amp;zwnj;ی آنها پائین تر از انبیا است سوگواری می&amp;zwnj;نماییم؟! نه از پیامبر گرامی مان صلی الله علیه وآله وسلم نقل شده و نه از مسلمانان صدر اسلام كه آنها بر مصیبتی ماتم و عزا گرفته باشند.&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;شهادت حضرت حسین رضی الله عنه هر مسلمانی را غمگین و ناراحت می&amp;zwnj;كند زیرا ایشان نوه&amp;zwnj;ی عزیز پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و از سرداران بزرگ اسلام و از علمای صحابه&amp;zwnj;ی كرام بود، وی مرد عابد، شجاع و سخاوتمندی بود، ولی باید پذیرفت آنچه را كه شیعیان در روز عاشورا بخاطر شهادتش انجام میدهند نادرست است، و این كارها ساختگی است و جنبه&amp;zwnj;ی نمایشی دارد و الا پدر ایشان علی رضی الله عنه افضل و بهتر از او بود، چرا برای شهادتش ماتم نمی&amp;zwnj;كنند؟! همچنین عثمان رضی الله عنه در نزد اهل سنت از علی رضی الله عنه بهتر است ولی در روز شهادتش كسی عزاداری نمی كند.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;همچنین عمر رضی الله عنه بهتر از عثمان رضی الله عنه بود ولی برای شهادت ایشان كسی عزاداری نمی&amp;zwnj;كند. همچنین ابوبكر صدیق رضی الله عنه از عمر رضی الله عنه بهتر بود ولی در روز وفاتش كسی عزاداری نمی كند، از همه برتر خود پیامبرگرامی اسلام صلی الله علیه وآله وسلم كه سردار جهانیان در دنیا و آخرت است خداوند روحش را مانند سائر انبیاء علیهم السلام قبض كرد ولی هیچكس برای ایشان عزاداری نكرد. [بدایه ونهایه 8/205]&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;بر هر مسلمانی واجب است كه در وقت مصیبت از صبر و شكیبائی كار بگیرد و بگوید: &lt;/strong&gt;&amp;laquo;إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَیهِ رَاجِعُونَ&amp;raquo;. تا اینكه خداوند و پیامبرش از این عمل خشنود و راضی گردند. &amp;raquo;وَبَشِّرِ الصَّابِرِینَ *الَّذِینَ إِذَا أَصَابَتْهُمْ مُصِیبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَیهِ رَاجِعُونَ&amp;laquo;. ترجمه: &amp;laquo;و مژده بده به بردباران.كسانی كه هر گاه بلائی به آنها برسد میگویند: ما از آن خدائیم و بسوی او باز میگردیم&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;پس به سر و صورت زدن و گریبان پاره نمودن و دعاهای زمان جاهلیت، همه حرام و نا مشروع است &lt;/strong&gt;و پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم از چنین اعمالی اظهار بیزاری نموده است چنانكه می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;آنكه بر رویش زده و گریبان پاره كند و دعاهای جاهلیت را بخواند از ما نیست&amp;raquo;. [بخاری 1/398]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;گلچینی از روایات اهل بیت علیهم السلام&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
1-(صوموا العاشوراء- هكذا- التاسع والعاشر فإنه یكفر ذنوب سنة). از امام صادق و ایشان از پدرش امام باقر علیهما السلام روایت می&amp;zwnj;كند كه علی (علیه السلام) فرمود:&amp;zwnj; &amp;laquo;در عاشورا روزه بگیرید، نهم و دهم زیرا كه گناه یك سال را می&amp;zwnj;بخشد&amp;raquo;. [تهذیب الأحكام 4/299 ، الإستبصار 2/134]&lt;br /&gt;
2- (صوموا یوم عاشوراء التاسع و العاشر احتیاطاً فإنه كفارة السنة التی قبله و إن لم یعلم به أحدكم حتى یأكل فلیتم صومه). از علی (علیه السلام) روایت است كه فرمود: &amp;laquo;نهم و دهم عاشورا احتیاطاٌ روزه بگیرید، زیرا كه این كفاره&amp;zwnj;ی گناهان سال گذشته است اگر كسی یادش نبود و خورد هر وقت یادش آمد از همان لحظه روزه اش را تكمیل كند&amp;raquo;. [مستدرك الوسائل 1-594]&lt;br /&gt;
3-(إذا رأیت هلال المحرم فاعدد فإذا أصبت من تاسعة فأصبح صائماً قلت (أی الراوی): كذلك كان یصوم محمد صلى الله علیه وآله وسلم قال: نعم). از ابن عباس رضی الله عنهما روایت است كه فرمود: &amp;laquo;هر گاه ماه محرم شروع شد، بشمار، به روز نهم كه رسیدی روزه بدار- راوی می&amp;zwnj;گوید: گفتم آیا حضرت محمد صلی الله علیه وآله وسلم در چنین روز، روزه می&amp;zwnj;گرفتند؟ فرمودند: بله&amp;raquo;. [إقبال الأعمال ص554 وسائل الشیعة 7/347]&lt;br /&gt;
4- از الفاظ رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم كه بهتر از آن نمی توان یافت این است: &amp;laquo;النیاحة من أعمال الجاهلیة&amp;raquo;. [من لایحضره الفقیه 4/271-272]&lt;br /&gt;
5- جابر رضی الله عنه از پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم روایت می&amp;zwnj;كند كه فرمودند: &amp;laquo;من شما را از نوحه كردن و از دو صدای احمقانه و فاجرانه نهی كردم، یكی صدای موسیقی كه ساز شیطان است و صدایی كه در هنگام مصیبت بلند می&amp;zwnj;شود كه صورت خراش می&amp;zwnj;دهند و گریبان پاره می&amp;zwnj;كنند، و ناله و فغان می&amp;zwnj;كشند&amp;raquo;. [مستدرك الوسائل 1/145]&lt;br /&gt;
6- امام صادق (علیه السلام) می&amp;zwnj;فرماید: (لایصلح الصیاح على المیت ولاینبغی و لكن الناس لایعرفون). [كافی 3/266] یعنی: &amp;laquo;شیون كشیدن بر مرده درست و شایسته نیست ولی مردم نمی دانند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
7- از امام صادق یا باقر علیهما السلام پرسیده شد كه نماز با كلاه سیاه چگونه است؟ فرمودند: &amp;laquo;با آن نماز نخوان،&amp;zwnj; زیرا كه رنگ سیاه لباس اهل دوزخ است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
(لاتصل فیها فإنها لباس أهل النار).&lt;br /&gt;
8- ا&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 0, 0);&quot;&gt;مام حسین علیه السلام فرمود: &amp;laquo;خواهرم!&amp;zwnj; قسمت می&amp;zwnj;دهم، قسمم را نشكن، هر گاه شهید شدم هرگز برای من گریبان پاره نكن و صورت نخراش و واویلا نكن&amp;raquo;.&lt;/span&gt; &amp;laquo;یا أختی إنی أقسمت علیك فأبریء قسمی لا تشقی علی جیباً و لا تخمشی علی وجهاً و لا تدعی علی بالویل إذا أنا هلكت&amp;raquo;. [مستدرك الوسائل 1/144- مظالم آهل البیت264 - علی خطی الحسین 116- تظلم الزهراء 190]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;به مناسبت عاشورا کتابخانه عقیده تصمیم گرفت مجموعه&amp;zwnj;ای از کتاب&amp;zwnj;های مرتبط به این روز را خدمت شما عزیزان تقدیم نماید تا مسلمانان از حقیقت روز عاشورا آگاه شوند همچنين راهی از راه&amp;zwnj;های شيطان كه بعضی از برادران و خواهران ما را به بيراهه برده است مسدود گردد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می&amp;zwnj;توانند با فشار دادن به روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;حقيقت عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;روز عاشورا را چگونه بگذرانيم؟&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;حقیقت زندگی حسین شهید&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;قاتلان حسين رضي الله عنه را بشناسيد&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;احكام ميت و آداب سوگوارى&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>ماهِ محرم كی شرعی اور تاريخی حيثيت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/370</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 16px;&quot;&gt;ماهِ محرم كی شرعی اور تاريخی حيثيت&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(51, 51, 204);&quot;&gt;&lt;strong&gt;شیخ الحدیث مولانا محمد صاحب کنگن پوری&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;محرم الحرام چار حرمت والے مہینوں میں سے ایک اور اسلامی سال کا پہلا مہینہ ہے۔ یہ مہینہ جہاں کئی شرعی فضیلتوں کا حامل ہے وہاں بہت سی تاریخی اہمیتیں بھی رکھتا ہے۔&lt;br /&gt;
کیونکہ اسلامی تاریخ کے بڑے بڑے واقعات اس مہینہ میں رونما ہوئے بلکہ یوں کہنا زیادہ صحیح ہو گا کہ نہ صرف تاریخ اُمت محمدیہ کی چند اہم یاد گاریں اس سے وابستہ ہیں بلکہ گزشتہ اُمتوں اور جلیل القدر انبیاء کے کارہائے نمایاں اور فضلِ ربانی کی یادیں بھی اپنے دامن میں سمیٹے ہوئے ہے۔ لیکن شرعی اصولوں کی روشنی میں جس طرح دوسرے شہور و ایام کو بعض عظیم الشان کارناموں کی وجہ سے کوئی خاص فضیلت و امتیاز نہیں ہے۔ اسی طرح اس ماہ کی فضیلت کی وجہ بھی یہ چند اہم واقعات و سانحات نہیں ہیں بلکہ اللہ تعالیٰ نے اشہرِ حُرُم (ذوالقعدہ، ذوالحجہ، محرم اور رجب) کو ابتدائے آفرینش سے ہی اس اعزاز و اکرام سے نوازا ہے&lt;br /&gt;
جس کی وجہ سے دورِ اسلام اور دورِ جاہلیت دونوں میں ان مہینوں کی عزت و احترام کا لحاظ رکھا جاتاتھا اور بڑے بڑے سنگدل اور جفا کار بھی جنگ و جدال اور ظلم و ستم سے ہاتھ روک لیتے تھے۔ اس طرح سے کمزوروں اور ناداروں کو کچھ عرصہ کے لئے گوشۂ عافیت میں پناہ مل جاتی تھی۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;اچھے یا برے دن منانے کی شرعی حیثیت: &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
اسلام نے واقعاتِ خیر و شر کو ایام کی معیارِ فضیلت قرار نہیں دیا بلکہ کسی مصیبت کی بنا پر زمانہ کی برائی سے اللہ تعالیٰ نے منع فرمایا ہے اور قرآن مجید میں کفار کے اس قول کی مذمت بیان کی ہے: ﴿وَمَا يُهۡلِكُنَآ إِلَّا ٱلدَّهۡرُ﴾ [الجاثية: ٢٤] یعنی ہمیں زمانہ کے خیر و شر سے ہلاکت پہنچتی ہے۔ &lt;br /&gt;
اور حدیث میں ہے: &lt;br /&gt;
&amp;rsquo;&amp;rsquo;زمانہ کو گالی نہ دو کیونکہ برا بھلا اللہ تعالیٰ کے ہاتھ میں ہے۔&amp;lsquo;&amp;lsquo;(بخاری و مسلم)&lt;br /&gt;
یعنی خیر و شر کی وجہ لیل و نہار نہیں ہیں بلکہ خدا کارسازِ زمانہ ہے۔ یہی وجہ ہے کہ شریعت نے اچھے یا بُرے دِن منانے کی کوئی اصل ہی تسلیم نہیں کی جیسا کہ آج کل محرم کے علاوہ بڑے بڑے لوگوں کے دن یا سالگرہ وغیرہ منائی جاتی ہیں۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;فضیلتِ محرم قرآن کریم سے: &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
خصوصی طور پر ماہِ محرم یا اس کے بعض ایام کی فضیلت کے متعلق میں پہلے قرآن و حدیث سے کچھ عرض کرتا ہوں، قرآن مجید میں ہے:۔ &lt;br /&gt;
﴿إِنَّ عِدَّةَ ٱلشُّهُورِ عِندَ ٱللَّهِ ٱثۡنَا عَشَرَ شَهۡرٗا فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ يَوۡمَ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ مِنۡهَآ أَرۡبَعَةٌ حُرُمٞۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلۡقَيِّمُۚ فَلَا تَظۡلِمُواْ فِيهِنَّ أَنفُسَكُمۡ﴾ الاٰية (التوبة: ۳۶)&lt;br /&gt;
بے شک شریعت میں ابتدائے آفرینش سے اللہ تعالیٰ کے ہاں بارہ ۱۲ ماہ میں جن سے چار حرمت والے ہیں، یہی مستحکم دین ہے۔ تم ان مہینوں کی حرمت توڑ کر اپنی جان پر ظلم نہ کرو۔ &lt;br /&gt;
تفسیر جامع البیان ص ۱۶۷ میں ہے: &lt;br /&gt;
فَاِنَّ الظُّلْمَ فِيْها اَعْظَمُ وِزْرًا فِيْمَا سِوَاهُ وَالطَّاعَةُ اَعْظَمُ اَجْرًا &lt;br /&gt;
یعنی ان مہینوں میں ظلم و زیادتی بہت بڑا گناہ ہے اور ان میں عبادت کا بہت اجر و ثواب ہے۔ &lt;br /&gt;
تفسیر خازن جلد ۳ ص ۷۳ میں ہے: &lt;br /&gt;
وإنما سميت حرما لأن العرب في الجاهلية كانت تعظمها وتحرم فيها القتال حتى لو أن أحدهم لقي قاتل أبيه وابنه وأخيه في هذه الأربعة الأشهر لم يهجه ولما جاء الإسلام لم يزدها إلا حرمة وتعظيما ولأن الحسنات والطاعات فيها تتضاعف وكذلك السيئات أيضا أشد من غيرها فلا يجوز انتهاك حرمة الأشهر الحرم&lt;br /&gt;
یعنی ان کا نام حرمت والے مہینے اس لئے پڑ گیا کہ عرب دورِ جاہلیت میں ان کی بڑی تعظیم کرتے تھے اور ان میں لڑائی جھگڑے کو حرام سمجھتے تھے حتیٰ کہ اگر کوئی شخص اپنے یا بیٹے یا بھائی کے قاتل کو بھی پاتا تو اس پر بھی حملہ نہ کرتا۔ اسلام نے ان کی عزت و احترام کو اور بڑھایا۔ نیز ان مہینوں میں نیک اعمال اور طاعتیں ثواب کے اعتبار سے کئی گنا بڑھ جاتی ہیں۔ اسی طرح ان میں برائیوں کا گناہ دوسرے دنوں کی برائیوں سے سخت ہے۔ لہٰذا ان مہینوں کی حرمت توڑنا جائز نہیں۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;فضیلتِ محرم احادیث سے:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
آیت مذکورہ بالا کی تفسیر سے محرم الحرام کی فضیلت اور اس ماہ کی عبادت کی اہمیت معلوم ہو چکی ہے۔ اب ہم احادیث سے صرف مزید وضاحت اور بعض ایام کی خوصی فضیلت پیش کرتے ہیں۔&lt;br /&gt;
ماہِ محرم کے روزے: &lt;br /&gt;
عن ابی هريرة رضی الله تعالیٰ عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أفضل الصيام بعد رمضان شهر الله المحرم وأفضل الصلوة بعد الفريضة صلٰوة الليل )اخرجہ مسلم ص ۳۶۸ ج۱، ایضا ابو داؤد، الترمذی، النسائی)&lt;br /&gt;
رمضان کے بعد سب سے افضل روزے ماہِ محرم کے روزے ہیں اور فرض نمازوں کے بعد سب سے افضل رات کی نماز (تہجد) ہے۔ &lt;br /&gt;
عن ابن عباس رضي الله تعالى عنهما قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من صام يوم عرفة كان له كفارة سنتين ومن صام يوما من المحرم فله بكل يوم ثلاثون يوما۔ (رواه الطبراني في الصغير وهو غريب واسناده لا بأس به) (الترغيب والترهيب ص ۲۳۷)&lt;br /&gt;
رسول اللہ صلى الله عليه وسلم نے فرمایا کہ عرفہ کے دن کا روزہ دو سال کے گناہوں کا کفارہ ہے اور جو محرم کے روزے رکھے اسے ہر روزہ کے عوض تیس روزوں کا ثواب ملے گا۔ &lt;br /&gt;
(یہ روایت اگرچہ اس پائے کی نہیں لیکن ترغیب و ترہیب میں قابلِ استیناس ہے) نیز حضرت علیؓ سے روایت ہے کہ: &lt;br /&gt;
ایک آدمی نے آنحضرت صلى الله عليه وسلم سے سوال کیا کہ رمضان کے بعد میں کس ماہ میں روزے رکھوں؟ آپ نے فرمایا: محرم کے روزے رکھ! کیونکہ وہ اللہ کا مہینہ ہے، اس میں اللہ تعالیٰ نے ایک قوم کی توبہ قبول کر لی اور ایک اور قوم کی توبہ قبول کرے گا۔ ) الترغیب والترھیب ص ۲۳۶)&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;عاشوراء کا روزہ: &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
ماہِ محرم میں روزوں کی فضیلت کے متعلق اگرچہ عمومی طور پر صحیح احادیث وارد ہیں، جیسا کہ ابھی گزرا لیکن خصوصی طور پر یومِ عاشوراء یعنی دس تاریخ محرم کے بارے میں کثرت سے احادیث آئی ہیں۔ جو اس دن کے روزے کی بہت فضیلت بیان کرتی ہیں بلکہ بعض روایات کے مطابق رمضان شریف کے روزوں سے قبل عاشوراء کا روزہ فرض تھا۔ (جیسا کہ بعض شوافع کا قول ہے) (فتح الباری)&lt;br /&gt;
پھر جب رمضان کے روزے فرض ہوئے تو اس دن کے روزے کی صرف تاکید باقی رہ گئی۔&lt;br /&gt;
اب قارئین اس سلسلہ میں وارد احادیث ملاحظہ فرمائیں: &lt;br /&gt;
عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: ما رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يتحرى صيام يوم فضله علي غيره إلا هذا اليوم يوم عاشوراء وهذا الشهر يعني رمضان (أخرجه البخاري ومسلم)&lt;br /&gt;
ابن عباس فرماتے ہیں کہ میں نے نبی صلى الله عليه وسلم کو کسی دن کے روزے کا دوسرے عام دنوں کے روزوں پر افضل جانتے ہوئے ارادہ کرتے ہوئے نہیں دیکھا جس طرح ہ یومِ عاشوراء اور ماہِ رمضان کا (اہتمام کرتے ہوئے دیکھا ہے)۔ &lt;br /&gt;
عن أبی قتادة رضی الله عنه قال: سُئِلَ عَنْ صَوْمِ يَوْمِ عَاشُورَاءَ؟ فَقَالَ: &amp;laquo;يُكَفِّرُ السَّنَةَ الْمَاضِيَةَ&amp;raquo; (اخرجه مسلم ج ۱ ص ۳۶۸(&lt;br /&gt;
ابو قتادہؓ فرماتے ہیں کہ رسول اللہ صلى الله عليه وسلم سے عاشوراء کے روزہ کے متعلق سوال ہوا تو آپ نے فرمایا کہ اس سے ایک سال گزشتہ کے گناہ معاف ہو جاتے ہیں۔ &lt;br /&gt;
عن حفصة رضي الله عنها قالت اربع لم يكن يدعھن النبي (صلى الله عليه وسلم) صيام عاشوراء ۔۔۔۔۔ الحديث (اخرجه النسائي)&lt;br /&gt;
آپ چار چیزیں نہ چھوڑا کرتے تھے۔ ان میں سے ایک عاشوراء کا روزہ ہے۔ الخ&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;عاشوراء کا روزہ اور یہود: &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
عن ابن عباس رضی الله عنها ان رسول الله صلى الله عليه وسلم قدم المدينة فوجد اليهود صياما يوم عاشوراء فقال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما هذا اليوم الذي تصومونه؟ فقالوا: هذا يوم عظيم انجي الله فيه موسٰي وقومه وغرق فرعون وقومه نصامه موسٰي شكرا فنحن نصومه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فنحن احق واولٰي بموسٰي منكم فصامه رسول الله صلى الله عليه وسلم وامر بصيامه ) اخرجه البخار و مسلم(&lt;br /&gt;
رسول اللہ صلى الله عليه وسلم جب مدینہ منورہ تشریف لائے تو یہود کو عاشوراء کے دن کا روزہ رکھتے ہوئے پایا۔ آنحضرت صلى الله عليه وسلم نے ان سے روزہ رکھنے کی وجہ دریافت کی تو انہوں نے جواب دیا، یہ بہت بڑا دن ہے، اس میں اللہ تعالیٰ نے موسیٰ اور اس کی قوم کو نجات دی تھی اور فرعون اور اس کی قوم کو غرق کیا تھا (اس پر) موسیٰ علیہ السلام نے (اس دن) شکر کا روزہ رکھا۔ پس ہم بھی ان کی اتباع میں روزہ رکھتے ہیں۔ آپ صلى الله عليه وسلم نے فرمایا، ہم تمہاری نسبت موسیٰ علیہ السلام کے زیادہ قریب اور حق دار ہیں لہٰذا آپ صلى الله عليه وسلم نے خود روزہ رکھا اور (صحابہؓ کو) اس دن کا روزہ رکھنے کا حکم فرمایا۔ &lt;br /&gt;
اس حدیث سے عاشوراء کے روزہ کا مسنون ہونا ثابت ہوا۔ دیگر روایات سے معلوم ہوتا ہے کہ بعد میں نبی صلى الله عليه وسلم نے یہود کی مشابہت سے بچنے کے لئے اس کے ساتھ نویں محرم کا روزہ رکھنے کا بھی ارادہ ظاہر فرمایا ( رواہ رزین)۔ اور مسند احمد کی اک روایت میں گیارہ محرم کا بھی ذکر ملتا ہے یعنی ۹ محرم یا ۱۱ گیارہ۔&lt;br /&gt;
یومِ عاشوراء اور عرب عاشوراء کے دن کی فضیلت عرب کے ہاں معروف تھی۔ اس لئے وہ بڑے بڑے اہم کام اسی دن سر انجام دیتے تھے۔ مثلاً روزہ کے علاوہ اسی روز خاہ کعبہ پر غلاف چڑھایا کرتے تھے۔ &lt;br /&gt;
حافظ ابن حجرؒ نے بحوالہ ازرقی ذکر کیا ہے کہ &amp;rsquo;&amp;rsquo;حضرت امیر معاویہ رضی اللہ عنہ نے بھی عاشوراء کے روز خانہ کعبہ کو غلاف چڑھایا۔&amp;lsquo;&amp;lsquo; (فتح الباری ج ۳ ص ۳۶۷)&lt;br /&gt;
حاصل یہ ہے کہ اللہ ارحم الراحمین اور نبی رحمۃ للعالمین (صلى الله عليه وسلم) نے امتِ مسلمہ کو ماہِ محرم کی برکات و فیوض سے مطلع کر دیا ہے اور بعض ایام میں مخصوص اعمال کی فضیلت سے بھی آگاہ کر دیا ہے تاکہ ہم شریعت کے ہدایات کے مطابق عمل کر کے سعادتِ دارین حاصل کر سکیں۔ &lt;br /&gt;
اللہ تعالیٰ کا فضل و کرم دیکھیے کہ تھوڑے تھوڑے عرصہ کے بعد وہ ہمیں کتنے عظیم الشان مواقع مہیا کرتا ہے جن سے فائدہ اُٹھاتے ہوئے ہم فیضانِ رحمت سے دامن بھر سکیں اور تلافیٔ مافات کرتے ہوئے اسی کی اطاعت و فرمانبرداری کے لئے کمر بستہ ہو سکیں۔ &lt;br /&gt;
رمضان خیر و برکت کی بارانی کرتا ہوا گزرا تو شوال اشہر الحج (شوال، ذی القعدہ اور ذی الحجہ) کی نوید لایا پھر ذی الحجہ ختم ہوا ہی تھا کہ حرمت و عظمت میں اس کا شریک کار سن ہجری کا پہلا مہینہ اپنی برکات و فیوض سے ہم پر آسایہ فکن ہوا۔ گویا سدا رحمت برس رہی ہے۔ &lt;br /&gt;
کاش کوئی جھولی بھرنے والا ہو! انسان کو چاہئے کہ ان مبارک اوقات کو غنیمت جانے اور اعمالِ صالحہ صوم و صلوٰۃ، ذکر و فکر، جہد و جہاد میں مصروف رہ کر اپنے آقا کو خوش کرے اور خداوندِ عزوجل کا قرب حاصل کر کے منزل مقصود پر پہنچ جائے لیکن یہ دیکھ کر بڑا دکھ ہوتا ہے کہ ہم ان ایام و شہور کی اصل برکتوں سے محروم رہ کر غلط رواجات اور قبیح رسومات میں مبتلا ہو کر یا ان میں شرکت کر کے ارحم الراحمین کی رحمت بے پایاں سے تہی دامن رہتے ہیں بلکہ اُلٹا گناہ گار ہو کر اس کے غضب کے مستحق ٹھہرتے ہیں۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;strong&gt;ماہِ محرم کی بدعات: &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
ہم نے ماہِ محرم سے بہت سے غلط رواج وابستہ کر لیے ہیں، اسے دکھ اور مصیبت کا مہینہ قرار دے لیا ہے جس کے اظہار کے لئے سیاہ لباس پہنا جاتا ہے۔ رونا پیٹنا، تعزیہ کا جلوس نکالنا اور مجالس عزاء وغیرہ منعقد کرنا یہ سب کچھ کارِ ثواب سمجھ کر اور امام حسین رضی اللہ عنہ سے محبت کے اظہار کے طور پر کیا جاتا ہے۔ &lt;br /&gt;
حالانکہ یہ سب چیزیں نہ صرف نبی صلى الله عليه وسلم کے فرمودات کے خلاف ہیں بلکہ نواسۂ رسول صلى الله عليه وسلم کے اس مشن کے بھی خلاف ہیں جس کے لئے انہوں نے اپنی جان قربان کر دی۔ شیعہ حضرات کی دیکھا دیکھی خود کو سنی کہلانے والے بھی بہت سی بدعات میں مبتلا ہو گئے ہیں مثلاً اس ماہ میں نکاح شادی کو بے برکتی اور مصائب و آلام کے دور کی ابتداء کا باعث سمجھ کر اس سے احتراز کیا جاتا ہے اور لوگ اعمالِ مسنونہ کو چھوڑ کر بہت سی من گھڑت اور موضوع احادیث پر عمل کرتے ہیں۔ &lt;br /&gt;
مثلاً بعض لوگ خصوصیت سے عاشوراء کے روز بعض مساجد و مقابر کی زیارتیں کرتے اور خوب صدقہ و خیرات کرتے ہیں اور اس دن اہل و عیال پر فراخی کرنے کو سارے سال کے لئے موجبِ برکت سمجھا جاتا ہے وغیرہ وغیرہ۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;کیا ماہِ محرم صرف غم کی یادگار ہے؟ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
شہادت حسینؓ اگرچہ اسلامی تاریخ کا بہت بڑا سانحہ ہے لیکن یہ صرف ایک واقعہ نہیں جس کی یاد محرم سے وابستہ ہے بلکہ محرم میں کئی دیگر تاریخی واقعات بھی رونما ہوئے ہیں جن میں سے اگر چند ایک افسوسناک ہیں تو کئی موقعے ایسے بھی ہیں جن پر خوش ہونا اور خدا کا شکر بجا لانا چاہئے ۔&lt;br /&gt;
جیسا کہ نبی اکرم صلى الله عليه وسلم نے موسیٰؑ کی اقتداء میں عاشورے کے دن شکر کا روزہ رکھا کہ اللہ تعالیٰ نے اس دن موسیٰؑ کو فرعون سے نجات دی تھی۔ نیز اگر اتفاق سے شہادتِ حسینؓ کا المیہ بھی اسی ماہ میں واقع ہو گیا تو بعض دیگر جلیل القدر صحابہؓ کی شہادت بھی تو اسی ماہ میں ہوئی ہے۔ مثلاً سطوتِ اسلامی کے عظیم علمبردار خلیفہ ثانی حضرت عمر بن الخطاب رضی اللہ عنہ اسی ماہ کی یکم تاریخ کو حالت نماز میں ابو لؤلؤ فیروز نامی ایک غلام کے ہاتھوں شہید ہوئے۔ &lt;br /&gt;
اس لئے شہادتِ حسینؓ کا دن منانے والوں کو ان کا بھی دن منانا چاہئے لیکن حقیقت یہ ہے کہ اگر اسلام اسی طرح دن منانے کی اجازت دے دے تو سال کا کوئی ہی ایسا دن باقی رہ جائے ا جس میں کوئی تاریخی واقعہ یا حادثہ رونما نہ ہوا ہو اور اس طرح مسلمان سارا سال انہی تقریبات اور سوگوار ایام منانے اور ان کے انتظام میں لگےے رہیں گے۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;آزمائشیں دنیا کی امامت اور حیات جاودانی بخشتی ہیں: &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
پھر یہ بھی یاد رکھنا چاہئے کہ دنیا دار البلاء اور امتحان گاہ ہے۔ اس دنیا میں ہر نبی اور امت پر کٹھن وقت آئے ہیں صرف بنی اسرائیل ہی کو لیجئے۔ ان پر کس قدر آزمائشیں آئیں؟ کس قدر انبیاء بے دریغ قتل کئے گئے؟ کتنے معصوم بچے ذبح ہوئے؟ جس کا اعتراف قرآن کریم نے بھی کیا ہے: &lt;br /&gt;
وَفِيْ ذٰلِكُمْ بَلَاءٌ مِّنْ رَّبِّكُمْ عَظِيْمٌ ---- یعنی اس میں تمہارے رب کی طرف سے بہت بڑی آزمائش تھی &lt;br /&gt;
ہمارے نبی صلى الله عليه وسلم فداہ ابی و امی، اہل بیت، صحابہ رضوان اللہ علیہم اجمعین اور سلف و خلف میں ائمہ دین رحمۃ اللہ علیہم اجمعین پر ایسی ایسی مشکل گھڑیاں آئیں کہ ان کے سننے سے ہی کلیجہ منہ کو آتا ہے۔ &lt;br /&gt;
بعثت سے لے کر واقعہ کربلا اور پھر کربلا سے لے کر اب تک اسلامی تاریخ کا کونسا ایسا ورق ہے جو اس قسم کے دِل ہلا دینے والے واقعات سے خالی ہو؟ نبی صلى الله عليه وسلم کی مکی زندگی اور اسلام قبول کرنے والوں کے دل دوز حالات اور پھر مدنی زندگی اور حق و باطل کے معرکے کس قدر جگر سوز ہیں۔ کیا شہادت حمزہؓ، شہادتِ عمرؓ، شہادتِ عثمانؓ، شہادتِ علیؓ، شہادت عبد اللہ بن زبیرؓ اور شہادت جگر گوشۂ رسول صلى الله عليه وسلم حسینِ کے لرزہ خیز حالات سننے کی تاب کسی کو ہے؟ لیکن یہی آزمائشں تو انہیں امامت کے منصب پر فائز کرتی ہیں اور حیات جاودانی بخشتی ہیں۔ &lt;br /&gt;
قرآن مجید میں ابو الانبیاء حضرت ابراہیمؑ کے متعلق اللہ تعالیٰ فرماتے ہیں کہ انہیں دنیا کی امامت آزمائشوں میں کامرانی کے بعد ہی ملی تھی۔ ارشاد ہے: &lt;br /&gt;
(وَاِذِ ابْتَلٰيْٓ اِبْرَاهِيْمَ رَبُّهُ بِكَلِمٰتٍ فَاَتمَّهُنَّ قَالَ اِنِّيْ جَاعِلُكَ لِلْنَّاسِ اِمَامًا)&lt;br /&gt;
یعنی ہم نے اپنے بندے ابراہیم کو چند آزمائشوں سے گزارا، وہ ان میں پورے اترے تو ہم نے کہا (اے ابراہیم) ہم آپ کو دنیا کا امام بنا رہے ہیں۔ (البقرہ: ۱۲۴) &lt;br /&gt;
ترمذی میں ہے: &lt;br /&gt;
&amp;rsquo;&amp;rsquo;ہشام بن حسان کہتے ہیں کہ حجاج بن یوسف ظالم نے لوگ باندھ کر قتل کیے وہ ایک لاکھ بیس ہزار تھے (جن میں سے بیشتر صحابہ، جلیل القدر تابعین اور تبع تابعین تھے) &amp;lsquo;&amp;lsquo; &lt;br /&gt;
اور مسلم میں ہے کہ:  &amp;rsquo;&amp;rsquo;حجاج نے عبد اللہ بن زبیرؓ کو کئی روز تک سولی پر لٹکائے رکھا۔ لوگ آتے اور ان کا درد ناک انجام دیکھ کر گزر جاتے، جب عبد اللہ بن عمرؓ کا ادھر سے گزر ہوا تو کہنے لگے۔ میں نے تجھے کئی بار منع کیا تھا۔ تین بار کہا۔ پھر فرمایا۔ خدا کی قسم! &lt;br /&gt;
جہاں تک مجھے علم ہے تو بہت روزے رکھنے والا، بہت قیام کرنے والا اور بہت صلہ رحم تھا۔ خبردار! جو امت تجھ کو برا سمجھتی ہے بُری امت ہے! حجاج بن یوسف کو جب یہ خبر پہنچی تو ابن زبیرؓ کی نعش کو وہاں سے اتروا کر اسے بے گور و کفن یہود کے قبرستان میں پھینک دیا۔ پھر ان کی والدہ اسماءؓ، بنت ابی بکر الصدیقؓ کو بلایا۔ وہ نہ آئیں تو دوبارہ آدمی بھیجا اور کہا کہ آجا! ورنہ ایسے آدمی بھیجوں گا جو تجھے چوٹی (میڈیوں) سے پکڑ کر گھسیٹ کر لائیں گے۔ اسماءؓ نے انکار کر دیا اور کہا کہ جب تک تو ایسے آدمی نہ بھیجے جو مجھے زمین پر گھسیٹ کر تیرے پاس لائیں میں نہیں آؤں گی۔ پھر حجاج غصہ میں اُٹھا اور الٹا جوتا پہن کر تکبر سے اسماءؓ کے پاس آیا اور کہا تو نے دیکھا لیا، میں نے اللہ کے دشمن (تیرے بیٹے عبد اللہ) کے ساتھ کیسا کیا ہے؟ حضرت اسماء نے جواب دیا، میں نے دیکھا لیا کہ تو نے اس کی دنیا خراب کی اور اس نے تیری آخرت تباہ کر دی۔ نیز فرمایا،میں نے سنا ہے کہ تو میرے بیٹے عبد اللہؓ کو &amp;rsquo;&amp;rsquo;دو آزار بند والی کا بیٹا&amp;lsquo;&amp;lsquo; کہہ کر پکارتا تھا۔ خدا کی قسم! واقعی میرے دو آزار بند تھے، ایک سے میں رسول اللہ صلى الله عليه وسلم اور ابو بکرؓ کا کھانا باندھتی تھی جس وقت کہ وہ غارِ ثور میں چھپے ہوئے تھے۔ دوسرا وہی جو عورتوں کے لئے ہوتا ہے، پھر حضرت اسماء نے کہا: گوش ہوش سے سن لے کہ رسول اللہ صلى الله عليه وسلم نے ہمیں بتایا تھا کہ ثقیف میں ایک کذاب اور ایک مفسد ہو گا۔ کذاب تو میں پہلے دیکھ چکی ہوں اور مفسد تو ہی ہے۔ پس وہ لاجواب ہو کر چلا گیا۔&amp;lsquo;&amp;lsquo; &lt;br /&gt;
اسی طرح اپنوں ہی نے حضرت عثمانؓ خلیفہ ثالث اور نواسۂ رسول صلى الله عليه وسلم حضرت امام حسینؓ کو میدانِ کربلا میں جس طرح تختہ مشق بنایا اور بے جگری سے شہید کیا، سن کر پتا پانی ہوتا ہے۔ &lt;br /&gt;
غرضیکہ دنیا آزمائشوں کا گھر اور حق و باطل کا میدان کار زار ہے۔ اس میں خدا پرستوں پر اللہ کے دین کی خاطر اسی طرح کے مصائب و آلام کی بارش ہوا کرتی ہے جس سے وہ ہمیشہ سرخرو ہو کر نکلتے ہیں۔ دکھ اور الم کی لہروں کے سامنے وہ چٹان بن کر کھڑے ہوتے ہیں۔ نہ ان کے دل ڈرتے ہیں، نہ پاؤں ڈگمگاتے ہیں بلکہ وہ خدا کی خوشنودی کی خاطر سب کچھ خندہ پیشانی سے قبول کرتے ہیں اور اپنے مقصد کے اعتبار سے ہمیشہ کامیاب و کامران لوٹا کرتے ہیں۔&lt;br /&gt;
نوحہ اور ماتم بزرگانِ ملّت کی تعلیم کے خلاف اور ان کے مشن کی توہین ہے: &lt;br /&gt;
ہم دیکھتے ہیں کہ یہ پاکباز ہستیاں کس طرح صبر و استقلال کا پہاڑ ثابت ہوئیں۔ ان کے خلفاء اور ورثاء بھی ان کے نقش قدم پر چلے۔ نہ کسی نے آہ و فغاں کیا، نہ کسی نے ان کی برسی منائی نہ چہلم، نہ روئے نہ پیٹے، نہ کپڑے پھاڑے، نہ ماتم کیا اور نہ تعزیہ کا جلوس نکال کر گلی کوچوں کا دورہ کیا بلکہ یہ خرافات سات آٹھ سو سال بعد تیمور لنگ بادشاہ کے دور میں شروع ہوئیں لیکن یہ سب حرکتیں اور رسوم و رواج نہ صرف روح اسلام اور ان پاکباز ہستیوں کی تلقین و ارشاد کے خلاف ہیں بلکہ ان بزرگوں کی توہین اور غیر مسلمانوں کے لئے استہزاء کا ساماں ہیں۔ اسلام تو ہمیں صبر و استقامت کی تعلیم دیتا ہے اور &amp;rsquo;&amp;rsquo;بَشِّرِ الصَّابِرِينَ&amp;lsquo;&amp;lsquo; (صبر کرنے والوں کو خوشخبری دے دو) کا مژدہ سناتا ہے۔ &lt;br /&gt;
﴿ٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَٰبَتۡهُم مُّصِيبَةٞ قَالُوٓاْ إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيۡهِ رَٰجِعُونَ﴾ [البقرة: ١٥٦]  &lt;br /&gt;
وہ لوگ جب ان کو کوئی مصیبت پہنچتی ہے تو کہتے ہیں ہم اللہ ہی کے لئے ہیں اور اسی کی طرف لوٹنے والے ہیں۔&lt;br /&gt;
نوحہ اور ماتم کی مذمت زبان رسالت صلى الله عليه وسلم سے: &lt;br /&gt;
نوحہ اور ماتم کی مذمت کے سلسلہ میں اگرچہ قرآن کریم کی کئی آیات اور احادیث نبوی سے استدلال کیا جا سکتا ہے بلکہ شیعہ حضرات کی بعض معتبر کتابوں سے ان کی ممانعت ثابت کی جا سکتی ہے لیکن اختصار کے پیشِ نظر اس صحبت میں ہم صرف دو فرمان نبوی پیش کرنے پر اکتفاء کرتے ہیں۔ &lt;br /&gt;
نمبر1۔قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ليس منا من ضرب الخدود وشق الجيوب ودعا بدعوی الجاهلية (بخاری و مسلم)&lt;br /&gt;
آنحضرت صلى الله عليه وسلم نے فرمایا جو شخص رخسار پیٹے، کپڑے پھاڑے اور جاہلیت کا واویلا کرے وہ ہم میں سے نہیں ہے۔ &lt;br /&gt;
نمبر2۔ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنا بریٔ من حلق و صلق وخرق (بخاری و مسلم)&lt;br /&gt;
آپ نے فرمایا جو شخص سر منڈوائے، بلند آواز سے روئے اور کپڑے پھاڑے میں اس سے بیزار ہوں۔&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;ماہِ محرم کے چند تاریخی واقعات: &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
اب آخر میں وہ چند واقعات ذکر کئے جاتے ہیں جو ماہِ محرم میں وقوع پذیر ہوئے لیکن آج عوام میں امام حسینؓ کی شہادت کے علاوہ ان کی یادیں طاق نسیاں میں رکھی رہتی ہیںَ اگرچہ ان کے ذِکر سے میرا مقصد یہ نہیں ہے کہ&lt;br /&gt;
شہادتِ حسینؓ کی طرح ان کی بھی یادیں منائی جائیں کیونکہ جیسا کہ میں پہلے ذِکر کر چکا ہوں کہ اگرچہ اسلام ان واقعات کی اہمیت اپنی جگہ تسلیم کرتا ہے اور ان کی عظمت کی یاد دہانی بھی ضروری سمجھتا ہے تاکہ ان کا کردار ہمیں جذبۂ قربانی اور شوق شہادت دے اور جن موقعوں پر مسلمانوں نے کامیابی حاصل کی یا ظلم و ستم سے نجات حاصل کی ان کے ذِکر سے ہماری تثبیتِ قلبی ہو اور ہم اللہ تعالیٰ کا شکریہ ادا کر سکیں لیکن وہ اس عظمت میں لیل و نہار کا کسی طرح کا دخل تسلیم نہیں کرتا اور نہ ہی عظمت میں انہیں شریک کار بناتا ہے۔ &lt;br /&gt;
بلکہ میرا مقصد تاریخی یاد داشتوں کی حیثیت سے ان کا ذِکر ہے۔ &lt;br /&gt;
دو جلیل القدر صحابیوں، بطل جلیل امیر المؤمنین حضرت عمر بن الخطاب رضی اللہ عنہ اور گوشۂ جگر رسول صلى الله عليه وسلم سید شباب المسلمین حضرت امام حسینؓ کی شہادت کا ذکر تو پہلے ہو چکا ہے جو بالترتیب یکم محرم اور دس محرم الحرام کو واصل بحق ہوئے اور ابتدائے آفرینش سے لے کر بعثت رسول صلى الله عليه وسلم تک چیدہ چیدہ واقعات درج ذیل ہیں: &lt;br /&gt;
نمبر1: آدمِ ثانی حضرت نوح علیہ السلام اور ان کے ساتھیوں کو کشتی کے ذریعے ان کی قوم کے ہتھکنڈوں سے اسی ماہ میں نجات ملی اور طوفانِ نوح میں مجرم کیفرِ کردار کو پہنچے۔ &lt;br /&gt;
نمبر2: ابو الانبیاء حضرت ابراہیم علیہ السلام کے لئے نارِ نمرود اسی ماہ میں گلزار بنی اور نمرود اور اس کے ایجنٹوں کی کوششیں اکارت گئیں۔ &lt;br /&gt;
نمبر3: موسیٰ علیہ السلام اور ان کی قوم بنی اسرائیل کو فرعون کے ظلم و ستم سے دس محرم (عاشوراء) کو نجات ملی اور فرعون اور اس کی فوج غرقاب ہوئی۔ &lt;br /&gt;
اس قسم کے بہت سے دیگر معرکہ ہائے حق و باطل تھے جن میں اللہ تعالیٰ کے فضل و کرم سے حق کو کامیابی نصیب ہوئی اور باطل خائب و خاسر ہوا۔ اگر ان شخصیتوں سے ہمارا بھی کوئی دینی اور روحانی تعلق ہے اور اسی حق میں ہم پیروکار ہیں جس کی خاطر انہوں نے اپنی زندگیاں وقف کیں اور جابر و ظالم بادشاہوں سے ٹکر لی تو ہمیں جہاں امام حسین رضی اللہ عنہ اور حضرت عمر بن الخطاب کی شہادت کا غم ہے وہاں ان چند واقعات پر خوش بھی ہونا چاہئے اور اللہ تعالیٰ کا شکر ادا کرنا چاہئے جس نے حق کی مدد فرما کر اسلامی تاریخ کو ایسا تابناک بنایا اور ہمارے اسلاف کو اسی حق کی خاطر ثابت قدم فرما کر دین کا بول بالا کیا۔ &lt;br /&gt;
ہمیں چاہئے کہ ان واقعات سے اچھا سبق لیں اور ان بزرگوں کی زندگیوں سے دینِ الٰہی کی خاطر ہر قسم کی جدوجہد کا نمونہ حاصل کریں۔ حتیٰ کہ اگر اس راہ میں اپنے جان و مال کی قربانی بھی دینی پڑے تو اس سے دریغ نہ کریں۔ ان واقعات کی یہی روح اور یہی ان بزرگوں کا مشن تھا۔ یہی راستہ دارین کی فوز و فلاح کا ضامن ہے اور یہی ان سے اظہارِ محبت کا طریقہ ہے۔ &lt;br /&gt;
محرم کے مروجہ رواجات و رسوماتِ ماتم، مرثیہ خوانی، مجالس عزاء، تعزیہ داری، علم دلدل، مہندی تابوت، لباسِ غم پہننا، امام حسین کے نام کی سبیلیں لگانا، ان کے نام کی نذر و نیاز دینا اور مالیدہ چڑھانا شرعاً ممنوع ہونے کے ساتھ ساتھ ان ائمہ کے مشن سے کوئی نسبت نہیں رکھتا۔ نہ ہی ان کے خلاء و ورثاء محبین مخلصین کا یہ وطیرہ تھا او نہ ہی یہ سب کچھ ان سے اظہارِ عقیدت کا ذریعہ ہے۔ &lt;br /&gt;
مراد ما نصیحت بود گفتمیم&lt;br /&gt;
حوالت با خدا کریم رفتیم&lt;br /&gt;
اللہ تعالیٰ سب مسلمانوں کو صحیح رستہ پر چلائے اور بزرگوں کے نقشِ قدم پر چلنے کی توفیق عطا فرمائے۔ آمین ثم آمین&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>محرم شناسنامۀ اسلام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/369</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;جنگ حق و باطل نبردی است ازلی که ناقوس آن در روز خلقت دمیده شده تا بروز پیروزی حق بر باطل در محشر ادامه خواهد داشت.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;از جمله نبردهایی که تیغ بران حق کمر باطل را در آن شکست معرکه ی موسی پیامبر بود با امپراطوری فرعون و چکاچک شمشیرهای فرعونیان!&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;در این ماه ـ و دقیقا در دهم عاشورای این ماه ـ بود که رمز ایمان و اسلام موسای پیامبر؛ قوم ستمدیده و مظلوم بنی اسرائیل را از زیر پنجه های ظلم و ستم فرعونیان بیرون کشیده بر ساحل پر موج دریا قرار گرفت.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;اینسو دریای خروشان است و نهنگهای گرسنه و آنسو اسبان فرعونیان که چار نعل می تازند و شمشیرهای برانی که در جهش آفتاب سوزان در کنار رعد و غرش سربازان مست چون برق در آسمان می جهند..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;لحظاتی است بسیار هراسناک که عقل بشر در آن از کار می افتد. موسی هم ستمدیدگان را بوعده نجات از خانه و کاشانهایشان بیرون کشیده تا در اینجا با تیغ فرعون چون گوسفند سر بریده شوند!...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;این است قدرت و توان یک مؤمن کوشا... که باید در ره حق بکوشد و از هیچ نهراسد و از خود هیچ کوتاهی نشان ندهد پس از آنست که آسمان ادامه ماجرا را در دست می گیرد. &lt;b&gt;اینجاست که معجزه سخن می گوید!.. &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;هرگاه عقل بشر در پرتو ایمان صادق در رکاب نبوت بپا خیزد، و جز اخلاص و ایمان هیچ نکارد معجزه دست در دستان او خواهد نهاد...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;آری..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;عصای معجزه آسای موسی بفرمان خدای موسی به دریا زده می شود و دریا از وسط شكافته می گردد و موسی و پیروانش بر خاک خشک در کوچه ای که دو دیوار آن را موجهای خروشان آب مستانه بالا می زنند بدانسوی دریا بحرکت در می آید...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;و لشکریان نادان فرعون نیز از پشت خود را طعمه ی این معجزه می کنند...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;موسی و یاران را به ساحل رسیدن همان و دریا به حال خود خزیدن همان...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;در یک آن دو دیواره موجهای خروشان همدگر را به آغوش می کشند و فرعون و فرعونیان را تا ابد از صحنه آفرینش می ربایند...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;این پیروزی بزرگ حق بر باطل در فراز تاریخ افتخاری است نمونه که همواره مومنان آنرا جشن می گرفتند. بنی اسراييل تا روزی که پرتوی از حق در آنها جریان داشت دهم محرم را روزه می گرفتند. و چون پیامبر اسلام از این خبر مطلع شدند فرمودند: ما به موسی اولاتريم از یهودیان ... و از آن روز امر فرمودند: مسلمانان روز عاشورا و تاسوعا را به پاس پیروزی حق در کالبد موسی بر فرعون رمز باطل روزه بگیرند. این روزه در حقیقت؛&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;اولا:&lt;/b&gt; سپاس مومنان است از پروردگار یکتایشان که حق را بر باطل؛ موسی را بر فرعون؛ و یا اسلام را بر کفر پیروزی بخشید.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;و دوما:&lt;/b&gt; یادبودی است از آن جشنواره بزرگ ایمان سترگ مومنان، و همدلی است با آن صادقان راستین. و تجدید عهد و میثاق و پیمان است با حق که ما همیشه و همواره با تو خواهیم بود و جان و مال خود را در راه تو فدا خواهیم نمود...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;این ماه پر شور پر است از صحنه های نبرد حق و باطل..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;از جمله این صحنه های دردآور صحنه شهادت امیر مؤمنان؛ داماد علی مرتضی، یار و دوست و همسنگر رسول خدا، حضرت عمر بن خطاب ـ رضی الله عنه ـ است.&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;نام عمر انسان را به یاد آرمانهایی والا از مقابله دندان شكن حق و باطل، از دلیر مرد شجاعت و بی مهابا، از ثبات و استقامت و یکدلی، از وزیری نمونه برای رسالت و خلافت آن، از رهبر و دولتمندی بی مانند، از سیاستمداری سترگ، از محبت و عشق به رسول خدا&amp;nbsp;و خاندان او... و خلاصه دانش آموزی نمونه از دانشکده رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله و صحبه ـ و دست پرورده ای ممتاز از ساختار تربیتی رسول اکرم می اندازد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;عمر شخصیتی است که تاریخ بشریت با یک دنیا اجلال و احترام در مقابل رادمردی او می ایستد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;همه بشریت از دوست و دشمن در مقابل مردانگی و شجاعت و ایمان عمر مات و مبهوت و حیران می ایستند و بر مدرسه و استادی که او را تربیت نموده سلام و درود بی پایان می فرستند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;مگر پشیزی از حاقدان که عمر گلیم برده داری و فرعون منشی را از زیر پایشان بدر کشید، و در یک آن از جاه و جلال کاخهای مجلل و ادعای خدایی پوزه حقیر آنها را به خاک ذلت کشانید و ملت را از بردگی آنان رهایی بخشید و به درگاه بندگی خداوند ـ آفریننده و خالق آسمانها و زمین و هر آنچه در آندوست ـ شرفیاب ساخت. &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;عمر آن شخصیتی است که آسمان او را برای گسترش قلمرو دین خدا بر زمین تربیت نمود. رسول خدا پیام آسمانی اسلام را از محضر ملکوتی آسمان به زمین رسانید، پس از او خلیفه و جانشین منتخبه ی دست پروردگان و یاران رسالت ـ ابوبکر صدیق؛ پدر زن پیامبر اکرم و یار غار او ـ در مدت دو سال دین را در شبه جزیره عرب استقرار بخشید و پایه های اسلام در چهار سوی جزیره مستحکم گشتند..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;پس از ابوبکر، عمر مقالید رهبری امت را بدست گرفت و حدود 12 سال پیام&amp;nbsp;اسلام را به جهانیان رسانید. در دوران عمر به گواهی و شهادت دوست و دشمن جهان در سایه عدالت و آزادی و رفاه و آسایش بی مانندی در سایه سیاست و حکومتداری این مرد صادق و زاهد و پارسا و فروتن می زیست...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;در دوران عمر بود که پوزه دو امپراطوری مغرور فارس و روم آنانیکه در ادعای خدایی مست بودند به زمین مالیده شد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;عمر فاروق رضی الله عنه شخصیتی است که ایران زمین همواره و همیشه بدو افتخار خواهد ورزید.&lt;/b&gt; چرا که در زمان او و در سایه رهبریت حکیمانه او ایران از چنگال پست حکومت مجوسیان آتش پرستی که عقل و انسانیت را به ذلت و خواری کشیده بودند نجات یافت و نور اسلام بر این سرزمین درخشیدن گرفت.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;آتش پرستانی که با مکر و حیله و نیرنگ مردم را فریب داده بودند و به بردگی گرفته بودند حقد و کینه ای بس بزرگ را در دل بر عمر گرفتند، و در یک توطئه پست و حقیری این ابر مرد تاریخ بشریت را به شهادت رسانیدند. که اول محرم هر سال هجری یاد بودی است از این نبرد حق و باطل که در آن خون عدالت بر شمشیر خیانت غلبه یافت...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;عمر &amp;nbsp;رضی الله عنه عشق و علاقه و ایمانی خاص به پیامبر و پس از او به خانواده ی او داشت. این عشق و ایمان حضرت علی وزیر و مشیر دست راست عمر را بر آن داشت که دختر خود &amp;quot;ام کلثوم&amp;quot; خواهر حسن و حسین دو گل سر سبد جوانان بهشت، و نوه ی پیامبر اکرم را به عقد ازدواج عمر درآورد. عمر از شدت محبت به خاندان رسالت ام کلثوم را به عنوان آخرین همسر خود برگزید و پس از او هرگز ازدواج نکرد تا نشاید دختر فاطمه زهراء رنجیده خاطر شود که رنجش او رنجش مادر، و رنجش مادر رنجش پدر بزرگ است. &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;سلام بر رشادت و اخلاص و مردانگی و محبت عمر به اهل بیت!...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;دشمنان عقل و صداقت، خفاشان ترسوی شبهای تار که عمر را با خنجر ننگ خیانت در نماز فجر به شهادت رسانیدند، این پیروزی بزرگ را بر خود جشن گرفته در &amp;quot;کاشان&amp;quot; برای ابو لؤلؤ آتش پرست قاتل امیر مؤمنان روضه ای بر پا نهادند و او را &amp;quot;بابا شجاع الدین&amp;quot; نامیدند و تا امروز کمر احترام در مقابل خاک نجس این بت خیانت پیشه خم می کنند. و با این کار خود به مسلمانان کاشان ایران و دنیا می گویند: ما بودیم که جگر ابرمرد تاریختان را دریدیم و امیر مؤمنان علی و خاندان او را داغدار کردیم! آنگاه مسلمانان غافل با لبخند حماقت از کنار آن حاقدان آتش پرست خاموش می گذرند!&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;یهودیان و آتش پرستان بسی سعی نمودند از مقام پر شکوه تاریخی عمر بکاهند ولی جز آنچه پارس سگ از ابر پربار بارانی می کاهد هیچ بیش نکاستند!...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;عمر؛ عمر ماند و خواهد ماند، و آن سگان هار همچنان پارس می کنند تا بجزای خود رسند!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;سلام بر عمر و سلام بر ثبات و استقامت و مردانگی و عدالت و آزادمنشی او...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;عاشورای این ماه تصویری دیگر از حماسه نبرد حق و باطل بر تاریخ بشریت رسم نمود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;آری!...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;حماسه پر شور و آه کربلا... حماسه زمینی پلید که جز کرب و بلا هیچ برای تاریخمان به ارمغان نیاورد.. حماسه ی خاکی که با مکیدن خون پسر رسول خدا برای همیشه مهر پلیدی بر پیشانی خود نهاد...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;گل خندان و شاداب جوانان فردوس، سالار شهیدان، نواده رسول اکرم امام حسین چون دید که نظام حکومتداری در اسلام از شورا که دستور قرآن و پیامبر است به نظام پادشاهی کسرا و قیصر کشیده می شود با برخی دیگر از جوانان برومند اسلام شمشیر اعتراض بر کشید و در مقابل این تحریف بزرگ تاریخ اسلام قد علم کرد. همسنگر او عبد الله بن زبیر نواسه ی ابوبکر، پسر اسماء چهره زن فداکار حادثه هجرت نبوی در مکه قیام کرد و خلافتی اسلامی بر پا نمود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;اما امام حسین به وعده شیعیان کوفه بسوی عراق حرکت نمود، ولی در راه خبر رسید که اهل کوفه بدو خیانت کرده اند، و در کربلا لشکر کوفیان خائن را دید در رکاب شمر رمز خودخواهی و غرور به جنگ با او کمر بسته اند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;شهید کربلا بر این ایمان بود که حکومت اسلامی بر پایه شورای برتران و عالمان و بزرگان و دانشوران انتخاب می شود؛ نه پیامبر آنرا میراث خاندان خود قرار داد و نه هیچ کس دیگری را چنین اختیاری است. پس نظام اسلام نظام شورا و آزادی و عدالت است نه نظام میراث داری و پادشاهی...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;سالار شهیدان در کربلا این ایده و آرمان خود را با خون خود نگاشت تا جهان دریابد؛ اسلام را نمی توان با زور شمشیر در قفس خواسته ها و آزهای این و آن زندانی نمود. اسلام آرمانی است آزاده؛ سوار بر اسب عقل و منطق و فطرت و خواسته های آزاد مردان عدالت پیشه و پارسا بسوی اهداف و آرمانهای خود چارنعل می تازد، و هیچ کسی نمی تواند آنرا با طناب شهوت خود بدار آویزد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;b&gt;پیام حرکت استشهادی سالار شهیدان در کربلا نگاشته شد و تا امروز خاری است در حلقوم پادشاهانی که مهار ملتها را آنروزی که روده ی نافشان بریده می شود در دست می گیرند! و خاری است در گلوی حکام زورگو و جاه طلب و خودخواه و خود رأی و تقلب باز و چپاولگر...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;محرم ماه پر شور و حماس تاریخ ماست، و آن نیز نوروز هر سال هجری ماست. گویا محرم در اول هر سال می آید تا همه این معانی را در ملت اسلامی زنده کند. و در گوشها و قلبهای امت اسلامی بدمد که شما وارثان انقلاب و پیروزی حق هستید. پس از هیچ مهراسید که پیروزی از آن شماست. چه در لباس شهادت عمری و حسینی و یا در لباس پیروزی موسایی...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: larger&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;و در این سالهای ننگ و خواری و عقب ماندگی محرم امسال با مثالی زنده در خیابانهای ایران، و در فلسطین و افغانستان و عراق وغزه به دیدار امت اسلامی آمده تا به جوانان برومند این ملت در خواب بیاموزد؛ خون شهیدان ما نمادی است دیگر در راستای خون عمر و خون حسین... و شما ای جوانان مسلمان می توانید عصای موسی، و معجزه ی این قرن باشید!...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;به&amp;nbsp;مناسبت ماه محرم کتابخانه عقیده تصمیم گرفت مجموعه ای از کتابهای مرتبط به این ماه مبارک را خدمت شما عزیزان تقدیم نماید تا مسلمانان از حقیقت این ماه&amp;nbsp; و روز عاشورا آگاه شوند همچنين راهي از راه هاي شيطان كه بعضي از برادران و خواهران ما را به بيراهه برده است مسدود گردد. &lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار دادن به روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;&lt;span&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; style=&quot;display: inline !important;&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/523/&quot;&gt;قاتلان حسين رضي الله عنه را بشناسيد&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; style=&quot;display: inline !important;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/415/&quot;&gt;حقيقت عاشورا&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/836/&quot;&gt;جوابهای نورانی در مورد عاشورای حسينی&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/278/&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;روز عاشورا&lt;/font&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt; را چگونه بگذرانيم؟&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/246/&quot;&gt;شيعه و حسينيه ها&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: normal; text-align: right;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1242/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255);&quot;&gt;حقیقت زندگی حسین شهید&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; style=&quot;display: inline !important;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt; &lt;span&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;strong style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; style=&quot;display: inline !important;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/488/&quot;&gt;احكام ميت و آداب سوگوارى&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/566/&quot;&gt;يزيد ابن معاويه&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/564/&quot;&gt;ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره 4 اول محرم 1430هـ&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/1174/&quot;&gt;ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره&amp;nbsp;28 اول محرم 1432هـ&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرا رسیدن عید سعید اضحی بر همه مسلمانان جهان مبارک باد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/367</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;آداب عید قربان&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;از انس رضی الله عنه روایت است که فرمود: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;هنگامی که پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم به مدینه آمدند دو روز داشتند که به بازی و سرگرمی مشغول می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شدند و جشن می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;گرفتند، پیامبر صلی الله علیه وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;الله متعال بجای آنها، دو روز بهتری برای شما قرار داده است. روز عید فطر و روز عید قربان&lt;/span&gt;) &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 9pt&quot;&gt;( حدیث صحیح/ سنن نسائی شماره1556) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;اذکار و فضائل روز عرفه و ایام التشریق (11 و 12 و 13 ذی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;الحجه)&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از عبدالله بن عمر رضی الله عنه روایت است که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;هیچ روزی باشکوه&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;تر و محبوبتر در انجام اعمال نیک نزد خداوند از 10 روز اول ذی الحجه وجود ندارد پس در این روزها &amp;laquo; لا اله إلا الله و الله أکبر و الحمد لله&amp;raquo; را زیاد بگویید&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ مسند احمد شماره 6154)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم روز اول ذی&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;الحجه را روزه می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گرفتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن ابوداود شماره 2437)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در مورد روزه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ی روز عرفه فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;گناهان سال گذشته و سال آینده را محو می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 1162)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;بهترین چیزی که پیامبران در روز عرفه گفته&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;اند و من نیز آن را می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گویم : &amp;laquo; لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِیک لَهُ، لَهُ الْمُلْک وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى کلِّ شَیءٍ قَدِیرٌ &amp;raquo; می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;باشد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ معجم الطبرانی شماره 3274 - سلسله صحیحه شماره 1503)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;روایت است که عبدالله بن عباس رضی الله عنه و دیگر اصحاب رسول الله صلی الله علیه وسلم تکبیر عید قربان را بعد از نماز صبح روز عرفه شروع می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;نمودند و بعد از نماز عصر آخرین روز از ایام تشریق به پایان می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رسانیدند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 6072) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ابوهریره، عمر, عبدالله بن مسعود و عبدالله بن عمر رضی الله عنهم در بازار، بعد از نمازها، وقت خواب، نشستن و پیاده رفتن خود را مشغول تکبیر گفتن &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;نمودند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری/ شماره970 - 969)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;عبدالله بن عمر رضی الله عنه می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;فرماید که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به همراه اصحاب در هر دو عید تکبیر گویان با صدای بلند به سوی نماز می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رفتند.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 5925)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;الفاظ تکبیر&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;الله اکبر الله اکبر ، لا اله الا الله ، والله اکبر الله اکبر ، و لله الحمد.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 7pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 5925) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;الله اکبر الله اکبر الله اکبر لا اله الا الله والله اکبر الله اکبر و لله الحمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(امام مالک و امام شافعی این لفظ را نیز جائز می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;دانند ) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;آداب و سنتهای عید قربان&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از ام سلمه رضی الله عنها روایت است که رسول الله صلی الله علیه وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;هرگاه هلال ماه ذی الحجه را مشاهده نمودید و قصد قربانی کردن را داشتید تا حیوان را قربانی نکرده&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;اید چیزی از مو&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;rlm;, ناخن و موهای زاید خود را کوتاه نکنید&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 1977)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 10pt&quot;&gt;رعایت نظافت ، استعمال بوی خوش، مسواک زدن و غسل زدن چنانچه در روز جمعه تأکید شده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از عبدالله بن عباس رضی الله عنه روایت است که پیامبر صلی الله علیه وسلم در یکی از جمعه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ها فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;الله جل جلاله این روز را برای شما مسلمانان &amp;laquo;عید&amp;raquo; قرار داده است پس کسی که به نماز جمعه آمد، غسل بزند، و اگر بوی خوش دارد استفاده کند و مسواک بزند&lt;/span&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن ابن ماجه شماره 1098) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;(&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;بهترین لباس خود را بپوشد&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( صحیح بخاری شماره 948)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم در روز عید قربان قبل از نماز چیزی نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خورد تا از نماز برمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشت&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ سنن ترمذی شماره 542)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;نظر علما بر این است که بعد از نماز عید غذای خود را با گوشت قربانی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;اش شروع کند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(فتح البای شرح حدیث 955 صحیح بخاری)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;اهمیت نماز عید و تأکید پیامبر به رفتن به نماز عید&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از ام عطیه رضی الله عنها روایت است که فرمود: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وسلم به ما فرمودند که دختران بکر ( ازدواج نکرده ) و زنان قاعده را به مصلی ببریم تا در کار نیک و دعای مسلمانان شریک باشند و زنان قاعده از مصلی کناره می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گرفتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری شماره 324 )&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;حال وقتی پیامبر صلی الله علیه وسلم به زنان چنین توصیه می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;کند مطمئناً این اهمیت و تأکید پیامبرصلی الله علیه وسلم شامل حال مردان بیشتر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم پیاده به مصلی می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رفتند و بر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ سنن ابن ماجه شماره 1294 ) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم در روز عید از راهی به مصلی می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رفتند و از راه دیگر باز می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( صحیح بخاری شماره 986 )&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;برای مأمومین مستحب است که برای نماز عید زود به مصلی بروند اما برای امام سنت است دیرتر به مصلی برود&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;( بخاری شماره 956)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبرصلی الله علیه وسلم قبل از نماز عید سنتی نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خواند ولی وقتی به منزلشان برمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گشتند دو رکعت می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خواندند&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;. (حدیث حسن/ ابن ماجه شماره1293)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ولی طبق دستور پیامبر صلی الله علیه وسلم وقتی وارد مسجد شدیم می توانیم دو رکعت سنت تحیه مسجد بخوانیم&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 714)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;نماز عید دو رکعت است که بصورت زیر خوانده می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;شود&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پس از تکبیرة الحرام دعای استفتاح (وجهت) را می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;خوانیم و سپس هفت تکبیر دیگر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;گوییم، در رکعت دوم بعد از تکبیر انتقال ( بالا آمدن از سجود ) پنج تکبیر دیگر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;گوییم در هر رکعت پس از تکبیرات دعای تعوذ ( اعوذ بالله &amp;hellip; ) و سوره حمد می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;خوانیم - در بین تکبیرات حمد و ثنای خدا را گفته و او را مورد مجد و تعریف قرار می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;دهیم ( سبحان الله و الحمد لله و لا اله الا الله و الله اکبر ) و بر رسول الله صلی الله علیه وسلم صلوات می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;فرستیم. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ معجم الکبیر الطبرانی شماره 9519 )&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کسانی که به نماز عید همراه امام نرسند و همچنین زنانی که در خانه هستند می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;توانند نماز عید را بجا آورند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری شماره987)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;در صورت نرسیدن به نماز جماعت ( نماز عید) تعداد رکعات نماز و چگونگی آن هیچ تغییری نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کند آن طور که از انس رضی الله عنه روایت شده است&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ سنن بیهقی شماره 6031)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;تبریک و تهنیت گفتن به یکدیگر&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از جبیر بن نفیر رضی الله عنه روایت است که: &lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;اصحاب رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم&lt;/span&gt; &lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;هنگامی که روز عید همدیگر را ملاقات می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;کردند به یکدیگر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;گفتند:&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &amp;laquo; &lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;تَقَبَّلَ اللهُ مِنَّا وَ مِنْک&lt;/span&gt; &amp;raquo; (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;الله از ما و شما قبول بگرداند&lt;/span&gt;) &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ فتح الباری شرح حدیث 952 صحیح بخاری)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;آداب اجتماعی روز عید&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;همانا الله بلند مرتبه به من وحی نمودند که نسبت به یکدیگر فروتن و متواضع باشید تا یکی بر دیگری ظلم و تعدی ننموده و فخر و تکبر نورزد&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره2865)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;اگر سوزن آهنی در سر یکی از شما فرو برده شود برای او بهتر از این است که زن نامحرمی را لمس کند&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ معجم الکبیرطبرانی شماره 486)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;ذلت و حقارت بر کسی قرار داده شده است که با دستور من مخالفت کند و هرکس خود را به قوم و گروهی شبیه کند پس او از همان قوم محسوب می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;شود&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث صحیح/ مسند احمد شماره 5115)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم مردانی که خود را شبیه زنان و زنانی که خود را شبیه مردان می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;سازند، لعنت نمودند و فرمودند: آنها را از خانه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;هایتان بیرون کنید&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح بخاری شماره 5547)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;زنانی که لباسهای نازک می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;پوشند و نیمه برهنه به نظر می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رسند و (موی) سرشان ماند کوهان شتر (برآمده) است خودشان منحرف هستند و دیگران را هم منحرف می&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;سازند، دوزخیانی هستند که من آنها را ندیده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ام، وارد بهشت نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;شوند و بوی بهشت به مشامشان نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;رسد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt; (صحیح مسلم شماره 2128)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;بخورید، بنوشید، بپوشید، و به یکدیگر صدقه دهید اما اسراف نکنید و تکبر نورزید&lt;/span&gt;). &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(حدیث حسن/ابن ماجه شماره 3605)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;کسی که می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;خواهد روزیش وسیع گردد و بقیه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی عمرش پر خیر و برکت باشد باید صله&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی رحم را بجای آورد. و در روایتی قطع کننده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی (ترک کننده) صله&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;ی رحم وارد بهشت نمی&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue&quot;&gt;شود&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;). &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt&quot;&gt;(صحیح مسلم شماره 2557ـ2556)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نيم رخی از سيمای پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله وسَلَّمَ</title>
<link>http://qalamlib.com/news/366</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نيم رخی از سيمای پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله وسَلَّمَ &amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;اهميت سيرت&lt;br /&gt;
متأسفانه اهميت وجايگاه زندگينامه و يا سيرت پيامبر اكرم &amp;nbsp;صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;بر بسياری از مسلمانان بدرستی واضح و روشن نيست.&lt;br /&gt;
شايد بهترين توصيفي كه مي تواند اهميت سيرت را به تصوير بكشد همان سخن خويشان وياران وشاگردان آن حضرت بود كه مي فرمودند: پيامبر قرآني بود كه با دو پا درميان انسانها راه مي رفت.&lt;br /&gt;
وچون از مادر مؤمنان عائشه صديقه؛ همسر گرانقدر آن حضرت از اخلاق پيامبر پرسيده شد فرمودند: اخلاقشان قرآن بود!&lt;br /&gt;
قرآن كريم اين واقعيت را در يك آيه؛ كه تا روز رستاخيز حنجره هاي قاريان با نداي ملكوتي تلاوت آنرا براي گوشهاي عاشقان رسالت مي سرايند، ثبت كرده است: { وَإِنَّكَ لَعَلى خُلُقٍ عَظِيمٍ}(قلم/4) (&amp;rlm;تو داراي خوي سترگ ( يعني صفات پسنديده و افعال حميده ) هستي).&lt;br /&gt;
به عبارتي واضحتر مي توان گفت: براي درك صحيح ودرست مفاهيم قرآني هر مسلمان نياز دارد سيرت پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ را به دقت وارسي كند. يعني اينكه قرآن مرامي است نظري از معيارهاي والا وبرتري كه ساختار فرد وجامعه ونهايتاً سعادت بشريت را تضمين مي كند وسيرت پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;سيماي تطبيقي وعملي اين مفاهيم است.&lt;br /&gt;
وچون انسان نياز به تصويري روشن وعملي از اين معيارهاي انسان ساز داشت، خداوند پيك خود را از ميان همين انسانها اختيار نمود. حكمت بشريت حضرت پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;در قرآن نيز چنين بيان شده است. واگر اين رسول هدايت فرشته اي مي بود، بدون شك اين ايراد مطرح مي شد كه ما انسانها را توان تقليد فرشتگان نيست!&lt;br /&gt;
سخنان آن حضرت؛ آن به شهادت وگواهي قرآن كريم جز وحي الهي ودر راستاي شرح وتفسير آن نبود: {وَمَا يَنطِقُ عَنِ الْهَوَى، إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَى&amp;rlm;} (النجم/3و4) همراه با روش زندگيشان،&amp;zwnj; در كنار قرآن كريم قرار گرفته، شرح وتفسير گويا ودرستي از معاني كلام پاك را به مسلمانان مي&amp;zwnj;آموزاند.&lt;br /&gt;
از اينروست كه هر فرد مسلمان موظف است در كنار درك اساسنامه ي دين خود؛ كه همان قرآن كريم، به كلام پاك پروردگار يكتاست، از سيرت وزندگي رسول الله آگاهي كامل داشته باشد.&lt;br /&gt;
موفق الدين عبدالطيف بغدادي پيام پرمعنايي دارند كه جاي دارد بدان اشاره كنم. ايشان مي گويند: زندگي يك مسلمان بايد تصويري باشد از سيرت وزندگي رسول الله وشاگران ودست پروده هاي مكتب آن حضرت. زندگينامه حضرت رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;را بخوان، وقدم در جاي پاي آن حضرت بگذار، وتا حد توان سعي كن شبيه او باشي؛ در خورد وخوراكت، در لباس وپوشاكت، در خواب وبيداريت، در صحت وبيماريت، در خوشيها وسختيهايت، در راه ورسم عبادت وبندگي پروردگارت، در رفتار با خانواده وخويشان وياران ودوستانت، در برخورد با دشمنات، و... هميشه وهمه جا پيامبرت را تقليد كن وبدان كه به اندازه ي مشابهتت با آن حضرت خوشبختي وسعادت خويش را رقم زده اي ...&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتابهاي سيرت&lt;br /&gt;
در تاريخ بشريت از آدم تا به اين دم كه در سايه ي پيشرفت تكنولو&amp;zwj;ژي، آدم از غور هسته تا مسير سالهاي نوري در آسمان را گام زده، انسان تصويري به گويايي ووضاحت وروشني وشموليت از هيچ كسي را به روشني وواضحت سيماي رسول الله تقديم نكرده است.&lt;br /&gt;
دانشمندان مسلمان همه ي جوانب زندگي پيامبراكرم از گفتار وكردار آن مقام گرفته تا شكل وشمايل ايشان، تا ابزار ووسايلي كه استفاده مي كرده اند، تا همسران وخويشان&amp;nbsp;او، وتا ياران ودوستانش وحتي لبخندها وخشمها واشاره هايشان را ثبت وضبط كرده اند. بگونه اي كه با جرأت مي توان ادعا نمود يك نگارنده ويا نقاش خوب مي تواند از روز به روز ولمحه لمحه ي زندگي آن مقام والا تصوير برداري كند.&lt;br /&gt;
در زمينه هاي مختلف سيرت پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;كتابهاي بسياري نوشته شده است.&lt;br /&gt;
البته بيشتر كتابهاي عربي كه از زندگي آن حضرت سخن گفته اند، جنگهاي آن حضرت را معيار فهرست بندي خود قرار داده اند. به نظر نويسنده اين معيار نگارش چندان موفق نبوده است!&amp;zwnj;چونكه دايره جنگ ويا غزوات در زندگي آن حضرت بسيار تنگ است. در طي 23 سال دعوت اسلامي تنها پيامبر رهبري 9 غزوه كه در آن جنگ صورت گرفته را به عهده داشتند كه بسياري از آنها تنها چند ساعت از روز را در برگرفته است.&lt;br /&gt;
يعني به معدل يك غزوه چند ساعته در طول هر دو ونيم سال (30 ماه)!&lt;br /&gt;
پس غزوه ودرگيري نظامي در زندگي آن حضرت بخلاف آنچه در فهرست كتابهاي سيرت عربي نمايان است، بسيار كم رنگ است. البته شايد دليل اين روش فهرست بندي بر مي گردد به عادات وتقاليد عرب در تعيين تاريخ خود. عربها پيش از اسلام ـ چون ساير انسانها ـ &amp;nbsp;تاريخ خود را بر اساس حوادث مشهور وبزرگ رقم مي زدند، از اينروست كه ما مثلاً در مورد تولد رسول الله مي گوئيم: ايشان در سال &amp;quot;عام الفيل&amp;quot; ـ سال حمله ابرهه با فيلهايش به مكه ـ &amp;nbsp;به دنيا آمده اند ودر مورد شخص ديگر مي گوئيم؛ دو سال قبل از غزوه بدر وفات كردند، يا در مورد مادر مؤمنان خديجه كبري مي گوئيم كه چند ماه قبل از هجرت رسول الله به مكه وفات كردند!...&lt;br /&gt;
گويا بازتاب اين روش تاريخ نگاري اذهان نويسندگان عرب ـ وكسانيكه از آنها تقليد كرده اند ـ را به سوي اعتماد بر جنگها كه بدون شك حوداث مهمي در زندگي آن حضرت بودند كشانده است. البته اكنون اين شيوه در ترتيب حوادث زندگي آن حضرت نزد بسياري از نويسندگان عرب، وبيشتر نويسندگان وتاريخ نگاران عجم، و بخصوص در شبه قاره هند، بسيار كم رنگتر شده است.&lt;br /&gt;
ونويسنده نيز بر اين اعتقاد است كه كتابهاي سيرت بايد به تمام زمينه هاي زندگي آن حضرت توجه داشته باشند، وميداني را بر حساب ميداني ديگر اهميت ندهند. يا اينكه نوشته هاي خود را در چارچوبهاي معيني مشخص سازند؛ چون كتابهاي نوين در: &amp;nbsp;فقه سيرت، جانب اقتصادي سيرت، زمينه هاي سياسي سيرت، پرتو اخلاق در سيرت، رسول الله در خانواده ، رسول الله در مسجد ومحراب، واخلاق رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;در ميدان كارزار، رسول الله در رهبري دولت مدينه، تعليم وتربيت در پرتو زندگي پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;وغيره ...&lt;br /&gt;
البته اين هرگز به اين معنا نيست كه به مغازي پيامبر پرداخته نشود! تاريخ نگاران اسلامي ريز ودرشت حوادث جنگها را به تصوير كشيده اند وشاگردان مكتب رسالت تمام آن حوادث را براي ما ثبت كرده اند ، وبر خواندن وآموختن آنها بسيار تأكيد ورزيده اند، تا بدانجا كه علي بن الحسين بن علي بن ابي طالب مي فرمايند:&amp;quot; پدران ما غزوه ها وسريه ها (جنگهاي زمان پيامبر) را چون سوره هاي قرآن به ما مي آموختند! (به روايت خطيب بغدادي).&lt;br /&gt;
جنگهاي پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;در كنار اينكه مدرسه هايي است از دليري&amp;nbsp;وشجاعت ورادمردي وايثار وگذشت، مكتبهايي است از اخلاق در بهترين صورت آن، وتجلي پرتو ايمان در والاترين درخشش وگذشت وجوانمردي در تصاويري كه فهم ودرك آن نياز به قلبهايي آگنده محبت واخلاص دارد.&lt;br /&gt;
وچون مسلمانان از اين ثروت بزرگ اخلاقي وميراث وبرنامه مديريت رفتاري برخوردار بودند هميشه در جنگهايشان مهذب، وبا فرهنگ وتمدن انسان دوستانه با دشمن برخورد مي كرده اند، برخلاف پيروان ديانتهاي ديگر كه ميراثي در اين زمينه از پيامبرانشان ويا رهبرانشان به ارث نبرده اند.&lt;br /&gt;
به طور مثال مسيحيان وكليميان كه از چنين برنامه وفرهنگي محرومند، در جنگهايشان از حيوانات درنده نيز پست تر بوده اند وميدان كارزار فلسطين وآتشي كه كليميان (يهودها) آنرا برافروخته اند، وميدانهايي چون عراق وافغانستان كه فتنه&amp;nbsp;افروز آن مسيحيان هستند شاهدي گويا بر اين مدعا است...&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;فعاليتهاي نظامي رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;&lt;br /&gt;
در 13 سال دعوت وتلاش زندگي مكه، با وجود آن همه زجر وشكنجه وظلم&amp;nbsp;واستبداد وديكتاتوريت وفرعون منشي قريشيان، رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;هرگز دست به سلاح نبردند. بارها اتفاق افتاده كه در زير يوغ ستمگران كاسه صبر ياران وشاگردان آن حضرت لبريز شده، به ايشان مشورت داده اند تا دشمن قسم خورده، تشنه به خون خود را غافل گير ساخته، تارومارش كرده، روزگارش سياه كنند! ولي رسول الله كه طبق برنامه پيش مي رفت،واز دستورات پروردگارش سرانگشتي كنار نمي رفت، هرگز كوس جنگ، ويا حتي دفاع، ننواخت تا حجت دعوت بر مردمان تمام گردد، وكينه ودشمني جنگ وخون بر مسير دعوت تأثير منفي نگذارد. گذشت پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;ومدارا با قريشان نه تنها از شدت استبداد ونيرنگ آنها نكاست بلكه فتيله ي فتنه افروزي وشهوت خونريزي وستم را در آنها شعله ورتر كرد، وكار به جايي رسيد كه تحمل استبداد آنها غير قابل برداشت بود. از اينرو مسلمانان خانه وكاشانه، مال وثروت خود را رها كرده از مكه فرار نموده، بسوي شهر يثرب (مدينه) هجرت كردند ودر آنجا پايه هاي اوليه حكومت اسلامي را پايه ريزي نمودند.&lt;br /&gt;
روند دشمني قريش با مسلمانان داخل مكه، وخارج آن شدت گرفته وهمواره در پي براندازي دولت اسلام بودند. اين روابط تيره واين مكرو حيله ها ونيرنگهاي قريشيان باعث شد كه سرنوشت منطقه به شيوه اي نوين رقم خورد، وفراز ونشيبهايي در روابط دوگانه صورت گيرد وستيزها وجنگهاي مسلحانه جزئي از اين جزرومد بود، كه مي توان آنها را از نقطه نظر مسلمانان به دو دسته تقسيم نمود.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;غزوه ها&lt;br /&gt;
هميشه رسول الله مي خواستند در همه سختيها علم بردار ميدان بوده، &amp;nbsp;بار سنگين مسئوليت را خود بدوش كشند ولي شركت آن حضرت در همه ميادين؛ باعث مشقت وسختي بسياري براي شاگردان وياران آن حضرت مي شد. آن حضرت مي فرمايند: سوگند به خداوندي كه جان محمد در دست اوست اگر ترس از مشقت وسختي بر مسلمانان نمي بود، هرگز از لشكري كه در راه خدا به جهاد مي رود عقب نمي ماندم. ولي در توانم نيست كه همه مسلمانان را مسلح نموده با خود ببرم، ودر توان هر مسلماني هم نيست كه خودش را مسلح وآماده كرده همراه من حركت كند وبر مسلمانان بسيار سخت وناگوار است كه از لشكري&amp;nbsp;كه من فرمانده اش هستم عقب بمانند. (به روايت امام مسلم نيشابوري)&lt;br /&gt;
از اينرو آن حضرت تنها رهبري وفرماندهي برخي از جنگها ويا لشكركشيها ويا مانورهاي نظامي را شخصاً&amp;zwnj; به عهده داشتند كه به آنها غزوه مي گويند.&lt;br /&gt;
در طول زندگي رسول الله 26 يا 27 غزوه صورت گرفت. علت اختلاف عدد در اين است كه رسول الله پس از فتح خيبر مستقيماً بسوي &amp;quot;وادي القري&amp;quot; لشكر كشي كردند، برخي از سيرت نگاران اين دو معركه را به دليل اينكه پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;پس از خيبر به مدينه بازنگشته اند، يك غزوه شمرده اند. وبرخي آنها را دو غزوه دانسته اند!&lt;br /&gt;
اولين غزوه رسول الله پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;غزوه &amp;quot;بودان&amp;quot; يا الأبواء&amp;quot; نام دارد كه در ماه صفر سال دوم هجري صورت گرفت، وآخرين غزوه آن حضرت غزوه &amp;quot;تبوك&amp;quot; است كه در ماه رجب سال نهم هجري بود.&lt;br /&gt;
در بيشتر غزوه هايي كه پيامبر فرماندهي آنها را به عهده داشتند هيچگونه جنگ ويا خونريزي صورت نگرفت وبيشتر آنها مانورهاي نظامي بود، تنها در 9 غزوه از 27 غزوه آن حضرت جنگ وخونريزي اتفاق افتاده كه عبارت بودند از : غزوه بدر، احد، خندق، بني قريظه، خيبر، فتح مكه،&amp;nbsp;حنين، طائف، تبوك.&lt;br /&gt;
در برخي از اين 9غزوه چون فتح مكه تنها تعداد بسيار اندكي كشته شدند، وبرخي از آنها چون غزوه بدر بيش از يك يا چند ساعت طول نكشيد. البته برخي از اين جنگها با وجود خسارتهاي جانبي؛ چون غزوه خندق مدت زمان زياد و زحمات فراواني را در برگرفت. در اين غزوه لشكر ده هزار نفري كافران نزديك به يك ماه مسلمانان را در محاصره قرار داد.&lt;br /&gt;
بزرگترين لشكري كه پيامبر فرماندهي آنرا به عهده داشته اند، لشكر تبوك بود كه تعداد سپاهيان اسلام در برخي روايات به سي هزار رقم زده مي شود كه در آن نيز خسارات جاني بسيار اندكي گزارش شده است!&lt;br /&gt;
شايد لازم به يادآوري نباشد كه پيامبر اكرم پيامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله سَلَّمَ ودين مبين اسلام از خونريزي به شدت متنفر است، ورسول الله جز در حالتهايي بسيار استثنائي مسير حركت لشكر خود را اعلام نمي داشتند، وهميشه سعي مي كردند دشمن را غافل گير ساخته با كمترين خسارتهاي جاني از دو طرف به اهداف خود دست يابند.&lt;br /&gt;
در بيشتر موارد تا غزوه خندق يا احزاب، سپاه كفر جنگ ووقت وجاي آن را بر مسلمانان تحميل مي كرد، ولي پس از شكست سهمگيني كه احزاب (گروههاي) متحد كفر از بت پرستان ويهوديان، در غزوه خندق خوردند، معادله رهبري منطقه به كلي تغيير پذيرفت وپيامبراكرم در يك جمله آنرا به تصوير كشيدند!&lt;br /&gt;
&amp;quot;الآن نغزوهم ولايغزوننا، نخن نسير إليهم&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;از اين به بعد ما بسوي آنها لشكر مي كشيم، وآنها توان لشكر كشي را نخواهند داشت، وما بسوي آنها حركت مي كنيم&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سريه ها ويا گشتها&lt;br /&gt;
لشكر كشيها ويا مانورهاي نظامي ويا جنگهايي كه آن حضرت شخصاً در آنها حضور نداشتند، وفرماندهي آنها را به يكي از يارانش سپرده بودند را سريه يا بعثه &amp;quot;گشت&amp;quot; مي گويند.&lt;br /&gt;
سيرت نگاران در تعداد اين مانورهاي نظامي بنا به طبيعت آنها اختلاف نظر دارند، كمترين عددي كه در اين زمينه ذكر شده 35 وبيشترين آن 66 سريه است. امام ابن حزم تعداد گشتها ومانورها وسريه ها را 47 سريه شمرده است.&lt;br /&gt;
غالباً اين سريه ها به نام ميدان ويا روستا وشهري كه در آن صورت گرفته اند، ويا به نام فرمانده سريه در كتابهاي سيرت نامگذاري شده اند.&lt;br /&gt;
در بيشتر اين مانورهاي نظامي هيچ گونه جنگ وخونريزي صورت نگرفت. در واقع هدف از اين مانورها در كنار آموزش جنگي افراد، وتربيت فرماندهان نظامي، ابراز قدرت مسلمانان وآمادگي آنها در دفاع از دولت خود بود، تا قبيله هاي مهاجم هميشه از مسلمانان حساب برده، جرأت حمله به مدينه را نداشته باشند.&lt;br /&gt;
به عبارت ديگر اين سريه ها به دستور قرآن جامعه عمل مي پوشانيد كه فرموده اند:&lt;br /&gt;
{وَأَعِدُّواْ لَهُم مَّا اسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍ وَمِن رِّبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِهِ عَدْوَّ اللّهِ وَعَدُوَّكُمْ وَآخَرِينَ مِن دُونِهِمْ لاَ تَعْلَمُونَهُمُ اللّهُ يَعْلَمُهُمْ وَمَا تُنفِقُواْ مِن شَيْءٍ فِي سَبِيلِ اللّهِ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لاَ تُظْلَمُونَ }(الأنفال/60) ترجمه: (&amp;rlm;براي ( مبارزه با ) آنان تا آنجا كه مي&amp;zwnj;توانيد نيروي ( مادي و معنوي ) و (از جمله) اسبهاي ورزيده آماده سازيد ، تا بدان ( آمادگي و ساز و برگ جنگي ) دشمنِ خدا و دشمن خويش را بترسانيد ، و كسان ديگري جز آنان را نيز به هراس اندازيد كه ايشان را نمي&amp;zwnj;شناسيد و خدا آنان را مي&amp;zwnj;شناسد . هر آنچه را در راه خدا ( از جمله تجهيزات جنگي و تقويت بنيه دفاعي و نظامي اسلامي ) صر</description>
</item><item>
<title>اهمیت کتابخوانی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/365</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 16px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;اهمیت کتابخوانی&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پرورش و تربیت خواندن از روزهای اول زندگی و کودکی و در محیط خانه و خانواده شروع می&amp;zwnj;گردد و تا آخرین مراحل و عاليترين تحصیلات دانشگاهی ادامه پیدا می&amp;zwnj;کند، پدران و مادران باید عادت کتابخوانی را در فرزندان خود بوجود بیاورند و همچنین مربیان تربیتی كه نقش مهمي در تربيت دارند به خردسالان و کودکان آموزشی که لازم و كافي می&amp;zwnj;باشد بدهند تا آنها را به کتاب خواندن راغب کند و اگر این آموزش توسط رسانه&amp;zwnj;های همگانی باشد تاثیر بیشتری دربرخواهد داشت. و اما عادت نمودن به کتابخوانی لازم و کافی نبوده و میبایست نسبت به تحکیم و تداوم آن عادت نمود که هدف و مقصود مطالعه را تحقق ببخشد و برای تداوم عادت خواندن می&amp;zwnj;بایست نظام&amp;zwnj;های دیگر هم به یاری و همکاری نظام آموزش بیایند خصوصا رسانه&amp;zwnj;های همگانی و امکانات و ابرازهاي ارتباطی فراگیر نقش پیگیر و هماهنگ&amp;zwnj;کننده را در رشد كتابخواني در جامعه بر عهده بگیرند.&lt;br /&gt;
اسلام که دینی عالم&amp;zwnj;گیر می&amp;zwnj;باشد به کتاب و کتابت عجین شده است، و معجزه&amp;zwnj;ی آن کتاب (قرآن کریم) بوده به اندازه لازم در تشویق و ترغیب به امر کتاب و کتابخوانی و گسترش و توسعه کتابخانه سفارش نموده است.&lt;br /&gt;
دنیای بزرگ و شگفت&amp;zwnj;انگیز کتاب و کتابخوانی به گروه خاصی و ويژه&amp;zwnj;اي تعلق نداشته و هر فرد باید با کتاب زندگی کند و مطالعه و کتابخوانی باید بعنوان یک نیاز و احساس دایمی لازم و روزانه در میان عموم رایج و مطرح باشد تا افراد جامعه به خواندن و مطالعه ترغيب و فرهنگ كتاب و كتابخواني رواج يابد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;نقش و اهمیت کتاب و کتابخوانی:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
درباره اهمیت کتاب و کتابخوانی این است که با نهادینه کردن عادت به مطالعه در همه تفکرات و اندیشه&amp;zwnj;ها و دل&amp;zwnj;ها اقدام تا با همگانی کردن شور، شوق و عشق به کتاب و کتابخوانی که آن در جامعه استمرار داشته باشد. اما جای تاسف دارد که عادت به مطالعه جایگاهی در رشد همه جانبه در همه سطوح اجتماع ما پیدا نکرده است. و هنوز که است عده&amp;zwnj;ای از خواندن سرباز می&amp;zwnj;زنند كه می&amp;zwnj;بایست در پیشگیری از توسعه و گسترش بیشتر این آفت بمنظور رشد و اعتلای فرهنگ عمومی کوشش و تلاش زيادي نمود. و این معضلهء بزرگ را با جدیت و سخت کوشی هر چه تمامتر از جامعه دور کرد و حالا موقعی آن شده است که همه انگیزه&amp;zwnj;ها و موانعی که به هر دلیل در زمینه کتاب و کتابخوانی ایجاد شده است کنار رانده و با یاری، کمک، مردانگی و اراده قاطع تصمیم شکست&amp;zwnj;ناپذیری گرفته و نسبت به احیای کتاب و کتابخوانی اقدام کنیم.&lt;br /&gt;
اهمیت کتاب هنگامی که روح به معنی اینکه در پیکره هنر دمیده گردد و معنویت به شکل هنری ارائه می&amp;zwnj;شود درجه تاثیرگذاری و ماندگاری آن به شدت روبه فزونی می&amp;zwnj;رود و پرداختن به اصولی از مسایل فرهنگی کشور از جمله مسئله کتاب و کتابخوانی و راه حل&amp;zwnj;های جهت رفع معضلات، تنگناها و مشکلات آن، اگرچه اموري است که نیازمند همت همگانی می&amp;zwnj;باشد ولی بخش&amp;zwnj;های دولتی مسئول آن هستند و می&amp;zwnj;بایست در راه آن سرمایه&amp;zwnj;گذاری نموده و با بصیرت و قدرت نظارت لازم بر مسایل فرهنگی داشته باشند و آن را سر و سامان دهند و دستگاه&amp;zwnj;های دولتی اداره&amp;zwnj;کننده&amp;zwnj;ی کشور می&amp;zwnj;بایست با پیشتازی کسانی را که دارای تفکر و اهل قلم هستند ترغیب نمایند تا به مطالعه و تحقیق دست زده و حاصل و نتیجه تلاش&amp;zwnj;هایشان را در معرض استفاده کننده و همگان بگذارند و از این طریق می&amp;zwnj;توان فرهنگ جامعه را به پویایی و بالندگی رساند.&lt;br /&gt;
تجزیه و تحلیل از کمیت کتاب نقش آن را کم&amp;zwnj;رنگ می&amp;zwnj;كند که باید مستقیماً نویسنده را وارد عمل نمود، نویسنده&amp;zwnj;ای که با خواندن کتاب آغاز می&amp;zwnj;نماید و از اول نویسندگی دانشی را نداشته و با مطالعه&amp;zwnj;ی بیشتر به نویسندگی دست يافته است و او فردي کاملا خاصی می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
در موقع تبلیغ و تمجید کتاب و کتابخوانی می&amp;zwnj;بایست مسئولیت عرضه&amp;zwnj;کننده و پدیدآوردگان کتاب که دارای اهمیت و مسئولیت سنگینی بوده&amp;zwnj;اند اشاره نمود. واقعا کسانی كه برای غذای روان و اندیشه نسبت به تهیه و توزیع کتاب می&amp;zwnj;پردازند باید بداند که درباره خدمت به اینگونه کارها فایده داشته و همچنین دارای پاداش بزرگی است.&lt;br /&gt;
پیامی که در نمایشگاه کتاب درباره اهمیت و لزوم کتابخوانی مي&amp;zwnj;باشد ضرورت دارد و باید اهمیت آن را در نظر گرفتن جهت بالابردن شکوفایی بیشتر استعدادهای توانمند که برای درک و فهم عمیق حقایق همگانی با تحولات علمی و فنی، غنا ساختن آن و سازماندهی بر تلاش&amp;zwnj;های فرهنگی و ایجاد نظام اطلاع&amp;zwnj;رسانی منسجم و توانمند ضرورت دارد و بر بهره&amp;zwnj;وری آن در نمایشگاه&amp;zwnj;های کتاب به بازدهی و افزايش آنها کمک می&amp;zwnj;کنند.&lt;br /&gt;
هرگاه ضرورت کتابخوانی و اهمیت آن برای همگان تفسیر و تعبير گردد در آن صورت در هیچ جای نباید فردی یافت شود که با مطالعه بیگانه باشد و در هیچ مکان و زمانی نباید وجود داشته باشد مگر نقش محدودی که کتاب درآن نادیده انگاشته شود.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;راه&amp;zwnj;ها و شیوه&amp;zwnj;های کتاب و کتاب خوانی&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
براي ايجاد جذب و جلب افراد به مطالعه راه&amp;zwnj;هاي مي&amp;zwnj;باشد تا آنها را به كتاب و كتابخواني ترغيب و تشويق نمائيد كه در اين مقاله به تعدادي از شيوه&amp;zwnj;هاي كه در راغب كردن مردم به مطالعه را سبب مي&amp;zwnj;گردد بيان نمائيم؛ و آن روش&amp;zwnj;ها عبارتند از:&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li&gt;برگزاری مسابقات کتابخوانی و خلاصه&amp;zwnj;نویسی کتاب&amp;zwnj;ها می&amp;zwnj;توانند گرایش افراد را به مطالعه منجر کند و این گونه مسابقات باید از روی اصول و سنجیده برگزار شود که این زمینه&amp;zwnj;ساز عده&amp;zwnj;ای زیادی از افراد به مطالعه خواهد شد.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;با گزیده&amp;zwnj;نویسی و خلاصه&amp;zwnj;سازی تعدادی از کتب حجیم و قطور مردم را به مطالعه ترغیب کرد که اغلب به خاطر گرفتاری و نداشتن فرصت کافی از مطالعه باز می&amp;zwnj;ماند، وقتی که آثار خوب، مفید و ارزنده خلاصه گردد می&amp;zwnj;تواند، رغبت بعضی از افراد به مطالعه را افزایش داده و در آن امر کتاب و کتابخوانی موثر باشد.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;فراهم کردن امکانات و فرصت&amp;zwnj;های مطالعاتی برای کودکان و نوجوانان که نیاز به کمک دارند علاوه بر کوشش و تلاش خود آنان نیاز به تلاش&amp;zwnj;ها و برنامه&amp;zwnj;ریزی و مشارکت حساب شده مربیان دارند جهت تشویق و ترغیب آنها به مطالعه باید نسبت به تهیه و خرید کتاب آنها را همراهی کرد و جهت بازدید به نمایشگاه&amp;zwnj;ها و فروشگاه&amp;zwnj;های کتاب و یا هدیه&amp;zwnj;ی کتاب، آنها را راغب نمود و به کودکان قبل از دبستان باید اهمیت داد که می&amp;zwnj;تواند با گرفتن هدیه&amp;zwnj;ی برجسته&amp;zwnj;ای از اولیا و مربیان، علاقه کودکان را به کتاب و کتابخوانی تعیین و تثبت کرد و آنها را به اين راه كشاند.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;برای ترغیب و علاقمند کردن کودکان به کتاب و کتاب&amp;zwnj;خوانی این است همانطور که بزرگترها مطالعه می&amp;zwnj;نمایند مي&amp;zwnj;توانند كتاب&amp;zwnj;هاي كودكانه را گزينش كنند، و در فرصت&amp;zwnj;های که کاری ندارند برای کودکانشان آن&amp;zwnj;ها را بخوانند که این کار سبب کتابدوستی و علاقمندی به کتابخوانی می&amp;zwnj;شود، و این عشق به تدریج در وجود كودک نهادینه می&amp;zwnj;گردد.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;کتاب&amp;zwnj;های تازه و جدیدی به مجموعه&amp;zwnj;اي کتابخانه&amp;zwnj;ها بايد افزود که این امر گوارا و دلنشین بوده و حیات و پویایی کتابخانه را تامین و تضمین می&amp;zwnj;كند، و با فزونی بخشیدن به طالبان دانش و بینش آنها را ترغيب نمود، هرگاه امکانات لازم و ضروری را به کتابخانه ندهند آن کارائی خود را از دست می&amp;zwnj;دهد و قدرت جذب عضوهای جدید را ندارد و اعضا و مراجعین که قبلا داشته رو به کاهش می&amp;zwnj;گذرد بدینوسیله همواره باید کتابخانه&amp;zwnj;ها را از لحاظ کتاب تقویت کرد.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;می&amp;zwnj;بایست با برداشتن گام موثری که مردم را به طرف کتاب و کتابخوانی ترغیب نمود و آنها را به سوی کتاب و کتابخوانی سوق داد، گامی ارزشمند و تلاشی بزرگی در این زمینه برداشت، و با یافتن چنین راه&amp;zwnj;های از قبیل برگزاری نمایشگاه&amp;zwnj;های دایمی کتاب، مسابقه کتابخوانی همراه با اختصاص جوایز برای کتابخوان&amp;zwnj;ها. و همچنان برای تلاش بیشتر در این مسیر، باید وسایلی را از کارهای اساسی و ارزنده، مفید و ثمر بخش، فراهم کرد.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;یکی ازعمده&amp;zwnj;ترین و بهترین راه&amp;zwnj;های افزایش اطلاعات عمومی، مطالعه کتاب می&amp;zwnj;باشد که همین زمینه&amp;zwnj;ساز گام&amp;zwnj;های بعدی برای رفع نیاز می&amp;zwnj;باشد و به گونه مطلوب آنها را به قله&amp;zwnj;ی پیشرفت در همه زمینه&amp;zwnj;های مادی و معنوی می&amp;zwnj;رساند.&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اگر بتوان مردم را با هر ترتيبی كه مي&amp;zwnj;باشد به كتاب و كتابخواني تشويق و ترغيب كرد و استعدادهاي كه در جامعه مي&amp;zwnj;باشد شناسايي كرد، مي&amp;zwnj;توان به توسعه و پيشرفت كشور و جامعه اميدوار بود. و اينك نتيجه مي&amp;zwnj;گيريم اگر فرهنگ كتاب و مطالعه در جامعه&amp;zwnj;ی ما رونق پيدا كند و علاقمندان زيادي به آن رو آورند باعث توسعه و گسترش كشور و سرفرازي ملت و جامعه خواهد شد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فدایی، غلامرضا: کتاب و کتابخانه &amp;laquo;مدیریت و توسعه&amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://www.datikan.com/&quot;&gt;موسسه حقوقی داتیکان&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>دکتر عمر بن سلیمان الأشقر درگذشت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/364</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;دکتر عمر بن سلیمان الأشقر درگذشت&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/book_files/images/ashqar.jpg&quot; alt=&quot;&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;شیخ علامه دکتر عمر بن سلیمان بن عبد الله الأشقر داعی و استاد دانشکده&amp;zwnj;ی شریعت دانشگاه&amp;zwnj; اردنی در عمان، پایتخت اردن، روز جمعه&amp;zwnj; ۲۰ مرداد 1391هـ، در سن ۷۲ سالگی، دار فانی را وداع گفت.&lt;br /&gt;
دکتر اشقر متولد ۱۹۴۰م در روستایی از توابع استان نابلس فلسطین از خانواده&amp;zwnj;ای اهل علم به&amp;zwnj; دنیا آمد، برادر وی دکتر محمد سلیمان اشقر از علمای نامدار اصول فقه&amp;zwnj; است.&lt;br /&gt;
استاد اشقر در سن سیزده سالگی فلسطین را به&amp;zwnj; مقصد عربستان سعودی&amp;zwnj; ترک نمود و در ریاض ساکن شد و تحصیلاتش را تا مقطع کار&amp;zwnj;شناسی در&amp;zwnj;&amp;zwnj; همان شهر، در دانشگاه&amp;zwnj; امام محمد بن سعود &amp;zwnj; به&amp;zwnj; اتمام رساند. سپس به مدینه منوره رفت و آنجا به عنوان کتابدار کتابخانه دانشگاه اسلامی مدینه ایفای وظیفه نمود. سپس در سال 1965م به&amp;zwnj; کویت رفت و بعد از آن به مصر رفت و مقطع کار&amp;zwnj;شناسی ارشد را در دانشگاه&amp;zwnj; الازهر به&amp;zwnj; پایان رساند و پس از مدتی دانشنامه&amp;zwnj;ی دکتری&amp;zwnj;اش را با پایان&amp;zwnj;نامه&amp;zwnj;ای با عنوان &amp;laquo;نیت&amp;zwnj;ها و مقاصد مکلفان&amp;raquo; در فقه&amp;zwnj; تطبیقی در دانشکده&amp;zwnj;ی شریعت دانشگاه&amp;zwnj; ازهر در سال ۱۹۸۰م دریافت نمود و در همان سال در دانشکده&amp;zwnj;ی شریعت دانشگاه&amp;zwnj; کویت مشغول به&amp;zwnj; تدریس شد.&lt;br /&gt;
شیخ اشقر تا سال ۱۹۹۰م در دانشگاه کویت به عنوان استاد ایفای وظیفه نمود؛ سپس به&amp;zwnj; اردن رفت و به&amp;zwnj; عنوان استاد در دانشکده&amp;zwnj;ی شریعت دانشگاه&amp;zwnj; اردن و سپس به&amp;zwnj; عنوان رییس دانشکده&amp;zwnj;ی شریعت دانشگاه&amp;zwnj; زرقاء به&amp;zwnj; کار گمارده&amp;zwnj; شد. سرانجام مشغول تحقیق، بررسی و نگارش شد و تحقیقات و کتاب&amp;zwnj;های مهمی را منتشر نمود.&lt;br /&gt;
شیخ اشقر در محضر اساتیدی همچون برادرش دکتر محمد بن سلیمان اشقر، شیخ عبدالعزیز بن&amp;zwnj;باز، شیخ محمد ناصرالدین آلبانی و شیخ عبد الجلیل القرقشاوی تلمذ نموده&amp;zwnj; بود.&lt;br /&gt;
همچنین شیخ شاگردان بسیاری تربیت کرد که&amp;zwnj; می&amp;zwnj;توان به&amp;zwnj; ابراهیم العلی، احسان العتیبی، اسامه&amp;zwnj; فتحی ابوبکر، عمر ابراهیم عادی، پسرش دکتر اسامه&amp;zwnj; و دکتر جاسم المطوع اشاره&amp;zwnj; کرد.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب&amp;zwnj;های زیادی از ایشان به زبان فارسی نیز ترجمه&amp;zwnj; و منتشر شده&amp;zwnj;اند، از آن جمله:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;1- &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/691/&quot;&gt;شناخت الله عز و جل&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/672/&quot;&gt;2- &amp;nbsp;اسما و صفات الهی&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;3-&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/704/&quot;&gt;دنیای فرشتگان&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;4-&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/680/&quot;&gt;دنیای جن ها و شیاطین&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;5-&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://سیمای روز رستاخیز&quot;&gt;سیمای روز رستاخیز&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;6-&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/705/&quot;&gt;قیامت صغری و علایم قیامت کبری&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;7-&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/673/&quot;&gt;پیامبران و رسالت الهی&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;8- &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/700/&quot;&gt;گفتاری پیرامون قضا و قدر&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;9-&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/670/&quot;&gt;بنیان ایمان&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;10- &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/676/&quot;&gt;توحید محور زندگی&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;11- &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/683/&quot;&gt;دنیای سحر و شعبده بازی&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;12-&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://روش عملی تزکیه در پرتو قرآن و سنت&quot;&gt;روش عملی تزکیه در پرتو قرآن و سنت&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;13- &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/837/&quot;&gt;پیامدهای خطرناک تأویل&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;14- &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/684/&quot;&gt;کاوشی پیرامون بهشت و دوزخ&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرارسیدن ماه خیر و برکت، رمضان مبارک باد!</title>
<link>http://qalamlib.com/news/363</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;strong&gt;فرارسیدن ماه خیر و برکت، رمضان مبارک باد!&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ماه رمضان، ماه بزرگ و با عظمتی است، در این ماه روزه كه پديدآورنده&amp;zwnj; تقوى&amp;zwnj; است، بر مسلمانان فرض گردیده است:&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ﴾ [البقرة: &amp;nbsp;١٨٣]&amp;nbsp;&amp;laquo;اي&amp;zwnj; مؤمنان&amp;zwnj;!!، بر شما روزه&amp;zwnj; فرض&amp;zwnj; گردانيده&amp;zwnj; شد همان&amp;zwnj;گونه&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; بر آنان&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; پيش&amp;zwnj; از شما بودند، فرض&amp;zwnj; شده&amp;zwnj; بود. باشد كه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; تقوی&amp;zwnj; گراييد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;در این ماه پرفیض و برکت، قرآن، آخرین کلام رب العالمین برای نجات بشریت، نازل گردیده است:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
﴿شَهۡرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِيٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلۡقُرۡءَانُ هُدٗى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٖ مِّنَ ٱلۡهُدَىٰ وَٱلۡفُرۡقَانِۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهۡرَ فَلۡيَصُمۡهُ﴾ [البقرة: ١٨٥]&lt;br /&gt;
&amp;laquo;(آن چند روز محدود و اندک) ماه رمضان است (ماهی) که قرآن در آن نازل شده است، (کتابی) که راهنمای مردم است، و (در بردارنده) نشانه&amp;zwnj;ها و دلایل آشکار و روشن از هدایت و جدا کننده&amp;zwnj;ی حق از باطل است. پس هر کس از شما این ماه را (در حضر) دریابد، باید که آن را روزه بدارد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;خداوند قرآن را در شبی از شب&amp;zwnj;های رمضان نازل نمود که خیر و برکت آن از هزار ماه بیشتر است،&lt;/strong&gt; همان&amp;zwnj;گونه که خداوند عزوجل می&amp;zwnj;&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید:&lt;br /&gt;
﴿إِنَّآ أَنزَلۡنَٰهُ فِي لَيۡلَةِ ٱلۡقَدۡرِ ١ وَمَآ أَدۡرَىٰكَ مَا لَيۡلَةُ ٱلۡقَدۡرِ ٢ لَيۡلَةُ ٱلۡقَدۡرِ خَيۡرٞ مِّنۡ أَلۡفِ شَهۡرٖ ٣﴾ [القدر:۱-۳]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;laquo;ما (قرآن را) در شب قدر نازل کردیم و &amp;rlm; تو چه مي&amp;zwnj;داني شب قدر كدام است (و چه اندازه عظيم است&amp;zwnj;؟) &amp;rlm;شب قدر از هزار ماه ارجمندتر است&amp;raquo;.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;یعنی عبادت در آن - اگر مورد قبول واقع شود- از عبادت 83 سال و 3 ماه برتر است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;منظور از نزول قرآن در این&amp;zwnj;جا، نزول یک&amp;zwnj;باره به &amp;laquo;بیت العزة&amp;raquo; در آسمان دنیا در شب قدر است،&lt;/strong&gt; تا بعداً به صورت تدریجی در مدت زمان نبوت بر اساس رویدادها و مراحلی&amp;zwnj;که پیش روی دعوت بود، بر پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- نازل گردد.&lt;br /&gt;
ابن کثیر -رحمه الله- در تفسیرش آورده است: &amp;laquo;و اما قرآن یک&amp;zwnj;باره به &amp;laquo;بیت العزة&amp;raquo; از آسمان دنیا نازل شده، و این اتفاق در شب قدر از ماه رمضان روی داده است، همان&amp;zwnj;گونه که خداوند عزوجل می&amp;zwnj;&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: ﴿إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ﴾ و پس از آن به صورت تدریجی و بر اساس حوادث بر پیامبر- صلی الله علیه وآله وسلم- نازل گردیده است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
ابن عباس -رضی الله عنهما- فرموده است: &amp;laquo;قرآن در شب قدر از ماه رمضان، در شبی مبارک نازل گردیده، سپس به صورت منظم و هماهنگ در طول ماه&amp;zwnj;ها و ایام نازل شده است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
شب قدر بنا بر فرمودۀ پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- در شب&amp;zwnj;های فرد ده آخر رمضان طلب می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- می&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: &amp;laquo;تَحَرَّوْا لَيْلَةَ القَدْرِ فِي الوِتْرِ، مِنَ العَشْرِ الأَوَاخِرِ مِنْ رَمَضَانَ&amp;raquo;. &amp;laquo;شب قدر را در شب&amp;zwnj;های فرد از دهة آخر رمضان جستجو کنید&amp;raquo;. [صحیح بخاری]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;در این ماه دروازه&amp;shy;های بهشت گشوده و درهای جهنم بسته می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، و شیاطین به بند و زنجیـر کشیده می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند،&lt;/strong&gt; چنان&amp;zwnj;که در حدیث، پیامبر- صلی الله علیه وآله وسلم- فرموده است:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;إِذَا جَاءَ رَمَضَانُ، فُتِّحَتْ أَبْوَابُ الْجَنَّةِ، وَغُلِّقَتْ أَبْوَابُ النَّارِ، وَصُفِّدَتِ الشَّيَاطِينُ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;laquo;با فرا رسیدن ماه رمضان، در&amp;zwnj;های بهشت گشوده و درهای آتش بسته می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود و شیاطین به زنجیر کشیده می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند&amp;raquo;. [صحیح بخاری و صحیح مسلم]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;همچنین می&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: &amp;laquo;إِذَا كَانَ أَوَّلُ لَيْلَةٍ مِنْ شَهْرِ رَمَضَانَ صُفِّدَتِ الشَّيَاطِينُ، وَمَرَدَةُ الجِنِّ، وَغُلِّقَتْ أَبْوَابُ النَّارِ، فَلَمْ يُفْتَحْ مِنْهَا بَابٌ، وَفُتِّحَتْ أَبْوَابُ الجَنَّةِ، فَلَمْ يُغْلَقْ مِنْهَا بَابٌ، وَيُنَادِي مُنَادٍ: يَا بَاغِيَ الخَيْرِ أَقْبِلْ، وَيَا بَاغِيَ الشَّرِّ أَقْصِرْ، وَلِلَّهِ عُتَقَاءُ مِنَ النَّارِ، وَذَلكَ كُلُّ لَيْلَةٍ&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&amp;laquo;با فرارسیدن شب اول از رمضان، شیاطین و جن&amp;zwnj;های سرکش به زنجیـر کشـیده می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند و تمامی در&amp;zwnj;های جهنم بسته می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، به طوری&amp;zwnj;که دری باز باقی نمی&amp;shy;ماند و تمامی درهای بهشت گشوده می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، به طوری&amp;zwnj;که دری بسته نخواهد بود، و کسی ندا می&amp;zwnj;&amp;shy;دهد: ای خواهان خیر و ثواب! به سوی خدا و عبادت روی آور، و ای خواهان شر و بدی و فساد! دست بردار، و در این ماه خدا آزاد شدگانی از آتش دارد و این ندا و آزاد شدن در تمامی شب&amp;zwnj;های ماه رمضان است&amp;raquo;. [صحیح سنن ترمذی]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;در این ماه گناهان بخشیده می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود&lt;/strong&gt; چنان&amp;zwnj;که در حدیث صحیح، پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- فرموده است: &amp;laquo;مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کس رمضان را با ایمان، و به نیت اجر و پاداش قیامت روزه بگیرد، گناهان گذشتة او بخشیده خواهد شد&amp;raquo;. [صحیح بخاری و مسلم]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;و می&amp;zwnj;&amp;shy;فرماید: &amp;laquo;وَرَمَضَانُ إِلَى رَمَضَانَ، مُكَفِّرَاتٌ مَا بَيْنَهُنَّ إِذَا اجْتُنِبَتِ الْكَبَائِرَ&amp;raquo;. &amp;laquo;رمضان تا رمضان سبب کفارۀ گناهان بین آن دو است به شرطی&amp;zwnj;که از گناهان کبیره خودداری شود&amp;raquo;. [صحیح مسلم]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;در فضیلت روزه به طور عموم احادیث زیادی روایت شده است، از جمله:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فرمودۀ پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;مَنْ صَامَ يَوْمًا فِي سَبِيلِ اللهِ جَعَلَ اللَّهُ بَيْنَهُ وَبَيْنَ النَّارِ خَنْدَقًا كَمَا بَيْنَ السَّمَاءِ وَالأَرْضِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کس روزی در راه خدا روزه باشد، خداوند بین او و آتش، خندقی به فاصلۀ آسمان و زمین قرار می&amp;zwnj;&amp;shy;دهد&amp;raquo;. [صحیح سنن الترمذی]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;و فرمودۀ پیامبر -صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;مَنْ صَامَ يَوْمًا فِي سَبِيلِ اللهِ زَحْزَحَهُ اللَّهُ عَنِ النَّارِ سَبْعِينَ خَرِيفًا&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کس، روزی در راه خدا روزه باشد، خداوند او را هفتاد سال از آتش دور می&amp;zwnj;&amp;shy;گرداند&amp;raquo;. [صحیح سنن الترمذی]&lt;br /&gt;
و از ابو أمامه -رضی الله عنه- روایت است که: &amp;laquo;به پیامبر خدا -صلی الله علیه وسلم- گفتم: ای رسول خدا، مرا به عملی ارشاد کن که با انجام آن به بهشت وارد شوم. پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم- فرمود: &amp;laquo;عَلَيْكَ بِالصَّوْمِ؛ فَإِنَّهُ لَا مِثْلَ لَهُ&amp;raquo;. وفي رواية: &amp;laquo;عَلَيْكَ بِالصَّوْمِ؛ فَإِنَّهُ لَا عِدْلَ لَهُ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;روزه بگیر، زیرا هیچ چیز مثل و مانند روزه نیست&amp;raquo;. و در روایتی دیگر &amp;laquo;روزه بگیر که هیچ چیز با آن برابری ندارد&amp;raquo;. [صحیح سنن النسائی]&lt;br /&gt;
و فرمودۀ پیامبر - صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;كُلُّ عَمَلِ ابْنِ آدَمَ يُضَاعَفُ، الْحَسَنَةُ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا إِلَى سَبْعِمِائَةِ ضِعْفٍ إِلَى مَا شَاءَ اللَّهُ، يَقُولُ اللَّهُ: إِلَّا الصَّوْمَ؛ فَإِنَّهُ لِي وَأَنَا أَجْزِي بِهِ، يَدَعُ شَهْوَتَهُ وَطَعَامَهُ مِنْ أَجْلِي، لِلصَّائِمِ فَرْحَتَانِ: فَرْحَةٌ عِنْدَ فِطْرِهِ، وَفَرْحَةٌ عِنْدَ لِقَاءِ رَبِّهِ. وَلَخُلُوفُ فَمِ الصَّائِمِ أَطْيَبُ عِنْدَ اللَّهِ مِنْ رِيحِ الْمِسْكِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;هر کردار نیکوی انسان ده تا هفتصد برابر ثواب و پاداش دارد، خداوند متعال فرموده است: جز روزه، چون روزه برای من است و من پاداش آن&amp;zwnj;را می&amp;zwnj;&amp;shy;دهم، شهوت و طعامش را به خاطر من رها می&amp;zwnj;&amp;shy;سازد و برای فرد روزه دار دو شادمانی هست: شادمانی در هنگام افطارش و شادمانی در هنگام ملاقات پروردگارش، به خدا سوگند بوی دهان روزه&amp;zwnj;دار در نزد خداوند خوشبوتر از بوی مشک است&amp;raquo;. [مسند احمد و صحیح بخاری و صحیح مسلم با الفاظ متفاوت و مختلف]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;و فرمودۀ پیامبر -صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;الصِّيَامُ وَالْقُرْآنُ يَشْفَعَانِ لِلْعَبْدِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ، يَقُولُ الصِّيَامُ: أَيْ رَبِّ، مَنَعْتُهُ الطَّعَامَ وَالشَّهَوَاتِ بِالنَّهَارِ، فَشَفِّعْنِي فِيهِ، وَيَقُولُ الْقُرْآنُ: مَنَعْتُهُ النَّوْمَ بِاللَّيْلِ، فَشَفِّعْنِي فِيهِ&amp;raquo;، قَالَ: &amp;laquo;فَيُشَفَّعَانِ&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;روزه و قرآن در روز قیامت برای بنده شفاعت می&amp;zwnj;&amp;shy;کنند، روزه می&amp;zwnj;&amp;shy;گوید: پروردگارا .. او را از خوراک و شهوت باز داشتم، پس شفاعت مرا در بارة او بپذیر و قرآن می&amp;zwnj;&amp;shy;گوید: او را از خواب شبانه باز داشتم، پس شفاعتم را در بارة او بپذیر، پیامبرr فرمود: شفاعت آنان پذیرفته خواهد شد&amp;raquo;. [مسند احمد، مستدرک حاکم، و شعب الإیمان بیهقی. آلبانی می&amp;zwnj;گوید: حسن و صحیح است]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;همچنین فرمودۀ پيامبر -صلی الله علیه وآله وسلم-: &amp;laquo;إِنَّ فِي الْجَنَّةِ بَابًا يُقَالُ لَهُ الرَّيَّانُ، يَدْخُلُ مِنْهُ الصَّائِمُونَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يَدْخُلُ فِيهِ أَحَدٌ غَيْرُهُمْ، فَإِذَا دَخَلُوا أُغْلِقَ عَلَيْهِمْ فَلَمْ يَدْخُلْ فِيهِ أَحَدٌ غَيْرُهُمْ فَإِذَا دَخَلَ آخِرُهُمْ أُغْلِقَ، مَنْ دَخَلَ فِيهِ شَرِبَ وَمَنْ شَرِبَ لَمْ يَظْمَأْ أَبَدًا&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;laquo;در بهشت دروازه هست کـه بـه آن &amp;laquo;ریـان&amp;raquo; گفتـه می&amp;zwnj;&amp;zwnj;شود، در روز قیـامت تنها روزه&amp;zwnj;داران از آن در وارد بهشت می&amp;zwnj;&amp;shy;شوند، از آن در، هیچ کس دیگری جز روزه&amp;zwnj;داران وارد نمی&amp;zwnj;شود، آخرین نفر از روزه&amp;zwnj;دارن که وارد بهشت شد، آن در نیز بسته خواهد شد و هر کس از آن در وارد شود، می&amp;zwnj;&amp;shy;نوشد و هر کس بنوشد هرگز تشنه نخواهد شد&amp;raquo;. [بخاری و مسلم و نسایی با الفاظ مختلف]&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;پس عبادت روزه، راهی است برای رسیدن به تقوا و پرهیزگاری. و در مدرسه روزه است که مرد مؤمن با کاروان متقیان و پرهیزگاران همسفر می‫شود، و اساسنامه هدایت (قرآن کریم) را به دست گرفته پله پله تا ملاقات خداوند به پیش می‫رود.&lt;br /&gt;
و در سایه تقوا انسان درمی‫یابد که پروردگارش کیست، و سر سجده و بندگی به درگاه حق فرود آورده بزرگی و عضمت او بدرستی در کالبدش تجلی می‫کند، و زبان و وجودش شکر و سپاس و ثنای او می‫شود، تنها اویی؛ که مؤمن سرگردان را به شرف هدایت نایل گردانید.&lt;br /&gt;
ماه رمضان؛ ماه قرآن و مدرسه دعا و نیایش و بندگی برای مؤمنان راستین است. شایسته است مؤمن در پرتو این ماه مبارک دریابد که تنها پناهگاه و تنها یار و یاور او پروردگاریست که او را آفریده. پس دست از امام زاده‫ها و قبرها و پیرها و مزارها شسته، از تمام مظاهر شرک و بت پرستی خود را رها کرده، بسوی پروردگارش پر کشد، ودستان نیایش و دعا بسوی او، و تنها او، دراز کند. و با تمام توان از او، و تنها او، بخواهد، و از گزند آفات و ضرر و زیانها به او ، و تنها او، پناه جوید.&lt;br /&gt;
رمضان بر همه شما مبارک بادا، و طاعات و عبادات و دعاهایتان قبول درگاه حق...&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;برادران و خواهران عزیز!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
سايت کتابخانه الکترونیکی عقيده مفتخر است كه مجموعه كتاب&amp;zwnj;هاى مفيدى را دربارۀ این ماه پر خیر و برکت و احكام روزه خدمت شما عزیزان معرفى نماید که در این سایت نشر گردیده است. امیدواریم این ماه، ماه رحمت و مغفرت و رهایی از آتش جهنم برای همۀ مسلمانان باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=891&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;font-size: 14px; line-height: 28px; font-family: Tahoma; text-align: center; text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;رمضان مبارک و فضایل آن&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;font color=&quot;#800080&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=868&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;ماه مبارک رمضان شاهراه رستگاری&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;font color=&quot;#800080&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=856&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;فقط برای جوانان در رمضان&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=418&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=397&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;حکمت و فقه روزه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=368&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;&lt;font color=&quot;#800080&quot;&gt;روزه سپر پارسایان&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; margin: 0cm 0cm 10pt; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=892&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;فقه روزه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 24px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 28px; font-size: 14px; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=653&quot; target=&quot;_blank&quot; style=&quot;text-decoration: none; color: rgb(74, 113, 148); &quot;&gt;روزه - فضائل، فوائد، احکام و آداب&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نسخه جدید دی وی دی (DVD) سایت عقیده با 1045 کتاب منتشر گردید. نسخه (5)، 22  خرداد 1391</title>
<link>http://qalamlib.com/news/357</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h1 style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 102, 0); &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 36px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt;&amp;nbsp;نسخه جدید دی وی دی (DVD) سایت عقیده با 1045 کتاب منتشر گردید.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Times New Roman&apos;; &quot;&gt; &lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;نسخه (5)، 22  خرداد 1391&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 22px; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Nazli; &quot;&gt;تنها با کلیک ماوس، بیش از هزار کتاب که دست یافتن به آن&amp;zwnj;ها آرزوی هر دانشور و طالب علم و معرفتی است بر صفحه کامپیوتر شما به نمایش در می‫آید.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;h2&gt;&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;کتابخانه عقیده؛ بزرگترین میراث فرهنگی قرن معاصر ما، خدمت ویژه‫ای را به دوستداران کتاب تقدیم داشته است. شما با دانلود دی وی دی سایت، تمامی کتاب&amp;zwnj;های این&amp;nbsp;کتابخانه&amp;nbsp;را در کامپیوتر خود خواهید داشت و در هر جا و هر زمانی که خواستید می توانید بدون اتصال به اینترنت از آنها استفاده کنید.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0); &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;ازمزایای این دی وی دی نسبت به نسخه های قبلی آن می&amp;zwnj;توان موارد زیر را برشمرد:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;1- بیش از 100 کتاب جدید&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;2- بسیاری از کتاب&amp;zwnj;ها در نسخه های قبل نیاز به صفحه آرایی داشت که بخش عمده آنها صفحه آرایی شده &amp;nbsp;و در نسخه&amp;zwnj;های ورد و پی دی اف در دسترس می&amp;zwnj;باشد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;3- بسیاری از کتاب&amp;zwnj;ها مراجعه شده و اشکالات تایپی، ویرایشی و محتوایی آنها برطرف گردیده است.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;4- کتاب های غیر فارسی از کتب فارسی جدا شده و در آینده در دی وی دی های مجزا منتشر خواهد شد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;5- حجم دی وی دی از 5.5 گیگابایت به 4 گیگابایت تقلیل یافته است (فایل های دانلودی فقط 3 گیگابایت هستند و پس از دانلود و باز شدن از حالت فشرده 4 گیگابایت خواهند بود). بنابراین کپی آنها در دی وی دی های معمولی به سادگی امکان پذیر است.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;ومزایای دیگری که خودتان با دانلود این نسخه از دی وی دی به آنها پی خواهید برد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;&lt;br type=&quot;_moz&quot; /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 20px; &quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Nazli; &quot;&gt;پس، پیش به&amp;zwnj;سوی علم و دانش و معرفت، و افروختن شمع هدایت و رستگاری در کالبد خویشتن و دیگران...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; &quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/dvd.shtml&quot; target=&quot;_self&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://aqeedeh.com/ebook/dvd/icon.gif&quot; alt=&quot;صفحه دانلود دی وی دی سایت عقیده&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/dvd.shtml&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 18px; &quot;&gt;صفحه دانلود دی وی دی&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نظرية ولاية الفقيه وتداعياتها في الفكر السياسي الإيراني المعاصر</title>
<link>http://qalamlib.com/news/356</link>
<description>&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;شفيق شقير&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;الدوافع التاريخية لتطور نظرية ولاية الفقيه&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; text-indent: 0.5in; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;يغلب على الفقه الشيعي الاثنى عشري التقليدي الطابع الفردي، ولم تكن مسألة الحكم والدولة من المسائل الخاضعة للبحث إلا بقدر ارتباطها بالفرد، مما يتطلب ملاحقة عدد من الجزئيات المتناثرة في مسائل فقهية وعقائدية في عصور سياسية متعددة كلها تشير بوضوح تام إلى أن الفقه والفقيه الشيعي (بوظيفته الأصلية) لم يكن واردا أن يقوما بالتنظير أو التعاطي مع السلطة الزمنية إلا بوصفها موقعا مقابلا منفصلا تماما قد يمكن التعامل معه إيجاباً أو سلباً&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;الشيعة الإمامية&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;الشيعة الإمامية يقولون إن النبي صلى الله عليه وسلم قد عين علياً للإمامة بالاسم والنص المباشر، وإن هذه الإمامة تستمر كذلك في ابنيه الحسن والحسين وتتسلسل بشكل وراثي عمودي في ذرية الحسين، وكل إمام يوصي لمن بعده إلى أن تبلغ الإمام الثاني عشر المهدي الغائب المنتظر&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;الإمامة والمهدوية&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;لم تكن فكرة الإمامة من البداية محددة المعالم، كانت مفتوحة على التاريخ فقهاً واعتقاداً، ومن المفترض أن تمتد من بعد وفاة الرسول صلى الله عليه وسلم إلى يوم القيامة يوصي بها كل إمام لمن بعده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;فجوهر النظرية الإمامية يعتمد على القول بعدم جواز خلو الأرض من قائم لله بالحجة (الإمام)، ويجب أن يكون معصوما، وتفوق أحيانا تلك التي يثبتها أهل السنة والجماعة للنبي، وهو مشرع ومبلغ عن الله يتصف بالعلم اللدني الإلهي ويوحى إليه من الله بالإلهام، حتى ذهب بعض المناوئين للشيعة إلى اعتبار أن الإمامة هي النبوة وتخالف ما تسمى بعقيدة ختم النبوة&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;قال هشام بن الحكم أقدم المنظرين للإمامة وهو يحاور أحدهم: &amp;quot;ولا بد من أن يكون في كل زمان قائم بهذه الصفة (العصمة) إلى أن تقوم الساعة&amp;quot;. (الصدوق، علل الشرائع 1/240، الباب 155)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ولكن بعد وفاة الإمام الحادي عشر الإمام الحسن العسكري في سامراء سنة 260هـ دون إعلانه عن وجود خلف له، أحدث شكاً وحيرة بشأن مصير الإمامة. فافترق الشيعة إلى أربع عشرة فرقة كما يقول النوبختي في &amp;quot;فرق الشيعة&amp;quot;، واحدة منها فقط قالت بوجود خلف للإمام العسكري، وأن اسمه محمد، وقد أخفاه والده خوفاً من السلطة فستر أمره&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ويروي الطوسي في &amp;quot;الغيبة&amp;quot; (ص 141 وما بعدها) قصة ولادة المهدي وما فيها من خوارق، وينقل حديثاً للحسن العسكري يجيب به عمته عن مكان ولده: &amp;quot;هو يا عمة في كنف الله وحرزه وستره وغيبه حتى يأذن الله له، فإذا غيب الله شخصي وتوفاني ورأيت شيعتي قد اختلفوا فأخبري الثقات منهم، وليكن عندك وعندهم مكتوبا، فإن ولي الله يغيبه الله عن خلقه ويحجبه عن عباده، فلا يراه أحد حتى يقدم له جبرائيل فرسه (ليقضي الله أمراً كان مفعولاً)&amp;quot;. فكانت هذه الغيبة الأولى وتتصل بإخفاء ولادته وسميت الغيبة الصغرى&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;استقرار فكرة المهدوية&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;إن أهمية فكرة المهدي للمذهب الاثني عشري أنها أتمت صورة المذهب عقائدياً، وساعدته على التماسك في وجه التحدي الذي فرضه موت الحسن العسكري دون أن يترك وصياً ظاهراً، فالفترة التي أعقبت موت العسكري اتسمت بحيرة الشيعة وضياعهم، ويصفها محمد بن أبي زينب النعماني في كتابه &amp;quot;الغيبة&amp;quot; (طبعة الأعلمي ص 103): &amp;quot;لأن الجمهور منهم (أي الشيعة) يقول في الخلف (خلف الحسن العسكري) أين هو، ومن يكون هذا، وإلى متى يغيب، وكم يعيش هذا وله الآن نيف وثمانون سنة، فمنهم من يذهب إلى أنه ميت ومنهم من ينكر ولادته ويجحد وجوده ويستهزئ بالمصدق به، ومنهم من يستبعد المدة ويستطيل الأمد. (الغيبة للنعماني ص 103)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ومن رحم هذه الحيرة خرج القائلون بوجود محمد بن الحسن العسكري واعتمدوا في إثبات وجوده على الأدلة العقلية بالدرجة الأولى، ولكنها كانت موجهة للشيعة فقط، فالمسألة مسألة إنقاذ التشيع وليس نشره&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;يقول الشيخ الصدوق في &amp;quot;إكمال الدين&amp;quot; (ص 36): &amp;quot;إن القول بغيبة صاحب الزمان مبني على القول بإمامة آبائه.. وإن هذا الباب شرعي وليس بعقلي محض&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وساعد وجود عدد من الأحاديث السنية التي تحدد عدد الخلفاء والأئمة بأنهم اثنا عشر وعن المهدي وصفته أو عن ولادته وغيبته لدى فرق أخرى كالواقفية الذين قالوا بمهدوية الكاظم ومن شابههم.. فقد ساعد هذا كله على استقرار فكرة المهدوية عند الاثني عشرية، ولكن بالمقابل فإن فكرة غياب الإمام تتناقض مع فلسفة الإمامة التي تقول بعدم جواز خلو الأرض من قائم لله بالحجة ووجوب كونه معصوماً ووجوب التعيين له في كل مكان وزمان. (انظر تطور الفكر السياسي الشيعي لأحمد الكاتب ص 242 وص 131)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وهذا يقودنا إلى الحديث عن النيابة الخاصة عن الإمام المهدي في زمن الغيبة الصغرى&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;النيابة الخاصة&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;استمرت الغيبة الصغرى للإمام المهدي من سنة 260هـ إلى سنة 329هـ وهي المدة التي كان يتصل فيها بالناس عبر نوابه(ويسمون السفراء والأبواب) ولم يوثق الاثنى عشرية إلا أربعة نواب مع أخذ ورد، واشترطوا لإثبات النيابة أن يأتي مدعي النيابة بدليل أو بمعجزة وكرامة تدل على اتصاله بالمهدي (وأورد الطوسي في كتاب الغيبة أخبارهم) وينقل منه الرسائل والتواقيع إلى المؤمنين به ويأخذ إليه الأموال&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وكان علي بن محمد السمري خاتم النواب، وتوفي سنة 329هـ، وكان آخر توقيع نقله عن المهدي فيه: &amp;quot;بسم الله الرحمن الرحيم.. فإنك ميت ما بينك وبين ستة أيام فاجمع أمرك ولا توصي إلي فيقوم مقامك بعد وفاتك، فقد وقعت الغيبة التامة فلا ظهور إلا بعد إذن الله &amp;ndash;تعالى ذكره&amp;ndash; وذلك بعد طول الأمد وقسوة القلوب وامتلاء الأرض جوراً وسيأتي لشيعتي من يدعي المشاهدة، ألا فمن ادعى المشاهدة قبل خروج السفياني والصيحة فهو كذاب مفتر&amp;quot;. ولما كان اليوم السادس قيل له: من وصيك من بعدك؟ فقال: &amp;quot;لله أمر هو بالغه&amp;quot; وقضى (أي مات) فهذا آخر كلام سمع منه (انظر الرواية في الغيبة للطوسي ص 242-243)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وبانقضاء الغيبة الصغرى وبدء الغيبة الكبرى دخل الاثني عشرية في غيبوبة التقية والانتظار&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ففكرة النيابة الخاصة أعطت فرصة للاثني عشرية في مرحلة الغيبة الصغرى كي تعيد النظر في بنائها، واستعملت هذه النيابة في حينها لإثبات وجود المهدي وحماية مذهب الإمامية من الانتكاس والضعف، وأهم ما فيها أنها أرست فكرة جواز النيابة عن المهدي حينئذ، وبهذا أعطت للمذهب الاثني عشري معناه العقائدي، إلا أنها في المقابل فرضت عليه جمودا فقهيا وخمودا سياسيا طال أمده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 16pt&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;ولاية الفقيه وعقيدة التقية والانتظار&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;بدأت الغيبة الكبرى للإمام المهدي بعد ختم النيابة الخاصة على لسان السمري، وعاد الأمر بالشيعة إلى اللحظة الثقافية السنية التي تقول بخلو الزمان من نبي بعد وفاة الرسول صلى الله عليه وسلم وما يسمى بعقيدة ختم النبوة. إلا أن عقيدة ختم النيابة الخاصة عن المهدي عند الشيعة لم تذهب بهم إلى حيث ذهبت عقيدة ختم النبوة عند السنة، فقد لجأ الشيعة إلى عقيدة التقية والانتظار لظهور المهدي، وذلك لقطع الطريق أمام مدعي النيابة الخاصة وللانسجام مع الأسس التي قامت عليها الإمامة (عدم خلو الأرض من إمام معصوم معين بالنص يتصدى للاجتهاد الديني وللإمامة السياسية&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ومن هنا فقد رفض متكلمو الإمامية الأوائل دعوة المعتزلة والشيعة الزيدية (الذين لم يشترطوا العصمة ولا النص في الإمام) إلى تبني نظرية ولاية الفقيه، التزاماً بنظرية الإمامة والتقية والانتظار، واستناداً إلى فقدان الفقيه للعصمة والتعيين من الله، ولتعارض نظرية ولاية الفقيه مع نظرية الإمامة الإلهية. ودار نقاش حام بين الطرفين حول الموضوع، وقد نقله الشيخ الصدوق في مقدمة كتابه &amp;quot;إكمال الدين وإتمام النعمة&amp;quot; حيث نقل مقتطفات من كتاب &amp;quot;الإشهاد&amp;quot; لأبي زيد العلوي، وكتاب علي بن أحمد بن بشار &amp;quot;حول الغيبة وولاية الفقيه&amp;quot;، ورد الشيخ عبد الرحمن بن قبة عليهما. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وقد استند ابن قبة في رفضه لنظرية ولاية الفقيه إلى رفضه للاجتهاد وحتمية وجود العالم المفسر للقرآن الكريم من أهل البيت، واستنتج ضرورة اشتراط العصمة في الإمام. (إكمال الدين وإتمام النعمة ص 94-95&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وبهذا أرخت عقيدة التقية والانتظار بظلالها الكثيفة على الذاكرة الشيعية عموماً وعلى ذاكرة المشتغلين بتنضيد الفكر والفقه الإماميين من علماء وفقهاء&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وفي تواصل مع هذه الحقيقة أسست المدونات الشيعية الأولى في إحدى مهماتها وتجلياتها وعياً انتظارياً وفقهاً إخبارياً روائياً يرفض الاجتهاد ويفضي الى تعليق وظائف الدولة الدينية الرئيسية: جباية المال (خمس وزكاة) وإمضاء الحدود والجهاد والأمر بالمعروف والنهي عن المنكر وإقامة صلاة الجمعة وغيرها.. علقت كل ذلك على وجود الإمام المعصوم، أي ظهور المهدي المنتظر، فالغيبة في الرؤية الشيعية كما يقول فؤاد إبراهيم (صاحب كتاب الفقيه والدولة، دار الكنوز ص48-49&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;):&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;أولا:&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt; تعبير احتجاجي على الدولة القائمة يستبطن حجب مشروعياتها.. إلا في زمن الظهور&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ثانيا:&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt; أن الغيبة تعني انقطاع إمكانية تحقق الدولة الشرعية (الإمامة) بما يشي أن المحاولة من بعده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;:&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; text-indent: -0.25in; margin: 0in 0.5in 10pt 0in; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;1-&lt;span style=&quot;font: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ليست ذات جدوى، يقول الشيخ مفيد &amp;quot;ولو كان في المعلوم للحق صلاح بإقامة إمام من بعده لكفى في الحجة وأقنع في إيضاح المحجة&amp;quot;. (المسائل الصاغانية للمفيد، طبعة دار المفيد، ص 75&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; text-indent: -0.25in; margin: 0in 0.5in 10pt 0in; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;2-&lt;span style=&quot;font: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;أن الإمامة في وعي الفقيه.. تقع خارج إطار القدرات البشرية.. منظوراً إلى أن الدولة/ السلطة ليست من مهمات غير الإمام الغائب. وفي هذا يذكر الشريف المرتضى في كتاب (الشافي في الإمامة، ج1/ ص112) ما نصه: &amp;quot;ليس علينا إقامة الأمراء إذا كان الإمام مغلوباً، كما لا يجب علينا إقامة الإمام في الأصل.. ليس إقامة الإمام واختياره من فروضنا فيلزم إقامته، ولا نحن المخاطبون بإقامة الحدود فيلزمنا الذم بتضييعها&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; text-indent: -0.25in; margin: 0in 0.5in 10pt 0in; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;3-&lt;span style=&quot;font: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;لو أن ثمة إمكانية لتحقق دولة الحق لحبطت الغاية من الغيبة، لأن الاستتار تعبير عن عدم إمكان تحقق الدولة الشرعية&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ويعقد الشيخان المفيد والطوسي لهذه النقطة مقارنة بين مواقف الأئمة السابقين وموقف الإمام الثاني عشر. يقول المفيد: &amp;quot;إن ملوك الزمان إذ ذاك كانوا يعرفون من رأي الأئمة عليهم السلام التقية وتحريم الخروج بالسيف على الولاة&amp;quot; (المسائل الصاغانية للمفيد - طبعة دار المفيد ص 74&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وكان ذلك يعني إرجاء &amp;quot;إزالة دولة الباطل وإقامة دولة الحق&amp;quot; إلى حين ظهور الإمام المهدي، مما أضفى لوناً قدرياً على الفقه السلطاني الشيعي يحيل إلى تقرير الحتمية التاريخية التي تتوج بالوعد الإلهي بظهور الإمام المهدي&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;..&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وانطلاقا من هذه الخلفية القدرية، يستقيل الفقه السلطاني الشيعي أمام الواقع للاضطلاع بمهمة بناء المعرفة الدينية بأمور الغيبة، وصناعة جيل من المنتظرين المتناسلين على امتداد التاريخ حتى تحقق الحتمية التاريخية (ظهور الإمام المهدي).. وهكذا يسقط الفقيه بحث أسس الدولة وإدارة الناس كحاجة اجتماعية ماسة وواقعية، ويتلبس بالتنظير للغائب، فهذا محمد بن إبراهيم النعمان (ت 342هـ &amp;ndash; 953م) يؤكد في كتاب &amp;quot;الغيبة&amp;quot; أن الإمامة &amp;ndash;حتى في عصر الغيبة&amp;ndash; جعل إلهي، وقال: &amp;quot;فمن اختار غير ما اختار الله وخالف أمر الله سبحانه ورد مورد الظالمين والمنافقين الحاليين في ناره&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;quot;. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ويستشف من هذا النص أن لا سبيل إلى العمل على إقامة سلطة أو انتخاب حاكم حتى ظهور الإمام المنتظر، يؤكد ذلك دعوته للشيعة بـ &amp;quot;الصبر والكف والانتظار للفرج وترك الاستعجال بأمر الله وتدبيره&amp;quot;، وعزز ذلك برؤيات تحث على الانتظار في عصر الغيبة.. (انظر الغيبة للنعماني - ص 577&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ونسج عدد من مشاهير فقهاء الشيعة على منوال النعمان مثل الغرار الرازي الضمي (381هـ) في &amp;quot;كفاية الأثر في النصوص على الأئمة الاثنى عشر&amp;quot;، وابن بابويه محمد بن علي المعروف بالشيخ الصدوق (ت 381هـ) في &amp;quot;إكمال الدين وإتمام النعمة&amp;quot; و&amp;quot;الاعتقادات&amp;quot;، والشيخ أبي جعفر محمد بن الحسن الطوسي المعروف بشيخ الطائفة (ت 460هـ) في كتاب &amp;quot;الغيبة&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;quot;. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وقد انعكست تلك المعتقدات التي قال بها فقهاء الشيعة الأوائل على تصنيفاتهم الفقهية فقرروا تعطيل بعض الحدود والأحكام، وما يدخل حسب اعتقادهم في ولاية الإمام المعصوم&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ونقف في بحوث الجهاد والقضاء الشرعي وصلاة الجمعة كمعايير اختبار لمشروعية الدولة في الفقه الشيعي.. فقد اشترط فقهاء الشيعة الإمامية وجود &amp;quot;الإمام العادل&amp;quot; أي المعصوم أو نائبه الخاص كشرط لوجوب الجهاد وإقامة الحدود وصحة انعقاد صلاة الجمعة&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;ذروة الاجتهاد وبذور ولاية الفقيه&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;لقد كان الدافع للشيعة في نفي الاجتهاد شبهة استغناء الأمة عن الحاجة إلى المعصوم. ففي هذا السياق منع الشيعة الأوائل الاجتهاد، واكتفوا بجمع الأخبار وتدوينها، فكانت وظيفة الفقيه الرواية فقط بناء على الاعتقاد السائد بكفاية النص الديني في غياب المعصوم، مما يحيل إلى نفي مطلق لنيابة الفقيه عن الإمام المعصوم، وما زال لهذا الخط أنصار ويسمون &amp;quot;بالإخباريين&amp;quot;. والحقيقة أنها الصورة الأصلية التي ولد عليها التشيع الاثني عشري&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ودأب علماء الشيعة الأوائل على منع الاجتهاد ورد القياس، فألف النوبختي في القرن الثالث الهجري كتابين في إبطال القياس ونقض اجتهاد الرأي، ولأئمة أهل البيت روايات في ذلك منها عن الإمام جعفر الصادق: &amp;quot;إن أصحاب القياس طلبوا العلم بالقياس فلم يزدادوا من الحق إلا بعداً&amp;quot;. (أصول الكافي للكليني 1/75&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ولما ألف محمد بن أحمد بن الجنيد الإسكافي (ت 378هـ) كتابه &amp;quot;تهذيب الشيعة&amp;quot; وأخذ فيه بالقياس والاجتهاد واستنبط الفروع على طريقة فقهاء السنة، أثار حفيظة العلماء فردوا عليه، منهم المفيد في &amp;quot;النقض على ابن الجنيد في اجتهاد الرأي&amp;quot;، وقال في رسالة &amp;quot;في أجوبة المسائل السروية&amp;quot; (طبعة دار الكتب التجارية ص 56-57): &amp;quot;فأما كتب أبي علي بن الجنيد فقد حشاها بأحكام عمل فيها على الظن واستعمل فيها مذهب المخالفين والقياس ولم يفرد أحد الصنفين عن الآخر&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وقال المرتضى في &amp;quot;الانتصار&amp;quot; رداً على الجنيد: &amp;quot;إنما عول ابن الجنيد على ضرب من الرأي والاجتهاد وخطؤه ظاهر&amp;quot;. وقال في &amp;quot;الشافي في الإمامة&amp;quot;: &amp;quot;إن الاجتهاد والقياس لا يثمران فائدة ولا ينتجان علماً فضلاً عن أن تكون الشريعة محفوظة بهما&amp;quot; (1/169&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ونجد أن الطوسي وهو علم من أعلام الخط الأصولي الاجتهادي، بل يعده البعض المؤسس لهذا الخط، نجده في كتابه &amp;quot;العدة في أصول الفقه&amp;quot; في باب الكلام في الاجتهاد قد بالغ في نفي القياس بما يؤدي إلى تعطيل الاجتهاد، رغم أنه لا يرمي إلى ذلك&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ولكن الأمر لم يستقر على ذلك، فاستطالة ظهور الإمام المهدي وتقدم الزمن وإلحاح الحاجة وكثرة النوازل قد دفعت ببعض فقهاء الإمامية للسير قدماً في فتح باب الاجتهاد وخرق أبواب فقهية كانت محكمة الإغلاق، حتى كتلك المتوقفة على وجود الإمام المهدي كالجهاد والجمعة وإقامة الحدود.. وغيرها، وعندها تمايزت الشيعة فقهيا إلى خطين: خط أصولي وخط إخباري&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;اجتماع ديني&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;ونجد أن بعض العلماء الذين منعوا الاجتهاد ونفوا القياس قد أخذوا بهما في كتبهم عمليا كالمفيد والمرتضى والطوسي، وأنكروا على الأخذ بالأخبار والواقفين عليها، حيث نقد المفيد الشيخ الصدوق والإخباريين في كتابه &amp;quot;شرح عقائد الصدوق أو تصحيح الاعتقاد&amp;quot; وبأنهم &amp;quot;يمرون على وجوههم فيما سمعوه من أحاديث ولا ينظرون في سندها ولا يفرقون بين حقها وباطلها ولا يفهمون ما يدخل عليهم من إثباتها ولا يحصلون معاني ما يطلقونه منهما&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وقد تمايز مع الطوسي العالم الراوي في الخط الإخباري عن العالم المجتهد في الخط الأصولي، ولكن أعقب الطوسي جمود فقهي حيث هيمنت آراؤه ما يربو على القرن، ولم تتحرر منه الشيعة إلا على يد علماء &amp;quot;الحلة&amp;quot;، حيث تحولت مدرسة &amp;quot;الحلة&amp;quot; إلى منهج في السلوك العقلاني تجاوز الكيان المرجعي الذي فرضه جيل المفيد والمرتضى والطوسي.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;وبدأ هذا التحول بالشيخ نجم الدين جعفر بن الحسن المعروف بالمحقق الحلي (602-676هـ) الذي استطاع أن يحرر الشيعة من القياس الذي أخذ صورة مقيتة في نظر الشيعة بسبب الروايات الذامة له، وأن يفصل بينه وبين الاجتهاد (انظر معارج الأصول، طبعة مؤسسة آل البيت 1/179)، ودأب الشيعة من بعده على تأكيد مبدأ الاجتهاد وعلى تكرار تأكيد نبذ القياس، رغم أنهم أثبتوا العقل كمصدر من مصادر التشريع وهو أعم من القياس&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;واحتل الفقيه بهذا موقعاً مميزا بعد أن أخذ موقعه إلى جانب النص، حيث ذهب محمد بن مكي العاملي (ت 876هـ) المعروف بالشهيد الأول إلى &amp;quot;وجوب الاجتهاد على من لديه القدرة وأوجب على العاجز التقليد&amp;quot; (انظر الذكرى طبعة حجرية ص 129&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وفي العصر القاجاري دافع الشيخ الجناحي (كاشف الغطاء) (ت 1228هـ) عن مبدأ الاجتهاد في مواجهة الإخباريين وجعله من &amp;quot;المناصب الشرعية&amp;quot; وأن المنكر لذلك &amp;quot;جاحد بلسانه معترف بجنانه وقوله مخالف لعمله&amp;quot; (انظر كشف الغطاء عن مبهمات الشريعة الغراء، انتشارات مهدوي ص 43&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وجاء من بعده تلميذه المولى محمد النراقي (ت 1249هـ) وزاد على أستاذه في إضفاء طابع ولايتي على الاجتهاد يستمد مشروعيته من الله عز وجل وقال بأن &amp;quot;ولاية الاجتهاد.. حق ثابت من الله ومن حججه للمجتهد&amp;quot;، ولهذا لا بد &amp;quot;من وجوب الرجوع إليهم&amp;quot; أي للفقهاء (انظر مستند الشيعة للنراقي، طبعة مكتبة آية الله المرعشي 2/132، 517، 523).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;وكذلك ذهب الشيخ مرتضى الأنصاري (1214-1281هـ) والذي عرف بخاتم المجتهدين في تقرير أصولي إلى &amp;quot;بطلان عبادة تارك طريقة التقليد والاجتهاد&amp;quot; (انظر فرائد الأصول للأنصاري، مؤسسة النشر الإسلامي، تحقيق التوري 1/275&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وأنزل من بعده تلميذه السيد محمد كاظم اليزدي الرأي الأصولي لأستاذه منزلة الفتوى الملزمة (العروة الوثقى ص2)، ويعد اليزدي أول من أثبت باباً بعنوان &amp;quot;باب التقليد والاجتهاد&amp;quot; حيث وضع هذا الباب في كتابه &amp;quot;العروة الوثقى&amp;quot;، وهو الرسالة العملية الواجب على المقلد امتثال ما جاء فيها، وسار فقهاء الشيعة من بعده على منواله، وتكرست مرجعية الفقهاء ودورهم في النيابة عن المعصوم في الاجتهاد والمرجعية الدينية&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;وهكذا تبدلت وظيفة الفقيه من راو إلى مجتهد إلى منصب شرعي إلى ولاية مستمدة من الله، فتحت الباب أمام ولاية الفقيه المطلقة&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;السلطة السياسية وولاية الفقيه&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;إن النيابة الخاصة التي استدعتها غيبة الإمام الصغرى قد أعطت إشارة إلى فكرة النيابة العامة للفقهاء في الغيبة الكبرى، وإن كانت الأولى في عصر الغيبة الصغرى تعينت بإذن الإمام ونصه، فإن الثانية في الغيبة الكبرى وجدت بتأويل نص الإمام والشارع (أي بالاستنباط والاجتهاد&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;).&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; margin: 0in 0in 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 115%; font-size: 12pt&quot;&gt;فمنذ </description>
</item><item>
<title>قطع و اندازه کتاب</title>
<link>http://qalamlib.com/news/355</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;قطع کتاب&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قطع کتاب همان اندازه درازا و پهنا کتاب است و انواع مختلفی دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علت بوجود آمدن قطع&amp;zwnj;های مختلف برای کتاب، استفاده آسان&amp;zwnj;تر یا متناسب با نوع کاربرد هر کتاب بوده&amp;zwnj;است بطور مثال کتابی که به راحتی بتواند به همراه افراد باشد و فضای زیادی اشغال نکند بایستی مثلا در قطع جیبی صحافی گردد. استفاده از اندازه&amp;zwnj;های مختلف در بهبود کار مؤثر خواهد بود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آلدوس مانوتیوس، از اهالی ونیز، نخستین کسی بود که به نقش و اهمیت قطع کتاب در میزان استفاده از آن پی برد. اندازه ابداعی او برای کتاب، هم حمل و نقل آن را آسان می&amp;zwnj;ساخت و هم هزینه&amp;zwnj;های چاپ را کاهش می&amp;zwnj;داد. قطع مورد استفاده او قطع وزیری بود که جانشین قطع سلطانی شد.[۱]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امروزه، قطع کتاب نشان&amp;zwnj;دهنده تعداد دفعات تاشدن کاغذ در چاپخانه نیز هست که منجر به تشکیل ورق&amp;zwnj;های کتاب می&amp;zwnj;شود.[۲] به&amp;zwnj;طور مثال کاغذ دوورقی با چهار صفحه در قطع رحلی، چهارورقی با هشت صفحه در قطع وزیری، و هشت&amp;zwnj;ورقی با شانزده صفحه در قطع رقعی برابر است.[۳]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;انواع قطع کتاب&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هم&amp;zwnj;اکنون رایج&amp;zwnj;ترین قطع برای کتاب، در همه جا، قطع وزیری است که ابعاد آن از ۱۳&amp;times;۲۰ تا ۲۰&amp;times;۲۶ سانتی&amp;zwnj;متر متغیر است. قطع رقعی با ابعاد ۱۵&amp;times;۲۲ و قطع جیبی با ابعاد ۱۱&amp;times;۵/۱۶ سانتیمتر از دیگر قطع&amp;zwnj;های رایج محسوب می&amp;zwnj;شود. معمولا در چاپ کتاب&amp;zwnj;های هنری و نفیس از قطع رحلی و برای کتاب&amp;zwnj;های کودکان از قطع خشتی استفاده می&amp;zwnj;شود. باید توجه داشت ابعاد ذکر شده برای هر قطع تقریبی است و در برخی منابع اندازه&amp;zwnj;های متفاوتی ارائه شده&amp;zwnj;است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برخی قطع&amp;zwnj;های رایج در میان مسلمانان به شرح زیر بوده&amp;zwnj;است:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قطع رقعی: در اندازه ۱۴*۲۲ سانتی متر و مطابق نظر دیگر اندازه قطعی است به طول و عرض تقریبی ۱۹&amp;times;۱۰ سانتی&amp;zwnj;متر.&lt;br /&gt;
قطع وزیری: در گذشته دارای سه اندازه کوچک (به طول و عرض تقریبی ۲۱&amp;times;۱۵ سانتیمتر)، متوسط (۲۴&amp;times;۱۶) و بزرگ (۳۰&amp;times;۲۰) بوده&amp;zwnj;است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بغدادی: اندازه دقیق این قطع مشخص نیست، ولی از گفته رشیدالدین فضل&amp;zwnj;الله (۶۴۸؟- ۷۱۸ق.)، در وقفنامه ربع رشیدی چنین برمی&amp;zwnj;آید که ابعادی بزرگ&amp;zwnj;تر از نسخه&amp;zwnj;های مرسوم داشته است؛&lt;br /&gt;
قطع بیاض یا بیاضی: از جانب طول آن باز و بست می&amp;zwnj;شده و شیرازه&amp;zwnj;بندی آن از طرف عرض اوراق بوده که در میان نسخه&amp;zwnj;نویسان و کتاب&amp;zwnj;سازان به بیاض شهرت داشته است، قطع بیاضی منسوب است و مخصوص به بیاض&amp;zwnj;ها که بیشتر کتب ادعیه، زیارات و مجموعه&amp;zwnj;های ادبی (که به غرض اشخاص فراهم می&amp;zwnj;آمده) به هیأت مذکور صحافی و جلد می&amp;zwnj;شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جانمازی: با ابعاد ۷&amp;times;۱۲ سانتیمتر که معمولا برای قرآن و کتاب&amp;zwnj;های دعا به&amp;zwnj;کار می&amp;zwnj;رفته است؛&lt;br /&gt;
قطع حمایلی: قطعی بوده&amp;zwnj;است به طول و عرض ۱۲&amp;times;۶ سانتی&amp;zwnj;متر. وجه تسمیة این قطع به حمایلی، این است که نسخه&amp;zwnj;هایی را که در قطع مزبور بوده&amp;zwnj;است به صورت حمایل روی لباس زیرین می&amp;zwnj;آویخته&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
قطع بغلی: این قطع که معادل قطع جیبی بزرگ در روزگار ماست. دارای طول و عرض تقریبی ۷&amp;times;۵ سانتی&amp;zwnj;متر بوده&amp;zwnj;است.&lt;br /&gt;
قطع خشتی:از کهن&amp;zwnj;ترین قطع&amp;zwnj;های نسخه&amp;zwnj;های خطی است به طول و عرض همسان و برابر. به شکل مربع که طول و عرض آن مساوی است و در سده&amp;zwnj;های نخست تمدن اسلامی بسیار رایج بوده است. هم&amp;zwnj;اکنون اغلب برای كتاب&amp;zwnj;های كودكان استفاده می​شود.&lt;br /&gt;
قطع رحلی:[۴] در ابعاد بیشتر از ۲۵&amp;times;۳۵ سانتیمتر که به انواع کوچک، متوسط، و بزرگ تقسیم می&amp;zwnj;شود. این قطع را به این جهت رحلی می&amp;zwnj;گویند که هنگام خواندن کتاب قطع رحلی، آن را بر روی چهارپایة چوبی &amp;ndash; یعنی رحل &amp;ndash; قرار می&amp;zwnj;داده&amp;zwnj;اند. قطع مزبور دارای اندازه&amp;zwnj;های تقریبی زیر است:&lt;br /&gt;
رحلی کوچک: طول ۴۲، عرض ۲۷ سانتی&amp;zwnj;متر.&lt;br /&gt;
رحلی متوسط: طول ۵۰، عرض ۳۰ سانتی&amp;zwnj;متر.&lt;br /&gt;
رحلی بزرگ: طول ۶۰، عرض ۳۰ سانتی&amp;zwnj;متر. عموماً نسخه&amp;zwnj;های کتاب&amp;zwnj;هایی چون قرآن مجید، مثنوی مولوی، شاهنامه فردوسی که در مجالس و محافل قرائت و خوانده می&amp;zwnj;شده، با این قطع بوده است.&lt;br /&gt;
قطع سلطانی یا تیموری: با ابعاد ۳۰&amp;times;۴۰ سانتیمتر، بیشتر نسخه&amp;zwnj;های نفیسی را که برای شاهان و شاهزادگان در دوره تیموریان (۷۷۱-۹۱۱ق.)، استنساخ می&amp;zwnj;شد، در این قطع می&amp;zwnj;ساختند. نمونه مشهور آن شاهنامه بایسنغری موجود در کاخ گلستان تهران است که ابعاد تقریبی آن همین اندازه است. در اواخر عصر مغولان و اوایل عهد تیموریان برای کتاب&amp;zwnj;های خطی در ایران رواج یافت که به این جهت آن را قطع تیموری نیز می&amp;zwnj;گویند. طول و عرض تقریبی آن ۴۰&amp;times;۳۰ سانتی&amp;zwnj;متر است.&lt;br /&gt;
طومار: اتصال اوراق کتاب به&amp;zwnj;گونه&amp;zwnj;ای که به شکل لوله در آید. معمولا در تهیه طومارها از کاغذهایی با عرض کم استفاده می&amp;zwnj;شد. هر چند که طول آنها بسیار متغیر بوده&amp;zwnj;است. برای نگهداری طومار، اغلب محفظه&amp;zwnj;ای به همان شکل می&amp;zwnj;ساختند؛&lt;br /&gt;
نیم&amp;zwnj;ربعی: ۱۰&amp;times;۱۸ یا ۹&amp;times;۱۷ سانتیمتر؛&lt;br /&gt;
نیم ورقی: ۲۲&amp;times;۳۴ سانتیمتر که در ابعاد دیگری هم وجود دارد.[۴]&lt;br /&gt;
جیبی: این قطع که در گذشته به قطع بغلی شهرت داشته​است دارای طول و عرض تقریبی ۷&amp;times;۵ سانتی&amp;zwnj;متر است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;منبع&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;استیپچویچ، الکساندر. کتاب در پویه تاریخ. ترجمه حمیدرضا آژیر و حمیدرضا شیخی. مشهد: آستان قدس رضوی، بنیاد پژوهش&amp;zwnj;های اسلامی، ۱۳۷۳&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;سلطانی، پوری؛ راستین، فروردین. دانشنامه کتابداری و اطلاع&amp;zwnj;رسانی. ذیل &amp;laquo;قطع کتاب&amp;raquo;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;صافی، قاسم. از چاپخانه تا کتابخانه. تهران: دانشگاه تهران، ۱۳۸۱&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;۴٫۰ ۴٫۱ &amp;laquo;واژگان نظام کتاب&amp;zwnj;آرایی&amp;raquo;. در نجیب مایل هروی. کتاب&amp;zwnj;آرایی در تمدن اسلامی. مشهد: آستان قدس رضوی، بنیاد پژوهش&amp;zwnj;های اسلامی، ۱۳۷۲، ص ۵۷۱-۸۳۲&lt;br /&gt;
آشنایی با صنعت چاپ از حروف&amp;zwnj;چینی تا صحافی، ناشر: وزارت فرهنگ و ارشاد اسلامی، سازمان چاپ و انتشارات&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>جایگاه کتابخانه در تفکر مسلمانان سلف</title>
<link>http://qalamlib.com/news/354</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;جایگاه کتابخانه در تفکر مسلمانان سلف&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
(ن وَالْقَلَمِ وَمَا یَسْطُرُونَ)؛ &amp;laquo;ن، سوگند به قلم و آنچه می&amp;zwnj;نویسند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;شأن و عظمت قلم و به تبع آن کتاب که خدای متعال بارها در قرآن کریم از آن نام می&amp;zwnj;برد، خود گویای ارزشی است که کتاب و کتابت در نزد پروردگار جهان داراست. اسلام دین علم و دانش است و مسلمانان را به دانش اندوزی توصیه می&amp;zwnj;کند، انسان&amp;zwnj;های دانا را با انسان&amp;zwnj;های نادان برابر نمی&amp;zwnj;داند و درخواست پیامبر از خدا این است که علمش افزون شود. توصیه&amp;zwnj;های ویژه رسول الله صلی الله علیه وسلم و شیفتگی مسلمانان به یاد گرفتن و یاد دادن باعث پیدایش دستاوردهای بزرگ مادی و معنوی بوده است.&lt;br /&gt;
با ظهور اسلام، کتابت وحی و پس از آن ضبط احکام و احادیث آغاز شد، و از قرن دوم هجری نگارش و ترجمه کتب در رشته&amp;zwnj;های مختلف شروع شد. در پی تألیف و ترجمه کتب و به منظور حفظ و نگهداری میراث علمی و فرهنگی بشر اولین کتابخانه&amp;zwnj;ها در ممالک اسلامی بوجود آمدند. تا جایی که در قرن چهارم و پنجم هجری کتابخانه&amp;zwnj;های بزرگی در سراسر ممالک اسلامی وجود داشت. در واقع پیدایش کتابخانه از آغازین روزهای اسلام، دستاورد بزرگداشت علم و دانش می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
در فرهنگ اسلامی شکوهمندی&amp;zwnj;هایی است که جهان بشری را به شگفتی و سپاس وامی دارد. کتاب&amp;zwnj;هایی که اندیشمندان مسلمان نگاشته&amp;zwnj;اند، کتابخانه&amp;zwnj;هایی که مسلمانان بویژه خلفای مسلمان بنیان نهاده&amp;zwnj;اند، &amp;zwnj;از جمله شکوهمندی&amp;zwnj;هایی است که همگان را به تعظیم وا داشته است.&lt;br /&gt;
آنچه در این مقال شایان گفتگو است، همین توجه ویژه&amp;zwnj;ای است که مسلمانان به کتابخانه&amp;zwnj;ها داشته&amp;zwnj;اند، کتابخانه در واقع، قلب هر مؤسسه آموزشی، پژوهشی و تربیتی است. قوت و ضعف تعلیم و تربیت و تحقیق در هر جامعه&amp;zwnj;ای وابسته به قوت و ضعف مراکز علمی ـ آموزشی آن جامعه است و قوت و ضعف مراکز علمی آموزشی وابسته به قوت و ضعف آن مرکز (یعنی کتابخانه&amp;zwnj;ها) است.&lt;br /&gt;
&amp;zwnj;از تتبع و استقراء در مدارک اسلامی چنین بر می&amp;zwnj;آید که مسلمانان قدرت و قوت تحقیقات نجومی، فن&amp;zwnj;آوری&amp;zwnj;های پزشکی، پژوهش&amp;zwnj;های علمی، تربیتی و دینی خود را در قرون طلایی تمدن اسلام مرهون شکوفایی و رونق مجموعه&amp;zwnj;های بزرگ و میلیونی کتابخانه&amp;zwnj;های خود هستند. مسلمانان بسیار سریع به جایگاه برتر کتابخانه&amp;zwnj;ها بعنوان حافظان میراث علمی و فرهنگی بشر، و نقش آموزشی ـ پژوهشی و تربیتی آن در جامعه و مراکز تعلیم و تربیت پی بردند و با همتی تام و عزمی راسخ برای تشکیل و سازماندهی کتابخانه&amp;zwnj;ها آستین همت بالا زدند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اولین کتابخانه در اسلام&lt;br /&gt;
می&amp;zwnj;توان گفت اولین کتابخانه مسلمانان در زمان حضرت معاویه رضی الله عنه توسط خود ایشان بنیان نهاده شده است. یوسف العش در کتاب خود می&amp;zwnj;نویسد: &amp;laquo;نخستین بیت الحکمه (کتابخانه&amp;zwnj;ای) که شناسایی آن برای ما ممکن هست متعلق به حضرت معاویه رضی الله عنه بوده است که پس از دست به دست شدن بین وارثان او به دست خالد بن یزید بن معاویه افتاد و خالد بن یزید اولین فرد در تاریخ اسلام است که کتابخانه&amp;zwnj;ای عمومی تأسیس کرد.[1]&lt;br /&gt;
&amp;laquo;در واقع باید گفت که در زمان خلافت چهار خلیفه نخست، نمی&amp;zwnj;توان از مجموعه کتاب&amp;zwnj;ها به عنوان کتابخانه&amp;zwnj;ها صحبتی به میان آورد. اما با ظهور سلسله اموی در دمشق و فتح ایران، بین النهرین و شمال آفریقا،&amp;zwnj; دنیای فرهنگی اسلام وارد مرحله جدیدی شد، اولین قدم در این مهم (کتابخانه) از طرف مؤسس این سلسله یعنی معاویه بن ابی سفیان رضی الله عنه برداشته شد.&lt;br /&gt;
مدارک تاریخیِ روشنی در دست است که جمع&amp;zwnj;آوری کتاب چه به صورت شخصی و چه به صورت عمومی از زمان حکومت بنی امیه شروع شده است. به گونه&amp;zwnj;ای که اولین مدارک موجود در باره موجودیت کتابخانه در دنیای اسلامی که مشابه کتابخانه&amp;zwnj;های عمومی امروز می&amp;zwnj;باشد به زمان خالد بن یزید مربوط می&amp;zwnj;باشد.&amp;raquo;[2]&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
کتابخانه&amp;zwnj;ها و نقش آموزشی آنها&lt;br /&gt;
کتابخانه&amp;zwnj;ها همواره نقش بسزایی در امر آموزش داشته&amp;zwnj;اند تا جایی که بیشتر کتابخانه&amp;zwnj;های اسلامی، &amp;zwnj;در سده&amp;zwnj;های میانه، بنیادهای آموزشی و فرهنگی بودند که در کنار آموزش، کار کتابخانه&amp;zwnj;های نوین را هم بر دوش می&amp;zwnj;کشیدند. نمونه&amp;zwnj;های بسیاری از کتابخانه&amp;zwnj;هایی که کار آموزش در آنها انجام می&amp;zwnj;گرفت وجود دارد. &amp;laquo;در کاخ علی بن یحیی منجم (275هـ) کتابخانه بزرگی بود به نام خزانةالحکمة که مردم از جاهای گوناگون برای مطالعه بدان روی می&amp;zwnj;آوردند. حتی برای دانشجویانی که می&amp;zwnj;خواستند در گوشه&amp;zwnj;ای از کتابخانه زندگی کنند تسهیلات و هزینه&amp;zwnj;هایی آماده شده بود و به آنان خوراک نیز داده می&amp;zwnj;شد.&lt;br /&gt;
جعفر بن حمدان موصلی کتابخانه&amp;zwnj;ای سرشار داشت که هر کس می&amp;zwnj;توانست از آن بهره&amp;zwnj;مند شود،&amp;zwnj;حتی به دانشجویان تهیدست کمک&amp;zwnj;های مالی می&amp;zwnj;کرد، و خود در آنجا به تدریس می&amp;zwnj;نشست.&lt;br /&gt;
ابوعلی سوار کتابخانه&amp;zwnj;ای داشت که به دانشجویانش ماهانه مقرّری رسمی می&amp;zwnj;پرداخت. و دیگر از کتابخانه بزرگ و زیبای بصره می&amp;zwnj;توان نام برد که دانشجویان برای بهره&amp;zwnj;مند شدن از این کتابخانه شگفت&amp;zwnj;انگیز به آنجا می&amp;zwnj;آمدند و در درس استادی که همیشه علم کلام می&amp;zwnj;آموخت، شرکت می&amp;zwnj;جستند و سرانجام در کتابخانه خزانه شاپور گفت و شنودها و مناظره&amp;zwnj;هایی چهره می&amp;zwnj;بست که ابو العلاء&amp;zwnj;مصری از سرشناس&amp;zwnj;ترین چهره&amp;zwnj;های آن بود.&amp;raquo;[3]&lt;br /&gt;
فراوانی، شکوه و عظمت کتابخانه&lt;br /&gt;
شور و اشتیاق مسلمانان به علم و دانش و به تبع آن کتاب و کتابت و به پاس بزرگداشت منزلت کتاب، &amp;zwnj;و جهت حفظ میراث علمی و فرهنگی بشر، آنان را بر آن داشت تا توجهی جدی و شایان به کتابخانه&amp;zwnj;ها داشته باشند. از این روکتابخانه&amp;zwnj;های بسیار و بزرگی بنیان نهاده شد.&lt;br /&gt;
دکتر شلبی در کتاب خود &amp;laquo;تاریخ آموزش در اسلام&amp;raquo; می&amp;zwnj;نویسد: &amp;laquo;کتابخانه&amp;zwnj;ها آنچنان فراوان بودند که به سختی می&amp;zwnj;توان مسجد و یا بنیاد علمی&amp;zwnj;ای یافت که فاقد کتابخانه باشد. بدینسان گروه&amp;zwnj;های مختلفی از طبقات اجتماعی گوناگون از این مجموعه&amp;zwnj;ها بهره می&amp;zwnj;گرفتند و نیز کمتر مدرسه&amp;zwnj;ای در عراق، خراسان، سوریه و مصر پیدا می&amp;zwnj;شد که کتابخانه&amp;zwnj;ای نداشته باشد،&amp;zwnj;در واقع به سختی می&amp;zwnj;توان تک مدرسه&amp;zwnj;ای بدون مجموعه کتابخانه یافت.&amp;raquo;[4]&lt;br /&gt;
توجه جدی مسلمانان به کتابخانه&amp;zwnj;ها باعث پیدایش ساختمان&amp;zwnj;هایی سترگ و مستقل برای کتابخانه&amp;zwnj;ها شد. &amp;laquo;مسلمانان به ساختن ساختمان&amp;zwnj;هایی به عنوان کتابخانه&amp;zwnj;های همگانی اهمیتی سترگ می&amp;zwnj;دادند. برخی از کتابخانه&amp;zwnj;ها همانند کتابخانه شیراز،&amp;zwnj; &amp;laquo;کردوبا&amp;raquo; (قرطبه) قاهره و بغداد در ساختمان&amp;zwnj;هایی جداگانه قرار داشتند با اتاق&amp;zwnj;هایی بسیار برای کاربردهای گوناگون و تالارهایی که جهت مطالعه و تحقیق و اتاق&amp;zwnj;هایی جهت نسخه&amp;zwnj;برداری از دست نوشت&amp;zwnj;ها و اتاق&amp;zwnj;هایی برای برگزاری نشست&amp;zwnj;ها و انجمن&amp;zwnj;های ادبی، به گونه&amp;zwnj;ای که تمام اتاق&amp;zwnj;ها از ابزار آسایش و راحتی جهت مطالعه پر بود.&amp;raquo;[5]&lt;br /&gt;
آدامز متز در کتاب خود می&amp;zwnj;نویسد: &amp;laquo;خواجه نظام الملک در نظامیه بغداد کتابخانه عظیمی را برای دانشجویان و روشنفکران تأسیس کرد که بودجه آن به &amp;laquo;یک میلیون و 54 هزار&amp;raquo; فرانک طلا می&amp;zwnj;رسید. خلیفه المستنصر بالله عباسی کتابخانه بزرگی برای ملل و نحل مختلف شرق در بغداد بنیان نهاد که صدها کتابدار وصدها هزار جلد نسخه خطی در آن موجود بود. کتابخانه خلیفه العزیز فاطمی یک میلیون و ششصد هزار جلد کتاب داشت که در این کتابخانه وسایل گوناگون نجومی،&amp;zwnj; نقشه کرات آسمانی،&amp;zwnj; و یک نقشه بسیار بزرگ جهان&amp;zwnj;نما روی پارچه ابریشمی کبود کشیده شده بود.&amp;raquo;[6]&lt;br /&gt;
جهت ارایه تصویر مختصری از عظمت و شکوه کتابخانه&amp;zwnj;های مسلمانان می&amp;zwnj;توان نام و شمار کتاب&amp;zwnj;های تعدادی از کتابخانه&amp;zwnj;های بزرگ در تمدن اسلامی را به اختصار به شرح ذیل نام برد: [7]&lt;br /&gt;
بیت الحکمة بغداد 4000000 جلد&lt;br /&gt;
کتابخانه شاپور بغداد 10000 جلد&lt;br /&gt;
کتابخانه سلطنتی قاهره 1000000 جلد&lt;br /&gt;
بیت الحکمة قرطبة 400000 جلد&lt;br /&gt;
کتابخانه دارالحکمة قاهره 100000 جلد&lt;br /&gt;
کتابخانه طرابلس شام 3000000 جلد&lt;br /&gt;
کتابخانه مراغه 400000 جلد&lt;br /&gt;
و همچنین جهت ارائه تصویری بهتر و روشن&amp;zwnj;تر از جایگاه کتابخانه در تفکر مسلمانان سلف می&amp;zwnj;توان حقیقت تاریخی ذیل را یاد آور شد،&amp;zwnj; در بررسی تاریخ کتابخانه&amp;zwnj;های مسلمانان حقایق و شگفتی&amp;zwnj;های بسیاری مشاهده می&amp;zwnj;شود. از جمله: &amp;laquo;هنگامی که نوح بن منصور سامانی به صاحب بن عباد وزارت را پیشنهاد کرد نپذیرفت، یکی از دلایلش این بود که جابه جا کردن کتابخانه&amp;zwnj;اش که نزدیک 400 بار شتر بود دشوار می&amp;zwnj;نمود. بدینسان او ماندن در کنار کتاب&amp;zwnj;هایش را بر وزارت ترجیح داد، &amp;zwnj;وی اجازه استفاده آزادانه از کتابخانه&amp;zwnj;ا&amp;zwnj;ش را به همگان داده بود و حتی برای آن&amp;zwnj;هایی که از کتابخانه بیشتر استفاده می&amp;zwnj;کردند، جوایزی تعیین کرده بود. و هنگام وفات، کتابخانه بزرگ خود را که بالغ بر 206 هزار جلد کتاب بود به شهر ری بخشید.))[8]&lt;br /&gt;
آنچه در این مختصر گفته شد قطراتی از اقیانوس شکوهمندی&amp;zwnj;های اسلام است. این شکوه و عظمت و این توجه قابل تحسین مسلمین به کتابخانه&amp;zwnj;ها زمانی ما را بیشتر شگفت&amp;zwnj;زده می&amp;zwnj;نماید که بدانیم تمام این دستاوردها و سایر دستاوردهای علمی، هنری، فرهنگی و تربیتی مسلمانان درست در زمانی صورت می&amp;zwnj;گیرد که طلیعه&amp;zwnj;داران علم و تکنولوژی عصر حاضر در آن دوران در خواب قرون وسطایی خود بسر می&amp;zwnj;بردند،&amp;zwnj; بگونه&amp;zwnj;ای که نه تنها با مجموعه&amp;zwnj;های میلیونی کتابخانه&amp;zwnj;ها کاملاً بیگانه بودند بکله حتی بسیاری از کتاب&amp;zwnj;های علمی در گوشه&amp;zwnj;های کلیسا به زنجیرها کشیده شده بود و اجازه استفاده عمومی از آنها نبود.&lt;br /&gt;
اما سوگمندانه حوادث بسیاری باعث سقوط تمدن اسلامی شد و با افول تمدن و فرهنگ در سرزمین&amp;zwnj;های اسلامی کتابخانه&amp;zwnj;ها نیز در غروب غمناکی فرو رفتند. حملات وحشیانه مغول و تاتار، یورش غربیان به کتابخانه&amp;zwnj;ها، بی&amp;zwnj;همتی و بی&amp;zwnj;علاقگی حکام داخلی و به تبع آن مردم پس از حملات وحشیانه مغول&amp;zwnj;ها و تاتارها سبب شد تا بسیاری از کتابخانه&amp;zwnj;ها به اصطبل!! تبدیل شوند، بسیاری توسط سربازان به غارت بروند و بسیاری توسط دلالان طمعکار کتاب خریداری شوند و این سقوطی بود که خیزشی بدنبال نداشت.&lt;br /&gt;
در بررسی تطبیقی اوضاع کنونی کتابخانه&amp;zwnj;های اسلامی و غربی به وضوح می&amp;zwnj;توان به عدم خیزش کتابخانه&amp;zwnj;های اسلامی و رشد همه جانبه کتابخانه&amp;zwnj;های غیر اسلامی پی&amp;zwnj;برد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نگاهی کوتاه به وضعیت کتابخانه&amp;zwnj;های غیر اسلامی&lt;br /&gt;
به عنوان نمونه، &amp;zwnj;فقط به بررسی وضعیت کتابخانه&amp;zwnj;های یک کشور اکتفاء می&amp;zwnj;نمائیم (آنهم به صورت آماری و مختصر.(&lt;br /&gt;
کشور روسیه با داشتن 360 هزار کتابخانه دارای مجموعه&amp;zwnj;ای از بزرگ&amp;zwnj;ترین کتابخانه&amp;zwnj;های دنیا و بخصوص آسیاست. از مجموعه 360 هزار کتابخانه یاد شده، 128هزار آن بصورت کتابخانه عمومی در معرض استفاده عموم مردم است.&lt;br /&gt;
کتابخانه لنین،&amp;zwnj; با مجموعه 36 میلیونی! خود در صدر کتابخانه&amp;zwnj;های روسیه قرار دارد. مجموعه این کتابخانه به 247 زبان! می&amp;zwnj;باشد که 25 میلیون آن به زبان روسی و بقیه به زبان&amp;zwnj;های دیگر است. بطور مثال این کتابخانه در حدود 20 هزار جلد کتاب در باره ادبیات ایران است!. روزانه به طور تقریبی 7000 نفر مراجعه&amp;zwnj;کننده روسی و غیر روسی دارد و سالانه بیش از 12میلیون جلد کتاب به امانت می&amp;zwnj;دهد. علاوه بر کتابخانه لنین می&amp;zwnj;توان از کتابخانه لنینگراد با مجموعه 28 میلیونی آن نام برد.&lt;br /&gt;
همچنین کتابخانه ملی علم و صنعت روسیه با مجموعه 10 میلیونی و کتابخانه آخوندوف با مجموعه 5/4 میلیونی د رحال سرویس دهی به دنیای اطلاعاتی و پژوهشی خود هستند.&lt;br /&gt;
از دیگر کشورها می&amp;zwnj;توان کتابخانه ملی چین، &amp;zwnj;فرانسه، آلمان، بریتانیا و آمریکا و سایر کشورها را نام برد که هر کدام از آنها دارای مجموعه&amp;zwnj;های 20 الی 30 میلیونی هستند. علاوه بر این، کتابخانه کنگره آمریکا دارای 80 میلیون جلد! مواد کتابی و غیر کتابی است که در حال حاضر پیشگام عرضه کتابداری نوین به جهان می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
با این تفصیل به خوبی می&amp;zwnj;توان پی برد که: اگر مسلمانان قدرت و قوت تحقیقات، پژوهش&amp;zwnj;ها و فن&amp;zwnj;آوری&amp;zwnj;های خود را در گذشته مرهون کتابخانه&amp;zwnj;های بزرگ خود بوده&amp;zwnj;اند، امروزه غربی&amp;zwnj;ها نیز قدرت و قوت تحقیقات علمی و نوآوری&amp;zwnj;های صنعتی خود را مرهون کتابخانه&amp;zwnj;های عظیم و باشکوه خود هستند.&lt;br /&gt;
کتابخانه&amp;zwnj;ها در عصر الکترونیک&lt;br /&gt;
آنچه شایان توجه است وضعیت کتابخانه&amp;zwnj;ها درعصر الکترونیک می&amp;zwnj;باشد. &amp;laquo;موج انقلاب اطلاعاتی که در چند دهه دیگر به کمال خواهد رسید به زودی تحولی شگرف در تمام شؤون زندگی ایجاد می&amp;zwnj;کند و این امری است اجتناب ناپذیر. آنچه مهم است انطباق با چنین شرایط ویژه پیشرفت تکنولوژی و اطلاعاتی است. کتابخانه&amp;zwnj;ها در عصر الکترونیک مفهوم امروزی خود را از دست خواهند داد، &amp;zwnj;نظام ارتباطی بی&amp;zwnj;کاغذ بر دنیا حاکم خواهد شد،&amp;zwnj; و سلطه کامپیوتر و ارتباطات از راه دور همه جا را تحت پوشش خود قرار خواهد داد.&amp;raquo;[9]&lt;br /&gt;
استفاده از نوارهای مغناطیسی برای ثبت و ضبط اطلاعات منجر به کنار گذاشتن کاغذ خواهد شد. کتاب الکترونیکی ،&amp;zwnj;کتاب مرجع الکترونیکی، کتابخانه الکترونیکی قابل حمل، جای مشابه&amp;zwnj;های خود را در وضع فعلی خواهد گرفت.&amp;raquo;[10]&lt;br /&gt;
کتابخانه&amp;zwnj;ها به عنوان ابزاری در خدمت علم و تکنولوژی و معارف بشری همواره باید خود را پا به پای چنین پیشرفت&amp;zwnj;هائی بکشانند و الا محکوم به زوال و فنا خواهند ماند. &amp;laquo;در برابرتحول سریع تکنولوژی اطلاعات،&amp;zwnj;بعید به نظر می&amp;zwnj;رسد که کتابخانه به عنوان نهادی بتواند پایداری کند،&amp;zwnj; کتابخانه&amp;zwnj;هایی می&amp;zwnj;توانند به بقای خود ادامه دهند که خواستار تلاش و پویایی باشند و بخواهند با واقعیات خود را تطبیق دهند.&amp;raquo;[11]&lt;br /&gt;
در این شرایط حساس و در عالم وابستگی تکنولوژی و صنعتی و به ویژه اطلاعاتی، &amp;zwnj;شایسته است بار دیگر با همتی تام و با عزمی راسخ به سازماندهی کتابخانه&amp;zwnj;های مساجد، &amp;zwnj;مدارس و دانشگاه&amp;zwnj;های اسلامی بپردازیم، &amp;zwnj;شاید در سایه همت و تلاش و با توکل به قدرت خداوند بتوانیم شمه&amp;zwnj;ای از دستاورهای گذشته خود را کسب نماییم و بار دیگر شکوهمندی&amp;zwnj;هایی بیافرینیم که مسلمانان سلف آفریدند، از این رو پیشنهاد می&amp;zwnj;شود:&lt;br /&gt;
1 - در جهت رشد و شکوفایی مجموعه کتابخانه خود کوشا باشیم،&amp;zwnj; به گونه&amp;zwnj;ای که مجموعه شایسته و قابل توجهی برای مساجد، مدارس و دانشگاه&amp;zwnj;های خود فراهم آوریم.&lt;br /&gt;
2- مجموعه&amp;zwnj;ها را بر اساس یکی از طبقه&amp;zwnj;بندیهای رایج در دنیا سازماندهی نمائیم. بخصوص کتابخانه&amp;zwnj;های مساجد و مدارس، &amp;zwnj;که بدون سازماندهی و به شیوه&amp;zwnj;ای ابتدایی و در واقع بدون هیچ گونه شیوه&amp;zwnj;ای اداره می&amp;zwnj;شوند.&lt;br /&gt;
3- در جهت کامپیوتریزه کردن مجموعه خود و همگام شدن با امکانات اطلاع رسانی روز گام&amp;zwnj;های اساسی و حساب شده&amp;zwnj;ای برداریم.&lt;br /&gt;
امید که کتابخانه&amp;zwnj;ها بتوانند جایگاه خود را در جوامع اسلامی ما بیابند.&lt;br /&gt;
ــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــ&lt;br /&gt;
[1]- عش، &amp;zwnj;یوسف، کتابخانه&amp;zwnj;های عمومی و نیمه عمومی عربی در قرون وسطی، ترجمه اسد الله علوی ص، : 36.&lt;br /&gt;
[2]- مکی السباعی، محمد، نفش کتابخانه&amp;zwnj;های مساجد در فرهنگ و تمدن اسلامی، ترجمه علی شکویی،ص: 12.&lt;br /&gt;
[3]- شلبی، احمد، تاریخ آموزش در اسلام، ترجمه محمد حسین ساکت، ص: 123.&lt;br /&gt;
[4]- همان،&amp;zwnj;ص: 152.&lt;br /&gt;
[5]- همان ص: 152.&lt;br /&gt;
[6]- متز، آدامز، زندگی مسلمانان در قرون وسطی، ترجمه علی مظاهری ص: 239.&lt;br /&gt;
[7]- زیدان،&amp;zwnj;جرجی ، تاریخ تمدن اسلام، ترجمه علی جواهر کلام، ص: 637&lt;br /&gt;
[8]- مکی السباعی، محمد، نقش کتابخانه&amp;zwnj;های مساجد در فرهنگ و تمدن اسلامی، ترجمه علی شکویی،&amp;zwnj;ص: 145.&lt;br /&gt;
[9]- لنکستر، ف،&amp;zwnj; ویلفرد، کتابخانه&amp;zwnj;ها و کتابداران در عصر الکترونیک، ترجمه اسدالله آزاد، ص: 44.&lt;br /&gt;
[10]- همان،&amp;zwnj;ص: 90.&lt;br /&gt;
[11]- همان،&amp;zwnj;ص: 200.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>موانع اصلی تقریب و وحدت میان شیعیان و اهل سنت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/351</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;موانع اصلی تقریب و وحدت میان شیعیان و اهل سنت&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما معتقديم بزرگ&amp;zwnj;ترين عامل تفرقه در ميان امت اسلامی لعن و نفرين به پاک&amp;zwnj;ترین انسانهای روی زمين پس از پيامبران است، كه با دلائل بسيار واهی و با اتكاء به افسانه&amp;zwnj;های پوچ و بی&amp;zwnj;ريشه صورت مي&amp;zwnj;گيرد؛ وقتی مسلمانان بدانند كه صحابه و اهل بيت نه تنها يكديگر را لعن و نفرين نمی&amp;zwnj;كرده، بلكه با يكديگر شير و شكر بوده&amp;zwnj;اند و بارها در انظار همگان از يكديگر ستايش می&amp;zwnj;كرده&amp;zwnj;اند؛ ديگر دليلی وجود ندارد كه يك فرد مسلمان آنان را لعنت و نفرين كند و خودش را مستوجب خشم و غضب الهی قرار دهد زيرا خداوند متعال در حديث قدسی می&amp;zwnj;فرمايد: (من عادی لي ولياً فقد آذنته بالحرب) &amp;laquo;كسی كه با يكی از دوستان من دشمنی كند من با او اعلان جنگ می&amp;zwnj;كنم&amp;raquo;. اگر صحابه&amp;zwnj;ای كه قرآن بارها از آنان ستايش نموده اوليای خدا نباشند ديگر چه كسی می&amp;zwnj;تواند ولی خدا باشد؟! به اميد آنكه روزی امت اسلامی &amp;zwnj;بتواند با دانش و بينش هر چه عميقتر، اسباب تفرقه را شناسايی و خنثی نموده و راه وحدت و عزت و سر بلندی را بپيمايد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
قرآن يكی از اهداف آمدن پيامبران را رفع اختلافات معرفی می&amp;zwnj;كند. پيامبر (صلى الله عليه وآله وسلم) نيز توانست تفرقه ملت عرب را در انقلاب عظيم اسلام به وحدت تبديل كند و تمامی خلفای راشدین هم همه تلاش خود را برای تحقق وحدت به كار بستند و علی رضی الله عنه حتی بارها به خلفا در حفظ وحدت و اقتدار جامعه&amp;zwnj;ی اسلامی مشورت و ياری داد و در دوران خلافتش با وجود آشوب و تنش فراوان، هدف علی در برقراری اتحاد و وحدت تغيير نكرد و برای تحقق آن از هيچ تلاشی فروگذاری نكرد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
از اتحاد به عنوان نعمت الهی تجليل شده است و برادری و همدلی را مي&amp;zwnj;ستايد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
اعراب به نعمت اسلام، اختلافاتی كه چون دره&amp;zwnj;ی آتش بود كنار گذاشته و برادر يكديگر گشتند و همه&amp;zwnj;ی قبايل را به وحدت فراخواندند و پيامبر (صلى الله عليه وآله وسلم) در طول ده سال در مدينه، الگوی حكومت&amp;zwnj;داری در سايه&amp;zwnj;ی وحدت ايجاد كرد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
ولی امروز، قرنهاست كه مسمانان از مدينه&amp;zwnj;ی فاضله&amp;zwnj;ی پيامبر فاصله گرفته&amp;zwnj;اند و انتظار اتحاد و همدلی مسلمانان به رؤيای غير قابل تحقق تبديل شده به طوری كه گاهاً اختلافات رنگ كينه و دشمنی به خود گرفته و احزاب و گروه&amp;zwnj;های اسلامی حكم به كشتن و كفر و ارتداد هم می&amp;zwnj;دهند.&lt;br /&gt;
دو گروه از مسلمانان كه با هم اختلافاتی در زمينه&amp;zwnj;های اعتقادی و فقهی دارند شيعيان و سنی&amp;zwnj;ها می&amp;zwnj;باشند كه علمای اين دو مذهب عليرغم شعار وحدت هنوز نتوانسته&amp;zwnj;اند وحدت واقعی را در دنيای اسلام پديدار كنند، هرچند تلاش&amp;zwnj;هايی صورت گرفته ولی كافی نيست.&lt;br /&gt;
در بسياری از گفتگوهايی كه بين علمای دو مذهب صورت گرفته يا به صورت تملق&amp;zwnj;آميز از اتحاد و وحدت صحبت كرده&amp;zwnj;اند و بعد از گفتگو سخنان خودشان را عملی نكرده&amp;zwnj;اند و يا به صورت جبهه&amp;zwnj;گيری و جدل رو در روی هم قرار گرفته، بدون اين كه گفتگوی آنها نتايج مثبت چندانی داشته باشد.&lt;br /&gt;
متأسفانه انديشمندان اسلام اختلافات را موشكافی نمی&amp;zwnj;كنند و به آنچه كسب كرده&amp;zwnj;اند دلخوش كرده&amp;zwnj;اند و توجه ندارند كه بسياری از اختلافات قابل اصلاح است و در اين شرايط اختلافات غير قابل اصلاح نيز بايد متروك شود.&lt;br /&gt;
در بهمن ماه 1385 هجری شمسی، بين دكتر يوسف قرضاوی انديشمند مصری و آقای هاشمی رفسنجانی گفتگويی زيبا صورت گرفت كه با همه&amp;zwnj;ی گفتگوهای قبلی تفاوت داشت و واقعاً اين دو عالم جهان شيعه و سنی نشان دادند حاضرند اتحاد را جايگزين تفرقه كنند ولی اين گفتگو كافی نبود و از اين گفتگوهايی كه اختلافات موشكافی و سوء برداشت&amp;zwnj;ها برطرف می&amp;zwnj;شود بايد هر ساله چندين مرتبه اتفاق بيفتد و بايد دست جيره&amp;zwnj;خواران تفرقه، از تصميم&amp;zwnj;گيری بر دنيای اسلام كوتاه شود.&lt;br /&gt;
چرا بايد يك شيعه در بين سنيان و يك سنی در بين شيعيان بدون زخم زبان و مزاحمت زندگی نكند؟&lt;br /&gt;
نكته&amp;zwnj;ی ديگر اين است كه بايد توجه داشت مسلمان حق ندارد در اصول دين تقليد كند و هركس در اصول دين از پدران و... تقليد كند، اسلامش قابل قبول نيست. &amp;nbsp;شايد بيش از نيمی از مسلمانان در دين از پدرانشان تقليد كرده&amp;zwnj;اند و شناخت كافی از اسلام ندارند.&lt;br /&gt;
شايد اگر اسلام تحقيقی جای اسلام تقليدی را بگيرد بسياری ازاختلافات و تفكرات اصلاح شود.&lt;br /&gt;
در كتاب خدا به مسائل اعتقادی و بندگی خدا و روش نيكو زيستن بيش از مسائل فقهی پرداخته شده است در حالی كه علمای اسلام به مسائل فقهی بيشتر پرداخته و در راهنمايی مردم در عبادت خدا به معنای واقعی و آموختن نيكو زيستن به امت كوتاهی كرده&amp;zwnj;اند هر چند كه اين كوتاهی ناخواسته بوده ولی اين سبب شده تا بسياری از مردم دين را در چگونگی وضو گرفتن و غسل كردن و... خلاصه كرده&amp;zwnj;اند غافل از اين كه عبادت خدای يگانه و دست طلب پيش او فقط دراز كردن، كمك به هم نوع، تلاش برای پيشرفت، تربيت فرزند، اخلاق نيكو و صله&amp;zwnj;ی ارحام و كسب روزی حلال و... اهداف اصلی دين است.&lt;br /&gt;
با نگاهی به زندگی اصحاب و خاندان پيامبر متوجه می&amp;zwnj;شويم كه آنها مصلحت اسلام را بر هر چيز ترجيح می&amp;zwnj;دادند، به طور مثال علی (رضی الله عنه) كه از اصحاب به خاطر عدم انتخابش دلخور بود به خاطر اسلام سكوت كرد (حسب ادعای مدعیان پیروی از علی رضی الله عنه) ولی بعضی پيروان علی (رضی الله عنه) قرن&amp;zwnj;هاست كه به خاطر اسلام در شرايط وخيم مسلمانان سكوت نمی كنند!&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
چه بسا كه بسياری از قتل&amp;zwnj;ها و غارت&amp;zwnj;ها و كشتارها در قرون اخير به خاطر شيعه و سنی بودن بود. چه بسيار سنی&amp;zwnj;ها را حكومت صفوی به فجيع&amp;zwnj;ترين شكل ممكن كشت.&lt;br /&gt;
عده&amp;zwnj;ای طرفدار تفرقه مسلمانان را سرگرم اختلافات شيعه و سنی و... كرده&amp;zwnj;اند تا از اين راه بهايی كسب كنند، عده&amp;zwnj;ای از اينها بر منابر مساجد راه پيدا كرده&amp;zwnj;اند و در جايی كه بايد يگانگی الله، مسلمانان را متحد گرداند شعار اختلاف و تفرقه سر می&amp;zwnj;دهند و از عذاب الهی نمی&amp;zwnj;ترسند.&lt;br /&gt;
با نگاهی به مدينه&amp;zwnj;ی فاضله&amp;zwnj;ی رسول خدا (صلى الله عليه وآله وسلم) مي&amp;zwnj;بينيم كه يهوديان و مسيحيان، حتی منافقان در حكومت پيامبر بدون رنج و عذابی می&amp;zwnj;زيستند ولی شيعه و سنی بايد همديگر را بيازارند و به هم توهين كنند!&lt;br /&gt;
اگر بخواهيم مسلمانان متحد شوند بايد آگاهی و دانايی عوض نادانی و بی&amp;zwnj;دانشی به جوامع اسلامی پای گذارد. بر هر فرد مسلمان لازم و واجب است چون به سن بلوغ رسيد در رابطه با اصول دين و حقيقت اسلام تحقيق كند، اسلام را بشناسد و هدف دين را درک كند آن گاه دين برايش لذت&amp;zwnj;آور است و نه با توهين به اعتقاد ديگران، بلكه با دليل از دين دفاع می&amp;zwnj;كند. به راستی كه توهين و تحقير اعتقادات ديگران بدون اين كه دليلی ارائه دهيم از نادانی و تعصب سرچشمه می&amp;zwnj;گيرد و در بسياری از موارد مسلمانان به دليل عدم آگاهی از دين در اختلافاتی كه بين خود دارند عوض اين كه با دليل و مدرك رقيب خود را ساكت كنند به تخريب شخصيت وی می&amp;zwnj;پردازند كه اين نشانه&amp;zwnj;ی عدم آگاهی آنها از حقيقت دين شان است.&lt;br /&gt;
در گفتگوی بين عوام شيعه و سنی وقتی سنی پيروز شده، شيعه شكست خورده عوض جواب دادن به او بر چسب وهابی بودن به سنی می&amp;zwnj;زند در حالی كه وهابيت را هم نمی&amp;zwnj;شناسد.&lt;br /&gt;
متأسفانه امروز خيلی از مسلمانان اعتقادشان را از كتب عرفانی و همچنين نظريات انديشمندان و... گرفته بعد آيات قرآن را بر باورهای خود تحميل می&amp;zwnj;كنند و اين يكی از دلايل اختلاف است. آيا به راستی دين و اعتقاد ارزش چند ماه مطالعه در كتاب خدا را ندارد، آيا اگر تعصب فراموش شود وحدت نمايان نمی&amp;zwnj;شود؟ و اگر كتاب خدا بدون تعصب مطالعه شود گره&amp;zwnj;ها گشوده نمی&amp;zwnj;شود. متأسفانه دين برای بسياری از انسان&amp;zwnj;ها نمادين شده و حالت انفعالی پيدا كرده است و يكی از دلايل عمده&amp;zwnj;ی عقب&amp;zwnj;ماندگی مسلمانان انفعالی بودن دين در نظر بعضي&amp;zwnj;هاست.&lt;br /&gt;
((كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّـهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَمَا اخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا الَّذِينَ أُوتُوهُ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى اللَّـهُ الَّذِينَ آمَنُوا لِمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِهِ ۗ وَاللَّـهُ يَهْدِی مَن يَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ)). [البقرة: ٢١٣]&lt;br /&gt;
&amp;laquo;همه&amp;zwnj;ی مردم یک امت بودند؛ پس (از آنکه عده&amp;zwnj;ای راه حق را رها کردند،) الله پیامبران را به عنوان بشارت&amp;zwnj;دهنده و بیم&amp;zwnj;دهنده فرستاد و همراهشان کتاب را به حق نازل کرد تا میان مردم درباره&amp;zwnj;ی اختلافاتی که داشتند، حکم نماید... تنها کسانی در آن اختلاف کردند که به آنها کتاب داده شد؛ (آن هم) پس از آنکه نشانه&amp;zwnj;های آشکار، در اختیارشان قرار گرفت (و این اختلاف) از روی حسادتی (بود که) در میانشان وجود داشت. الله به فرمانش مؤمنان را به حقیقتِ چیزی که مورد اختلافشان بود، هدایت نمود. و الله هر که را بخواهد، به راه راست هدایت می&amp;zwnj;کند.&amp;raquo;&lt;br /&gt;
نکاتی در آيه فوق:&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
- هدف آمدن پيامبران، رفع تفرقه&lt;br /&gt;
- كتاب&amp;zwnj;های آسمانی منبع خوبی برای رفع تفرقه&lt;br /&gt;
- تفرقه عامل سركشی است در برابر خدا با تفرقه سركشی نكنيم.&lt;br /&gt;
بنابر آیات قرآن کریم، تنها راه اتحاد مسلمانان بازگشت به قرآن کریم و فرامین آن می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
امیدواریم که روزی فرا رسد که همه مسلمانان بر اساس کتاب خدا و سنت صحیح رسول خدا صلی الله علیه و آله وسلم وحدت کنند و از تفرقه و اختلاف بپرهیزند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب سنت و جايگاه آن در شريعت اسلامي</title>
<link>http://qalamlib.com/news/350</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب سنت و جایگاه آن در شریعت اسـلامی نوشته دكتر مصطفى سباعی از مهمترین کتابها در بخش سیرت و سنت نبوى در كتابخانه عقیده می باشد... این كتاب به دلیل اینكه جایگاه سنت نبوی را در اسلام مورد بحث قرار می دهد دارای اهمیت بزرگی است. همه می دانیم که از آنجائی كه الله متعال بیان و تفسیر كتابش را بعهده پیامبرش واگذار نموده، برای او نیز گواهی داده است كه آنچه كه می گوید...&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب سنت و جایگاه آن در شریعت اسـلامی&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب سنت&amp;nbsp;&amp;nbsp;و جایگاه آن در شریعت اسـلامی نوشته&amp;nbsp;&amp;nbsp;دكتر مصطفى سباعی از مهمترین کتابها در بخش سیرت و سنت نبوى در كتابخانه عقیده می باشد.&lt;br /&gt;
این كتاب به دلیل اینكه جایگاه سنت نبوی را در اسلام مورد بحث قرار می دهد دارای اهمیت بزرگی است همه می دانیم که از آنجائی كه الله متعال بیان و تفسیر كتابش را بعهده پیامبرش واگذار نموده، برای او نیز گواهی داده است كه آنچه كه می گوید وحی ازطرف الله متعال است: ﴿وَمَا یَنْطِقُ عَنِ الْهَوَى * إِنْ هُوَ إِلاَّ وَحْیٌ یُوحَى﴾. (النجم: 4).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هنگامی كه پیامبر علیه السلام دارای چنین شأن ومنزلتی از طرف الله متعال است، الله متعال تعالی پیروی وفرمانبرداری ایشان را واجب، وعصیان ونافرمانی آن حضرت را حرام گردانده است، و می فرماید: ﴿أَطِیعُوا اللَّهَ وَأَطِیعُوا الرَّسُولَ﴾. (النساء: 59).. ((خدا را اطاعت كنید ورسول الله را اطاعت نمائید)).&lt;br /&gt;
وهمچنین خدای متعال از آن كسانی كه پیامبر را میانجی وحاكم در میان خود قرار نمی دهند، ودر مقابل فرمان ایشان سر تسلیم فرو نمی آورند ایمان را نفی می كند ومی فرماید:&lt;br /&gt;
﴿فَلا وَرَبِّكَ لا یُؤْمِنُونَ حَتَّى یُحَكِّمُوكَ فِیمَا شَجَرَ بَیْنَهُمْ ثُمَّ لا یَجِدُوا فِی أَنْفُسِهِمْ حَرَجاً مِمَّا قَضَیْتَ وَیُسَلِّمُوا تَسْلِیماً﴾. (النساء: 65). ((نه! سوگند به پروردگارت كه آنان مومن بشمار نمی آیند تا زمانیكه در اختلافاتشان تو را حكم و داور قرار ندهند، وسپس ملالی در دل خود از داوری تو نداشته وكاملا تسلیم تو باشند)).&lt;br /&gt;
داونلود کتاب&lt;br /&gt;
سنت و جایگاه آن در شریعت اسـلامی&lt;br /&gt;
جایگاه سنت در قانونگذاری&lt;br /&gt;
امیدواریم که این کتاب مورد استفاده برادران وخواهران مسلمان واقع گردد&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>داستان شهادت حسين بن علي رضي الله عنهما</title>
<link>http://qalamlib.com/news/349</link>
<description>&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-justify: kashida; text-align: justify; line-height: 200%; text-kashida: 0%&quot;&gt;كتابخانه عقیده: حسین بن علی بن ابی طالب فرزند دختر رسول الله است که پس از برادر بزرگترش حسن بن علی رضی الله عنه در ماه شعبان سال 4 هجری متولد شد و به تاریخ 10 محرم (عاشورا) سال 61 هجری در کربلا به شهادت رسید. رضی الله عنه و ارضاه.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;حسن بن علی رضی الله عنه در دوران کودکی رسول الله را درک نمود و در هنگام وفات رسول الله هنوز کودک بود. پس از رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) خلیفه بزرگوارش ابوبکر صدیق رضی الله عنه وی را گرامی می&amp;zwnj;داشت و پس از او عمر بن الخطاب و عثمان بن عفان نیز او و دیگر بزرگواران اهل بیت را بسیار گرامی می&amp;zwnj;داشتند. وی در دوران خلافت پدر بزرگوارش علی بن ابی طالب رضی الله عنه وی را در همه&amp;zwnj;ی زندگی&amp;zwnj;اش همراهی نمود و از او روایت نمود و همچنان در طاعت پدر بززرگوارش باقی ماند تا اینکه ایشان به دست خوارج نادان به شهادت رسیدند.&lt;br /&gt;
پس از آنکه برادر ایشان خلیفه پنجم مسلمین حسن بن علی رضی الله عنه به نفع معاویه از خلافت کناره گرفت، حسین رضی الله عنه با این اقدام ایشان موافق نبود اما تسلیم خواسته&amp;zwnj;ی برادرش شد و سکوت اختیار کرد.&lt;br /&gt;
پس از وفات حسن بن علی رضی الله عنه وی در لشکری که معاویه رضی الله عنه برای محاصره&amp;zwnj;ی قسطنطنیه پایتخت بیزانس فرستاد شرکت کرد و جنگید اما پس از آنکه معاویه برای خلافت پسرش یزید بیعت گرفت حسین رضی الله عنه از بیعت یزید امتناع ورزید، زیرا از نظر وی افراد بسیاری شایسته&amp;zwnj;تر از یزید بودند. پس از آن از مدینه به سوی مکه خارج شد. در آن زمان بر روی زمین هیچ کس در فضل و منزلت با او برابری نمی&amp;zwnj;کرد.&lt;br /&gt;
نامه&amp;zwnj;های اهل كوفه&lt;br /&gt;
به اهل عراق خبر رسید كه حسین با یزید بن معاویه بیعت نكرده است؛ عراقی&amp;zwnj;ها یزید بن معاویه را نمی&amp;zwnj;خواستند و بلكه خود معاویه را نیز نمی&amp;zwnj;خواستند، در واقع آن&amp;zwnj;ها كسی جز علی و فرزندانش را قبول نداشتند، بنابراین به حسین نامه&amp;zwnj;هایی فرستادند و همه در نامه&amp;zwnj;هایشان می&amp;zwnj;گفتند: ما با تو بیعت كرده&amp;zwnj;ایم و فقط تو را می&amp;zwnj;خواهیم و یزید در گردن ما بیعتی ندارد، بلكه بیعت ما با تو است. نامه&amp;zwnj;های زیادی به حسین بن علی رسید تا اینكه بیش از پانصد نامه به او فرستاده شد، و همه&amp;zwnj;ی این نامه&amp;zwnj;ها را اهل كوفه می&amp;zwnj;فرستادند و او را به سوی خود فرا می&amp;zwnj;خواندند.&lt;br /&gt;
آنگاه حسین بن علی، پسر عمویش &amp;laquo;مسلم بن عقیل بن ابی طالب&amp;raquo; را فرستاد تا اوضاع آن&amp;zwnj;جا را بررسی كند و حقیقت امر را بداند، وقتی مسلم بن عقیل به كوفه رسید پرس&amp;zwnj;وجو كرد تا آن كه دانست مردم یزید را نمی&amp;zwnj;خواهند بلكه حسین بن علی را می&amp;zwnj;خواهند؛ مسلم نزد &amp;laquo;هانئ بن عروه&amp;raquo; اقامت گزید و مردم گروه گروه، و به تنهایی می&amp;zwnj;آمدند و با مسلم بن عقیل به نمایندگی از حسین بیعت می&amp;zwnj;كردند، و بیعت انجام شد. در آن هنگام، &amp;laquo;نعمان بن بشیر&amp;raquo; از سوی یزید امیر كوفه بود؛ وقتی به او خبر رسید كه مسلم بن عقیل در میان آنهاست و مردم پیش او می&amp;zwnj;آیند و برای حسین با او بیعت می&amp;zwnj;كنند، آن را نشنیده &amp;zwnj;گرفت و به قضیه توجه نكرد؛ تا اینكه افرادی به شام پیش یزید رفتند و قضیه را به اطلاع او رساندند و گفتند كه مردم با مسلم بیعت می&amp;zwnj;كنند و نعمان بن بشیر به این امر توجه نمی&amp;zwnj;كند. یزید دستور عزل نعمان بن بشیر را صادر كرد و &amp;laquo;عبیدالله بن زیاد&amp;raquo; را كه امیر و فرمانروای بصره بود به عنوان امیر بصره و كوفه، به كوفه فرستاد تا این قضیه را حل كند. عبیدالله بن زیاد شبانه در حالی كه نقاب زده بود وارد كوفه شد. او هنگامی که از كنار مردم رد می&amp;zwnj;شد به آنها سلام می&amp;zwnj;كرد و آنها در جواب می&amp;zwnj;گفتند: &amp;laquo;و علیك السلام یا ابن بنت رسول الله&amp;raquo;، مردم گمان می&amp;zwnj;بردند كه او حسین است و مخفیانه در شب نقاب زده و وارد كوفه شده است.&lt;br /&gt;
توطئه&amp;zwnj;ی عبیدالله بن زیاد و خیانت مردم كوفه&lt;br /&gt;
عبیدالله بن زیاد دانست كه قضیه جدی است و مردم منتظر حسین بن علی هستند. در این هنگام او وارد قصر شد و سپس یكی از غلام&amp;zwnj;هایش را به نام &amp;laquo;معقل&amp;raquo; فرستاد تا بررسی كند و بداند چه كسی در رأس این كار قرار دارد. او رفت و خودش را به دروغ چنین معرفی كرد كه فردی از اهالی حمص است و سه هزار دینار به همراه دارد كه برای حسین آورده است. او همچنان پرس و جو می&amp;zwnj;كرد تا آن كه او را به خانه&amp;zwnj;ی هانئ بن عروه راهنمایی كردند. او وارد خانه شد، مسلم بن عقیل را دید و با او بیعت كرد و سه هزار دینار را به او داد. او چند روز پیش مسلم بن عقیل رفت و آمد می&amp;zwnj;كرد تا آن كه از وضعیت آنها كاملاً اطلاع یافت و پس از آن به نزد عبیدالله بن زیاد بازگشت و ماجرا را به اطلاع او رساند.&lt;br /&gt;
پس از آن كه بسیاری از مردم با مسلم بن عقیل بیعت كردند، او به حسین پیام فرستاد كه همه چیز آماده است، آنگاه حسین بن علی رضی الله عنهما در روز هشتم ذی الحجه به سوی كوفه حركت كرد.&lt;br /&gt;
عبیدالله از كارهای مسلم با خبر بود، وی دستور داد هانئ بن عروه را پیش او بیاورند، هانئ را پیش او آوردند، عبیدالله از او پرسید، مسلم بن عقیل كجاست؟ گفت: نمی&amp;zwnj;دانم.&lt;br /&gt;
آنگاه عبیدالله غلامش معقل را صدا زد، او وارد شد و گفت: آیا او را می&amp;zwnj;شناسی؟ گفت: بله؛ او متوجه شد و دانست كه عبیدالله بن زیاد آنها را فریب داده است، عبیدالله بن زیاد گفت: مسلم بن عقیل كجاست؟ او گفت: سوگند به الله متعال اگر زیر پاهایم باشد پاهایم را بلند نمی&amp;zwnj;كنم، آنگاه عبیدالله بن زیاد او را شکنجه کرد و سپس دستور داد او را زندانی كنند.&lt;br /&gt;
خبر به مسلم بن عقیل رسید؛ او به همراه چهار هزار نفر بیرون آمده و قصر عبیدالله بن زیاد را محاصره كرد و اهل كوفه همراه او بیرون آمدند، در این هنگام اشراف و سران مردم پیش عبیدالله بودند. وی با تطمیع سران و اشراف و ترساندن آنها از لشكر شام به آنها گفت كه مردم را از حمایت مسلم باز دارند. بنابراین سران از مردم &amp;zwnj;خواستند كه از حمایت مسلم دست بردارند، مسلم چهار هزار نفر به همراه داشت و شعارشان &amp;laquo;یا منصور امت&amp;raquo; بود؛ سران قبایل و اشراف همچنان مردم را از همراهی مسلم بر حذر داشتند تا اندك اندك مردم پراكنده شدند. زن&amp;zwnj;ها می&amp;zwnj;آمدند و فرزندانشان را با خود می&amp;zwnj;بردند، ومردها می&amp;zwnj;آمدند و برادرانشان را با خود می&amp;zwnj;بردند، و امیر قبیله می&amp;zwnj;آمد و مردم را از همراهی با مسلم باز می&amp;zwnj;داشت، تا آن كه از چهار هزار نفر فقط سی نفر با مسلم باقی ماندند! هنوز خورشید غروب نكرده بود كه مسلم بن عقیل تنها ماند و همه&amp;zwnj;ی مردم او را رها كردند؛ او تنها در كوچه&amp;zwnj;های كوفه می&amp;zwnj;گشت و نمی&amp;zwnj;دانست كه به كجا برود، او درِ خانه&amp;zwnj;ای را زد و زنی از قبیله&amp;zwnj;ی كنده كه صاحب خانه بود در را باز كرد؛ او آب خواست، زن تعجب كرد و به او گفت: تو چه كسی هستی؟ گفت: من مسلم بن عقیل هستم، و ماجرا را به اطلاع او رسانید و گفت كه مردم او را رها كرده&amp;zwnj;اند و حسین به زودی می&amp;zwnj;آید زیرا او به حسین پیام فرستاده كه بیاید. آن زن مسلم را به اتاق مجاور وارد كرد و نشاند، و آب و غذا برایش آورد اما فرزند آن زن رفت و عبیدالله بن زیاد را از محل اقامت مسلم بن عقیل آگاه كرد. آنگاه عبیدالله هفتاد نفر را به سوی او فرستاد و آنها او را محاصره كردند. مسلم با آنها جنگید و در پایان، هنگامی که به او امان دادند تسلیم شد، او را دستگیر كردند و به قصر فرمانداری كه عبیدالله بن زیاد در آن بود بردند. وقتی مسلم وارد شد عبیدالله بن زیاد از او پرسید كه علت قیام او چییست. گفت: با حسین بن علی بیعت كرده&amp;zwnj;ایم.&lt;br /&gt;
عبیدالله گفت: من تو را می&amp;zwnj;كشم، مسلم گفت: مرا بگذار كه وصیت كنم، گفت: وصیت كن، مسلم به اطرافش نگاه كرد و &amp;laquo;عمر بن سعد بن ابی وقاص&amp;raquo; را دید و به او گفت: تو از همه&amp;zwnj;ی مردم از نظر خویشاوندی به من نزدیكتر هستی بیا تا تو را سفارشی كنم؛ و او را به گوشه&amp;zwnj;ای از خانه برد و به او سفارش كرد كه به حسین پیام بفرستد تا برگردد. بنابراین عمر بن سعد بن ابی وقاص مردی را به سوی حسین فرستاد تا او را خبر كند كه كار تمام شد و اهل كوفه او را فریب داده&amp;zwnj;اند. آنگاه در روز عرفه مسلم بن عقیل به شهادت رسید. &amp;laquo;إنا لله و إنا إلیه راجعون&amp;raquo; حسین در روز ترویه (هشتم ذی الحجه) یك روز پیش از كشته شدن مسلم بن عقیل از مكه حركت كرده بود.&lt;br /&gt;
تلاش اصحاب برای جلوگیری از خروج حسین رضی الله عنه&lt;br /&gt;
بسیاری از اصحاب كوشیدند تا حسین را از خروج و رفتن به كوفه باز دارند؛ &amp;laquo;عبدالله بن عمر&amp;raquo;، &amp;laquo;عبدالله بن عباس&amp;raquo;، &amp;laquo;عبدالله بن عمرو بن عاص&amp;raquo;، &amp;laquo;ابو سعید خدری&amp;raquo;، &amp;laquo;عبدالله بن زبیر&amp;raquo; و برادر حسین، &amp;laquo;محمدحنفیه&amp;raquo;، همه&amp;zwnj;ی اینها وقتی دانستند كه او می&amp;zwnj;خواهد به كوفه برود او را منع كردند:&lt;br /&gt;
هنگامی که حسین خواست به كوفه برود عبدالله بن عباس به او گفت. اگر مردم به من و تو طعنه نمی&amp;zwnj;زدند دستم را به موی سرت چنگ می&amp;zwnj;زدم و نمی&amp;zwnj;گذاشتم كه بروی. شعبی می&amp;zwnj;گوید ابن عمر در مكه بود او را خبر كردند كه حسین به سوی عراق رهسپار شده است، عبدالله بن عمر به دنبال او حركت كرد و به فاصله&amp;zwnj;ی سه روز از مكه به او رسید و گفت: كجا می&amp;zwnj;خواهی بروی؟ گفت: به عراق، و نامه&amp;zwnj;هایی كه از عراق برای او فرستاده بودند و در آن اعلام كرده بودند كه آنها با او هستند را بیرون آورد و گفت: این نامه&amp;zwnj;هایشان است و با من بیعت كرده&amp;zwnj;اند، (اهل عراق او رضی الله عنه را فریب داده بودند).&lt;br /&gt;
ابن عمر به او گفت: پیش آنها مرو... حسین نپذیرفت و برنگشت، آنگاه عبدالله بن عمر او را در آغوش گرفت و گریه كرد و گفت: تو را از آن كه كشته شوی به الله متعال می&amp;zwnj;سپارم.&lt;br /&gt;
حادثه&amp;zwnj;ی كربلا&lt;br /&gt;
حسین بوسیله&amp;zwnj;ی قاصدی كه عمر بن سعد فرستاد از وضعیت مسلم خبردار شد، بنابراین خواست كه باز گردد و با فرزندان مسلم بن عقیل سخن گفت، اما آنها گفتند: نه، سوگند به الله متعال بر نمی&amp;zwnj;گردیم مگر آن كه انتقام خون پدرمان را بگیریم. حسین نظر آنها را قبول كرد. عبیدالله پس از آن كه باخبر شد كه حسین به سوی آنها می&amp;zwnj;آید به حُرّ بن یزید التمیمی دستور داد تا با لشكری هزار نفری برود تا در راه با حسین روبرو شود. او حركت كرد و نزدیك قادسیه با حسین روبرو شد. حر به او گفت: كجا می&amp;zwnj;روی ای فرزند دختر رسول الله؟! گفت: به عراق می&amp;zwnj;روم. گفت: من به تو می&amp;zwnj;گویم برگرد تا الله مرا به گناه جنگ با تو مبتلا نكند! به همان جا كه آمده&amp;zwnj;ای برگرد، یا به شام برو كه یزید آنجاست و به كوفه نیا.&lt;br /&gt;
اما حسین نپذیرفت؛ حسین به سوی عراق می&amp;zwnj;آمد و حر بن یزید برایش مزاحمت ایجاد می&amp;zwnj;كرد و او را منع می&amp;zwnj;كرد. حسین به او گفت: از من دور شو مادرت به عزایت بنشیند. حر بن یزید گفت: سوگند به الله متعال اگر غیر از تو كسی دیگر از عرب، این را می&amp;zwnj;گفت او و مادرش را قصاص می&amp;zwnj;كردم، ولی چه می&amp;zwnj;توانم بگویم كه مادرت بانوی زنان جهان است.&lt;br /&gt;
در این هنگام حسین توقف كرد، سپس دنباله&amp;zwnj;ی لشكر كه چهار هزار نفر بودند و عمر بن سعد آنها را فرماندهی می&amp;zwnj;كرد آمدند، و حسین در جایی بود كه به آن كربلا گفته می&amp;zwnj;شود. او پرسید اینجا كجاست؟ گفتند: كربلا است، گفت: &amp;laquo;كرب است و بلا&amp;raquo;. وقتی لشكر عمر بن سعد رسید او با حسین سخن گفت و به او گفت كه با من به عراق بیا كه عبیدالله بن زیاد آنجاست، اما حسین نپذیرفت، و وقتی حسین دید كه كار جدی است به عمر بن سعد گفت: من شما را در سه چیز مختار قرار می&amp;zwnj;دهم یكی از این سه چیز را انتخاب كن، او گفت: آنها چه هستند؟ گفت: &amp;laquo;یكی اینكه مرا بگذاری تا برگردم، یا به مرزی از مرزهای اسلام بروم، و یا اینكه به شام پیش یزید بروم و دستم را در دست او بگذارم&amp;raquo;. عمر بن سعد گفت: خوب است، تو به یزید پیام بفرست و من كسی را پیش عبیدالله بن زیاد می&amp;zwnj;فرستم، و نگاه می&amp;zwnj;كنیم كه چه خواهد شد. و آنگاه عمر بن سعد كسی را پیش عبیدالله بن زیاد فرستاد، ولی حسین كسی را پیش یزید نفرستاد، وقتی قاصد پیش عبیدالله بن زیاد آمد و او را خبر كرد كه حسین می&amp;zwnj;گوید من شما را در سه چیز مختار می&amp;zwnj;گذارم یكی را انتخاب كنید، عبیدالله بن زیاد گفت هر كدام را كه حسین انتخاب كرد می&amp;zwnj;پذیریم. مردی نزد عبیدالله بن زیاد بود كه به او &amp;laquo;شمر بن ذی الجوشن&amp;raquo; می&amp;zwnj;گفتند، او از مقرّبان و نزدیكان عبیدالله بن زیاد بود، او گفت: نه، سوگند به الله متعال مگر آن كه حكم تو را بپذیرد، بنابراین عبیدالله فریب سخن او را خورد و گفت: آری، باید حكم مرا بپذیرد (یعنی به كوفه بیاید و من خودم او را به شام یا به یكی از مرزها می&amp;zwnj;فرستم یا او را به مدینه باز می&amp;zwnj;گردانم). آنگاه عبیدالله بن زیاد شمر بن ذی الجوشن را فرستاد و گفت: برو تا او تسلیم فرمان من شود، اگر عمر بن سعد پذیرفت كه خوب است، و اگر نپذیرفت پس به جای او تو فرمانده هستی.&lt;br /&gt;
عبیدالله بن زیاد عمر بن سعد را با لشكری چهار هزار نفری آماده&amp;zwnj; كرده بود تا به ری برود و به او گفت كار حسین را تمام كن سپس به ری برو. عبیدالله به او وعده داده بود كه فرمانداری ری را به او واگذار كند، شمر بن ذی الجوشن به سویی كه حسین بن علی و حر بن یزید و عمر بن سعد در آن جا بودند حركت كرد؛ هنگامی که به حسین خبر دادند كه او باید تسلیم حكم و دستور عبیدالله بن زیاد شود نپذیرفت و گفت: نه! سوگند به الله متعال هرگز تسلیم حكم و فرمان عبیدالله بن زیاد نخواهم شد.&lt;br /&gt;
همراهان حسین هفتاد و دو اسب سوار بودند، و لشكر كوفه پنج هزار نفر بودند وقتی هر دو گروه رو در روی هم قرار گرفتند حسین به لشكر ابن زیاد گفت: به خودتان بازگردید و خویشتن را مورد بازخواست قرار دهید، آیا برای شما شایسته است كه با فردی چون من بجنگید؟ حال آن كه من پسر دختر پیامبر شما هستم و غیر از من روی زمین پسر دختر پیامبر دیگری نیست، و پیامبر به من و برادرم گفته است: &amp;laquo;این دو سرداران جوانان اهل بهشت هستند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
حسین همچنان آنها را تشویق می&amp;zwnj;كرد كه عبیدالله بن زیاد را ترك كنند و به او بپیوندند بنابراین سی نفر از آنها به حسین پیوستند، كه یكی از این سی نفر حر بن یزید التمیمی فرمانده پیشقراولان لشكر ابن زیاد بود. به حر بن یزید گفتند: تو با ما آمدی در حالی كه فرمانده پیشقراولان بودی و اكنون به سوی حسین می&amp;zwnj;روی؟! گفت: وای بر شما! سوگند به الله متعال باید از جهنم و بهشت یكی را انتخاب كنم، و سوگند به الله متعال كه هیچ چیزی را بر بهشت ترجیح نمی&amp;zwnj;دهم گرچه قطعه قطعه شده یا سوزانده شوم! بعد از آن حسین رضی الله عنه نماز ظهر و عصر روز پنجشنبه را خواند، هم لشكر ابن زیاد پشت سر او نماز گذاردند، و هم یاران خودش. او به آنها گفته بود كه یك امام از شما باشد و یك امام از ما. گفتند: نه، بلكه ما پشت سر تو نماز می&amp;zwnj;خوانیم، بنابراین نماز ظهر و عصر را پشت سر او خواندند. نزدیك غروب آنها همراه با اسب&amp;zwnj;هایشان به سوی حسین پیش آمدند، حسین وقتی آنها را دید گفت: این چیست؟! گفتند: آنها جلو آمده&amp;zwnj;اند، گفت: نزد آنها بروید و به آنها بگویید كه چه می&amp;zwnj;خواهند؟ پس بیست اسب سوار كه یكی از آنها برادر حسین عباس بن علی بن ابی طالب بود به سوی آنها رفتند و با آنها حرف زدند و از آنها پرسیدند كه چه می&amp;zwnj;خواهند؟ گفتند: یا حسین تسلیم شود و حكم عبیدالله بن زیاد را بپذیرد و یا اینكه با او می&amp;zwnj;جنگیم. گفتند: ما می&amp;zwnj;رویم و ابا عبدالله را خبر می&amp;zwnj;كنیم، بنابراین به سوی حسین رضی الله عنه برگشتند و او را خبر كردند، حسین گفت: به آنها بگویید امشب به ما فرصت دهید فردا شما را خبر می&amp;zwnj;كنیم، تا من امشب با پروردگارم مناجات كنم و نماز بخوانم زیرا دوست دارم برای پروردگارم نماز بگذارم؛ حسین رضی الله عنه و یارانش آن شب را با دعا و نماز و استغفار سپری كردند.&lt;br /&gt;
صبح روز جمعه وقتی حسین رضی الله عنه گفت كه تسلیم ابن زیاد نمی&amp;zwnj;شوم جنگ میان هر دو گروه در گرفت، جنگ، جنگ نابرابری بود و یاران حسین دیدند كه نمی&amp;zwnj;توانند با این لشكر بزرگ بجنگند بنابراین تنها هدفشان این بود كه مانع از رسیدن دشمن به حسین شوند و از او دفاع كنند و یكی پس از دیگری در دفاع از حسین كشته می&amp;zwnj;شدند تا اینكه همه كشته شدند و كسی جز خود حسین بن علی -رضی الله عنهما- باقی نماند.&lt;br /&gt;
شهادت حضرت حسین رضی الله عنه&lt;br /&gt;
بعد از آن تا مدتی طولانی كسی به حسین نزدیك نمی&amp;zwnj;شد و هیچ كس نمی&amp;zwnj;خواست كه دستش به خون حسین رضی الله عنه آلوده شود، و وضعیت همچنان ادامه یافت تا آن كه شمر بن ذی الجوشن - قبحه الله- آمد و فریاد زد وای بر شما! مادرانتان به عزایتان بنشینند! او را محاصره كنید و او را بكشید، آنگاه آمدند و حسین را محاصره كردند او چون شیر درنده در میان آنها از این سو و آن سو شمشیر می&amp;zwnj;زد تا اینكه افرادی از آنها را كشت، اما تعداد زیاد بر شجاعت غالب می&amp;zwnj;آید. شمر بن ذی الجوشن فریاد زد وای بر شما منتظر چه چیزی هستید؟! جلو بروید. آنگاه آنها به سوی حسین رفتند و او رضی الله عنه را به شهادت رساندند - انا لله و انا الیه راجعون- كسی كه حسین را را به شهادت رساند و سرش را از تن جدا كرد &amp;laquo;سنان بن انس نخعی&amp;raquo; بود، و گفته&amp;zwnj;اند كه شمر بن ذی الجوشن - قبحه الله - او را كشت. پس از شهادت حسین سر او را به كوفه پیش عبیدالله بن زیاد بردند، وقتی سرش را پیش عبیدالله بن زیاد آوردند او چوبی كه همراه داشت را به دهان حسین وارد می&amp;zwnj;كرد و می&amp;zwnj;گفت: &amp;laquo;گر چه بهترین دهان است.&amp;raquo; انس بن مالك رضی الله عنه آن جا نشسته بود بلند شد و گفت: &amp;laquo;سوگند به الله متعال تو را رسوا می&amp;zwnj;كنم، رسول الله را دیده&amp;zwnj;ام كه همین جایی از دهان حسین كه تو چوب در آن داخل می&amp;zwnj;كنی را بوسیده است...&amp;raquo;&lt;br /&gt;
ابراهیم النخعی رضی الله عنه می&amp;zwnj;گوید: اگر من از قاتلان حسین می&amp;zwnj;بودم و سپس به بهشت می&amp;zwnj;رفتم از نگاه كردن به چهره&amp;zwnj;ی رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) شرمم می&amp;zwnj;آمد.&lt;br /&gt;
چه كسانی در آن جا به همراه حسین كشته شدند؟&lt;br /&gt;
بسیاری از اهل بیت به همراه حسین در آنجا به شهادت رسیدند، از جمله كسانی كه در این جنگ در كنار حسین كشته شدند، از فرزندان علی بن ابی طالب خود حسین و جعفر و عباس و ابوبكر و محمد و عثمان كشته شدند.&lt;br /&gt;
و از فرزندان حسین، عبدالله و علی اكبر (او علی زین العابدین نیست)&lt;br /&gt;
و از فرزندان حسن، عبدالله و قاسم و ابوبكر كشته شدند.&lt;br /&gt;
و از فرزندان عقیل، جعفر و عبدالله و عبدالرحمن و عبدالله بن مسلم بن عقیل در كربلا كشته شدند و مسلم بن عقیل خودش در كوفه كشته شد.&lt;br /&gt;
و از فرزندان عبدالله بن جعفر، عون و محمد كشته شدند.&lt;br /&gt;
هیجده نفر كه همه از اهل بیت پیامبر (صلی الله علیه وآله وسلم) بودند در این جنگ نابرابر به شهادت رسیدند.&lt;br /&gt;
آیا یزید قصد كشتن حسین رضی الله عنه را داشت؟&lt;br /&gt;
یزید مستقیما دستی در كشتن حسین نداشت، نمی&amp;zwnj;خواهیم از یزید دفاع كنیم و بلكه حقیقت را می&amp;zwnj;گوییم و از آن دفاع می&amp;zwnj;كنیم. یزید، عبیدالله بن زیاد را فرستاد تا نگذارد كه حسین به كوفه برسد و او را به كشتن حسین دستور نداد، بلكه خود حسین نسبت به یزید گمان نیك داشت و گفت: مرا بگذارید كه پیش یزید می&amp;zwnj;روم و دستم را در دست او می&amp;zwnj;گذارم.&lt;br /&gt;
به اتفاق اهل نقل یزید به كشتن حسین دستور نداد و بلكه به ابن زیاد نوشت كه به حسین اجازه ندهد كه بر عراق فرمانروایی كند، و وقتی یزید از كشته شدن حسین خبردار شد از این فاجعه دردمند و ناراحت شد و در خانه&amp;zwnj;اش گریه كرد. او زنان آنها را اسیر نكرد بلكه اهل بیت حسین را گرامی داشت و آنها را به شهرشان باز گرداند. اما روایاتی كه در آنها ذكر شده كه زنان اهل بیت پیامبر (صلی الله علیه وآله وسلم) مورد توهین قرار گرفته&amp;zwnj;اند و به اسارت گرفته شده&amp;zwnj;اند و به شام برده شدند، همه اینها بی&amp;zwnj;اصل و اساس هستند، بلكه بنی امیه بنی هاشم را گرامی می&amp;zwnj;داشتند، برای مثال هنگامی که &amp;laquo;حجاج بن یوسف&amp;raquo; با فاطمه بنت عبدالله بن جعفر ازدواج كرد، عبدالملك بن مروان این را نپذیرفت و به حجاج دستور داد تا او را طلاق دهد. بنی امیه بنی هاشم را بزرگ و گرامی می&amp;zwnj;داشتند و هرگز زنی هاشمی به اسارت گرفته نشده است.&lt;br /&gt;
بنابراین زنان هاشمی در آن زمان محترم و گرامی بودند، و آنچه می&amp;zwnj;گویند كه یزید زنان اهل بیت را به اسارت گرفت و به عنوان اسیر جنگی آنها را كنیز قرار داد صحت ندارد. و آنچه گفته&amp;zwnj;اند كه سر حسین پیش یزید فرستاده شد نیز واقعیت ندارد بلكه سر حسین نزد عبیدالله در كوفه ماند، و حسین دفن شد و مکان قبر او معلوم نیست. ولی مشهور است كه او در كربلا در همان جا كه به شهادت رسید دفن شد.&lt;br /&gt;
موضع اهل سنت در مورد یزید بن معاویه&lt;br /&gt;
می توان موضع اهل سنت در مورد یزید را در این گفته&amp;zwnj;ی امام ذهبی رحمه الله خلاصه نمود كه: &amp;laquo;نه او را دوست می&amp;zwnj;داریم و نه هم او را لعن و نفرین می&amp;zwnj;كنیم&amp;raquo; زیرا از یك سو كفر وی ثابت نشده و حتی در فاسق دانستن وی دلیلی در دست نیست و این باید ثابت شود و تمام روایاتی كه در مورد مشروب خوار بودن و فسق و فجور وی نقل می&amp;zwnj;شود ضعیف و غیر قابل استناد می&amp;zwnj;باشند و از سوی دیگر وی در برخی موضع&amp;zwnj;گیری&amp;zwnj;ها و تصمیم&amp;zwnj;گیری&amp;zwnj;هایش اشتباهات بزرگی مرتكب شد و افراد نامناسبی را بر برخی امور گمارد كه موجب حوادث غم انگیزی همچون كربلا گردید. و وی به طور ناخواسته و غیر مستقیم باعث آن فاجعه گردید و به همین علت اهل سنت و جماعت وی را دوست نمی&amp;zwnj;دارند و محبت او را در قلب جای نمی&amp;zwnj;دهند.&lt;br /&gt;
همچنین اهل سنت وی را لعن و نفرین نمی&amp;zwnj;كنند زیرا لعنت فرستادن بر مرده&amp;zwnj;ای كه الله متعال و پیامبرش او را لعنت نكرده&amp;zwnj;اند جایز نیست، زیرا هنگامی که ابوجهل را ناسزا گفتند پیامبر (صلی الله علیه وآله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;مرده&amp;zwnj;ها را ناسزا نگویید، زیرا آنها به آنچه كرده&amp;zwnj;اند رسیده&amp;zwnj;اند&amp;raquo; [بخاری/1393]&lt;br /&gt;
و اساس دین الهی بر پایه&amp;zwnj;ی دشنام و ناسزا نیست، و بلكه اسلام بر خوبی&amp;zwnj;های اخلاقی استوار است، بنابراین دشنام و ناسزا گفتن از دین نیست، بلكه پیامبر (صلی الله علیه وآله وسلم) می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;ناسزا گفتن به مسلمان فسق است و جنگیدن با او كفر است&amp;raquo;. (در اینجا كفر به معنی گناه بسیار بزرگ است و نه كفر خارج كننده از دین)&lt;br /&gt;
پس ناسزا گفتن به مسلمان فسق و گناه است، و هیچ كسی نگفته كه یزید از دین اسلام خارج است، بلكه نهایت آنچه در مورد او گفته&amp;zwnj;اند این است كه او فاسق است، و فسق او چنان كه گفتیم باید ثابت شود، و الله آن را می&amp;zwnj;داند، بلكه پیامبر (صلی الله علیه وآله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;اولین لشكری كه با شهر قیصر می&amp;zwnj;جنگند بخشیده شده&amp;zwnj;اند&amp;raquo;. و این لشكر را یزید بن معاویه فرماندهی می&amp;zwnj;كرد و گفته می&amp;zwnj;شود كه بزرگان اصحاب چون ابن عمر و ابن الزبیر و ابن عباس و ابو ایوب و همچنین خود حسین بن علی رضی الله عنهم اجمعین در این جنگ همراه او بودند، و این جنگ در سال 49 ه&amp;zwj; اتفاق افتاد.&lt;br /&gt;
نگاه اهل سنت به این مصیبت&lt;br /&gt;
آنچه الله متعال مقدر كرده باشد رخ می&amp;zwnj;دهد گرچه مردم نخواهند. و كشته شدن حسین، از كشته شدن پیامبران بزرگتر و بالاتر نیست، سر یحیی بن زكریا علیه السلام به عنوان مهریه و پیشكش زن زناكاری تقدیم شد، و زكریا را كشتند، و خواستند موسی را به قتل برسانند، و خواستند عیسی را بكشند و پیامبرانی دیگر نیز كشته شده&amp;zwnj;اند، و همچنین عمر و عثمان و علی كشته شده&amp;zwnj;اند و اینها همه از حسین رضی الله عنه افضل و برتر بوده&amp;zwnj;اند. بنابراین جایز نیست كه انسان هنگامی که كشته شدن حسین را یادآوری می&amp;zwnj;كند به سر و صورت خود بزند و گریبانش را پاره كند. بلكه از همه&amp;zwnj;ی این چیزها نهی شده است و پیامبر (صلی الله علیه وآله وسلم) می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;هر كس به صورت بزند و گریبانش را پاره كند از ما نیست&amp;raquo; [بخاری 1294]&lt;br /&gt;
و ایشان (صلی الله علیه وآله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;من از زنی كه [در مصیبت] فریاد می&amp;zwnj;زند و آن كه مویش را می&amp;zwnj;كند و آن كه گریبانش را چاك می&amp;zwnj;كند بیزار هستم&amp;raquo; [مسلم 167]&lt;br /&gt;
و فرمودند: &amp;laquo;نوحه&amp;zwnj;خوان اگر توبه نكند روز قیامت در حالی حشر می&amp;zwnj;شود كه جامه و شلواری از قیر بر تن خواهد داشت&amp;raquo; [مسلم 934]&lt;br /&gt;
بنابراین هر گاه چنین مصیبت&amp;zwnj;هایی پیش می&amp;zwnj;آید مسلمان همان چیزی را می گوید كه الله &amp;nbsp;متعال فرموده که: {الَّذِینَ إِذَا أَصَابَتْهُمْ مُصِیبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَیْهِ رَاجِعُونَ}. (بقره: 156). &amp;laquo;کسانی که هرگاه مصیبتی به آنان می&amp;shy;رسد، می&amp;shy;گویند: ما از آنِ الله هستیم و به سوی الله باز می&amp;shy;گردیم &amp;raquo;.&lt;br /&gt;
روزه&amp;zwnj;ی عاشورا&lt;br /&gt;
علما اتفاق دارند كه روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا سنت است.&lt;br /&gt;
از رسو ل الله (صلی الله علیه وآله وسلم) روایت است كه فرمودند: &amp;laquo;بهترین روزه پس از رمضان روزه&amp;zwnj;ی ماه الله، محرم است&amp;raquo; [به روایت مسلم]&lt;br /&gt;
و از رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) روایت است كه: &amp;laquo;من اینگونه احتساب می&amp;zwnj;كنم كه روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا كفاره&amp;zwnj;ی گناهان سال قبل باشد&amp;raquo; [رواه مسلم]&lt;br /&gt;
همچینین رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) به روزه&amp;zwnj;ی روز نهم محرم (تاسوعا) به همراه عاشورا استحبابا و برای مخالفت با یهود و نصاری دستور داده است. (زیرا آنها تنها روز عاشورا را روزه می&amp;zwnj;گرفتند) از ابن عباس رضی الله عنه روایت است كه وقتی رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) عاشورا را روزه گرفت و به روزه گرفتن در آن دستور داد، مردم گفتند كه یهود و نصاری این روز را گرامی می&amp;zwnj;دارند! پس رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;اگر ان شاالله سال بعد را درك نمودیم روز نهم را نیز روزه خواهیم گرفت&amp;raquo; ابن عباس رضی الله عنه می&amp;zwnj;گوید. سال بعد فرا نرسید تا اینكه رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) وفات نمودند... [رواه مسلم]&lt;br /&gt;
حكمت روزه&amp;zwnj;ی عاشورا&lt;br /&gt;
عبدالله بن عباس رضی الله عنهما حكمت روزه&amp;zwnj;ی روز عاشورا را چنین بیان می&amp;zwnj;كند: زمانی كه پیامبر (صلی الله علیه وآله وسلم) به مدینه هجرت نمود، یهود را دید كه روز عاشورا را روزه می&amp;zwnj;گیرند رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) از آنها پرسید: &amp;raquo;این چه روزی است؟&amp;laquo; گفتند: این روز نیكی است، روزی كه الله متعال بنی اسرائیل را از چنگ دشمن نجات بخشید، لذا موسی علیه السلام این روز را روزه گرفت. آن حضرت (صلی الله علیه وآله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;من از شما به موسی نزدیكترم&amp;laquo;. همین بود كه این روز را روزه گرفت و امتش را به روزه گرفتن این روز امر فرمود. [بخاری 3/58]&lt;br /&gt;
دیدگاه اهل سنت درباره&amp;zwnj;ی عاشورا&lt;br /&gt;
بر اساس دیدگاه اهل سنت انجام هرگونه مراسم خاص در این روز جایز نیست؛ نه عزاداری و نه جشن و سرور زیرا هیچ&amp;zwnj;كدام از این كارها از رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) ثابت نیست و تنها روزه&amp;zwnj;ی عاشورا از رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) ثابت شده است. این روز هیچ حكم خاص دیگری ندارد و ممنوع كردن ازدواج در ماه محرم و صفر نیز از دیدگاه اهل سنت جایز نیست. بر اساس دیدگاه اهل سنت احترام به بزرگان دین در تبعیت از آنها و گرامی داشتن نام و یاد آنهاست. و رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) ازدواج در سالروز شهادت عمویش حمزه و همسر گرامیش خدیجه رضی الله عنهما که بسیار دوستشان داشت را ممنوع قرار نداد و صحابه نیز سالروز وفات پیامبر را عزاداری نمی&amp;zwnj;کردند و این به هیچ عنوان بی&amp;zwnj;احترامی محسوب نمی&amp;zwnj;شود.&lt;br /&gt;
الله متعال توفیق پیروی صحیح آن بزرگان را به ما عطا کند و ما را شایسته&amp;zwnj;ی ادامه دادن راه آنان قرار دهد. آمین.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>ماه محرم  و عاشورا و فرهنگ عزاداری</title>
<link>http://qalamlib.com/news/348</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;ماه محرم&amp;nbsp;&amp;nbsp;و عاشورا و فرهنگ عزاداری&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عاشورا، دهمین روز ماه محرم است که از قدیم الایام در اکثر ادیان آسمانی دارای فضیلت و جایگاه ویژه&amp;zwnj;ای بوده است؛ بطوری که یهودیان، این روز را، روز نجات بنی&amp;zwnj;اسرائیل از ظلم فرعون دانسته و در این روز، روزۀ شکر بجای می&amp;zwnj;آوردند. بعد از بعثت پیامبر اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم و ظهور اسلام، فضیلت این روز همچنان برحال خود باقی ماند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روزۀ عاشورا&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با توجه به جایگاه روز عاشورا، در مورد روزۀ آن، درسنت پیامبر اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم تأکید بسیار شده است و آن حضرت صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم امت را تشویق به روزه گرفتن دراین روز نموده&amp;zwnj;اند. روایتی از حضرت عبدالله بن عباس رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه در بخاری نقل شده که می&amp;zwnj;فرماید: رسول الله صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم به مدینه تشریف آوردند، یهودیان را دیدند که در روز عاشورا روزه می&amp;zwnj;گیرند، آن حضرت صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم فرمودند: [فلسفه] این کار چیست؟ [یهودیان] گفتند: این روز مبارکی است، در این روز خداوند متعال بنی&amp;zwnj;اسرائیل را از دشمنشان نجات داد و حضرت موسی علیه&amp;zwnj;السلام این روز را روزه می&amp;zwnj;گرفت. آن حضرت صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم فرمودند: من از شما به موسی سزاوارتر - نزدیک&amp;zwnj;تر- هستم. لذا آن حضرت صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم آن روز را روزه گرفتند و دستور به روزۀ آن روز دادند. روایت دیگری نیز از ابن عباس رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه نقل شده است که پیامبر اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم فرمودند: &amp;laquo;صوموا یوم عاشورا و خالفوا فیه الیهود، صوموا قبله یوماً و بعده یوما ً&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;nbsp;روز عاشورا روزه بگیرید و با یهودیان مخالفت کنید - به این صورت که - یک روز قبل و یک روز بعد از آن را نیز روزه بگیرید.&amp;nbsp;&amp;nbsp;[مسلم، ش: 1162]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با وجود همه فضایلی که در مورد روزۀ عاشورا در احادیث آمده، متأسفانه در بعضی از کتب، روایتهایی آمده است که با مضامین احادیث پیامبر اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم مغایرت دارد. مثلا علامه کلینی درکتاب خود روایت می&amp;zwnj;کند:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قال جعفر بن عیسی: سألت الرضا علیه&amp;zwnj;السلام عن صوم عاشورا و ما یقول الناس فیه، فقال عن صوم ابن مرجانة تسألنی؟! ذلک یوم صامه الأدعیاء من ال زیاد لمقتل الحسین و هو یوم&amp;nbsp;&amp;nbsp;یتشاءم به ال محمد و یتشاءم به اهل الاسلام. لایصام و لا یتبرک به. و یوم الاثنین یوم نحس قبض الله فیه نبیه، و ما أصیب آل محمد إلا فی یوم الإثنین، فتشاءَمنا به و تبرک به ابن مرجانة ، و تشاءم به آل محمد. فمن صامهما و تبرک بهما لقی الله عزوجل ممسوخ القلب و کان حشره مع الذین سنّوا صومهما و التبرک بهما [اصول الکافی 4/146- الإستبصار2/35- بحار الأنوار45/59]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جعفر بن عیسی می&amp;zwnj;گوید: ازحضرت رضا علیه&amp;zwnj;السلام در مورد روزه عاشورا سئوال کردم. ایشان فرمودند: آیا در مورد روزۀ&amp;nbsp;&amp;nbsp;فرزند مرجانه - عبیدالله بن زیاد - سئوال می&amp;zwnj;کنی؟! این روزی است که خاندان زیاد، به خاطر قتل حضرت حسین روزه می&amp;zwnj;گرفتند، در حالی که این روز، نزد آل محمد و دیگر مسلمانان، روزی نحس بوده که در این روز نه روزه می&amp;zwnj;گیرند و نه آن را مبارک می&amp;zwnj;دانند. روز دوشنبه نیز نحس می&amp;zwnj;باشد، زیرا دراین روز خداوند روح مبارک پیامبرش - حضرت محمد صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم - را قبض نمود، و تمام مصیبتهای آل محمد درروز دوشنبه بوده است. لذا هرکس در این دو روز - عاشورا و دوشنبه - روزه بگیرد و به این دو روز فضیلت قائل باشد، در حالی خداوند متعال را ملاقات می&amp;zwnj;کند که قلبش مسخ شده است و حشر وی با کسانی خواهد بود که روزه و تبرک جستن به این دو روز را سنت قرار داده&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در این روایت ساختگی، چندین مطلب ذکرشده است که با دستورات اسلام و سنت پیامبر صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم مغایرت دارد:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1- روز عاشورا، نحس قرار داده شده است درحالی که همۀ ایام از جانب خداوند حکیم است و شوم قرار دادن آنها صحیح نمی باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2- روز دوشنبه روزی نحس معرفی شده و روزه&amp;zwnj;گیران آن، ممسوخ القلب خوانده شده است، درحالی که درصحیح مسلم حدیثی با این مضمون آمده است: عن ابی قتادة قال: سُئل النبی صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم عن صوم یوم الإثنین . قال صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم ذاک یوم ولدت فیه و یوم بعثت فیه أو أنزل علیّ فیه [مسلم ش: 1977]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حضرت ابو قتاده رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه می&amp;zwnj;فرماید: از پیامبر اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم درمورد روزه روز دوشنبه سوال شد. آن&amp;zwnj;حضرت صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم فرمودند: این روزی است که من در این روز متولّد شده&amp;zwnj;ام و در این روز به پیامبری مبعوث شده&amp;zwnj;ام و یا اینکه دراین روز- قرآن - برمن نازل شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;3- روز دوشنبه درعین حال که روز رحلت آن&amp;zwnj;حضرت صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم می&amp;zwnj;باشد روز ولادت ایشان نیز هست، لذا این روز روزمبارکی نیز می&amp;zwnj;باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;4- روز دوشنبه را به خاطر رحلت پیامبر صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم، نحس دانستن، نوعی اعتراض بر افعال خداوندی می&amp;zwnj;باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عزاداری&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قبل از پرداختن به مسأله عزاداری، در مورد گریه کردن بر میت و اینکه آیا این گریه و زاری نفعی برای میت و ثوابی برای بازماندگان دارد یا نه؟ مختصراً بحث می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اهل&amp;zwnj;سنت معتقدند که گریه و زاری، هیچ نفعی برای میت ندارد.البته در حق شخص گریه کننده باید خاطرنشان کرد که اگر گریه بصورت طبیعی و بی&amp;zwnj;اختیار باشد، نه ثواب دارد و نه گناه. اما اگر گریه ساختگی بوده و واویلا کردن و بر سر و صورت زدن را به همراه داشته باشد، این کار مخالف شریعت بوده و گناه محسوب می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لذا نزد کلیه مذاهب اهل&amp;zwnj;سنت، گریه کردن به هرعنوانی باشد، اجر و ثواب ندارد مگر در یک مورد و آن هم زمانی است که گریه از ترس خدا درهنگام عبادت و طلب آمرزش گناهان باشد. رسول&amp;zwnj;الله صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم درحدیثی می&amp;zwnj;فرمایند: سه چشم در روز قیامت، عذاب نمی بینند 1- چشمی که - با انگیزه بد - به نامحرم نگاه نکند 2- چشمی که در راه خدا نگهبانی دهد 3- چشمی که از ترس خدا، اشک بریزد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما در مورد مصیبت از دست رفتن عزیزان مخصوصاً وفات یا شهادت بزرگان دین و پیشوایان مذهب، باید توجه داشته باشیم که اشک ریختن و گریه کردن در فراق آنها، هرگز نمی&amp;zwnj;تواند بیانگر احترام گذاشتن و بزرگداشت آنان باشد. بلکه قدردانی از زحمات و مجاهدتهای آنان به سه صورت امکان پذیر است:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1- گفتار و کردار آنان در مراحل فردی و اجتماعی مورد پیروی قرار بگیرد&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2- نام آنها به نیکی یاد شود&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;3- از خداوند برای آنان رفع درجات مسألت شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در مورد شهادت امام حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه نیز این موارد باید رعایت شود. زیرا قدردانی از خون امام حسین و شهدای اسلام را هرگز نمی&amp;zwnj;توان در قالب هیأتهای عزاداری - آنهم سالی یک بار- به وسیله گریه ونوحه به جای آورد، زیرا امام حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه نه به گریه ما نیازی دارد ونه هدف از قیام ایشان این بوده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عزاداری وتاریخچه آن&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در ماه محرم، مخصوصا در روز عاشوار، گروهی از مسلمانان به مناسبت سالگرد شهادت حضرت حسین، هر سال مراسم سوگواری و مجالس عزاداری برپا می&amp;zwnj;کنند و به روضه&amp;zwnj;خوانی، نوحه&amp;zwnj;سرائی، سینه&amp;zwnj;زنی و زنجیرزنی می&amp;zwnj;پردازند. آیا این اعمال واقعاً ثبوت شرعی و دینی دارند؟ و فرهنگ عزاداری به شیوه رایج از چه زمانی شروع شده است؟.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اولاً باید دانست که در اسلام چیزی به نام &amp;quot; سالگرد&amp;quot; وجود ندارد. به طوری که اگر زندگی پیامبر اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم و صحابه و دیگر ائمه دین مورد بررسی قرار گیرد، حتی یک مورد که بیانگر برپایی سالگرد فلان موضوع یا سالگرد وفات یا شهادت فلان شخصیت باشد، یافت نمی&amp;zwnj;شود&amp;nbsp;&amp;nbsp;در حالی که در آن موقع اتفاقات مهمی مانند: ولادت پیامبر صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم، بعثت آن حضرت، وفات آن حضرت و &amp;hellip; رُخ داده بود اما نه پیامبر سالروز ولادت و بعثت خود را جشن گرفتند و نه صحابه کرام، بمناسبت سالگرد وفات رسول&amp;zwnj;الله صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم مراسم عزا و ماتم برپا کردند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;به عنوان مثال هنگامی که حضرت حمزه به شهادت رسید، آن حضرت صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم حدود هفت سال بعد از این واقعه در قید حیات بودند، اما هرگز نامی از سالگرد شهادت حضرت حمزه، به میان نیاوردند. همچنین در مورد واقعه کربلا و شهادت حضرت حسین نیز از هیچ کدام از ائمه دین که بعد از حضرت حسین بوده&amp;zwnj;اند ثابت نیست که برای شهادت حضرت حسین سالگرد گرفته و مراسم عزاداری و سینه زنی برپا کرده باشند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لذا اهل&amp;zwnj;سنت نوحه&amp;zwnj;سرائی، روضه&amp;zwnj;خوانی، سیاه پوشیدن - به عنوان ماتم -&amp;nbsp;&amp;nbsp;زدن برسرو صورت و &amp;hellip; را هنگام مصیبت، جایز نمی&amp;zwnj;دانند. زیرا اینگونه رفتارها منافی با فرهنگ اسلام و مغایر با فلسفه امام حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه می&amp;zwnj;باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اما در مورد تاریخچه آغاز عزاداری محرم، علامه ابن&amp;zwnj;کثیر دمشقی و علامه ذهبی می&amp;zwnj;نویسند:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در سال 352 هـ معز الدولة بن بابویۀ شیعی، مردم بغداد را دستور داد تا لباس سیاه پوشیده، بازار را تعطیل کنند و برای شهادت حضرت حسین بن علی ماتم بگیرند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;ابن&amp;zwnj;کثیر در ادامه می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;لذا بعضی از نویسندگان و مؤرخان، معزالدولة را بنیان&amp;zwnj;گذار عزاداری محرم می&amp;zwnj;دانند. [البدایة و النهایة 11/ 5777- العبر 2/89]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در دوران فاطمیان نیز این روز به عنوان روز ماتم تلقی می&amp;zwnj;شد. حاکم و دیگر اراکین حکومتی، این روز را در سوگواری و عزا سپری می&amp;zwnj;کردند. بازار تعطیل می&amp;zwnj;شد و شعراء و مداحان به نوحه&amp;zwnj;سرائی و مداحی و بیان حکایاتی در وصف اهل&amp;zwnj;بیت می&amp;zwnj;پرداختند. [الخطط للمقیریزی 1/431]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بنابراین بعد از تحقیق و تفحص به این نتیجه می&amp;zwnj;رسیم که عزاداری و برگزاری مراسم ماتم، هیچگونه ثبوتی از خیرالقرون (قرن صحابه، تابعین و تبع&amp;zwnj;تابعین) ندارد و بدعت محسوب می&amp;zwnj;شود. اما با وجود این، بعضی از بزرگان اهل&amp;zwnj;تشیع بدون هیچ دلیلی از قرآن و حدیث، آن را جنبه شرعی داده و اجر و ثواب اخروی را بر آن مترتب می&amp;zwnj;کنند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;محمد حسین نائینی که از علمای اهل&amp;zwnj;تشیع می&amp;zwnj;باشد، در جواب سوالی که از وی در مورد هیأتهای عزاداری شده است، می&amp;zwnj;گوید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(1) در جواز خروج هیأتهای عزاداری در دهۀ محرم، هیچ شبهه&amp;zwnj;ای وجود ندارد، بلکه بهترین روش برای تبلیغ دعوت حسینی می&amp;zwnj;باشد. (2) بر سرو صورت زدن و با زنجیر بر شانه و پشت خود زدن هیچ اشکالی ندارد. [مقتل الحسین و فتاوی العلماء الأعلام فی شجیع الشعائر]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین، محمد باقر مجلسی در بحار الانوار، بابی تحت عنوان &amp;quot;باب ثواب البکاء علی المصیبة و &amp;hellip;&amp;quot; دارد که در این باب روایتی را از ابوعبدالله نقل می&amp;zwnj;کند:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کل الجزع و البکاء مکروه سوی الجزع و البکاء علی الحسین. هر ناله و گریه&amp;zwnj;ای مکروه است، مگر گریه و ناله برای حسین. [بحار الأنوار44&amp;zwnj;&amp;zwnj;\280]&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به راستی آیا این جمله، جمله شرعی و معقولانه&amp;zwnj;ای است؟؟! اگر ناله و گریه در وقت مصیبت کار جایز و پسندیده&amp;zwnj;ای می&amp;zwnj;بود، قبل ازهمه باید برای وفات رسول اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم انجام می&amp;zwnj;گرفت. زیرا ایشان سرور و سردار انبیا هستند و وفات ایشان بزرگترین مصیبت برای جهانیان می&amp;zwnj;باشد، مگرغیر از این است که اگرحضرت علی و امام حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهما به این مقام والا و عظیم رسیده و به رضای الهی و نعمتهای جنت نایل شدند، در نتیجۀ محبت، هم&amp;zwnj;رکابی و عمل بر دین و دستورات همان پیامبر اعظم بوده است؟؟! راست گفته&amp;zwnj;اند که: &amp;quot; نقل را، عقل به کار آید&amp;quot;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لذا اگر با دیده عقل و انصاف نگریسته شود، بر همگان واضح می&amp;zwnj;گردد که این افعال هیچ ثبوتی در اسلام و تعالیم نبوی نداشته و شخصیت والای حضرت حسین علیه&amp;zwnj;السلام ازاینگونه افعال بیزار است. زیرا اسلامی که جدّ حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه حامل آن بوده و حضرت حسین نیز به خاطر آن قیام کرده و جان خود را قربان نموده است، به هیچ وجه این افعال را جایز نمی&amp;zwnj;داند. جدّ حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه - حضرت محمد صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم - می&amp;zwnj;فرمایند:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;لیس منا من ضرب الخدود و شق الجیوب و دعا بدعوی الجاهلیة&amp;raquo;. [بخاری، ش: 1294]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کسی که بر صورت خود بزند و گریبان پاره کند و جملات جاهلی بر زبان بیاورد از - امت- من نیست. درجایی دیگر می&amp;zwnj;فرمایند:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;النائحة اذا لم تتب قبل موتها، فقام یوم القیامة و علیها سربال من قطران و درع من جرب&amp;raquo; [مسلم، ش: 934]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نوحه&amp;zwnj;کننده اگر قبل از مرگش توبه نکند روز قیامت در حالی حشر می&amp;zwnj;شود که بر بدنش شلواری از قیر و پیراهنی از جرب (نوعی بیماری پوستی) پوشانده می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;مذمت نوحه&amp;zwnj;سرائی در کتب اهل&amp;zwnj;تشیع&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با وجود اینکه درکتب اهل&amp;zwnj;تشیع، روایات ساختگی در مورد فضیلت نوحه و نوحه&amp;zwnj;سرائی آمده است، اما در منابع قدیم و جدید آنان، روایاتی نیز از پیامبر صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;و ائمه منقول است که افعالی مانند نوحه، سینه&amp;zwnj;زنی و از این قبیل، مورد مذمت و نکوهش قرارداده شده است، که ذیلاً به چند مورد اشاره می&amp;zwnj;شود:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1- محمد بن علی بن حسین بن بابویه قمی، معروف به &amp;quot; شیخ صدوق&amp;quot; در کتاب &amp;quot; من لایحضره الفقیه 4/271&amp;quot; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و من الفاظ الرسول صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم: &amp;laquo;النیاحة من عمل الجاهلیة&amp;raquo; و از فرمایشات پیامبر صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم است که نوحه&amp;zwnj;سرائی از اعمال دوران جاهلیت است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین محمد باقر مجلسی، این حدیث را با الفاظ &amp;laquo;النیاحة عمل الشیطان&amp;raquo; نوحه کردن کار شیطان است آورده است. [ بحار الأنوار 82/103]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2- رسول اکرم&amp;nbsp;&amp;nbsp;صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم هنگام وفات به حضرت فاطمه رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنها فرمودند: &amp;laquo;ای فاطمه! وقتی من وفات کردم، بر سر و صورت خود نزن، واویلا و نوحه&amp;zwnj;سرائی نکن و نوحه&amp;zwnj;گران رادعوت نکن&amp;raquo; [فروع کافی2\214، جلاء العیون مجلسی 1\&amp;zwnj;92]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;3- روایتی ازحضرت علی رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه منقول است که می&amp;zwnj;فرمایند: ثلاث من اعمال الجاهلیة، لا یزال الناس فیها حتی تقوم الساعة، الإستسقاء بالنجوم، والطعن فی الأنساب والنیاحة علی الموتی [بحارالأنوار 82&amp;zwnj;\101]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سه عمل ازاعمال جاهلیت می&amp;zwnj;باشند که مردم همواره تا روز قیامت به آنها دچار&amp;zwnj;اند ا- طلب باران بوسیله ستارگان 2- بدگویی گذشتگان&amp;nbsp;&amp;nbsp;3- نوحه&amp;zwnj;سرائی برمردگان.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;4- کتاب اصول کافی نزد اهل&amp;zwnj;تشیع چنان کتاب معتمدی است که - به گفته خودشان- امام مهدی در بارۀ آن گفته است: هذا کاف لشیعتنا. این کتاب برای شیعیان ما کافی است! در این کتاب روایتی از امام جعفر صادق نقل شده که فرمودند: مصیبت به سوی بندۀ مومن می&amp;zwnj;آید و او- بنده مومن- درمقابل آن مصیبت، صبر می&amp;zwnj;کند و مصیبت به سوی کافر هم می&amp;zwnj;آید اما او - کافر- جزع (بی صبری) می&amp;zwnj;کند. [اصول کافی باب الصبر، ص 87]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;درمورد معنی &amp;quot;جَزَع&amp;quot; از امام جعفر صادق سؤال شد، ایشان فرمودند: شدیدترین نوع جزع این است که با صدای بلند واویلا کرده و بر سر و صورت بزند و موی سر را بکند. هرکس مجالس ماتم برپا کند، وی صبر را ترک کرده است. [فروع کافی، کتاب الجنائز 1&amp;zwnj;223]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;5- شیخ مفید در کتاب &amp;quot;الإرشاد 2&amp;zwnj;\97&amp;quot; می&amp;zwnj;نویسد:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام حسین به خواهرش زینب فرمود: ای خواهر! من تو را سوگند می&amp;zwnj;دهم و تو به سوگند من وفادار باش که&amp;nbsp;&amp;nbsp;اگر کشته شدم به خاطر من، گریبان چاک مکن، چهره را مخراش، و درمرگ من واویلا مگو.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مهمترا زهمۀ این احادیث و روایات اینکه، خداوند متعال در سوره بقره می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;و لنبلونکم بشیء من الخوف و الجوع ونقص من الاموال والانفس والثمرات وبشر الصابرین الذین إذا أصابتهم مصیبة قالوا إنا لله و إنا إلیه راجعون اولئک علیهم صلوات من ربهم ورحمة واولئک هم المهتدون&amp;raquo;.[بقره: 155-157]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ترجمه: و شما را آزمایش می&amp;zwnj;کنیم با چیزی از قبیل ترس و گرسنگی و نقصان در مال و جان و محصولات و بشارت بده صبرکنندگان را. آنانی که اگرمصیبتی به آنها برسد می&amp;zwnj;گویند: ما از خدائیم و به سوی او برمی گردیم. همین گروه&amp;zwnj;اند که برآنها درود و رحمت از جانب پروردگارشان نازل می&amp;zwnj;شود و همین گروه&amp;zwnj;اند که هدایت یافته هستند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این آیه بطور صریح و آشکار، وظیفه مومنان را در قبال آزمایشات الهی و مصیبتها مخصوصاً مصیبت از دست دادن عزیزان، بیان می&amp;zwnj;فرماید، واضح است که بی&amp;zwnj;صبری و بر سر و سینه زدن، خلاف راه صابران است، لذا در مقابل صبر و تعقل و دعا، جزع و فزع و برپایی مراسم عزاداری و نوحه&amp;zwnj;سرائی می&amp;zwnj;باشد که شریعت اسلام به هیچ یک از این موارد توصیه نکرده است بلکه بی&amp;zwnj;صبری و ماتم گرفتن را خلاف مسیر انسانهای هدایت یافته می&amp;zwnj;داند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;برداشت ما از حادثه کربلا&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;متأسفانه امروزه نگاههای عرفی و عام به حادثه کربلا یک نگاه احساساتی بوده و صرفاً آن را یک واقعه غم&amp;zwnj;انگیز می&amp;zwnj;دانند، درحالی که اگر کمی عمیقانه و عالمانه به واقعه کربلا بنگریم، متوجه می&amp;zwnj;شویم که پشت پردۀ این واقعه اسراری بزرگ و آموزنده نهفته است. حادثه کربلا در کنار همۀ صحنه&amp;zwnj;های غمناک و خونین خود، مجموعه ای از واقعات با شکوه و عظیم، در تاریخ اسلام و حتی درتاریخ بشریت را در خود جای داده است. امام حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه در آن صحرای گرم و با تحمل سختیها، برای نسلهای بعد از خود پیام عزت، آزادی و مردانگی را به جای گذاشت و خودش و یارانش مورد اکرام و اعزاز خداوندی قرار گرفته و مدال پرافتخار شهادت درراه خدا، از جانب پروردگار متعال برگردنشان آویخته شد. چنانکه علامه ابن تیمیه می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فلما قتل الحسین بن علی رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهما یوم عاشوراء قتلته الطائفة الظالمة الباغیة، أکرم الله تعالی الحسین بالشهادة کما أکرم بها من أکرم من أهل بیته. أکرم بها حمزة و جعفراًٌ و اباه علیاً و غیرهم. و کانت شهادته مما رفع الله بها منزلته و أعلی درجته فإنه هو و أخوه الحسن سیدا شباب أهل الجنة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هنگامی که حضرت حسین بن علی رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهما در روز عاشورا توسط گروه ظالم و طغیان&amp;zwnj;گر به قتل رسید، خداوند متعال وی را با نعمت شهادت مورد اکرام و اعزاز قرار داد، همانطورکه اهل بیت ایشان، حضرت حمزه، حضرت جعفر و پدرش علی رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهم&amp;zwnj;اجمعین را مورد اکرام خویش قرار داد و شهادت وی - حضرت حسین - باعث بلندی مرتبه و رفع درجات او شد. به راستی که او و برادرش سردار جوانان اهل بهشت&amp;zwnj;اند. [الفتاوی: 5\162]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اهل&amp;zwnj;سنت ضمن اینکه واقعه کربلا را واقعه&amp;zwnj;ای غم&amp;zwnj;انگیز در تاریخ اسلام دانسته و از آن به عنوان مصیبتی جبران ناپذیر یاد می&amp;zwnj;کند، جنبه ظلم&amp;zwnj;ستیزی و حق&amp;zwnj;طلبی و عدالت&amp;zwnj;خواهی امام حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه را مدنظر قرار داده و به این واقعه به عنوان واقعه&amp;zwnj;ای حماسی می&amp;zwnj;نگرند و در پرتوی قیام ایشان که برگرفته شده از تعالیم زیبای اسلام می&amp;zwnj;باشد، به زندگی خود معنا بخشیده و درس شهامت و آزادمردی را می&amp;zwnj;آموزند. چنانکه استاد مرتضی مطهری از علمای روشن فکر اهل&amp;zwnj;تشیع نیز به اهمیت این دیدگاه اشاره کرده و می&amp;zwnj;گوید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آنانی که تنها به صفحۀ جنایت&amp;zwnj;آمیز عاشورا می&amp;zwnj;نگرند، فقط مرثیه&amp;zwnj;خوان و نوحه&amp;zwnj;سرایند، اما آنانی که به صفحۀ نورانی و حماسی عاشوار نگاه می&amp;zwnj;کنند در مسیر حق&amp;zwnj;پرستی و انسانی، شور و حماسه می&amp;zwnj;آفرینند. [حماسی&amp;zwnj; حسینی ص213]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لذا اهل&amp;zwnj;سنت بنابر اصول اعتقادی خویش، برای هیچ یک از شخصیتها و پیشوایان دینی سالگرد ولادت، وفات و شهادت نگرفته و مراسم سوگواری برپا نمی&amp;zwnj;کنند، بلکه سعی بر پیاده کردن زندگی عملی پیشوایان اسلامی در سطح زندگی فردی و اجتماعی امت دارند. و این عقیده، هرگز به معنای محبت نداشتن با امام حسین و اهل بیت پیامبر اکرم صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم نمی&amp;zwnj;باشد. اگراهل&amp;zwnj;سنت در سالروز شهادت حضرت عمر و حضرت عثمان رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهما مراسم عزاداری برگزار می&amp;zwnj;کردند و در شهادت حضرت علی و حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهما عزاداری نمی&amp;zwnj;کردند، جای اعتراض برای معترضین باقی بود، اما با این توضیح دیگر جای هیچ اعتراضی نیست و حقیقت این است که در فرهنگ اهل&amp;zwnj;سنت چیزی بنام سالگرد و عزاداری وجود ندارد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مفسر و مورخ معروف، علامه ابن&amp;zwnj;کثیر دمشقی می&amp;zwnj;گوید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به جا و شایسته است که مسلمانان برای این فاجعه - کربلا- ناراحت باشند، اما حزن و &amp;zwnj;اندوه که اغلب آمیخته با ریا و تظاهر گردد، درست نمی&amp;zwnj;باشد و به همین خاطر برای سایر پیشوایان دینی نیز ماتم گرفته نمیشود. لذا در بزرگداشت شهادت حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه نیز مناسب است مطابق آنچه علی بن حسین از پدرش روایت می&amp;zwnj;کند عمل نمائیم؛ ایشان از امام حسین روایت می&amp;zwnj;کند که فرمودند: از رسول خدا صلی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;علیه&amp;zwnj;وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;شنیدم که می&amp;zwnj;فرمود: &amp;laquo;هیچ مسلمانی نیست که مصیبتی به وی رسیده باشد، هرچند که مربوط به گذشته باشد، و او با گفتن استرجاع ( إنا لله و إنا إلیه راجعون) از آن مصیبت یاد کند مگر اینکه خداوند همان ثوابی را که به هنگام مصیبت و صبر او به وی عطاء کرده است، دوباره به او عنایت می&amp;zwnj;فرماید. [البدایة و النهایة 8\191]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار دادن به روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قاتلان حسين رضي الله عنه را بشناسيد&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
حقيقت عاشورا&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جوابهای نورانی در مورد عاشورای حسينی&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;چه کساني حسين رضي الله عنه را به شهادت رساندند؟&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
روز عاشورا را چگونه بگذرانيم؟&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
شيعه و حسينيه ها&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
نگرشی نو به تاريخ صدر اسلام&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
توسل - وساطت بين الله و بندگان&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
زيارت از ديدگاه ائمه&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;زيارت قبور بين حقيقت و خرافات&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;احكام ميت و آداب سوگوارى&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
يزيد ابن معاويه&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ماهنامه الکترونیک سایت نواراسلام شماره 4 اول محرم1430هـ&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره&amp;nbsp;16 اول محرم 1431هـ&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره&amp;nbsp;28 اول محرم 1432هـ&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره&amp;nbsp;40 اول محرم 1433هـ&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>روايتى از انقلاب عاشورا و شهادت حسين رضى الله عنه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/347</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#FF0000;&quot;&gt;&lt;strong&gt;روايتى&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;از انقلاب&amp;nbsp;عاشورا&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;و شهادت حسين&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;رضى الله&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;عنه&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt; mso-margin-top-alt: auto; mso-margin-bottom-alt: auto&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;حادثه كربلا از وقايع مهم اسلام است كه مقاصد و مفاهيم والا و پر ارزشی در بر دارد. عمق اين تراژدی بقدری بزرگ اســـت كه بـا گذشت چندين قرن، با فرا رسيدن روز عاشورا، خاطره اندوه بار شهادت مظلومانه حسين&amp;nbsp;&amp;nbsp;رضی الله عنه و ياران باوفايـــش در اذهـان ميليونها انسان مومن وآزاده تداعی می&amp;zwnj;شود و موج عواطف و احساسات انسانی و ايمانی در سينه هايشان به تلاطم می&amp;zwnj;افتد از ايـن رو، نبايد داستان حادثه كربلا و شهادت حضرت حسين&amp;nbsp;رضی الله عنه را مساله ساده ای تصور كرد و به سادگی از كنار آن گذشت زيرا داستان كربلا&amp;nbsp;است كه برای الله قيام می&amp;zwnj;كند و انسانيت را به نهضتی فـرا می&amp;zwnj;خوانـد كه اساس آن آزادی، عدالــت و نهضت فرزند رسول الله صلی الله عليه وسلم او می&amp;zwnj;خواهـد تا مردم از ظلم و جور حاكمان زمان &amp;laquo;رهايی يابند و عدل و قسط و برادری و برابری در همه جـا گسترش يابـد شرافت و برای تحقق اين آرمان والا و الهی &amp;laquo;باعشق ايمان و باكمال شجاعت و شهامت قدم بر می&amp;zwnj;دارد. و در نهايت با شهادت وجود با ارزش خويش به همگان درس آزادگی و عزت می&amp;zwnj;آموزد. لذا بجاست كه در سال عزت و ا فتخار حسينی و به مناسبت سالروز شهادت آن بزرگ مرد تاريخ، اين حركت انقلابی و تاريخی مورد مطالعه خوانندگان گرامی قرار گيرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#FF0000;&quot;&gt;&lt;strong&gt;نام و نسب&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ايشان ابو عبدالله، حسين بن علی بن ابی طالب، &amp;nbsp;فرزند دوم علی بن ابی طالب&amp;nbsp; و فاطمه زهرا بنت رسول الله است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حضرت حسين لقبهای متعددی دارند كه برخی عبارتند از: سيد، فی، ولی، مبارك، سبط، شهيد كربلا (1) برخی حسين را سيدالشهداء نيز لقب داده اند&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;؛ و اين لقب برای حضرت حسين كاملا بجاست زيرا رسول اكــرم &amp;laquo;سيدالشهدا حمزه بن عبدالمطلب، و رجل قام الی امام جائر فامره ونهاه فقتله&amp;raquo;(2) سرور شهيدان حمزه بن عبدالمطلب است و مردی كه در مقابل حاكم ظالم قيام می&amp;zwnj;كند واو را امر به معروف و نهی از منكر كند و به دست او كشته شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;color:#FF0000;&quot;&gt;&lt;strong&gt;ولادت&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;روز&amp;nbsp;ولادت حسين رضی الله عنه در پنجم شعبان سال چهارم هجری در مدينه منوره به دنيا آمد، رسول اكرم&amp;nbsp;صلی الله عليه وسلم بی نهايت خوشحال گرديد و شادمانه به ديدار فرزندزاده خود شتافت، كام او را با آب دهان خويش متبرك ساخته و در حق وی دعای خير نمود آنگاه پيامبر صلی الله عليه وسلم فرمود:&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;پسرم را چه نام نهاده ايد؟ علی رضی الله عنه در جواب پيامبر صلی الله عليه وسلم گفت: او را &amp;laquo;حرب&amp;raquo; جـنـگـاور نامـيـده ام؛ پيامبر تبسم زد و فرمود: نام او &amp;laquo;حسين&amp;raquo; است&lt;/span&gt;&amp;nbsp;(3) در روز هفتم ولادت حضرت حسين رضی الله عنه گوسندی عقيقه كرد و فرمود: موی سرش را بچينند و هم وزن آن نقره صدقه دهند.(4)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حضرت حسن و حسين در دوران كودكی خود، همواره مورد عنايت و لطف بيش از حد پيامبر صلی الله عليه وسلم و آن دو را فرزندان خود ناميدند و هرگاه نزد دخترشان فاطمه (رضی الله عنها) می&amp;zwnj;آمدند، می&amp;zwnj;فرمودند:&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;فرزندانم را به نزد من بيـاوريـد؛ &lt;/span&gt;گـاهی اوقــات آن حـضرت می&amp;zwnj;فرمود: &amp;laquo;هما ريحانتای من الدنيا&amp;raquo;(5) ؛&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;&amp;nbsp;آن دو، دوگل خوشبوی من در دنيا هستند.&lt;/span&gt;&amp;laquo;الحسن والحسين سيداشباب اهـل الجنه&amp;raquo;(6)&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;حسن و حسين، سيد و سرور جوانان بهشتی اند. &lt;/span&gt;يعلی بن مره می&amp;zwnj;گويند: روزی حسين رضی الله عنه در كوچه بـازی می&amp;zwnj;كـرد، رسـول اكرم صلی الله عليه وسلم دستهای مباركش را دراز كرد. حسين&amp;nbsp;رضی الله عنه به اين سو وآن سو می&amp;zwnj;رفت، پيامبر صلی الله عليه وسلم او راخندانـد و بـغـل گرفت، يك دست را زير ذقن و دست ديگرشان را بالای سر حسين قرار دادند و فرمودند :((حسين منی وأنا من حسين، أحب الله من أحب حسينا))&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;حسين از من است ومن از حسين ام، الله&amp;nbsp;&amp;nbsp;دوست بدارد كسی را كه حسين را دوست می&amp;zwnj;دارد.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جابر بن عبدالله روايت می&amp;zwnj;كندكه رسول اكرم صلی الله عليه وسلم فرمودند:((من سره أن ينظر إلی رجل من أهل الجنه فلينظر إلی الحسين بن علي))(7)&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;هر كس دوست دارد به مردی از اهل بهشت بنگرد، به حسين بن علی نگاه كند.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در روايات متعددی آمده است كه رسول اكرم صلی الله عليه وسلم حسين را بر دوش خود سوار می&amp;zwnj;كرد و او را به سينه خود می&amp;zwnj;چسـپاند و دهان و گلوی وی را می&amp;zwnj;بوسيد كه همه اين روايات، دلالت بر اين فضائل و مناقب والای ايشان دارد؛ علامه محدث بزرگوار، شـاه عبدالحق دهلوی رحمه الله می&amp;zwnj;فرمايد: ((به حسب شرف ذات و طهارت طينت و پاكی جوهر، هيچ كس به فاطمه، حسن و حسين و ديگر اهل بيت نرسد)). (8)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#FF0000;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بزرگداشت حضرت حسين رضی الله عنه در ميان صحابه پيامبر&lt;/strong&gt;صلی الله علیه وسلم&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خلفای راشدين صحابه گرامی پيامبر صلی الله&amp;nbsp;عليه وسلم&amp;nbsp;حسن و حسين رضی الله عنهما را بی نهايت دوست می&amp;zwnj;داشتند و همواره آنان را مـــورد بزرگداشت و احترام قرار ميدادند: ح&lt;span style=&quot;color:#0000FF;&quot;&gt;ضرت ابوبكر رضی الله عنه در مورد بزرگداشت و احترام به اهل بيت می&amp;zwnj;فرمايد :&amp;laquo;ارقـــبوا محمدا فی اهـــــــل بيت&amp;raquo;(9)؛&amp;nbsp;حرمت پيامبر صلی الله عليه وسلم را در مورد احترام به اهل بيت ايشان، مراعات كنيد. عقبه بن حارث می&amp;zwnj;گويد: روزی ابوبـــــــكر را ديدم كه&amp;nbsp;حضرت حسن را بلند كرده و می&amp;zwnj;گويد: فدايت باد پد</description>
</item><item>
<title>محرم شناسنامۀ اسلام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/346</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جنگ حق و باطل نبردی است ازلی که ناقوس آن در روز خلقت دمیده شده تا بروز پیروزی حق بر باطل در محشر ادامه خواهد داشت.&lt;br /&gt;
از جمله نبردهایی که تیغ بران حق کمر باطل را در آن شکست معرکه ی موسی پیامبر بود با امپراطوری فرعون و چکاچک شمشیرهای فرعونیان!&lt;br /&gt;
در این ماه ـ و دقیقا در دهم عاشورای این ماه ـ بود که رمز ایمان و اسلام موسای پیامبر؛ قوم ستمدیده و مظلوم بنی اسرائیل را از زیر پنجه های ظلم و ستم فرعونیان بیرون کشیده بر ساحل پر موج دریا قرار گرفت.&lt;br /&gt;
اینسو دریای خروشان است و نهنگهای گرسنه و آنسو اسبان فرعونیان که چار نعل می تازند و شمشیرهای برانی که در جهش آفتاب سوزان در کنار رعد و غرش سربازان مست چون برق در آسمان می جهند..&lt;br /&gt;
لحظاتی است بسیار هراسناک که عقل بشر در آن از کار می افتد. موسی هم ستمدیدگان را بوعده نجات از خانه و کاشانهایشان بیرون کشیده تا در اینجا با تیغ فرعون چون گوسفند سر بریده شوند!...&lt;br /&gt;
این است قدرت و توان یک مؤمن کوشا... که باید در ره حق بکوشد و از هیچ نهراسد و از خود هیچ کوتاهی نشان ندهد پس از آنست که آسمان ادامه ماجرا را در دست می گیرد. اینجاست که معجزه سخن می گوید!..&lt;br /&gt;
هرگاه عقل بشر در پرتو ایمان صادق در رکاب نبوت بپا خیزد، و جز اخلاص و ایمان هیچ نکارد معجزه دست در دستان او خواهد نهاد...&lt;br /&gt;
آری..&lt;br /&gt;
عصای معجزه آسای موسی بفرمان خدای موسی به دریا زده می شود و دریا از وسط شكافته می گردد و موسی و پیروانش بر خاک خشک در کوچه ای که دو دیوار آن را موجهای خروشان آب مستانه بالا می زنند بدانسوی دریا بحرکت در می آید...&lt;br /&gt;
و لشکریان نادان فرعون نیز از پشت خود را طعمه ی این معجزه می کنند...&lt;br /&gt;
موسی و یاران را به ساحل رسیدن همان و دریا به حال خود خزیدن همان...&lt;br /&gt;
در یک آن دو دیواره موجهای خروشان همدگر را به آغوش می کشند و فرعون و فرعونیان را تا ابد از صحنه آفرینش می ربایند...&lt;br /&gt;
این پیروزی بزرگ حق بر باطل در فراز تاریخ افتخاری است نمونه که همواره مومنان آنرا جشن می گرفتند. بنی اسراییل تا روزی که پرتوی از حق در آنها جریان داشت دهم محرم را روزه می گرفتند. و چون پیامبر اسلام از این خبر مطلع شدند فرمودند: ما به موسی اولاتریم از یهودیان ... و از آن روز امر فرمودند: مسلمانان روز عاشورا و تاسوعا را به پاس پیروزی حق در کالبد موسی بر فرعون رمز باطل روزه بگیرند. این روزه در حقیقت؛&lt;br /&gt;
اولا: سپاس مومنان است از پروردگار یکتایشان که حق را بر باطل؛ موسی را بر فرعون؛ و یا اسلام را بر کفر پیروزی بخشید.&lt;br /&gt;
و دوما: یادبودی است از آن جشنواره بزرگ ایمان سترگ مومنان، و همدلی است با آن صادقان راستین. و تجدید عهد و میثاق و پیمان است با حق که ما همیشه و همواره با تو خواهیم بود و جان و مال خود را در راه تو فدا خواهیم نمود...&lt;br /&gt;
این ماه پر شور پر است از صحنه های نبرد حق و باطل..&lt;br /&gt;
از جمله این صحنه های دردآور صحنه شهادت امیر مؤمنان؛ داماد علی مرتضی، یار و دوست و همسنگر رسول خدا، حضرت عمر بن خطاب ـ رضی الله عنه ـ است.&lt;br /&gt;
نام عمر انسان را به یاد آرمانهایی والا از مقابله دندان شكن حق و باطل، از دلیر مرد شجاعت و بی مهابا، از ثبات و استقامت و یکدلی، از وزیری نمونه برای رسالت و خلافت آن، از رهبر و دولتمندی بی مانند، از سیاستمداری سترگ، از محبت و عشق به رسول خدا&amp;nbsp;و خاندان او... و خلاصه دانش آموزی نمونه از دانشکده رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله و صحبه ـ و دست پرورده ای ممتاز از ساختار تربیتی رسول اکرم می اندازد.&lt;br /&gt;
عمر شخصیتی است که تاریخ بشریت با یک دنیا اجلال و احترام در مقابل رادمردی او می ایستد.&lt;br /&gt;
همه بشریت از دوست و دشمن در مقابل مردانگی و شجاعت و ایمان عمر مات و مبهوت و حیران می ایستند و بر مدرسه و استادی که او را تربیت نموده سلام و درود بی پایان می فرستند.&lt;br /&gt;
مگر پشیزی از حاقدان که عمر گلیم برده داری و فرعون منشی را از زیر پایشان بدر کشید، و در یک آن از جاه و جلال کاخهای مجلل و ادعای خدایی پوزه حقیر آنها را به خاک ذلت کشانید و ملت را از بردگی آنان رهایی بخشید و به درگاه بندگی خداوند ـ آفریننده و خالق آسمانها و زمین و هر آنچه در آندوست ـ شرفیاب ساخت.&lt;br /&gt;
عمر آن شخصیتی است که آسمان او را برای گسترش قلمرو دین خدا بر زمین تربیت نمود. رسول خدا پیام آسمانی اسلام را از محضر ملکوتی آسمان به زمین رسانید، پس از او خلیفه و جانشین منتخبه ی دست پروردگان و یاران رسالت ـ ابوبکر صدیق؛ پدر زن پیامبر اکرم و یار غار او ـ در مدت دو سال دین را در شبه جزیره عرب استقرار بخشید و پایه های اسلام در چهار سوی جزیره مستحکم گشتند..&lt;br /&gt;
پس از ابوبکر، عمر مقالید رهبری امت را بدست گرفت و حدود 12 سال پیام&amp;nbsp;اسلام را به جهانیان رسانید. در دوران عمر به گواهی و شهادت دوست و دشمن جهان در سایه عدالت و آزادی و رفاه و آسایش بی مانندی در سایه سیاست و حکومتداری این مرد صادق و زاهد و پارسا و فروتن می زیست...&lt;br /&gt;
در دوران عمر بود که پوزه دو امپراطوری مغرور فارس و روم آنانیکه در ادعای خدایی مست بودند به زمین مالیده شد.&lt;br /&gt;
عمر فاروق رضی الله عنه شخصیتی است که ایران زمین همواره و همیشه بدو افتخار خواهد ورزید. چرا که در زمان او و در سایه رهبریت حکیمانه او ایران از چنگال پست حکومت مجوسیان آتش پرستی که عقل و انسانیت را به ذلت و خواری کشیده بودند نجات یافت و نور اسلام بر این سرزمین درخشیدن گرفت.&lt;br /&gt;
آتش پرستانی که با مکر و حیله و نیرنگ مردم را فریب داده بودند و به بردگی گرفته بودند حقد و کینه ای بس بزرگ را در دل بر عمر گرفتند، و در یک توطئه پست و حقیری این ابر مرد تاریخ بشریت را به شهادت رسانیدند. که اول محرم هر سال هجری یاد بودی است از این نبرد حق و باطل که در آن خون عدالت بر شمشیر خیانت غلبه یافت...&lt;br /&gt;
عمر &amp;nbsp;رضی الله عنه عشق و علاقه و ایمانی خاص به پیامبر و پس از او به خانواده ی او داشت. این عشق و ایمان حضرت علی وزیر و مشیر دست راست عمر را بر آن داشت که دختر خود &amp;quot;ام کلثوم&amp;quot; خواهر حسن و حسین دو گل سر سبد جوانان بهشت، و نوه ی پیامبر اکرم را به عقد ازدواج عمر درآورد. عمر از شدت محبت به خاندان رسالت ام کلثوم را به عنوان آخرین همسر خود برگزید و پس از او هرگز ازدواج نکرد تا نشاید دختر فاطمه زهراء رنجیده خاطر شود که رنجش او رنجش مادر، و رنجش مادر رنجش پدر بزرگ است.&lt;br /&gt;
سلام بر رشادت و اخلاص و مردانگی و محبت عمر به اهل بیت!...&lt;br /&gt;
دشمنان عقل و صداقت، خفاشان ترسوی شبهای تار که عمر را با خنجر ننگ خیانت در نماز فجر به شهادت رسانیدند، این پیروزی بزرگ را بر خود جشن گرفته در &amp;quot;کاشان&amp;quot; برای ابو لؤلؤ آتش پرست قاتل امیر مؤمنان روضه ای بر پا نهادند و او را &amp;quot;بابا شجاع الدین&amp;quot; نامیدند و تا امروز کمر احترام در مقابل خاک نجس این بت خیانت پیشه خم می کنند. و با این کار خود به مسلمانان کاشان ایران و دنیا می گویند: ما بودیم که جگر ابرمرد تاریختان را دریدیم و امیر مؤمنان علی و خاندان او را داغدار کردیم! آنگاه مسلمانان غافل با لبخند حماقت از کنار آن حاقدان آتش پرست خاموش می گذرند!&lt;br /&gt;
یهودیان و آتش پرستان بسی سعی نمودند از مقام پر شکوه تاریخی عمر بکاهند ولی جز آنچه پارس سگ از ابر پربار بارانی می کاهد هیچ بیش نکاستند!...&lt;br /&gt;
عمر؛ عمر ماند و خواهد ماند، و آن سگان هار همچنان پارس می کنند تا بجزای خود رسند!&lt;br /&gt;
سلام بر عمر و سلام بر ثبات و استقامت و مردانگی و عدالت و آزادمنشی او...&lt;br /&gt;
عاشورای این ماه تصویری دیگر از حماسه نبرد حق و باطل بر تاریخ بشریت رسم نمود.&lt;br /&gt;
آری!...&lt;br /&gt;
حماسه پر شور و آه کربلا... حماسه زمینی پلید که جز کرب و بلا هیچ برای تاریخمان به ارمغان نیاورد.. حماسه ی خاکی که با مکیدن خون پسر رسول خدا برای همیشه مهر پلیدی بر پیشانی خود نهاد...&lt;br /&gt;
گل خندان و شاداب جوانان فردوس، سالار شهیدان، نواده رسول اکرم امام حسین چون دید که نظام حکومتداری در اسلام از شورا که دستور قرآن و پیامبر است به نظام پادشاهی کسرا و قیصر کشیده می شود با برخی دیگر از جوانان برومند اسلام شمشیر اعتراض بر کشید و در مقابل این تحریف بزرگ تاریخ اسلام قد علم کرد. همسنگر او عبد الله بن زبیر نواسه ی ابوبکر، پسر اسماء چهره زن فداکار حادثه هجرت نبوی در مکه قیام کرد و خلافتی اسلامی بر پا نمود.&lt;br /&gt;
اما امام حسین به وعده شیعیان کوفه بسوی عراق حرکت نمود، ولی در راه خبر رسید که اهل کوفه بدو خیانت کرده اند، و در کربلا لشکر کوفیان خائن را دید در رکاب شمر رمز خودخواهی و غرور به جنگ با او کمر بسته اند.&lt;br /&gt;
شهید کربلا بر این ایمان بود که حکومت اسلامی بر پایه شورای برتران و عالمان و بزرگان و دانشوران انتخاب می شود؛ نه پیامبر آنرا میراث خاندان خود قرار داد و نه هیچ کس دیگری را چنین اختیاری است. پس نظام اسلام نظام شورا و آزادی و عدالت است نه نظام میراث داری و پادشاهی...&lt;br /&gt;
سالار شهیدان در کربلا این ایده و آرمان خود را با خون خود نگاشت تا جهان دریابد؛ اسلام را نمی توان با زور شمشیر در قفس خواسته ها و آزهای این و آن زندانی نمود. اسلام آرمانی است آزاده؛ سوار بر اسب عقل و منطق و فطرت و خواسته های آزاد مردان عدالت پیشه و پارسا بسوی اهداف و آرمانهای خود چارنعل می تازد، و هیچ کسی نمی تواند آنرا با طناب شهوت خود بدار آویزد.&lt;br /&gt;
پیام حرکت استشهادی سالار شهیدان در کربلا نگاشته شد و تا امروز خاری است در حلقوم پادشاهانی که مهار ملتها را آنروزی که روده ی نافشان بریده می شود در دست می گیرند! و خاری است در گلوی حکام زورگو و جاه طلب و خودخواه و خود رأی و تقلب باز و چپاولگر...&lt;br /&gt;
محرم ماه پر شور و حماس تاریخ ماست، و آن نیز نوروز هر سال هجری ماست. گویا محرم در اول هر سال می آید تا همه این معانی را در ملت اسلامی زنده کند. و در گوشها و قلبهای امت اسلامی بدمد که شما وارثان انقلاب و پیروزی حق هستید. پس از هیچ مهراسید که پیروزی از آن شماست. چه در لباس شهادت عمری و حسینی و یا در لباس پیروزی موسایی...&lt;br /&gt;
و در این سالهای ننگ و خواری و عقب ماندگی محرم امسال با مثالی زنده در خیابانهای ایران، و در فلسطین و افغانستان و عراق وغزه به دیدار امت اسلامی آمده تا به جوانان برومند این ملت در خواب بیاموزد؛ خون شهیدان ما نمادی است دیگر در راستای خون عمر و خون حسین... و شما ای جوانان مسلمان می توانید عصای موسی، و معجزه ی این قرن باشید!...&lt;br /&gt;
به&amp;nbsp;مناسبت ماه محرم کتابخانه عقیده تصمیم گرفت مجموعه ای از کتابهای مرتبط به این ماه مبارک را خدمت شما عزیزان تقدیم نماید تا مسلمانان از حقیقت این ماه&amp;nbsp;&amp;nbsp;و روز عاشورا آگاه شوند همچنین راهی از راه های شیطان كه بعضی از برادران و خواهران ما را به بیراهه برده است مسدود گردد.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار دادن به روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
قاتلان حسين رضي الله عنه را بشناسيد&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
حقيقت عاشورا&lt;br /&gt;
جوابهای نورانی در مورد عاشورای حسينی&lt;br /&gt;
روز عاشورا را چگونه بگذرانيم؟&lt;br /&gt;
شيعه و حسينيه ها&lt;br /&gt;
نگرشی نو به تاريخ صدر اسلام&lt;br /&gt;
توسل - وساطت بين الله و بندگان&lt;br /&gt;
زيارت از ديدگاه ائمه&lt;br /&gt;
زيارت قبور بين حقيقت و خرافات&lt;br /&gt;
احكام ميت و آداب سوگوارى&lt;br /&gt;
يزيد ابن معاويه&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره 4 اول محرم 1430هـ&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره&amp;nbsp;28 اول محرم 1432هـ&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>به مناسبت ماه محرم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/345</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;به مناسبت ماه محرم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;امروز مصائب گوناگوني كه اعم از قحطي، ويراني، كشتار، زلزله، ذلت و غيره گريبانگير مسلمانان است سبب اساسي آن، دوري آنها از اوامر الله جل جلاله و رسولش صلی الله علیه وآله وسلم است، هيچ روزي نيست كه واقعۀ تلخي برای مسلمانان رخ ندهد، ولي بخود نمي آيند و متوجه نميشوند! &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;متأسفانه شيطان توانسته است، سنت را بدعت، و بدعت را سنت به مردم جلوه دهد و تعدادي را بدنبال خود بكشاند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;عاشورا ! روزيكه با روزه گرفتن گناهان يكسال قبل محو مي گردد ولي شيطان با حيله و نيرنگش توانست اينروز را از خط سير اصلي اش منحرف سازد. علاوه بر آن، آنها را مرتكب اعمال ناشايسته و بدعت در دين كند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;از امام صادق و ايشان از پدرش امام باقر عليهما السلام روايت مي كند كه علي عليه السلام فرمود:&amp;zwnj;&amp;laquo;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;در عاشورا روزه بگيريد، نهم و دهم زيرا كه گناه يك سال را مي بخشد&lt;/font&gt;&amp;raquo;. &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 8pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;تهذيب الأحكام 4/299 ، الإستبصار 2/134&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;اما عده ای از مسلمانان كه خود را دوستدار اهل بیت علیهم السلام می دانند و از حقيقت روز عاشورا بي خبرند در این&amp;nbsp;روزها به اعمال خلاف شرع و خلاف فرموده های اهل بیت دست می زنند که سبب نارضایتی الله متعال و نافرمانی رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم واهل بیت ایشان می گردد.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: #0033cc; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;laquo;موضع اهل سنت در خصوص شهادت&amp;nbsp;حسين رضي الله عنه &amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;ابن تيميه رحمه الله عقيده&amp;zwnj;ي اهل&amp;zwnj;سنت را درباره&amp;zwnj;ي شهادت امام حسين رضي الله عنه&amp;nbsp;خلاصه كرده و مي&amp;zwnj;نويسد: &amp;laquo;الله متعال امام حسين را با شهادت اكرام نمود و قاتلان و دستياران و كساني كه به كشتنش راضي بودند را خوار و ذليل گردانيد. واز شهيدان پيش از خود الگوي نيكويي دارد؛ چراكه او و برادرش حسن رضي الله عنه ، سرداران جوانان بهشتند. آن دو در زمان عزت و قدرت اسلام و مسلمانان بزرگ شدند و زندگي كردند لذا هجرت و جهاد نكردند و از اذيت و آزار مشركين مصون بودند؛ بنابراين خداوند آن دو را با شهادت اكرام نمود، تا كرامت و بزرگواريشان كامل شود و درجه و مقامشان رفيع باشد و شهادت حسين رضي الله عنه&amp;nbsp;مصيبت بزرگي است. و الله متعال به ما دستور داده كه در هنگام مصيبت &amp;laquo;&lt;span style=&quot;color: #0033cc&quot;&gt;إِنَّا لِلّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعونَ&lt;/span&gt;&amp;raquo; بگوييم و مي&amp;zwnj;فرمايد:[&lt;span style=&quot;color: #0033cc&quot;&gt;وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ` الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُمْ مُصِيبَةٌ قَالُوا إِنَّا للهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ` أُولَئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَاتٌ مِنْ رَبِّهِمْ وَرَحْمَةٌ وَأُولَئِكَ هُمُ المُهْتَدُونَ&lt;/span&gt;] : (صابران را بشارت بده. آناني كه هرگاه مصيبتي به آنان برسد، گفته&amp;zwnj;اند: ما از خداييم و به خدا باز مي&amp;zwnj;گرديم. بر آنان درود و رحمتي از جانب خداوند است و آنان هدايت يافته گانند). &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;به&amp;nbsp;مناسبت ماه محرم کتابخانه عقیده تصمیم گرفت مجموعه ای از کتابهای مرتبط به این ماه مبارک را خدمت شما عزیزان تقدیم نماید تا مسلمانان از حقیقت این ماه&amp;nbsp; و روز عاشورا آگاه شوند همچنين راهي از راه هاي شيطان كه بعضي از برادران و خواهران ما را به بيراهه برده است مسدود گردد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار دادن به روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/523/&quot;&gt;قاتلان حسين رضي الله عنه را بشناسيد&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/415/&quot;&gt;حقيقت عاشورا&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;
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&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/161/&quot;&gt;زيارت از ديدگاه ائمه&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt; &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/152/&quot;&gt;زيارت قبور بين حقيقت و خرافات&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/488/&quot;&gt;احكام ميت و آداب سوگوارى&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/566/&quot;&gt;يزيد ابن معاويه&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/564/&quot;&gt;ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره 4 اول محرم 1430هـ&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>مئوية الإمام المهدي!!...</title>
<link>http://qalamlib.com/news/344</link>
<description>&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;بسم الله الرحمن الرحيم&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;الحمد لله والصلاة والسلام على رسول الله ومن والاه&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: left; &quot;&gt;&lt;b&gt;الدكتور حسين النجفي&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot; style=&quot;text-align: left; &quot;&gt;أستاذ الفلسفة ومقارنة الأديان بجامعة طهران سابقاً&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;b&gt;مئوية الإمام المهدي!!...&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;ul&gt;
    &lt;li&gt;&amp;nbsp;السيد أبو الحسن الندوي رحمه الله: &amp;laquo;كان الإمام محمدي مهدي علي رحمه الله من العباقرة الذين ساهموا في صياغة العقل المسلم المعاصر في شبه القارة الهندية. وكتابه &amp;quot;الآيات البينات&amp;quot; شاهد صدق على قوة شخصيته وعقليته العبقرية وبيانه الساحر المبين. وكأنه لسان الفطرة بعث ليزيل شبهات الضلال عن الرعيل الأول صحابة خير البشر صلى الله عليه وسلم بأسلوب متوثب حي يدعو العقول إلى مراجعة صفحات المعتقدات الزائفة التي اختلقها الشيعة الإثنا عشرية&amp;raquo;&lt;sup&gt; (&lt;a name=&quot;_ednref1&quot; title=&quot;&quot; href=&quot;file:///E:/aqeedeh/as%20email%20add%20aqeedeh%2023%20Nov/MEYAWIYAAH.doc#_edn1&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[1]&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;)&lt;/sup&gt;.&lt;/li&gt;
    &lt;li&gt;&amp;nbsp; شمس العلماء الشيخ ذكاء الله الهندي:&amp;nbsp; &amp;laquo; فقد كان الشيخ مهدي علي عالما عبقريا فذا في العلوم الدينية بشتى تخصصاتها ومذاهبها.. وقد ألم بتاريخ المذاهب في العالم إلمامه بمذهبه وقد أثبت صدق الإسلام على سائر الملل والنحل، وكان يسعى دوما أن يزيل شبهات المسلمين ويهدئ عن تعصباتهم الممقوتة. ويقضي على ما تعلقت بهم من الخرافات بسلاح القرآن الكريم والسنة المطهرة...&amp;raquo;.&lt;/li&gt;
    &lt;li&gt;&amp;nbsp; العالم الهندوسي &amp;quot;رام بابو سكيسنة&amp;quot;: &amp;laquo; ... كان السيد المهدي يهدف بكتاباته تغيير مجرى الحياة لدى المسليمن ليعودوا إلى ما كان عليه سلفهم، فلن يصلح الخلف منهم إلا ما أصلح سلفهم، وإنهم لن يخرجوا من الفقر والضياع إلا إذا عادوا إلى مدارج السلف وأخلصوا في شتى مجالات التعليم وأصلحوا أخلاقهم وخاضوا غمار السياسة بروح المؤمن التقي الواثق بربه. ولا شك أن كتاباته تكشف عن رؤيته العلمية الواسعة وحبه للعدل والإنصاف..&amp;raquo;.&lt;/li&gt;
    &lt;li&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;الشيخ محمد فراست الهندي: كتاب &amp;quot;الآيات البينات&amp;quot; للإمام محمد المهدي علي رحمه الله أخذ بيدي وأخرجني من دياجير الظلام إلى نور الإيمان، وأرى أني لو أنفقت حياتي كلها في سبيل نشر هذا الكتاب لم أؤد عشر معشار ما له علي من فضل..&amp;raquo;&lt;sup&gt; (&lt;a name=&quot;_ednref2&quot; title=&quot;&quot; href=&quot;file:///E:/aqeedeh/as%20email%20add%20aqeedeh%2023%20Nov/MEYAWIYAAH.doc#_edn2&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[2]&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;)&lt;/sup&gt;.&lt;/li&gt;
    &lt;li&gt;&amp;nbsp; الشيخ ثناء الله الصديقي: &amp;laquo; الإمام محمد المهدي صفحة ناصعة من تاريخ الإسلام في الهند، وهو وحده يمثل منارا في سماء البحث عن الحقيقة المفقودة للباحثين عنها، وكتابه ثروة علمية هامة لا يستغني عنه طلاب العلم وعامة المثقفين من الشيعة والسنة وطلاب مقارنة الأديان والملل والنحل. فمن يريد أن يجدد دينه ويقوي عقائده لابد أن يرتع في حديقته. ولا أظن أن يقع في ظمأ الشبهات من شرب من منهل هذا الكتاب الصافي&lt;sup&gt;(&lt;a name=&quot;_ednref3&quot; title=&quot;&quot; href=&quot;file:///E:/aqeedeh/as%20email%20add%20aqeedeh%2023%20Nov/MEYAWIYAAH.doc#_edn3&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[3]&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;)&lt;/sup&gt;!&lt;/li&gt;
    &lt;li&gt;&amp;nbsp;الشيخ عبد الرحمن الفاروقي: &amp;laquo; كان آية في الذكاء وقوة الشخصية، له قلم سيال ولسان ذرب في الرد على الكيانات المستهدفة للإسلام، رجح عقيدة أهل السنة والجماعة بعد تضلع في العلم والدراسة والتحقيق ..&amp;raquo;&lt;sup&gt;(&lt;a name=&quot;_ednref4&quot; title=&quot;&quot; href=&quot;file:///E:/aqeedeh/as%20email%20add%20aqeedeh%2023%20Nov/MEYAWIYAAH.doc#_edn4&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[4]&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;)&lt;/sup&gt;.&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;p&gt;من العباقرة من يثير غبار المعارك ويقود الجماهير والعقول ثم لما تخمد نبرات حياته تبدأ دعوته بالذبول والاندثار...&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ومنهم من يبقى روحا متدفقا حيا ينفث في الناس أفكاره ويبقى ذكراه ناصعة في التاريخ ...&lt;/p&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ومنهم من يظل يعيش تحت ركام الصمت، يضع لبنات المجد بجوار البعض، ويخلف من ورائه دعوة من الشموع لتكون معالم في الطريق للأجيال القادمة والتي تليها... عبقرية الصمود وعبقرية الصراخ الصامت!...&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;من هذا النوع كان نواب محسن الملك الشيخ سيد محمد مهدي علي رحمه الله..&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;أجل، فقد كان عبقريا عجيب الإحساس، قوي الإلهام، بليغ الأثر في عصره، كان يشبه تحولا عظيما وقع في صورة من صور التاريخ؛ عبقريا في الإصلاح والسياسة، نحريرا في المذاهب والمناهل والمشارب. وكأنه خلق للتاريخ في أصل طبيعته، ليقف على صفحات تاريخ الهند المعاصر نجما لامعا يكسح مجالا خصبا للدراسات الإسلامية. ولينقل اليوم إلى العالم أجمع فتصبح كلماته حياة تجري في عروق الدارسين من طلاب الحقيقة فيقفوا في ظلالها على المحجة البيضاء التي ترك الرسول صلى الله عليه وسلم أمته عليها، ليلها كنهارها لا يزيغ عنها إلا الهالك الذي أبى!..&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ولد في أسرة شيعية ظلت طوال القرون مضرب الأمثال للالتزام والعلم عام 1253هـ، الموافق لعام 1827م، لكن عبقريته أبت أن تعيش في قالب من الأساطير الجوفاء والنياح الكاذب فكسرت حواجز التقدس الزائف ودرس المذهب الشيعي بعمق فوجده قد بني على أضعف من أوتار العنكبوت. مذهب أسس على تكفير خريجي جامعة الرسول صلى الله عليه وسلم. ثم لما شعر بأن شعرة الوصال بصاحب الرسالة قد انقطع اضطر لصناعة ما يسمى &amp;quot;بالإمام&amp;quot;، ولما وجد الإمام بعيدا عن صحبة النبي صلى الله عليه وسلم جهزه بأدواة الرسالة من &amp;quot;العصمة&amp;quot; و&amp;quot;الوحي&amp;quot;. وكان ولابد للمسرحية من نهاية مكشوفة تكون هي البداية، فصنع الإمام الثاني عشر ـ الإمام المهدي المزعوم ـ وأطاره من أعين الناس وسماه بالإمام الغائب المنتظر. وظل المذهب ينضح مع الأيام حسب أهواء علمائه وسادته يضعون لبنة من &amp;quot;الخمس&amp;quot; الذي يملأ كروشهم ويشبع نهبتهم على جنب لبنة &amp;quot;المتعة&amp;quot; التي تروي شهواتهم بجوار لبنة &amp;quot;التقية&amp;quot; التي توسع دائرة الدجل والنفاق أمامهم على جوار لبنة &amp;quot;الولاية الفقيه&amp;quot; و... وهلم جرا.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فكان لهذا العبقري أن ثار على الجمود يدرس المذاهب والملل والنحل إلى أن هداه الله عز وجل إلى عقيدة التوحيد مذهب عبادة الرحمن دون سواه، مذهب أهل بيت رسول الله وصحابته الكرام، فاعتنق مذهب أهل السنة والجماعة، بين قوم لم يقصروا في إيذاءه واشهروا عنه كلمات الصبأ والضلال و...&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;فكان منه أن وضع كتابه &amp;quot;الآيات البينات&amp;quot;: &amp;laquo; أحمد الله عز وجل وأشكره جزيل الشكر أن من علي بفضل منه ورحمة، ووفقني لدراسة أصول المذهبين ومراجعة ما فيهما بعين الناقد البصير، وبقلب لا يخاف في الله لومة لائم، ولايبتغي إلا مرضاة ربه عز وجل، فوصلت إلى أن مذهب أهل السنة والجماعة يوافق ما جاء في كتاب الله عز وجل وأن مذهب الشيعة الإثنا عشرية أو الإمامية يعارض كلام الله عز وجل ويناقضه. فتركت دين آبائي دون خوف من الأهل والأقارب والخلان والناس أجمعين، مخاطبا مولاي عز وجل: إذا صح منك الود فالكل هين، وكل ما فوق التراب تراب!... وبما أن أحبابي وأقاربي وإخواني وأولادهم لم يزالوا على مذهبهم القديم ويعتبروني قد ضللت، فرأيت أن أكشف لهم عن تلك الأدلة العقلية التي جعلتني أكره مذهبم، وأوضح لهم تلك البراهين النقلية التي جعلتني أعشق مذهب أهل السنة والجماعة وأختاره لي دينا. فوضعت هذا الكتاب ـ الآيات البينات ـ لأوضح حقيقة مذهب أهل السنة والجماعة وصدقه عسى أن يقرأه بني قومي، وعسى أن ينظروا فيه بعين العدل والإنصاف لينكشف لهم زيف عقائدهم فيتركوها ومن ثم يهتدوا&amp;raquo;&lt;sup&gt;(&lt;a name=&quot;_ednref5&quot; title=&quot;&quot; href=&quot;file:///E:/aqeedeh/as%20email%20add%20aqeedeh%2023%20Nov/MEYAWIYAAH.doc#_edn5&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[5]&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;)&lt;/sup&gt;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;وله عدد من المؤلفات غير كتابه هذا، منها: &amp;quot;كتاب المحيط والسوق&amp;quot; و&amp;quot;التقليد والعمل بالحديث&amp;quot; و&amp;quot;ميلاد الشريف&amp;quot; و&amp;quot;القوانين المالية&amp;quot; و&amp;quot;القوانين العسكرية&amp;quot;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;وقد أدى دورا بارزا في نهضة المسلمين سياسيا واقتصاديا واجتماعيا ودعويا أيام الاستعمار الإنجليز. وقد وصفه أشهر شعراء الهند المعاصرين &amp;quot;داغ الدهلوي&amp;quot; بخير أهل زمانه و بمن &amp;quot;أحسن إلى العالم&amp;quot; وبصاحب العقل الكبير والقلب الرءوف.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ترجم الجزء الأول من الأجزاء الأربعة من كتابه &amp;quot;الآيات البينات&amp;quot; إلى الفارسية إمام أهل السنة في الهند الشيخ محمد عبد الشكور اللكنوي&lt;sup&gt;(&lt;a name=&quot;_ednref6&quot; title=&quot;&quot; href=&quot;file:///E:/aqeedeh/as%20email%20add%20aqeedeh%2023%20Nov/MEYAWIYAAH.doc#_edn6&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[6]&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;)&lt;/sup&gt; وكتب عليه تكملة لا تقل أهمية عن الكتاب نفسه.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;عالج الشيخ المهدي في كتابه قضية تكفير الشيعة للصحابة من خلال ما كتبوه في مراجعهم ومصادرهم ورد عليهم بما هو في كتبهم ما رووه على ألسنة أئمتهم. وكذلك عالج قضية زواج سيدنا عمر بن الخطاب من أم كلثوم ابنة سيدنا علي رضي الله عنهم، وقضية &amp;quot;الفدك&amp;quot; من خلال المذهب الشيعي، وبين ما في المذهب من التعارض والزيف والدجل وترك القارئ على المحجة البيضاء لا يزيغ عنها إلا الهالك المتعاند والجاحد الذي حلف أن ينكر الشمس في رابعة النهار!&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;يأتي أهمية الكتاب من أنه يعالج المذهب الشيعي من الداخل، فإن معظم من درس المذهب الشيعي وحاول الرد عليه كان يعتمد في رده على ما ثبت لدى أهل السنة من الحق ويرفضها الشيعة، لكن هذا الكتاب اعتمد على ما لا يستطيع الشيعي إنكاره، فإن أنكره فقد كذب قواعد المذهب وخرج عليها، وإن قبله ضل ضلالا مبينا، فليس أمامه إلا أن يعترف بالحق وينطق بوحدانية الرحمن جل وعلا.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;بعد جهاد طويل وريادة للنهضة الإصلاحية والدعوية انتقل الشيخ مهدي علي في الساعات الأخيرة من يوم الثامن من شهر رمضان المبارك لعام 1325هـ الموافق لـ 16/ اكتوبر/1907م إلى خالقه جل وعلا ليرى تقريرا شاملا من أعماله الإصلاحية ودعوته وجهاده الميمون قد سبقه إلى مولاه.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;ترجم الأستاذ الدكتور مصطفى المحمدي الجزء الأول من كتابه إلى العربية، وعسى أن يكتب الله للكتاب من يكمل تعريبه&lt;sup&gt;(&lt;a name=&quot;_ednref7&quot; title=&quot;&quot; href=&quot;file:///E:/aqeedeh/as%20email%20add%20aqeedeh%2023%20Nov/MEYAWIYAAH.doc#_edn7&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[7]&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;)&lt;/sup&gt;.&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1031/ &quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255); &quot;&gt;رابط جزء الأول من الكتاب:&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1031/&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;http://www.aqeedeh.com/book/1031&lt;/span&gt;/&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;&lt;br clear=&quot;all&quot; /&gt;
&lt;hr align=&quot;right&quot; size=&quot;1&quot; width=&quot;33%&quot; /&gt;
&lt;div id=&quot;edn1&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;(&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[1]&lt;/span&gt;) تصويران متضادان من الإسلام والرعيل الأول، ص/60ـ61.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;edn2&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;(&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[2]&lt;/span&gt;) &amp;nbsp;&amp;quot;الآيات البينات&amp;quot;، ط/ لكنهو، يوبي، 2006م، مؤسسة نشر الحق ـ إداره اشاعت حق ـ.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;edn3&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;(&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[3]&lt;/span&gt;) مقدمة الآيات البينات، ط/ كراتشي، 1979م، دار الإشاعة.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;edn4&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;(&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[4]&lt;/span&gt;) الأمير محسن الملك مؤلف الآيات البينات، للشيخ عبد الرحمن الفاروقي. تحت الطبع.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;edn5&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;(&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[5]&lt;/span&gt;) مقدمة &amp;quot;الآيات البينات&amp;quot; للمؤلف.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;edn6&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;(&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[6]&lt;/span&gt;) &amp;nbsp;هو العلامة الفقيه الهندي الشيخ عبد الشكور الفاروقي اللكنهوي المعروف بإمام أهل السنة وحجة الإسلام في شبه القارة الهندية المتوفي عام 1318هـ. من أبرز مؤلفاته: علم الفقه، وأربعون عقيدة عند الشيعة، والخلفاء الراشدون، والشيعة والقرآن، ومن توجيهات أبي الأئمة. وترجم إلى العربية: أسد الغابة، والتاريخ الطبري، وإزالة الخفاء عن خلافة الخلفاء، وتفسير آيات الإمامة والخلافة، والنفحة العنبرية في سيرة خير البريةو....&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div id=&quot;edn7&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;RTL&quot;&gt;(&lt;span dir=&quot;LTR&quot;&gt;[7]&lt;/span&gt;) ويكفي لأهمية الكتاب أن أقول بأن السلطات الإيرانية تحكم بالإعدام على كل من يجدوا الكتاب عنده! وفي بلد الحرية باكستان الذي لا يمنع أي شيء مهما كان ، أصدرت الحكومة منذ أكثر من عقدين منع الكتاب وتداوله في المكتبات ولم يزل القانون جاري المفعول!..&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>سجل اسمك في قائمة الخالدين!...</title>
<link>http://qalamlib.com/news/343</link>
<description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;سجل اسمك في قائمة الخالدين!...&lt;br type=&quot;_moz&quot; /&gt;
&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;ليس من السهل أن يبلغ المرء مقاما  يترحم الناس عليه إلى يوم الدين!...&lt;br /&gt;
هذا أمر يتطلب إخلاصا وصدقا وجهدا وكفاءة تناطح صدق الصديق، وإخلاص الفاروق، وجهد البخاري، وكفاءة ابن تيمية و....&lt;br /&gt;
أجل! لأن تكون رجل التاريخ، ولأن تسجل اسمك في الخالدين فلابد أن تضحي بالكثير بل وأكثر...&lt;br /&gt;
لكن هناك محطات في التاريخ يستغلها الذكي ليسجل اسمه في الخالدين . ـ وما أقلها! ـ.&lt;br /&gt;
ومن هذه المحطات خدمة بعض الكتب العلمية التي ألفت في غير المكتبة الإسلامية العربية، وهي نجوم خالدة وراء سحب اللغات التي وضعت فيها ـ وما أقلها! ـ.&lt;br /&gt;
من هذه الكتب كتاب جد مهم، له شأن جد خطير، يترك المرء حيرانا.. ويظل الباحث يضرب الأخماس في الأسداس سائلا نفسه؛ كيف تجاهله التاريخ ولم يترجمه إلى العربية؟!.. بل وإلى كل اللغات في العالم!..&lt;br /&gt;
كتاب ظل نبراسا في طريق الهدى قرونا متتالية وأزمنة مديدة...&lt;br /&gt;
من يرزقه الله همة لخدمة هذا الكتاب وإحيائه، ويظل ينفق حياته كلها لخدمة هذا الكنز العظيم، نشرا وإنفاقا وبحثا فيه.. يكون قد ضمن لنفسه الحياة ما بقيت الأرض ومن عليها، وسجل اسمه في الخالدين!..&lt;br /&gt;
فسوف يبقى الكتاب نبراسا يهتدي في ضوئه التائهين، ويكتب لمن خدم الكتاب وأحياه الأجور تلو الأجور.. ولأن يهدي الله بك رجلا واحدا خير لك من حمر النعم.&lt;br /&gt;
والآن:&lt;br /&gt;
اقرأ عن الكتاب وفكر كيف يمكنك أن تخدم نفسك وأن تظفر ببعض الخير أو كله...&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 0, 255); &quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/news/342/&quot;&gt;كتاب لا ككتب!...&lt;br /&gt;
&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/news/342/&quot;&gt;aqeedeh.com/news/342/&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ولا تنسى أن الدال على الخير كفاعله!..&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;&amp;bull;	المقترحات:&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt;وبناءا على ما أشرت إليه أرفع إلى من يهمه الأمر الاقتراحات التالية:&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;1.	طباعة الكتاب في جزأين أو ثلاثة أجزاء: ( بالعربية والفارسية والأردية)&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt;الجزء الأول: يشتمل على الفصل الأول والثاني والتذييل الذي كتبه مترجم الكتاب إلى الفارسية الشيخ محمد عبد الشكور رحمه الله.&lt;br /&gt;
الجزء الثاني: يشتمل على الفصل الثالث والرابع.&lt;br /&gt;
فهذا العمل الضخم سيكون بلا شك ثروة علمية فريدة للأمة الإسلامية وللمكتبات الإسلامية باللغات الثلاثة على مر الدهور وكر الأزمان. وسيكتب التاريخ من يتولى هذا الأمر في صفحة بيضاء ناصعة، وسينفعه بإذن الله يوم لا ينفع مال ولا بنون إلا من أتى الله بقلب سليم. فهذه صدقة جارية قلما يجاريها شيء.&lt;br /&gt;
لا شك أن الكتاب بشكله العلمي الكامل ثروة علمية لا تكاد تبارى في تخصصه إلا أن عامة الناس قلما يتصفحون في الكتب العلمية الكبيرة والمراجع والمصادر، فلابد من أن يخرج من الكتاب بعض الوجبات التي تحلو لعامة الناس وعامة المثقفين، فاقترح في هذا الباب ما يلي:&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;2.	نشر خلاصة الكتاب. ( باللغات الثلاثة)&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt;لو يتم نشر خلاصة هذه المادة العلمية في كتاب لا يزيد عن مائة وخمسين صفحة، فيه شبهات القوم إجمالا والرد عليها، دون الخوض في التفاصيل يؤدي هذه الخلاصة هدفين:&lt;br /&gt;
الأول: إيصال المادة العلمية لقطاع كبير من الطبقة المثقفة من الشيعة، وإثارة بعض الأسئلة في الأذهان، فمن يكتب الله له الهداية يستزيد أو يهتدي إن شاء الله.&lt;br /&gt;
الثاني: تعريف الناس وأهل العلم منهم بالكتاب الأصلى والمادة العلمية السخية التي فيه، وتحريض الباحثين على قراءته.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;3.	نشر مختارات من الكتاب بشكل الأسئلة والأجوبة. ( باللغات الثلاثة)&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt;أتصور أن من أفضل الأساليب لمخاطبة عامة الناس أو الطبقة المثقفة تثقيفا عاديا، أن يتم طرح المادة العلمية في صورة أسئلة وأجوبة. كأن هناك سائلا يطرح سؤالا أو شبهة فيرد عليه العالم في أسلوب شيق جميل دون جرح لمشاعر القوم وعواطفهم.&lt;br /&gt;
في هذا الكتاب الذي لا يتجاوز مائتي صفحة يتم عرض المادة العلمية في الكتاب بأسلوب الأسئلة والأجوبة.&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;4.	الإخراج الصوتي للكتاب: (باللغات الثلاثة)&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt;ويا حبذا لو تم إخراج الكتاب الثالث في شكل أشرطة صوتيه، حيث يطرح السؤال سائل ويجيب عليه العالم بصوت وأسلوب العلماء، ويتم نشره من خلال الأشرطة الصوتية والسي ديهات وعلى مواقع الإنترنت.&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;5.	الإخراج بالصورة: (بالعربية)&lt;br /&gt;
&lt;/strong&gt;ويا حبذا لو تم تمثيل الكتاب بنفس الأسلوب السابق ـ بين سائل يطرح السؤال وشيخ يجيب ـ على شاشات الفضائيات مثل شاشة قناة &amp;quot;المستقلة&amp;quot; أو تلفاز الإمارات أو غيرها، ومن ثم توزيعها بشكل المادة المصورة على سي ديهات والأشرطة المرئية مع الترجمة إلى الفارسية والأردية. ولو مكتوبة تحت الصورة.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب لا ككتب!...</title>
<link>http://qalamlib.com/news/342</link>
<description>&lt;p style=&quot;direction: rtl; text-align: center; &quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large; &quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&amp;bull;	كتاب لا ككتب!...&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;هل سمعت عن كتاب يحكم على حامله بالإعدام شنقا في إيران التي تسمى الإسلامية!!...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;هل سمعت عن كتاب يحرم تناوله وقراءته في باكستان التي تعتبر أكثر البلاد الإسلامية حرية!!...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;و لعلك تستغرب إن عرفت أن الكتاب ليس فيه شيء من المحذورات الشرعية ولا الأخلاقية!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وتزداد استغرابا إن عرفت أن الكتاب لم يظلم إلا لأنه نطق بالحق بين قوم يعتبرون الحق أكبر الجرائم!!!...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;ما هذا الكتاب؟&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;bull;	بطاقة الكتاب:&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;اسم الكتاب: الآيات البينات&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;المؤلف: العالم بالمعقول والمنقول، حافظ دين الله والرسول، سلطان الناظرين، والعالم بالأسرار الخفية والجلية، والخطيب المفوه والكاتب الألمعي سعادة الشيخ نواب محسن الملك سيد محمد مهدي علي. ( هكذا عرفه الناشر الهندي محمد مرتضى بيك) ولد عام 1253هـ ، الموافق لعام 1827م ، وانتقل إلى رحمة الله عز وجل في 8/ رمضان المبارك عام1325هـ الموافق 16/ أكتوبر/ 1907م.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;عدد الفصول: أربعة فصول&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;عدد الصفحات: 725 صفحة ( مكثفة من القطع الكبير)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;التذييل: وعلى الكتابة تكملة مفيدة وضعها الشيخ محمد عبد الشكور عام1364 الهجري في 290 صفحة من القطع الكبير.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;مجموع الصفحات مع التكملة: 1015 صفحة من القطع الكبير.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;bull;	الإطلالة:&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;مما لا يخفى على أحد من الناس فإن مذهب الشيعي هو أكبر المذاهب البدعية في قلب العالم الإسلامي، وبما أن أصحابه امتلكوا مصادر القوة في المنطقة اقتضت ضعف القرار السياسي والبعد عن قواعد الدين السليم لدى الحكام وأصحاب القرار في بلادنا الإسلامية نوعا من الركون أمام الشيعة الذين تستروا وراء أقنعة &amp;quot;التقية&amp;quot;، ومع الأسف جارى الوضع السياسي كثير من علمائنا الأفاضل سامحهم الله وغفر لهم!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;لكن الأيام الأخيرة كشفت شيئا عن حقيقة الشيعة والأيام مازالت حبلى، فالأيام القادمة على ما يبدوا سوف تكون أدهى وأمر إن لم نتدارك الأمر ولم نعالج الواقع بشيء من الحكمة، فالدين الشيعي الآن يعاني من اضطرابات وتدهورات سريعة إن لم نتداركها بالإصلاح من الداخل سنواجه في المستقبل دينا دمويا شرسا وخنجرا مسموما في قلب العالم الإسلامي!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;من أساليب الإصلاح والدعوة أن نخاطب الناس بلغة يفهمونها، فقد كتب علمائنا الأفاضل رحمهم الله كتبا عديدة في معالجة شبهات الشيعة وافتراءاتهم والرد عليها، ولعل من أفضلها ما كتبه الإمام ابن تيمة رحمه الله ـ أي؛ كتاب &amp;quot;منهاج السنة&amp;quot; وقد لخصه الإمام الذهبي وسماه &amp;quot;المنتقى شرح منهاج الاعتدال&amp;quot; وترجمه إلى الفارسية العلامة آية الله أبو الفضل البرقعي رحمة الله عليه ـ وكتاب &amp;quot;إزالة الخفاء عن خلافة الخلفاء&amp;quot; للإمام الشاه ولي الله الدهلوي، وكتاب &amp;quot;التحفة الإثنا عشرية&amp;quot; للإمام عبد العزيز الدهلوي، إلا أن هذه الكتب مع أهميتها تترجم رؤيتنا في معالجة القضايا من منظارنا، وقد لا يرتاح لها كثير من الشيعة إذ يعتبرونها هجوما من خارج المذهب!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;لكن كتاب &amp;quot; الآيات البينات&amp;quot;، وإن كان يشترك مع الكتب السابقة في الهدف إلا أنه يتمتع بأسلوب يتلائم مع العقلية الشيعية أكثر من غيره، وذلك لأن الكتاب وضعه عالم شيعي نحرير يخاطب بني جلدته بأسلوب يفهمونه وقد اعتادوا عليه.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;فالكتاب من الشيعي إلى الشيعي، وقد وضع على قواعد ونصوص يقبلها الشيعة...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وهو فيما أعرفه من الكتب التي وضعها قادة الفكر الإصلاحي الشيعي المعاصر، و يعتبر كتابا فريدا في أسلوبه وقوته العلمية، فالمؤلف رجل عالم في المذهب الشيعي وقد قرأ كتب المذهب وهضمها بشكل رهيب، ولم يهتد إلا عن قناعة وإيمان، ثم هو لم يضع هذا الكتاب إلا عن إيمان راسخ بالفكرة، وعن قلب جريح مكلوم يحترق حزنا على بين جلدته، فجزاه الله عنا وعن الإسلام والمسلمين والصحابة خير ما جازى به عبدا من عباده الصالحين وعالما من علمائه المخلصين!...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;نسأل الله عز وجل أن يجعل هذه الدراسة العلمية سببا لهداية الشيعة إلى الحق المبين وإلى الآيات البينات من كتاب رب السماوات والأرضيين.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;فقد وضع المؤلف الكتاب باللغة الأردية، وقد طبع في الهند وباكستان قديما، لكن مع الأسف لم يعاد طبعه في السنوات الأخيرة وقد نفد الكتاب من السوق منذ عهد طويل، ونسأل الله عز وجل أن يهيئ لهذا الكتاب رجلا رشيد يعيد كتابته على الكامبيوتر ويقوم بطباعته بالأردية من جديد، فإن الحاجة إلى مثله أصبحت ماسة.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;كما أسأله سبحانه وتعالى أن يصطفي من عباده الصالحين رجالا يقومون بترجمة الكتاب إلى العربية والفارسية وغيرها من اللغات، ويقومون بطباعته على أوسع نطاق ممكن وبذلك يكون لهم شأن كبير في حركة الإصلاح الديني والدعوة الإسلامية المعاصرة، وتصحيح العقائد البدعية الهوجاء!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;إذا كان طلاب العلم اليوم يستصعبون الحصول على علم مؤلف هذا الكتاب فليس أقل من أن يترجموه على العديد من الأصعدة العلمية وبالطرق والأساليب المتنوعة ـ التي سأشير إلى شيء منها في مقترحاتي ـ.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;ولا أتصور أن يستغني الفكر الإصلاحي والدعوي بين الشيعة من هذا الكتاب بحال من الأحوال!!!...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وقد وضع الشيخ محمد عبد الشكور على الفصل الأول من الكتاب بعض التعليقات في الهامش، وتكملة مفيدة لا يقل أهميتها عن ما وضعه المؤلف نفسه، وقد شملت هذه التكملة على فصول في غاية الأهمية منها:&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;الأول: بيان عجائب المذهب الشيعي وغرائبه!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;الثاني: بيان الإيمان بالقرآن والقول بالتحريف!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;الثالث: قضية الإمامة!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;الرابع: تفسير آيات الاستخلاف والتمكين والتطهير ومودة القربى!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وختم بحثه ببيان محبة أهل البيت.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;ويأتي أهمية هذا البحث في وجوب مرافقة الكتاب من أنه بسط الكلام في نقاط أجمل المؤلف الحديث فيها.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;bull;	التعريف بالكتاب:&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;الفصل الأول والثاني:&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;يدرس هذا الفصل أكبر خيانة على التاريخ البشري وأشنع طعن فيه، وهو ما صنعه الشيعة إذ زعموا بأن دعوة الإسلام دعوة عقيمة ورسالة بتراء، وأن الرسول صلى الله عليه وسلم فشل في صناعة جيل قرآني! فقالوا بقلوب تملأها الأحقاد والضغائن على ضياع الإمبراطورية المجوسية والحكم الروماني، والحسد على تفوق الإسلام على ديانتي اليهودية والنصرانية : بأن صحابة الرسول صلى الله عليه وسلم كانوا شلة من المنافقين يرتادون مائدة النبوة طمعا في الحكم، وأول ما انطفئت أنوار الحياة النبوية، وانتقل الرسول صلى الله عليه وعلى آله وصحبه وسلم إلى الرفيق الأعلى ارتد الصحابة كلهم عن بكرة أبيهم ما عدا ثلاثة أو أربعة!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وبذلك استطاع القوم أن يفصلوا بين الأجيال المسلة القادمة وصاحب الرسالة صلى الله عليه وسلم، فلم تعد قيمة لقوله تعالى:  لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا  (الأحزاب 21)، حيث انقطعت صلة التاريخ بالرسول صلى الله عليه وسلم. إذ كل ما نقلت إلينا من سنته كان عن طريق هؤلاء الصحابة المرتدون ـ العياذ بالله ـ!!!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;ومن ثم تم الطعن في القرآن الكريم! فالقرآن الكريم ليس إلا كتابا جمع بأيدي هؤلاء الصحابة الذين لم يعجبهم تعاليمه فحرفوا وبدلوا وغيروا حسب ما كان يحلوا لهم، فليس القرآن إذن حجة للدعوة.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;هذا ما قصده أعداء الدين بقيادة زعيمهم إبليس اللعين ـ ولعنة الله على الظالمين ـ!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;يعالج الكتاب هذه الترهات التي تفوه به هؤلاء القوم، حيث يرد عليهم من خلال الآيات القرآنية وتفاسيرهم هم عليها، ثم من خلال دراسة الشبهات والمطاعن على أرض الواقع ومدى تطابقها بالعقل السليم والمنطق القويم، ثم ما رواه القوم عن أئمتهم ـ المعصومون (!) ـ وما ورد في كتبهم من الروايات والأحاديث.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;ومن أجمل ما يتميز به الكتاب أنه يعتمد على تتبع ما عند القوم من الحق الذي نقلوه دون أن يقصدوا، فالسارق والخائن لابد وأن يترك أثرا يمسك من خلاله. وهذا ما حصل للشيعة. وقد هيأ الله هذا الكاتب لتتبع هذه الآثار ومن ثم الكشف عن حقيقة أمر الشيعة.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;من خلال الحديث عن الصحابة والتابعين كذلك عالج المؤلف بعض عقائد الشيعة مثل : عقيدة الرجعة، والتقية، والبداء و...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وقد طبع الكتاب لأول مرة عام 1870م، وطبع الفصل الأول في صورة كتاب مستقل عام 1301هـ في الهند مرتين، ثم خرج الفصل الثاني وتتابع طباعة الفصلين في كتاب مستقل عدة مرات في الهند وباكستان، وعام 1315هـ قام مطبعة &amp;quot;مصطفائي&amp;quot; بطباعته في جزئين. ثم فقد الكتاب عن المكتبات و الأنظار حتى كاد يفقد! إلى أن حصل دار الإشاعة في كراتشي باكستان على الجزء الأول منه فطبعه عام 1960م، ثم حصلت على الجزء الثاني وأخرج الكتاب بفصوله الأربع في مجلد ضخم عام 1963م. ثم أعاد طباعته عام1964م ثم عام 1679م.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;الفصل الثالث والرابع:&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وضع المؤلف رحمه الله الفصل الثالث تمهيدا للفصل الرابع، ومن أهم ما ذكر فيه هو شهادات بعض المستشرقين عن الصحابة الكرام، كشهادة سر وليم المؤرخ والمستشرق النصراني الشهير في بيان فضائل صحابة الرسول صلى الله عليه وسلم، وشهادة كاؤفري هينكس المؤرخ والمستشرق النصراني عن مناقب الصحابة ومكانتهم في التاريخ، وشهادة المستشرق كبن. و الحق ما شهد به الأعداء!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وتابع البحث في ذكر قضية &amp;quot;فدك&amp;quot; وما أثارته الشيعة من الشبهات والافتراءات ثم الرد عليها على نفس الأسلوب ـ أي؛ من خلال القرآن الكريم وتفاسير الآيات لدى الشيعة ثم ما ورد عن الرسول صلى الله عليه وسلم في كتبهم، ثم ما قاله الأئمة ورواة الشيعة ـ .&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;وفي ثنايا الحديث يتطرق البحث إلى مسائل فرعية تقتضيها الدراسة كحجية خبر الآحاد عند الشيعة، وما يجلبه لهم من المصائب في استقرار قواعد المذهب، وأن ما يعتقد الشيعة لا يعني السب واللعن في الصحابة والطعن في القرآن فحسب، بل ما يرمون به الأئمة في كتبهم أشد وأنكى، فلم يسلم الأئمة منهم وإن سموا أنفسهم بالإمامية!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;والتفسير الباطني وإعجاب مفسريهم الكبار به، فقد حاولوا من خلاله إلتواء أعناق الآيات إلى حيث ما يحلوا لهم.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;والفصل الرابع بحث علمي دقيق عن &amp;quot;فدك&amp;quot;، ويدور في ست محاور:&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;1.	حقيقة قضية &amp;quot;فدك&amp;quot; وحدوده ومصادره.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;2.	كيف حصل الرسول صلى الله عليه وسلم على &amp;quot;فدك&amp;quot;؟&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;3.	معنى الفيء وأين وكيف يصرف.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;4.	هل قدم الرسول صلى الله عليه وسلم &amp;quot;فدك&amp;quot; هدية لابنته فاطمة الزهراء أم لا؟&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;5.	هل ادعت سيدة النساء فاطمة الزهراء رضي الله عنها أمام أبي بكر أن الرسول صلى الله عليه وسلم وهب إليها أرض &amp;quot;فدك&amp;quot; أم لا؟&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;6.	الادعاء في الميراث وحقيقته.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;كل هذه المحاور يدرسها المؤلف من خلال كتب الشيعة ومصادرهم وما فيها من التعارضات والتناقضات.&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;فيا ترى!...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;لماذا يحارب الفكر الطائفي الصفوي الذي تتزعمه إيران مثل هذه الكتب الإصلاحية وهذا الكتاب بالذات؟!..&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;أو ليس كتابا علميا هادفا وضعه أحد أكبر أئمة الشيعة في الهند؟!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;أو ليس كل ما فيه من مصادر الشيعة الأصلية؟!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;فأين موطن الخطر؟! وأين الخلل؟!...&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;هل الخلل في الكتاب؟ أم في مؤلفه؟ أم أن الخلل في العقلية الإرهابية الصفوية التي تسعى أن تمسك بزمام الفكر الشيعي وأن تقود المذهب الشيعي في العالم!&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;فيا شيعة العالم استيقظوا!....&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;ويا شيعة العالم لا تتركوا المذهب العلوي ضحية للأطماع الصفويين!..&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&lt;strong&gt;تحميل الكتاب من هنا:&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;direction: rtl;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/1031/&quot;&gt;www.aqeedeh.com/book/1031/&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>به مناسبت واقعه غدیر خم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/341</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران محترم!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از دیرباز در بین&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; تشیع&amp;zwnj; سخن&amp;zwnj; در مورد &amp;laquo;غدیر خُم&amp;zwnj;&amp;raquo; جریان&amp;zwnj; دارد و همین&amp;zwnj; مسئله&amp;zwnj; مبنای&amp;zwnj; عقیده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; &amp;laquo;امامت&amp;zwnj;&amp;raquo; و نیز &amp;laquo;طعن&amp;zwnj;&amp;raquo; و &amp;laquo;لعن&amp;zwnj;&amp;raquo; جمع&amp;zwnj; زیادی&amp;zwnj; از شاگردان&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj;الله صلى الله علیه وآله وسلم قرار گرفته&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. اما بیان&amp;zwnj; این&amp;zwnj; قضیه&amp;zwnj; در سال&amp;zwnj;های&amp;zwnj; اخیر داغ&amp;zwnj;تر شده&amp;zwnj; و &amp;zwnj; شیعیان رافضى با انتشار كتاب&amp;zwnj;ها و رساله&amp;zwnj;هایی&amp;zwnj; در مناطق&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj;، و نیز برگزاری&amp;zwnj; همایش&amp;zwnj;ها و سمینارهایی&amp;zwnj; با عنوان&amp;zwnj; &amp;laquo;غدیر&amp;raquo;، ذهن&amp;zwnj; جوانان&amp;zwnj; جامعه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj; را دچار شبهه&amp;zwnj; نموده&amp;zwnj;اند. در این&amp;zwnj; برهه&amp;zwnj; از زمان&amp;zwnj; به&amp;zwnj; علّت&amp;zwnj; نیاز مبرم&amp;zwnj;، ضروری&amp;zwnj; می&amp;zwnj;باشد كه&amp;zwnj; دیدگاه&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj; در مورد این&amp;zwnj; واقعه&amp;zwnj; بیان&amp;zwnj; گردد تا عزیزان دچار سردرگمی&amp;zwnj; نشوند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شیعیان &amp;nbsp;می&amp;zwnj;گویند: &amp;quot;حضرت محمد صلى الله علیه وآله وسلم در آخرین سال عمر با برکت خویش به سفر حج رفتند و در بازگشت، کاروان عظیم همراه خود را در محلی بنام غدیر خم متوقف کردند و سپس در جمع آنها اعلان فرمودند که الله جل جلاله علی را بعد از من رهبر شما تعیین فرموده&amp;zwnj;است و علی جانشین من است&amp;quot;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شیعیان می&amp;zwnj;گویند: &amp;quot;پس از این اعلان مردم به علی (رضی الله عنه) تبریک گفتند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;به روایت اهل تشیع 70 روز بعد از این حادثه، حضرت محمد صلى الله علیه وآله وسلم دار فانی را وداع گفته و به جهان باقی شتافتند. و اصحاب او بلا فاصله حکم را تغییر دادند و علی را کنار زدند و ابوبکر را بر کرسی خلافت نشاندند، و به این نیز بسنده نکردند و به خانه علی هجوم برده و در خانه را سوزانده و وارد خانه شدند و به گردن علی ریسمان انداختند و او را کشان کشان به مسجد بردند و در این گیرو&amp;zwnj;دار پهلوی فاطمه شکست و عمر یا غلام عمر فاطمه را که پشت در گیر کرده بود با فشار دادن در له کرد تا آنجا که حضرت فاطمه سقط حمل نمود و جنین شیشماهه&amp;zwnj;اش مرده به دنیا آمد!&amp;quot;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به روایت اهل تشیع &amp;quot;عمر و یارانش همچنان علی را کشان کشان به داخل مسجد بردند و هر چی سعی کردند علی دست مشت کرده خود را باز نکرد و به همین اکتفا کردند که دست علی به دست ابوبکر بخورد و بیعت انجام گیرد!&amp;quot;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پس از این واقعه به روایت شیعه حضرت علی 25 سال سکوت کرد تا مردم او را خلیفه کردند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما اهل سنت می&amp;zwnj;گویند: نه خیر، این داستان از پایه دروغ است. نه حضرت محمد صلى الله علیه وآله وسلم در غدیر خم علی رضی الله&amp;nbsp;عنه&amp;nbsp;را جانشین خود کرده، نه کسی ایشان را مجبور به بیعت کرده، نه به خانه فاطمه رضی الله عنها&amp;nbsp;حمله شده، نه پهلوی فاطمه شکسته است. همه این حرفها دروغ، است! و داستانی خیالیست پایه و اساس و ریشه ندارد!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;براى اینكه این قضیه خلافى براى برادران وخواهران مسلمان ما بیشتر آشكار شود كتابخانه عقیده تصمیم گرفت به مناسبت سالروز واقعۀ غدیر خم &amp;nbsp;کتابهایی را که دربارۀ این واقعه نوشته شده معرفی نماید تا باشد که با مطالعه آن عاقلان و خردمندان بخود آیند و جاهلان و&amp;nbsp;&amp;nbsp;کینه دلان در غیض و بغض و کینه خود بمیرند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برای دریافت کتابها به سایت مراجعه كنید&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;عقیده امامت و حدیث غدیر&lt;br /&gt;
2.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;شاهراه اتحاد یا بررسی نصوص امامت&lt;br /&gt;
3.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;راهی دیگر براى کشف حقیقت&lt;br /&gt;
4.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;غدیر خم&lt;br /&gt;
5.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;خلافت و امامت&lt;br /&gt;
6.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;خلافت و امامت 2&lt;br /&gt;
7.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;امامت در پرتو نصوص&lt;br /&gt;
8.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;تئوری امامت درترازوی نقد&lt;br /&gt;
9.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;حـدیـث&amp;zwnj; غـدیـر، مولای&amp;zwnj; مؤمنان&amp;zwnj; و ما اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj;&lt;br /&gt;
10.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;تکامل فکر سیاسی شیعه از شورا تا ولایت فقیه&lt;br /&gt;
11.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;نقد و بررسی اصول و پایه های مذهب شیعه دوازده امامی&lt;br /&gt;
12.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;خلافت و انتخاب&lt;br /&gt;
13.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;درسی از ولایت&lt;br /&gt;
14.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;چرا نام حضرت علی رضی الله عنه در قرآن نیست؟&lt;br /&gt;
15.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;تهمت به علی در نهج البلاغه&lt;br /&gt;
16.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;ای شیعیان جهان بیدار شوید&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>توحيد و یکتاپرستی در حج</title>
<link>http://qalamlib.com/news/340</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;توحيد و یکتاپرستی در حج&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
مسألة توحيد از واضح ترين و مهمترين قضايایی شمرده می شود كه رسول الله &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم در حج به آن تأكيد كرده و اهميت آن را بيان نموده اند و از بارز ترين جوانبی كه مسأله توحيد در آن بوضوح بنظر می رسد مواردی را ذکر می کنیم:&lt;br /&gt;
الف - تلبيه: كه شعار حج بوده، و متضمن افراد الله لا شريك در ملك و عبادت است و پيامبر الله &amp;nbsp;بعد از نيت داخل شدن در حج تا وقت مشاهدة خانة كعبه بطور مداوم تلبيه را تكرار می نمود.&lt;br /&gt;
جابر ابن عبداللّه انصاری رضي الله عنه كلمات تلبيه را از آن&amp;nbsp;&amp;nbsp;حضرت اين طور نقل می كند: (لبّيك الّلهمّ لبّيك، لبّيك لا شريكَ لكَ لبَّيك، إنَّ الحمدَ والنِّعمةَ لك والملكَ لا شريك لكَ).&lt;br /&gt;
ب - اهتمام خاص رسول الله &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم به اخلاص عمل: و دعای آن حضرت به حضور پروردگار كه او را از رياء و خود بينی به دور نگه دارد؛ چنانكه درحديث انس رضي الله عنه آمده كه پيامبر صلی الله علیه وآله وسلم در هنگام بستن احرام فرمودند: (الّلهم حجّة لا رياء فيها ولا سمعة).&lt;br /&gt;
&amp;laquo;ای بار الها! توفيق حجّی را می خواهم كه رياء و شهرت در آن نباشد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
ج - خواندن سوره های اخلاص در دو ركعت طواف: امام ترمذی با سند صحيح روايت نموده كه آن حضرت-صلي الله عليه وسلم- سوره های اخلاص (قل يا أيّها الكافرون -و- قل هو الله أحد) را در دو ركعت طواف قرائت نمودند.&lt;br /&gt;
د- تبلور جوانبی از توحيد در نيايش آن حضرت بر بالای صفا و مروه: چنانکه جابر انصاری رضي الله عنه در حديث طويلی حج ایشان را بطور مفصّل&amp;nbsp;&amp;nbsp;بيان می نمايد: (...بعدا بر تپة &amp;quot;صفا&amp;quot; بالا رفتند تا اينكه بيت الله را ديدند، رو به قبله نموده &amp;quot;الله&amp;quot; را به يگانگی ياد كردند و بزرگيش را بيان نمود و فرمودند: هیچ معبودی جز الله یکتا شایستۀ عبادت نیست، پادشاهی و ستايش برای او است، و او بر هر چيز توانا ميباشد. . سه مرتبه اين جملات و يا مشابه اينها را تكرار نمودند پس از آن به &amp;quot;مروه&amp;quot; آمده و اعمال و دعاهايی را كه به صفا انجام داده بودند در مروه نيز تكرار نمودند).&lt;br /&gt;
هـ- نيايش توحیدی آن حضرت در عرفه، چنانکه در حديث آمده: بهترين دعا، دعای روز عرفه است و بهترين دعای كه من ميگويم و پيامبران پيش از من گفته اند: (لا إله إلّا الله وحده، لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو علي كلِّ شيئ قدير) است.&lt;br /&gt;
با تأسف شديد امروزه هر بيننده متوجّه جهل و نادانی ميشود كه دامنگير مسلمانها شده است، و همچنين مشاهده ميشود كه انواع بدعت ها و خرافات حتی در مراسم بزرگ و جهانی حج دربين مردم به چشم می خورد.&lt;br /&gt;
بديهی است كه مسئوليت عظيم ارشاد و راهنمائی مسلمانها بسوی اصل دين و حقيقت توحيد كه پيامبران به خاطر آن فرستاده شده اند و بر حذر داشتن آنها از همه انواع و اقسام شرك و بدعت به دوش علماء و دعوتگران ميباشد.&lt;br /&gt;
اهميت مسألة توحيد و تقديم آن برساير اركان عملی اسلام از سيرت پيامبر بزرگ اسلام است آنگاه كه معاذ رضي الله عنه را بسوی &amp;quot;يمن&amp;quot; فرستادند برايش فرمودند: ايشان را به گواه&amp;zwj;ی بر كلمة توحيد (لا إله إلّا الله) و براينكه من رسول الله &amp;nbsp;هستم دعوت بده، اگراين دعوت ترا پذيرفتند؛ آنها را بفهمان كه خدای متعال در هر شبانه روز پنج نماز بر آنها فرض نموده است، و اگر اين را نيز اطاعت كردند، به ايشان خبر بده كه خدای بزرگ بر آنها صدقه در مالهايشان فرض گردانيده كه از ثروتمندان شان گرفته شده به فقرا&amp;zwj;ی شان تقسيم ميشود.&lt;br /&gt;
پس چه جالب و لايق است برای حجاج محترم كه خود بر توحيد استوار باشند و خويشتن را داعی و حامل لوای توحيد قرار دهند.&lt;br /&gt;
به اين مناسبت توحیدی سایت عقیده کتاب هایی در مورد توحید را خدمت شما معرفی می نماید که امیدواریم مورد استفاده برادران و خواهران مسلمان قرار گیرد.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;middot;بسوی نور توحيد&lt;br /&gt;
&amp;middot;توحيد-یکتا پرستی&lt;br /&gt;
&amp;middot;توحيد برای کودکان و نوجوانان&lt;br /&gt;
&amp;middot;توحید عبادت&lt;br /&gt;
&amp;middot;توحید محور زندگی&lt;br /&gt;
&amp;middot;توحید، نبوت، معاد&lt;br /&gt;
&amp;middot;حقیقت توحيد&lt;br /&gt;
&amp;middot;حقیقت توحيد از دیدگاه ائمه&lt;br /&gt;
&amp;middot;حمایت از توحيد&lt;br /&gt;
&amp;middot;دلایل توحید- 50 سؤال و جواب در یگانه پرستی&lt;br /&gt;
&amp;middot;دلایل توحید- 50 سوال و جواب دربارۀ عقیده&lt;br /&gt;
&amp;middot;غایة المرید شرح کتاب توحيد&lt;br /&gt;
&amp;middot;فتح المجید شرح کتاب توحيد&lt;br /&gt;
&amp;middot;نقش توحید در زندگی انسان&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;وحدت کلمه بر اساس کلمه توحید&lt;br /&gt;
&amp;middot;پناهگاه توحید&lt;br /&gt;
&amp;middot;کتاب توحید&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرا رسیدن عید سعید اضحی بر همه مسلمانان جهان مبارک باد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/338</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;آداب عید قربان&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از انس رضی الله عنه روایت است که فرمود: هنگامی که پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم به مدینه آمدند دو روز داشتند که به بازی و سرگرمی مشغول می&amp;lrm;شدند و جشن می&amp;lrm;گرفتند، پیامبر صلی الله علیه وسلم فرمودند: (الله متعال بجای آنها، دو روز بهتری برای شما قرار داده است. روز عید فطر و روز عید قربان) ( حدیث صحیح/ سنن نسائی شماره1556)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اذکار و فضائل روز عرفه و ایام التشریق (11 و 12 و 13 ذی&amp;lrm;الحجه)&amp;lrm;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از عبدالله بن عمر رضی الله عنه روایت است که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (هیچ روزی باشکوه&amp;lrm;تر و محبوبتر در انجام اعمال نیک نزد خداوند از 10 روز اول ذی الحجه وجود ندارد پس در این روزها &amp;laquo; لا اله إلا الله و الله أکبر و الحمد لله&amp;raquo; را زیاد بگویید).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(حدیث صحیح/ مسند احمد شماره 6154)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم روز اول ذی&amp;lrm;الحجه را روزه می&amp;lrm;گرفتند). (حدیث صحیح/ سنن ابوداود شماره 2437)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در مورد روزه&amp;lrm;ی روز عرفه فرمودند: (گناهان سال گذشته و سال آینده را محو می&amp;lrm;کند). (صحیح مسلم شماره 1162)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (بهترین چیزی که پیامبران در روز عرفه گفته&amp;lrm;اند و من نیز آن را می&amp;lrm;گویم : &amp;laquo; لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِیک لَهُ، لَهُ الْمُلْک وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى کلِّ شَیءٍ قَدِیرٌ &amp;raquo; می&amp;lrm;باشد). (حدیث حسن/ معجم الطبرانی شماره 3274 - سلسله صحیحه شماره 1503)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روایت است که عبدالله بن عباس رضی الله عنه و دیگر اصحاب رسول الله صلی الله علیه وسلم تکبیر عید قربان را بعد از نماز صبح روز عرفه شروع می&amp;lrm;نمودند و بعد از نماز عصر آخرین روز از ایام تشریق به پایان می&amp;lrm;رسانیدند. ( حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 6072)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابوهریره، عمر, عبدالله بن مسعود و عبدالله بن عمر رضی الله عنهم در بازار، بعد از نمازها، وقت خواب، نشستن و پیاده رفتن خود را مشغول تکبیر گفتن &amp;lrm;می&amp;lrm;نمودند. (صحیح بخاری/ شماره970 - 969)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عبدالله بن عمر رضی الله عنه می&amp;lrm;فرماید که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به همراه اصحاب در هر دو عید تکبیر گویان با صدای بلند به سوی نماز می&amp;lrm;رفتند. (حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 5925)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الفاظ تکبیر&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الله اکبر الله اکبر ، لا اله الا الله ، والله اکبر الله اکبر ، و لله الحمد. (حدیث صحیح/ سنن بیهقی شماره 5925)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الله اکبر الله اکبر الله اکبر لا اله الا الله والله اکبر الله اکبر و لله الحمد. (امام مالک و امام شافعی این لفظ را نیز جائز می&amp;lrm;دانند )&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آداب و سنتهای عید قربان&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از ام سلمه رضی الله عنها روایت است که رسول الله صلی الله علیه وسلم فرمودند: (هرگاه هلال ماه ذی الحجه را مشاهده نمودید و قصد قربانی کردن را داشتید تا حیوان را قربانی نکرده&amp;lrm;اید چیزی از مو&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;zwj;&amp;rlm;, ناخن و موهای زاید خود را کوتاه نکنید).(صحیح مسلم شماره 1977)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رعایت نظافت ، استعمال بوی خوش، مسواک زدن و غسل زدن چنانچه در روز جمعه تأکید شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از عبدالله بن عباس رضی الله عنه روایت است که پیامبر صلی الله علیه وسلم در یکی از جمعه&amp;lrm;ها فرمودند: (الله جل جلاله این روز را برای شما مسلمانان &amp;laquo;عید&amp;raquo; قرار داده است پس کسی که به نماز جمعه آمد، غسل بزند، و اگر بوی خوش دارد استفاده کند و مسواک بزند). (حدیث صحیح/ سنن ابن ماجه شماره 1098)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(بهترین لباس خود را بپوشد). ( صحیح بخاری شماره 948)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم در روز عید قربان قبل از نماز چیزی نمی&amp;lrm;خورد تا از نماز برمی&amp;lrm;گشت. (حدیث صحیح/ سنن ترمذی شماره 542)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نظر علما بر این است که بعد از نماز عید غذای خود را با گوشت قربانی&amp;lrm;اش شروع کند. (فتح البای شرح حدیث 955 صحیح بخاری)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اهمیت نماز عید و تأکید پیامبر به رفتن به نماز عید&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از ام عطیه رضی الله عنها روایت است که فرمود: (رسول الله صلی الله علیه وسلم به ما فرمودند که دختران بکر ( ازدواج نکرده ) و زنان قاعده را به مصلی ببریم تا در کار نیک و دعای مسلمانان شریک باشند و زنان قاعده از مصلی کناره می&amp;lrm;گرفتند). (صحیح بخاری شماره 324 )&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حال وقتی پیامبر صلی الله علیه وسلم به زنان چنین توصیه می&amp;lrm;کند مطمئناً این اهمیت و تأکید پیامبرصلی الله علیه وسلم شامل حال مردان بیشتر می&amp;lrm;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم پیاده به مصلی می&amp;lrm;رفتند و بر می&amp;lrm;گشتند. (حدیث حسن/ سنن ابن ماجه شماره 1294 )&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وسلم در روز عید از راهی به مصلی می&amp;lrm;رفتند و از راه دیگر باز می&amp;lrm;گشتند. ( صحیح بخاری شماره 986 )&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برای مأمومین مستحب است که برای نماز عید زود به مصلی بروند اما برای امام سنت است دیرتر به مصلی برود. ( بخاری شماره 956)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبرصلی الله علیه وسلم قبل از نماز عید سنتی نمی&amp;lrm;خواند ولی وقتی به منزلشان برمی&amp;lrm;گشتند دو رکعت می&amp;lrm;خواندند. (حدیث حسن/ ابن ماجه شماره1293)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ولی طبق دستور پیامبر صلی الله علیه وسلم وقتی وارد مسجد شدیم می توانیم دو رکعت سنت تحیه مسجد بخوانیم. (صحیح مسلم شماره 714)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نماز عید دو رکعت است که بصورت زیر خوانده می&amp;lrm;شود&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پس از تکبیرة الحرام دعای استفتاح (وجهت) را می&amp;lrm;خوانیم و سپس هفت تکبیر دیگر می&amp;lrm;گوییم، در رکعت دوم بعد از تکبیر انتقال ( بالا آمدن از سجود ) پنج تکبیر دیگر می&amp;lrm;گوییم در هر رکعت پس از تکبیرات دعای تعوذ ( اعوذ بالله &amp;hellip; ) و سوره حمد می&amp;lrm;خوانیم - در بین تکبیرات حمد و ثنای خدا را گفته و او را مورد مجد و تعریف قرار می&amp;lrm;دهیم ( سبحان الله و الحمد لله و لا اله الا الله و الله اکبر ) و بر رسول الله صلی الله علیه وسلم صلوات می&amp;lrm;فرستیم. (حدیث صحیح/ معجم الکبیر الطبرانی شماره 9519 )&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کسانی که به نماز عید همراه امام نرسند و همچنین زنانی که در خانه هستند می&amp;lrm;توانند نماز عید را بجا آورند. (صحیح بخاری شماره987)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در صورت نرسیدن به نماز جماعت ( نماز عید) تعداد رکعات نماز و چگونگی آن هیچ تغییری نمی&amp;lrm;کند آن طور که از انس رضی الله عنه روایت شده است. (حدیث حسن/ سنن بیهقی شماره 6031)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تبریک و تهنیت گفتن به یکدیگر&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از جبیر بن نفیر رضی الله عنه روایت است که: اصحاب رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم هنگامی که روز عید همدیگر را ملاقات می&amp;lrm;کردند به یکدیگر می&amp;lrm;گفتند: &amp;laquo; تَقَبَّلَ اللهُ مِنَّا وَ مِنْک &amp;raquo; (الله از ما و شما قبول بگرداند) (حدیث حسن/ فتح الباری شرح حدیث 952 صحیح بخاری)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آداب اجتماعی روز عید&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (همانا الله بلند مرتبه به من وحی نمودند که نسبت به یکدیگر فروتن و متواضع باشید تا یکی بر دیگری ظلم و تعدی ننموده و فخر و تکبر نورزد). (صحیح مسلم شماره2865)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (اگر سوزن آهنی در سر یکی از شما فرو برده شود برای او بهتر از این است که زن نامحرمی را لمس کند). (حدیث حسن/ معجم الکبیرطبرانی شماره 486)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (ذلت و حقارت بر کسی قرار داده شده است که با دستور من مخالفت کند و هرکس خود را به قوم و گروهی شبیه کند پس او از همان قوم محسوب می&amp;lrm;شود). (حدیث صحیح/ مسند احمد شماره 5115)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم مردانی که خود را شبیه زنان و زنانی که خود را شبیه مردان می&amp;lrm;سازند، لعنت نمودند و فرمودند: آنها را از خانه&amp;lrm;هایتان بیرون کنید. (صحیح بخاری شماره 5547)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (زنانی که لباسهای نازک می&amp;lrm;پوشند و نیمه برهنه به نظر می&amp;lrm;رسند و (موی) سرشان ماند کوهان شتر (برآمده) است خودشان منحرف هستند و دیگران را هم منحرف می&amp;lrm;سازند، دوزخیانی هستند که من آنها را ندیده&amp;lrm;ام، وارد بهشت نمی&amp;lrm;شوند و بوی بهشت به مشامشان نمی&amp;lrm;رسد). (صحیح مسلم شماره 2128)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (بخورید، بنوشید، بپوشید، و به یکدیگر صدقه دهید اما اسراف نکنید و تکبر نورزید). (حدیث حسن/ابن ماجه شماره 3605)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: (کسی که می&amp;lrm;خواهد روزیش وسیع گردد و بقیه&amp;lrm;ی عمرش پر خیر و برکت باشد باید صله&amp;lrm;ی رحم را بجای آورد. و در روایتی قطع کننده&amp;lrm;ی (ترک کننده) صله&amp;lrm;ی رحم وارد بهشت نمی&amp;lrm;شود). (صحیح مسلم شماره 2557ـ2556)&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>عرفه ميعادگاه مؤمنان با الله</title>
<link>http://qalamlib.com/news/337</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بدون شك روز عرفه: بزرگترین روز در میان روزهای پر فیض وبركت الله &amp;nbsp;است، عرفه مركز بزرگی سر شار از خیر وایمان و تقوا است، عرفه فصل بسیار مهمی از فصول طاعت و عبادت است، عرفه روزی است كه در آن پندها آموخته می شود، دعاها به آسمان می رود، رحمتها فرود می آید ، و گناهها بخشیده می شود، روز امید ها و آرزو ها ، روز فروتنیها و پشیمانیها، آری روز بخششها و بركتها، روزی كه خورشید بهتر از آنرا ندیده است، ویژگیهای ارزشمند، خصوصیات عظیم ،صفات والا و فضائل بی انتهایی كه این روز بزرگ بهمراه دارد از شمارش و احاطه خارج است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روز عرفه روزی است كه الله &amp;nbsp;متعال در آن، دین اسلام، این نعمت بزرگ را بر امت اسلامی كامل فرمود، چنانكه می فرماید: ) الْیَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِینَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَیْكُمْ نِعْمَتِی وَرَضِیتُ لَكُمُ الْأِسْلامَ دِیناً ( (المائدة:3)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; امروز دینتان را بر شما كامل كردم و نعمتم را بر شما تمام نمودم و اسلام را به عنوان (آخرین و كاملترین ) دین برای شما پسندیدم &amp;raquo; بعد از نزول این آیه دیگر حلال وحرامی نازل نشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از طارق ابن شهاب روایت است كه فرمود: &amp;laquo; مردی یهودی نزد عمر فاروق رضی الله عنه آمد و گفت :ای امیرمؤمنان ! شما آیه ای را در كتابتان می خوانید كه اگر بر ما یهودیان نازل می شد آنروز را جشن می گرفتیم، پرسیدند كدام آیه ؟ گفت : ( الیوم اكملت لكم دینكم و أتممت علیكم نعمتی) حضرت عمر فرمودند: به خدا سوگند من دقیقا می دانم كه این آیه در چه روزی و در چه ساعتی بر رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ نازل گردیده شامگاه روز عرفه كه مصادف با روز جمعه بود&amp;raquo; بخاری&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دراین روز خجسته و پربركت آزاد شدگان خدا از دوزخ چه بسیارند ، روزی كه الله &amp;nbsp;در آن بر بندگان مؤمنش سخاوت می فرماید و با آنان بر فرشتگان معتبرش فخر و مباهات می ورزد ، از ام المومنین عائشه صدیقه رضی الله عنها روایت است كه پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ فرمودند : ( مامن یوم اكثر من أن یعتق الله فیه عبدا من النار من یوم عرفة وانه لیدنوا ثم یباهی بهم الملائكة فیقول ما أراد هؤلاء) مسلم&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; روزی نیست كه الله &amp;nbsp;بیشتر از روز عرفه در آن بنده از دوزخ آزاد فرماید ، الله &amp;nbsp;مهربان در آن روز &amp;ndash; چنانكه خود داند &amp;ndash; به بندگانش نزدیك می شود ، آنگاه با حضور آنان بر فرشتگانش فخر می ورزد &amp;nbsp;و از روی فخر و مباهات می فرماید اینها چه می خواهند؟(مگر جز خشنودی من ، و آمرزش گناهانشان آرزوی دیگری دارند؟) &amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علامه ابن عبدالبر رحمة الله علیه می فرماید :&amp;laquo; این دلالت می كند كه آنها بخشیده می شوند ، زیرا الله &amp;nbsp;ممكن نیست به كسانی فخر فرماید كه اهل گناه و خطا باشند مگر بعد از اینكه توبه كنند و بخشیده شوند&amp;raquo; از عبدالله بن عمرو رضی الله عنهما روایت است كه رسول الله ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ فرمودند: ( إن الله تعالی یباهی ملائكته عشیة عرفة بأهل عرفة یقول : اُنظروا إلی عبادی أتونی شعثا غبراً) التمهید&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; بطور قطع الله &amp;nbsp;متعال در شامگاه عرفه بوسیله كسانی كه در عرفه حاضرند بر فرشتگانش فخر می نماید و می فرماید : ببینید كه بندگانم چگونه ژولیده وغبار آلود پیش من آمده اند&amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فضیل بن عیاض رحمةالله علیه شامگاهان درعرفه ایستاده بود كه ناگاه&amp;nbsp;&amp;nbsp;گریه و زاری مردم توجه او را جلب نمود فرمود: &amp;laquo; به نظر شما اگر همه اینها پیش كسی بروند واز او یك دانه (مثلاگندم)بخواهند آیا او (این خواسته ناچیز) آنان را رد خواهد كرد؟ گفتند نه ، فرمود : بخدا قسم آمرزش گناهان در نزد پروردگار از دادن یك دانه هم آسان تر است&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بنابر این مسلمانی كه در این روز خجسته و مبارك می خواهد استفاده كند و فیض ببرد می بایستی بشدت در حضور پروردگارش فروتنی كند و با عجز و انكسار ، و ندامت و پشیمانی رحمت و مغفرت ذات كبریایی اش را از او بخواهد، از غضب و عذابش در ترس و حذر باشد از هر گناهی كه مرتكب شده و از هر اشتباهی كه از او سرزده از ته دل و اعماق قلبش توبه كند ، در این لحظات طلائی و سر نوشت ساز كه ممكن است زندگی هر مسلمانی دگرگون شود با رفتن به این سو و آن سو&amp;nbsp;&amp;nbsp;وقتش را ضایع نكند ، با حرفهای بیهوده یا حد اقل غیر ضروری این فرصت بزرگ را از دست ندهد ، بلكه با كمال عاجزی و صداقت به مولا و پروردگارش روی آورده و هر چه می تواند بیشتر مشغول ذكر و دعا و استغفار باشد ، از پیامبر خدا ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ ثابت شده كه فرمودند: ( خیرالدعاء دعاء یوم عرفة و خیر ما قلته أنا و النبیون من قبلی) &amp;laquo; بهترین دعاء، دعای روز عرفه است و بهترین سخنانی كه من و پیامبران قبل از من گفته ایم:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(لا اله إلا الله وحده لا شریك له، لهُ الملك و له الحمد وهو علی كل شئ قدیر) است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;معنای این كلمات چنین است &amp;laquo; هیچ معبود برحقی جز خدای یگانه و لاشریك نیست، پادشاهی وستایش ویژه اوست ، و او برهر چیزی تواناست&amp;raquo; .پس روز عرفه روز دعاست ، و بهترین ذكر &amp;laquo;لا اله الاالله&amp;raquo; است و پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ در بهترین روز، بهترین ذكر را انجام می دادند ، زیرا سردار همه روزها رز عرفه، و سردار همه اذكار&amp;laquo; لااله الاالله &amp;raquo; است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پس بسیار شایسته و مناست است كه بهترین ذكر را در بهترین روز انجام دهیم - و در عین حال از رسول گرامیمان ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ پیروی نمائیم- &amp;laquo;لااله الاالله&amp;raquo; این كلمه بزرگی كه رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ &amp;nbsp;آنرا در روز عرفه به كثرت ورد می فرمود بطور قطع بزرگترین و ارزشمندترین كلمه است، این كلمه ریسمان محكم، كلمه تقوی، كلید بهشت و اصل و اساس دین است. بخاطرهمین كلمه است كه آسمان و زمین آفریده شده ، مخلوقات آفریده شده، پیامبران فرستاده شده اند و كتابها فرود آمده اند ، فضائل این كلمه و موقعیت آن در دین بالا تر از آنست كه وصف كنندگان توصفیش كنند یا عارفان بشناسندش ، بلكه فضائل و مزایای آن ، بقدری زیاد است كه در خیال و تصور هم نمی گنجد .&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با اینهمه مسلمان باید بداند كه &amp;laquo; لا اله الاالله&amp;raquo;&amp;nbsp;&amp;nbsp;صرفا با زبان بدون آنكه گوینده آن حقش را اداء گرداند وشروط آنرا بجای آورد قبول نمی شود، &amp;laquo; لا اله الاالله &amp;raquo; اسمی نیست كه بی معنی باشد ، یا قولی كه حقیقت نداشته باشد، یا لفظی كه مفهوم نداشته باشد بلكه این كلمة بزرگ مدلولی دارد كه فهم و درك آن ناگزیر ومعنایی كه حفظ آن لازم ،و غایت وآرمانی كه تحقق آن واجب است، چون به اجماع علماء صرفا گفتن این كلمه بدون آنكه گوینده معنای آنرا بفهمد وعمل به مقتضای آنرا بشناسد غرض مطلوب را بر آورده نخواهد كرد، چنانكه الله &amp;nbsp;متعال می فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;)وَلا یَمْلِكُ الَّذِینَ یَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ الشَّفَاعَةَ إِلَّا مَنْ شَهِدَ بِالْحَقِّ وَهُمْ یَعْلَمُونَ( (الزخرف:86)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; كسانی كه مشركین آنانرا غیر از خدا می خوانند اختیار شفاعت ندارند مگر كسانی كه به حق و توحید گواهی داده باشند در حالیكه حقیقت گواهی شان را می دانند&amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;یعنی مگر كسانی كه به &amp;laquo; لا اله الاالله&amp;raquo; گواهی دهند در حالیكه از ته دل می دانند آنچه را بر زبان می آورند، بدون شك این امر بسیار مهم است و هر مسلمانی باید به آن توجه فوق العاده داشته باشد زیرا &amp;laquo;لا اله الاالله &amp;raquo; نفعی نخواهد داشت مگر برای كسی كه مدلول آنرا چه در بُعد نفی و چه در بُعد اثبات بشناسد و با اعتقاد كامل به آن عمل كند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اگر كسی آنرا ظاهراً بر زبان آورد و بدون اعتقاد حتی اگر به آن عمل هم بكند منافق است، و اگر كسی آنرا بگوید و بر خلاف آن عمل كند وی مشرك و چه بسا كافر می گردد، همچنین است حال كسی كه كلمه را بگوید سپس با انكار بخشی از لوازم و حقوق آن مرتد شود در این صورت به او نفعی نخواهد بخشید حتی اگر هزار مرتبه این كلمه را بخواند، همچنین است كسی كه آنرا می گوید اما بعضی عبادتها را برای غیر خدا انجام می دهد، مثلا غیر خدا را می خواند ، یا از غیر او در زمینه هایی كه جز خدا توانایی انجام آنرا ندارد، نصرت ویاری می جوید، یا كسی كه بخشی از عبادات را كه جز الله &amp;nbsp;بزرگ هیچ احدی شایستگی آنرا ندارد برای غیر خدا انجام میدهد چنین فردی مشرك است اگر چه &amp;nbsp;&amp;laquo; لا اله الاالله &amp;raquo; بر زبان آورد، زیرا معنای این كلمه بزرگ این است كه تمامی انواع عبادت را صرفا برای خدای یكتا خالص گردانیده شود، وهیچ احدی را با او شریك قرار داده نشود و در هر حال فقط به خدای یكتا و لا شرك روی آورده شود و عاجزی و تذلل ، امید و توجه ، انابت و توكل و دعا وطلب، فقط ببارگاه آن ذات ملكوتی انجام گیرد ، پس گویندة &amp;laquo; لا اله الاالله &amp;raquo; جز خدا كسی را نمی خواند ، جز برای خدا ذبح نمی كند، هیچ بخشی از پرستش را جز برای خدا انجام نمی دهد و به همة آنچه كه جز خدای یكتا پرسیده می شود كافر می گردد ، و از آنها به ببارگاه پروردگار یكتا اعلان برائت و بیزاری می كند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>العلماء بين بيان الدين وثائرة التعصب</title>
<link>http://qalamlib.com/news/336</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;bdo dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;خالد بن محمد البديوي&lt;/span&gt;&lt;/bdo&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;المشرف العام لموقع جسور التواصل&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;لاشك بأن الواجب على العلماء حفظ الدين، إذ هو على رأس الضروريات الخمس التي وضعت الشريعة لحفظها (الدين، النفس، العقل، النسل، المال)، ولكي يقوم العلماء بحفظ الدين ينبغي أن يرتكز خطابهم على (البيان)؛ بيان حقائق الدين معالمه ومحاسنه لكل الناس.&lt;br /&gt;
فقد سمّى الله تعالى نفسه بالمُبِين ((ويعلمون أنَّ اللهَ هو الحقُّ المُبِين))، فلكماله تعالى بيّن لعباده سبيل الرشاد بأحسن طرق، ولكمالِ كتابه وصفه بأنّه ((نور وكتاب مبين))، وقد رفع الباري قدر محمد صلى الله عليه وآله وسلم حين أرسله ((ليبين للناس ما نزل إليهم)).&lt;br /&gt;
وخطاب البيان وحديث المُبيّنون يرتكز في مضمونه على الآراء والمقالات والبراهين والأدلة بأنواعها، فهو حوارات علمية راقية تثري العقول وتنشر الهدى.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وبتتبع يسير نجد أن أحاديث القرآن حول الحق والباطل عامتها حديث في عالم الأفكار والآراء، فيبين القرآن طريق الهداية وأسبابها وفضائلها في الدنيا الآخرة، ويبين الضلال وطرقه وأسبابه ومصير أصحابه في الدنيا والآخر، دون أن يشغل السامعين بأسماء المخالفين لطريق الرشاد إلا نادراً، وربما كانت هذه الأسماء من المتفق على بغضها عند السامعين (الشيطان، فرعون، هامان..)، كما أنه قد يسمي مخالفاً لحكمة كتسمية القرآن لأبي لهب مع ترك تسمية أبي جهل فرعون هذه الأمة وترك تسمية الآخرين من صناديد مشركي مكة أو مدعيّ البنوة في ذلك العهد، كما لم يسم القرآن رأس النفاق عبد الله بن سلول فضلا عن من هو دونه مع علمنا بأن كثير من الآيات نزلت في التعليق على أحداث معلومة.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أمّا اليوم فيُعد الاهتمام بإشهار الطعن في أسماء المخالفين &amp;quot;قوة في الدين&amp;quot; لدى بعضنا، كما يُعد ترك ذلك &amp;quot;ضعف في الديانة&amp;quot;، والحقيقة أن أسلوب القرآن فيه القوة العلمية الراسخة لأن القوة في عالم حوار العقائد والمقالات تكمن في امتلاك الحجج والبينات، ويزيدها قوة أسلوب العرض الذي يبتعد عن التهويشات والهبوط إلى عالم العصبيّات وكل ما يثيرها مثل الطعن في الآله المعبودة أو الشخصيات المتبوعة المعظمة بين أتباعها، وفي ترك القرآن لذلك حكمة ظاهرة إذ قد يمتنع بعض السامعين من الانتفاع بالبينات بسبب ذلك فوجب أن لا تكون الموانع من صنع أهل البيان.&lt;br /&gt;
إن القرآن يعلمنا أن نقيم الحق بقوة البيان بدلائله وبراهينه، ويعلمنا أن أهل البيان يشيدون مجتمعات راقية فكرياً تقوم على تعزيز القناعات المبنية على التفكر والتأمل، وفي مجتمعهم تجد الفكرةَ تجادل الفكرةَ، وتجد البرهان يغلب الظن، وفي كل الأحوال لا يقبلوا العلماء المبينون النزول بمجتمعاتهم عن هذا المستوى الفكري، ولا يُسفّون بالحق مهما استفزهم الآخرون، وهذه الطريقة هي الأحرى بحفظ الدين وإفساح المجال للحوار دون فتن، أما المتعصبون لأهوائهم الذين تنتهي حججهم عند ((إنا وجدنا آبائنا على أمة)) فإن العادة تثبت بأنهم لا يستطيعون العيش في عالم الأفكار والبراهين التي قد تنتهي بهم إلى التخلي عن بعض الآراء الموروثة فليس أمامهم إلا النزول إلى مراتب الوجدان.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وقد تساءل بعض الفضلاء: لماذا ضُعف أثر المعتدلين بين أتباع الفرق في الأمة الإسلامية؟ والواقع يجيب بأنّ عوام الفرق لازالوا يتعرضون لجريمة كبرى تستهدف إبقائهم في عالم التعصب حتى لا يصعدوا إلى عالم التفكير، ويشارك في هذه الجريمة فئام من أصحاب الباطل وأصحاب الحق بأساليب تعزز الحمية الجاهلية للمقولات الدينية ورموزها، والنتيجة: إيجاد المناخات الفكرية التي نزل القرآن وجميع الكتب السماوية لينقذوا البشر منها، وليرفعوهم للعيش في عالم التوحيد الذي يسموا بالعقل وينميه، بينما يسعى خصوم الرسل دوماً إلى تثوير العصبيات لتُغلق العقول ثم يلتف الناس حول المتسلقين وأكثر المتطرفين في كل ملة وفرقه، والسبب الجامع لكل ذلك هو مخالفة منهج القرآن في البيان والإسفاف بالحق من خلال أساليب تعزز نزعة الهوى سواء قام بذلك صاحب حق أو باطل.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وقد نقل الشاطبي عن أبي حامد الغزالي رحمه الله قوله: (أكثر الجهالات إنما رسخت في قلوب العوام بتعصب جماعة من جهال أهل الحق، أظهرا الحق في معرض التحدي والإذلال، ونظروا إلى ضعف الخصوم بعين التحقير والازدراء فثارت في بواطنهم دواعي المعاندة والمخالفة ورسخت في قلوبهم الاعتقادات الباطلة، وتعذر على العلماء المتلطفين محوها مع ظهور فسادها). ثم علق الإمام الشاطبي رحمه الله بقوله: (وهو الحق الذي تشهد له العوائد الجارية، فالواجب تسكين الثائرة ما قدر على ذلك، والله أعلم) (الاعتصام 2/732).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;فمتى سنعي أن قوة البيان تكمن في التزام طريقة القرآن &amp;quot;الاهتمام بجدل الأفكار وليس الطعن في الذوات&amp;quot;، وأن الحقائق تنتشر في أجواء السلم والطمأنينة الفكرية التي تتيح للأفراد التأمل والتدبر وأن الانحرافات إنما تنتشر مع الإثارات والاضطرابات التي تشوش العقول.. ألا ترون أن الإسلام انتشر بعد صلح الحديبية عندما أمن الناس، وأن الفتن في الأمة الإسلامية ظهر بمقتل عثمان رضي الله عنه وما تبع ذلك من قلاقل هيأت لظهور مقالات وفرق، وصار لكل فرقة أتباع ومتبوعين.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;بعد هذا كله لنا أن نتساءل: أي نصر سيجنيه من يسعى لإسقاط شخص متبوع في فرقة لها عقائد يزيد عمرها على ألف عام؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;kb@josortwasul.com&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فضائل دهه ذو الحجه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/335</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فضائل دهه ذو الحجه&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سپاس و ستایش پروردگاری یکتا را و درود سلام&amp;nbsp;&amp;nbsp;بر بهترین اولاد آدم سید الأنبیاء والمرسلین و آل و اصحاب بزرگوارشان.&lt;br /&gt;
به&amp;nbsp;&amp;nbsp;گزارش&amp;nbsp;سایت سنی نیوز دادگاه عالی عربستان سعودی اعلان نمود که هلال ماه ذی الحجه در شامگاه امروز پنجشنبه دیده شد و به این ترتیب وقوف در عرفات روز شنبه نهم ذی الحجه موافق با 5 نوامبر 2011م مصادف با با 14 آبان / عقرب 1390هـ ش بوده و عید سعید قربان روز یكشنبه دهم ذی الحجه، 6 نوامبر 2011م مصادف با 15 آبان / عقرب 1390هـ ش خواهد بود.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان&lt;br /&gt;
از فضل و رحمت الله است كه در طی سال برای بندگان صالح خود مواسمی قرار می دهد كه در آن به اعمال صالح بپردازند و یكی از این مواسم خیر دهه ذو الحجه است...&lt;br /&gt;
دهه ذو الحجه&lt;br /&gt;
در فضیلت و بزرگی این دهه مبارك ادله بسیاری از قرآن و سنت وارد شده است:&lt;br /&gt;
1-الله سبحانه و تعالی می فرماید:&lt;br /&gt;
{والفجر ولیال عشر} [الفجر/2-1]&lt;br /&gt;
(قسم به سپیده دم و قسم به شب های دهگانه)&lt;br /&gt;
ابن كثیر رحمه الله در تفسیر خود می گوید: منظور از این ده شب دهه ذی الحجه است همانطور كه ابن عباس رضی الله عنهما و ابن زبیر ـ رضی الله عنهما ـ و مجاهد و دیگران گفته اند. (رواه البخاری)&lt;br /&gt;
2-و همچنین از ابن عباس رضی الله عنهما روایت است كه فرمود: رسول الله ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ فرمود: &amp;laquo;هیچ ایامی نیست كه نزد الله سبحانه و تعالی عمل صالح محبوبتر از این ایام باشد&amp;raquo; گفتند: و نه حتی جهاد در راه الله؟ فرمود: &amp;laquo;ونه جهاد در راه الله مگر شخصی كه با جان و مال خود خارج شود و هیچ كدامشان را برنگرداند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
3- و الله سبحانه و تعالی می فرماید:&lt;br /&gt;
{ویذكروا اسم الله فی أیام معلومات} [الحج/28]&lt;br /&gt;
(ونام الله را یاد كنند در روزهای مشخص)&lt;br /&gt;
ابن عباس رضی الله عنهما در تفسیر آن می فرماید: یعنی روزهای دهگانه ذی الحجه )تفسیر ابن كثیر(&lt;br /&gt;
4- و از ابن عمر رضی الله عنهما روایت است كه رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ فرمودند: &amp;laquo;هیچ ایامی نیست كه عمل صالح در آن محبوبتر از این ایام دهگانه باشد؛ پس در آنها بسیار تهلیل (لا اله الا الله) و تكبیر (الله اكبر) و تحمید (الحمدلله) بگویید&amp;raquo; (رواه احمد)&lt;br /&gt;
5-سعید بن جبیر رحمه الله (راوی حدیث دوم از ابن عباس) وقتی كه دهه ذی الحجه داخل می شد تا جایی در عبادت تلاش می كرد كه توانش به پایان می رسید. (رواه الدارمی)&lt;br /&gt;
6-و همچنین ابن حجر عسقلانی در فتح الباری (شرح صحیح بخاری) می فرماید: و آنچه در فضیلت و برتری ایام ذی الحجه نمایان است جمع شدن تمام عبادات در این مناسبت است، یعنی: نماز و روزه و صدقه و حج، و در هیچ مناسبت دیگری چنین نیست.&lt;br /&gt;
آنچه در این دهه مستحب است&lt;br /&gt;
1-نماز: در این ایام زود رفتن برای انجام فرائض در مسجد و بسیار انجام دادن نوافل مستحب است زیرا این اعمال از بهترین قربات است. ثوبان ـ رضی الله عنه ـ می فرماید: شنیدم رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ فرمودند: &amp;laquo;بر تو باد بسیار سجده بردن برای الله كه تو سجده ای برای الله نمی بری مگر آنكه الله تو را به خاطر آن درجه ای بالا می برد و گناهی از گناهانت پاك می كند&amp;raquo; [رواه مسلم] و این فضیلت در تمام سال وجود دارد.&lt;br /&gt;
2-روزه: از هنیده بن خالد ـ رضی الله عنه ـ از همسرش رضی الله عنها از برخی از همسران رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ روایت می كند كه &amp;laquo;رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ نهم ذی الحجه و روز عاشورا و سه روز از هر ماه را روزه می گرفت&amp;raquo;. (رواه الامام أحمد و أبوداود و النسائی)&lt;br /&gt;
امام نووی رحمه الله درباره روزه ایام ده گانه می فرماید: روزه آن شدیدا مستحب است.&lt;br /&gt;
3-تكبیر و تهلیل و تحمید: به دلیل آنچه در حدیث ابن عمر رضی الله عنهما كه گذشت وارد شده است: &amp;laquo;پس در این روزها (روزهای دهگانه) بسیار تهلیل و تكبیر و تحمید بگویید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و امام بخاری رحمه الله می فرماید: &amp;laquo;ابن عمر و ابوهریره رضی الله عنهما در روزهای دهگانه وارد بازار می شدند و تكبیر می گفتند و مردم به تكبیر آنها تكبیر می گفتند&amp;raquo; و همچنین امام بخاری می فرماید: &amp;laquo;و عمر ین الخطاب ـ رضی الله عنه ـ در قبه اش در منی [منا] تكبیر می گفت و اهل مسجد تكبیر او را می شنیدند و تكبیر می گفتند و مردم در بازار به تكبیر آنها تكبیر می گفتند چنانكه منی بر اثر تكبیر آنها به لرزه می افتاد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و عادت ابن عمر این بود كه در این ایام در منا و قبل از نمازها و در رختخوابش و در خیمه اش و در مجلسش و در حال راه رفتنش تكبیر می گفت و مستحب این است كه تكبیر به صدای بلند باشد به دلیل فعل عمربن الخطاب و ابن عمر و ابی هریره رضی الله عنهما.&lt;br /&gt;
شایسته است ما مسلمانان این سنت فراموش شده را كه متاسفانه حتی در بین اهل صلاح و خیر به فراموشی سپرده شده است به مانند آنچه در میان سلف صالحمان بود زنده كنیم.&lt;br /&gt;
نحوه تكبیر:&lt;br /&gt;
الف) الله اكبر، الله اكبر، الله اكبر كبیرا&lt;br /&gt;
ب) الله اكبر، الله اكبر، لا اله الا الله، و الله اكبر، الله اكبر، و لله الحمد.&lt;br /&gt;
ج) الله اكبر، الله اكبر، الله اكبر، لا اله الا الله، و الله اكبر، الله اكبر، الله اكبر، و لله الحمد.&lt;br /&gt;
4-روزه روز عرفه: روزه عرفه به دلیل آنچه از رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ در مورد روزه عرفه به ثبوت رسیده است مستحب است. رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;(ثواب) آن را نزد الله اینگونه احتساب می كنم كه كفاره گناهان سال قبل و سال بعدش باشد&amp;raquo;. (رواه مسلم)&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;اما هر كس كه خود در صحرای عرفه حاضر باشد (یعنی خود حاجی باشد) روزه برایش مستحب نیست زیرا رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ در حالی كه روزه نبود در عرفه وقوف نمود.&lt;br /&gt;
5-فضیلت روز قربانی (نحر): بسیاری از مسلمانان از عظمت و بزرگی این روز غفلت می ورزند حال آنكه برخی از علما بر این نظر هستند كه این روز مطلقا بهترین روز سال است حتی بهتر از روز عرفه. ابن قیم رحمه الله می فرماید: (بهترین روزها نزد خداوند روز نحر است كه همان روز حج اكبر است). چنانكه در سنن ابی داود از رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ روایت است كه فرمود: &amp;laquo;بزرگترین ایام نزد الله سبحانه و تعالی روز نحر است و پس از آن روز قَرّ&amp;raquo; و روز قر یعنی روز استقرار در منی كه روز 11 ذی الحجه است و گفته شده است كه روز عرفه بهتر است زیرا روزه اش كفاره گناهان دو سال است و هیچ روزی نیست كه الله متعال به اندازه روز عرفه انسانها را از آتش آزاد سازد، به این دلیل كه در این روز الله متعال به بندگانش نزدیك می شود و به خاطر اهل موقف (حجاجی كه در عرفات وقوف كرده اند) به فرشتگان مباهات می كند. البته قول اول صحیح تر است زیرا حدیثی كه درباره آن آمده معارضی نداردو الله اعلم. و چه روز عرفه بافضیلت تر باشد و یا روز نحر، انسان مسلمان چه حاجی باشد چه مقیم باید در به دست آوردن این فضایل و استفاده از فرصت كوشا باشد...&lt;br /&gt;
چگونه به استقبال این مواسم خیر برویم؟&lt;br /&gt;
1- شایسته است انسان مسلمان با توبه نصوح و صادقانه و برگشتن از گناهان و ترك آنها به استقبال این مواسم خیر برود زیرا این گناهان است كه انسان را از فضل پروردگار محروم می سازد.&lt;br /&gt;
2- و هنچنین باید با عزم صادق و جدی برای اغتنام این فرصتها از این مواسم مبارك استقبال كنیم و هر كه با خداوند صدق ورزد، خداوند نیز او را تصدیق خواهد كرد:&lt;br /&gt;
{والذین جاهدوا فینا لنهدینهم سبلنا وإن الله لمع المحسنین} [العنكبوت/69]&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;(و كسانی كه در راه ما جهاد كردند، قطعا آنها را به راه های خویش هدایت خواهیم كرد)&lt;br /&gt;
پس برادر و خواهر مسلمان من! تا فرصت هست از آن استفاده ببر. خداوند ما را بر قدردانی این مواسم موفق بدارد.&lt;br /&gt;
برخی از احكام قربانی:&lt;br /&gt;
اصل در قربانی آن است كه برای زنده ها مشروع است چنانكه رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ و اصحابش برای خود و خانواده شان قربانی می كردند اما اینكه برخی از مردم گمان می كنند قربانی تنها برای مرده گان است، صحیح نیست و اصل و اساسی ندارد. اما قربانی برای اموات سه حالت دارد:&lt;br /&gt;
1-به همراه زنده گان برای آنها نیز قربانی شود؛ مانند اینكه فرد برای خود و خانواده اش قربانی كند و قصدش زنده گان و اموات باشد (خویشاوندانش كه فوت نموده اند) و دلیل این قول قربانی كردن رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ برای خود و خانواده اش است در حالی كه برخی از خانواده او فوت كرده بودند.&lt;br /&gt;
2-اینكه فرد بر اساس وصیت متوفی برایش قربانی كند.&lt;br /&gt;
3-اینكه فرد به عنوان صدقه برای اموات بطور مستقل قربانی كند: و این جایز است و فقهای حنبلی تقریر نموده اند كه ثواب آن به متوفی می رسد (با قیاس بر صدقه) اما آنچه مشخص است این نوع قربانی سنت و مستحب نیست به دلیل آنكه رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ برای هیچكدام از درگذشتگانش به طور خصوصی قربانی ننموده است. نه برای حمزه سید الشهداء ـ رضی الله عنه ـ و نه برای فرزندانش كه قبل از او وفات كردند و نه برای همسرش ام المومنین خدیجه رضی الله عنها كه از محبوب ترین همسرانش بود. و از هیچكدام از اصحاب پیامبر رضی الله عنهم اجمعین روایت نشده كه برای یكی از بستگان متوفی خود بطور خصوصی قربانی كرده باشند. همچنین كاری كه برخی از مردم انجام می دهند و سال اول وفات میت برایش قربانی می كنند و اعتقاد دارند كه در این قربانی نباید هیچ كس را شریك نمود، صحیح نیست. شاید اگر آنها می دانستند می توان از طرف خود و خانواده خود چه زنده گان و چه رفتگان قربانی نمود، چنین نمی كردند.&lt;br /&gt;
آنچه نباید شخص قربانی كننده انجام دهد:&lt;br /&gt;
اگر شخصی نیت قربانی كرد و ماه ذی الحجه (چه با رویت هلال و چه با تكمیل ماه ذی القعده) وارد شد؛ بر او حرام می شود كه موی خود را كوتاه كند و یا چیزی از آن كم كند و یا ناخن خود را بگیرد و یا هر چیزی از پوست خود بگیرد تا اینكه قربانی را انجام دهد زیرا در حدیث ام السلمه رضی الله عنها از رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ روایت شده كه ایشان فرمودند: &amp;laquo;اگر ماه ذی الحجه وارد شد و یكی از شما خواست قربانی كند، مو و ناخن هایش را نگه دارد [كوتاه نكند]&amp;raquo; [رواه أحمد و مسلم] و در لفظ دیگر حدیث: &amp;laquo;پس چیزی از مو و پوستش نگیرد تا قربانی كند&amp;raquo; و اگر در وسط دهه ذی الحجه نیت قربانی كرد از زمان نیت این كارها بر او ممنوع می شود و اگر قبل از نیت مو و یا ناخن خود را كوتاه كرده بر او اشكالی نیست.&lt;br /&gt;
حكمت این نهى: از آنجا كه قربانی كننده در برخی از اعمال نسك یعنی قربانی برای الله با حاجیان مشاركت كرده است در برخی از خصوصیتهای احرام نیز با آنها شریك می شود مانند ممنوع بودن گرفتن مو و ناخن و ... اما خانواده او می توانند این كارها را انجام دهند.&lt;br /&gt;
و این حكم خاص قربانی كننده است اما این حكم به خانواده او و كسانی كه او از طرف آنها قربانی می كند تعلق نمی گیرد زیرا رسول الله ـ صلی الله علیه و سلم ـ می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;هر كدام از شما كه خواست قربانی كند ...&amp;raquo; و همچنین از او روایت شده كه از طرف اهل بیتش قربانی می كرد اما روایت نشده به آنان دستور امساك از این موارد را داده باشد.&lt;br /&gt;
اما اگر شخصی كه نیت قربانی دارد چیزی از مو یا ناخن و یا پوستش گرفت گناهكار است و باید به سوی الله توبه نماید و دیگر تكرار نكند و كفاره ای بر او نیست و هیچ امری بر او تعلق نمی گیرد. و اگر از روی فراموشی یا جهل یا بدون قصد این امور از او صورت گرفت گناهی بر او نیست. اما اگر مجبور شد به علتی این امور را انجام دهد گناهی بر او نیست مثلا اگر ناخنش شكست و راهی جز كوتاه كردن آن نبود یا برای مداوای زحم موجود در سر مجبور به تراشیدن سر شد، و اینگونه موارد...&lt;br /&gt;
كتابخانه عقیده برای حجاج محترم حج مقبول و بخشش گناهان و برای عموم مسلمانان توفیق عبادت و هدایت، از بارگاه رب العزت والجلال تمنا دارد.&lt;br /&gt;
وصلی الله علی سیدنا ونبینا محمد وعلی آله وصحبه اجمعین&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>ارمغان حجاز - در رکاب زائران بیت الله</title>
<link>http://qalamlib.com/news/334</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;p&gt;ارمغان حجاز&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در رکاب زائران بیت الله&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;داستانی گفتم از یاران نجد&lt;br /&gt;
نکهتی آوردم از بستان نجد&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;***&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مسکن یار است و شهر شاه من&lt;br /&gt;
پیش عاشق این بود حب الوطن&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;***&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;سرود رفته باز آید که ناید&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;نسیمی از حجاز آید که ناید&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;***&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;به فرمان پروردگار ابرمرد توحید و یکتاپرستی حضرت ابراهیم خلیل &amp;ndash; علیه السلام &amp;ndash; کعبه منسوب به پروردگار را که قبله سینه‫ها و جهت حرکت دلهاست بنا نهادT تا تمامی یکتاپرستان تاریخ از روز خلیل تا به روز دمیدن در سور &amp;ndash; بوق &amp;ndash; و دیدار پروردگار جلیل بدان سوی روی آورده، بیعت و صداقت خود با خالقشان را با این خانه تواضع به نمایش گذارند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بیعت با کعبه...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;قبله ایمان...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خانه خداوند رحمان...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مرکز دایره محبت و شوق عاشقان بهشت...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مغناطیس دلهای شیفته حق، که از چهارسوی جهان آنها را بسوی خود جذب می‫کند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کعبه چون قلب، مؤمنانی که زنگ گناهها و لغزشها آنها را اکسیده کرده بسوی دهلیزهای خود می‫کشد، و طی یک برنامه آلایشی آنها را پاک کرده، از چاله‫های شهوت به کرانه‫های عفت ملکوتی، و از سستی و افتادگی به حرکت و سازندگی، و از منیت و خودپرستی به جهان بینی و یکتاپرستی، و از خواب و خیال به امید و برنامه، و از چشم دوختن به دیگران به چشم گشودن بر دیگران، از هیچ بودن به همه چیز شدن، و از تابعیت و تقلید به رهبریت و تحریک، بالا برده بار دگر در کالبد جهان اسلام پمپاژ می‫کند تا زندگی و سلامت جسم را حفظ نمایند، و جسد دنیای توحید را توان زیستن و ادامه حیات باشد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کعبه در سمت قلب مؤمن، و طواف مخالف حرکت عقربه‫های ساعت. درست چون حرکت همه کائنات از ذره تا بزرگترین ستاره و سیاره.. گویا مؤمن می‫گوید: در بندگی خداوند همه کائنات شریکند و همه در حال عبادت. قلب مؤمن بسوی کعبه می‫نگرد تا دریابد؛ دعای قلب غافل را نزد پروردگار هیچ ارزشی نیست،&amp;nbsp;&amp;nbsp;و جایگاه واقعی عبادت قلب است، درست همان چیزی که رسول هدایت &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; به ما آموختند:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;إن الله لا ینظر إلى صوركم وأموالكم ، ولكن ینظر إلى قلوبكم وأعمالكم &amp;raquo;. رواه مسلم .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خداوند به شکل و شمایلتان و مال و ثروتتان توجه نمی‫کند، بلکه به قلبها و کارهایتان می‫نگرد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;عبادتی که برخواسته از قلب انسان و تنها برای رضایت رحمان باشد، آسمانها را شکافته فورا به درگاه احدیت وارد می‫شود. و عبادتی که در پی نام و نشان، و یا پست و مقام، و یا برای ارضاء شهوتی نفسانی، یا آز و طمعی حیوانی باشد چون گهنه پارچه‫ای گند به سر صاحبش زده خواهد شد!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مکعبی سربلند، و آغوشی باز به شکل هلال که تاریخ گواهی می‫دهد که از آن خانه حق است و بنا به دستور قدر بدین شکل بازگذاشته شده تا مؤمنان را در آغوش گیرد و آنرا &amp;quot;حجر اسماعیل&amp;quot; ‫نامند. آغوشی که اسماعیل را در دامن خود پرورده، مؤمنان را به سینه خود می‫فشارد و در گوشهایشان زمزمه می‫کند: چون اسماعیل باشید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اسماعیل؛ فرزند بحق توحید ابراهیمی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اسماعیل؛ زاده ایمان و پرورده توحید و یکتاپرستی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اسماعیل؛ آن نوجوانی که با رشادت و دلیری خود سر بشریت را بالا گرفت..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;نوجوانی که با اراده واختیار فولادینش گردن طاعت خویش در زیر تیغ بران دستور الهی نهاد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آه!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;عجب حادثه‫ای بود و عجب امتحان و آزمایشی!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آزمایشی که کوههای سترگ در مقابلش خاکستر می‫شوند، و آسمان و زمین توان تحملش را ندارند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ابرمرد توحید؛ ابراهیم دوست و خلیل رب جلیل بنا به اشاره‫ای گذرا از سوی حق ساتور تیزش را بر گردن جگرگوشه‫اش - آنهم چه چگر گوشه‫ای؟!.. اسماعیلش که پس از هشت دهه زاری و تضرع و اشک بدان رسیده بود &amp;ndash; می‫کشد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چاقوی تیز از فرط حیرت مات و مبهوت مانده، توان بریدن از او سلب گشته.. برایش باور کردن آنچه روی می‫دهد ناممکن شده، حیران است چه کند!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;همین فضای کعبه نظاره‫گر تمامی آن ماجرا بود، و آنرا در گوش هر مؤمنی که به حجر اسماعیل درمی‫آید زمزمه می‫کند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;از هر سوی حرم بوی توحید ابراهیمی به مشام می‫رسد، هر لحظه امواج همیشه زنده صدای پرطنین ابراهیم از فضای حرم به چهارسوی جهان فرستاده می‫شود.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چون ابراهیم خانه حق را بنا نهاد، پروردگار بدو امر نمود تا مردم را بسوی خانه توحید و رمز یکتاپرستی برای ادای مناسک و عبادت حج فرا خواند؛&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;وَأَذِّن فِی النَّاسِ بِالْحَجِّ یَأْتُوكَ رِجَالًا وَعَلَىٰ كُلِّ ضَامِرٍ یَأْتِینَ مِن كُلِّ فَجٍّ عَمِیقٍ &amp;raquo;﴿الحج/٢٧﴾&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;{ به مردم اعلام کن که، پیاده، یا سواره بر شتران باریک اندام (ورزیده و چابک و پرتحمّل، و مرکبها و وسائل خوب دیگری) که راههای فراخ و دور را طی کنند، به حجّ کعبه بیایند (و ندای تو را پاسخ گویند) }.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و از آنروز تا به امروز و تا بروز قیامت امواج صوتی ابراهیم با اکسیژن هوا آمیخته شده از راه شش وارد قلب مؤمنان گشته عشق و محبت زیارت خانه حق را در آنها می‫کارد و آنها را بسوی کعبه و قبله حق دعوت می‫کند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;هزاران هزار زن و مرد، پیر و جوان، سیاه و سفید، از چهارسوی جهان در هر لحظه بدور مغناطیس قلبها در حال طواف و چرخشند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;طوافی که با اذان ابراهیم شروع شده تا دمیده شدن سور اسرافیل و برپایی قیامت جریان خواهد داشت.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مؤمنان کعبه آمال و خانه عشق و ایمان خود را در کنار قلبهایشان قرار داده رابطه‫ای محکم و پرمعنا با پروردگارشان برقرار می‫کنند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خدایا، بار الها؛...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بنگر بدین مؤمنان صادق، اینان بدرستی فهمیده‫اند که درگیر و دار و جیغ و داد زندگی قلبهایشان را گم کرده‫اند، و حال آمده‫اند در اینجا آنرا می‫پالند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;یا اینکه احساس کرده‫اند زنگ کبود گناهها و لغزشها و کوتاهیها بر دلهایشان انباشته شده، حال آمده‫اند تا با ریختن اشکهای پشیمانی و توبه بر زنگهای دل آن را سنباده کشند!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;عجب صفایی است در اینجا!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;حرم حرم خداست و بندگان بندگان او، ایمان و توحید در کمال اخلاص و صداقت به شیوه ابراهیم و فرزندش محمد مصطفی &amp;ndash; صلی الله علیهما و سلم -...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اخلاص و صداقت با پروردگار را عجب حکایتی است و مکانتی در نزد او!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پیرزنی پریشان و خسته تنها و تنها برای کسب رضایت الهی، با ارداه و اختیار خود به دستور او تن داده، در این صحرای بی آب و علف به امید یافتن قطره آبی بدینسو و آنسو می‫دود. این اخلاص و صداقت آنچنان در درگاه احدیت قبولیت می‫یابد که حرکت او رژه ایمان می‫شود برای همه مؤمنان تا بروز قیامت!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;حقا که عجب جایگاهی است اخلاص و تجرد و ایمان راستین را!...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خانواده حضرت ابراهیم رمز یکتاپرستی و اخلاص آنچنان مقامی نزد پروردگارشان کسب کرده‫اند که نامشان تا ابد بر زبانهاست، درست آن چیزی که حضرت ابراهیم آرزویش را داشت: &amp;laquo;وَاجْعَل لِّی لِسَانَ صِدْقٍ فِی الْآخِرِینَ &amp;raquo;﴿الشعراء/٨٤﴾&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;{و برای من در میان امّتهای آینده، زبان صدق (و ذکر خیری) قرار ده!}&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و یادشان با عرق مؤمنان بر خاطره تلخ تاریخ نقش بسته. هر جا کسی از آنها دوید مؤمنان گام به گام پشت سر او و بیاد او می‫دوند، و هر جا آرام گام زد مؤمن در پی او آرام گام می‫زند. آنجایی که سنگ ریزه‫ای به رمز ستیز با اهریمن پرتاب کردند ما سنگ ریزه‫ای درست به حجم سنگ آنها پرتاب می‫کنیم، و چون ابراهیم برای رسیدن به رضایت الهی گوسفندی قربان می‫کنیم.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;عجب پاداشی است اخلاص را!...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;این جزئی است بس کوچک از پاداش دنیوی ابراهیم در صحیفه کائنات، او را چه پاداشی است در روز قیامت خود خدای ذی الجلال ‫داند و بس!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مؤمن در می‫یابد نزد پروردگارش مشکی است که هر چند در مقابل او متواضع‫تر و خاکسارتر و مخلصتر باشد بهمان اندازه بوی عطراگینش نام خوش او را بر صفحات تاریخ خواهد نگاشت. مگر نه این است که خداوند خود به فرزند ابراهیم؛ حضرت خاتم &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; فرمودند:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo; وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ &amp;raquo;﴿الشرح/٤﴾&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;{و آوازه و نام تو را بلند ساختیم!}&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و نه این است که تا روز قیامت منادی حق نام او را در کنار نام خالق یکتا جار می‫زند:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;أشهد أن لا إله إلا الله... أشهد أن محمدا رسول الله...&amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و مگر نه این است که در هر تشهد در کنار تحیات الهی سلام و درود است بر پیامبر خاتم و بر بندگان صالح و نیکو سرشت و پارسا از پیروان او، و دعای صلوات و برکات است بر محمد و آل محمد آنچنان که بر ابراهیم و آل ابراهیم بود؟!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;التحیات لله, والصلوات والطیبات, السلام على النبی ورحمة الله وبركاته, السلام علینا وعلى عباد الله الصالحین أشهد أن لا إله إلا الله, وأشهد أن محمدا عبده ورسوله. اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّیْتَ عَلَى إِبْرَاهِیمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِیمَ إِنَّكَ حَمِیدٌ مَجِیدٌ ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِیمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِیمَ إِنَّكَ حَمِیدٌ مَجِیدٌ&amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;مقام ابراهیم&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در کنار کعبه امیدها و رمز پیوستن مخلوق به خالق یکتا &amp;quot;مقام&amp;quot; یادگاری دیگر از ابراهیم است..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مقام ابراهیم بیانگر خاطره‫هایی است بس عمیق در تاریخ ایمان سترگ، و دعوتی است گویا و روشن..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;جای پای ابراهیم...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;گویا قدر با حفظ اثر قدمهای امام موحدان تاریخ خواسته پیام او را به زائران خانه ملکوتی حق تزریق کند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مقام ابراهیم یا جای قدمهای مبارک او به صراحت به میهمانان خانه حق می‫گوید: ره سعادت تنها در گام نهادن بر جای پای ابراهیم است..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چون ابراهیم باید تبر بدست گیری و بتهای شهوت و آز و طمع و دل بستن به غیر خدا را بشکنی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و چون ابراهیم باید زاد همت بدست گرفته در راه رسیدن به حقیقت و رساندن پیام حق در زمین خدا قدم زنی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و چون ابراهیم کعبه توحید و یکتاپرستی در دلت بنا کنی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و چون ابراهیم ساتور تیزت را بدست گرفته هر آنچه محبتش ممکن است در دلت با محبت حق جای گیرد &amp;ndash; چون مال و منال و منصب و عیال، و دل بستن به دنیای فانی &amp;ndash; را سر ببری..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مقام ابراهیم پیامی است گویا از پیراسته زیستن، آزاده بودن، رها شدن از تمامی قید و بندهای دنیایی و بال و پر گشودن بسوی هر آنچه رضایت و خشنودی حق بدان وابسته است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پیام ابراهیم پیام مرد بودن و مرد زیستن و چون جوانمردان به پیش رفتن، و با سری بلند در مقابل پروردگار حاضر شدن و کسب رتبه &amp;quot;خلیل الله&amp;quot; بودن است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;صد عجب از زائرانی که با چشمان پف کرده و دل غافل به جای پای ابراهیم خلیل می‫نگرند، و اثر قدم بر سنگ خارا آنها را به شگرف وا می‫دارد، و پیام رسای آنرا نمی‫شنوند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آه!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آه، از این زائران فارغ البالی که از خانه خدا تنها با چند سجاده و تسبیح چینی به خانه‫هایشان برمی‫گردند!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آه!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آه، از این زائران غافلی که تا ریشه در خاک غفلت فرو رفته‫اند و توان دیدن درخشش سیمای ابراهیم در آسمان مکه را ندارند!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و خوشا بحال آن عاشقان دلباخته‫ای که در پی ابراهیم شدن و در پی لبیک گفتن به ندای رسول خاتم &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; پا بدین دیار می‫نهند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و صد اسفا که در بین این ملیونها زائر غافل محمدها و ابراهیمها بسیار اندکند...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;رکن یمانی&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;رکن یمانی همان دست دراز کعبه است که نا امیدی را هرگز نمی‫شناسد. دست دراز به سوی همه کس، دست درازی که به همه گناهکاران و همه جنایتکاران و همه غافلان می‫گوید:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;درگه ما درگه نا امیدی نیست... صدبار گر توبه شکستی باز آی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مؤمنان دست راست خود را بر رکن یمانی کشیده در گوش کعبه زمزمه کنان می‫گویند:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بسم الله.. الله اکبر!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;سرآغاز هر کارم و ابتدای هر همت و تلاشم با نام اوست و از برای او و در راه او، و امیدم تنها بدوست که او &amp;quot;الله&amp;quot; اکبر است!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پروردگار بزرگی که بزرگتر از او نیست و من با امید بدو می‫توانم کارهای بزرگ انجام دهم، و می‫توانم چون ابراهیم خلیل و محمد مصطفی بزرگ شوم.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مؤمنان با دست دادن به رکن یمانی با کعبه بیعت می‫کنند تا چون پیامبران و رهروان راستین حق به پیش روند و در راه خدا از هیچ دریغ ننمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در بین رکن یمانی و حجر الأسود تنها یک دعا را می‫شنوی:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;...رَبَّنَا آتِنَا فِی الدُّنْیَا حَسَنَةً وَفِی الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ &amp;raquo;﴿البقرة/٢٠١﴾&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بار الها؛... در دنیا به ما نیکی و سعادت ارزانی دار و در روز قیامت ما را خشنود و سعادتمند قرار داده از آتش سوزان جهنم برهان!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;یا رب!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;عجب دعایی است!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چه پژواک پر معنایی و چه طنین با صفایی دارد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مؤمن پس از بیعت با کعبه و دست دادن با خانه خدا، به پیش می‫رود، و بسوی ابراهیم شدن قدم می‫نهد، و با اولین گامش دنیایش را با آخرت گره می‫زند و از پروردگار یکتا سعادت و خوشبختی و خیر دو جهان را خواسته، از او و تنها او می‫خواهد که از آتش سوزان جهنم نجاتش دهد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مؤمن دریافته حرکت از اوست و برکت از خدا...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;حال مؤمن بدرستی درک نموده، باید چون ابراهیم کمر همت بالا زند و چون رسول خاتم &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; آنچنان در راه هدایت ملتش جان کند که قرآن را به دلسوزی و شفقت وا دارد:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;فَلَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَّفْسَكَ عَلَىٰ آثَارِهِمْ إِن لَّمْ یُؤْمِنُوا بِهَـٰذَا الْحَدِیثِ أَسَفًا&amp;raquo; ﴿الکهف/٦﴾&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;{نزدیک است خویشتن را در پی (دوری گزیدن و روی گردانیدن) ایشان (از ایمان آوردن، دق مرگ کنی و) از غم و خشم این که آنان بدین کلام (آسمانی قرآن نمی&amp;zwnj;گروند و بدان) ایمان نمی&amp;zwnj;آورند (خود را) هلاک سازی.}&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;حجر الأسود&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;حلقه نقره‫ای براقی که در وسط آن خمیره‫ قهوه‫ای مایل به سیاه که در دل آن پاره‫های کبود &amp;quot;حجر الأسود&amp;quot; است، بیانگر تاریخی بس تلخ از کشمکش حق و باطل است. باطلی که در شیعیان قرمطی تجلی کرده بود. پس از خونریزیهای وحشتناک و قتل عام حاجیان خانه خدا &amp;quot;حجر الاسود&amp;quot; را ربوده خورد کردند. گرچه حقد و کینه این طایفه مندرس همچنان در سینه‫های بدعتگران و مذهب فروشان می‫جوشد با این وجود &amp;quot;حجر الأسود&amp;quot; پیامش را با صدای رسا می‫رساند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;حجر الأسود یا سنگ سیاه تنها هدیه ملموس بهشت در زمین.. هدیه سفیدی که انسان رویش را سیاه کرد!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;رفیقی که با انسان از بهشت به زمین آمد، از همراه بی‫وفایش جز بی‫مهری هیچ ندید!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;سنگی بود سفیدتر از برف که بهشت به زمین فرستاد، و بر اثر گناهان بنی‫آدم هر روز سیاه و سیاهتر می‫شود. تصویری زنده از قلب انسان، اثر هر گناه بر قلب آدمی نقطه‫ای است سیاه، تا بدانجا که قلب انسان سیاه و کبود و سخت می‫شود چون سنگ خارا..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ستیز بین گناه و توبه؛ یا زمختی و زنگهای گناه بر قلب و شستشوی آن با اشک ندامت و بازگشت بسوی خدا حکایت نفس لوامه است که حجر الأسود رمزی بهشتی از آن است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;گویا نمادی است برای سنجش میزان سقوط انسان در دره‫های هلاکت و نافرمانی و بین بازگشت بسوی احدیت.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دماسنج حجر الأسود بیانگر دمای آدمیت انسان است! بهر اندازه که انسان به ضمیر و وجدان آدمی و فطرت و سرشت بهشتی خود نزدیکتر شود بهمان اندازه این سنگ بهشتی به اصالت خود و به رنگ سفید خود نزدیکتر می‫گردد، و هر اندازه بسوی گناه و پستی و رذالتها روی کند بهمان اندازه چهره حجر الأسود را سیاه و سیاهتر می‫کند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;گویا حجر الأسود که تماما به شکل چشم می‫ماند، چشم بینای کعبه است که چون دستگاه تصویر از یک یک زائران عکسی گرفته حضور و صداقت و ایمان آنها را با تصویری زنده در نامه اعمالشان ثبت می‫کند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مؤمن چون نامه اعمالش را در روز جزا بدست راستش می‫گیرد، و زیارت خانه خدا با صدای لبیک گفتنش، همراه با تصویر زنده می‫بیند از فرط شادی دست و پایش را گم کرده داد می‫زند:&amp;laquo;... هَاؤُمُ اقْرَءُوا كِتَابِیَهْ&amp;raquo;﴿الحاقة/١٩﴾ ـ آهای مردم بیائید نامه اعمال مرا بخوانید!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;عجب صفا و جمال و جلالی دارد مشاهده این صحنه زیبا..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آن لبخند گشاد مؤمن..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و آن اشکهای شادی که بر گونه‫هایش سرازیر است..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و آن جهش برق خوشحالی که در چشمانش هویداست..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و آن چهره نورانی، همه سختیهای راه و همه دشواریهای تحمل ایمان و همه دربدریها و هجرتها و شکنجه‫ها و سایر بدبختیها در یک لحظه بکلی از خاطره او محو می‫شوند و کالبد او لبریز شادی و خوشبختی و سعادت &amp;ndash; آنهم سعادت و شادی بهشتی &amp;ndash; می‫گردد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خوشا بحالت ای مؤمن رستگار و ای خوشبخت سعادتمند...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;هنوز گرمی دستان پر لطف پیامبر اکرم &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; را بر حجر الأسود لمس می‫کنی. گویا همین دیروز بود که قبیله‫های قریش بر سر افتخار نصب &amp;quot;حجر الأسود&amp;quot; بروی همدیگر شمشیر کشیده، دستهایشان را تا آستین در کاسه خون فرو برده بودند، و هر یک آرزو داشت این افتخار تاریخی را بدست آورد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ولی خداوند خواست این هدیه از آن رسول خاتمش گردد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;رسول امین از در مسجد وارد شد و قریشیان به اتفاق داد زدند که جوان راستگوی امانتدار آمد، هر آنچه ایشان فیصله کند را قبول داریم.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;محمد جوان؛ امین و حکیم و محبوب مکه &amp;quot;حجر الأسود&amp;quot; را بر پارچه‫ای نهاد. و هر قبیله گوشه‫ای از آنرا گرفته بلند کردند و ایشان با دستهای مبارکشان آنرا بر روی دیوار کعبه نصب کردند، و امروز چون چشم بینای کعبه شاهدی بر اخلاص و ایمان و صداقت مؤمنان راستین است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;زائر کفن پوش خانه خدا که در گردابی از بشریت رنگارنگ فرو رفته در حال طواف است خود را در می‫یابد. گویا قیامت به پا گشته و انسان آغشته به گناه حقیقت را دریافته از کرده خود پشیمان گشته داد برآورده:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo; ... رَبِّ ارْجِعُونِ * لَعَلِّی أَعْمَلُ صَالِحًا فِیمَا تَرَكْتُ&amp;nbsp;&amp;hellip;&amp;raquo;﴿المؤمنون/99-100﴾ { ... پروردگارا! مرا (به دنیا) باز گردانید* تا کار شایسته&amp;zwnj;ای بکنم و فرصتهائی را که از دست داده&amp;zwnj;ام جبران نمایم.}&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بارالها.. مرا بازگردانید تا من شرمسار گناهکار، جبران ما فات کنم. حال که واقعیت را دریافته‫ام چنان خواهم شد که تو می‫خواهی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و گویا خداوند خواسته‫ی او را برآورده کرده، این همان مرده است که با کفن خود از قبر سر بر آورده لبیک گویان بسوی خانه حق و کعبه‫ی بازگشت روی آورده:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;لبیك اللهم لبیك، لبیك لا شریك لك لبیك، إن الحمد والنعمة لك و الملك لا شریك لك&amp;raquo;...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پروردگارا.. ندای تو را استجابت کرده به دعوت تو لبیک گفته بسوی تو آمده‫ام. گواهی می‫دهم و جار می‫زنم در جهان که هیچ شریکی نیست مر تو را، تمامی حمد و سپاس و ثنا از آن توست، تمامی فضل و من و نعمتهای بیدریغ از جانب توست، و تو همه جهان را مالک و فرمانروایی و هیچ همراه و شریکی نیست مر تو را.. ای یگانه معبود من، من ناچیز بسوی تو ای همه چیز آمده‫ام، مرا پذیرا باش...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در بین سیل انسانهای سر برآورده از گورستان غفلت، و نجات یافتگان از دنیای پر زرق و برق شیطانی، و در بین موج خروشانی که از باتلاق مناصب و نامها و جاهها و شخصیتهای کذائی جان سالم بدر برده‫اند ، همه با هم برابرند و هیچکس را بر دیگری برتری نیست. زن و مرد، شاه و گدا، دارا و نادار، رئیس و مرؤوس، کفن پوشان و اشک ریزان در تلاشند خود را به خالق خود نزدیک و نزدیکتر سازند...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در میان افواج پی در پی سیاهی زمخت از چپ به تو برمی‫خورد، و پیرمردی گوژپشت عصا بدست از راست، زنی زائیده قرن پیش با چشمان کم سویش از پشت تو را به جلو هل می‫دهد و جوانکی رنگ پریده و اشک ریزان چشم به کعبه دوخته از جلو راهت را گرفته.. هر کسی در حال و هوای خویش غرق است و دیگری را هیچ نمی‫بیند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کسی به تو نمی‫گوید: ببخشید سرورم.. شما بفرمائید.. خیلی خوش آمدید.. جناب آقا.. حضرت عالی ...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;نه کسی می‫داند که شما دکترید یا مهندس، آیت الله‫اید یا حجت الإسلام.. حامیی‫ یا مولانا.. طالب علمید یا جاهل معرفت.. عاقلید یا ابله.. چوپانید یا رهبر.. اینجاست که درمی‫یابی تو انسانی و بس..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در می‫یابی در مسیر بشریت قیمت و بهای تو در انسانیتت است، نه در پستها و صفتها و نامهای کذائی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;نه آیت بودن و نه حجت شدن و نه رئیس و رهبر و وزیر و شاه بودن بدادت می‫رسد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;انسانی ناچیز و بنده‫ای بیش نیستی، چون مورچه‫ای کوچک در سیل موریان.. تنها ارزش و بهای تو در میزان بندگی، و با درجه و قرب و نزدیکی به پروردگارت وزن می‫شود. هر چه به خدایت نزدیکتر و در نزد او عزیزتر باشی بهمان اندازه برتر و ولاتری..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بار خدایا!...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در هر یک از اشواط هفتگانه طواف به دور رمز یکتاپرستی، کعبه حق و قبله توبه، خوانی از خودیها ذوب می‫شود و بنده پله‫ای به خدایش نزدیکتر...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;با پایان یافتن دور هفتم وقتی دستت را بسوی &amp;quot;حجر الأسود&amp;quot; بلند کرده داد می‫زنی: &amp;quot; بسم الله.. الله اکبر&amp;quot; اشکهای اخلاص بر گونه‫هایت جاری می‫شوند و احساس می‫کنی انسانی دیگر شده‫ای...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;موجودی ملکوتی از دیار پرنیان..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;از اعماق وجودت داد می‫زنی: &amp;quot;بسم الله&amp;quot; بنام آفریدگارم؛ الله ذوالجلال، &amp;quot;الله اکبر&amp;quot; خدایم بزرگتر و والاتر و برتر و اکبر است و هر آنچه غیر از اوست دون است و هیچ..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و دست راستت که بلند شده با خانه کعبه بیعت می‫کند و می‫گوید: و بفرما که فرمان برم.. چه کنم تا به حق رسم؟!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در کنار در خانه معبود، آنجا که &amp;quot;ملتزم&amp;quot; می‫نامندش دستهایت را گرفته آویزان می‫شوی، و از ته دل با خدایت راز و نیاز کرده، از آنچه بوده‫ای بازگشته، بسوی آنچه او از تو می‫خواهد چشم دوخته‫ای. از خدای بی‫همتا و خالق یکتایت که او را به حق الآن شناخته‫ای همت می‫خواهی و مردانگی، از او و تنها او کمک می‫ستانی و توفیق می‫طلبی.. صداقتت در بندگی را به نمایش می‫گذاری، و الفبای اخلاصت را با اشک ریزان چشمانت بر چهره پریشانت می‫نگاری..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;سپس در پشت مقام ابراهیم دو رکعت نماز خوانده، در آن از کفر و کافران بیزاری جسته به یگانگی و بی‫همتایی پروردگارت شهادت می‫دهی، از آب زمزم سیراب شده نفسی آرام می‫کشی. اینجاست که احساس می‫کنی ندایی از بلندای وجود تو را می‫خواند:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ای بنده ما، مرحبا به تو که خود را شناختی.. راه ما راه سعی است و تلاش و سازندگی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;از خواب و خیال و دل بستن به خرافات و نیروهای خارق العاده دل بر کن که مسیر ما مسیر واقعیتهاست، مسیر تلاش و کارزار و سعی ... میوه و ثمره آرزوهایت به تلاش و سعی و کوشش و عرق پیشانیت بسته شده..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ای بنده ما برو بسوی مسعی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مسعی&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;laquo;إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَائِرِ اللَّـهِ&amp;nbsp;ۖ فَمَنْ حَجَّ الْبَیْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَیْهِ أَن یَطَّوَّفَ بِهِمَا&amp;nbsp;ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَیْرًا فَإِنَّ اللَّـهَ شَاكِرٌ عَلِیمٌ &amp;raquo;﴿البقرة/١٥٨﴾&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;quot;&amp;laquo;صفا&amp;raquo; و &amp;laquo;مروه&amp;raquo; از شعائر (و نشانه&amp;zwnj;های) خداست! پس کسی که حجّ بیت کند یا عمره به جا آورد نیست بر او باکی که طواف کند بر آنها (و سعیِ صفا و مروه انجام دهد. و هرگز اعمال بی&amp;zwnj;رویّه مشرکان، که بتهایی بر این دو کوه نصب کرده بودند، از موقعیّت این دو مکان مقدّس نمی&amp;zwnj;کاهد!) و کسی که خواستار نکوئی شود همانا خداست سپاسگزار دانا&amp;quot;.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دو کوه صفا و مروه چون دو استاد بزرگ تاریخ در کنار کعبه مشغول تربیت و تعلیم زائران خانه خدایند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;به هر زائری می‫گویند که راه رسیدن به موفقیت سعی است و تلاش.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;قصه هاجر را به عنوان مثالی گویا برای روشنتر کردن موضوع بیان می‫دارند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;زنی تنها با نوزادی تشنه در صحرای بی آب و علف.. صحرایی با امواج هولناک شن و با کوههای سیاه خشک. هیچ صدایی نیست مگر صدای وزوز باد گرمی که کمر ریگهای تفته را می‫خاراند، و هیچ بویی نیست مگر بوی وحشت و تنهایی.. و گریه نوزاد تشنه که با مرگ دست بگریبان است به وحشت صحرای خاموش سنگدل افزوده..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مادری که لحظاتی پیش با ایمانی بسیار قویتر از کوههای خارا به رادمرد توحید؛ پیامبر خدا ابراهیم بزرگ گفته بود: برو در پناه خدا، و به پشتت منگر و هیچ دلهره‫ای بدلت راه نده که خداوندی که به تو امر فرموده ما را در این صحرای خشک رها کنی، هرگز ما را ضایع نخواهد کرد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بنگر این قلب شیر زن با خدا را.. با این ایمان سترگ.. به گوشه‫ای نخزیده تا دست زاری به درگاه حق بلند کند و بگوید: بار الها آبی برسان ما را..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خوب بدو بنگر...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;لبهایش لبریز دعاست..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;گامهایش در پی آب او را از صفا به مروه می‫کشاند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چشمهایش را به نوزادش دوخته نشاید درنده یا خزنده‫ای او را ببلعد.. و چون به ته دره می‫رسد دوان دوان خود را به بیرون می‫کشد تا لحظه‫ای نوزادش از تیر رس دیدش پنهان نگردد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;از صفا به مروه و از مروه به صفا...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;سفری پیاپی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دوان دوان در دره دلهره‫ها و ترس..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;هفت بار تمام..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;امید بخداست و تنها خدا..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;سعی و تلاش آموزه حرکت از جانب بنده..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;از تو حرکت از خداوند برکت و گشایش..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;به یک آن!...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دعای حاجت هاجر پرده آسمان می‫درد، و استجابت الهی دل زمین می‫شکافد و آب زمزم &amp;ndash; دنیای نیاز و حاجت &amp;ndash; در زیر قدم اسماعیل صبر و ثبات فوران می‫کند!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چرا در زیر قدمهای نوزاد؟!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;این هم شاید رمزی است دیگر برای هر بنده؛..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دنیا هر چند نیاز مبرمت گردد، باز هم نباید جایش بالاتر از زیر قدمهایت باشد. دنیا را زیر پایت بینداز، و اجازه نده در قلبت رسوخ کند. دنیا نیاز هر انسان است، و مؤمن با دنیا در ستیز نیست، ایمان و دنیا با هم تضادی ندارند، تنها ایمان جایگاه دنیا را زیر پای بنده مؤمن پارسا و زاهد قرار می‫دهد نه در دل او و نه در خاطر و حواس او..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پس از آنکه بنده همه درهای سعی را کوبید، و همه اسباب و راههای رسیدن به هدف را تجربه کرد، صداقت و اخلاص و توکلش پخته گشت، گشایش حق دست او را می‫گیرد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چشمه‫ی آبی زیر پای نوزاد تشنه برون می‫جهد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مادر پریشان و حیران و دل سوخته خوشحال و شادان خود را به کودک گریانش می‫رساند و &amp;quot;زمزم زمزم&amp;quot; گویان ریگها را از اینسو و آنسوی کنار می‫زند. از فرط شادی و خوشحالی در گوش آب زمزمه می‫کند &amp;quot;زمزم زمزم&amp;quot;: آرام .. آرام..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و از آنروز تا به امروز هدیه هاجر و ارمغان زندگی اسماعیل همچنان آرام آرام و زمزم زمزم کنان حکایت عرق پیشانی همت مادر مؤمن زحمتکش و پر سعی و تلاش را برای زائران خانه حق تعریف می‫کند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در زمزم رمزی است از وراثت حقیقی پیامبر خاتم از پدرش ابراهیم بت شکن. زمزم هدیه پروردگار بود به اسماعیل؛ رمز اطاعت و از خودگذشتگی و جان فشانی.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مردم در کنار زمزم این خانواده را شناختند و در کنار زمزم از سرچشمه ایمان آنها سیراب شدند. بعدها که اهریمن ایمان را ربود چشمه بزیر خاک رفت تا اینکه با اشاره‫ای از جانب تقدیر الهی پدر بزرگ پیامبر؛ عبدالمطلب، آنرا یافت و بار دگر زمزم بر جهانیان لبخند زد و به وارثان ابراهیم بازگشت.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و از آن روز است که عبادت حج و راه و رسم ابراهیمی و بت شکنی و توحید و یکتاپرستی او به فرزند بر حقش پیامبر خاتم رسید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;عارفان آب و جوشش آنرا رمزی از علم و معرفت تلقی می‫کنند. و زمزم نشانه‫ای است دیگر از این معنا. راه و رسم و دیانت حضرت ابراهیم و رسول خاتم؛ حضرت محمد مصطفی &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; بر علم و معرفت بنا شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;برکت زمزم خود معجزه‫ای است که علم و دانش و همه عقلها را به تفکر وا می‫دارد؛ چشمه‫ای کوچک در همه زمانها توان سیراب کردن زائران خانه خدا را داشته و دارد!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;زائر که حال بکلی انسانی دیگر شده در بین صفا و مروه در می‫یابد چرخ زندگی را با سعی و تلاش هاجر گونه باید به پیش راند..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;میهمان خدا که لحظاتی پیش در پشت مقام ابراهیم دو رکعت نماز خوانده بود و با رادمهر توحید؛ ابراهیم بزرگ بیعت نموده تا گام در گامش نهاده زندگی نوینی آغاز کند، و سپس با نوشیدن آب زمزم خاطره شیر زن مؤمن؛ هاجر، و فرزندش؛ الگوی ایمان و از خود گذشتگی را در خود زنده کرده بود حال با سعی در بین صفا و مروه گام در مثال تطبیقی درس آموخته شده نهاده...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پس از سعی تیغ زائر است که موهای سر او که نشانه غرور و شامه خودخواهی است را سر می‫برد..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;انسانی بکلی دیگر از رحم &amp;quot;عمره&amp;quot; زائیده شده، با نیرو و امید و اندیشه‫ها و باورهایی بکلی جدید وارد میدان عمل می‫شود..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;زیارت خانه پروردگار و رسیدن بدین مکان با برکتی که هر عبادت آن را پاداشی صد هزار برابر است در توان هر کسی نیست! شاید این جرقه غرور و تکبر و خودستایی در فرد را بیدار سازد. تراشیدن سر در واقع بخاک مالیدن پوزه کبر و غرور و آز و تمامی معانی شیطانی و خودپرستی در فرد و رساندن او به صفاتی چون تواضع و فروتنی که شاخصه‫های بندگی است، می‫باشد. و این معنای بزرگ بندگی را در هر عبادتی می‫توان دید. مثلا: در نماز سر به سجده نهادن نهایت بندگی و خاکساری و تواضع و فروتنی است. و در روزه شکم گرسنه و دهان تشنه مؤمن را به مصاف فقیران و ناداران می‫کشاند و بوی ذلت و محرومیت را به مشامش می‫رساند. اینجاست که درمی‫یابی معنای بندگی واقعی چیست؟&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;میهمان خدا کفن &amp;ndash; احرام &amp;ndash; را از تن می‫کشد و لباس خود را می‫پوشد و &amp;quot;یا حق&amp;quot; گویان در نهایت فروتنی و تواضع و خاکساری بسوی زندگی جدید به حرکت درمی‫آید..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;زندگی جدیدی به شیوه حضرت خاتم؛ محمد مصطفی &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash;، و به رسم حضرت ابراهیم خلیل &amp;ndash; علیه السلام &amp;ndash;، و به همت و توان هاجر زحمتکش &amp;ndash; علیها السلام -، و به گذشت و جانفشانی حضرت اسماعیل &amp;ndash; علیه السلام -.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و این خود زائر است که پس از مدتی کوتاه از بازگشتن به کاشانه خود می‫تواند دریابد: آیا عمره او پذیرفته شده است یا خیر؟&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;تنها آن عمره‫ای پذیرفته شده که زائر یا حاجی پس از بازگشت از خانه خدا بر مسیر درسهای آموخته شده حرکت کند.. اما اگر درسهای کفن &amp;ndash; احرام &amp;ndash; و کعبه و طواف و سعی و حجر الأسود، و مقام ابراهیم و رکن یمانی در او تجلی نکرده باشند، شاگرد عمره مردود است و نیاز به عمره‫ای دیگر و توبه‫ای دیگر دارد...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;الوداع با خانه خدا&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ای ز غم فراق تو جان مرا شکایتی&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بر در تو نشسته&amp;zwnj;ام منتظر عنایتی&lt;br /&gt;
گر چه بمیرم از غمت هم نکنی به من نظر&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ور همه خون کنی دلم، هم نکنم شکایتی&lt;br /&gt;
دل ز فراق گشت خون، جان به لب آمد از غمت&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;زحمتم آید، ار کنم از غم تو حکایتی&lt;br /&gt;
گرچه برانی از برم باز نگردم از درت&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چون ز در عنایتت یافته&amp;zwnj;ام هدایتی&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;فراق و دوری دردی است بی‫درمان که عاطفه انسانی همواره از آن اشک ریخته، شاعران و شیفتگان و عاشقان و محبان از دردش سخت نالیده‫اند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;فراق دوستان و احباب را گردباد فراموشی پس از اندی در خود می‫غلطاند، و آتشش را در دل خاموش می‫کند. اما فراق خانه معبود و قبله سوخته دلان را هرگز..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دل کندن از خانه خدا، پس از آنکه کیانت با آن آمیخته شد بسیار سخت و دشوار است. احساس می‫کنی کعبه قلبت شده است و خون تنها با تپش دیدار خانه خدا در رگانت به جریان می‫آید. چشمهایت تنها با تازه کردن دیدار خانه خدا توان دیدن می‫گیرند، و گوشهایت شنوائیشان را در شنفتن ندای &amp;quot;حی علی الصلاة&amp;quot; حرم بدست می‫آورند، پاهایت در شور و شوق هروله در گرداگرد کعبه معبود زنده‫اند، آنچنان با کعبه آمیخته شده‫ای و انس گرفته‫ای که جدا شدن از آن به جان دادن در مصاف آن می‫ماند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ولی چه چاره است تو را که کوس رحیل نواخته شده؟!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کاروان برای سفر آماده است..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;و تو مجبوری کعبه را به امید دیداری دیگر وداع گویی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در وداع با خانه خدا بیاد حجة الوداع و خطبه پیامبر و پیام رسای آن حضرت می‫افتی.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;صدای رسول پاک هدایت و رستگاری را از پشت قرنها زمان می‫شنوی که بر جای بلندی در مقابل مؤمنان از حج بازگشته ایستاده است. با این وجود خطابش بسوی عالمیان است &amp;laquo;یا أیها الناس&amp;raquo;: ای مردم!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;واضح است پیام آور توحید انسانیت را مورد خطاب قرار می‫دهد. و گویا به مؤمنان می‫گوید شما پس از حج بسوی بشریت می‫روید تا پیام حج و دعوت به بندگی خالق و یکتاپرستی را به جهان و جهانیان برسانید و مردم را از عبادت بندگان رهایی داده به عبادت پروردگار عالمیان دعوت نمایید...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آه!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;هیچ تعجبی نیست از آنکه به دیدار خانه ملکوتی معبود نایل نشده؛ چون توان صبر دوری دارد، تعجب و حیرت از آن کسی است که شرف دیدار یافته، چون می‫تواند از کعبه جدا شود؟!..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چشمهایت اشک ریزان به خانه خدا خیره می‫شوند، پاهایت عاشقانه‫وار در طوافند و لبهایت مشغول دعا.. احساس می‫کنی ای کاش بیشتر و بیشتر در کنار کعبه مراد می‫بودی، بیشتر از گلستان ایمانش برمی‫چیدی، یا حداقل فرصت بیشتری برایت می‫بود تا از رحمات بیدریغ الهی بهره گیری..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ولی صد حیف و هزار حیف که وقت رحیل فرا رسیده است و باید رخت بر بست..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;چشمها پر از اشک فراق، دل تپان شوق دیدار مجدد.. دستهای لرزانت اگر شور و شوق انبوه عاشقان اجازه دهد خود را به ملتزم می‫رسانند، در غیر اینصورت در حجر اسماعیل یا هر گوشه‫ای دیگر به دعا بلند شده از ته دلت از پروردگار عالم می‫خواهی هر سال حج و عمره‫ای و تجدید دیدارهایی نصیبت کند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;تنها امید به پذیرش این دعاست که برد و سلامی بر قلبت نازل می‫کند و احساس می‫کنی دلت می‫تواند بر الم فراق صبر تلخ پیشه کند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در انبوه جمعیت پاهای دلریشت ناخواسته بسوی درب خروجی در حرکتند و چشمها اشک ریزان کعبه را در آغوش دارند. پاهای حیران چشمهایی که چون نوزادی شیرخواره به سینه داغ مادر سخت چسپیده را در یک آن از دامن کعبه می‫ربایند، و خانه حق از دیدت پنهان می‫شود.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دلت می‫خواهد بازگردی و یک نگاه دیگر به خانه خدا بیندازی، ولی وقت تنگ است و هر دیدار خنجری است تشنه خون بر دل زخمی و خسته و پریشان..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اشک ریزان و دلریش دیوانه وار با خانه امید و آرزوهایت و با کعبه معبودت الواداع می‫کنی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;الهی!...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اگر امید به دیدار مجدد خانه تو نمی‫بود دلهای شیفتگان و عاشقان در هنگام فراق می‫ترکید. حقا که در امید دیدار بستن به خانه تو چه بردها و سلامهاست. درست مثل همان برد و سلامی که بر ابراهیم &amp;ndash; علیه السلام &amp;ndash; در آتش نمرود فرود آوردی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پس حمد و ثنا و تحیات و سپاس بیکران بادا مر تو را ای پروردگار یگانه.. و درود و سلام و طیبات بر عزیز دلهایمان؛ پیک رسالت و رسول خاتمت؛ حضرت محمد مصطفی &amp;nbsp;و اهل بیت و یاران و پیروان او تا به روز وصال...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بشنو از نی چون حکایت می کند&lt;br /&gt;
از جدایی ها شکایت می کند&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کز نیستان تا مرا ببریده اند&lt;br /&gt;
در نفیرم مرد و زن نالیده اند&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;سینه خواهم شرحه شرحه از فراق&lt;br /&gt;
تا بگویم شرح درد اشتیاق&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;هر کسی کو دور ماند از اصل خویش&lt;br /&gt;
بازجوید روزگار وصل خویش&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;آتش است این بانگ نای و نیست باد&lt;br /&gt;
هر که این آتش ندارد نیست باد&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;درنیابد حال پخته هیچ خام&lt;br /&gt;
پس سخن کوتاه باید_ والسلام&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>بزرگترین مژده قرن به اهل علم و دانش و معرفت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/333</link>
<description>&lt;p&gt;دیگر هیچ نیازی نیست در پی کتابی از شهری به دیاری و از کتابسرایی به خانۀ کتابی و از موزه‫ای به کتابخانه‫ای رخت سفر بربندی...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دیگر هیچ نیازی نیست در پی کتابهای توحید که چنگال دژخیمان ظلمت آنها را زیر خروارها ترس پنهان کرده بود، کلنگ بدست گرفته دل گنجهای نهفته زمین را بشکافی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دیگر هیچ نیازی نیست برای بدست آوردن کتابهای هدایتگران و ستاره‫گان آسمان سرزمین هدایت فارس دست نیاز بدینسو و آنسو دراز کنی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دیگر هیچ نیازی نیست از ترس تاریکی شمع روشنایی را در وجودت خاموش کنی..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کتاب خوب؛ یار مهربان؛ دانا و خوش بیان را بزرگترین کتابخانه آزاد و رایگان فارسی در علوم انسانی &amp;quot;کتابخانه عقیده&amp;quot; بصورت مجانی خدمت شما تقدیم می‫دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;تنها با اشارۀ سر انگشت.. با یک کلیک صدها کتابی که دست یافتن بدانها آرزوی هر دانشور و طالب علم و معرفتی بود، بر صفحه کامپیوتر شما به نمایش می‫آید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کتابخانه عقیده؛ بزرگترین میراث فرهنگی قرن معاصر ما خدمت ویژه‫ای را به دوستداران کتاب تقدیم داشته است. شما با یک کلیک می‫توانید تمامی کتابهای این کتابخانه را بر نسخۀ &amp;quot;دی وی دی- DVD&amp;quot; کپی کرده در هر جا و هر زمانی که خواستید مورد استفاده قرار دهید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;خورشید علم تابیدن گرفته است و جز کوردلان هیچ صاحب دلی از جمال و جلال آن خود را بی بهره نخواهد گذاشت!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;پیش بسوی علم و دانش و معرفت، و افروختن شمع هدایت و رستگاری در کالبد خویشتن و دیگران...&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;صفحه داونلود دی وی دی سایت&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>به مناسبت فرارسيدن ماه هاى حج</title>
<link>http://qalamlib.com/news/332</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: #000099; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;به مناسبت فرارسيدن ماه هاى حج&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;(&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;إنَّ أوَّلَ بَيتٍ وُضِعَ للنَّاسِ لِلَّذِي بِبَکَّةَ مُبَارَکاً وَ هُدَي لِلعَالَمِينَ، فِيهِ آيَاتٌ بَيِّنَاتٌ مَقَامُ إبرَاهِيمَ، وَمَن دَخَلَهُ کَانَ آمِناً، وَ للهِ عَلَي النَّاِس حِجُّ البَيتِ مَنِ استَطَاعَ إلَيهِ سَبِيلاً وَ مَن کَفَرَ فَإنَّ اللهَ غَنِيٌّ عَنِ العَالَمِينَ&lt;/span&gt;)&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;(آل عمران: 96-97)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&amp;laquo;نخستين خانه&amp;zwnj;اي که براي مردم (جهت عبادت) بنيانگذاري گشته است خانه&amp;zwnj;اي است که در مکه قرار دارد. (کعبه نام و از لحاظ ظاهر و باطن) پربرکت و نعمت است و (از آنجائي که قبله&amp;zwnj;گاه نماز مسلمانان و مکان حج آنان يعني کنگره بزرگ&amp;zwnj;سالانه ايشان است مايه) هدايت جهانيان است. در آن نشانه&amp;zwnj;هاي روشني است. مقام ابراهيم. (يعني مکان نماز و عبادت او از جمله آنها است) و هر کس داخل آن (حرم) شود در امان است. و حج اين خانه الهي واجب است بر کساني که توانايي (مالي و بدني براي رفتن به آنجا را دارند و هر کس وجوب حج را انکار کند کافر مي&amp;zwnj;شود و (به خود زيان رسانده نه به الله) که الله از همه جهانيان بي&amp;zwnj;نياز است&amp;raquo;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;برادران&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;و خواهران مسلمان!&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;هنگامى كه در كشور خود هستيد، و به سوى مكّهء مكرمه و كعبه مشرفه نماز مى خوانديد، و مردم را مى ديديد كه در حرم نماز مى خوانند، و از الله متعال مى خواستيد كه شما نيز يكى از آن مردمى باشيد كه در حرم هستند، چنان كه آنان دور كعبه طواف مى كنند، شما نيز طواف كنيد، و نماز بخوانيد چنان كه آن ها نماز ميخوانند، و آب زمزم بنوشيد، و سعى بين صفا و مروه بكنيد، و الله جل جلاله را در بهترين مكان عبادت كنيد.&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;اى برادر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;و خواهر مسلمان!&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;اگر &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;الله متعال را دعا كردید و حج و عمره را برایتان ميسر گردانيد، و دعايتان را اجابت كرد، و آسان گردانيد، و خـواستـه هايتان را برآورده كرد، حق شما بر ما اين است كه شما را در اين سفر همراهى كنيم، و از آغاز سفر خود به بلد الحـرام، تا رجوع بـه سـوى خـانواده هايتان با سـلامتى و اجر و پاداشى فراوان، چگونگى حج و عمره را برايتان بيان كنيم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;به مناسبت فرارسيدن ماه هاى مبارك حج اين فريضۀ بزرگ الهی&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;كتابخانه سايت عقيده افتخار داردكه مجموعه اى از &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;کتابهای متعلق به حج و عمره را خدمت برادران و خواهران مسلمان تقدیم نماید و امیدواریم که حجاج محترم بتوانند در این سفر روحانی از این کتابها استفاده نمایند&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font size=&quot;4&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;با فشار بر رو&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;ی اسم کتاب می توانید آنرا داونلود نمایید:&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 150%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/556&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;آموزش حج و عمره همراه با تصویر&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;strong&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/610/&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;مختصری از مناسک و راهنمای حج&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/207&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;احوال پيامبر صلي الله عليه وآله وسلم در حج&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/517&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;بيان چند درس عقيدتى برگرفته از حج &lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/390&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;خطبه هاي پيامبر صلي الله عليه وآله وسلم در حج&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/387&quot;&gt;درسهاي عقيدتي بر گرفته شده از حج&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/341&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;يادى از وداع حجاج&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 11pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/483&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;چگونگي حج و عمره و زيارت همراه با دعا&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 11pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/255&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;آدارب زيارت مسجد نبوى&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 11pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 11pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/140&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;بيان آنچه از مساجد مدينه زيارت آن جايز و غير جايز است&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 11pt&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 11pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/485&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;فضايل و احكام مكه مكرمه&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font style=&quot;font-size: 11pt&quot; color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 11pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/256&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;فضائل مدینه منوره و آداب سکونت و زیارت آن&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font style=&quot;font-size: 11pt&quot; color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 11pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/140&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;بیان آنچه از مساجد مدینه زیارت آن جایز و غیر جایز است&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/717&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;حج با خرافیون&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; margin: 0cm 0cm 0pt; unicode-bidi: embed; direction: ltr&quot; dir=&quot;ltr&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font style=&quot;font-size: 11pt&quot; color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font style=&quot;font-size: 11pt&quot; face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/296&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;مختصر فقه از كتاب و سنت &lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font style=&quot;font-size: 11pt&quot; color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/707&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;خلاصة المسائل - در مذهب حنفی&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;font: 11pt tahoma&quot; class=&quot;style5&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/588&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;احکام و مناسک حج - فقه شافعی&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;از الله متعال مسئلت داريم تا سعى شما مشكور، و حج و عمره&lt;sup&gt;ء&lt;/sup&gt;تان مقبول باشد، و شما را سالم و با پاداشى فراوان به خانواده&lt;sup&gt;ء&lt;/sup&gt;تان برگرداند، و بر ما و شما پايدارى و استوار بودن بر دين مبين اسلام و عمل نيك منت گذارد.&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;التماس دعا&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;اداره کتابخانه الکترونیکی عقیده&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font face=&quot;Calibri&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مادر مؤمنان عایشه رضی الله عنها را بشناسید</title>
<link>http://qalamlib.com/news/330</link>
<description>&lt;p&gt;بسم الله الرحن الرحیم&lt;br /&gt;
(النَّبِيُّ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنفُسِهِمْ وَأَزْوَاجُهُ أُمَّهَاتُهُمْ) احزاب 6&lt;br /&gt;
&amp;laquo; پیامبر اولی تر است به مؤمنان از خود آنها و زنان پیغمبر نیز مادران مؤمنان هستند &amp;raquo; .&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;پروردگار جهانیان وقتی خواست انسانها را به سعادت. وکامیابی همیشگی برساند و به آنها بیاموزد که چگونه به انسانیت واقعی برسند، پیامبران خویش را از میان نسل انسانها برگزید وبه آنها&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتاب ودستورات خویش راعطا فرمود تا به جهان بشریت عرضه&amp;nbsp;&amp;nbsp;نمایند.&lt;br /&gt;
افرادی که در اولین روزها گِرد این فرستادگان الهی جمع میشدند و آنها را تصدیق می نمودند، معمولاً انسان های روشن ضمیر و &amp;nbsp;پاک طینتی بودند که خداوند،قلب هایشان را جهت پذیرفتن دین و احکام خودش،هدایت نموده بود.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;در بین این افراد، زنان نیز نقش &amp;nbsp;مهم و چشم گیری داشتند و چه بسا درمیادینی که پا از مردان فراتر نهاده اند،وجان ومال و هستی خویش را در راه نشر واشاعۀ دین الله، فدا کرده اند.&lt;br /&gt;
در عصر رسول خدا صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم آخرین فرستاده الهی ـ &amp;nbsp;نیزجهت نجات انسانها, چنین زنان نمونه ای یافت می شوند که امروز ما مدیون احسان وفداکاری های آن عزیزان هستیم . وقتی اسلام آمد، دیگر فرقی بین سیاه وسفید، زن ومرد &amp;nbsp;نماند، همه را برابر می نگریست. همه&amp;nbsp;&amp;nbsp;را در اجر وثواب با یک دید نگاه می کرد وهمگی در بارگاه الله دارای ارزش و شرافت بودند .&lt;br /&gt;
اگر ما زندگانی رسول اکرم صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم رابررسی نماییم و نحوه رسیدن دین اسلام به تمام جهان را مورد مطالعه &amp;nbsp;قرار دهیم، می بینیم که در کنار مجاهدان جان بر کفی که گرداگرد رسول الله صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم چون پروانه می چرخیدند، زنان مجاهدی نیز حضور داشته اند که در بعضی میدان ها چون علم وتقوی، از بسیاری مردان بالاتر رفته اند و مراتب صعود وترقی به بارگاه احدیت را بیشتر پیموده اند.&lt;br /&gt;
یکی از این بزرگ زنان نمونه اسلام ، کسی که عالم اسلام به نام او افتخارمی کند ، و محدثین وفقهاء نام مبارکش را زینت بخش کلامشان قرار داده اند، همسر گرانقدر رسول الله صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم &amp;nbsp;محبوبۀ مصطفی، صدیقه بنت صدیق &amp;nbsp;پروردۀ &amp;nbsp;صدیق اکبر رضی الله تعالى عنهما،مادر مؤمنان، حضرت عایشه رضی الله عنها می باشد کسی که نیم قرن بعد از پیامبر صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم &amp;nbsp;به نشر دین همّت نمود، و با مجاهدتها وایثارگری هایش سبب شد تاعلم حدیث وفقه و تفسیر جان گیرد و دین اسلام به صورت کامل وجامع از رسول الله صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم به نسل های بعدی برسد.&lt;br /&gt;
حضرت ام المومنین عایشه رضی الله عنها، به خاطر حافظه قوی واستعداد فراوانش&amp;nbsp;&amp;nbsp;مفسری بزرگ، فقیهی چیره دست، محدثی توانا، ادیبی متبحر و حتی پزشکی ماهر بود.&lt;br /&gt;
اما آنچه باید اذعان نمود، این است که با تأسف فراوان باید قبول کرد که امروزه جمع کثیری از مسلمانان با نام، صفات، اخلاق ومقام بزرگ علمی او آ شنایی ندارند. این ظلم بزرگی است که&amp;nbsp;&amp;nbsp;فرزندان امت اسلامی با مادرشان بیگانه هستند وهیچ توجهی به اوصاف نیکویش نکرده واو را به عنوان اسوه والگو در جامعه معرفی ننموده اند.&lt;br /&gt;
و عده ای جاهل ونادان و شاگردان عبدالله بن سبا یهودی به این شمع خانه نبوت توهین کرده &amp;nbsp;وناسزا می گویند و اگر این انسانهای منافق ومسلمان نما از حقیقت قرآن وسیرت رسول اکرم صلی الله علیه آله وسلم آگاه می بودند هرگز این طور عمل نمی کردند.&lt;br /&gt;
آیا امکان دارد کسی مسلمان باشد و باز با ام المؤمنین عایشه رضی الله عنها، عداوت و دشمنی داشته باشد، هرگز چنین نیست. و اگر چنین فردی پیدا شود که خود را مسلمان بداند، اما باز در مورد مادر مؤمنان، عایشۀ صدیقه رضی الله تعالى عنه دچار شک و شبهه باشد، و در دل نسبت به ایشان کینه و بغض بپروراند، به جرأت می توان گفت که چنین شخصی نه &amp;laquo;شیعه&amp;raquo; است و نه &amp;laquo;سنی&amp;raquo; ، بلکه بدون تردید او یک کافر و گمراه زندیق است وبس.&lt;br /&gt;
البته این نکته قابل ملاحظه است که ما خدای ناکرده به هیچ مسلمانی از صدر اسلام تا حال، کوچکترین اهانت وتوهینی روا نمی داریم. چرا که معتقدیم، آنها امتی بوده اند که گذشته اند، حسابشان با خدایشان است، در مورد اختلافات ومشکلات موجود بین آنها از ما سؤال نمی شود.&lt;br /&gt;
(تِلْكَ أُمَّةٌ قَدْ خَلَتْ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ وَلاَ تُسْأَلُونَ عَمَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ) ﴿134 بقره ﴾&lt;br /&gt;
&amp;laquo;این امتی است که گذشته است دست آوردشان برای خودشان ودست آوردتان برای خودتان است و از آنچه می کرده اند بازخواست نخواهید شد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;به همین جهت ما تمام آن افرادی که با رسول الله صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم بوده اند ودر کنار ایشان برای نشردین جانفشانی کرده اند را، با دیدۀ محبت واحترام می نگریم &amp;nbsp;و اهانت وتوهین به آنها و یا هرفردی ازتابعین آنها را حرام می دانیم. و انتظار ما از مسلمانان این است که اجازه ندهند افرادی جاهل، یاوه گو و متعصب &amp;nbsp;به اعتقادات حقۀ مسلمانان جهان، اهانتی روا دارند. و با این کار موجب خدشه دار شدن وحدت میان مسلمانان گردند.&lt;br /&gt;
اگر اندکی باتأمّل نگریسته شود، اختلافات از این گونه جاها واز این نوع افراد سر چشمه می گیرد..&lt;br /&gt;
ادارۀ کتابخانۀ عقیده بر آن شد تا برخی از کتبی را که در مورد زندگانی و شخصیت این بانوی بزرگوار اسلام، نگاشته شده را خدمت شما عزیزان معرفی نماید، باشد که گامی جهت تلاش وتکاپوی بیشتر در این میدان گردد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
به امید اینکه وحدت واقعی وحقیقی در&amp;nbsp;&amp;nbsp;بین امت اسلامی تحقق یابد واز اهانت وناسزا گفتن یاران پیامبر و خاندان رسول الله صلى الله علیه وآله وصحبه وسلم در جامعۀ اسلامی اثری یافت نشود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- بگذارید از مادرم&amp;zwnj; عایشه صدّیقه&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj;الله عنها بگویم&amp;zwnj;&lt;br /&gt;
- زندگانی مادر مومنان بانو عایشه رضی الله عنها&lt;br /&gt;
- عایشه رضی الله عنها همسر، همراه و همراز پیامبر&lt;br /&gt;
- همسران پاک پیامبر و فلسفه تعدد آنها&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرا رسیدن فرخنده عید سعید فطر مبارک باد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/329</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #0000ff&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;کم کم غــــــروب ماه خـــدا دیده مـــی‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شود&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #0000ff&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;صد حیف ازین بســاط که برچیده می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;‫شـــــود&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #0000ff&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;در ایـن بـــــــهار رحمـــــت و غــــفـران و مغفرت&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #0000ff&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;خوشبخت آن کسی است که بخشیده می‫شد&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot;&gt;به گزارش سایت خبری&amp;nbsp;سنی نیوز&amp;nbsp;شوراى عالي قضايي عربستان سعودى دقايقي پيش در اطلاعيه&amp;zwnj;اي اعلام كرد كه شامگاه امروز (دوشنبه&amp;zwnj;شب 29 رمضان) هلال ماه شوال رويت شده است. بنابر اين فردا (سه شنبه) اول شوال سال 1432هـ ق برابر با 8 شهريور/سنبله 1390هـ ش و 30 &amp;ndash;اوت 2011ميلادي اولين روز عيد سعيد فطر است. &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #003300&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ادارۀ کتابخانه عقیده،&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt; فرا رسیدن فرخنده عید سعید فطر را به&amp;nbsp; تمامی مسلمانان جهان تبریک و تهنئت عرض کرده از الله متعال عاجزانه می‫خواهیم تا همۀ طاعات و عبادات ما و شما عزیزان را مورد قبول درگاه عظمت و بزرگواریش قرار داده، همه ما را از آتش سوزان جهنم در امان داشته، غریق رحمت و رضوان خویش قرار دهد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #0000ff&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;زمـــردم دل بکــن و یاد خــــدا کن &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;خــدا را وقــت تنهایی صدا کن&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #0000ff&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;در آن حالت که اشکت می‫چکد گرم &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;غنیمت دان و ما را هم دعا کن&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شایسته است دریابیم که در حقیقت عید پایان یافتن رمضان نیست، بلکه عید تولد مسلمانان نوینی است که از رحم رمضان، پاک و بی آلایش و مبرا از گناهان و خطاها، با چهره‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;هایی نورانی از ایمان و اخلاص وارد جامعه شده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;‫اند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #0000ff&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;عید رمـــــضان آمد و ماه رمضـــان رفت &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;صد شکر که این آمد و صد حیف که آن رفت&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ما با تبریک این عید فرخنده به همگی شما عاشقان و دلدادگان راه حق و توحید، و شیفته‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;های اطاعت و فرمانبرداری و بندگی الله متعال از آن ذات پاک یکتا می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;خواهیم تا به همۀ ما توفیق دهد از جمله کسانی باشیم که حاصل دسترنج این ماه و فضل و کرامت شب قدر را تا آخر عمر حفظ می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;کنند. و از اله و پروردگارمان مسألت داریم که مشکلات تمامی مسلمانان جهان را برطرف کرده، چکمه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;‫های فولادین ظلم و ستم و طغیان دژخیمان را از سر مظلومان برچیند...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>آداب و احکام عید</title>
<link>http://qalamlib.com/news/328</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الله سبحانه وتعالی در قرآن کریم می فرماید: (قُلْ بِفَضْلِ اللَّهِ وَبِرَحْمَتِهِ فَبِذَلِکَ فَلْیَفْرَحُوا هُوَ خَیْرٌ مِمَّا یَجْمَعُونَ) یونس: ٥٨&lt;br /&gt;
&amp;laquo; بگو به فضل و رحمت الله &amp;ndash; به همین چیز باید مردمان شادمان شوند، این بهتر از چیزهایی است که گرد می آورند&amp;raquo;&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان!&lt;br /&gt;
الله متعال در پایان ماه مبارک&amp;nbsp;رمضان بر روزه&amp;rlm;داران منت نهاد، چون انجام کارى را که وسیله پاک گرداندن و کامل کننده نعمتش به ایشان است، بر آنان مقرر کرده است. با انجام آن روزه و شب زنده&amp;rlm;دارى آنان را قبول مى&amp;rlm;کند و لغزشها و بیهوده&amp;rlm; گویی هایى را که با عبادتشان در آمیخته است، از بین مى&amp;rlm;برد و نیازمندانشان را در روز عید فطر از گدایى&amp;nbsp;بى&amp;rlm;نیاز مى&amp;rlm;کند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;با انجام این کار، مسلمانان دوشادوش همدیگر حرکت مى&amp;rlm;کنند و همدیگر را دوست مى&amp;rlm;دارند و ثروتمندان و نیازمندانشان با هم یک دل مى&amp;rlm;شوند و براى خشنودى الله حرکت مى&amp;rlm;کنند. چنانکه در حدیث شریف روایت شده:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;فرض رسول اللّه صلی الله علیه وآله وسلم زکاة الفطر طهرة للصّیام من اللّغو والرَّفث وطعمة للمساکین&amp;raquo;. (أبوداود 1609، ابن ماجه 1827، آلبانى در الارواء (3/332) حدیث را حسن دانسته است).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم زکات فطر را فرض کرد تا وسیله&amp;rlm;اى باشد براى پاک شدن روزه از کارهاى و سخنان لغو و بیهوده (که با روزه آمیخته&amp;rlm;اند) و غذایى باشد براى مستمندان&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;الله متعال با این صدقه سرور و خوشحالى را در دل روزه&amp;rlm;داران مى&amp;rlm;اندازد، بدین گونه که خشنودى&amp;rlm;اش را از آنان در این ماه بزرگ میسر مى&amp;rlm;گرداند. این صدقه همان زکات یا صدقه فطر است. گرچه مقدار آن کم است اما نشانه&amp;rlm;اى بر عظمت قانون&amp;rlm;گذارى اسلامى و کمال آن است.بیهقی&amp;nbsp;و&amp;nbsp;دارقطنی&amp;nbsp;از&amp;nbsp;ابن&amp;nbsp;عمر&amp;nbsp;رضی الله عنهما روایت&amp;nbsp;کرده&amp;zwnj;اند،&amp;zwnj;که فرموده است&amp;zwnj;:&lt;br /&gt;
پیامبر صلی الله علیه و سلم&amp;nbsp;زکات&amp;nbsp;فطریه&amp;nbsp;را&amp;nbsp;فرض&amp;nbsp;نمود&amp;nbsp;و&amp;nbsp;فرمود:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;أغنوهم فی هذا الیوم&amp;raquo;&amp;nbsp;&amp;zwnj;&amp;laquo;در&amp;nbsp;این&amp;nbsp;روز&amp;nbsp;فقیران&amp;nbsp;را&amp;nbsp;بی&amp;zwnj;نیاز کنید&amp;raquo;&amp;nbsp;زکات فطر به خاطر آن به این اسم نامیده شده که با افطار کردن در پایان رمضان، واجب مى&amp;rlm;گردد. (فتح الباری 3/430).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم زکات فطر را در سال دوم هجرى - سالى که روزه رمضان فرض شد- بر مسلمانان فرض نمودند.&lt;br /&gt;
زکات فطر بر تمامى مسلمانان مرد یا زن، کوچک یا بزرگ، آزاد یا برده، مقیم یا مسافر، در حالى که در شب و روز عید بیشتر از غذاى خود و کسانى که نفقه آنان بر او واجب است داشته باشند، فرض است. زکات فطر با دریافتن غروب آخرین روز رمضان (شب عید فطر) واجب مى&amp;rlm;شود. مسلمانان از جانب خود و از جانب کسانى که نفقه آنان (از مسلمانان) بر عهده&amp;rlm;شان واجب است (مانند: زن، فرزند نیازمند، خدمتکار و والدین نیازمند) زکات فطر مى&amp;rlm;دهند. مقدار آن معادل یک صاع (در حدود دو کیلو و هفتصد گرم) از غذاى معمولى شهرى که در آن زندگى مى&amp;rlm;کند، مى&amp;rlm;باشد؛ چون نیازمندان در روز عید به چنین غذایى علاقمند و منتظر دریافت آن هستند. پس یک صاع از گندم یا برنج خوب و نظیر آن از حبوباتى که در حالت اختیارى خورده مى&amp;rlm;شوند، داده شود. چنانکه در حدیث روایت شده که:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;فرض رسول اللَّه صلی الله علیه وآله وسلم زکاة الفطر، صاعاً من تمر أو صاعاً من شعیر، على العبد والحرّ والذکر والأنثى والصغیر والکبیر، من المسلمین وأمر بها أن تؤدّى قبل خروج الناس إلى الصّلاة&amp;raquo;. متفق علیه&lt;br /&gt;
&amp;laquo;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم زکات فطر را چنین فرض کرد. یک صاع (دو کیلو و هفتصد گرم) از خرما یا یک صاع از جو، بر هر فرد مسلمان آزاد و برده از مرد و زن، کوچک و بزرگ، و دستور داد که قبل از رفتن مردم براى نماز (عید فطر) پرداخت شود&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
اگر مسلمان بیشتر از آن هم زکات فطر بدهد، براى او صدقه به شمار مى&amp;rlm; آید و به او پاداش فزونترى داده مى&amp;rlm;شود. (الفقه الإسلامی وأدلته. وهبه الزحیلی 1/142).&lt;br /&gt;
پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم چهار نوع از غذاها را براى دادن زکات نام برده است: ابوسعید خدرى رضی الله عنه میفرماید: ما یک صاع خوراکى یا یک صاع جو، یا یک صاع خرما، یا یک صاع کشک یا یک صاع کشمش، به عنوان زکات فطر مى&amp;rlm;دادیم. (متفق علیه)&lt;br /&gt;
پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم زمان پرداخت آن را مشخص کرده است، انسان مسلمان باید بعد از طلوع فجر صادق (بعد از نماز صبح) در روز عید و پیش از رفتن مردم براى نماز عید زکات فطر را پرداخت کند. این وقت براى دادن زکات مستحب و پسندیده است. (چون روز عید است و مستمندان با دریافت آن در این روز در شادى و سرور با دیگران شریک مى&amp;rlm;شوند)، اما پرداخت زکات فطر در طول ماه رمضان و پیش انداختن آن، یک یا دو روز یا بیشتر مانده به عید فطر، جایز است، ولى به تأخیر انداختن آن از نماز عید مکروه است، مگر کسى که عذر داشته باشد، مانند غایب بودن مستمند و نظیر آنها. تأخیر پرداخت زکات فطر به خاطر آن مکروه است که در تأخیر آن هدفى که از دادن زکات - که خوشحال کردن مستمند و بى&amp;rlm;نیاز گرداندن او از گدایى کردن در روز عید است - از بین مى&amp;rlm; رود.&lt;br /&gt;
آری! روزه داران در این یک ماه&amp;nbsp;به جنگ نفس شتافته، و با روزه داری درس صبر و مقاومت را آموختند. روزه به انسان روزه دار می آموزد که گرسنگی، تشنگی و ایستادن و مقابله با خواسته های نفسانی مشکل و دشوار هست ولی انسان میتواند در مقابل سختی ها ایستادگی نماید. روزه به روزه داران و انسانها هشدار می دهد&amp;nbsp;فقر و گرسنگی که انسانهای دیگر را رنج و عذاب می دهد و باید از آن مشقت وسختی ها مطلع گردد و روزه دار در هنگام گرسنگی وسختی خود را شریک رنج فقرا بدانند. از سوی دیگر وقتی روزه داران با موفقیت از امتحان بیرون آمده اند بخاطر این پیروزی از این روز تجلیل می گردد و این جشن پیروزی در فرهنگ اسلام بنام عید فطر یاد شده است که یکی از اعیاد مهم مسلمانان به شمار می آید.&lt;br /&gt;
نماز عید، سنت موکده است و برخی از عالمان قائل به وجوب آن هستند. مستحب است که نماز عید در عیدگاه خوانده شود چنانکه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در عیدگاه نماز می خواندند، ولی اگر ضرورتی یا عذری باشد می توان در مسجد خواند. نماز عید از شعائر دین اسلام است و شایسته است که زن و مرد مسلمان جهت ادای آن در جماعت شرکت کنند. حضرت ام عطیه رضی الله عنها می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;(أمرنا أن نخرج العواتق و ذوات الخدور) متفق علیه&lt;br /&gt;
&amp;laquo;به ما امر شد که در روز عید دختران بالغ و آنهایی که در خانه هایشان پرده نشین هستند با خود به عیدگاه بیرون ببریم&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;اما وقت نماز عید، آنچه از یزید بن خمیر رحبی روایت است که: عبدالله بن بسر صحابی پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم روز عید فطر یا قربان با مردم خارج شد، تأخیر امام را ناپسند دانست و فرمود: (إنا کنا قد فرغنا ساعتنا هذه، و ذلک حین التسبیح) &amp;laquo;ما (زمانی که با پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم نماز عید می&amp;zwnj;خواندیم) در این لحظه از نماز فارغ شده بودیم و آن وقت نماز، اشراق بود&amp;raquo;. روایت اصحاب سنن&lt;br /&gt;
نماز عید دو رکعت است، و در آن دوازده تکبیر گفته می&amp;zwnj;شود؛ هفت تکبیر در رکعت اول بعد از تکبیرة الإحرام و قبل از قرائت فاتحه و پنج تکبیر در رکعت دوم قبل از قرائت فاتحه: از عمرو بن شعیب از پدرش از جدش روایت است:&lt;br /&gt;
(أن رسول الله صلی الله علیه و سلم کبر فی العیدین سبعا فی الأولی و خمسا فی الآخرة) روایت ابن ماجه&lt;br /&gt;
&amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در نمازهای دو عید هفت تکبیر در رکعت اول و پنج تکبیر در رکعت دوم گفت&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
در مورد قرائت در نماز عید از نعمان بن بشیر رضی الله عنه روایت است:&lt;br /&gt;
(أن رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم کان یقرأ فی العیدین و فی الجمعة بسبح اسم ربک الأعلی، و هل أتاک حدیث الغاشیة) روایت اصحاب سنن&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در نماز دو عید و نماز جمعه سوره&amp;zwnj;های &amp;laquo;سبح اسم ربک الأعلی&amp;raquo; و &amp;laquo;هل أتاک حدیث الغاشیه&amp;raquo; را می&amp;zwnj;خواند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
عزیزان! سنت است خطبه بعد از نماز عید خوانده شود چنانکه از ابن عباس&amp;nbsp;رضی الله عنه روایت است:&lt;br /&gt;
(شهدت العید مع رسول الله صلد الله علیه وسلم و أبی بکر و عمر و عثمان رضی الله عنهم فکلهم کانوا یصلون قبل الخطبة) متفق علیه&lt;br /&gt;
&amp;laquo;با پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم، ابوبکر، عمر و عثمان رضی الله عنهم نماز عید خواندم، همه آنها قبل از خطبه نماز می&amp;zwnj;خواندند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
نماز (سنت) قبل و بعد از نماز عید مشروع نیست از ابن عباس رضی الله عنه روایت است:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;(أن النبی صلی الله علیه وآله وسلم صلّی یوم الفطر رکعتین، لم یصل قبلها و لابعدها) متفق علیه&lt;br /&gt;
&amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم روز عید فطر دو رکعت نماز خواند قبل و بعد از آن نماز دیگری نخواند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و آنچه در روز عید مستحب است:&lt;br /&gt;
1- غسل: از علی رضی الله عنه روایت است که درباره غسل از او سؤال شد فرمود: (یوم الجمعة، و یوم عرفة، و یوم الفطر، و یوم الأضحی)&amp;nbsp;&amp;laquo;روز جمعه، روز عرفه، روز عید فطر، روز عید قربان غسل واجب است&amp;raquo;. اصحاب سنن&lt;br /&gt;
2- پوشیدن بهترین لباس، از ابن عباس رضی الله عنهما روایت است که: &amp;laquo;کان رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;یلبس یوم العید بردة حمراء&amp;raquo; روایت طبرانی &amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم روز عید جامه&amp;zwnj;ای سرخ رنگ می&amp;zwnj;پوشید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
3- خوردن در روز عید فطر قبل از خروج برای نماز: از انس رضی الله عنه روایت است: &amp;laquo;کان رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم لا یغدو و یوم الفطر حتی یأکل تمرات&amp;raquo; سنن ترمذی &amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم صبح روز عید فطر تا چند خرما نمی&amp;zwnj;خورد (به نماز) نمی&amp;zwnj;رفت&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
4-&amp;nbsp;تغییر مسیر رفت و برگشت: از جابر&amp;nbsp;رضی الله عنه روایت است: &amp;laquo;کان النبی صلی الله علیه وآله وسلم إذا کان یوم عید خالف الطریق&amp;raquo; مشکاه &amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم روز عید از راهی غیر از راه رفتن برمی&amp;zwnj;گشت&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
5-&amp;nbsp;تکبیر در روزهای عید: الله متعال می&amp;zwnj;فرماید: (وَلِتُکْمِلُوا الْعِدَّةَ وَلِتُکَبِّرُوا اللَّهَ عَلَى مَا هَدَاکُمْ وَلَعَلَّکُمْ تَشْکُرُونَ)البقرة: ١٨٥ &amp;laquo;و تا تعداد (روزهای رمضان) را کامل گردانید و بخاطر اینکه الله شما را هدایت کرده، الله اکبر بگویید و تا اینکه سپاسگذاری کنید&amp;raquo;. تکبیر در روز عید فطر از هنگام رفتن به مصلی شروع می&amp;zwnj;شود و تا خواندن نماز ادامه می&amp;zwnj;یابد ابن ابی&amp;zwnj;شیبه رحمه الله می فرماید: یزید بن هارون از ابن ابی ذئب از زهری روایت می&amp;zwnj;کند که: &amp;laquo;أن رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم کان یخرج یوم الفطر فیکبر حتی یأتی المصلی، و حتی یقضی الصلاة، فإذا قضی الصلاة قطع التکبیر) اصحاب سنن &amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم روز عید فطر تکبیرگویان به مصلی می&amp;zwnj;آمد تا اینکه نماز را تمام می&amp;zwnj;کرد و پس از اتمام نماز تکبیر را قطع می&amp;zwnj;کرد&amp;raquo;. بیهقی از طریق عبدالله بن عمر از نافع از عبدالله بن عمر روایت کرده است که: &amp;laquo;أن رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم کان یخرج فی العیدین مع الفضل بن عباس و عبدالله بن عباس و علی و جعفر و الحسن و الحسین و أسامة بن زید، و زید بن حارثه و أیمن بن أم أیمن رضی الله عنهم رافعا صوته بالتهلیل و التکبیر، فیأخذ طریق الحذائین حتی یأتی المصلی، و إذا فرغ رجع علی الحذائین حتی یأتی منزله&amp;raquo;&lt;br /&gt;
&amp;laquo;پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم برای نماز دو عید با فضل بن عباس، عبدالله بن عباس، علی، جعفر، حسن، حسین، اسامه بن زید، زید بن حارثه، ایمن ابن ام ایمن رضی الله عنهم خارج می&amp;zwnj;شد و با صدای بلند لا إله إلا الله و الله أکبر می&amp;zwnj;گفت و از راه حذائین (مسیر کفاشان) به مصلی می&amp;zwnj;رفت و بعد از خواندن نماز از بالای حذائین (از راهی دیگر) به خانه&amp;zwnj;اش برمی&amp;zwnj;گشت&amp;raquo;. و اصحابشان همچون ابن عمر رضی الله عنهما وابی امامه رضی الله عنه صدای خود را در این تکبیر بالا می&amp;zwnj;بردند&amp;raquo;.البیهقی/ صحیح 3/276.&lt;br /&gt;
اما الفاظ تکبیرات عید از این قرار است: &amp;laquo;الله اکبر الله اکبر، لا إله إلا الله، والله اکبر الله اکبر، ولله الحمد&amp;raquo; یا&amp;nbsp;&amp;laquo;الله اکبر، الله اکبر، الله اکبر، لا إله إلا الله، والله اکبر، ولله الحمد&amp;raquo;. به روایت ابن ابی شیبه.&lt;br /&gt;
برگرفته شده از کتاب: خطبه&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>english news test</title>
<link>http://qalamlib.com/news/327</link>
<description>&lt;p dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;This book takes us on a journey of knowledge and penetrating insights that bring us to the destination of ultimate truth and reality in a rational and logical way.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>سفينة &quot;إيران&quot; إلى أين ستأخذ أبناء شيعة الخليج؟</title>
<link>http://qalamlib.com/news/326</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;bdo dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;عايض الدوسري&lt;/span&gt;&lt;/bdo&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;قبل ما يُقارب خمسة عشر عامًا جمعتني صحبة دراسية بأحد الزملاء الشيعة. لقد كان ذكيًا ومتوقد الإيمان، وكنا نجتمع في أماكن الدراسة العامة نتبادل أطراف الحديث وأحيانًا الحوار الساخن. وبعد فترة ليست طويلة تولد بيننا نوعٌ من الألفة وبدأ يتغير موضوع الحوار من المسائل المذهبية إلى المشتركات الإنسانية. ولا زلتُ أذكر في لحظة مصارحة وصفاء منه أنه قال لي: &amp;quot;كُنا نُحشى بالضغينة والكراهية على وطننا &amp;quot;السعودية&amp;quot; وعلى بقية السعوديين، وفي المقابل نُملأ بالحب العميق والرغبة الجامحة والشوق العظيم إلى إيران وما فيها ومن فيها&amp;quot;. ويقول صاحبي: &amp;quot;لقد تخيلت أنَّ إيران هي الدولة المؤمنة الوحيدة، التي توافرت فيها جميع عناصر دولة الهادة المهديـين، ولم يـبق إلا أن يخرج المهدي المنـتظر لتكتمل الدولة الشيعية المثالية&amp;quot;. يقول وهو في حماسٍ شديد: &amp;quot;عملتُ المستحيل للسفر إلى إيران إلى درجة أنني زورتُ جوازًا لهذا الغرض&amp;quot;. ثم يقول وهو يتنهد عميقًا: &amp;quot;لقد تحطمت تلك الصورة &amp;quot;الطوباوية&amp;quot; عن إيران سريعًا بمجرد وصولي إليها، حيث كَثُرَ على مسمعي ورود كلمة &amp;quot;يا عرب يا أنجاس&amp;quot;، وأنا العربي الأصيل، فتعجبتُ من كراهية الإيرانيين للعرب مع أن العرب هم معدن ومادة الإسلام، وأهل البيت هم سادة العرب. كانت تلك الشتائم الإيرانية المتكررة هي بداية إبصاري بعين العقل لا بعين المذهب والعاطفة&amp;quot;. ويواصل مصارحته ويتابع حديثه: &amp;quot;ثم بدأت أبصر حالة الشعب الإيراني كيف كان غارقًا في الفقر والذل والمهانة، وفي نفس الوقت كان الشعب غارقًا في الأحلام والأوهام والوعود بقرب الظهور&amp;quot;. يختم صاحبي كلامه بقوله: &amp;quot;والله لأول مرة أشعر وقتها ماذا يعني أن أكون سعوديًا&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وبعد كلام صاحبي هذا بزمنٍ سمعتُ مثل هذا الكلام كثيرًا من أبناء الشيعة العقلاء الذين رجعوا من إيران وهم في حالة صدمة من حجم الكراهية للعرب بشكل عام، ثم زادت الكراهية بعد موت المرجع آية الله &amp;quot;الشيرازي&amp;quot;، أو اغتياله كما يذكر أتباعه، وتعريته ودهس جثته، ثم سرقة جثمانه ودفنها في قارعة الطريق على يد قوات &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;كل هذا لا زلتُ أتذكره وأنا أتابع ما يجري حاليًا في مدينة &amp;quot;العوامية&amp;quot; من أحداث، وإن كانت ولله الحمد من قلة حتى الآن، إلا أنها مؤسفة مؤلمة أن تصدر عن شباب ينـتمون في أصلهم إلى هذا الوطن. وأود من مقالي هذا أن أبعث برسالتين إلى جهات عديدة، كما يلي:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أولاً: دعوة إلى شباب الشيعة أن يتعظوا من التاريخ.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أعرف &amp;ndash;من خلال تخصصي- أن الدافع للشاب الشيعي &amp;ndash;في الغالب- نحو التمرد والشغب يمكن في أمرين: الأول: هو الرواسب &amp;quot;التاريخية-الأيديولوجية&amp;quot; التي يتعمد بعض علماء الشيعة إبرازها على وجه الخصوص، ويتم عرضها في كل لحظة في كثير من المجتمعات الشيعية، ليتم تحويلها من مجتمعات الأصل فيها المسالمة إلى بؤر توتر ودوائر قلقة ومنغلقة تنـتظر الانفجار. أما الثاني: فهو أمر حادث مع ظهور مبدأ &amp;quot;ولاية الفقيه&amp;quot; والذي تُوج عمليًا بزعامة &amp;quot;الخميني&amp;quot; لإيران. ومنذ تأسيس دولة &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; أصبحت إيران مصدرًا للتوتر والحروب والفتن في دول المنطقة، ومن المفارقات أن أول ضحية لهذه الدولة الطائفية هم أبناء الطائفة الشيعية أنفسهم.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وأصبحت هناك سياسة راسخة عند &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; من أجل أطماعه التوسعية، وهي استخدام أبناء الشيعة كوقود لسياساته وأطماعه، لا يهتم بمصالحهم ولا بمنافعهم، وفي اللحظة التي يحتاج فيها أبناء الشيعة &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; يتخلى عنهم بدم بارد إذا تعارض ذلك مع مصلحته. إن &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; يعتبر جميع أبناء الشيعة من أبناء منطقة الخليج وغيرها مجرد قطيع يجوز التضحية بهم لأجل مصالحه، وهذا ما أكده الأمين السابق لحزب الله في لبنان &amp;quot;صبحي الطفيلي&amp;quot; حيث قال: &amp;quot;الإيرانيون يعتبرون أن الشيعة في لبنان مزرعة لهم&amp;quot;[1]. وهذه الحقيقة ليست في لبنان فقط، بل في كل دولة فيها شيعة.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وسبب الخلاف بين &amp;quot;صبحي الطفيلي&amp;quot; و&amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; في إيران هو اصطدام مصلحة إيران بمصلحة لبنان، حيث رفض &amp;quot;الطفيلي&amp;quot; تقديم المصلحة الإيرانية على بلده وكأنه مجرد عميل. يقول &amp;quot;الطفيلي&amp;quot;: &amp;quot;قلت مراراً للإيرانيين لن أكون أبداً عميلاً لإيران ولسياستها&amp;quot;[2]. ثم يـبين أنهم رفضوه بسبب ذلك، وعينوا بدلاً عنه &amp;quot;حسن نصر الله&amp;quot;. يقول &amp;quot;الطفيلي&amp;quot;: &amp;quot;هم يفضلون الضعفاء الذين يدينون لهم بالولاء الأعمى&amp;quot;[3]. ثم يُعلق على قرارات &amp;quot;حزب الله&amp;quot; في لبنان بقوله: &amp;quot;القرار ليس في بيروت وإنما في طهران&amp;quot;[4]. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;لم يكن خوف العالم والقائد الشيعي &amp;quot;صبحي الطفيلي&amp;quot; من تبعات الولاء &amp;quot;لولي الفقيه&amp;quot; على حساب الوطن مجرد أوهام أو صراعات حزبية، بل كان عن إدراك لحقيقة مطامع وأهداف الدولة الإيرانية في المنطقة. فالناطق باسم حزب الله &amp;quot;إبراهيم السيد&amp;quot; يؤكد أنَّ مهمتهم كلبنانيين يدينون بالولاء لإيران تتمثل في أن يكون &amp;quot;الأساس في لبنان أن يبقى ساحةً وموقعاً للصراع&amp;quot;، وأن من &amp;quot;مصلحة الإسلام أن يكون لبنان كذلك&amp;quot;[5]. ثم يؤكد أنَّ هذه السياسة هي من تكريس &amp;quot;الأجهزة الإيرانية كافة، من حوزات قم إلى حرس الثورة، ومن الدعاة، إلى وزارة الداخلية&amp;quot;[6].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;بل إن الأمين الحالي لحزب الله &amp;quot;حسن نصر الله&amp;quot; يؤكد تلك السياسة الإيرانية في لبنان، ويؤكد فوقها أنهم ليسوا معنيين بمصالح لبنان الاقتصادية بل بإدامة الصراع فيها، وجعل لبنان بؤرة للتدريـبات العسكرية لأبناء الشيعة من كافة الدول العربية والإسلامية، لتصدير الميليشيات لكافة تلك الدول من أجل الخروج المسلح وزعزعت الأمن والسلم الاجتماعي، وزرع الشقاق بين المسلمين. يقول &amp;quot;حسن نصر الله&amp;quot; بالحرف الواحد: &amp;quot;عندما يكون في لبنان مليون جائع، فإن مهمتنا لا تكون في تأمين الخبز، بل بتوفير الحالة الجهادية حتى تحمل الأمة السيف في وجه كل القيادات السياسية&amp;quot;[7].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وهذا الأمر ليس مستغربًا، لأن هذا الولاء السياسي سُبِقَ بولاء أيديولوجي، &amp;quot;فحسن نصر الله&amp;quot; يقول: &amp;quot;إن المرجعية الدينية في إيران تشكل الغطاء الديني والشرعي لكفاحنا ونضالنا&amp;quot;[8]. ويؤكد &amp;quot;نصر الله&amp;quot; مراراً وتكراراً التزامه بمرجعية الخميني وأنه هو الإمام المطاع، فيقول: &amp;quot;إن الإمام الخميني من وجهة نظرنا هو المرجع الديني والإمام والمرشد بكل ما تحمله هذه الكلمة من معاني&amp;quot;[9]. ويؤكد &amp;quot;حسين الموسوي&amp;quot;، وهو مسئول وقيادي بارز في حزب الله، أن مرجعية الخميني ليست روحية فقط، بل سياسية وعقائدية، فيقول: &amp;quot;إننا نتبع الإمام الخميني على مستوى الفكر السياسي والعقائدي والديني&amp;quot;[10].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولذلك اعتبرت إيران الشيعة في سوريا وفي لبنان مجرد دمى تُديرها حسب مصالحها، ولذلك قام مرشد الثورة &amp;quot;علي خامنئي&amp;quot; بتعيـين &amp;quot;محمد يزبك&amp;quot; -الإيراني الجنسية والذي يعمل مستشارًا لحزب الله ومدرسًا بحوزة الإمام المنتظر ببعلبك- و&amp;quot;حسن نصر الله&amp;quot; وكيلين شرعيين عنه في لبنان، وهما يعينان الوكلاء من قِبَلِهِمَا في بقية المناطق[11].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وأصبحت لبنان وسوريا مرتهنة في يد &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; يحركهما كيفما شاء نحو مصلحة إيران فقط، ولو على حساب احتراق لبنان وسوريا. وهذا ما عبر عنه وزير الخارجية الإيراني &amp;quot;كمال خرازي&amp;quot; حينما ألمح إلى نظيره السوري &amp;quot;فاروق الشرع&amp;quot; بأن مصير سوريا ولبنان أصبح مترابطًا بمصير إيران السياسي[12].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولذلك أصبح مفهوم الأعداء أو الأصدقاء لا يُحدد حسب مصلحة لبنان أو سوريا، بل من خلال المفهوم الإيراني، فولي الفقيه هو من بيده تحديد قواعد اللعبة لحزب الله وغيره من المليشيات الشيعية. يقول &amp;quot;نعيم قاسم&amp;quot; -نائب الأمين العام لحزب الله- معترفًا بهذه الحقيقة: &amp;quot;الولي الفقيه يعطي القواعد العامة&amp;quot;، وهو الذي &amp;quot;يحدد الأعداء من الأصدقاء&amp;quot;[13].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;من أجل هذا قام &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; بإعداد مُعسكرات تدريب إرهابية في إيران ولبنان والعراق وسوريا، كنقاط تجمع لأبناء الشيعة المغرر بهم من كل أنحاء العالم الإسلامي، لتنفيذ الأجندة الإيرانية. يقول الجنرال &amp;quot;جورج كايسي&amp;quot;، قائد عسكري أميركي في العراق، ما نصه: &amp;quot;إن الإيرانيين من خلال قوات العمليات الخاصة السرية يقدمون أسلحة وتكنولوجيا قنابل، وتدريب لجماعات شيعية متطرفة في أنحاء جنوب العراق، والتدريب يجري في إيران وفي بعض الحالات في لبنان&amp;quot;[14]. وكذلك أكدت تقرير غربية عن ظهور ميليشيات شيعية وأنها ذات تمويل وإشراف إيرانيين مباشرين[15]. ويؤكد &amp;quot;حسن نصر الله&amp;quot; ذلك، ويقر صراحةً أن إيران هي من تدرب الكوادر الشيعة في لبنان وفي سوريا. يقول ما نصه: &amp;quot;أتت قوات إيرانية إلى سوريا ولبنان للمساعدة، وهذه القوات هي التي تولت تدريب مقاتلينا&amp;quot;[16].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;كل ما مضى هو محاولة مختصرة لشرح ما عمله &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; في العراق ولبنان وسوريا، وذلك لأجل أمرين اثنين: الأول كشف حجم الدمار الذي لحق بالبلدان التي خضعت لسياسة التبعية لإيران، فتم تدمريها من خلال سياسة &amp;quot;حرق الأتباع لبقاء المتبوع&amp;quot;، فكل محاولات إيران التدميرية في العراق وسوريا ولبنان، والتي يسمونها مقاومة، هي من أجل الحفاظ على كيان &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot;. الثاني: محاولة إعطاء أبناء الشيعة في الخليج العربي الصورة الكاملة للمشهد الحقيقي، وأن بلدانهم الآمنة في الخليج يُريد لها &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; أن تصبح مواضع جديدة للصراع، كي يـبقى هو المستفيد الوحيد من ذلك، ولن يهتم لو قتل آلاف الشيعة فضلاً عن أهل السنة، فلسان حاله هو: أن تبقى إيران آمنة وسالمة وليذهب أبناء الشيعة وغيرهم بعد ذلك إلى الجحيم.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولذلك لم يستغرب المحللون والسياسيون والعقلاء ما حدث في &amp;quot;البحرين&amp;quot; وما حدث في &amp;quot;العوامية&amp;quot; وما سيحدث في &amp;quot;الكويت&amp;quot; وفي &amp;quot;قطر&amp;quot;، لا قدر الله، إن استمر تجاهل المشكلة الحقيقية. فقد تنبأ وتوقع المحللون والسياسيون والعقلاء حدوث ذلك منذ سنوات، استشرافًا للمستقبل من خلال قراءة فاحصة للماضي والحاضر، وكانت توقعاتهم أن &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; سوف يـبدأ بالبحرين لأسبابٍ إستراتيجية، وفعلاً هذا الذي حدث في البحرين تمامًا.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ففي تاريخ 5/5/2006 أعرب &amp;quot;عدد من المثقفين والخبراء الإيرانيين&amp;quot; أن إيران في ظل التصعيد الحاد مع المجتمع الدولي الرافض امتلاكها التكنولوجيا النووية، ستقوم ببعض الخيارات من أجل تشتيت المجتمع الدولي، ومنها: استخدام عمليات الاغتيال والاختطاف، واستخدام &amp;quot;حزب الله&amp;quot; في لبنان، وتخريب الوضع العراقي[17]. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وأكد &amp;quot;وليد جنبلاط&amp;quot; بتاريخ 2/5/ 2006 أن الإستراتيجية الإيرانية تقوم على إشعال حروب في المنطقة العربية بعيدة عن حدودها، والهدف من ذلك رسالة للغرب على مدى قدرتها على التحكم في مصير المنطقة. وأكد كذلك أن المشروع الإيراني المتمثل في تدخلها وسياستها التوسعية في المنطقة يشكل خطرًا على السعودية[18].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وذهبت الكاتبة &amp;quot;هدى الحسيني&amp;quot; بتاريخ 12/2/2006 إلى أن إيران سوف تتوقى الضغوط عليها بتفجير الوضع في &amp;quot;البحرين&amp;quot; لأنها الساحة الأخصب لإيران لفتح جبهات أخرى للقتال[19].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إذن، نحن أمام مشروع إيراني واضح المعالم، لضرب المنطقة بكل من فيها وما فيها، لحساب مصلحة إيران الخاصة، ووقودها في ذلك هم بعض أبناء الشيعة الذين ينخرطون بولاء صادق وإيمان عميق &amp;quot;بولي الفقيه&amp;quot; وبالمرجعية الإيرانية.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وهنا أود أن أتوجه إلى أبناء الشيعة في السعودية على وجه الخصوص بهذا السؤال، وهو: هل ترغبون في أن تتحول مناطقكم إلى بؤر صراع وقتل واضطراب دائم كما ترغب إيران؟ هل تقدمون مصلحة إيران على مصلحة بلدانكم وأهلكم؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن الولاء لإيران لا يجتمع أبدًا مع الولاء لبلدكم، وإن رفع أعلام &amp;quot;حزب الله&amp;quot; أو صور &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; تُنافي أقل مقدار من الولاء لبلدكم، لأنه لا يخفى &amp;ndash;للأسف الشديد- مدى الكراهية والعداء الذي يُكنه &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; لبلدانكم، وما حصل من أحداث في &amp;quot;البحرين&amp;quot; أو &amp;quot;العوامية&amp;quot; ليس وليدة اليوم، بل هو مخطط إيراني لزعزعة أمن الخليج بمن فيه شيعة وسنة.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;هل تريدون أن تجربوا تجربة سبق وأن قام بها أصحابها سنين طويلة ثم فشلوا وخسروا أرواحهم وأموالهم وأهليهم ظنًا منهم أنهم يقومون بخدمة لدينهم وهم في الحقيقة يُحرقون أنفسهم من أجل أطماع &amp;quot;ولي الفقيه&amp;quot; الفارسي.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وإذا أدرتم أن تتعظوا، فاتعظوا بمن سبقكم، وهو أذكى وأعلم وأعرف منكم، حيث سلك نفس سبيلكم اليوم، وبعد سنوات طويلة لم يجد إلا الخسران والخيانة والنكران. وإذا كنتم قد اغتررتم بما يقوله لكم الآن المرجع آية الله &amp;quot;محمد تقي المدرسي&amp;quot;، فهو الرجل المخادع نفسه الذي غرر بشباب الشيعة قبل سنوات، ولم يجدوا منه إلا الثمار المرة. وكذلك لا تغتروا بخطيبٍ جاهل أرعن يحضكم على الإرهاب والفتنة، وهو أول من يهرب ويختفي عند المواجهة.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن كنـتم لا تقدرون على أن تتذكروا ما جرى قبل سنوات، فلندع أحد أبناء الشيعة السعوديين يروى لكم قصته وتجربته المرة لكم بكل صدق وصراحة، بعد أن سلك سبيلكم هذا منذ سنوات، ولم يحصد إلا الخيانة والغدر ممن زج به في هذا المعترك الخطير.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;فأنتم تعرفون جيدًا الأستاذ &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot;، وتذكرون تاريخه بشكل ممتاز، وقد ألف كتابًا مهمًا وهو &amp;quot;الانقلاب: بيع الوهم على الذات&amp;quot; يحكي لكم عن تجربته قبل سنوات. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;فقد ذكر &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; أنه في أحداث (1400هـ) في الشرقية كان من الشعارات التي كان يرددها الثوار الشيعة، ما يلي: &amp;quot;نحن جنودك يا إمام، خميني خميني... نحن فداك يا إمام، خميني خميني&amp;quot;[20]. وشعار: &amp;quot;يا خالد شيل إيدك ... ترى الشعب ما يريدك&amp;quot;. يقصدون الملك خالد رحمه الله.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويذكر &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; أن سفير &amp;quot;دولة ما!&amp;quot; لم يسمها، سهل له تزوير جواز سفر، كي يسافر إلى إيران. ثم أخذ &amp;quot;اللباد&amp;quot; يشرح بعد ذلك كيف انتقلوا إلى إيران عبر سوريا، وانضموا لمركز تدريب عسكري تابع للمرجع &amp;quot;محمد تقي المدرسي&amp;quot;، حيث أكد &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; أن &amp;quot;المدرسي&amp;quot; هذا كان هو المسؤول هناك عن الحركات الشيعية في السعودية والكويت[21].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويواصل &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; سرد ذكرياته فيذكر أن الشيعة المغرر بهم كانت أعمارهم حين نقلوا من سورياً إلى إيران للتدريب تتراوح بين (12-25) سنةً. ويذكر أنهم التحقوا بمعسكر كانت أعمار الأفراد فيه تتراوح بين (12-38)، ويذكر أنه نشأت علاقات غرامية بين بعض أفراد المعسكر[22].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويؤكد &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; أنه ومن كان معه من الشيعة السعوديين في إيران كانوا يتلقون تدريباً عسكرياً، على استعمال السلاح، وتصنيع المتفجرات، وتكتيكات الاقتحام، واستعمال قذاف (الآر بي جي)، وكذلك على الكاراتيه والتاكوندوا، ويدرسون تاريخ المنظمات الثورية، مثل منظمة بادر ماينهوف، والألوية الحمراء، وعمليات كارلوس في عالم الاختطاف والقتل، ولشدة هذه التدريبات، فقد لقي بعضهم حتفه فيها[23].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويواصل &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; حديثه فيذكر كيف أن بعضهم فكر في ترك التدريب والعودة للبلد، بعدما رأى المشاق وصعوبة احتمال التدريبات العسكرية الجادة. لكنه يذكر أن نظرة المجتمع لمن يعود نظرة حارقة، فكانوا يسمونه &amp;quot;متراجع&amp;quot;، وينظر إليه أشد من النظرة إلى من يفر يوم الزحف، فيشنع عليه في الأصقاع بطريقة لا يدرك شدتها من لم يجربها[24].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويذكر &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; كيف كان &amp;quot;هادي المدرسي&amp;quot; -الأخ الأصغر لمحمد تقي المدرسي- يحاضر فيهم ويحرضهم على الإرهاب، وكيف كان يقول: &amp;quot;لا بديل عن السلاح&amp;quot;، &amp;quot;نحن لا نريد إسلام الأرانب، بل إسلام الأسود&amp;quot;[25].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويـبين &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; طريقة تدريبهم على السمع والطاعة المطلقة للقيادة، وكيف كانت دون نقاش، ويحكي كيف قام مدربهم يوماً بتقسيمهم إلى صفين متقابلين، ثم أمر أحد الصفين أن يصفع كل واحدٍ منهم من يقابله في الصف الآخر بكل ما أوتي من قوةٍ، من غير أن يـبدي الطرف المصفوع أدنى معارضةٍ أو حركةٍ. ثم ينصرف الجميع وقد احمرَّت وجوههم من وقع الصفعات عليها[26].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويستطرد &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; فيحكي كيف دخل عليهم ثلاثة من المدربين، في ليلة شديدة البرودة، وقالوا لهم: &amp;quot;وقوف يا تنابلة&amp;quot;، ثم أمروهم بخلع ملابسهم، والانبطاح على الأرض، ثم انهالوا عليهم ضرباً بأسلاك كهربائية، فجعلوا يتلوون على الأرض من الألم. ثم بعدما أشبعوهم ضرباً، وبعدما احمرت ظهورهم واسودت، أخبروهم أن هذا العذاب هو ما يلاقيه زملاؤهم في السجون و المعتقلات[27].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويحكي &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; طائفة من الأهازيج والشعارات التي يرددونها في ذلك الوقت، ومنها: &amp;quot;ياطالب يا ابن المقرودة...بيع كتبك واشتر بارودة&amp;quot;[28]. وقولهم: &amp;quot;عيدي اليوم عيدي...كلاشنكوف بيدي...كلنا رجال مستعدة للقتال وحنا ارجال....يا ابو صالح &amp;ndash;المهدي المنتظر- لا تحزن وحنا ارجال&amp;quot;[29]. ومن أناشيدهم في معسكرات إيران هذه المقطوعة:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;quot;يا شعبنا هز البارود يا شعبنا..يا شعبنا&lt;br /&gt;
سمِّع الدنيا هذا صوت ارصاصنا..ارصاصنا.&lt;br /&gt;
أبداً ما نرمي سلاحنا من يدِّنا...من يدِّنا.&lt;br /&gt;
ألا بعد ما نحررك يا بلادنا...يا بلادنا.&lt;br /&gt;
إذا جاء يومٌ وقيل السلاح...تهلل وجهي وقلت نعم.&lt;br /&gt;
مدرسي مدرسي جهادك رمز لنا.&lt;br /&gt;
مدرسي مدرسي جهادك رمز لنا.&lt;br /&gt;
مدرسي مدرسي قيادة وقوة لشعبنا.&lt;br /&gt;
مدرسي مدرسي قيادة وقوة لشعبنا.&lt;br /&gt;
يا صفار عود عود...خلصنا من آل سعود.&lt;br /&gt;
يا صفار عود عود ...خلصنا من آل سعود.&lt;br /&gt;
القدس تلعن اليهود ... والكعبة تلعن آل سعود&amp;quot;[30].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويذكر &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; كيف كان &amp;quot;حسن الصفار&amp;quot; يزورهم، ويحثهم على الصبر والاستمرار في التدريب، وطاعة أوامر القيادة[31].&lt;br /&gt;
ويحكي &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; كيف كان المسؤولون عن التدريب يأمرون (كميل) أحد المتدربين، ليحكي لهم رؤيا منامٍ كرره عليهم مراتٍ ومراتٍ، رأى فيها الإمام المهدي يحمل سيفاً يقطف به رؤوس من حوله، وكيف كانت العمائم تتهاوي صفاً صفاً من غير أن ينطق أحدٌ ببنت شفة، حتى وصل إلى &amp;quot;المدرسي&amp;quot; فاقترب منه، ثم رفع السيف، وأهوى به على من يليه، فتهلل وجه المدرسي ضياءً ونوراً، في حين استمر الإمام المهدي &amp;quot;في جز الأعناق حتى تكومت كالتلال في بحر من الدم القاني&amp;quot;[32].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويذكر &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; عن تاريخه في المعسكرات الإيرانية كيف كانوا يتدربون على الرمي، وقد وضعت لهم أهداف من خشب تجسد حكام العرب[33].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولعل من أخطر ما يذكره &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; هو ما نصَّ عليه من أنهم في تلك البرامج التدريبية، تلقوا &amp;quot;دروساً تدخل في حيز غسل العقول بماء الطاعة والولاء للقيادة الربانية المتمثلة في آية الله محمد تقي المدرسي&amp;quot;[34].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويحكي &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; فصلاً جديداً من طريقة تدريبهم على الطاعة المطلقة للولي الفقيه، فيذكر كيف أنهم ذات صباح، وحين وضع إفطارهم بعد جوعٍ شديدٍ إثر أداء تمارين الصباح الشاقة، دخل عليهم أحد المدربين قبل أن يشرعوا في تناول طعامهم، فخطب فيهم عن أن أهم ما يميز &amp;quot;المقاتل الرسالي &amp;ndash;بعد إيمانه بالله-، هو الطاعة في كل الظروف&amp;quot; ثم بعد حديث عن منزلة الطاعة، وبعدما ذكر لهم قصة طالوت وجنوده، وكيف نهاهم عن شرب الماء، فأطاعته طائفة، وعصته أخرى، بعد ذلك: رفع كيساً كان بيده، ثم استخرج منه ضفدعاً بحجم قبضة اليد، أخضر اللون، مع خطوط سوداء، يتصبب لزوجةً وقذارة، ثم صاح فيهم: &amp;quot;من منكم يمثل الفئة التي لم تشرب الماء؟&amp;quot; ففهم الجميع أنه يريدهم أن يضعوا الضفدع في أفواههم ويمضغوه. فقفز أحد الجنود مبادراً معلناً موافقته، ودون تردد وضع الضفدع في فمه، ثم أخذ يضغط عليه ويلوكه بأسنانه، ثم استوقفه المدرب كي يبقي لزملائه بقية، فأخرج الضفدع من فمه، ودفعه لمن بعده، وهكذا تنقل الضفدع بين الأفواه. ويذكر هنا كيف أن بعضهم تقيأ وتذمر. لكن كل ذلك ذهب أدراج رياح الحماس[35]. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وبعد تلك التضحية من بعض أبناء الشيعة السعوديين في سبيل ولائهم &amp;quot;لولي الفقيه&amp;quot; ولدولة إيران، ماذا حدث لهؤلاء المغرر بهم؟&lt;br /&gt;
يحكي &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; كيف أن الوضع السياسي تغير عليهم في إيران، بعد صفقة &amp;quot;إيران غيت&amp;quot; والتي تسلمت فيها إيران &amp;quot;أسلحة أمريكية&amp;quot; عن طريق &amp;quot;إسرائيل&amp;quot;، وبعدها تم التضييق على المتدربين في المعسكرات داخل إيران، وتمت تصفية &amp;quot;مهدي الهاشمي&amp;quot; المسؤول عن الجناح الثوري لحركات التحرر في إيران، وابتدأت تصفية مجموعة من المعسكرات التدريبية شيئاً فشيئاً، وكأن هذا كان من &amp;quot;بنود الصفقة&amp;quot;، ثم يحكي كيف أن المتدربين تشردوا ما بين الهند، وسوريا، ثم قطعت عنهم المعونات المالية التي كانت تصرف لهم، فعانوا من الحرمان والعوز إضافة لمشكلة الغربة. ثم يحكي كيف تأثر وضعهم بتوتر العلاقة بين &amp;quot;الخميني&amp;quot; و&amp;quot;الشيرازي&amp;quot;[36].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ثم يحكي &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; كيف أن قياداتهم (توفيق السيف، حمزة الحسن، حسن الصفار، جعفر الشايب، عيسى المزعل، صادق الجبران، محمد المحفوظ، موسى بوخمسين) منذ عام (1404هـ) بدأوا يراجعون أنفسهم، بعدما أدركوا عجزهم وفشل مشروعهم، لكنهم لم يستطيعوا تغيير منهجهم في فورة الثورة الإسلامية والحرب العراقية الإيرانية. لكنهم بعد عام (1408هـ)، وبعد نهاية الحرب، بدأ خطاب قياداتهم يتغير[37].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ثم يواصل &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; حكاية معاناتهم مع قياداتهم الثورية فيذكر كيف وقعت خلافات حول &amp;quot;الأموال التي تجبى من شيعة السعودية&amp;quot;، وكيف اعترض قيادات المعارضة الشيعية السعوديين، على فتح حسينية الإمام علي في البحرين، كغطاء لاستقبال تبرعات الشيعة السعوديين[38]. وينقل &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; أن &amp;quot;حسن الصفار&amp;quot; كان يقول لهم: &amp;quot;لدينا رصيد رهيب في أوروبا&amp;quot;[39].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويتذكر &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; بحرقة شديدة قرار حل الحركة الذي اتخذته القيادة بطريقة منفردة، والدخول في مفاوضات للعودة إلى وطنهم السعودية. ويذكر &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; بألم كيف ضاعت تضحياته وتضحيات غيره سدى، ويذكر الآلام التي عانها الأفراد في سبيل دعم الحركة، حتى إن منهم من كان يتبرع بنصف دخله لهم، ثم في النهاية تم بيع قضيته نظير صفقة سياسية، بين إيران من طرف وأمريكا وإسرائيل من طرف آخر، ثم بين قيادات الثورة والحكومة السعودية ثانياً. وينقل عن توفيق السيف أمين عام حركتهم قوله بلا مبالاة: &amp;quot;لا يجوز لأحدٍ محاسبتنا&amp;quot;[40]. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وأخيرًا ينقل &amp;quot;عادل اللباد&amp;quot; عن &amp;quot;حسن الصفار&amp;quot; قوله: &amp;quot;نحن لا نمانع أن يـبقى أحدٌ في الخارج، وسوف ندعمه. فقد جاء لنا (حزب الله الحجاز)، محتجاً على نزولنا. فقلنا: ابقوا أنتم في الخارج معارضة، ونحن في الداخل، لتتوحد الجهود في سبيل الحصول على حقوقنا. فما هي إلا أيام حتى سبقونا في العودة إلى البلد&amp;quot;[41].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وبعد هذه التضحيات من الشباب المغرر بهم من الشيعة تم بيعهم أو قتلهم من قبل إيران بدم بارد، وكذلك تم التضحية بهم من قبل قيادات الثورة المزعومة مقابل مطامع دنيوية ومبالغ مالية، وتبخرت كل الأحلام بالمهدي ودولته بتعاون إيران مع إسرائيل وأمريكا.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;فهل يعيد التاريخ نفسه؟&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;فالمدعو &amp;quot;محمد تقي المدرسي&amp;quot; هو الشخص نفسه الذي يعيد اليوم لعب دوره بالأمس، من تحريض شباب الشيعة في البحرين والسعودية على الخروج والثورة وتكفير المسلمين. وأنتم أيضًا تشاهدون وتلاحظون أن نفس شعارات الأمس تُردد اليوم لكن الأسماء تغيرت، فقد سمعتُ بأذني في أحداث &amp;quot;العوامية&amp;quot; بعض المغرر بهم من أبناء الشيعة يردد: &amp;quot;ارحل يا محمد بن فهد.. أحنا ما ننذل بهالبلد&amp;quot;. وهو نفس الشعار الذي أمركم به آية الله &amp;quot;المدرسي&amp;quot; وسمعتُه بنفسي يقول لكم رددوا هذه الشعارات.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;و&amp;quot;محمد تقي المدرسي&amp;quot; هو الشخص المخادع صاحب المعسكرات الإيرانية، الذي يقوم بنفس الدور الإجرامي، فقد سمعتُه بنفسي في هذه الأحداث يصف أسر الحكم في الخليج بأنها &amp;quot;فاجرة فاسقة متخلفة&amp;quot;، ويصف السعوديين على وجه الخصوص بأنهم &amp;quot;أحفاد بني أمية&amp;quot;، وهذه أشارة خطيرة إلى تكفير الشعب السعودي واستباحة دمه، لأن الأمويين عند الشيعة &amp;quot;نواصب&amp;quot; حلال دمهم وعرضهم ومالهم. وقد سمعتُ أيضًا &amp;quot;محمد تقي المدرسي&amp;quot; قبل يومين في بيان على قناة &amp;quot;أهل البيت&amp;quot; يأمر الشيعة بالثورة والتمرد والخروج في وجه القوات السعودية. وقد قرأتُ قبل يومين كذلك البيان الصادر من &amp;quot;المشاغبين&amp;quot; في &amp;quot;العوامية&amp;quot; يصفون أنفسهم ومن قام بالشغب بأنهم &amp;quot;جنود خبير&amp;quot;، وهذا فيه إشارة إلى أنهم في معركة مع اليهود، أي أن الشعب السعودي هم اليهود!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;والسؤال: هل سيتعظ أبناء الشيعة في الخليج عمومًا وفي السعودية خصوصًا بما مضى؟ أم أنهم يريدون أن يجربوا الاحتراق بنار إيران والقيادات الثورية بأنفسهم؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أتمنى من أبناء الشيعة في الخليج العربي أن يتمعنوا في هذا الكلام جيدًا، وأن يتقبلوا الحق بصرف النظر عن قائله هل هو على نفس المذهب أو على خلافه، فالحق أصيل، والرجال يُعرفون بالحق كما رُوي عن علي رضي الله عنه. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ثانياً: دعوة إلى حكام الخليج إلى العمل الفكري.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;هذه الرسالة الثانية أخص بها حكام الخليج، وعلى وجه الخصوص ولاة الأمر في السعودية &amp;ndash;وفقهم الله لخدمة دينه- وأقول لهم: إن الحلول السريعة أو المؤقتة ليست علاجًا للمرض، بل مسكنات مرحلية، لكن المرض لا يزال يمد جذوره بعمق، حتى يميت الجسد. وكذلك فإن الحلول الأمنية ليست وحدها كافية، خصوصا أننا &amp;ndash;ولله الحمد- أمام تجربة ناجحة وفريدة في السعودية في مكافحة الإرهاب تعتمد بعد الله على عمل فريد متوازن بين &amp;quot;الفكر&amp;quot; و&amp;quot;الأمن&amp;quot;، ولولا الله ثم العمل الفكري مع الأمني لما تم القضاء على الإرهاب.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إننا هنا نواجه إرهابًا آخر، وعبثًا آخر، المسكنات غير مجدية، ووضع الرأس في التراب أيضًا غير مجدي، لأن غيرك يعمل ويجند جنوده في كل لحظة. والحل الأمني وحده لا يجدي كذلك، والتنازلات لا تجدي، بل قد تفهم بشكل عكسي، ومن القواعد المهمة في العمل السياسي: &amp;quot;أن الضعف يحرض عليك الآخرين&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن أخطر أنواع الضعف الذي قد تُصاب به أي دولة هو الضعف الفكري، وهذا بدوره سيحرض جميع أشكال وأنواع الأفكار الأخرى المعادية لاختراق نطاقنا الفكري ومنظومتنا الأمنية، لتفقد المنظومة تماسكها وجوهريتها، وجاذبيتها وقوتها. وكما أن الأحداث الإرهابية التي حدثت في السعودية سُبِقت باختراقٍ فكريٍ خارجي وافد، وتم تجنيد مئات الشباب في هذا المسلك الإرهابي، عن طريق إقناعهم بواسطة الفكر أو &amp;quot;القوة الناعمة للتكفيريين&amp;quot;، ومن ثَمَّ أثاروا القتل والدمار أينما حلُّوا، وكانت بدايتهم مجرد فكرة، كذلك الأحداث اليوم في &amp;quot;العوامية&amp;quot; هي في أساسها فكرية أولاً ثم لما أهمل التعامل معها فكريًا تطورت من فكرة إلى عمل كما يقول ذلك &amp;quot;فرانك أنلو&amp;quot; في كتابه &amp;quot;القيادة والتغيير&amp;quot;. وإن إهمال المواجهة الفكرية اليوم يهدد ديننا وأمننا الفكري ووطننا، فبالفكرة وحدها يمكن اختراق أقوى الأنظمة كما يقول &amp;quot;جوزيف ناي&amp;quot; -مدير مجلس المخابرات الوطني الأمريكي- في مؤلفه &amp;quot;القوة الناعمة&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن الحل هو في عمل فكري كبير ومنظم ومدعوم يواجه العمل الفكري الذي تقوم به &amp;quot;الدولة الأجنبية&amp;quot;، التي تمتلك وتمول وتدعم أكثر من (40) قناة فضائية، وتملك وتدعم مئات المواقع الضخمة على الشبكة العنكبوتية، ولها عشرات الآلاف من المندوبين والمبلغين والمبشرين، وعندها مئات المراكز الناشطة، وعشرات المراكز البحثية، وفي المقابل لا يوجد شيء من ذلك ألبتة في دول الخليج مجتمعة.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن الأفكار التي تبثها &amp;quot;الدولة الأجنبية&amp;quot; مثل &amp;quot;أحلام المهدي&amp;quot; أو فكرة &amp;quot;313&amp;quot; أو فكرة &amp;quot;مقتل حاكم خليجي&amp;quot;، أو غير ذلك من الأفكار ذات الطابع الثوري أو الانفصالي، أو بث الكراهية والأحقاد في المسيرات الفكرية المعبأة والملغمة، إذا لم يُلتفت إليه فكريًا فسوف تصنع أفعلاً وأحداثًا، لأن جاذبيتها على الطرف المستعد للإيمان بها كبير، ومن ثم يسهل على &amp;quot;الدولة الأجنبية&amp;quot; &amp;ndash;كما يقول&amp;quot;جوزيف ناي&amp;quot;- أن تستغل جاذبيتها الفكرية وتسخير ذلك لزيادة إمكانية اختراقها والتأثير عليها.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن عدم الاهتمام بهذا الجانب وتجاهله يُعد بكل وضوح تضحية بجيل يمكن أن يُغرر به ويفقد ولاءه، والاستهانة بقناة فضائية أو مركز فكري أو عالم ديني يوجه رسائل ثورية؛ خطأ فادح وكبير، لأن&amp;quot;الأفكار الفلسفية التي يطرحها أستاذ من مكتبه الهادئ قادرة على إبادة حضارة بكاملها&amp;quot; كما قال الألماني &amp;quot;هاينه&amp;quot;. وحقيقة الأمر كما ذكر ذلك &amp;quot;روبرت رايلي&amp;quot;، مدير إذاعة صوت أمريكا، هي: &amp;quot;أن الحروب تخاض ويتم فيها تحقيق النصر أو الهزيمة في عقول الناس، قبل وقت طويل من بلوغها نهايتها في ميدان قتال بعيد&amp;quot;. وإهمال الأفكار المخالفة دون تصدٍّ لها &amp;quot;يكسبها قوة كاسحة، لا يمكن مقاومتها أو كبحها، تفرض على أعداد هائلة من البشر&amp;quot;، كما يقول الباحث الغربي &amp;quot;إيزايا برلين&amp;quot;. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;فحينما تدعم إيران والمرجعيات الموالية لها عشرات القنوات الفضائية لبث الكراهية والإرهاب، ونشر التشيع، وطباعة الكتب بالآلاف بل بالملايين، وتوزيع الأشرطة، وإقامة المؤتمرات ومراكز البحث العلمي بالعشرات، لا تجد من يقابل مشروعها الفكري بأقل القليل.&lt;br /&gt;
وحينما يقوم مركز فكري إيراني متخصص مثل مركز &amp;quot;الدراسات العقدية&amp;quot; بإيران، بنشاطات التجسس في الخليج وتجنيد من يسميهم &amp;quot;المستبصرين&amp;quot; أو &amp;quot;المبلغين&amp;quot;، فإنه لا يوجد مركز خليجي واحد يرصد ذلك ويتابعه فكريًا. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وحينما يقوم في إيران مثل &amp;quot;محمد تقي المدرسي&amp;quot; منذ عقود بعمل مكثف للدعوة إلى الإرهاب والتمرد والخروج المسلح، وفتح معسكرات إرهابية لتدريب المتطوعين على الاغتيالات والقتل والتفجير، ثم هو اليوم من إيران وكربلاء يكرر عمله في أحداث &amp;quot;البحرين&amp;quot; و&amp;quot;العوامية&amp;quot;، ويدعو للإرهاب والفتنة، ويبث أشرطته، ويُلقي كلماته عبر قنوات الشيعة ومنها قناة &amp;quot;أهل البيت&amp;quot;، ويطبع كتبه وأبحاثه، ويوجه دعوات صريحة وتحريضية على العنف، ومع ذلك لم يُتَخَذ بحقه أي إجراء قانوني، بل ولم يتم دراسة مشروعه الفكري وأهدافه من قبل مركز مختص.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وحينما يقوم عالم ديني آخر في إيران وهو &amp;quot;علي الكوراني&amp;quot; ويـبث أفكارًا دينية متطرف يُـبشر فيها بقرب مقتل حاكم خليجي، كما في كتابه (عصر الظهور)، لا يُحاسب قانونيًا ولا يواجه فكريًا، مع أن تلك الأفكار خطيرة جدًا. ويجب أن لا يُستهان بهذه الأفكار التي يروجها القادة في إيران، فعن طريقها تمرر المشاريع السياسية المشبوهة. &amp;quot;فعلي الكوراني&amp;quot; حين يسرد في كتابه بشارات وعلامات خروج مهدي الشيعة، ويسرد مجموعة روايات، منها مقتل شخص اسمه &amp;quot;الملك عبدالله&amp;quot; في الحج وفي عرفات، ماذا يريد، وماذا يقصد، ولأي شيء يهدف؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولتتضح الصورة أكثر، فقد ذكر روايات كثيرة منها: ما ينسبون إلى جعفر بن محمد أنه قال: &amp;quot;من يضمن لي موت عبد الله أضمن له القائم. ثم قال: إذا مات عبدالله لم يجتمع الناس بعدة على أحد، ولم يتناه هذا الأمر دون صاحبكم إن شاء الله. ويذهب ملك السنين، ويصير ملك الشهور والأيام. فقلت: يطول ذلك ؟ قال: كلا&amp;quot;. ثم يتحدث &amp;quot;الكوراني&amp;quot; بهذه الأمر على القنوات الشيعية بلغة تحريضية واضحة على الاغتيال والإرهاب، ثم يؤكد في كتابه أنَّ: &amp;quot;عبد الله آخر من يحكم الحجاز&amp;quot;، ثم يقول إن الروايات &amp;quot;تكاد تكون متواترة بأن ظهور المهدي عليه السلام يكون على أثر موت حاكم أو ملك أو خليفة واختلاف على من يكون بعده وحصول أحداث داخلية و فراغ سياسي في الحجاز&amp;quot; [42].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ثم يقوم شيوخ الشيعة بترويج مثل هذه الشائعات الخطرة، مثل الشيخ &amp;quot;فارس فقيه&amp;quot; حيث يقول: &amp;quot;تشير الرواية إلى أن آخر حكام الحجاز هو الملك عبدالله، وأن الأسرة الحاكمة ستختلف من بعده على غرار الخلاف الذي حصل في الكويت&amp;quot;[43]. ويقول الشيخ &amp;quot;ماجد المهدي&amp;quot; ما نصه: &amp;quot;ستكون هناك حالة فراغ سياسي في ذلك الوقت بعد موت ملك و اسمه (عبد الله) ونحن نعرف إن الأمير عبد الله هو ولي العهد في السعودية اليوم وأن مسالة تسلمه الحكم أصبحت مسألة وقت. وقد ذُكر عن الإمام الصادق &amp;quot;من يضمن لي موت عبد الله اضمن له القائم المهدي، أما إنه إذا مات عبد الله لم يجتمع الناس بعده على أحد&amp;quot; [44].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أقول: إن أخطر ما في هذا الأمر أن زعماء وساسة الشيعة، الموجود معظمهم في إيران، يوظفون تلك الروايات المكذوبة على أرض الواقع، ويحمسون ويشجعون أتباعهم ومن يواليهم على تحقيقها من أجل تعجيل خروج المهدي. وقد ثبت أنه في منتصف عام 2004، وتحديداً في 18 يونيو/ حزيران، حينما اندلعت في اليمن &amp;quot;فتنة الحوثي&amp;quot; بقيادة &amp;quot;حسين الحوثي&amp;quot;، والتي كبدت اليمنيين الكثير من الخسائر في الأرواح والممتلكات، كان وراءها دعماً إيرانيا لوجستياً، ووجدوا أوراقاً ووثائق إيرانية تثبت ذلك، وقد سبق ذلك بثٌ لأفكارٍ مشابهٍ نص فيها &amp;quot;علي الكوراني&amp;quot; على أن &amp;quot;الحوثي&amp;quot; هو الزعيم اليماني الذي بشر به الأئمة. وهذا اليماني هو من يعتقدون أنه سيساعد المهدي في إسقاط حكام الحجاز.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ويقول مؤلف كتاب &amp;quot;الحرب في صعدة&amp;quot;: &amp;quot;لم يظهر التعصب المذهبي إلى أن ذهب حسين الحوثي مع والده إلى إيران وأقاما هناك عدة أشهر، ثم قيامه بزيارة حزب الله في لبنان، ثم قدوم مجموعة من الشيعة العراقيين إلى مراكزه التي أقامها، للتدريس فيها، وقد أدّى ذلك إلى التأثير عليه وعلى أتباعه&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولذلك، فإن ما تعمله إيران في العراق والبحرين وسوريا ولبنان واليمن والعوامية وغيرها من المناطق هو استهداف بالدرجة الأولى لدول أهل السنة وعلى رأسها السعودية، وطبقاً لقول مسئول رفيع المستوى في وزارة الاستخبارات الإيرانية، فإن &amp;quot;إيران تعتبر السعودية هي منافسها الرئيسي ليس فقط في المنطقة، ولكن في العالم الإسلامي ككل، ومن ثم فإن عملياتنا في العراق وفي الخليج تمثل وسائلنا الأساسية لموازنة ذلك&amp;quot;[45].&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن إيران لديها الاستعداد أن تحرق جميع أبناء شيعة المنطقة لتحقيق توسعها ونفوذها، وذلك من خلال مشروعها الفكري التبشيري، وقد بذلت لذلك عشرات القنوات والمراكز والصحف ومواقع الإنترنت، واستخدمت علماء الشيعة القابعون عندها لترويج الشائعات والأساطير والخرافات التي تبث الفتن والبلبلة بين أبناء الشيعة أنفسهم وبينهم وبين أهل السنة الذين يعيشون معهم بسلام ووئام في الخليج العربي.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;والسؤال الأخير والمهم: هل سيوجد هناك مشروع أو برنامج فكري يواجه المشروع الفكري الإيراني، لحماية أبناء الوطن، سنة وشيعة؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أتمنى أن لا يطول الانتظار، في وقتٍ يعمل من يريد بالبلاد السوء ليل نهار! &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;عايض بن سعد الدوسري&lt;br /&gt;
الرياض&lt;br /&gt;
7/10/2011&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-----------------&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;التوثيقات والمراجع:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;(1) مقابلة معه في صحيفة صدى البلد - 18 أبريل 2006م.&lt;br /&gt;
(2) مقابلة معه في صحيفة الشرق الأوسط 25-9-2003- العدد 9067، وأعادت نشرها الوكالة الشيعية للإنباء تاريخ 25/9/2006م.&lt;br /&gt;
(3) نفس المصادر السابقة.&lt;br /&gt;
(4) نفس المصادر السابقة.&lt;br /&gt;
(5) انظر: دولة حزب الله، ص 336.&lt;br /&gt;
(6) انظر: الحرس الثوري الإيراني نشأته وتكوينه ودوره، كينيث كاتزمان، ترجمة: مركز الإمارات للدراسات والبحوث الاستراتيجية، (ص 104) الطبعة الأولى، 1996م&lt;br /&gt;
(7) جريدة النهار، 27/1/1986م.&lt;br /&gt;
(8) مجلة المقاومة، العدد: 27، ص 15- 16.&lt;br /&gt;
(9) مجلة مختارات إيرانية السنة السادسة العدد 69ـ أبريل 2006م.&lt;br /&gt;
(10) مجلة مختارات إيرانية السنة السادسة العدد 69ـ أبريل 2006م.&lt;br /&gt;
(11) جريدة السفير اللبنانية، 18/5/1995م.&lt;br /&gt;
(12) جريدة الأنباء- العدد: (8302) 14/2/1420هـ .&lt;br /&gt;
(13) مجلة المجلة 29 /4/2006م.&lt;br /&gt;
(14) رويترز 23/6/2006م&lt;br /&gt;
(15) الوطن العربي - 26/5/2006 م&lt;br /&gt;
(16) مجلة المقاومة، العدد: 31، ص 6.&lt;br /&gt;
(17) الوطن العربي 5/5/2006 م.&lt;br /&gt;
(18) جريدة القبس 2/5/2006 م.&lt;br /&gt;
(19) صحيفة الشرق الأوسط 12/2/2006م.&lt;br /&gt;
(20) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 36 .&lt;br /&gt;
(21) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 117 .&lt;br /&gt;
(22) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 231 .&lt;br /&gt;
(23) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 140، 186، 189، 233.&lt;br /&gt;
(24) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 144.&lt;br /&gt;
(25) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 145.&lt;br /&gt;
(26) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 177.&lt;br /&gt;
(27) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 208.&lt;br /&gt;
(28) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 180.&lt;br /&gt;
(29) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 186.&lt;br /&gt;
(30) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 190.&lt;br /&gt;
(31) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 213 و223.&lt;br /&gt;
(32) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 218.&lt;br /&gt;
(33) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 220.&lt;br /&gt;
(34) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 226.&lt;br /&gt;
(35) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 248.&lt;br /&gt;
(36) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 255.&lt;br /&gt;
(37) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 356.&lt;br /&gt;
(38) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 356.&lt;br /&gt;
(39) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 396.&lt;br /&gt;
(40) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 370.&lt;br /&gt;
(41) الانقلاب بيع الوهم على الذات، ص: 399.&lt;br /&gt;
(42) دراسة أولية لعلامات الظهور- آية الله علي الكوراني.&lt;br /&gt;
(43) كتاب العلامات الكبرى لظهور الإمام المهدي تأليف: فارس فقيه -لبنان.&lt;br /&gt;
(44) كتاب الإمام المهدي -ماجد المهدي.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مأخوذ من: جسور التواصل&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مؤتمر الصحوة الإسلامية في طهران هل يعوض خسارتها في الشارع العربي والإسلامي؟</title>
<link>http://qalamlib.com/news/325</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;bdo dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;اسامة شحاتة - كاتب أردني&lt;/span&gt;&lt;/bdo&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;شهدت العاصمة الإيرانية طهران خلال الفترة 17-18 أيلول/ سبتمبر الجاري فعاليات المؤتمر الدولي الأول للصحوة الإسلامية والذي حظي برعاية رسمية على أعلى مستوى، حيث افتتحه المرشد الإيراني علي خامنئي بكلمة امتدح فيها الثورات العريبة التي زعم أنها استلهمت الثورة الخمينية لكنه في كلمته تجاهل الثورة القائمة في سوريا، كما عُين مستشار خامنئي، علي أكبر ولايتي، أمينا عاما للمؤتمر، وألقى الرئيس الإيراني نجاد، كلمة في جلسة الافتتاح وكذلك وزير الخارجية الإيراني علي أكبر صالحي، رغم أن ولايتي أمين عام المؤتمر كان قد أكد عدم وجود تمثيل حكومي فيه، وأن جميع المشاركين هم من الشخصيات المستقلة!!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وهذا المؤتمر طرحت فكرته في الدورة التاسعة من الملتقى الفكري للممثلين الثقافيين الإيرانيين في الخارج، ويعرف الخبراء بالشؤون الإيرانية أن الملحقيات الثقافية في السفارات الإيرانية تعد من أنشط أذرع جهاز نشر التشيع وتصدير الثورة في العالم مما يفضح حقيقة هذا المؤتمر.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;عقد المؤتمر بمشاركة 600 شخصية من خارج إيران و400 شخصية إيرانية من 80 بلداً، لكن الغريب أن المؤتمر رغم أنه يحمل اسم الصحوة الإسلامية لم يُدعَ إليه أية شخصية سلفية برغم أن الدعوة السلفية هي مُكوّن رئيس في الصحوة على مستوى العالم، وأيضاً فإن غالب جماعات الإخوان المسلمين لم تشارك في المؤتمر وخاصة الجماعة الإسلامية بلبنان، أما حركة حماس فقد تغيب عن المؤتمر رئيس مكتبها السياسي خالد مشعل وحضر نائبه موسى أبو مرزوق في رسالة واضحة &amp;ndash; للمتابعين - بعد تصادم مواقفهما من جرائم النظام السوري وتقنين الدعم الإيراني للحركة، وكان الدكتور محمود غزلان عضو مكتب الإرشاد لجماعة الإخوان بمصر صرح أن الجماعة أرجأت مشاركتها لحين تحسن العلاقات المصرية الإيرانية، كما أن &amp;quot;الجماعة الإسلامية المصرية&amp;quot; اعتذرت عن المشاركة، بينما رفض تنظيم &amp;quot;الجهاد&amp;quot; المصري المشاركة بسبب المواقف الإيرانية المخزية تجاه المذابح الطائفية بحق الشعب السوري، وقد غاب عن المؤتمر الكثير من الجماعات الإسلامية العريقة فلم تُظهر أخبار المؤتمر مشاركة أي شخصية خليجية أو سورية أو أردنية أو يمنية سنية لها حضورها.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أما أبرز المفارقات فكان تغييب ممثلين حقيقيين لأهل السنة الإيرانيين عن جلسات المؤتمر التي اتسعت لـ 1000 شخص من 80 بلداً، لكنها ضاقت ببضعة أفراد إيرانيين لأنهم من أهل السنة فقط، ولذلك وجّه نشطاء أهل السنة في إيران عبر وسائل الإعلام رسالة مفتوحة إلى المرشد خامنئي، بالتزامن مع بداية المؤتمر طالبوه فيها بإزالة التمييز الديني الذي يعانون منه في إيران قبل توصية الآخرين بالاهتمام بتجنب الخلافات الطائفية والقومية والعرقية، ووجهوا سؤالاً للمشاركين في المؤتمر: &amp;quot;كيف تقبل شعوب المنطقة وغالبيتها من أهل السنة بأن يصبح النظام الذي يمنعهم من بناء مسجد أو إقامة الصلاة في العاصمة، أسوة لهم&amp;quot;؟ &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وذكروا في رسالتهم: أنه قدم &amp;quot; 300 عالم من أهل السنة في كردستان، وعدد آخر من العلماء مطالب للاجتماع مع القائد المعظم، لكنه لم يرد عليها&amp;quot;!!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وأما محاور المؤتمر فقد أوضح ولايتي أن المشاركين فيه سوف يناقشون خمسة محاور رئيسة، وهي: أسس ومفاهيم الصحوة الإسلامية، ودور الأشخاص المؤثرين فيها، وتعريف التيارات، ودراسة المخاطر التي تهدد الصحوة الإسلامية، وتوحيد صفوفها، بالإضافة إلى مناقشة أهداف وتداعيات الصحوة الإسلامية ومستقبلها.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;والمعلوم أن مصطلح &amp;quot;الصحوة الإسلامية&amp;quot; يراد بها الظاهرة الإجتماعية التي تعنى عودة الوعي للأمة وإحساسها بذاتها واعتزازها بدينها والتي عمل في سبيلها الدعاة المستقلون والحركات الإسلامية من السنة، ولكن مؤتمر طهران تجاهل هذا كله وحاول أن يفرض على أرض الواقع أن من شارك فيه هم هم قادة الصحوة، وإذا تأملت في المشاركين وجدت أن المؤتمر حرص على زج الجماعات والأحزاب الشيعية التي ليست لها صلة بالصحوة الإسلامية أصلاً لتصبح مكوناً رئيسياً للصحوة الإسلامية، إنها محاولة إيرانية جديدة لسرقة بساط الصحوة بعدما سرقت بساط الجهاد والمقاومة من قبل.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;والملفت للنظر أن إيران تذكرت الصحوة الإسلامية بعد 40 سنة على ظهورها، وطوال هذه السنوات لم تكن الصحوة تعني لها شيئاً!! ومن جهة أخرى شكلت مشاركة شخصيات علمانية مثل أحمد جبريل، زعيم الجبهة الشعبية لتحرير فلسطين، ورئيس اليمن الجنوبي السابق علي ناصر محمد، وهما من خلفيات فكرية لينينية ماركسية، في مفارقة عجيبة تظهر حقيقة الصحوة الإسلامية الإيرانية.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وفي نهاية المؤتمر تم الاتفاق على &amp;quot;تأسيس (المجمع العالمي للصحوة الإسلامية) وأن تستضيف طهران الأمانة الدائمة للمؤتمر لضمان استمرار حركة الصحوة الإسلامية وشموخها عبر تعزيز الاتصالات والتعاون ونقل التجارب&amp;quot;، وأن هذه الأمانة ستتابع قرارات المؤتمر والاجتماعات التخصصية له وتقوم بالإعداد والتحضير لعقد مؤتمرات دورية للصحوة الإسلامية وتنظم عملية التواصل المستمر بين المفكرين والمثقفين من العالم الإسلامي، مما يكشف عن حقيقة المؤتمر والغاية والدور المطلوب منه مستقبلاً كأحد الأدوات الإيرانية، ومما يؤكد هذا هو تفحص البيان الختامي الذي صدر عن المؤتمر والذي جاء مطابقاً لكثير من كلمات المشاركين التي مجدت الثورة الإيرانية ورموزها والفكر الشيعي مثل كلمة كمال الهلباوي ود. مها الدوري أو الكلمات التي أيدت سياسة إيران في دعم النظام السوري ضد الثورة السورية مثل كلمة أحمد جبريل.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;جاء في البيان الختامي: &amp;quot;أكد المؤتمرون على ما يلي:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;* إن انتصار الثورة الإسلامية الإيرانية بقيادة سماحة الإمام الخميني &amp;laquo;رضوان الله تعالى عليه&amp;raquo; مجدد الإسلام العظيم في التاريخ المعاصر، والتي واصلت مسارها بقيادة سماحة آية الله العظمى الخامنئي، فتح مرحلة جديدة، لتطوير موجة الصحوة الإسلامية على مستوى العالم الإسلامي وبرهن للجميع إمكانية استعادة العزة والقدرة الإسلامية المهدورة لجميع الشعوب على أساس التعاليم الدينية والالتزام بالقيم الإسلامية السامية والدفاع عن كرامتهم الإنسانية بكل قوة..&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;bdo dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;اتفق المشاركون في المؤتمر على مايلي:&lt;/span&gt;&lt;/bdo&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إذ نثمن غاليا المواقف الحكيمة والتاريخية لقائد الثورة الإسلامية المعظم سماحة آية الله العظمى الخامنئي (مد ظله) الذي كان ولا زال يلعب الدور الاستراتيجي في نمو وازدهار الصحوة&amp;zwnj; نستحسن توجيهاته الجديرة في الدفاع عن حرمة الإسلام والمسلمين في مختلف الصعد ونقر كلمته في حفل الافتتاح باعتبارها منطلقا أساسياً وخارطة طريق في هذا المضمار&amp;quot; أ.هـ.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;إن هذا المؤتمر يجيء ضمن خطوات إيران الرامية لتعويض خسارتها في الشارع العربي والإسلامي بعد أن فضحت ثورة المعلومات والاتصالات حقيقة فكرها ومبادئها التي قامت عليها وفضحت أيضاً مواقفها الانتهازية والمخزية بالوقوف مع المحتلين والطغاة ضد الشعوب المسالمة، فالفضائيات والمواقع والمنتديات الشيعية والإيرانية قدمت الصورة الحقيقية للمعتقدات الشيعية المغالية التي تؤمن بها قطاعات كبيرة وأساسية في إيران ولدى حلفائها، كما أن الثورة الإعلامية اليوم تجاوزت حالة التعتيم الإعلامي التي شيدت عليها إيران نفوذها، فقد توالت المواقف التي أظهرت الحرص الإيراني على مصالحها الذاتية والمتناقضة مع المصالح الإسلامية العامة والعليا مثل:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;* موقف إيران الانتهازي من دعم الاحتلال الأمريكي للعراق والتخاذل عن دعم المقاومة كان هو الشرارة التي نبهت البعض.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;* السكوت عن المجازر بحق العراقيين والفلسطينيين في بغداد والتي قامت بها الميلشيات الشيعية بدعم إيراني.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;* الموقف الهجومي الظالم لإيران ووكلائها ضد الشيخ يوسف القرضاوى حين انتصر للحق برفض نشر التشيع في البلاد السنية، ورفض التطاول على الصحابة وأمهات المؤمنين رضوان الله عليهم.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;* تأييد النظام السوري الأسدي في قتله وتعذيبه لشعبه.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;هذه المواقف وغيرها أفرغت شعارات إيران القديمة من مضمونها مثل شعار (الوحدة الإسلامية) وشعار (التقريب بين المذاهب الإسلامية)، والتي أنشأت لها مؤسسات ترعاها وتقوم على تنفيذ أجندتها، وها هي اليوم تلجأ لشعار جديد وهو &amp;quot;الصحوة الإسلامية&amp;quot; وتنشئ له مؤسسة جديدة، فهل تضحك إيران علينا من جديد؟ أم أن أمتنا فهمت الخدعة الإيرانية؟؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;مأخوذ من: جسور التواصل&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>محمد حسين فضل الله في عيون خصومه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/324</link>
<description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;bdo dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span class=&quot;source-text&quot;&gt;خالد بن محمد البديوي&lt;/span&gt; &lt;/bdo&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أول لقاء جمعني بالمرجع الراحل محمد حسين فضل الله كان في مارس 2003، وفي أول الأمر كنت أظن أن اللقاء معه سيكون صعباً كما اعتدت على ذلك مع كثير من المبرزين الذين عرفتهم، لكنني عندما اتصلت بأحد الأرقام المدونة في موقع فضل الله الإلكتروني، تلقيت رداً مباشراً من شخص وبعد أن عرفته بنفسي وحاجتي للاتقاء بفضل الله قاطعني وطلب مني الانتظار، ثم كلمني شخص آخر أجش الصوت ومن الواضح أنه كبير السن، فأعدت له نفس الكلام، فقاطعني وقال أنا محمد حسين فضل الله ما المطلوب؟ تلعثمت أولاً.. ثم أخبرته برغبتي في الاتقاء به لأنّني سأتطرق لآرائه في بحثي لمرحلة الماجستير، الذي طبع لاحقاً بعنوان &amp;quot;أعلام التصحيح والاعتدال في صفوف الإمامية&amp;quot;، فجاء تحديد موعد اللقاء بسهولة.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أذكر أنني عندما وصلت إلى حارة حريك في بيروت حيث يسكن فضل الله، انتابني شيء من القلق لِما رأيت من الحراسة المشددة هناك، فليس بيت المرجع هو المُطَوَّق وإنما الحارة التي يسكنها كلها مطوقة بسياج حديدي ولا يُستطاع الدخول إليها إلا عبر بوابة يتم تفتيشك عندها بشكل دقيق.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;لم يكن فضل الله هو المتعاون معي فحسب، بل العاملون معه أيضاً، إلى درجة أنهم لم يترددوا في تزويدي بما لديهم من مقالات أو كتب حتى لأولئك الذين ينتقدون مرجعهم محمد حسين فضل الله.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(128, 0, 0);&quot;&gt;&lt;bdo dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;خصومه ومحاولات وأده في حياته&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/bdo&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;عندما اطلعت على أقوال منتقدي محمد حسين فضل الله أدركت شدّة الحملة عليه، فهذا وحيد الخرساني، وهو من المراجع المعاصرين، يصف آراء فضل الله بأنها &amp;quot;إضلال عن سبيل الله وإفساد في الطريقة الحقة&amp;quot; (الحوزة العلمية تدين الانحراف-القسم الثالث/وثيقة 11)، كما وصف فضل الله بأنه &amp;quot;ضال مضل&amp;quot;, وصرح الخرساني في أحد مجالسه العلمية بقوله: &amp;quot;يجب على جميع المؤمنين، كل بحسب وسعه وقدرته إسقاط فضل الله&amp;quot;! وعندما سأله أحد الحضور: هل نقتله؟! أجابه: &amp;quot;كلا&amp;quot;، ثم يعقب بما يكشف بأن ذلك ليس لحرمة دمه، فيقول: &amp;quot;لأنه إذا قتل فستصبح أفكاره أكثر شهرة ورواجاً، والواجب هو القضاء على أفكاره ومنع انتشارها&amp;quot; (فتنة فضل الله/فصل الموقف من الفتنة).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وأما المرجع جواد التبريزي فقد وصف آراء فضل الله بأنّها &amp;quot;خلاف المسلمات بل ضروريات المذهب الحق, وقائلها خارج عن طريقة المذهب الاثني عشري, وأن فضل الله ومن يسهم في نشر أقواله يدخلون في عنوان: من يشري مرضاة أعدائنا بسخط الخالق&amp;quot; (الحوزة العلمية تدين الانحراف - القسم الثالث/وثيقة12).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أما المرجع محمد تقي بهجت فقد صرح &amp;quot;بأنّ فضل الله مشروع وهابي ينخر في كيان التشيع من داخله&amp;quot; (فتنة فضل الله/فصل الموقف من الفتنة).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;كما اعتبر الشيخ علي السيد حسين يوسف مكي أن فضلَ الله &amp;quot;يشكل خطراً كبيراً على التشيع وعلى الفكر الشيعي وعلى أسسه وقواعده وعقائده وشرائعه وتاريخه&amp;quot; (انظر رسالته للتريزي والخرساني, الحوزة العلمية تدين الانحراف، ص 175 و176/وثيقة20 و21).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;واعتبر محمد الصدر أن فضل الله يحمل &amp;quot;مشروعاً خطراً&amp;quot;, حقيقته: &amp;quot;تغيير الشخصية الشيعية باستبدال عقيدتها الأصلية بعقيدة مزيفة&amp;quot; (ردود المرجع الديني السيد محمد الصدر على الشبهات البيروتية ص3/دار الملاك الأصيل-بيروت/مصور ضمن ملاحق كتاب الحوزة العلمية تدين الانحراف).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وفي بيان الحوزة في (قم) اعتبروا أقواله &amp;quot;ضلالاً وإضلالاً&amp;quot; و&amp;quot;إنكار لضروريات المذهب&amp;quot; (الحوزة العلمية تدين الانحراف - القسم الثالث 179-181).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;كما أصدرت الحوزة العلمية في أصفهان بياناً جاء في عنوانه: &amp;quot;انحرافات الضال المضل فضل الله&amp;quot; (الحوزة العلمية تدين الانحراف - القسم الثالث 169).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أما محمد باقر الصافي، مؤلف كتاب فتنة فضل الله، فقد أوغل في ذم فضل الله فنعته بأنه &amp;quot;صاحب فتنة&amp;quot;, وأنه صاحب &amp;quot;دور خبيث&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وقد فهمت وقتها أن هذه الأقوال تشير إلى شدّة الخلاف الواقع بين هذا الفريق وبين محمد حسين فضل الله وأن هؤلاء كانوا يستشعرون خطراً حقيقياً في آراء فضل الله.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;والسؤال الذي يطرح نفسه: ما الآراء التي تبناها فضل الله وجعلت هذا الفريق يتبنى هذا الموقف المعادي منه؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;لعل من أبرز مآخذ منتقدي فضل الله أنهم اعتبروه ممن يشكك في الضروريات التي يعتقدونها.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;فعندما شكك فضل الله في صحة روايات كسر ضلع فاطمة الزهراء (رضي الله عنها) وقتل جنينها على يد عمر (رضي الله عنه)، مستبعداً أن يحدث ذلك لأن الروايات التي تذكر الحادثة تخبر بوجود علي (رضي الله عنه) في المنزل، وليس علي (رضي الله عنه) فقط بل معهم بني هاشم كلهم، فالتسليم بهذه الرواية يؤدي لاتهام علي بالجبن وتخاذل أهل البيت عن نصرة بنت النبي (صلى الله عليه وسلم) وهذا ما دعا فضل الله للتشكيك دون النفي القاطع.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ومع أن هذه جزئية تاريخية إلا أن كثيراً من الذين ردّوا على فضل الله اعتبروها من الضرورات التي لا يسوغ إنكارها, فقد حكم المرجع التبريزي على محمد حسين فضل الله بالخروج من المذهب بمجرد تشكيكه في هذه القضية (الحوزة العلمية تدين الانحراف26. وانظر وثيقة ص259).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;كما أن قول محمد حسين فضل الله &amp;quot;إن الإمامية من المتحول&amp;quot; وليست من ضرورات الدين التي توجب الخروج من الإسلام, ووصفه الإمامة بأنها من (المتحول) الذي يدور في فلك التوثيق والتضعيف، أقول: هذا القول أحدث ضجة كبيرة ضد المرجع فضل الله عام 1418هـ وفتح عليه باباً واسعاً لمحاولة إسقاطه، فقد اعتبره بعض خصومه ممن يشكك في القطعيات, وذهب المرجع الخرساني في ردّه إلى درجة بعيدة حينما قال في معرض ردّه على فضل الله: &amp;quot;إلقاء الشك فيها [يعني الإمامة] نقض للغرض من الخلقة والبعثة&amp;quot; (انظر الحوزة العلمية تدين الانحراف/القسم الثالث ص147/ وثيقة11).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;كما أن منتقدي فضل الله أخذوا عليه قوله في الشفاعة وعدم مشروعية اتخاذ الوسطاء في الدعاء، حيث أكد فضل الله أنّ المؤمن &amp;quot;لا يسأل غيره [أي الله] فيما يريد سؤاله, ولا يطلب حاجته من غيره, ولا يدعو أحداً سواه, ولا يشرك أحداً معه في رجائه, ولا يتفق معه في دعائه, فهو المدعو في وحدانية الدعاء&amp;quot; (تفسير من وحي القرآن/تفسير الفاتحة).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وقد ردّ آية الله تقي القمي قولَ فضل الله بنفي الحاجة للوسطاء بين الله وخلقه في طلب الحاجات, وعدّ كون الأئمة وسطاء في طلب الحاجات من ضروريات الدين, فقال: &amp;quot;أما جعل الأنبياء والأئمة عليهم السلام والأولياء وسطاء إلى الله لقضاء الحوائج, فمما لا إشكال فيه ثبوتاً, كما أن الأدلة كافية لإثبات المُدْعَى, والسيرة بين المسلمين جارية على المنوال المذكور, وكل من ينكر هذا الأمر فقد أنكر ضرورة من ضروريات المذهب بل الدين&amp;quot; (الحوزة العلمية تدين الانحراف/ملحق الوثائق الجديد ص7).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وما ذكره القمي هنا غاية في الغلو؛ لأن مقتضى كلامه كفر من قال لا إله إلا الله ولو قام بجميع فرائض الإسلام, ما لم يقر بكون الأنبياء والأئمة وسطاء في طلب الحاجات، لأنه في نظره أنكر لضروري من ضروريات الدين.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ومن أبرز مواضع الخلاف بين فضل الله ومناؤيه مسألة الولاية التكوينية &amp;ndash;أي اعتقاد تصرف الأئمة بالكون، حيث أنكرها فضل الله مبيناً أن دور الرسل والأنبياء هو دور دعوي تشريعي, وليس دوراً إدارياً للكون (تفسير من وحي القرآن &amp;ndash; سورة المائدة- آية 48/49). ورأى فضل الله أن الرسل والأنبياء والأئمة بشر في خلقتهم وطريقة حياتهم وأساليب دعوتهم وعليه فقد حكم على القول بالولاية التكوينية بأنه انحراف عن ما يقرره القرآن (تفسير من وحي القرآن &amp;ndash; الأنعام آية 50)، كما أن محمد حسين فضل الله استغرب ممن يؤمن بهذه العقيدة مع أن الأئمة لم يستخدموا هذه القدرة لا في حماية أنفسهم ولا في حماية رسالتهم، وكما يقول فضل الله: &amp;quot;ثُمَّ ما معنى هذه الولاية التي لا أثر لها في حياتهم من قريب أو من بعيد، ولا دخل لها في حماية رسالتهم، فلم يستعملوها في إذهاب الخطر عنهم، ولـم يتحرّكوا بها في الانتصار لرسالاتهم، وذلك من خلال قراءة تاريخهم الصحيح كلّه؟&amp;quot;، ( تفسير من وحي القرآن &amp;ndash; سورة المائدة - آية 48/49).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وقد وُجهت آراء فضل الله حول الولاية التكوينية بالرفض من عدّة أسماء بارزة منهم محمد بهجت, ومحمد الشاهرودي, وتقي القمي (المرجع السابق/القسم الثالث/242، 249-250، ملحق الوثائق الجديدة 7-8), كما ألف هشام شري العاملي كتاباً في إثباتها والإجابة عن أدلة فضل الله سمّاه &amp;quot;الولاية التكوينية بين الكتاب والسنة&amp;quot; وغير ذلك.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;لقد تبنى محمد حسين فضل الله فتح باب التصحيح بجرأة وشرّع الباب للنظر في أخطر المسائل، كما سبق وأكد أهمية هذا المنهج بقوله: &amp;quot;لابد من الخروج من أقبية الذات والخصوصيات والحسابات الضيقة، وعلينا أن نواجه قضايانا وأفكارنا وحتى عقيدتنا بالنقد والشجاعة والجرأة قبل أن ينقدها الآخرون، لأننا نملك كماً غير قليل من الموروث الذي تركه لنا الأقدمون، والذي ينبغي النظر إليه بعين النقد والتحليل حتى لا نكون مصداقاً للآية الكريمة: (إنا وجدنا آباءنا على أمة وإنا على آثارهم مقتدون)&amp;quot;، (الحياة 25-1-1999م مقال: فضل الله يقود ثورة ثقافية).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;ولعل هذا المبدأ الذي طرحه فضل الله من أخطر الأمور التي تخوف منها التقليديون في مشروع محمد حسين فضل الله.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;أخيراً: قبل خمس سنوات أخرجت كتابي &amp;quot;أعلام التصحيح والاعتدال&amp;quot; ومنهم محمد حسين فضل الله وكنت متردداً في الحديث عن شخص حيّ قد يغير اجتهاده، وأمّا الآن فقد رحل محمد حسين فضل الله، فالحديث عن مشروعه أنسب، فأقول: رحل محمد حسين فضل الله وهو يمثل أحد وجوه الإصلاح الداخلي في المذهب الاثني عشري، ونحن نسجل له إصلاحات أساسية هي أهم في المقاييس الشرعية من مسألة الإمامة كإصلاحاته في باب إفراد الله بالدعاء والعبادة وطلب الشفاعة من الله وأنّ الأئمة لا يشفعون إلا لمن يأذن الله لهم بالشفاعة له فيجب طلب الشفاعة من الخالق، وتأكيده على إفراد الله بالتصرف بالكون التي تعني إخلاص توحيد الربوبية لله، وكما ذكرت فإن هذه الإصلاحات من محمد حسين فضل الله أتت على أمور أساسية في مسائل تتعلق بتوحيد الربوبية والعبودية وهي أهم من مسألة الإمامة التي يؤكد فإن محمد حسين فضل الله إيمانه بها وبفروعها، وهذا القول يغنينا عن نقل آرائه حول الصحابة، لأن مقتضى قوله بالنص على الإمامة يعني ترك الصحابة لتطبيق أمر الرسول صلى الله عليه وسلم وهي جريمة تستوجب الذم إلا أنهم ليسوا كفاراً، ولولا قول فضل الله إن الإمامة ليست من ضروريات الدين لما صدقنا عدم تكفيره للصحابة واتهامهم بما يوجب الفسق، حاشاهم رضي الله عنهم.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;وفي الجملة يسجل لمحمد حسين فضل الله جرأته في طرح مراجعات أساسية ومهمة، وصموده في تبنيها حتى وفاته، مع شدّة الهجوم الذي لقيه في سبيل ذلك.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;غير أن ما أصابني بالدهشة أنني قرأت لكثير ممن كتب عنه من داخل المذهب بعد وفاته فلحظت تغفلاً عن طرح أهم المسائل التي قدمها المرجع فضل الله في مراجعاته، وقصارى ما رأيت من كثير من أصحاب المقالات الحديث عن نواحٍ لا تشكل فرائد فضل الله، كالتركيز على إنكاره مسألة ولاية الفقيه وقد أنكرها قبله الخوئي، وكان رأس المرجيعة في النجف، بل إن كثيراً مما تحدث عنه أصحاب المقالات يتفق عليه فضل الله مع بعض أشد مناوئيه، فهل هي عدم الجرأة في فتح الملفات الأهم؟ أم هو السير في جنازة فضل الله مع وأد أهم آرائه الإصلاحية؟&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;مأخوذ من: العربية&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>محاولات أولية لاصلاح الفكر الشيعي</title>
<link>http://qalamlib.com/news/323</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;محاولات أولية لاصلاح الفكر الشيعي&lt;br /&gt;
صباح الموسوي&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;إن ما يخشى منه على العالِم المسلم هوخطر الانحراف عن العقيدة السليمة، حيث أن خطر هذا الانحراف لا يضره وحسب وإنما سيكون له آثارا ًسلبية على التابعين له أومن يوصفون بالمقلدِين له (حسب المصطلح الشيعي). لذلك فان سلامة منهج العالِم تأتي من سلامة عقيدته وما يقدمه هذا العالِم من علوم سواء فقهية كانت تلك العلوم أوأدبية أوثقافة عامة لا يخشى منها طال ما أنها محكومة بعقيدة سليمة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لذا نجد أن سبب انبثاق الفرق والحركات البطانية الهدامة إنما جاء بسبب الانحراف الذي أصاب عقائد مؤسسي هذه الفرق والحركات. فلولا حدوث تلك الانحرافات العقائدية لما ظهرت علينا فرق الخوارج والسبئية والقرامطة والنصيرية والصفوية والبهائية والقاديانية وغيرها. وكما هومعلوم فان هذه الفرق والحركات كانت قد ألحقت وما تزال تلحق الأذى بالمسلمين. وحجم هذه الأذى لا يقل عن حجم الأذى الذي ألحقه ويلحقوه الصليبيون والصهاينة بأمتنا الإسلامية.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ومن هنا فان البحث عن تهذيب العقيدة من الشوائب والادران كانت الهدف الأساس لدى الكثير من الباحثين والعلماء المهتدين في الطائفة (الشيعية) وقد استطاع هؤلاء المهتدين أن يكتشفوا الخلل الذي أصاب أفكارهم السابقة ويصححوها بتخليهم عنها ونقدها. وقد توصلوا بهداية من الله تعالي ورحلة بحث علمي إلى الخروج من القلق الذي في داخلهم نتيجة للتضارب الفكري والعقائدي الذي كان يصاحبهم. وقائمة هؤلاء المهتدين طويلة وقد عمل بعضهم &amp;quot;وعلى الرغم من تعرضه للأذى والمحاربة من قبل المغالين&amp;quot; على توثيق وكتابة تجربته ورحلته العلمية التي قادته إلى المعرفة الحقيقية التي ضمنت له سلامة الفكر والمنهج. وقد أصبحت تجارب هؤلاء الرجال مرجعا لمن أعقبهم ودليلا لمحاججة من بقي متمسكن بجاهليته الفكرية والعقدية.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وهنا نحاول أن نلقي الضوء على بعض الشخصيات الإصلاحية التي بزرت على الساحة الشيعية خلال القرن الميلادي المنصرم والتي تركت أثراً واضحةً في الطائفة ومازال بعضها يواصل مسيرة التصحيح والإصلاح على الرغم مما يتعرض له من اضطهاد ومحاربة من قبل المرجعيات الطائفية المغالية التي تخشى من أي حركة تصحيحة وتعدها خطراً يهدم قدسيتها ويهدد وجودها اكثر من خشيتها على العقيدة ذاتها.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وإذا ما راجعنا مسيرة التصحيح الشيعية نجد أن الوجوه البارزة في هذه الحركة قد خرجت من ايران عقر دار الطائفة ومن حوزة قم الدينية منبت الغلوتحديداً. فمن بين الذين كسروا الطوق وتحدثوا في الإصلاح العقائدي والفكري في الطائفة (الشيعية) هوالشيخ &amp;quot;شريعت سنغلجي&amp;quot; المتوفى عام 1943م والذي تناول في كتابيه &amp;quot;الإسلام والرجعة/ فارسي&amp;quot; و&amp;quot;مفتاح فهم الإسلام / فارسي&amp;quot; وبشجاعة وجرأة غير مسبوقة رواية خروج المهدي الموعود مفنداً ما تقوله الروايات الشيعية من أن المهدي تصاحب خروجه ثورة مسلحة يضع فيها السيف على رقاب خصومه.(والخصوم دائم حسب الرواية الشيعية هم أهل السنة) مؤكدا أن خروج المهدي سيأخذ طابعا نهضوي جماعي واجتماعي يلاقي فيه قبولا عالمي. مقدما بذلك تصورا جديداً لمسألة المهدي تتلاءم مع الرؤية الإسلامية العامة ومخالفة للرواية الشيعية التي تظهر المهدي وكأنه سياف لا هم له سوى القتل والانتقام.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وفي كتابه &amp;quot;مفتاح فهم الإسلام&amp;quot; والذي هوتفسير للقرآن في مجلدين، فقد قال عنه الكاتب والباحث الإيراني ناصر الدين صاحب زماني في کتابه &amp;quot;ديباچه اي بررهبري&amp;quot; صفحه 134، أن &amp;quot;الشيخ شريعت&amp;quot; قدم رؤية عصرية للإسلام في ايران استحق أن ينال عليها لقب المصلح الأكبر من قبل اتباعه. كما شبه الكثير من الباحثين الإيرانيين حركة الشيخ &amp;quot;شريعت سنغلجي&amp;quot; التصحيحية بأنها أشبه ما تكون بحركة &amp;quot;لوتر وتوماس منتسروكالون&amp;quot; الذين كانا يريدان العودة بالمسيحية إلى أصولها الأولية وتخليصها مما اُلحق بها من خرافات وبدع.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ويقول هؤلاء الباحثون، أن &amp;quot;شريعت&amp;quot; كان يعمل عن وعي كامل في مواجهة الخرافات التي كان ينتقدها بانتظام في مجالسه وكتاباته ومنها على سبيل المثال خرافة &amp;quot;الرجعة&amp;quot; وظهور &amp;quot;الدجال&amp;quot; و&amp;quot;الشفاعة&amp;quot; وقصة &amp;quot;ظهور المهدي&amp;quot; وغيرها من الخرافات الشيعية الأخرى،. وبخصوص &amp;quot;الرجعة&amp;quot; فقد جمع &amp;quot;الشيخ شريعت&amp;quot; الروايات والأخبار والدلائل النقلية وأضاف إليها استدلالات عقلية لدحضها، محذراً الناس من تصديق هذه الخرافة التي تصور الأمر وكأنه فيلم سينمائي لتاريخ الإنسان يظهر عملية إعادة الأنبياء والأئمة إلى عالم الدنيا من جديد. وكان المستمعون والقراء المتابعون &amp;quot;للشيخ لشريعت&amp;quot; يوافقونه على استدلالاته وآرائه العقلية ولكن أصحاب &amp;quot;البازار- تجار طهران&amp;quot; الذين كانوا يميلون إلى مشايخ الغلوكانوا يشنون حملات تحريضية ضده محاولين ثنيه عن مسيرته التصحيحية.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
علما أن العديد من مشايخ الشيعة الكبار لا يعد &amp;quot;الرجعة&amp;quot; من أصول أوفروع الدين لكن عدد الأخبار والروايات التي وضعت بشأن هذه الخرافة جعلت انتقادها خط احمر لا يمكن المساس به وقد تحولت &amp;quot;الرجعة&amp;quot; مع مرور الزمان إلى عقيدة راسخة في المذهب الشيعي لا يسمح لاحد نكرانها.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وعلى الرغم من أن محاولة &amp;quot;شريعت سنغلجي&amp;quot; كانت محاولة أولية في حركة التصحيح الشيعي إلا أنها فتحت آفاقا مستقبلية واسعة ساعدت في ظهور مصلحين آخرين كانوا اكثر جرأة في الطرح واكثر شمولية في التصحيح. ومن بين هؤلاء المصلحين يمكن ذكر أسماء لامعة أمثال &amp;quot;الأستاذ علي اكبر حكمي زادة&amp;quot; و&amp;quot;الشيخ نعمة الله صالحي نجف آبادي&amp;quot; و&amp;quot; لأستاذ حيدر علي قلمداران&amp;quot; والدكتور علي شريعتي وغيرهم. وقد ترك كل واحد من هؤلاء المصلحين أثراً قيماً في الساحة الشيعية على الرغم من الحرب التي تعرضوا لها من قبل المغالين الذين لم يجدوا سوى كلمة &amp;quot;الوهابية&amp;quot; لأطلاقها عليهم وذلك بعد أن عجزوا عن مناقشتهم بطرق علمية. و&amp;quot;الوهابية&amp;quot; كما هومعروف أصبحت في الأدبيات الشيعية المغالية تهمة توجه لك من يرفض الاعتقاد بالخرافات والبدع التي تلازم الفكر الطائفي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ومن بين الوجوه الإصلاحية التي خلقت هزة مدوية في وسط الحوزة بعد تناوله للأفكار العقدية الشيعية هوالأستاذ &amp;quot; علي اكبر حكمي زاده بن الشيخ مهدي پائين شهري القمي &amp;quot;الذي نقاش في رسالته المسماة&amp;quot; أسرار هزار ساله &amp;ndash; أسرار ألف عام والتي جاءت في 38 صفحة ونشرت في عام 1943م&amp;quot;، دحض فيها مسألة &amp;quot;عصمة الأئمة&amp;quot; التي تشكل أحد أهم أركان العقيدة الشيعية. كما هاجم بشدة المرجعيات الشيعية وسلطتها على العوام من الناس مما استفز حوزة قم ومرجعيتها التي رأت في مثل هذه الأفكار خطرا يحدق بها. وبعد كيل الاتهامات له قام الخميني الذي كان يتزعم الحركة الدينية المعارضة لشاه آنذاك ومن أجل كسب مزيداً من الشهرة قام بوضع كتابه &amp;quot;كشف الأسرار&amp;quot; لرد على حكمي زاده لكنه لم يكن موفقا بالدرجة التي بلغها كتاب &amp;quot;أسرار هزار ساله&amp;quot; الذي خلق هزة حقيقية في الوسط الحوزوي خاصة والشيعي عامة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
لقد فتحت خطوات، الشيخ شريعت والأستاذ حكمي زاده، الباب أمام أصحاب الأفكار النيرة وشجعتهم على طرح آرائهم في إطار الحركة التصحيحية التي كانوا يأملونها في مذهب التشيع وقد جاء كاتب &amp;quot; التشيع العلوي والتشيع الصفوي &amp;quot; لدكتور علي شريعتي (توفي عام 1978م) ليكون رافدا جديدا لحركة التصحيح التي هزت المغالين وكشفت خرافاتهم وانزعت عن مرجعياتهم جزء كبيراً من الهالة والقدسية التي هم عليها.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ورغم أن &amp;quot;الدكتور علي شريعتي&amp;quot; هوابن أحد مراجع الحوزة الشيعية البارزين في مدينة مشهد وكان ذوتوجه إسلامي معتدل ومعارض شديد لحكم النظام البهلوي إلا أن ذلك كله لم يشفع له وقد شنت عليه حملة عشواء دفعت به للخروج من ايران تحت ضغط النظام والحوزة الشيعية ليقتل مسموما في العاصمة البريطانية لندن أواخر السبعينيات ويعتقد أنصاره أن مقتله على يد السافاك (المخابرات الإيرانية آنذاك) جاء إرضاء للزعامات الشيعية التي كانت مؤيدة لحكم الشاه.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
لقد اصبح كتاب &amp;quot;التشيع العلوي والتشيع الصفوي&amp;quot; وغيره من كتب وخطابات الدكتور علي شريعتي مرجعا هاما لكل من أراد التعرف على حجم الخرافات والبدع التي أحدثها الصفويون بالإضافة إلى الكم الهائل من الأخبار والأحاديث المفتعلة التي نسبوها إلى أهل البيت عليهم السلام زورا وبهتانا.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وبالرغم من أن شريعتي يعد الصانع الحقيقي للثورة في وجه الشاه إلا ان نظام الجمهورية الإيرانية حارب أفكاره ولاحق اتباعه ومازالت اغلب كتب شريعتي ممنوعة الطبع والتداول في ايران كما تعرض الكثير من اتباعه إلى الملاحقة والسجن أوالقتل. وما تعرض له مؤخرا اثنان من ابرز المفكرين الإيرانيين السائرين على خط شريعتي وهم المفكر البارز الدكتور عبد الكريم سروش والدكتور هاشم آغاجري له دليل كافي على حجم الخطر الذي ينتاب زعامات الحوزة ومراجع الغلومن أفكار شريعتي وتيار التصحيح الشيعي عامة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ولعل في الكلام الذي جاء على لسان أحد مدرسي حوزة قم الدينية وهو&amp;quot;آية الله مرتضى جعفر العاملي&amp;quot; سوف يتبين لنا مدى عمق الكراهية التي يكنها هؤلاء المغالون لعلي شريعتي وكتاباته القيمة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وهنا نص كلام العاملي: بالنسبة للسؤال عما يقال من تشيع صفوي وتشيع علوي.. أقول:إن التشيع هوحقيقة دين الله تعالى الذي أنزله على رسوله محمد صلى الله عليه وآله.. فمن تمسك به كان من المهتدين، ومن حاد عنه كان من الضالين.. ولا حاجة إلى اللجوء إلى مثل هذه المهاترات التي لا تفيد شيئاً، لا في إحقاق الحق، ولا في إبطال باطل، بل هي سلاح العاجز المهزوم في ساحة البرهان والحجة..على أن اتهام جيل من الناس بأن تشيعه ليس علوياً لهوأمر بعيد عن أخلاقيات الإسلام، وهويحتاج إلى كثير من الجرأة على الحق وأهله.. كيف وقد نشأ في تلك الحقبة، أعاظم علمائنا، وحفظة الدين، وحملة العلم، ومنهم العلامة المحقق المجلسي، والمحقق الكركي، وغيرهما من أساطين العلم الذين نشروا علوم آل محمد، وساعدوا في حفظ الإيمان وأهله. حينما كانت قوى التعصب المقيت تسعى للقضاء عليهم، واستئصالهم، وتقويض دولتهم، وخضد شوكتهم..نقول هذا، ونحن لا ننكر أن لكل حقبة سلبيات تطفوفيها على السطح لعوامل وأسباب مختلفة، ونحن نعتقد: أن من الذين يتحدثون عن تشيع علوي وصفوي، ويسعون إلى تصنيف أنفسهم في التشيع العلوي، من هوأضر على التشيع، بل على الدين كله، من السباع الضارية، والوحوش الكاسرة.. فإنا لله وإنا إليه راجعون..وفي جميع الأحوال نقول: إن هذه التصنيفات تسهم في تمزيق الأمة، وفي إيجاد العقد المستعصية على الحل فيها.. من خلال ادعاءات ترمي لتسويق ما يعجزون عن تسويقه في ظل الفكر المنفتح، والهيمنة العقلية، وسلطة البرهان والحجة، فيلجأون إلى مثل هذه الأساليب الملتوية لمحاصرة العقل، والفطرة، والوجدان ضمن أسوار الأحقاد والضغائن والإثارات اللاإنسانية.انتهى.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
لقد تزامن تحرك شريعتي التصحيحي مع وجود شخصية علمية تسير على نفس الخطى وهو&amp;quot; الشيخ نعمة الله صالحي نجف آبادي &amp;quot; أحد العلماء المجتهدين والمدرسين البارزين في الحوزة الدينية في قم واصفهان والذي عرض أفكاره الإصلاحية للمرة الأولى في كتابه &amp;quot; شهيد جاويد &amp;ndash; الشهيد الخالد&amp;quot; الذي صدر في عام 1951م وعُـد من أهم الكتب التي تناولت حركة الإمام الحسين بن علي عليهم السلام وواقعة كربلاء بصورة علمية وتحليل استدلالي ناقش فيه ماهية الحركة الحسينية، مراحلها، هدفها، نتائجها، وأثارها. مقدما قراءة جديدة تتعارض كليا مع القراءة التي تقدمها الرواية الشيعية المغالية والقائمة على نظرة عاطفية بحتة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
لقد قدم الشيخ صالحي رأيه في هذه القضية بطريقة اعتمدت البحث العلمي متبعا المنهج الاستدلالي الذي أوصله إلى النتيجة التي تؤكد أن الإمام الحسين لم يخرج بهدف أن يقتل وينال الشهادة وإنما خروج الحسين كان بهدف، إقامة العدالة الإسلامية وتحكيم الإسلام في الأمة ولكنه لم يتمكن من تحقيق ذلك، منتقدا بشدة الرواية الشيعية العاطفية التي تقول بعلم الحسين المسبق بمقتله وانه خرج ليقتل!.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وقد اعتبر اغلب الباحثين الإيرانيين كتاب &amp;quot; شهيد جاويد &amp;quot; من أهم الكتب المثيرة للجدل في تاريخ ايران المعاصر ومن أهم الكتب التي ناقشت قضية الحسين عليه السلام ببعديها السياسي والاجتماعي حيث صدر اكثر من ثلاثة عشر كتابا في الرد عليه من قبل الغلاة. وكان من ابرز المنتقدين له هم، آية الله صافي الگلپايگانى، آية الله رفيعى قزوينى، آية الله مرتضى المطهري وغيرهم من آيات الحوزة الكبار. وقد جمع الشيخ صالحي ردوده على منتقديه في كتاب اسماه &amp;quot; عصاي موسي يا درمان بيماري غلو&amp;ndash; عصى موسى أوعلاج مرض الغلو&amp;quot;. صدر هذا الكتاب في عام 1981م غير أن وزارة الإرشاد والثقافة الإيرانية قامت بعد ذلك بجمعه من الأسواق ومنعت إعادة طبعه وتداوله.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
توفي الشيخ صالحي العام الماضي (1427هـ - 2006م ) في مدينة نجف آباد من توابع محافظة اصفهان بعد حصار من الحكومة الإيراني دام اكثر من عشرين عاما وذلك نتيجة لأفكاره الإصلاحية بالإضافة إلى كونه من المحسوبين على خط الشيخ حسين علي منتظري الذي كان خليفة للخميني ثم تم عزله وفرضت عليه الإقامة الجبرية. وعلى غير عادته في نعيه للآيات الذين يموتون فان مرشد الثورة الإيرانية علي خامنئي لم ينعى الشيخ صالحي الذي كان عالما مجتهدا وحاصل على لقب آية الله وكان أستاذا يدرس البحث الخارج وله كتاب في هذا المجال بعنوان &amp;quot; ولايت فقيه، حكومت صالحان- ولاية الفقيه، حكومة الصالحين &amp;quot;. كما أن الإعلام الرسمي الإيراني تجاهل نشر خبر وفاته.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ومن الشخصيات اللامعة الأخرى التي برزت في ساحة الإصلاح الشيعي في ايران هوالأستاذ والباحث الإسلامي القدير&amp;quot; حيدر علي بن إسماعيل قلمداران القمي 1409&amp;ndash; 1330 هـ &amp;quot; الذي كرس جهدا كبيراً في سبيل إثبات الحقيقة وتصحيح الأفكار ونقد العقائد الخرافية السائدة. وكان &amp;quot;الأستاذ قلمداران &amp;quot; قد تأثر في بادئ أمره بالأفكار الإصلاحية للشيخ محمد الخالصي بن الشيخ محمد مهدي المرجع العراقي المعروف الذي قامت قوات الاحتلال البريطاني في العراق في منتصف عشرينيات القرن الماضي بأبعاده إلى ايران نتيجة جهاده ضد الاحتلال. وقد تطور الوعي الإصلاحي عند &amp;quot; قلمداران &amp;quot; بعد ذلك الأمر الذي جعله يجمع أفكاره الإصلاحية وينشرها في عدد من الكتب التي حملت العناوين التالية.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
1/ الإمامة والولاية / فارسي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
2/ جواب مختصر على سؤالين مهمين حول الإمامة والخلافة / فارسي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
3/ طريق النجاة من شر الغلاة/ فارسي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
4/ زيارة القبور بين الحقيقة والخرافة / فارسي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
5/ الخمس / فارسي. وهوبحث روائي رجالي فقهي ضخم أثبت فيه عدم وجوب أداء خمس أرباح المكاسب، مخالفا للفكر الشيعي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وغيرها من الكتب الأخرى. كما قام بترجمة كتابين لصديقه الشيخ محمد خالصي الأول &amp;quot; أخلاق محمد &amp;quot; والثاني &amp;quot; المعارف المحمدية &amp;ndash; الفلسفة الإسلامية العليا &amp;quot;. ومن ابرز كتب الأستاذ &amp;quot; قلمداران&amp;quot; في نقد العقائد الخرافية كتاب &amp;quot; شاهراه اتحاد - طريق الاتحاد أوتمحيص روايات النص على الأئمة &amp;quot; وهوالأثر الوحيد الذي تم تعريبه وطبعه بعد وفاته. وقد قام بهذا العمل الجبار مشكورا الأستاذ &amp;quot; سعد رستم &amp;quot; الذي بذل جهدا كبيرا في إخراج هذا الكتاب إلى النور.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وقد جاء في مقدمة الطبعة المعربة مايلي : (ترى عقيدة الإمامية أن الأئمة الاثني عشر من آل البيت عليهم السلام، منصوبون ومعينون من قِبَلِ الله تعالى لإمامة المسلمين، مفترضوالطاعة على العالمين بأمر الله ورسوله صلى الله عليه وسلم، وبالتالي فالإيمان بهم ومعرفتهم أصل من أصول الدين يساوي أصل الإيمان بالله وباليوم الآخر وبنبوة خاتم النبيين صلى الله عليه وسلم، مما يعني بالنتيجة الضرورية، وبدون لف ودوران، أنه لن تكون هناك نجاة أخروية لأي مسلم أولأي إنسان دون معرفة أولئك الأئمة والإيمان بعصمتهم وإمامتهم!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
فأراد (قلمداران) أن يمحص صحة هذه العقيدة ويرى سندها، فتبين له أن مستندها مجموعة من الأحاديث الواهية الموضوعة من قبل الغلاة التي لا تقوم بها أي حجة رغم كثرتها، ثم تبين له أن القرائن الخارجية من آيات القرآن ووقائع التاريخ وسير الأئمة أنفسهم تؤكد عدم صحة تلك الأحاديث والرويات وبالتالي عدم صحة العقيدة التي انبنت عليها، فضمَّن نتيجة بحثه هذا الكتاب، مبتغيا بذلك إزالة السبب الرئيسي لتباعد الشيعة الإمامية عن سائر المسلمين، وسماه: &amp;quot;شـاهراهِ اتحاد&amp;quot;: أي طريق الاتحاد الواسع، ولكنه لم يستطع طباعته بشكل رسمي ونشره لحساسية الموضوع البالغة بالنسبة للعلماء التقليديين، بل اكتفى بعض زملائه ومحبيه بأن يطبعوا الكتاب سنة 1978 م. على الآلة الكاتبة اليدوية ثم مرة ثانية على آلة كاتبة إلكترونية I.B.M. ـ (وكلا الطبعتين كانتا مليئتان بالأغلاط المطبعية بالإضافة لعدم التنسيق) ـ ويصوروا منه بضع مئات من النسخ سرعان ما نفدت).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
توفي الأستاذ &amp;quot; حيدر علي قلمداران&amp;quot; في يوم الجمعة 28 من رمضان عام 1409 هـ في مدينة قم عن عمرٍ ناهز 79 عاما قضاه في البحث والتوثيق والتأليف غايته تقديم ما يخدم الإسلام ويصحح الأفكار والعقائد السائدة في مجتمعه. وكان قد تعرض إزاء ذلك شأنه شأن غيره من المصلحين إلى حرب ظالمة شنت عليه من قبل مراجع الحوزة وأرباب الفكر الطائفي المغالي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
الساحة العراقية&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
إذا كنت الساحة الإيرانية هي الساحة الرئيسية للجدل الذي دار وما يزال يدور بين حركة الإصلاح وتيار الغلوالشيعي لكونها (ايران) منبت هذا الفكر والمركز المغذي له، فانه يجب علينا عدم إغفال وجود الأصوات التصحيحية في الساحات الشيعية الأخرى ومنه الساحة العراقية والأحوازية على سبيل المثال.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
فعلى صعيد الساحة نجد إن حركة الإصلاح الشيعي ظهرت على يد الشيخ محمد بن الشيخ محمد مهدي الخالصي (1383- 1306 هـ) الذي تمثلت حركته بمحاربته الشعواء للبدع والخرافات التي سادت بين الشيعة والعمل على تنزيه العقيدة الإسلامية من الانحراف، فكانت هذه هي النقطة الأصعب في حركته رحمه الله، لان تنزيه الدين من البدع والخرافات التي يظنها الجهال إنها من اصل الدين يحتاج إلى شجاعة ونكران للذات في الله، وهوما ألّب عليه اقرب أصدقائه فضلاً عن مرجعية الحوزة النجفية ومراجع حوزة قم الإيرانية الذين قاما بدفع الرعاع إلى مهاجمته بألسنتهم وأقلامهم وسائر وسائلهم الخبيثة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وكانت من آثاره القيمة في مجال الإصلاح ونبذ الخرافات والطائفية هي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
1- أحياء الشريعة في مذهب الشيعة / رسالته العلمية في عدة أجزاء.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
2- الوقاية من أخطار الكفاية.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
3- النيروز / في بدعة عيد النيروز.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وكتابات قيمة أخرى تركت آثرها في الساحة العراقية والإيرانية. وكان الخالصي الذي أسس مدرسة دينية علمية في مدينة الكاظمة في بغداد باسم &amp;quot; مدينة العلم &amp;quot; أول مرجع شيعي يجرأ على رفع شاهدة &amp;quot; اشهد أن عليا ولي الله من الآذان &amp;quot; وهي الشاهدة التي أمر بوضعها إسماعيل الصفوي يوم استيلائه على مدينة تبريز في إقليم أذربيجان في بداية القرن العاشر الهجري والتي قتل دونها اكثر من مائتي ألف مسلم من أهل السنة لرفضهم &amp;quot; الآذان باشهد أن عليا والله&amp;quot;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
مدرسة الخالصي التصحيحية ماتزال مستمرة ولها اتباع وان كانوا أقلية إلا انهم يعبرون عن أفكارهم بشكل صريح. ولعل من آثار مدرسة الخالصي، التي يقودها اليوم أبنائه الشيخ جواد والشيخ محمد مهدي، هوتحالف أنصار هذه المدرسة مع أهل السنة في العراق والنأي بأنفسهم عن المليشيات والمرجعيات الطائفية في قم والنجف.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ومن بين الوجوه الإصلاحية العراقية الأخرى التي يمكن ذكرها على سبيل المثال، الشيخ الدكتور &amp;quot;موسى الموسوي&amp;quot; حفيد مرجع الشيعة البارز في منتصف القرن الماضي أبوالحسن الموسوي الأصفهاني.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
لقد أدرك &amp;quot;موسى الموسوي&amp;quot;، الذي عاش في الوسط الحوزوي وفي أسرة المرجعية الشيعية، عمق التخلف والخلل الفكري والعقائدي الذي تعيشه هذه الحوزة بالإضافة وما يدور فيها من تخطيط وتآمر على الأمة ولذا انتفض على هذا الواقع وقال كلمته التي أفحمت الطائفيين. وقد دون أفكاره هذه في اكثر من كتاب اهمها الكتب التالية:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
1- يا شيعة العالم استيغضوا / عربي &amp;ndash; فارسي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
2- الشيعة والتصحيح / عربي &amp;ndash; فارسي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
3- الخميني في الميزان / عربي &amp;ndash; فارسي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وهناك كتب ورسائل ومحاضرات هامة أخرى كشف فيها وهن وضعف الأفكار العقدية للصفويين واتباعهم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
والى جانب موسى الموسوي يمكن ذكر اسم الشيخ &amp;quot;حسين الموسوي&amp;quot; صاحب كتاب &amp;quot; لله ثم للتاريخ &amp;quot; هذا الكتاب الذي يعد من أهم وانجح ما قدمته المدرسة التصحيحية الشيعية في العراق وذلك لغزارة المعلومات والأدلة التي قدمها الموسوي في كتابه والتي لم تترك شاردة أوواردة من الأفكار والعقائد الخرافية إلا وذكرها وناقشها بتمعن ومنهجية علمية رائعة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ومن الشخصيات العراقية الأخرى التي تركت لها أثراً في التصحيح وهي ماتزال مستمرة في عطائها فيمكن ذكر&amp;quot; الأستاذ احمد الكاتب &amp;quot; وأثره القيم كتاب &amp;quot; (تطور الفكر الشيعي) الذي نقض فيه نظرية الإمامة الشيعية بأدلة قوية غير قابلة للدحض.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
أما الشخصية الأخرى التي يمكن ذكرها هنا فهوفضيلة الشيخ &amp;quot;طالب السنجري&amp;quot; صاحب كتاب (التشيع كما افهمه) والذي أكد فيه ان الرجوع إلى الخليفة عمربن الخطاب كم الرجوع إلى الإمام علي بن أبى طالب رضي الله عنهما كون الاثنين يستقيان علمهما من منبع واحد وهوالقرآن والسنة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وكانت هذه الكلمة كفيلة لكي يقوم المرجع الشيعي محمد حسين فضل الله بطرد السنجري من حوزته الكائنة في منطقة السيدة زينب في سوريا حيث كان فيها الأخير أستاذا للفقه. وقد حورب السنجري على رأيه هذا وحوصر من جميع الجهات الأمر لذي دفعه للقيام بفتح محل لبيع الأحذية بعد ان أغلقت جميع الحوزات الشيعية أبوابها في وجهه وقطعت جميع مكاتب المرجعيات الشيعية رواتبها التي كانت تقدمها لطلبة وأساتذة الحوزات عنه. ولكن ذلك لم يثنيه عن مواصلة مشواره الإصلاحي وقد نشر العديد من الكتب في هذا الشأن ومنه كتاب تذكرة المسلم وغيرها. وهواليوم يعمل إماماً لأحد المراكز الإسلامية في مدينة فلوريدا بالولاية المتحدة الأمريكية يواصل من خلاله الإصلاح في الفكر الشيعي وقد اصبح له مناصرون واتباع كثيرون.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
الساحة الأحوازية&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
في هذا الساحة العربية الإسلامية المغتصبة من قبل الدولة الإيرانية والتي يعاني أهلها من الحرمان التعليمي والاضطهاد بجميع أشكاله فان عملية الإصلاح الفكري والعقائدي قد شقت طريقها في السنوات الأخيرة بشكل واسع متأثرة بالخطابات والندوات التي تبث من خلال القنوات التلفزيونية العربية والخليجية منها تحديدا وذلك بسبب قرب الأحواز من الدول الخليجية. كما ان تردد الأحوازيين على الدول الخليجية ونقلهم للكتب والأشرطة التي تحتوي على خطب وندوات فكرية إسلامية قد ساهم بشكل كبير في توسع حركة الإصلاح الفكري الأمر الذي رفع من نسبة أهل السنة في الأحواز في السنوات الأخيرة بشكل كبير جدا. علما ان شيعة الأحواز وعلى خلاف شيعة ايران وباقي الشيعة لا يرون التشيع اكثر من مجرد مدرسة فقهية وهم يسمون أنفسهم بالجعفرية ( نسبة للإمام جعفر بن محمد الصادق ) ويقفون من الصحابة وأمهات المؤمنين ذات الموقف الذي يقفه منهم أهل السنة. ولا يؤمنون بالخرافات والطقوس الصفوية التي نشاهدها تمارس في ساحات شيعية مختلفة ولهذا فهم اقرب لاهل السنة منهم للشيعة. وإذا أردنا الحديث عن شخصيات فكرية إصلاحية احوازية فيمكن ذكر أسماء من أمثال الشيخ عبد الحميد النواصري والشيخ عباس البوشوكة الموسوي والشيخ عقيل الهاشمي ولا استبعد نفسي عن هذه الثلة الخيرة.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ختاما ما تقدم أعلاه كان محاولة أولية لالقاء الضوء على مسيرة الإصلاح الفكري التي قام بها أناس أنار الله قلوبهم بالإيمان وكشف عن بصيرتهم الغشاوة فأدركوا ما توصلوا إليه نتيجة للبحث والمطالعة كونهم يمتلكون كفاءة عقلية وعلمية مكنتهم من التوصل إلى الحقيقة وفهمها. يقودهم إلى ذلك أيمانهم بان الإسلام لا يقبل الازدواجية العقائدية.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ومما يجدر ذكره أيضاء ان عدم تطرقنا للساحات الأخرى ( الخليجية أواللبنانية أوالأفغانية،،،،) لا يعني خلوتلك الساحات من شخصيات إصلاحية، أوان الأسماء التي ذكرت في هذه المقدمة لا يوجد غيرها، ولكننا اخترنا هذه النماذج من الشخصيات والساحات على سبيل المثال فقط لنقدمها للقارئ الكريم. متمنين لحركة الإصلاح الشيعي التوسع والتوفيق في عملها.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>عين على المدرسة الخالصية</title>
<link>http://qalamlib.com/news/322</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;الآباء المؤسسون&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بقلم : خالد بن محمد البديوي&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تعد أسرة الخالصي البغدادية أحد أبرز البيوت العربية التي لا زالت تقدم أدوراً دينية وسياسية بارزة في صفوف الشيعة منذ ما يقارب المائة عام، ومع أن بعض الكتاب يحاول أن يغيب أدوارها إلا أن القارئ الموضوعي لتاريخ الشيعة الحديث يصعب عليه أن يتجاوز بصمات المراجع الخالصيين في تقويم المشروع الشيعي وتصحيح الحالة التي تعيشها الأمة الإسلامية منذ أزمان متطاولة والتي لم تنفك عن الحالة الطائفية ثقافياً وسياسياً.&lt;br /&gt;
والخالصيون ينحدرون من أسرة عراقية عريقة تسكن الكاظمة ببغداد ويعود نسبهم إلى حبيب بن مظاهر الأسدي -أحد أبرز الذين قتلوا مع الحسين رضي الله عنه في كربلاء-(1).&lt;br /&gt;
واللافت هو أن أعلام هذه الأسرة يحملون رؤية دينية تستحق الدراسة، وهو ما قمنا ببعضه في كتاب (أعلام التصحيح والاعتدال في صفوف الإمامية خلال القرن الأخير) ، وهنا نلخص ونستكمل بعضاً آخر حول مواقف وآراء المدرسة الخالصية.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;المرجع محمد مهدي الخالصي (الكبير)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;يُعدّ المرجع محمد مهدي بن حسين الخالصي (1859م- 1925م) الأب المؤسس للمرجعية الخالصية، فقد كان من أبرز زعماء ثورة العشرين ضد الاحتلال البريطاني في العراق ، وله الموقف المشهور عندما أفتى بحرمة الدخول في وظائف الدولة الجديدة المحتلة ، ومع أن بيرسي كوكس &amp;ndash;المندوب السامي للاحتلال البريطاني- حاول أن يتواصل مع مهدي الخالصي وأن يلين جانبه إلا أن الخالصي رفض بشكل قاطع، ثم بعد تنصيب الملك فيصل على العراق ، بايعه مهدي الخالصي &amp;quot;ملكاً على العراق مستقلاً منقطعاً عن أي سلطة أجنبية بأي اسم كان&amp;quot; ثم لما تبيّن للخالصي تبعية الملك فيصل للبريطانيين أعلن إلغاء بيعته وأفتى بحرمة التصويت في انتخاب أعضاء المجلس التأسيسي عام 1922م، مما سبب إحجام كثير من الناس عن التصويت، وفي عام 1923 صدر أمر الحكومة باعتقاله وإبعاده إلى إيران، ليبدأ رحلة من النفي والتنقل الشاق ، ففي إيران تم اعتقاله مع أسرته و أرسل إلى البصرة ومنها إلى مكة ، ثم نقل على باخرة إلى بندر بوشهر في الخليج، ومن ثم انتقل إلى قم ثم إلى مدينة مشهد، ومن الواضح أنّ الاحتلال كان يريد كسر عناد الخالصي وتليين موقفه ليقبل بعد ذلك بأي شروط مقابل العودة، ولكن وبعد كل تلك المعاناة رفض محمد مهدي الخالصي شرط الحكومة العراقية للعودة المتمثل بالابتعاد عن السياسة ، فضل منفياً في إيران حتى مات في أبريل من عام 1925م (2).&lt;br /&gt;
لقد مات الخالصي الجد غير أنّ جدّية التغيير وصلابة الموقف من الاحتلال&amp;nbsp;لم يمت في نفوس&amp;nbsp;ذريته من بعده وهو ما سنقف معه الحلقات القادمة&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;***&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(تبنى محمد الخالصي الأب منظومة من الأفكار الآراء التي رأى أنها تقود الشيعة والمسلمين إلى المسار الصحيح، وقد ابتدأ الخالصي مشروعه من داخل الشيعة عبر مسارين:&amp;nbsp;&amp;nbsp;الأول يتمثل في محاولة تنقيح أقوال المذهب الإمامي الكلامية من الأمور الدخيلة في الدين)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;------------&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;من أبرز أعلام المدرسة الخالصية المرجع الراحل محمد بن محمد مهدي الخالصي (1888م-1963م) فقد ولد الكاظمية ، ونال درجة الاجتهاد في الفقه الجعفري من قبل أبرز مراجع عصره، وقد قضى 27 عاماً من عمره في المنفي، فنفي من العراق إلى إيران بقرار من المندوب السامي للحكومة البريطانية عام 1922م ،&amp;nbsp;&amp;nbsp;ثم بسبب تمسك الخالصي بآرائه وتوجهاته السياسية ؛ عوقب بالنفي المتكرر الشاق داخل إيران.&lt;br /&gt;
ففي عام 1925م نفي من طهران إلى خراسان حتى 1926م ومنها نفي إلى (خوف) والتي حبس فيها لاتهامه بقتل المفوض الأمريكي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ثم في سنة 1927م سمح له بالرجوع إلى طهران، ثم في سنة 1931م حبس في طهران 3شهور, ثم سجن في قصر (قاجار), ثم نفي بعد ذلك إلى &amp;quot;تويسر كان&amp;quot; سنةً كاملةً , ثم إلى &amp;quot;نهاوند&amp;quot; سنتين.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وبعد ذلك سمح له بالعودة إلى الكاظمية ولم يمكث إلا يوم وليلة ثم قبض عليه وأعيد إلى إيران وحبس في قصر شيرين 20 يوماً, ثم أُخّذ إلى (كرمانشاه) ومنها إلى (نهاوند) حيث بقي فيهما سنةً كاملةً, ثم أطلق سراحه ونفي إلى (تويسر كان) وبقي فيها تحت مراقبة الشرطة حتى سنة1361هـ/1942 حيث نفي بعدها إلى كاشان وبقي تحت رقابة الشرطة الشديدة إلى سنة 1947م ،وبعدها نفي إلى مدينة (يزد) وبقي فيها إلى سنة 1947ثم سمح له بالعودة إلى العراق(3)، فعاد إليها بعد أن قضى 27 عاماً من عمره.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ومع أن محمد الخالصي كان يعاني مرارة النفي إلا أن ذلك لم يثنيه أو يضعفه، بل على العكس&amp;nbsp;&amp;nbsp;فقد أسس جمعية الدفاع عن بلاد ما بين النهرين لمناهضة الاحتلال البريطاني وقام بحملات مكثفة وإلقاء خطب لتحريض الناس ضد الانكليز ، ولعل البرقية التي أرسلها سفير بريطانيا في طهران (السير برسي لورين) إلى وزارة الخاجية تكشف عن جانب مما قام به الخالصي الأب ، حيث جاء في البرقية : &amp;quot;يعد الشيخ محمد الخالصي المحرض الرئيسي ضد الإنكليز في طهران&amp;quot;(4). كما أنه شارك وبقوة مع الكاشاني في تأسيس ثورة التأميم في إيران.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
ويتميز محمد الخالصي بالشجاعة والوضوح، ففي رسالته التي وجهها إلى رئيس الحكومة الإيرانية أحمد قوام، قال فيها : (أخاطبك بهذه الكلمات لا لأنك تملك نفعاً يرجى أو ضراً يخشى, فما أعجزك عن الأمرين, بل لأنك أقرب إلي مكاناً من كل مسلم يحمل مثل هذه الصفة, وأقصد بخطابي هذا عظة أمثالك من رؤساء المسلمين كل على حسب إمارته ونزعته, وعلو نفسه..&amp;quot;(5).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وقد تبنى محمد الخالصي الأب منظومة من الأفكار الآراء التي رأى أنها تقود الشيعة والمسلمين إلى المسار الصحيح، وقد ابتدأ الخالصي مشروعه من داخل الشيعة عبر مسارين:&amp;nbsp;&amp;nbsp;الأول يتمثل في محاولة تنقيح أقوال المذهب الإمامي الكلامية من الأمور الدخيلة في الدين، وهذا ما تناوله بقوة في مباحث كتابه (علماء الشيعة والصراع مع البدع والخرافات الدخيلة في الدين) وفي كتاب (رسالة إلى أحمد قوام السلطنة رئيس الحكومة الإيرانية) ، فقد تحدث عن بشكل صريح عن (مظاهر) رأى أنها تخالف التوحيد ومنهج الأئمة عليهم السلام متهماً الرواة الكذابين والوعاظ - الجهلة الذين يصفهم محمد الخالصي بأنهم &amp;quot;أضر على الشيعة من جيش يزيد&amp;quot; بتحريف منهج الأئمة والافتراء عليهم لأطماع مادية.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
والمسار الثاني الذي سلكه الخالصي الأب للإصلاح فهو محاولة كسر روح الطائفية عملياً ، عبر مبادرات سياسية وعلمية ، فقد شارك بقوة في تأسيس مؤتمر الوحدة في القاهرة ودخل في حلف ديني مع الشيخ عبد العزيز البدري-من أبرز علماء أهل السنة وقتها- ضد الشيوعيين، كما أن الخالصي على الصعيد السياسي دخل في حلف مع الرئيس العراقي عبد السلام عارف حيث كان يرى فيه مسؤلاً وطنياً يسعى لتحقيق الاستقلال للعراق وهي مجازفة كبيرة من عالم شيعي في وقت كانت المرجعية حبيسة الانتظار السلبي والاحجام عن المشاركة الساسية.&lt;br /&gt;
ومن الواضح أن محمد الخالصي رأى أن إصلاح الحالة العامة يجب أن تخضع لـ(جراحة) تستأصل الورم وليس إلى (مراهم) تسكن الألم، ولهذا جاءت مواقفه صريحة جداً ، فكان وصفه بعض الأعمال التي تمارس بأنها بدعاً شركيةً ، ووصفه بعض الأعمال المنتشرة بأنها لا تخلوا من &amp;quot;نزعة مجوسية&amp;quot; ، ومقارنته تبريرات رجال الدين لهذه الأعمال بأنها أقرب إلى تأويلات الوثنيين في وقولهم (ما نعبدهم إلا ليقربونا إلى الله زلفى) ، إضافة إلى معارضته إضافة جملة (أشهد أن علياً ولي الله) في الأذان واعتبارها محدثة في الدين، وإقامته صلاة الجمعة التي كانت معطلة بين الشيعة من قبل المرجعية في كل العراق واغلب إيران، كل هذا وغيره شكل صدمةً&amp;nbsp;&amp;nbsp;كبيراً لعامة الشيعة وإزعاجاً للمرجعية الشيعية العليا في النجف ، ولعل هذا أكبر أسباب عدم تناغمها مع الخالصي ووقوفها ممثلة بالمرجع محسن الحكيم بقوة دون تعاظم مرجعية الخالصي.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
وأظن أن لو قدّر لمحمد لخالصي أن يصل إلى رأس المرجعية لربما تغير المسار اللاحق للشيعة والعراق بشكل أكثر إيجابيةً عبر قفزات إيجابية سريعة وليس خطوات بطيئة، لكنها وللأسف ليست الفرصة الأولى وليس الأخيرة التي تفوت على المسلمين دون الاستفادة منها بالشكل الصحيح ما دام الإسلاميون لا يعلمون إلى أين يسيرون.&lt;br /&gt;
ولنا حديث عن بقية عن الأبناء الخالصيين..إن شاء الله.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و ننتظر الحلقات القادمة&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;منقول من: جسور التواصل&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;---------&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(1) علماء الشيعة والصراع مع البدع والخرافات الدخيلة في الدين23(مقدمة&amp;nbsp;&amp;nbsp;المترجم) . الأعلام للزركلي 7/86.&lt;br /&gt;
(2) الزركلي: خير الدين ، الأعلام ، ص115.&amp;nbsp;&amp;nbsp;الطهراني: الذريعة 4/17. الزبيدي: حسن لطيف: موسوعة الأحزاب العراقية، ص381. من كتبه العناوين في الأصول (جزآن &amp;ndash;مطبوع) ، والقواعد الفقهية (جزآن)&lt;br /&gt;
(3)&amp;nbsp;&amp;nbsp;رسالة المجاهد الأكبر 99-110&lt;br /&gt;
(4) الوثيقة رقم 1 في رسالة المجاهد الأكبر ص23.&lt;br /&gt;
(5) رسالة المجاهد الاكبر الإمام محمد الخالصي 80.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مسارات إصلاح الفكر الديني في إيران</title>
<link>http://qalamlib.com/news/321</link>
<description>&lt;p class=&quot;rteright&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خالد بن محمد البديوي&lt;img align=&quot;left&quot; alt=&quot;خالد بن محمد البديوي&quot; border=&quot;4&quot; height=&quot;205&quot; hspace=&quot;4&quot; src=&quot;/userfiles/image/khalid3(1).jpg&quot; vspace=&quot;4&quot; width=&quot;150&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;rteright&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;منذ مدّة وأنا أفكر في الكتابة عن مسارات الإصلاح الديني في المشهد الثقافي الإيراني، لأنني على قناعة أن لدينا-نحن العرب- قصور في المعرفة والتفاعل مع هذا الجانب مع شدّة أهميته.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
والمؤسف أن الباحث يجد شحّاً في الدراسات العربية الموضوعية التي تناولت هذا المجال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقد يكون على أبرز الدراسات المتوفرة هي كتاب (نظرية الستة في الفكر الإمامي الشيعي-التكون والصيرورة) للباحث حيدر حب الله، وكتاب (المشهد الثقافي في إيران فلسفة الفقه ومقاصد الشريعة) للباحث عبد الجبار الرفاعي، وهما دراستان لن يستغني عنها المهتم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إن الحديث عن الإصلاح في إيران يعني الحديث عن مسارات وطرق متعددة قد لا يجمعها إلا نُبل المهمة وإن اختلفت في أساليبها وتنوعت في موضوعاتها ومخرجاتها، كما أن المتتبع للمشهد الثقافي الإيراني يجد مادة ثرية من تجارب (الإصلاح الشيعي الداخلي) بدرجة لا يمكن مقارنتها بأي حال بمثيلها في الشق (العربي الشيعي)، ولربما كان زوال الشعور بالأقلية بين الشيعة في إيران من أكبر أسباب نضج العملية النقدية في المجتمع، خلافاً للشيعة العرب حيث يعدّ إغلاق باب النقد الداخلي هدفاً أساسياً عند الكثير لتخوفهم من التأثير على تماسك الأقلية الأمر الذي يؤدي إلى بطء مسارات الارتقاء وتأخر الإصلاح الداخلي.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إن محاولات إصلاح الفكر الديني الشيعي في إيران أخذ لدى البعض مسار إصلاح أدوات المعرفة الدينية وطرق الاجتهاد، كما أن البعض قدّم محاولة إصلاحية من خلال تنقية التراث المروي الذي هو المرود للمعرفة الدينية، في حين تبنى آخرون مسارات أخرى سيأتي الحديث عنها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;مسار تنقية التراث&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
على صعيد الموروث الحديثي رأى مجموعة من المنتسبين إلى الدائرة العلمية في إيران أهمية غربلة الموروث &lt;img align=&quot;left&quot; alt=&quot;أبي الحسن الشعراني &quot; height=&quot;100&quot; hspace=&quot;5&quot; src=&quot;/userfiles/image/sharani.jpg&quot; vspace=&quot;5&quot; width=&quot;85&quot; /&gt;المروي في كتب الأخبار، وقد خرجت عدّة محالات في هذا المسار كان من أهمها محاولة &lt;strong&gt;الميرزا أبي الحسن الشعراني&lt;/strong&gt; (المتوفى عام 1973م) حيث ألف كتابه (المدخل إلى عذب المنهل) وفيه تحدث عن أهمية تنقية الآثار من أجل المحافظة على المذهب الشيعي، وقد وصل الشعراني بقناعته إلى أن خمس المرويات في كتب المذهب في عداد الأحاديث الموضوعة على الأئمة، إلا أنه بين أن أغلب الكذب في غير أبواب الفقه.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كما أن من أهم المشاريع التي ظهرت في نفس هذا المسار مشروع الشيخ &lt;strong&gt;محمد باقر البهبودي&lt;/strong&gt;، وهو أستاذ جامعي معاصر في طهران، وكان من تلاميذ الخميني والبروجردي والخوئي ومتخصص في علم الحديث.&lt;br /&gt;
عودة للأعلى&lt;br /&gt;
&lt;img align=&quot;right&quot; alt=&quot;البهبودي&quot; height=&quot;180&quot; hspace=&quot;4&quot; src=&quot;/userfiles/image/behboodi.jpg&quot; vspace=&quot;5&quot; width=&quot;114&quot; /&gt;اهتم البهبودي بمشروع تنقية التراث وقام بعلمية جريئة أثارت لغطاً وردود أفعال كبيرة حيث تبنى غربلة أحد أهم مصادر الحديث في المذهب الإثني عشري وهو كتاب الكافي للكليني، فقام البهبودب بتحقيق هذا الكتاب وتنقيته مما بدا له أنه ضعيف ومكذوبة، فكانت النتيجة التي توصل إليها هي صحة ربع الكتاب فقط (4428 من أصل 16194أثر)، كما أخرج كتاب صحيح الميزان في التفسير للطباطبائي، وحقّقّ 45 مجلداً من كتاب بحار الأنوار للمجلسي.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الجدير بالذكر أن البهبودي عندما أصدر النسخة الفارسية من كتاب صحيح الكافي قام صاحب المطبعة-وبضغط من مراجع دينية- بتغيير عنوان الكتاب إلى (زبدة الكافي)، كما قام المرجع منتظري-وكان خليفة الخميني وقتها- باستدعاء البهبودي وأمره بسحب جميع النسخ من الاسواق بما فيها النسخة العربية-حسب ما ذكره الشيخ جعفر السبحاني في حوار مع صحيفة كيهان-.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يقول الباحث حيدر حب الله في كتابه نظرية السنة: (يرى البهبودي أن حملات النقد ضده كانت بسبب تسميته لكتابه (صحيح الكافي) إذا أن هذه التسمية أدت-في نظره- إلى تساؤل كثير من الناس عما يرويه العلماء والخطباء ومدى صحته وسلامته).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لقد كان البهبودي صريحاً في تشخيص ما رأى أنه عبث كبير في منهج أهل البيت وذكر بصراحة أن ظاهرة الدس والكذب كانت ضاربة أطنابها في كتب المذهب، ولهذا اتخذ منهجاً علمياً لمحاربة هذه الظاهرة وتنقية المروي، وفي سبيل ذلك وضع خارطة للوضاعين والضعفاء شملت أسماء لامعة في مجال الرواية، بل وصل الأمر بالبهودي إلى التشكيك في مصداقية الكليني نفسه صاحب الكافي، كما أنه شكك في أسلوب حصول المجلسي على الكتب التي نقل منها كتابه البحار.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ويرى حيدر حب الله أن هذه المحاولة التي قادها البهبودي في مطلع الثمانينيات الماضية واجهتها حملة مضادة قوية، أدت إلى تراجع المشاريع من هذا القبيل حتى كادت تضمحل إلا قليلاً.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وفي مسار تنقية التراث وتصفيته يجب الإشارة إلى مشروع &lt;strong&gt;آية الله العظمى محمد آصف محسني القندرهاري &lt;/strong&gt;الأفغاني (المولود 1936م) وهو شخصية شيعية معاصرة بارزة، تعلم في العراق وإيران وناشط سياسي معروف في أفغانستان لاسيما بعد سقوط طالبان، والأمر الذي يهمنا هنا أنه متخصص في علم رجالات الحديث.&lt;br /&gt;
&lt;img align=&quot;left&quot; alt=&quot;آصف محسني&quot; height=&quot;225&quot; hspace=&quot;4&quot; src=&quot;/userfiles/image/asefmohseni.jpg&quot; vspace=&quot;4&quot; width=&quot;278&quot; /&gt;&lt;br /&gt;
لقد أثار محمد آصف محسني زوبعة كبيرة بعد إصداره كتاب (مشرعة بحار الانوار) عام 2000م، وقد اختار محسني بحار الأنوار كمادّة للدراسة لأنه رأى أن هذا الكتاب هو المصدر الأساسي للخطباء والوعاظ الذين يشاركون في صناعة الرأي العام بين الشيعة، في حين يضع القندهاري ملاحظات كثيرة على هذا الكتاب ويرى محسني أن أكثر رواياته غير معتبرة.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقد تمسك محمد آصف محسني بمبدأ التخلي عن كل تلك الروايات غير الموثوق بها فقهية أو عقائدية أو سياسية أو غيرها، وهو أمر جعله يتخطى بعض الخطوط الحمراء ليصل إلى التشكيك في بعض الآراء السائدة، كما انتقد محسني تساهل العلماء وطلابهم في تداول الراويات المنسوبة إلى أهل البيت، الأمر الذي أدى في نظر محسني إلى تراجع المسلمين وتخلفهم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الضجة التي أحدثها محسني القندهاري كانت نسبية مقارنة بما حدث بعد محاولة البهبودي وقد يعود ذلك إلى أن دوائر الحوزات خفت حساسيتها أمام مثل هذه المشاريع أو على الأقل أصبحت تتعامل معها بعقلانية أكثر في ردود الفعل.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وفي نفس السياق-تنقية المروث الديني- يمكن أن نضع جزء كبير من مشروع&lt;strong&gt; آية الله نعمة الله صالحي نجف آبادي&lt;/strong&gt;، وهو عالم دين معاصر من أصفهان، وقد أثار ضجة في السبعينيات الماضية عندما أصدر كتابه (الشهيد الخالد) حيث صدم الرأي العام الشيعي عندما تبني نفى علم الأمام الحسين رضي الله عنه باستشهاده في كربلاء مما أدى إلى ظهور ردود كثيرة عليه، وكان أبرزها كتاب (الملحمة الحسينية) لمرتضى مطهري.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;img align=&quot;textTop&quot; alt=&quot;صالحي نجف آبادي&quot; height=&quot;150&quot; src=&quot;/userfiles/image/salehi.jpg&quot; width=&quot;105&quot; /&gt;&lt;br /&gt;
نجف آبادي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وفي عام 2003م أصدر صالحي كتابه الأحاديث الموهومة في مجمع البيان (بالفارسي)، ومعه أربع مقالات في التفسير، وقد طبع الكتاب مرتين في نفس العام.&lt;br /&gt;
تبنى صالحي فكرة تنقية المورث عندما اختار أوسع كتاب في التفسير عند الشيعة، وسار بطريقة جادة في تطبيق معاييره في سبيل تحقيق هدفه، إلى درجة لم يتردد معها في تضعيف بعض الرويات لبعض الأحاديث المهمة مثل تضعيفة للصيغة الرائجة في الأوساط الشيعة لحديث الكساء وهي المذكورة في كتاب مفاتيح الجنان- وإن كان صالحي يرى أن أصل الحديث من الصحيح المستفيض.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وفي مسار تنقية الموروث لابد أن يذكر أسماء أشخاص لهم جهوده في مسارات مثل آية الله العظمى أبوالفضل البرقعي (ت:1992م) حيث تبنى نقد أحاديث الكافي في كتابه (عرض أخبار الأصول على القرآن والمعقول) فقد نقد أحاديثه سنداً ومتناً، وإن كان اهتمام البرقعي بنقد متون الأحاديث وبيان مدى موافقتها للقرآن والسنة القطعية والعقل أخذ الحيز الأكبر عند البرقعي، النسخة الفارسية من كتاب البرقعي لم يتح لها الانتشار مثل بقية كتبه التي لم يسمح بطباعتها، أما الترجمة العربية(وجاءت بعنوان: كسر الصنم) فكانت على يد عبد الرحيم ملا زاده البلوشي وقد حصل لها رواج نسبي، وسوف نعود لتجربة البرقعي ومثله آية الله محمد موسوي الغروي الأصفهاني في مسارات أخرى إن شاء الله.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;مسار إصلاح أدوات المعرفة الدينية&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
محاولة تقويم الفكر الديني اخذ بعداً أخر لدى شريحة أخرى إيراني، فقد ظهر على الساحة عدّة مشاريع تنادي بضرورة إصلاح أدوات النظر والاجتهاد في نصوص الشريعة كمقدمة أساسية لمعرفة دينية صحيحة.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
المحاولات في هذا الاتجاه ليست جديدة في المذهب الشيعي ككل، فقد شهد المذهب من قبل ظهور مشاريع من هذا القبيل ربما يكون أبرزها ظهور الحركة الأصولية في القرون المتقدمة من عمر المذهب من خلال مشروع فتح باب الاجتهاد وإدخال العقل كأحد الأدلة الشرعية.&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;rteright&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;الدكتور محمد مجتهد شبستري&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;rteright&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
في الحقبة المتأخرة بما يكون من أبرز المشاريع في مسار إصلاح أدوات المعرفة الدينية مشروع الشيخ الدكتور محمد مجتهد شبستري، وهو استاذ الفلسفة في كلية أصول الدين في جامعة طهران (مواليد: 1936هـ)، وهو ليس غريباً على المؤسسة الدينية فهو يحمل رتبة (آية الله) وقد بدأ مسيرته الدينية من قم فتعلم المعارف الدينية فيها، ثم استهوته الفسلفة فدرسها عند الخميني والطباطبائي (المفسر)، وقبل الثورة عمل في إدارة المركز الاسلامي في هامبورج في ألمانيا وهي الفرصة التي أتاحت له التعمق في الفلسفة الأوروبية واللاهوت المسيحي.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مع بدايات الثورة كان شبستري من طلائع المشاركين في السياسة فقد أُنتخب نائباً في البرلمان الإيراني عام 1979م، إلا أنه ومع منتصف الثمانينات ترك جميع أعماله السياسة وحصر جهوده في ممارسات ثقافية دينية، قدم من خلالها صياغة مقترحة لمعنى الإيمان وللتعامل معه النصوص الدينية.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تبنى الدكتور شبستري القيام بمراجعة نقدية لأدوات المعرفة الدينية، فقام بالدعوة إلى إعادة فهم النص (القرآن والسنة) على ضوء المقولات الهرمنوطيقية (hermeneutics= فرع من علم الفلسفة يدرس مبادئ تأويل النصوص المقدسة) وخلص شبستري إلى القول بأن النص الديني له تاريخ يجب أن يقرأ من خلاله، وأن النص الديني الواحد ذا دلالات مختلفة باختلاف التاريخ، وأن المفسر من أجل أن يصل للمعنى الصحيح يجب أن يعيش المناخ التاريخي للنص وقت صدوره وأن يتعرف على المغزى من صدوره وظروف المخاطبين والمعنى المستتر خلف الدلالات الشكلية من خلال معرفة المعنى الأساسي الذي تعود إليه جميع المعاني الجزئية، لكن شبستري وبعد نقاش لوظيفة المفسر يعود إلى تأكيد أننا لا يمكن أن نجزم بيقينية أي تفسير لأي نص، ليصل بذلك إلى إبطال التقسيم الاصطلاحي المعروف القائل بأن الكلام ينقسم إلى ثلاثة: النص والظاهر والمجمل.&lt;br /&gt;
&lt;img align=&quot;textTop&quot; alt=&quot;شبستري&quot; height=&quot;150&quot; hspace=&quot;3&quot; src=&quot;/userfiles/image/shabestari.jpg&quot; vspace=&quot;3&quot; width=&quot;250&quot; /&gt;&lt;br /&gt;
محمد مجتهد شبستري&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قد يكون الاتجاه النقدي لدى شبستري بعيداً في الظاهر عن السياسة في إيران، إلا أن حقيقة الأمر تقول غير ذلك لاسيما في إيران حيث (جمهورية الثورة الإسلامية) التي تستند إلى رؤية دينية تقوم على طريقة دينية تعتمد على منهج استدلالي محدد المعالم، مما يعني أن افكار شبستري تعمل أو تهدد تلك أو بعبارة أخرى تسعى لتغيير جذور النقل.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
أهمية شبستري تزداد إذا علمنا أنه أحد الرموز المقربة من الرئيس السابق محمد خاتمي، كما أنه أصبح وبحسب تعبير بعض المهتمين أهم الرموز التي يتلف حوله المثقفون الدينيون الشيعة المستقلون عن رؤية السلطة في إيران.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بعد وصول نجاد إلى السلطة-قبل أربع سنوات- منع شبستري من نشاطه العلمي في جامعة طهران، كما كثرت الضغوط عليه ولا تزال بسبب &amp;quot;انزعاج&amp;quot; التيار المحافظ الإيراني منه، وفي الأيام التي سبقت الانتخابات الأخيرة شن أحمد خاتمي عضو مجلس خبراء القيادة &amp;ndash;أخو الرئيس السابق- هجوماً عنيفاً على رموز التيار الإصلاحي بسبب سكوتهم إزاء ما نقل عن شبستري حول تشكيكه في عصمة النبي صلى الله عليه وسلم وعصمة الأئمة وهو أحد أهم ركائز مذهب الشيعة الذي تتبنها السلطة في ايران&lt;br /&gt;
وبحسب ما نقلته صحيفة الأخبار اللبنانية (عدد الأربعاء ٢٥ شباط ٢٠٠٩) فقد طالب أحمد خاتمي الإصلاحيين بموقف واضح وصريح مما اعتبره إساءة إلى النبي وأهل البيت، مشدداً على أن سكوتهم هو بمثابة الكفر، ومشيراً إلى أن حديث شبستري عن أن الاعتقاد بولاية الفقيه المطلقة (شرك)، هو خلاف لبديهيات مذهب التشيّع وما هو مشهور عن علمائهم عبر التاريخ، ووصف خاتمي كلام شبستري بأنه نوع من التماشي بين أصحاب هذه الأفكار مع أولئك الذين يسعون لتقويض النظام الإسلامي في ما بات يعرف (بالانقلاب الناعم). في هذا الوقت، اعتصم مئات الطلاب وعناصر التعبئة للباسيج في حرم جامعة أصفهان، احتجاجاً وتنديداً بكلام شبستري، وطالبوا الحكومة بحل اتحاد الطلبة الإصلاحي، ووقف نشاطهم السياسي.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;الدكتور عبد الكريم سروش&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;img align=&quot;left&quot; alt=&quot;عبد الكريم سروش&quot; height=&quot;135&quot; hspace=&quot;4&quot; src=&quot;/userfiles/image/soroosh.jpg&quot; vspace=&quot;4&quot; width=&quot;91&quot; /&gt;&lt;br /&gt;
كما أن من أبرز مشاريع نقد أساليب المعرفة الدينية التي شهدتها إيران مؤخراً مشروع الدكتور عبد الكريم سروش الذي عنون له بنظرية القبض والبسط في الشريعة أو نسبية المعرفة الدينية، اسم الدكتور سروش الحقيقي هو حسن حاج فرج الدباغ، وهو من مواليد طهران سنة 1945م وقد حصل على الدكتوراه في الصيدلة من جامعة طهران 1968، ثم سافر إلى بريطانيا عام 1972 لإكمال دراسته في الكيمياء التحليلية، وقد بدا له أن يغير تخصصه فدرس فلسفة العلم في جامعة لندن ما أتاح له الاطلاع على تطورات نظريات الفلسفة الغربية والتعمق فيها مناهجها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عاد سروش إلى ايران بعد الثورة عام 1979 ليصبح عضواً في لجنة الثورة الثقافية بتوصية من الخميني، ثم انتقل إلى جمعية الحكمة والفلسفة في طهران كباحث متفرغ وتم اختياره كعضو في المجمع العلمي هناك. وقد ظهر سروش منذ اوائل الثمانينات كواحد من الكتاب اللامعين في إيران، واهتم في أول الأمر بمناقشة النظريات الماركسية وموضوعات فلسفة العلم ومن أهم ما كتب تلك الفترة كتاب (ما هو العلم، ما هي الفلسفة؟) وكتاب (دراسة نقدية لكتاب الشهيد محمد باقر الصدر -الأسس المنطقية للاستقراء).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بعد منتصف الثمانينات اتجه سروش إلى ممارسة نقدية داخلية دينية أثارت لغطاً كبيرا، ففي عام 1989 نشر مجموعة مقالات القبض والبسط النظري للشريعة في مجلة (كيهان)، وقد كانت شرارة &amp;quot;لاندلاع واحدة من أبرز المعارك الفكرية بعد انتصار الثورة الإيرانية، كما شكلت علاقة فارقة في المشهد الثقافي الإيراني بحكم ما أفرزته من محاور وتيارات فكرية معارضة ومؤيدة، ساهمت في الإعداد لاحقاً لبروز مجموعة من التغيرات والتكوينات السياسية&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لن يخفى على القارئ لكتابات سروش بأنه متعمق ومؤمن بالتصوف، ولعل اقتباسه مسمى (القبض والبسط) وهما مصطلحان صوفيان دليل على ذلك، كما أن سروش انطلق من تخصصه في فلسفة المعرفة إلى تقديم رؤية جديدة ترمي إلى إعادة مفهوم المعرفة الدينية، والسؤال المهم ما هي نظرية سروش؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يبدأ شروس التأسيس لنظريته بقاعدة أن المعارف الدينية بشرية وأن الدين شيء وما نفهمه من الدين شيء آخر، وتبعاً لذلك فإن الدين هو الثابت وما نفهمه قد يتحول، ثم يأتي إلى قاعدة ثانية وهي أن التغير والتطور سمة ثابتة للمعارف البشرية كلها بما فيها معارف الإنسان بدينه، ليصل سروش إلى صلب نظريته وهي أن جميع المعارف البشرية-بما فيها الدينية مرتبطة ببعضها وأن حدوث أي تطور في احدها يعني بالضرورة تطور في المعارف كلها بما فيها الدينية، لتكون النتيجة أن فهمنا وقراءتنا للدين سوف تتطور بحسب تطور العلوم البشرية الأخرى، من هنا جاء استعارة مصطلح القبض والبسط عند سروش ليبين أن فهمنا الشريعة ينقبض وينبسط بحسب المعطيات المعرفية البشرية.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظرية سروش أحدثت زلزالا عنيفاً بعد ظهورها في إيران، فقد انبرى للمناقشتها عدد كبير، منهم الشيخ صادق لاريجاني والدكتور عبد الله نصري و أحمد الواعظي.&lt;br /&gt;
لقد كان المصدر الأساسي لقلق الرافضون لنظرية (القبض والبسط) استشعارهم بأن النظرية تحمل بذور الشك والنسبية في عقائد الدين وأحكامه، حتى أن بعضهم علق عليها بقوله: إن الدين الثابت عند سروش هو ما في اللوح المحفوظ ما يعني عدم وجود ثوابت للدين على أرض الواقع.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقد أوردت صحيفة الشرق الأوسط في عدد 26 سبتمبر 2004 العدد 9434 خبراً يفيد بتعرض سروش للضرب في مدينة قم من قبل بعض المعارضين له، حيث دعي من قبل بعض زملائه لزيارة قم بعد غياب دام 14 عاما، وبعد الاجتماع الذي عقد في منزل صديقه، حضره ما بين 40 الى 50 شخصا فوجئ الحاضرون بهجوم مجموعة من الشبان عليهم وضربهم. وهذه الحادثة تشير إلى مدى استشعار بعض المعارضين لسروش لخطورة ما يطرح، الأمر الذي دفع سروش إلى الخروج من إيران والإقامة في الولايات المتحدة.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يجدر بنا الإشارة إلى أن سروش إلى جانب كتابه القبض والبسط أصدر عدّة كتابات أخرى أهمها كتاب (الذاتي و العرضي في القرآن) وكتاب (بسط التجربة النبوية) و كتاب (الصراطات المستقيمة).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;محمد جواد الموسوي الغروي&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;img align=&quot;right&quot; alt=&quot;محمد جواد الموسوي الغروي&quot; height=&quot;216&quot; hspace=&quot;4&quot; src=&quot;/userfiles/image/garoori.jpg&quot; vspace=&quot;4&quot; width=&quot;145&quot; /&gt;كما أن من أهم محاولات اصلاح أدوات النظر والاجتهاد الديني في إيران محاولة الشيخ محمد جواد الموسوي الغروي الأصفهاني (المولد عام 1906م)، وهو عالم دين شيعي حاز على مرتبة (آيه الله العظمى) وعلى درجة الاجتهاد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقد كان للسيد الغروي تجرية منهجية مهمة يصعب على الباحث أن يتجاوزها وهو يتحدث عن أهم التجارب الإيرانية المعاصر في الإصلاح والتغيير عموماً، إذ تبنى محمد جواد الموسوي الغروي الفكرة التي تقول بأن الدين يجب أن يبني على العلم اليقيني وليس الظني، إلا أن الجديد لدى الغروي أنه استطاع في فترة مبكرة-نسبياً- أن يجعل من الفكرة تجرية عملية على أرض الواقع، حيث وضع أسساً جديدة لمفهوم الاجتهاد الديني ومصادر المعرفة الدينية مبني على أن كل دليل ظني فهو مرفوض ولا يصح الاعتماد عليه لا في العقائد ولا في الأحكام ولا غيرها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لقد كانت النتيجة الأولى لتوجه الغروي أن أسقط الاستدلال بجزء كبير من المرويات الحديثية واعتبارها ليست جدير بأن تكون مصدراً للمعرفة الدينية، لأن قصارى ما تفيده هو الظن، وهو بحسب الغروي مما أورد الأمة في المهالك وفتح باب التفرق بين المسلمين عبر فتاوى الفقهاء المعتمدة التي تستدل بالآحاد والظنون.&lt;br /&gt;
عودة للأعلى&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ويرى الغروي أن الاعتماد على أخبار الآحاد وقع بين أهل السنة أولاً ثم انتقل إلى صفوف الشيعة على يد الطوسي (460هـ)رغبة في مواكبة الفقه.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الغروي يؤيد توجهه الاستدلالي بأن القرآن الكريم يؤكد على أن المرجعية المعتبرة هي اليقين فقط وأنه-أي القرآن- حثنا على أتباع العلم ونهانا عن اتباع الظن، مشيراً إلى أن النصوص القطيعة (القرآن والسنة) فيها ما يغني عن غيرها، وبناء على ذلك أبطل الغروي الاستدلال بأدلة مشهورة مثل خبر الآحاد والمصالح المرسلة والإجماعات وغيرها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ومع أن الغروي ينفي حجية خبر الواحد بحد ذاته إلا أنه عملياً لا يلغيها، بل يرى أن كثيراً منها مؤيد بالدليل القطعي مثل العقل أو القرآن أو السنة المتواترة أو تؤيده أحد الأصول الثابتة مثل البراءة الأصلية.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من جهة أخرى يرى الغروي أن الاعتماد على كتب الرجال لمعرفة صحة الأحاديث من عدمها خطأ منهجي لأن مؤلفي تلك الكتب لم يقابلوا الرواة بأنفسهم وإنما اعتمدوا على نقل الناقلين وهو أمر غير قطعي فلا يعتمد عليه.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إذن ما منهج الغروي في معرفة صحة الحديث؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يرى الغروي أن لا طريق لمعرفة صحة الحديث من ضعفه إلا من خلال عرض نصّه على القرآن ثم العقل ثم الأصول المسلم بها كالبراءة الأصلية ثم السنة القطيعة فإن وافقها قُبل وإلا رُدَّ، ويرى الغروي أن لا سبيل للخروج من تعارض الأحاديث إلا بنفس الطريق أيضاً.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وللغروي حديث طويل حول كثرة الأحاديث الموضوعة والتي أسست لانتشار الخرافات والغلو عند الشيعة والسنة لاسيما في أحاديث الكرامات والمعجزات وأدعية زيارات قبور الأئمة وغيرها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وكتأسيس عملي لفقه يقوم على نظرية (العلم اليقيني) يضع الغروي بعض المبادئ هي:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
أولاً: أن أهداف الدين هي تهذيب النفس وإصلاح العمل ولا يمكن أن يحصل هذا بالظن.&lt;br /&gt;
ثانياً: أن آراء الفقهاء المبنية على الظنون لا تسقط التكاليف.&lt;br /&gt;
ثالثاً: أن رجوع الجاهل إلى العالم أمر مطلوب ولكن بغرض حصول العلم للجاهل وليس للتقليد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ويرى الباحث حيد حب الله بأن هذه المبادء تحمل نتائج حساسة على التيار السائد &amp;quot;إذ يعني أن المرجعيات الشيعية اليوم ليست مرجعيات حقيقية، وأن ما يكتب على الرسالة العلمية من (مبرئ للذمة) ليس صحيحاً، أي أنها دعوة لعدم تقليد المرجعيات الدينية القائلة بخبر الواحد، وأما المبدأ الثالث فيعني إعادة تكوين لمفهوم التلقيد، فلم يعد اتباع المرجع صماً وعمياناً، بل مساءلته عن دليله لكي يقتنع المكلف به، وليست القضية أنه قلد شخصاً لزمه كل ما قاله، حتى ولو لم يقتنع به كما هو الحال السائد اليوم&amp;quot;.&lt;br /&gt;
الغروي وبسبب توجهاته هذه تعرض لحملة قوية من التشويه والمضايقة، كما أن البرقعي ذكر في كتاب سوانح الأيام أن الغروي كانت تعرض هو ومن يصلون معه الجمعة-قبل الثورة- للمضايقات والترهيب.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;إعلاء مرجعية القرآن&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
في حديثنا عن أهم محاولات إصلاح أدوات النظر والمعرفة الدينية في إيران يجب أن نعرج بالحديث عن شريحة أثارت لغطاً كبيراً في الحقبة الماضية ولازالت، حيث شهدت إيران ميلاد تيار ديني حاول تقديم منهجاً جديداً على الساحة الدينية الشيعية.&lt;br /&gt;
الفكرة الأساسية التي قدمها منظرو هذا الفريق هو (إعادة مكانة الاستدلال بالقرآن في الأوساط الدينية عملياُ)، حيث أحس هؤلاء بأن أدلة القرآن قد توارت خلف بعض المقدمات الكلامية (كتوهم ظنية دلالة القرآن) أو خلف بعض المفاهيم الخاطئة (كالقول بصعوبة فهم القرآن أو لا يفهم القرآن إلا الأئمة أو العلماء) أو خلف روايات تفسر القرآن بشكل باطل.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ونظراً لتركيز هذه الفئة على القرآن شاع تسميتهم بـ (القرآنيون الشيعة) مع أحداً من هؤلاء لم يقل برفض السنة النبوية كما هو حال القرآنيون في الهند وباكستان.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ويعد المؤسس الأول لهذه الفكرة هو آية الله &lt;strong&gt;محمد حسين شريعت سنكلجي &lt;/strong&gt;المتوفى سنة 1943م، وهو عالم دين &lt;img align=&quot;left&quot; alt=&quot;شريعت سنكجلي&quot; height=&quot;250&quot; hspace=&quot;4&quot; src=&quot;/userfiles/image/sangalji.jpg&quot; vspace=&quot;4&quot; width=&quot;186&quot; /&gt;شيعي درس في إيران والعراق على يد مجموعة من العلماء أمثال المرجع أبي الحسن الأصفهاني وغيره، وقد قاد دعوة إصلاح داخل المذهب الاثني عشري ذات طابع منهجي وعقدي في آن واحد.&lt;br /&gt;
ملخص ما رآه سنكلجي هو أن المسلمين ابتعدوا عن القرآن قراءة وفهماً واستدلالاً مما أدى بهم إلى الفشل والخراب، الأمر الذي دفع سنكلجي إلى تبني رفع لواء الدعوة إلى إعادة المكانة للقرآن الكريم، وفي سبيل ذلك طرح سنكلجي مبادئه التالية:&lt;br /&gt;
أولاً: أن القرآن محفوظ من التبديل والتحريف. ثانياً: أن القرآن واضح، وأنه لا يحتاج إلى غيره من أجل فهمه، وبحسب ما قال سنكجلي: (لا توجد في كتاب الله آية واحدة يعجز جميع الخلائق عن فهمها، بل القرآن كله قابل للتدبر والفهم). ثالثاً: أن نص القرآن يتضمن كل ما يتعلق بالدين والشريعة وأنه بيان لكل شيء. رابعاً: رفض التخلي عن السنة النبوية وبيان أن أحكام الشريعة في القرآن مجملة وتحتاج في تفصيلها إلى السنة النبوية، يقول سنكلجي: (والسنة هي التي تبين ما أجمله الكتاب وتشرح كلياته، فلا يمكن فهم القرآن دون سنة النبي صلى الله عليه وسلم) ويقول: (فإذا عرفنا أن مباحث القرآن كلّيّة ومجملة وأنه لا يمكننا أن نفهمها دون الرجوع إلى السنة اتضح لنا بطلان قول من يسعون إلى تخريب الإسلام وليس لهم في الآخرة نصيب وهم خارجون عن جماعة المسلمين الذين يقولون إن في القرآن بيان لكل شيء وأننا لسنا بحاجة إلى السنة، ثم قاموا بتأويلات باردة للقرآن واتبعوا أهواءهم وآراءهم في فهم كتاب الله). خامساً: أن القرآن استوعب العقائد التي يجب الإيمان بها، فلا حاجة إلى السنة في بيان العقيدة الواجبة. يقول سنكلجي: (أما في المسائل الاعتقادية مثل إثبات صانع العالم والتوحيد والنُبُوَّة والمعاد فلما كان القرآن قد تعرَّض لإثباتها بكل تفصيل وأقام عليها براهين ساطعة لم نعد بحاجة إلى الرجوع إلى السنة في هذا المجال)، وللاطلاع بشكل أوسع على آراء سنكلجي التي رسمها للاستدلال بالقرآن يمكن الاطلاع على كتابه مفاتيح فهم القرآن وقد ترجمه للعربية الاستاذ سعد رستم ويمكن الاطلاع عليه عبر موقع اجتهاد الالكتروني.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الجدير بالذكر أن شريعت سنكجلي تبنى آراء إصلاحية علمية وعميلة تندرج في إطار محاربة ما اعتبره سنكلجي مظاهر للغلو والخرافات في الدين ودعوة لتنيقة الاعتقاد الاثني عشري من المحدثات التي أدخلها فيه الغلاة، وفي سبيل ذلك ألّف كتابه توحيد العبادة بالفارسية وهو مطبوع ومترجم للعربية.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
إذن شريعت سنكجلي أراد من خلال مشروعه تقويم أهم أسلوب للمعرفة الدينية من خلال إعادة طريقة الاستدلال بالقرآن الكريم من أجل الوصول إلى معرفة دينية صحيح وسلوك ديني قويم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;عبد الوهاب فريد التنكابني&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يعد عبد الوهاب فريد أحد أهم المطروين لفكرة سنكلجي فهو أحد أبرز تلامذته، ومع أنه لم يصل إلينا عن عبد الوهاب إلا كتاب (الاسلام والرجعة) نقله إلى العربية الاستاذ سعد رستم إلا أن المطلع عليه لن يصعب عليه معرفة منهجه الرامي إلى إعلاء الاستدلال بالقرآن كما هو حال سنكجلي إلا أن الجديد لدى عبد الوهاب هو قوله باستحالة وجود حديث متواتر في غير ضروريات الدين، وإلغاء أشكال التقليد في الدين، كما أنه رسم صورة للأحاديث الضعيفة وأسباب وجود الأحاديث المكذوبة طريقة معرفتها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
أول نتيجة عملية لاتباع عبد الوهاب فريد أسلوبه الجديد في طريقة المعرفة الدينة هو وصوله إلى نفي عقيدة الرجعة ووصفها بأنها عقيدة الغلاة، ثم يقوي تأويلها إلى عودة الاسلام إلى قوته في دولة الأئمة آخر الزمان.&lt;br /&gt;
عودة للأعلى&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;يوسف شعار&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ومن المصنفين في مدرسة إعادة مكانة الاستدلال بالقرآن الكريم الشيخ يوسف شعاري التبريزي (ت: 1394هـ) وقد اشتهر عنه بالاهتمام بالقرآن تدريساً وتفسيراَ، كما أنه أسس مكتباً لتفسير القرآن في تبريزـ وألف عدّة كتب منها: المحكمات والمتشابهات في القرآن، وكتاب تفسير سورة الجمعة وكتاب مقدمة في التفسير.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;الدكتور مصطفى حسيني طباطبائي&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;img align=&quot;absBottom&quot; alt=&quot;مصطفى حسيني الطباطبائي &quot; height=&quot;185&quot; hspace=&quot;4&quot; src=&quot;/userfiles/image/hoseini_tabatabayi.jpg&quot; vspace=&quot;4&quot; width=&quot;150&quot; /&gt;&lt;br /&gt;
يعد السيد الدكتور مصطفى حسيني الطباطبائي من أبرز الوجوه الإصلاحية الدينية في إيران، وهو أكاديمي وباحث إسلامي يعيش فيطهران وله اهتمام بالغ بالقرآن الكريم، ولتوضيح ما يتعلق بعلاقته بمدرسة إعادة مكانة الاستدلال بالقرآن فإن مصطفى حسيني الطباطبائي يؤكد على مبدأ إمكانية فهم القرآن دون الحاجة للأحاديث في ذلك، كما يقول الدكتور مصطفى بأن أفضل طريقة لتفسير القرآن هو تفسير القرآن بالقرآن، غير أنه يبين أن سهولة القرآن وضوحه لا يناقض وجود معاني دقيقة زائدة على المعنى الإجمالي.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كما أن الطباطبائي في سبيل تأكيده على مبدأ الاهتمام بالاستدلال بالقرآن يرى بأن كتب المرويات مليئة بالأحاديث الباطلة والخرافية ويرى أن ذلك مما يؤكد أهمية الاعراض عنها اعتماد على مرجعية القرآن.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الطباطبائي له آراء إصلاحية مهمة في سبيل توحيد المسلمين وتقليص دائرة الخلاف بين السنة والشيعة كما هو واضح في كتابه حل مشكلة الخلاف بين الشيعة والسنة في الإمامة.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;محمد الصادقي الطهراني&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آية الله الدكتور محمد الصادقي الطهراني من المؤمنين بمبدأ إعادة تكوين طريق المعرفة الدينية عبر إعلاء القرآن الكريم والسنة القطعية دون غيرهما للوصول إلى معارف إسلامية أصيلة.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الصادقي الطهراني علام إيراني معاصر وله تحقيقات ونتائج علمية أثارت جدلاً في الساحة الإيرانية، حيث يرى الصادقي يبين أن أهم شروط الاجتهاد في الدين هو أخذ طالب العلم دورة بحثية كاملة للقرآن الكريم، وهو ما لا ينطبق على كثير من الفقهاء المتصدرين اليوم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كما يرى الصادقي لا يقول بـ&amp;quot;أن أفضل طريقة لفهم القرآن هو تفسير القرآن بالقرآن&amp;quot; فقط بل يرى الصادقي أن هذه الطريق الوحيد لفهم القرآن، وأن السنة وإن كانت قطعية فلاحاجة لها في فهم القرآن الذي هو نص واضح وميسر وتبان لكل شيء ولهذا يؤكد الصادقي بطلان القول بـ&amp;quot;ظنية دلالات القرآن&amp;quot; وأن قائل ذلك يشارك في ستر حقائق كتاب الله وكاتم للحق، لكنه يبين أن السنة القطيعة ممكن أن ينتفع بها في التفسير القاصرين عن فهم النص الواضح، اما من جهة الأحكام الفقيهة فلا مانع لدى الصادقي أن تؤسس السنة المتواترة أحكاماً ليست لم ترد في القرآن الكريم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الجدير بالذكر أن صادقي قدم خطوة عملية مهمة في تطوير مسار إعادة هيكلة أدوات المعرفة الدينية، حيث قام بتأسيس فقه إسلامي شبه متكامل يعتمد في استدلالاته على الأدلة التي يقول بأنها قطعية، وقد أطلق على هذا الفقه &amp;quot;مسمى الفقه&amp;quot; الناطق في مقابل نوعين آخرين هما &amp;quot;الفقه التقليدي&amp;quot; وهو الطريقة السائدة التي يصفها الصادقي بأنها همشت دور القرآن الكريم، والفقه الآخر هو &amp;quot;الفقه التجديدي&amp;quot; ويشير فيها إلى أصحاب نظرية التحول الدائم في فهم الشريعة مثل عبد الكريم سروش ونحوه، وإن كان الصادقي يرى أن بعض الأحكام قد تتغير بتغير أو انتفاء &amp;quot;علة الحكم&amp;quot; ن الحكم يدور مع علته.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقد جاءت المخرجات التطبيقية لـ&amp;quot;الفقه الناطق&amp;quot; عند الصادقي بآراء صادمة للسائد المتعارف عليه بين الشيعة في إيران، كان من أبرزها: تحريم التقليد إلا للعاجز عن الاجتهاد، وجواز السجود على الفرش وأنواع السجاد، وربط جواز القصر في السفر بوجود الخوف أو الضرر فقط، ووجوب صلاة الجمعة والجماعة والعيدين، ورحمة تقبيل يد غير المعصوم، ونفي وجوب الخمس في أرباح المكاسب ونحوها من الآراء التي خالف فيها الصادقي الاتجاه الفقهي السائد في إيران.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
والخلاصة أن آية الله الدكتور الصادقي الطهراني من خلال آرائه -التي دونها في كتبه مثل (تبصرة الفقهاء) وكتاب (الفرقان في تفسير القرآن) قدّم مشروعاً تطبيقياً مهماً وتطويرا في نفس الوقت لفكرة المدرسة القطعية القرآنية، ذلك المشروع الجدير بدراسات معمقة بشكل أكبر ترصد تطوراته وتفاعلاته وآثاره.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ربما أكون قد قدمت إضاءة لأبرز الشخصيات في مسارات إصلاح الفكر الديني في إيران في هذا الكلمات، وأؤكد بأن هذا المقالات ما هي إلا إشارات ربما تحمل في طياتها بيان أهمية التعرف والتواصل مع تفاعلات المشهد الإصلاحي الديني في إيران وهو أمر يكاد يكون غائبا عن ساحتنا، فالواقع يشهد على وجود قطيعة ثقافية بين المشهد العربي والإيراني، وكأن بينهما جدار فصل عنصري يهيئ أحسن الأجواء لسيطرة الطائفيين والتعصبيين، ويغلق أبواب التواصل البناء بين أصحاب الفكر النير والمشاريع الإصلاحية، أعني تلك المشاريع التي تدعوا إلى تصحيح المسار التي تساهم في تجنيب الأمة ويلات كثيرة تستنزف طاقاتها في جبهات خاسرة، نعم وحدهم الطائفيون هم الذين يخشون من نشاط دعوات الإصلاح ويخشون أكثر من تواصل المصلحين.&lt;br /&gt;
فهل تشهد المرحلة القادمة بناء جسور التواصل البناء بين أصحاب الفكر في المشهد العربي والمشهد الإيراني. أرجوا ذلك.&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;rteright&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;منقول من: جسور التواصل&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>الموقف من الشبهات على خليفة رسول الله أبي بكر الصدّيق</title>
<link>http://qalamlib.com/news/320</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فإنه لمن المفارقات أن تنشغل أمّة الكتاب والسنّة والجماعة؛ عن أهدافها الكبرى في هذا العصر، بالدفاع عن ثوابتها ورموزها وأئمتها، وما يُفترض أن يكون خارج دائرة النظر والبحث، لاتفاق الأمة وإجماعها عليه! فحين ينشغل المخلصون بالدفاع عن رموز أمتهم وسلامة عقيدتها ووحدة صفها، فمن يخطط لواقعها ويستشرف لها مستقبلها لتواكب السائرين، وتنافس السابقين؟ وحين يصير الحال إلى دفع الشبهات عن الرجل الثاني في الأمّة بعد رسول الله ج أبي بكر الصدّيق (ثاني اثنين) رضي الله عنه، فهذا يؤشر إلى تغلغل الزحف الأسود في الأعماق، ووصوله إلى الخصوصيات، وأنّ ثقافة الشك والريبة ونشر الشبهات على الثوابت والرموز، التي تبثها راياته الغارقة في الغدر والمكر ضد أمتنا وعقيدتنا، لها ربيئة تتخندق حولها، وتحتمي بها داخل حصوننا، ولها كباش تقودهم من قرونهم من أبناء جلدتنا، تنطح بهم كل مخلص أمين، بفتاوى زائفة، وأفكار فاشلة، واجتهادات تائهة، لتبعثر وتشوه كل جهد أصيل، وموقف نبيل، يعمل على ترميم الثغور، وتنقية القصور، وإشادة الحصون!.&lt;br /&gt;
وعلى الرغم من أنّ (ثاني اثنين) خليفة رسول الله صلى الله عليه وسلم أبي بكر الصدّيق رضي الله عنه بإيمانه وعلمه وشجاعته وقيادته وكرمه، وقربه من رسول الله صلى الله عليه وسلم&amp;nbsp;ومحبة الأمة له، لا يحتاج إلى من يرد عنه الشبهات لأنّه فوق الشبهات، ولأن النيل منه علامة على الشعوبية والزندقة، وإشارة إلى أهل الرفض والردة، فمن تثبت عليه تهمة بغض الصدّيق س فهذا فيه الدليل الواضح؛ على أنّ صاحبه من أعداء رسول الله صلى الله عليه و سلم من بقايا المشركين، وإخوان المرتدين، وأعوان الغزاة والمحتلين.&lt;br /&gt;
فأعداء رسول الله صلى الله عليه وسلم هم خصوم أبي بكر الصدّيق رضي الله عنه وعلى هذا فردّ الشبهات عن خليفة النّبي صلى الله عليه وسلم أبي بكر الصدّيق رضي الله عنه يعني في المقام الأول، رصد مواطن الخطر ومنابع الشرّ، وبيان اتجاهاتها وأهدافها ومقاصدها، ومَن يتلقاها ويتعاون معها، ومن ثم العمل على فضح ربيئتها وتكسير قرونها، لتنقية صفوفنا، وصيانة حصوننا، فأبو بكر الصدّيق س إمام الأمّة وقائدها بعد نبيّها ج لا يقبل تحت راياته المترددين، ولا التائهين المفرطين بالهوية، فسبيله واضحة، ومقاصده نيرة، وأهدافه سامية، وجنده نبلاء أمناء أوفياء.&lt;br /&gt;
فمن اختار إمامة الصدّيق رضي الله عنه فقد رضي بالكتاب والسنّة منهجاً، وأنّ أعداء الصحابة وبكل أصنافهم هم خصومهما، المتربصين بالعقيدة والقيادة، المتعاونين مع الأعداء على مرّ العصور، فطريق أبي بكر الصدّيق رضي الله عنه هو سبيل الدفاع عن وحدة الأمّة وحاضرها ومستقبلها، وتحمل تبعات ذلك، والعمل بكل الطاقات لصيانة موروثها، وحماية حصونها، ومواجهة أعدائها.&lt;br /&gt;
فكل يد تمتد إلى أعداء الصحابة إنّما هي يد مشاركة في تقوية شبهاتهم وحماية ربيئتهم، ومَنْ أكل من حلوائهم خبط في أهوائهم، فلا عذر ولا مسوغ لمن لازال مصراً على الخوض في أوحالهم، فالصدّيق س وأولياؤه أمّة من دون النّاس، وأعداؤه وأولياؤهم أمّة أخرى لا يلتقيان!.&lt;br /&gt;
وهذا الموضوع إذ يعمل على ردّ الشبهات فإنّه بالقدر ذاته ينبه إلى مصادر الشرّ وأعوانه، ويهيب بأبناء أمّةِ السنّةِ والجماعة أن يتعاملوا مع أعدائهم بالمثل، العين بالعين، والسنّ بالسن , والبادئ أظلم، وإن لم يتحقق هذا فلا أقلّ من حراسة عقيدة الكتاب والسنّة وحملتهما الصحابة رضي الله عنهم وأن يفقه كل مسلم أنّ الانتماء لهذه العقيدة له ضوابط ونواقض وأنّ موالاتها يعني البراءة ممن يرفضها ويردها، وما سوى هذا فإنّما هو ادعاء وعبث، لا يُسمن ولا يغني من جوع.&lt;br /&gt;
وهذا البحث عالج مجموعة من الأباطيل التي تستهدف عقيدة السنّة والجماعة، وخليفة نبيها ج أبا بكر الصدّيق س وقد ابتدأ فصوله المهمة بتمهيد لكل فصل منها، أغنى عن إطالة الكلام في المقدمة، وبيَّن فيه أهمية تنقيح وتنقية ثقافة الأمّة وفكرها، ونزع كل مافيها من الشوائب، وأكد على وجوب ردّ الشبهات وطمسها، من غير أن يكون لها نصيب في الانتشار بين طيات تلك الردود، وأن يتحلى الكُتَّاب المسلمون بالثقة المطلقة بعقيدة الكتاب والسنّة، وبالصحابة الذين هم خير من حملهما وبلّغهما، وعمل بما فيهما رضي الله عنهم وأرضاهم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرا رسیدن ماه رحمت بیکران حق مبارک باد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/318</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتابخانۀ عقیده: فرا رسیدن ماه میهمانی الله متعال، ماه رحمت بی&amp;zwnj;پایان حق، ماه خیر و برکت، غفران و بخشایش، عبادت و بندگی حق تعالی ، ماه امساک از گناهان و محرمات بر تمامی بندگان&amp;nbsp;الله متعال مبارک و خجسته بادا...&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از ذات پاک احدیت تمنا داریم گردانندگان سایت و خوانندگان عزیزمان را به جمع ضیوف رحمانی این مائده آسمانی شامل گرداند، و به ما توفیق دهد تا جان و روح و جسم خود را در کوثر زلال رمضان همراه با عاشقان ماه عبادت و بندگی صادقانه شستشو دهیم و با ورع و پرهیز از منکرات دل و جان خود را سرشار از زمزمه آیات ملکوتی حق گردانیم، و با سلاح تقوا و توحید و پرهیزکاری و خودسازی اهریمن و سپاهیانش را از سرزمین مقدس روحانی وجودمان برانیم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;اميدواریم ماه رمضان امسال ماه شكوفايي روح ايمان و تقوا در دل تمام مردم مسلمان جهان، و ماه پرورش و صعود روحيه صبر و استقامت در برابر ناملايمات زندگي، و ماه رهایی از شرک و بدعت و خرافات و قبرپرستی، و رسیدن به توحید قرآنی باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الله متعال به همه ما توفیق صیام و قیام این ماه مبارک را ارزانی دارد، و شب قدر را ارمغان کرم و بخشایش خود به ما گرداند!..&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ادارۀ کتابخانۀ عقیده&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کشف دروغها و فريبهای نگارنده «المراجعات»</title>
<link>http://qalamlib.com/news/317</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همواره کتاب &amp;laquo;المراجعات&amp;raquo; اثر عبدالحسین شرف الدین موسوی (م 1377 ه&amp;zwj;&amp;zwnj;) ، از نظر شیعیان پیروز و برنده&amp;zwnj;ی میدان، و مرجع مهمی برای فریب مسلمانان غافل بوده است.نویسنده المراجعات ادّعا می&amp;zwnj;نماید که این کتاب خلاصه نامه&amp;zwnj;ها و گفتگو و مناظره&amp;zwnj;های میان او و شیخ و استاد دانشگاه اَلازهر سلیم بشری (رح) می&amp;zwnj;باشد. دروغ پردازی این گروه مسلک و روش تازه&amp;zwnj;ای نیست، این راه و روش در طول تاریخ رهروان و پیشگامانی داشته است. ولیکن شگفت اینکه پیروان موسوی چگونه به این سفاهت راضی و خشنود می&amp;zwnj;گردند!!&lt;br /&gt;
کتاب &amp;laquo;المراجعات&amp;raquo; موسوی مملو از دروغ و تلبیس و تهمت است و علیرغم همه این خصوصیات و رسوایی&amp;zwnj;هایی که در کتاب وی وجود دارد، میلیونها نسخه از آن در اطراف دنیا میان اهل تشیّع و اهل سنّت توزیع و به فروش رسیده است. و شما خوانندة گرامی اگر اندکی با مصادر اهل سنت آشنایی داشته باشید به محض ورق زدن صفحه&amp;zwnj;هایی از این کتاب به حقیقت موسوی پی خواهید برد، خلاصه اینکه همه چیز در کتاب &amp;quot;المراجعات&amp;quot; یافت می&amp;zwnj;شود، جز واقعیت و سلامت تحقیق و &amp;nbsp;با مطالعه این کتاب به میزان جهل و دروغ و فریب موسوی پی خواهید برد.&lt;br /&gt;
کتابی که اینکه خدمت شما عزیزان معرفی می گردد ردی است بر دروغ های &amp;nbsp;موسوی زیرا اسلام و اهل بیت نیازی به کذب و جهالتهای عبدالحسین (وامثال او) ندارند، این کتاب ثابت می کند که اهل سنت روایات را به دور از احساسات و عواطف، و بر اساس قواعد علمی تحقیق مورد بحث و بررسی قرار می&amp;zwnj;دهند.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزیز می توانند با کلیک بر روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/464/&quot;&gt;کشف دروغها و فريبهای نگارنده &amp;laquo;المراجعات&amp;raquo;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
نقد المراجعات (آيت الله برقعى)&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>فاطمه زهراء رضی الله عنها و توهین روافض به صحابه و اهل بیت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/316</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این روزها در ایام فاطمیه، توهین و افتراء از هر سو در رسانه ها، مطبوعات و سایتها به مقدسات اهل سنت و جماعت شیوع پیدا کرده است.&lt;br /&gt;
بدون&amp;zwnj; تردید احترام&amp;zwnj; به&amp;zwnj; خانه&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; زهرا رضی&amp;zwnj;الله عنها احترام&amp;zwnj; به&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; اكرم&amp;zwnj;(صلی الله علیه وآله وسلم) است&amp;zwnj; و هتك&amp;zwnj; حرمت&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; زهرا رضی&amp;zwnj;الله عنها، توهین&amp;zwnj; به&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; اكرم&amp;zwnj;(صلی الله علیه وآله وسلم) و خاندان&amp;zwnj; او محسوب&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گردد، كه&amp;zwnj; هیچ&amp;zwnj; مسلمانی&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; را جایز نمی&amp;zwnj;داند.&lt;br /&gt;
اما بر خلاف&amp;zwnj; آنچه&amp;zwnj; كه روافض ادعا می&amp;zwnj;نمایند، عموم مسلمانان معتقدند كه&amp;zwnj; همه ی&amp;zwnj; صحابه&amp;zwnj; و خصوصاً حضرت&amp;zwnj; ابوبكر و عمر رضی&amp;zwnj;الله عنهما با دخت&amp;zwnj;گرامی &amp;zwnj;رسول&amp;zwnj; اكرم (صلی الله علیه وآله وسلم) رفتاری&amp;zwnj; شایسته&amp;zwnj; داشته&amp;zwnj;اند و احترام&amp;zwnj; خانه&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; بانوی&amp;zwnj; بزرگوار را كاملاً مراعات&amp;zwnj; نموده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
چنانچه&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; ابوبكر(رضی الله عنه) توصیه&amp;zwnj; فرمودند: ارقبوا محمداً(صلی الله علیه وآله وسلم) فی أهل&amp;zwnj; بیته&amp;zwnj; (صحیح بخاری)&lt;br /&gt;
حال&amp;zwnj; محمد (صلی الله علیه وآله وسلم) را درباره&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیتش&amp;zwnj; مراعات&amp;zwnj; كنید.&lt;br /&gt;
و فرمودند: والذی&amp;zwnj; نفسی بیده&amp;zwnj; لقرابة&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; الله(صلی الله علیه وآله وسلم) احب&amp;zwnj; الی&amp;zwnj;ّ أن&amp;zwnj; أصل&amp;zwnj; من&amp;zwnj; قرابتی (صحیح بخاری)&lt;br /&gt;
قسم&amp;zwnj; به&amp;zwnj; ذاتی كه&amp;zwnj; جانم&amp;zwnj; در دست&amp;zwnj; اوست &amp;zwnj;ارتباط&amp;zwnj; و خویشاوندی&amp;zwnj; با خاندان&amp;zwnj; پیامبر(صلی الله علیه وسلم) نزد من&amp;zwnj; دوستدارتر از آن&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; با خویشاوندان&amp;zwnj; خویش&amp;zwnj;، خویشاوندی&amp;zwnj; نمایم&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
و از طرفی&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; ابوبكر(رضی الله عنه) جدّ برخی&amp;zwnj; از ائمه&amp;zwnj; محسوب&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گردد چنانكه&amp;zwnj; امام&amp;zwnj; صادق&amp;zwnj;(رحمه الله)؛ كه&amp;zwnj; مادرش&amp;zwnj; ام&amp;zwnj; فروه&amp;zwnj; نواده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; محمد وعبدالرحمن&amp;zwnj;، پسران&amp;zwnj; ابوبكر(رضی الله عنه) بود می&amp;zwnj;فرمود: من&amp;zwnj; از دو سو نواده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; ابوبكرم&amp;zwnj; (ولدنی ابوبكر مرتین)&amp;zwnj; (أعیان الشیعة، ج1، ص: 659)&lt;br /&gt;
حضرت&amp;zwnj; عمر فاروق&amp;zwnj;(رضی الله عنه) نیز به&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیت&amp;zwnj; پیامبر(صلی الله علیه وآله وسلم) احترام&amp;zwnj; خاصی&amp;zwnj; قایل&amp;zwnj; بودند. و خطاب&amp;zwnj; به&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; فاطمه&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj;الله عنها فرمودند: (یا فاطمة&amp;zwnj; والله ما رأیت&amp;zwnj; أحداً أحب&amp;zwnj; إلی رسول&amp;zwnj; الله(صلی الله علیه وآله وسلم) منك&amp;zwnj; والله ما كان&amp;zwnj; أحدٌ من&amp;zwnj; الناس&amp;zwnj; بعد أبیك&amp;zwnj;(صلی الله علیه وسلم) أحب&amp;zwnj; إلی &amp;zwnj;ّ منك&amp;zwnj;). (مستدرک حاکم)&lt;br /&gt;
ای&amp;zwnj; فاطمه&amp;zwnj;! بخدا قسم&amp;zwnj; من&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; را محبوبتر از تو نزد پیامبر خدا نیافتم&amp;zwnj; و به خدا قسم&amp;zwnj; هیچ&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; بعد از پدر بزرگوارت&amp;zwnj; نزد من&amp;zwnj; محبوبتر از شما نیست&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
عقیده&amp;zwnj; و اراده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; خاص&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; عمر فاروق(رضی الله عنه) به&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیت&amp;zwnj; پیامبر(صلی الله علیه وسلم)، سبب&amp;zwnj; شد تا ایشان&amp;zwnj; از ام&amp;zwnj; كلثوم&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj;الله عنها دختر گرامی&amp;zwnj;حضرت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; و فاطمه&amp;zwnj; زهرا رضی&amp;zwnj;الله عنهما خواستگاری&amp;zwnj; نمایند و سیدنا علی رضی الله عنه هم دختر خود ام&amp;zwnj; كلثوم&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj;الله عنها را كه از بطن فاطمه زهراء به دنیا آمده بود به ازدواج سیدنا عمر رضی الله عنه در آورد.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;اما روافض با قبول روایات و دروغ های شهادت حضرت زهراء رضی الله عنها ناخواسته توهین و جسارت بزرگی نسبت به علی رضی الله عنه روا داشته و او را بسیار ضعیف و کم&amp;zwnj;جرأت نشان داده اند، علی&amp;zwnj;ای که در این روایت و چند روایت دیگر این همه ضعیف است، چگونه در روایاتی دیگر این همه شجاع و غیرتمند جلوه می&amp;zwnj;نماید؟!&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;چطور ممکن است که علی رضی الله عنه با آن همه شجاعتی که از او سراغ داریم به عمر رضی الله عنه یا به خدمت&amp;zwnj;گزارش قنفذ فرصت دهد تا به همسرش که دختر رسول خداص است صدمه&amp;zwnj;ای وارد کنند و سبب سقط جنینی بنامی محسن بشوند؟!&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آیا علی رضی الله عنه تا آن حد ضعیف بود که نتواند از حریم خانوادگی خود دفاع کند؟! اگر چنین شخصیتی داشت، چگونه می&amp;zwnj;توانست ادعای خلافت و رهبری جامعه مسلمانان را بنماید؟! چگونه می&amp;zwnj;توانست از امپراطوری پهناور و نوپای اسلام دفاع کند و آن را اداره نماید؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آورده اند: زمانی که فاطمه توسط عمر رضی الله عنه مورد ضرب و شتم قرار گرفت، فاطمه فریاد می&amp;zwnj;زد: ای پسر أبی طالب! جنینم را کشتند! اما علی نظاره&amp;zwnj;گر این ماجرا بود و برای حمایت از همسرش کاری نمی&amp;zwnj;کرد!&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آیا این سخنان ناسره افراطی&amp;zwnj;ها با شأن و مقام علی رضی الله عنه شیرخدا و شهسوار اسلام و قائل عمرو بن عبدودها! سازگار است؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آیا این راویان اخبار و طوطیان شکرشکن! فکر می&amp;zwnj;کنند، خادم اسلام و مسلمین اند؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آیا این جسارت&amp;zwnj;ها و هتک حرمت&amp;zwnj;ها به علی و فرزندانش گناه نیست؟!.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آیا عمری که پهلوی فاطمه دختر پیامبر خدا را شکسته و بر صورتش سیلی زده و خانه&amp;zwnj;اش را به آتش کشیده؛ سزاوار است که با دختر فاطمه&amp;nbsp;و نواده&amp;zwnj;ی پیامبر ازدواج کند، و خود علی رضی الله عنه بزرگ&amp;zwnj;ترین قاضی صدر اسلام ولی و عقد نکاحش باشد؟!.&lt;br /&gt;
به فرض محال اگر چنان کاری از حضرت عمر سر زده بود، علی رضی الله عنه هرگز &amp;laquo;ام کلثوم&amp;raquo; دختر خود و فاطمه و خواهر تنی حسن و حسین و زینب را به نکاح عمر رضی الله عنه درنمی&amp;zwnj;آورد، نه خود ام کلثوم و نه حسنین نیز هرگز حاضر نمی&amp;zwnj;شدند، قاتل مادرشان را به عنوان عضوی از خانواده خویش قبول کنند!.&lt;br /&gt;
آری، به شهادت منابع شیعه و سنی علی رضی الله عنه دخترش ام کلثوم را به همسری عمر رضی الله عنه درآورد و یک پسر به نام &amp;laquo;زید&amp;raquo; ثمره&amp;zwnj;ی ازدواج&amp;zwnj;شان بود که ام کلثوم وفرزندش زید هردو پس از شهادت عمر رضی الله عنه در یک روز فوت کردند.&lt;br /&gt;
آری برادران و خواهران مسلمان! روافض معتقدند که عمر و اطرافیان او به خانه ای که فاطمه در آن بوده، هجوم برده اند و درب منزل را سوزانده اند و باعث شهادت فاطمه زهرا و حتی جنین داخل شکمش شده اند که نامش محسن بوده است.&lt;br /&gt;
سوالی که اکنون از این جاهلان باید شود این است لطفاً صحت این روایت را ثابت کنید و فراموش نکنید منظور ما تنها و تنها اثبات موارد زیر بطور کامل است نه چیزی دیگر که بصورت مبهم و گوشه و کنایه باشد:&lt;br /&gt;
1-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آتش زدن منزل یا درب منزل.&lt;br /&gt;
2-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سقط جنین.&lt;br /&gt;
3-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;شهادت فاطمه زهرا بخاطر این هجوم.&lt;br /&gt;
حتی روایاتی که در کتب اهل سنت پیرامون این مسئله موجود است و علمای شیعه نیز دائم به آنها اشاره دارند تنها تهدید به سوزاندن منزل را بیان می کنند نه اینکه اینکار عملی شده باشد و همچنین سقط جنین و شهادت فاطمه نیز در آنها نیست. و آیت الله قزوینی در مدت 8 شب مناظره در شبکه المستقله با وجود اصرار شدید علمای اهل سنت نتوانست حتی یک روایت صحیح در باره این اعتقاد رافضه از کتب علمای خودشان بیاورد.....&lt;br /&gt;
و به این مناسبت کتابخانه عقیده برخی از کتابهایی را که در این مورد و سیرت حضرت فاطمه رضی الله عنها نوشته شده خدمت شما عزیزان معرفی می کند:&lt;br /&gt;
فضائل اهل بیت و منزلت والای آنان از دیدگاه اهل سنت&lt;br /&gt;
عصمت حضرت زهرا رضی الله عنها از دیدگاه اهل سنت&lt;br /&gt;
فاطمه الزهراء رضی الله عنها، رحلت یا شهادت؟&lt;br /&gt;
فاطمه زهرا از خود دفاع می كند&lt;br /&gt;
دفاع از آل و اصحاب پیامبر&lt;br /&gt;
همچنین برای اطلاع از مکانت و منزلت اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم در نزد اهل سنت به بخش اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم مراجعه نمایید.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب &quot;درسهایی از مدرسه رسول الله&quot; به کتابخانه عقیده پیوست</title>
<link>http://qalamlib.com/news/315</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%&quot;&gt;کتاب &amp;quot;درسهایی از مدرسه رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم&amp;quot; نوشته دکتر عادل بن علی الشدی&amp;quot; از جمله کتابهایی است که به زائران مسجد نبوی در مدینه منوره به عنوان ارمغان حجاز اهداء می‫شود. به شکرانه حق این کتاب به فارسی برگردانده شده به کاروان کتابهای &amp;quot;کتابخانه عقیده پیوست&amp;quot;.&lt;br /&gt;
در زنگ اول این کتاب می خوانیم:&amp;laquo; از روزی که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم بانگ هدایت بشریت سردادند تا به امروز قلمها از او می‫نگارند، عقلها در اقیانوس زندگیش موج می‫زنند، اندیشه‫ها لحظه لحظه و حرکت حرکت او را پشت و رو می‫کنند، و مفاهیم جدید و معانی نوینی استخراج می‫کنند، و باز هم همه بر این اعتقادند که بشریت تنها راه و چاره روزش را از دریای بیکران او برچیده، و برای آیندگان مروارید و گهرهایی از فهم و درک در صدفهای روایات تاریخی او نهفته است که عقلهای ما، ما را یاری نمی‫کنند تا آنها را دریابیم!&lt;br /&gt;
و اینچنین است که قرآن، و سیرت عطراگین سفیر آسمان تا بروز قیامت زنده و پایدارند، و رهبریت و برنامه‫ریزی برای هر زمان و مکانی را بر دوش گرفته‫اند.&lt;br /&gt;
و اگر حضرت موسی&amp;nbsp;علیه السلام&amp;nbsp;را پیروانی بود، و اگر حضرت عیسی&amp;nbsp;علیه السلام&amp;nbsp;را مریدانی، سیمای رسول خاتم در خود سیمای همه پیامبران و رسولان خدا را جمع کرده است. او در بزرگی و عظمت خویش آنچنان فروتن و متواضع بود که مقام شاگردان خویش را از خدمت و سربازی و پیروی به راتب بالاتر بوده آنها را دوستان و یاران خود نامید!...... این کتابچه هرگز این ادعا را ندارد که گمان برد؛ بحر را در کوزه گرد آورده، بلکه تنها قطره‫ای است ناچیز که بر منقار گنجشککی کوچک از این دریای بیکران برگرفته شده است..&lt;br /&gt;
و حال که شرف این را یافته که شما؛ ای شیفته محمد مصطفی&amp;nbsp;&amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم و ای عاشق پیک آسمان، و ای پیرو و محبوب او، آنرا بدست گیری، تنها می‫خواهد به شما بگوید که راه سعادت را یافته‫ای، از این قطره برگیر و ره اقیانوس پیما. قرآن را در دو دستت و رسول هدایت را در کنارت داشته باش، و یک آیه از قرآن برگیر، سپس در تابلوی متحرک رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم بنگر که چگونه آنرا به نمایش گذاشته، و پا بر جای پای او بگذار، تا پله پله بسوی آسمان و رضایت الهی بالا روی..&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
در این کتاب نویسنده 42 درس از زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم در زمینه‫های مختلف اخلاقی و تربیتی گلچین نموده که راهگشای سالگان درب رسالت قرار دهد.&lt;br /&gt;
پایان نامه این سفرنامه 227 صفحه‫ای در زندگی رسول خدا صلی الله علیه وآله وسلم تصویری است شگفت انگیز از لحظات وداع با یار خدا که دلها را به لرزه درمی‫آورد و زخم جگرهای خونین را تازه می‫کند. مطالعه این کتاب خواننده را از این زندگی ماشینی برچیده، در پرتو عشق و محبت به رسول هدایت به زمان فجر رسالت و در کنار زمزمه‫های اول جبریل و رسول حق قرار می‫دهد. او همراه با آنها از غار حراء، بیرون می‫آید و در مکتب رسالت درسها و پندها و اندرزها می‫آموزد، و در نهایت در مدینه رسول خدا را وداع می‫گوید تا بار دگر به روزگار خود بازگردد.&amp;nbsp;با مطالعه این کتاب دریچه‫های بسیاری را بر روی خود باز گردانید و بر تصورات پوچ و بیهوده بسیاری خط بطلان کشید...&lt;br /&gt;
این کتاب را از بخش سیرت نبوی صلی الله علیه وآله وسلم داونلود نمایید&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1231/&quot;&gt;درسهایی از مدرسه رسول الله&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب عقيدۀ اهل بيت عليهم السلام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/314</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;برادران وخواهران مسلمان خوشحالیم که کتاب عقیدۀ اهل بیت علیهم السلام را که نوشتۀ شیخ عبد الله جوران الخضیر و ترجمۀ استاد اسحاق دبیری رحمه الله می باشد خدمت شما عزیزان معرفی نماییم و ناگفته پیداست که از جمله یاران بزرگوار پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم ، اهل بیت پاک آن سرور گرامی بودند که در رأس آنها علی -علیه السلام-، آن عالم دریاگونه و پرهیزگار و پاک، پسر عموی پیامبر -صلى الله علیه وآله وسلم-، همسر سرور زنان جهان فاطمه زهرا -رضی الله عنها- می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
همچنین نوه&amp;zwnj;های بزرگوار رسول الله -صلى الله علیه وآله وسلم- و دو ریحانه او در این دنیا و محبوبان آن، امام حسن و امام حسین -علیهما السلام- و دریای خروشان علم، مبلغ قرآن، عبدالله بن عباس -رضی الله عنهما-&amp;nbsp;می باشند که همه به تبلیغ و دعوت اسلام پرداختند.&lt;br /&gt;
پس از آنها از میان امامان اهل بیت بهترین جانشینان برای بهترین پیشینیان یعنی امام علی بن حسین سجاد -علیه السلام-، فرزندش امام محمد باقر -علیه السلام- و برادرش زید -علیه السلام- که بسیار فهمیده و دارای ذهن صاف و روشنی بود، همچنین پس از ایشان امام و پیشوای بزرگ، حسن مثنی بن حسن بن علی بن ابیطالب، امام ابی عبدالله جعفر صادق -علیه السلام- که همگان از او به نیکی یاد می&amp;zwnj;کردند و امامان دیگری که پس از آنان آمدند، همگی بر روش جدشان، پیامبر -صلى الله علیه وآله وسلم- حرکت و از سنّت او پیروی می&amp;zwnj;کردند.&lt;br /&gt;
اما چنانکه در مثل آمده است، &amp;laquo;هیچ گلی بی&amp;zwnj;خار نیست&amp;raquo;، هنگامی که گروهی از مردم دریافتند که سیره و زندگی آن بزرگواران در میان مردم همانند انتشار نور در سپیده&amp;zwnj;دم منتشر شده است، شروع به دروغ بستن بر آنان و نسبت دادن اقـوال باطل و محال - که مو را بر تـن انسان سیخ می&amp;zwnj;کند و گوش را کر می&amp;zwnj;کند - آن هم در بزرگترین ارکان دین و اموری که به ذات اقدس الهی مربوط می&amp;zwnj;شود &amp;ndash; به آن بزرگواران پرداختند.&lt;br /&gt;
در این كتاب مؤلف محترم سخنان ارزشمند ایشان را درباره توحید پروردگار و بری بودن آنها از هر عیب و نقصی که اهل بهتان بدان&amp;zwnj;ها نسبت می&amp;zwnj;دادند، ذکر می نماید كه شامل بخش های ذیل می باشد.&lt;br /&gt;
فصل اول: اهمیت توحید و انواع آن.&lt;br /&gt;
بخش اول: هدف از فرستادن پیامبران -علیهم السلام-.&lt;br /&gt;
بخش دوم: ارزش و اهمیت توحید و انواع آن.&lt;br /&gt;
فصل دوم: توحید ربوبیت.&lt;br /&gt;
بخش اول: تعریف توحید ربوبیت.&lt;br /&gt;
بخش دوم: اهمیت ایمان به قضا و قدر.&lt;br /&gt;
الف) نتایج و ثمرات ایمان به قضا و قدر.&lt;br /&gt;
ب) کسانی که در ایمان به قضا و قدر منحرف شده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
ج) داشتن صبر در برابر قضا و قدر الهی.&lt;br /&gt;
فصل سوم: توحید الوهیت.&lt;br /&gt;
بخش اول: تعریف توحید الوهیت.&lt;br /&gt;
بخش دوم: سوال و جواب دربارة توحید الوهیت.&lt;br /&gt;
بخش سوم: پرهیز از خطر شرک ورزیدن به پروردگار.&lt;br /&gt;
بخش چهارم: نمونه&amp;zwnj;هایی از وقوع شرک در میان مردم.&lt;br /&gt;
فصل چهارم: توحید اسماء و صفات.&lt;br /&gt;
بخش اول: قواعدی درباره فهمیدن و شناخت نام&amp;zwnj;های خداوند و اثبات آنها.&lt;br /&gt;
بخش دوم: قواعدی دربارة فهمیدن و شناخت صفات بلند مرتبه پروردگار.&lt;br /&gt;
بخش سوم: اصول مشترکی دربارة دلایل نام&amp;zwnj;ها و صفات پروردگار.&lt;br /&gt;
بخش چهارم: نمونه&amp;zwnj;هایی از صفات خداوند.&lt;br /&gt;
این كتاب ارزشمند را در بخش عقیده وایمان كتابخانه عقیده مطالعه نمایید.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>تاريخ حديث و ضبط و ثبت احاديث</title>
<link>http://qalamlib.com/news/313</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;اين كتاب همان گونه كه از نامش پيداست درباره تاريخ حديث نگاشته شده است. كتاب با مقدمه مؤلف آغاز مي&amp;zwnj;شود. ايشان در مقدمه، منظور از &amp;laquo;تاريخ حديث&amp;raquo; را اين گونه بيان مي&amp;zwnj;كند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;:&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;laquo;تاريخ حديث به معناي بررسي تحولات و مشاهدة فراز و نشيب&amp;zwnj;هايي است كه در ضبط احاديث در سينه&amp;zwnj;ها و ثبت آنها در صحيفه&amp;zwnj;ها و همچنين اثبات اسناد آنها به پيامبر صلي&amp;zwnj;الله عليه و سلم و جدا كردن صحيح و غيرصحيح آن استنادها به وقوع پيوسته&amp;zwnj;اند&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot;&gt;&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;مؤلف فرزانه در اين كتاب سير تكامل تدوين حديث و تنظيم كتب روايي را از زمان پيامبراسلام تا عصر حاضر مورد بررسي قرار داده است، و اين ديدگاه را كه حديث در آغاز قرن سوم تدوين شده است به كلي تكذيب مي&amp;zwnj;كند و بيان مي&amp;zwnj;دارد كه سير تكاملي ضبط و ثبت احاديث شش مرحله را طي نموده است كه عبارتند از&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;:&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;مرحلة اول: ثبت محفوظات بدون رعايت ترتيب موضوع يا راوي؛ &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;مرحلة دوم: تدوين حديث به طور موضوعي؛&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;مرحلة سوم: دورة مسندنويسي است كه محدثان در پي نام هر صحابي احاديث روايت شدة او را مي&amp;zwnj;آورند؛&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;مرحلة چهارم: صحيح&amp;zwnj;نويسي است كه محدثان فقط احاديث صحيح را در يك مجموعه جمع&amp;zwnj;آوري كرده&amp;zwnj;اند؛&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;مرحلة پنجم: دورة كتابهاي سنن است؛&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;مرحلة ششم: دورة تاليف كتاب&amp;zwnj;هايي دربارة علوم حديث و شرح&amp;zwnj;نويسي بر متون كهن است كه تا عصر حاضر تداوم دارد&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;نويسنده در اين كتاب درباره اين مراحل شش&amp;zwnj;گانه به طور جامع و مفيد سخن گفته است و براي نگارش اين كتاب زحمت فراواني متحمل شده است آن گونه كه خود مي&amp;zwnj;گويد:&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;laquo;كساني كه از كمبود منابع در كتابخانه&amp;zwnj;هاي عمدة منطقه آگاه هستند و به شيوة تأليفات تحقيقي و مستند ما نيز آشنايي دارند بخوبي مي&amp;zwnj;دانند كه در طول مدت تأليف اين كتاب چه قدر از آسايش شبانه&amp;zwnj;روزي خود كاسته&amp;zwnj;ايم تا توانسته&amp;zwnj;ايم مطالب تحقيق شده اين كتاب را از قلب كتابهاي &amp;laquo;تاريخ حديث&amp;raquo; عربي و كتابهاي تذكره و علم رجال و مؤلف&amp;zwnj;شناسي و غيره بيرون بكشيم و آن مطالب پراكنده را همراه اسناد خود به گونه&amp;zwnj;اي طبقه&amp;zwnj;بندي و تنظيم نماييم تا كتابي به نام تاريخ حديث به طور مطلوب و مستند به زبان فارسي روان در دسترس خوانندگان قرار گيرد&amp;raquo;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;الله متعال زحمات مؤلف فقيد را مورد قبول درگاه خويش قرار داده و باعث علو درجات ايشان در سراي آخرت بگرداند. همچنين مطالعة آن را براي خوانندگان سودمند كند.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;دوستان عزیز می توانند با کلیک بر روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/424/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;تاريخ حديث و ضبط و ثبت احاديث&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابخانۀ عقیده جزئی از ثروت فرهنگی ما</title>
<link>http://qalamlib.com/news/312</link>
<description>&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: #0033cc; font-size: 12pt&quot;&gt;کتابخانۀ عقیده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;: تا سالها پیش علم، عقل، منطق، دانش، برداشت، نحوه نگرشها و خلاصه باورها و تفکیر افراد جامعه در تالار زر و زور سلطان نقش زده می&amp;zwnj;شد.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;رسانه&amp;zwnj;های گروهی بوق سلاطین و فرعونها می&amp;zwnj;نواختند. و در سرزمین فارس کتاب به مزاج چماق بدستان نگاشته می&amp;zwnj;شد و حسب خواسته&amp;zwnj;های سردمداران سانسور می&amp;zwnj;گشت.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;در پژوهش مستند یکی از اندیشمندان جوان ایران دربارۀ سیرت پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم آمده:&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;در بین سالهای 1304 تا 1356 یعنی در مدت 52 سال در سرزمین فرهنگ و ادب و علم و دانش ما تنها 21 کتاب در سیرت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم به رشتۀ تألیف درآمده، و تنها 14 کتاب از زبانهای دیگر به فارسی برگردانده شده است!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;و در طی 10 سال بعد یعنی بین 1357 تا 1367 تنها 19 کتاب در رابطه با زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم و آنچه بدان تعلق می&amp;zwnj;گیرد نگاشته شد. و تعداد کتابهای ترجمه شده در این زمینه تنها 6 کتاب بوده است!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;و در طی 21 سال پس از آن (1368 تا 1389) فقط 133 کتاب در این زمینه ترجمه و تألیف شده که 77 مورد آن طی دوران 8 ساله اصلاحات (76 تا 84) بوده است!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;حال اگر نظری به موضوعات کتابها بیندازیم و بخواهیم آنها را بنا بر معیارهای علمی مورد سنجش قرار دهیم تعداد کتابهایی که می&amp;zwnj;توانند مصادر علمی مورد پذیرش کتابخانه فارسی قرار گیرند در بین کتابهای تألیف شده به فارسی از شمارش انگشتان یک دست نیز کمترند!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;سایر این کتابها که در مقایسه با کتابخانه عربی و انگلیسی و یا حتی زبانهای همسایه چون اردو و ترکی رقمی بسیار ناچیز و غیر قابل ذکر است، یا از زندگی پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم استفاده ابزاری ـ چه فکری و عقائدی و چه اقتصادی ـ کرده&amp;zwnj;اند، و یا اینکه از زاویه تنگ مذهبی بدان نگریسته تصوری بسیار دگرگون و احیانا بکلی واژگون از پیامبر بزرگوار اسلام صلی الله علیه وآله وسلم عرضه داشته&amp;zwnj;اند!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;این در حالی است که جایگاه و مکانت همسران پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و یاران و شاگردان مکتب او بکلی در کتابخانه فارسی پایمال شده است. و همچنین نویسنده آزاد و اندیشمندی که با مزاج نظام مستبد همخوانی نداشته بکلی از صحنه علم و دانش بدور رانده شده است!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;سایر موضوعات ریشه&amp;zwnj;ای و اساسی فرهنگ قرآنی و توحیدی چون؛ تفسیر کلام الله مجید، احادیث و سخنان گهربار رسول هدایت و رستگاری صلی الله علیه وآله وسلم ، فقه، عقیده، و تاریخ و غیره را اگر مورد بررسی قرار دهید وضع و حالی بهتر از سیرت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم ندارند!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;در این اوضاع پریشان علمی و چیره بودن رعب و وحشت طناب دار و سلولهای مغزکش زندان بر عقل انسان، بناگاه آسمانها شکافته شد و فضای مجازی انترنت مشت گره&amp;zwnj; کرده قدرتمند را از تسلط کامل بر عقل کوتاه نمود.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;از سال 80 تا کنون، یعنی طی تقریبا 9 سال کوشش برخی جوانان آزاد اندیش سرزمین فارس تنها در موضوع زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم که مثال آن رفت 63 کتاب، و درباره زندگی صحابه و شاگردان مکتب او 79 کتاب و در باره اهل بیت او 42 کتاب بصورت تألیف و یا ترجمه به کتابخانه فارسی اضافه شده است!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;البته این کتابهای کتابخانه مجازی عقیده از ویژگیهای خاصی برخوردارند، از آن جمله به دو نکته بسنده می&amp;zwnj;کنیم:&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: #0033cc; font-size: 12pt&quot;&gt;اولا&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;: هیچگونه سانسوری عقل نویسنده یا مترجم را در هنگام بیان واقعیتها تهدید نمی&amp;zwnj;کرده است.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: #0033cc; font-size: 12pt&quot;&gt;دوما&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;: کتابهایی زنده هستند که همواره در دسترس هر خواننده&amp;zwnj;ای می&amp;zwnj;توانند قرار گیرند، و چون کتابهای داخل کشور ایران چاپشان از سوی مراکز تفتیش عقائد در چند نسخه که در بین قفسه&amp;zwnj;های برخی کتابخانه&amp;zwnj;های دولتی یا شخصی خاک می&amp;zwnj;خورد نمی&amp;zwnj;باشند.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;گرچه کتابخانۀ عقیده تا کنون در حد توان و امکانات بسیار ابتدائی خود در پی شکستن سد سانسور نظام، و آزادی دادن به عقل پویای اندیشمند فارسی زبان بوده، بیشتر به موضوعات و کتابهایی اهمیت داده که جزء مهمی از نیاز جامعۀ ماست و دسترسی بدانها برای بیشتر افراد جامعه ناممکن بوده است. در آینده تلاش دارد دایره فعالیتش را گسترش داده، نه تنها به دیگر موضوعات کتابخانه فارسی اهمیت بدهد، بلکه به زبانهای دیگری چون عربی، اردو، ترکی، و انگلیسی در کنار رسم الخط تاجیکی نیز کتابهای فارسی را ترجمه کند تا سایر ملتها بتوانند از خلاقیتهای جامعه فارسی زبان بهره گیرند و با نحوه رشد فرهنگی و علمی منطقه ما آشنا گردند.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;کتابخانۀ عقیده در تلاش است ـ به یاری و توفیق حق تعالی ـ طی سالهای آینده بزرگترین کتابخانه مجازی فارسی را برای همه دانش دوستان و عاشقان علم و معرفت و تشنگان کتاب؛ این یار مهربان، بصورت رایگان فراهم سازد. و از علما و اندیشمندان و نویسندگان گرامی هم&amp;nbsp;می خواهیم که در پربار شدن این کتابخانه دست در دست ما نهند.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;در اینجا جا دارد که از همکاران عزیزمان در کتابخانۀ عقیده که شبانه روز با جدیت و پشتکار زحمت می کشند و اجر و پاداش خود را از بارگاه پروردگار متعال می خواهند و همۀ&amp;nbsp;برادران و خواهرانی که با ارسال کتب و پیامهای محبت آمیز خویش ما را در این راستا تشویق نموده اند اظهار سپاس و قدردانی نموده و از بارگاه الله متعال برای همه سعادت دنیا و آخرت را استدعا می نماییم.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-size: 12pt&quot;&gt;ادارۀ کتابخانۀ عقیده&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>خودشناسی در فرخنده میلاد با سعادت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/310</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتابخانه عقیده: فرهنگ از هم گسیخته و حیران جهان غرب مجبور شده برای حفظ آخرین نفسهای معانی اخلاقی و انسانی، نمادهایی چون؛ عید یا روز مادر، روز کارگر، روز معلم و روز پرستار وغیره را در جامعه‫های خود رواج دهد. این جامعه‫های ماشینی و ماده پرستی که از مادر و جایگاه و احترام او و مکانت و اهمیت کارگر و قیمت پرستا بکلی بیگانه‫اند در یک روز سعی می‫کنند این مفاهیم والا را با تکلف بخورد نسلهای نوینی که از عاطفه و درک این معانی اخلاقی نا آشنایند، بدهند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در یک روز از سال جوانان به خانه‫های سالمندان می‫روند و پس از چند ساعت پرس و جو و اینسو و آنسو پالیدن مادر پیر و درافتاده‫یشان را که چون کاغذ مچاله شده در گوشه‫ای از اتاقی افتاده را پیدا می‫کنند و یک شاخه گل در دستش می‫گذارند، و دوباره به آغوش زندگی ماشینی بدور از عاطفه و احساسات و انسانیت خویش بازگشته تا سالی دیگر و شاخه گلی دیگر.. این حکایت در روزهای پرستار و معلم و کارگر نیز بدون سر و صدا سرد و بی‫روح تکرار می‫گردد!&lt;br /&gt;
این عادت و رسومی که در آن جامعه‫ها باید بسیار بدان ارج نهاد. در جامعه‫های پر عاطفه و احساس اسلامی که بر مبنای اخلاق و انسانیت بنا شده رمزی است از اهانت و تحقیر به جایگاه این مهره‫های ساختاری خانواده و جامعه. در جامعه‫های اسلامی همه‫ی سال روز مادر و روز پرستار و معلم و خدمتگذاران جامعه است. مسلمانان همیشه‫ی سال این زحمتکشان را ارج می‫نهند و قدر و منزلتشان را گرامی می‫دارند و از اینکه آنها را در چارچوب یک روز تنگ زندانی کنند شرم می‫ورزند.&lt;br /&gt;
جامعه‫ی اسلامی در تاریخ خود ( نه در زندگی پرفروغ حضرت رسول الله ـ صلی الله علیه وآله وسلم ـ و نه در زمان صحابه و دوستداران و اهل بیت آن مقام شرف، و نه در طول بیش از 500 سال پس از رحلت آن پیک آسمان ) روزی بنام &amp;quot;روز میلاد رسول اکرم &amp;quot; هرگز نمی‫شناخت.&lt;br /&gt;
رسول الله همواره در اذهان مسلمانان، و در اذان، نماز، عبادات، معاملات، اخلاق و گفتار آنها حضور داشت. و مکانت و مقام او همواره در قله‫های برافراشته‫ی شموخ و عز در قلبهای مسلمانان جای داشت.&lt;br /&gt;
در قرن ششم هجری/ در بین سالهای 909 تا 1171 میلادی گروهی از شیعیان اسماعیلیه که ادعا می‫کردند نسبشان از اسماعیل فرزند جعفر صادق به حضرت فاطمه زهراء می‫رسد و خود را فاطمیان می‫نامیدند بر کشورهایی چون؛ تونس، مصر و سرزمینهای شام، و همچنین بصورت پراکنده بر لیبی، جزائر، مراکش و بر مناطقی از شبه جزیره‫ی عرب، صقلیه ـ در اسپانیا یا اندلس ـ و شمال سودان حکومت کردند.&lt;br /&gt;
فاطمیان چون شیعیان اثنا عشری یا جعفری و سایر فرقه‫های شیعه حزبی سیاسی بودند که از مذهب به عنوان روپوشی بر فعالیتهای سیاسی و رسیدن به هدفهای مادی و جاه و سلطان استفاده کردند.&lt;br /&gt;
وچون دریافته بودند با ایجاد تغییر و تحولاتی در سیستم عبادی اسلام پیروان خود را می‫توانند از جامعه‫ی بزرگ اسلامی جدا ساخته به آنها شخصیتی مستقل و جدا از جمهور مسلمانان تزریق کنند و بدینوسیله آنها را چون مهره‫هایی همیشه تابع فرمان خود داشته باشند، بدعتها و طقوس و عادات و رسوم عبادی جدیدی به جامعه‫ی روز خود تزریق کردند.&lt;br /&gt;
عید میلاد رسول اکرم (صلی الله علیه و سلم) از جمله بدعتهایی است که فاطمیان شیعه در جامعه‫ی اسلامی به یادگار گذاشته‫اند.&lt;br /&gt;
گر چه برگذاری این مراسم و تصویر عبادی دادن به آنها اتهامی است ننگین به فرموده‫ی الله متعال در آیه3 سوره مبارکه/ مائده &amp;laquo;الْیَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِینَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَیْكُمْ نِعْمَتِی وَرَضِیتُ لَكُمُ الإِسْلاَمَ دِیناً&amp;raquo; {امروز ( احكام ) دین شما را برایتان كامل كردم و ( با عزّت بخشیدن به شما و استوار داشتن گامهایتان ) نعمت خود را بر شما تكمیل نمودم و اسلام را به عنوان آئین خداپسند برای شما برگزیدم.}&lt;br /&gt;
که در آن الله متعال دین اسلام را کامل شمرده، هر گونه اضافه سازی بر آن را مردود شمرده است. و پیامبر الله (صلی الله علیه وآله وسلم) صراحتا اعلام داشته که &amp;laquo; من أحدث فی أمرنا هذا ما لیس منه فهو رد&amp;raquo; ـ هر کسی چیزی نوین در این دین ما بیاورد مردود است ـ و &amp;laquo; کل محدثة بدعة و کل بدعة ضلالة، و کل ضلالة فی النار&amp;raquo; ـ هر نوین سازی و نوآوری بدعت است، و هر بدعتی گمراهی، و هر گمراهی در آتش سوزان جهنم ـ.&lt;br /&gt;
فاطمیان با این نوآوریها اهدافی بسیار عمیق در نظر داشتند.&lt;br /&gt;
اولا: آنها با ایجاد این روز خواستند پیامبر الله (صلی الله علیه وآله وسلم) و احترام و جایگاه او را در یک روز زندانی کنند و جامعه را بتدریج از رسول اکرم و هدایات و فرامین و دستورات آن مقام هدایت دور سازند.&lt;br /&gt;
ثانیا: با اجرای طقوس و مراسم خاص در این روز نوعی روح چاپلوسی در بین مسلمانان رواج دهند تا رابطه‫یشان با رسول اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) از اطاعت و فرمانبرداری او به نوعی عواطف و احساسات چاپلوسانه خلاصه شود. بنام او حلوا تقسیم کرده، نذریه دهند و درحق او شعرها و مدحهای چاپلوسانه سروده مقام و منزلت او را به گمان خود بالا ببرند، و به او صفات الهی داده در ردیف پروردگار متعال قرارش دهند. و با غروب آفتاب آنروز دفترش را بسته در طاقچه‫ی اتاقشان بگذارند، و تا سالی دیگر و مراسمی دیگر، نه رسولی در زندگیشان باشد و نه اطاعت و فرمانبرداری از او...&lt;br /&gt;
البته همانگونه که امام حافظ ابن کثیر فاطمیان را وصف نموده، آنها از بدجنسترین انسانهای روی زمین بودند!&lt;br /&gt;
این انسانهای مکار و حیله‫گر و بدطینت و پست‫، روز عید و شادمانی و جشن برای مولد رسول اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) را دوازدهم ربیع الأول که روز وفات آن حضرت است قرار دادند!!&lt;br /&gt;
تاریخ از آنجا که علم غیب ندارد، و بزرگی بزرگان را پس از رشد و کمال آنها درمی‫یابد، نه همراه با میلادشان، غالبا روز ولادت بزرگان را بدرستی نمی‫داند. رسول اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) نیز از این قاعده مستثنی نبود. به همین دلیل کسی به درستی نمی‫تواند تعیین کند که روز ولادت آن حضرت دقیقا چه روزی بوده است. برخی دوم و برخی هشتم و برخی دهم و بعضی دوازدهم ربیع الأول عام الفیل ـ سال حمله‫ی ابرهه با فیلهایش به کعبه ـ را روز ولادت آن حضرت شمرده‫اند. آنچه از خود آن حضرت ثابت است ایشان در روز دوشنبه‫ای به دنیا آمده‫اند. و برخی از دانشمندان اسلامی چون محمد سلیمان المنصور فوری در کتابش &amp;laquo;رحمة للعالمین&amp;raquo;، و پژوهشگر و فلک شناس نامدار محمود پاشا پس از تحقیق و بررسی به این نتیجه رسیده‫اند که آن حضرت در 9/ربیع الأول موافق با 20 یا 22/ آپریل/571 میلادی به دنیا آمده است.&lt;br /&gt;
اما تاریخ ثابت و دقیق وفات آن حضرت 12/ ربیع الأول/ سال یازدهم هجری است.&lt;br /&gt;
و فاطمیان بدجنس و کینه‫توز و حقود روز وفات آن حضرت را روز جشن و شادی قرار داده‫اند، و آن را روز میلاد آن حضرت برشمرده‫اند!!!...&lt;br /&gt;
و صد افسوس که بسیاری از مسلمانان جاهل هنوز این حقیقت تلخ را درک نکرده، به ساز آن بدعت فروشان و مذهب سازان بد طینت می‫رقصند!..&lt;br /&gt;
آری! جای دارد نه تنها مسلمانان بلکه تمامی بشریت در طول تاریخ خود همه‫ی سال را به پاس حضرت محمد آخرین پیک آسمان ( سلام و درود الله و فرشتگان و انسانها بر او بادا) گرامی دارند، و با زنده نگه داشتن فرخنده میلاد باشکوه او، او را والاترین اسوه و نمونه‫ی حیات در زندگیشان قرار دهند.&lt;br /&gt;
او در حقیقت نمونه‫ای عملی و اجرائی از احکام اسلام بود، قرآنی که با دو پا در بین انسانها قدم می‫زد.&lt;br /&gt;
او رحمتی بود برای جهان و جهانیان. و باید با زنده نگه داشتن یاد او خود را به اخلاق و رفتار او زینت و زیبائی بخشیم.&lt;br /&gt;
شایسته است در این روزگاری که بشریت از کالبد انسانیت خود بیرون خزیده، با تازه کردن یاد رسول اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) عقلها را زنده، وجدانها را بیدار و قلبها را تکان داد تا دریابند پیام محمد؛ بزرگمرد تاریخ بشریت را.&lt;br /&gt;
و با زنده نمودن نام او، رسالت و پیام او را به مسلمانان تذکر داد، و به آنها آموخت که باید چون رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) باشند.&lt;br /&gt;
&amp;laquo; لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِی رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ یَرْجُو اللَّهَ وَالْیَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِیراً &amp;raquo;&lt;br /&gt;
{ سرمشق و الگوی زیبائی در ( شیوه پندار و گفتار و كردار ) پیغمبر الله برای شما است . برای كسانی كه ( دارای سه ویژگی باشند : ) امید به الله داشته ، و جویای قیامت باشند ، و الله را بسیار یاد كنند&amp;rlm;}. (سوره مبارکه احزاب/21)&lt;br /&gt;
و با یادآوری آنها به مقام و منزلت انسانی رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) مسلمانان را بسوی وحدت اسلامی و هم‫پیمانی و برادری در برابر موجهای هولناک و وحشی صهیونیستها و انسانهای حیوان صفت و خونخوار غرب سوق داد.&lt;br /&gt;
و چه شرم آور است که در بسیاری از کشورهایی که خود را با کمال بی‫شرمی به ( نماد انسانیت و اخلاق و رحمت و شفقت و مهر پدری بشریت؛ حضرت رسول اکرم محمد نسبت می‫دهند، جلادان ددمنش و درنده حیوان صفت از ریختن خون مظلوم و به دار آویختن بیگناه و به زندان انداختن ستمدیده و در زیر شلاقهای شکنجه و عذاب انداختن مردم بیچاره هیچ ابائی نمی‫ورزند.&lt;br /&gt;
آیا این اهانت به رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) نیست؟!&lt;br /&gt;
و چه شرم آور و ننگین است که در بسیاری از کشورهایی که خود را به آن مقام والای عصمت و طهارت (صلی الله علیه وآله وسلم)، و یا اهل بیت او نسبت می‫دهند از آزادی و عدالت اجتماعی و برابری و برادری هیچ خبر و اثری نیست!&lt;br /&gt;
آیا این اهانت به مقام والای آن حضرت و تعالیم دین مبین اسلام نیست؟!&lt;br /&gt;
و چه شرم آور و ننگین است که در بسیاری از کشورهایی که خود را مسلمان می‫نامند، کسانی که خود را پارسا و زاهد و پرهیزگار، و نمایندگان بر حق دین می‫خوانند برای رسیدن به جاه و مقام و کرسی و ریاستی چند روزه، خونهای گلگون فرزندان ملت را به زمین می‫ریزند، در حالیکه نزد الله ارزش خون و جان یک مسلمان از خانه‫ی کعبه با ارزشتر است!&lt;br /&gt;
آیا لازم است میلاد رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم را جشن بگیریم؟&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی دو کتاب در مورد ازدواج مؤقت یا صیغه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/309</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
كتابخانه عقیده: مسئله نكاح و ازدواج موقت یكی از مسائل پر ماجرا و مباحث بسیار جنجالی است كه امروزه پیرامون آن به گفتگو مباحثه می&amp;zwnj;پردازند كه پس از به كار آمدن روحانیت- در كشور ایران- هزاران کتاب و رساله دربارۀ عقاید تشیع به رشته&amp;zwnj;ی تحریر در آمده است- چگونه آنان این كارها را رایج نگردانند در حالی كه آنان صاحب&amp;zwnj;نظران و به اصطلاح روشنفكران و حامیان مذهب تشیع هستند- آنان در این كتابها و رساله&amp;zwnj;ها به صراحت و با بی&amp;zwnj;حیایی كامل به زنا و فحشا و منكرات دعوت می&amp;zwnj;دهند و آن را جنبۀ شرعی داده&amp;zwnj;اند و به نام نكاح متعه و موقت نامگذاری كرده&amp;zwnj;اند كه دربارۀ فضایل و ثواب آن نیز احادیث جعلی بسیاری را به ائمه و پیامبر اكرم&amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;نسبت می&amp;zwnj;دهند اعاذنا الله منه- اینان برای توجیه جوانان و مادران مسلمانان دلایلی همچون:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;1&amp;raquo; نكاح موقت جزء ضروریات دینی است.&lt;br /&gt;
&amp;laquo;2&amp;raquo; راهی به سوی نكاح دائمی و همیشگی است و . . . چنگ می&amp;zwnj;زنند، و چنان زیاده&amp;zwnj;روی نموده&amp;zwnj;اند كه حرمت آن را به خلیفه دوم مسلمانان امیرالمومنین حضرت عمر بن خطاب رضی الله عنه نسبت داده و او را مورد طعن و نفرین خود قرار می دهند.&lt;br /&gt;
برادر و خواهر عزیزم و بزرگوارم جناب محمد مال الله مولف این كتاب افترائات و تهمت&amp;zwnj;های آن را كاملاً در كتاب بیان نموده و سپس به پاسخ شبهات و پرسش&amp;zwnj;های آنان نیز پرداخته است وی به پاسخ دلایل بسیار مسخره و بچه&amp;zwnj;گانه خمینی كه در كتاب كشف الاسرار آن را درج كرده است نیز پرداخته است، دیدگاه حضرت عمر بن خطاب رضی الله عنه همان دیدگاه و نظریه پیامبر اكرم صلى الله علیه وآله وسلم است كه آن را بنا به روایات و مسانید صحیح و درست اهل سنت و تشیع- در سال خیبر بیان نموده&amp;zwnj;اند، سپس وی افترائات و بهتان&amp;zwnj;های تشیع بر بعضی از صحابه از قبیل عبدالله بن عباس، عبدالله بن عمر و پدران این دو بزرگوار را نقل و به نقد و بررسی آن می&amp;zwnj;پردازد و در باب سوم تحریف صریح و آشكار تشیع پیرامون توضیح و تفسیر آیه: (فَمَا اسْتَمْتَعْتُمْ بِهِ مِنْهُنَّ فَآَتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِیضَةً) (النساء: ٢٤). می&amp;zwnj;پردازد، كسی كه مباحث این كتاب را آن بابی را كه در آن به پیامدهای ننگین و شوم نكاح موقت اشاره نموده است مطالعه نماید. و هر برادر و خواهر شیعی را به خواندن این كتاب تشویق و ترغیب نماید و پس از خواندن آن مطالب و بدون هیچ&amp;zwnj;گونه تعصب مذهبی از خود بپرسد آیا خود او برای عمل نكاح موقت راضی می&amp;zwnj;شود و آیا آن را برای خواهر، دختر و خویشاوندان نزدیک خود جایز و تقرب الهی می&amp;zwnj;داند؟.....&lt;br /&gt;
برای داونلود کتاب بر روی اسم آن کلیک نمایید:&lt;br /&gt;
ازدواج موقت - صیغه - و پیامدهای آن&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;كتاب دوم:&lt;br /&gt;
شیعه&amp;zwnj;ها قانونی دارند بنام ازدواج موقت، در میان ملل عالم تنها آنها&amp;zwnj; هستند که تحت نام دین، ازدواجی شبیه به زنا را حلال می&amp;zwnj;دانند و نه فقط حلال، بلکه که کاری ثواب می&amp;zwnj;دانند!&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;تو گویی سازندگان این مذهب قصد مسخره کردن اسلام را داشته&amp;zwnj;اند .&lt;br /&gt;
خوب، اینها نشانه سیاهی دل و حقد بی&amp;zwnj;پایان است.&lt;br /&gt;
به هر حال، شیعه&amp;zwnj;های ساده لوح و بیخبر گمان می&amp;zwnj;کنند قانون ازدواج موقت هم در قرآن است هم در کتاب سنی&amp;zwnj;ها!!.&lt;br /&gt;
فصل اول کتاب با آیه&amp;zwnj;ای که آنها گمان می&amp;zwnj;کنند در باره متعه است شروع شده و نویسنده 13 رد بر آنها نوشتیه است.&lt;br /&gt;
در فصل دوم کتاب تضاد متعه را با قوانین قرآن نشان داده است.&lt;br /&gt;
در فصل سوم ثابت کرده که بر خلاف ادعای شیعه در کتب اهل سنت متعه حرام قطعی دانسته شده است&lt;br /&gt;
در فصل 4 دلایل عقلی در رد متعه&lt;br /&gt;
در فصل 5 ضرر آن را برای کودکان و زنان &amp;nbsp;&lt;br /&gt;
و در فصل آخر دفاعیات شیعه&amp;zwnj;ها را جواب داده است.&lt;br /&gt;
برای داونلود کتاب بر روی اسم آن کلیک نمایید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1212/&quot;&gt;پنجاه و هشت اعتراض به قانون ازدواج&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب امامت در پرتو کتاب و سنت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/308</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; text-align: justify;&quot;&gt;کتابخانۀ عقیده: شیعیان&amp;zwnj; معتقدند الله جل جلاله تصریح&amp;zwnj; به&amp;zwnj; امامت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; رضی الله عنه و فرزندان&amp;zwnj; او كرده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و علی&amp;zwnj; شایسته&amp;zwnj;تر و اولی&amp;zwnj;تر از دیگران&amp;zwnj; به&amp;zwnj; جانشینی&amp;zwnj; پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم بوده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;، و می&amp;zwnj;گویند ابوبكر و عمر و عثمان&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj; الله عنهم&amp;zwnj; به&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; و فرزندانش&amp;zwnj; ظلم&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; و حق&amp;zwnj;خلافتشان&amp;zwnj; را غصب&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj;اند، و اضافه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كنند هر كس&amp;zwnj; معتقد به&amp;zwnj; صحت&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; ابوبكر و عمر و عثمان&amp;zwnj; باشد، فاسق&amp;zwnj; بلكه&amp;zwnj;كافر است&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
مجلسی&amp;zwnj; در بحار الانوار ج&amp;zwnj;23 ص&amp;zwnj;390 می&amp;zwnj;نویسد: شیعه&amp;zwnj; بر این&amp;zwnj; اصل&amp;zwnj; متفقند كه&amp;zwnj; هر كس&amp;zwnj; امامت&amp;zwnj; یكی&amp;zwnj; از ائمه&amp;zwnj; و اطاعت&amp;zwnj; ازآنها را كه&amp;zwnj; خداوند فرض&amp;zwnj; دانسته&amp;zwnj; است&amp;zwnj; انكار كند، كافر و همیشه&amp;zwnj; در جهنم&amp;zwnj; خواهد بود. كلینی&amp;zwnj; نیز می&amp;zwnj;نویسد: نافرمانی&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;كفر و اعتقاد به&amp;zwnj; برتری&amp;zwnj; كس&amp;zwnj; دیگری&amp;zwnj; جز او شرك&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. (الكافی&amp;zwnj;، الحجه&amp;zwnj;،45و52)&lt;br /&gt;
در تفسیر نور الثقلین&amp;zwnj; ج&amp;zwnj;1 ص&amp;zwnj;654 آمده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;: آیاتی&amp;zwnj; در قرآن&amp;zwnj; تصریح&amp;zwnj; به&amp;zwnj; امامت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj;اند اما این&amp;zwnj; آیات&amp;zwnj; را از قرآن&amp;zwnj; حذف&amp;zwnj;كرده&amp;zwnj;اند. اما این&amp;zwnj; آیات&amp;zwnj; را از قرآن&amp;zwnj; حذف&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj;اند. مانند: &amp;laquo;یا ایها الرسول&amp;zwnj; بلغ&amp;zwnj; ما انزل&amp;zwnj; الیك&amp;zwnj; من&amp;zwnj; ربك&amp;zwnj; فی&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; و ان&amp;zwnj; لم&amp;zwnj;تفعل&amp;zwnj; فما بلغت&amp;zwnj; رسالته&amp;zwnj;&amp;laquo;.&lt;br /&gt;
&amp;quot;خمینی&amp;quot;&amp;zwnj; دركتاب&amp;zwnj; حكومت&amp;zwnj; اسلامی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;نویسد: ما معتقدیم&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; پیامبر صلی الله علیه وآله&amp;nbsp;باید جانشین&amp;zwnj; خود را معین&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كرد و این&amp;zwnj; كار را هم&amp;zwnj; كرد واگر این&amp;zwnj; كار را نمی&amp;zwnj;كرد، رسالت&amp;zwnj; خود را ابلاغ&amp;zwnj; نكرده&amp;zwnj; بود (حكومت&amp;zwnj; اسلامی&amp;zwnj; ص&amp;zwnj;20)&lt;br /&gt;
اعتقاد به&amp;zwnj; وجود نصی&amp;zwnj; در قرآن&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; در آن&amp;zwnj; به&amp;zwnj; امامت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; و فرزندانش&amp;zwnj; تصریح&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; باشد، تناقضات&amp;zwnj; و ایرادات&amp;zwnj; ساختاری&amp;zwnj;مهمی&amp;zwnj; را بوجود خواهد آورد.&lt;br /&gt;
اولین&amp;zwnj; تناقض&amp;zwnj;: آنچه&amp;zwnj; مسلمین&amp;zwnj; در امر خلافت&amp;zwnj; بعد از رحلت&amp;zwnj; پیامبر اكرم&amp;zwnj; صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;انجام&amp;zwnj; دادند بر اساس&amp;zwnj; شوری&amp;zwnj; و مشورت&amp;zwnj; بوده&amp;zwnj;است&amp;zwnj;. چنانكه&amp;zwnj; الله متعال می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;و امرهم&amp;zwnj; شوری&amp;zwnj; بینهم&amp;zwnj;- در امورتان&amp;zwnj; با یكدیگر مشورت&amp;zwnj; كنید&amp;raquo; سوره&amp;zwnj; شوری&amp;zwnj; آیه&amp;zwnj;38.&lt;br /&gt;
واضح&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; هم&amp;zwnj; از امور مسلمین&amp;zwnj;، بلكه&amp;zwnj; از مهمترین&amp;zwnj; آنهاست&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
دومین&amp;zwnj; تناقض&amp;zwnj;: در نهج&amp;zwnj; البلاغه&amp;zwnj; آمده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;می فرماید: قومی&amp;zwnj; بامن&amp;zwnj; بیعت&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj;اند بر آنچه&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; با ابوبكر و عمر بیعت&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; بودند، پس&amp;zwnj; نه&amp;zwnj; شخصی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; حاضر است&amp;zwnj; می&amp;zwnj;تواند به&amp;zwnj; رأی&amp;zwnj; خود برگزیند و نه&amp;zwnj; شخصی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; غایب&amp;zwnj; است&amp;zwnj; می&amp;zwnj;تواند رأی&amp;zwnj; مردم&amp;zwnj; را رد كند. شورا&amp;zwnj; از آن&amp;zwnj; مهاجرین&amp;zwnj; و انصار است&amp;zwnj; و هرگاه&amp;zwnj; بر امامت&amp;zwnj; فردی&amp;zwnj; اتفاق كردند، آن&amp;zwnj; موجب&amp;zwnj; رضایت&amp;zwnj; الله خواهد بود و از آن&amp;zwnj; خشنود خواهد شد. &amp;nbsp;از این&amp;zwnj; روایت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;توان&amp;zwnj; پی&amp;zwnj; برد كه&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; رضی الله عنه معتقد بوده&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; ابوبكر و عمر و عثمان&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj; الله تعالی&amp;zwnj; عنهم&amp;zwnj; مطابق&amp;zwnj; موازین&amp;zwnj; شرعی&amp;zwnj; و بر اساس&amp;zwnj; مشورت&amp;zwnj; و رضایت&amp;zwnj; مردم&amp;zwnj;بوده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;.. (نهج&amp;zwnj;البلاغه&amp;zwnj; نامه 6)&lt;br /&gt;
سومین&amp;zwnj; تناقض&amp;zwnj;: سنی&amp;zwnj; و شیعه&amp;zwnj; متفق&amp;zwnj; القولند كه&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;با خلفای&amp;zwnj; سه&amp;zwnj; گانه&amp;zwnj; بیعت&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. گرچه&amp;zwnj; برخی&amp;zwnj; ازبزرگان&amp;zwnj; شیعه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گویند علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;ابتدا اعتراض&amp;zwnj; نمود، اما اعتراف&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كنند كه&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;پس&amp;zwnj; از خلافت&amp;zwnj; را پذیرفت&amp;zwnj; و با ایشان&amp;zwnj; بیعت&amp;zwnj; نمود.&lt;br /&gt;
بنابراین&amp;zwnj; بیعت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;اعتراف&amp;zwnj; به&amp;zwnj; مشروعیت&amp;zwnj; و صحت&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; آنها و حجتی&amp;zwnj; بر شیعیان&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. مجلسی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; حكم&amp;zwnj; به &amp;zwnj;تكفیر كسی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كند كه&amp;zwnj; معتقد به&amp;zwnj; شرعی&amp;zwnj; بودن&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; ابوكر و عمر و عثمان&amp;zwnj; باشد، نسبت&amp;zwnj; به&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; با آنها بیعت&amp;zwnj;كرده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; چه&amp;zwnj; حكمی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كند؟&lt;br /&gt;
كاشف&amp;zwnj; الغطاء در كتاب&amp;zwnj; اصل&amp;zwnj; الشیعه&amp;zwnj; و اصولها ص&amp;zwnj;91 می&amp;zwnj;نویسد: علی&amp;zwnj; چون&amp;zwnj; دید كه&amp;zwnj; ابوبكر و عمر نهایت&amp;zwnj; سعی&amp;zwnj; خود را معطوف&amp;zwnj; اعتلا و نشر كلمه&amp;zwnj; توحید، تجهیزات&amp;zwnj; ارتش&amp;zwnj; و گسترش&amp;zwnj; فتوحات&amp;zwnj; اسلامی&amp;zwnj; نموده&amp;zwnj;اند و در جهت&amp;zwnj; رفع&amp;zwnj; ظلم&amp;zwnj; و ستم&amp;zwnj; وتبعیضها كوشش&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كنند، با آنان صلح و بیعت كرد.&lt;br /&gt;
گفته های كاشف الغطاء مغایر گفته های تیجانی است, آنجا كه می گوید: آنها (ابوبكر و عمر) در جهاد سستی كرده و به دنیا گرایش پیدا كردند.&lt;br /&gt;
آخوندهای&amp;zwnj; شیعه&amp;zwnj; برای&amp;zwnj; توجیه&amp;zwnj; بیعت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;با خلفای&amp;zwnj; سه&amp;zwnj; گانه&amp;zwnj; دو دلیل&amp;zwnj; می&amp;zwnj;آورند.&lt;br /&gt;
اول&amp;zwnj; اینكه&amp;zwnj;: بیعت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;بخاطر اسلام&amp;zwnj; و هراس&amp;zwnj; از، از بین&amp;zwnj; رفتن&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; بوده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. در رد این&amp;zwnj; توجیه&amp;zwnj; همین&amp;zwnj; بس&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; بگوئیم &amp;zwnj;دوران&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; ابوبكر و عمر و عثمان&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj; الله عنهم&amp;zwnj; عصر طلایی&amp;zwnj; اسلامی&amp;zwnj; بوده&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; اسلامی&amp;zwnj; از شرق تا بخارا و ازغرب&amp;zwnj; تا شمال&amp;zwnj; افریقا گسترش&amp;zwnj; پیدا كرد.&lt;br /&gt;
دوم&amp;zwnj; اینكه&amp;zwnj;: بیعت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;تقیه&amp;zwnj; بوده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. &amp;laquo;و به&amp;zwnj; عبارتی&amp;zwnj; دیگر عذر بدتر از گناه&amp;zwnj;&amp;laquo; یعنی&amp;zwnj; اینكه&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;به&amp;zwnj; ظاهر بیعت&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و در واقع&amp;zwnj; از بیعت&amp;zwnj; با آنها ناخشنود بوده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. این&amp;zwnj; دلیل&amp;zwnj; از دلیل&amp;zwnj; اول&amp;zwnj; بی&amp;zwnj; اساس&amp;zwnj;تر است&amp;zwnj;، چرا كه&amp;zwnj; از علی&amp;zwnj; رضی الله عنه چهره&amp;zwnj;ای&amp;zwnj; سازشكار و فریبنده&amp;zwnj; و ترسو ترسیم&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كند كه&amp;zwnj; آنچه&amp;zwnj; را كه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گوید و می&amp;zwnj;كند بر خلاف&amp;zwnj; تمایل&amp;zwnj; باطنی&amp;zwnj; اش&amp;zwnj; می&amp;zwnj;باشد. و براستی&amp;zwnj; آیا علی&amp;zwnj; چنین&amp;zwnj; شخصیتی&amp;zwnj; داشت&amp;zwnj;؟ و مگر نه&amp;zwnj; این&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; شجاعت&amp;zwnj; و حق&amp;zwnj; طلبی&amp;zwnj; آنحضرت&amp;zwnj; زبانزد شیعه&amp;zwnj; و سنی&amp;zwnj;می&amp;zwnj;باشد؟ در نهج&amp;zwnj; البلاغه&amp;zwnj; از علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه روایت&amp;zwnj; شده&amp;zwnj; كه&amp;zwnj;: من&amp;zwnj; از آن&amp;zwnj; گروهی&amp;zwnj; هستم&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; ملامت&amp;zwnj; هیچ&amp;zwnj; ملامتگری&amp;zwnj; آنها را از راه &amp;zwnj;الله باز نمی &amp;zwnj;دارد. (ص&amp;zwnj;195)&lt;br /&gt;
پذیرش&amp;zwnj; اینكه&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; رضی الله عنه تقیه&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; باشد، در حالیكه&amp;zwnj; ایشان&amp;zwnj; وزیر و قاضی&amp;zwnj; خلفای&amp;zwnj; سه&amp;zwnj; گانه&amp;zwnj; بوده&amp;zwnj;اند، دشوار است&amp;zwnj;. كمااینكه&amp;zwnj; دشوار است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; بپذیریم&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; دخترش&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; نكاح&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; عمر رضی الله عنه در آورد و سه&amp;zwnj; نفر از فرزندانش&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; نام&amp;zwnj; خلفای&amp;zwnj; سه&amp;zwnj;گانه&amp;zwnj; نامگذاری&amp;zwnj; كرد و این&amp;zwnj; همه&amp;zwnj; را در حال&amp;zwnj; تقیه&amp;zwnj; انجام&amp;zwnj; داده&amp;zwnj; باشد. اهل&amp;zwnj; سنت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گویند نسبت&amp;zwnj; دادن&amp;zwnj; تقیه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; شجاع&amp;zwnj;ترین&amp;zwnj; فردروی&amp;zwnj; زمین&amp;zwnj; طعنه&amp;zwnj; و ریشخندی&amp;zwnj; به&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیت&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و می&amp;zwnj;پرسند آیا شایسته&amp;zwnj; است&amp;zwnj; شیعیان&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; مدعی&amp;zwnj; دوستی&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;&amp;nbsp;رضی الله عنه هستند چنین&amp;zwnj; نسبتهایی&amp;zwnj; به&amp;zwnj; ایشان&amp;zwnj; بدهند كه&amp;zwnj; حتی&amp;zwnj; درشان&amp;zwnj; یك&amp;zwnj; آدم&amp;zwnj; معمولی&amp;zwnj; هم&amp;zwnj; نیست&amp;zwnj;!؟&lt;br /&gt;
در نهج&amp;zwnj; البلاغه&amp;zwnj; روایت&amp;zwnj; شده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; علی&amp;zwnj;رضی الله عنه پیشنهاد خلافت&amp;zwnj; را رد كرد و گفت&amp;zwnj;: مرا رها كنید و كسی&amp;zwnj; دیگر را بجوئید،من&amp;zwnj; اگر وزیرتان&amp;zwnj; باشم&amp;zwnj; برایتان&amp;zwnj; بهتر از آن&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; امیرتان&amp;zwnj; باشم&amp;zwnj;. (ص&amp;zwnj;182ـ181-خطبه92) و در صفحه&amp;zwnj; 322 نهج&amp;zwnj; البلاغه&amp;zwnj; اضافه&amp;zwnj; شده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; بعد از كشته&amp;zwnj; شدن&amp;zwnj; حضرت&amp;zwnj; عثمان&amp;zwnj; هنگامیكه&amp;zwnj; مردم&amp;zwnj; با علی&amp;zwnj; بیعت&amp;zwnj; كردند، ایشان&amp;zwnj; گفتند: به&amp;zwnj; خدا قسم&amp;zwnj; من&amp;zwnj; نه&amp;zwnj;علاقه&amp;zwnj;ای&amp;zwnj; به&amp;zwnj; خلافت&amp;zwnj; داشتم&amp;zwnj; و نه&amp;zwnj; آرزوی&amp;zwnj; ولایت&amp;zwnj;، اما شما مرا به&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; دعوت&amp;zwnj; دادید و مرا بر آن&amp;zwnj; گماشتید.&lt;br /&gt;
از این&amp;zwnj; دو روایت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;توان&amp;zwnj; دریافت&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; علی رضی الله عنه معتقد به&amp;zwnj; وجود آیه&amp;zwnj;ای&amp;zwnj; در مورد امامت&amp;zwnj; نبوده&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و اگر چنین&amp;zwnj; می&amp;zwnj;بودنمی&amp;zwnj;گفت&amp;zwnj; مرا رها كنید و كسی&amp;zwnj; دیگر را بجوئید. چرا كه&amp;zwnj; در این&amp;zwnj; صورت&amp;zwnj; از دستور الله متعال سرپیچی&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; بود. (به&amp;zwnj; فرض&amp;zwnj;اینكه&amp;zwnj; بپذیریم&amp;zwnj; قرآن&amp;zwnj; به&amp;zwnj; امات&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; تصریح&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; باشد.)&lt;br /&gt;
زیرا الله متعال می فرماید:&lt;br /&gt;
{وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَنْ یَكُونَ لَهُمُ الْخِیَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ وَمَنْ یَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُبِینًا } [الأحزاب: 36]&lt;br /&gt;
&amp;laquo;سزاوار هیچ مرد و زن مؤمنی نیست که چون الله و پیامبرش به کاری حکم دهند، برای آنها در کارشان اختیاری باشد. و هرکس از الله و پیامبرش نافرمانی کند، دچار گمراهی آشکاری شده است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
اهل&amp;zwnj; سنت&amp;zwnj; و تشبع&amp;zwnj; متفق&amp;zwnj; القولند كه&amp;zwnj; امام&amp;zwnj; حسن&amp;zwnj; رضی الله عنه به&amp;zwnj; نفع&amp;zwnj; معاویه&amp;zwnj; از خلافت&amp;zwnj; كناره&amp;zwnj; گرفت&amp;zwnj;. چنانكه&amp;zwnj; پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;فرموده&amp;zwnj;بود: پسرم&amp;zwnj; مرد والامقامی&amp;zwnj; است&amp;zwnj; و شاید كه&amp;zwnj; الله متعال به&amp;zwnj; واسطه&amp;zwnj; او بین&amp;zwnj; دو گروه&amp;zwnj; بزرگ&amp;zwnj; از مسلمین&amp;zwnj; تفاهم&amp;zwnj; وآشتی&amp;zwnj; برقرار كند.&lt;br /&gt;
سوال&amp;zwnj; اینجاست&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; چرا امام&amp;zwnj; حسن رضی الله عنه از خلافت&amp;zwnj; كناره&amp;zwnj;گیری&amp;zwnj; كرد؟ هر چند كه&amp;zwnj; بعضی&amp;zwnj; از زعمای&amp;zwnj; شیعه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; این&amp;zwnj; اقدام&amp;zwnj;ایشان&amp;zwnj; معترض&amp;zwnj; هستند. همچون&amp;zwnj; سلیمان&amp;zwnj; بن&amp;zwnj; سرد كه&amp;zwnj; یكی&amp;zwnj; از زعمای&amp;zwnj; شیعه&amp;zwnj; است&amp;zwnj; خطاب&amp;zwnj; به&amp;zwnj; ایشان&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گوید: السلام&amp;zwnj; علیك&amp;zwnj;یا مذل&amp;zwnj; المومنین&amp;zwnj;، یعنی&amp;zwnj; سلام&amp;zwnj; بر تو ای&amp;zwnj; ذلیل&amp;zwnj; كننده&amp;zwnj; مسلمین&amp;zwnj; (بجای&amp;zwnj; اینكه&amp;zwnj; بگوید السلام&amp;zwnj; علیك&amp;zwnj; یا امیرالمومنین&amp;zwnj;). همین&amp;zwnj;مطلب&amp;zwnj; در كتاب&amp;zwnj; رجال&amp;zwnj; الكشی&amp;zwnj; ص&amp;zwnj;103 و تاریخ&amp;zwnj; یعقوبی&amp;zwnj; ج&amp;zwnj;2ص&amp;zwnj;215 و ارشاد المفید ص&amp;zwnj;190 و الفصول&amp;zwnj; المعمع&amp;zwnj; فی&amp;zwnj;معرفة&amp;zwnj; احوال&amp;zwnj; الائمه&amp;zwnj; ص&amp;zwnj;162 و احتجاج&amp;zwnj; طبرسی&amp;zwnj; ص&amp;zwnj;148 آمده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;. ملا محمد باقر مجلسی&amp;zwnj; هم&amp;zwnj; در كتاب&amp;zwnj; جلاء العیوم&amp;zwnj;ج&amp;zwnj;1 ص&amp;zwnj;393 به&amp;zwnj; این&amp;zwnj; مطلب&amp;zwnj; اذعان&amp;zwnj; كرده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
در اینجا اهل&amp;zwnj; سنت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;پرسند بحث&amp;zwnj; و جدل&amp;zwnj; پیرامون&amp;zwnj; گذشته&amp;zwnj; و اینكه&amp;zwnj; ابتدا چه&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;بایست&amp;zwnj; خلیفه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;شد چه&amp;zwnj; سودی&amp;zwnj;دارد؟ آیا شیعیان&amp;zwnj; می&amp;zwnj;پندارند كه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;توانیم&amp;zwnj; تاریخ&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; عقب&amp;zwnj; برگردانیم&amp;zwnj; و این&amp;zwnj; بار خلافت&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; علی رضی الله عنه بدهیم&amp;zwnj;؟ نتیجه&amp;zwnj;این&amp;zwnj; بحث&amp;zwnj; و جدلها جز اختلاف&amp;zwnj; و تفرقه&amp;zwnj; بیشر آیا چیز دیگری&amp;zwnj; است&amp;zwnj;؟ اگر شیعیان&amp;zwnj; به&amp;zwnj; راستی&amp;zwnj; خواهان&amp;zwnj; وحدت امت&amp;zwnj; اسلامی&amp;zwnj;هستند چرا خاطرات&amp;zwnj; گذشته&amp;zwnj; را تازه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كنند؟ ما از آنها می&amp;zwnj;پرسیم&amp;zwnj; مگر آنها اعتقاد به&amp;zwnj; عصمت&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; رضی الله عنه ندارند و مگر به&amp;zwnj;نظر آنها حسن&amp;zwnj; رضی الله عنه معصوم&amp;zwnj; نیست&amp;zwnj;؟ پس&amp;zwnj; چگونه&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; شیعیان&amp;zwnj; به&amp;zwnj; موضوعی&amp;zwnj; تكیه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كنند كه&amp;zwnj; علی&amp;zwnj; و حسن&amp;zwnj; رضی&amp;zwnj; الله عنهما از آن&amp;zwnj; موضوع&amp;zwnj; دست&amp;zwnj; برداشته&amp;zwnj; و كناره&amp;zwnj; گرفته&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
اگر علی رضی الله عنه از طرف الله متعال و رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به عنوان امام نصب شده بود و سپس کناره گیری نمود پس العیاذ بالله نافرمانی الله متعال را نمود؟ الله متعال در قرآن کریم می فرماید:&lt;br /&gt;
{فَإِنْ تَنَازَعْتُمْ فِی شَیْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللَّهِ وَالرَّسُولِ إِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْیَوْمِ الْآخِرِ ذَلِكَ خَیْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِیلًا } [النساء: 59]&lt;br /&gt;
&amp;laquo;و هرگاه در چیزی اختلاف کردید، آن را به الله و پیامبر بازگردانید؛ اگر به الله و رستاخیز ایمان دارید. این بهتر است و سرانجام بهتری دارد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
کتابخانه عقیده هم تصمیم گرفت بنابر این فرمودۀ الله متعال مساله امامت را در پرتو قرآن کریم و سنت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم بررسی نموده و کتاب ارزشمند امامت در پرتو کتاب و سنت را خدمت شما عزیزان تقدیم نماید. امیدواریم مورد استفادۀ حق جویان قرار گیرد.&lt;br /&gt;
با کلیک بر روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده دریافت نمایید.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1190/&quot;&gt;امامت در پرتو کتاب و سنت&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب تجلی اخلاق اسلامی در سورۀ حجرات به کتابخانه عقیده پیوست</title>
<link>http://qalamlib.com/news/307</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;كتابخانه عقیده: خوش اخلاقی شیوه پیامبران و پله اول کوی سالکان راه حق است. و تار و پود سعادت و نیک&amp;zwnj;بختی و نیک نامی هر انسانی با رشته&amp;zwnj;های اخلاقی چون؛ گفتار و کردار نیکو، تواضع و فروتنی، قناعت و شکرگذاری، پارسائی و پرهیزکاری، صدق و راستگوئی، احسان و از خودگذشتگی، پاکدلی و پاک سرشتی، فتوت و جوانمردی، وفاء و خوش عهدی، توبه و محاسبه نفس، دوری از بیهودگیها و پستی و رذالتها، ثبات و پایداری، صبر و تحمل و بردباری، و... بهم بافته شده است.&lt;br /&gt;
تأسف از آن است که انسان امروزی درگیر و دار زندگی، خود را به کلی گم کرده است.&lt;br /&gt;
کار و تلاش و زحمت و عرق ریختن از برای خودنمائی... نیرنگ و مکر و حیله به هدف دست یافتن به کمالیات زندگی... دروغ و پزدادن برای ساختن شخصیتی کذائی... زن و مرد در پی مال و ثروت و نام و نشان... خانه و کاشانه... خریدن آخرین سیستم ماشین (موتر) و کامپیوتر... مدهای روز لباس و وسائل خانه... از دیگران عقب نماندن... خلاصه چشم هم چشمی...&lt;br /&gt;
در این فضای تار که قطار زندگی با سرعت سر سام آوری قصد خودکشی کرده است، این کتابچه می&amp;zwnj;آید تا به من و شما تلنگری زده، یادآوری کند که آفریدگار یکتا ما را &amp;laquo;حیوان متمدن&amp;raquo;، یا &amp;laquo;مرد ماشینی&amp;raquo; و یا &amp;laquo;ربوت&amp;raquo; نیافرید، بلکه انسان آفریده، کرامت بخشید و از روح خود در ما دمید و شکل و شمایل و جمال و جلالی داد بی&amp;zwnj;مانند).&lt;br /&gt;
با این جمله&amp;zwnj;های زیبا و پر بار کتاب &amp;quot; تجلی اخلاق اسلامی در سوره حجرات&amp;quot; به کتابخانه عقیده پیوست!&lt;br /&gt;
این دفتر مختصر در 100 صفحه خود؛ از قرآن کریم اساسنامه اخلاق، و نمادهای اخلاقی و روابط افراد جامعه سخن گفته، چشم به آیات ملکوتی سوره مبارکه حجرات دوخته است. نویسنده در سایه باصفای این سوره آرام نشسته قلم می&amp;zwnj;زند و افکار و اندیشه&amp;zwnj;ها و قراءت خود از این سوره را به خوانندگانش هدیه می&amp;zwnj;کند.&lt;br /&gt;
تجلی اخلاق اسلامی با تصویری نمادین از پیک هدایت و رسول دعوت رستاخیز به سر می&amp;zwnj;رسد.&lt;br /&gt;
شما خواننده بزرگوار می&amp;zwnj;توانید با خواندن این کتاب، نه تنها از خورجین آن بهره علم و معرفت کسب کرده، راه تعالی و سمو بپیمایید، بلکه می&amp;zwnj;توانید در پربار کردن مفاهیم آن با فرستادن پیشنهادات و افکار و اندیشه&amp;zwnj;های خود نیز سهیم گردید.&lt;br /&gt;
برای داونلود این کتاب بر روی اسم کتاب کلیک نمایید:&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1186/&quot;&gt;تجلی اخلاق اسلامی در سورۀ حجرات&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>برای اولین بار &quot;مناظره ارزشمند امام جعفر صادق با یک رافضی&quot; به فارسی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/306</link>
<description>&lt;div&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;چند سال پیش هنگامی که برای اولین بار چشمم به کتابی با این عنوان افتاد از خوشحالی نفهمیدم که آنرا چطور خواندم و با همان خوشحالی هم آنرا ترجمه کردم. اما خداوند خواست که در آن سالها نشر آن به تأخیر بیفتد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;عمده ترین علت تأخیر نشر کتاب مناظره امام صادق در آن برهه این بود که چون در اسم کتاب کلمه رافضی آمده بود دوست داشتم در باره این کلمه بحث تحقیقی مفصلی بنویسم که به این بهانه خوانندۀ فارسی زبان کتاب باریشه و کاربرد و مقصود این اصطلاح آشنا شود یاد داشتهای نیز جمع آوری کردم اما گویا قسمت نبود و عوامل دیگری به این سبب افزوده شد که نشر کتاب تا امروز یعنی حدود 10 سال به تأخیر بیفتد. الحمدلله علی کل حال. حال که خداوند اسباب نشر الکترونی آنرا فراهم کرده إن شاءالله امیدوارم که چاپ آن نیز بزودی میسر شود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;متأسفانه در اصل کتاب یعنی تحقیقی که دکتر علی الشبل زحمت کشیده و انجام داده جای دو موضوع خالی است که کاش ایشان زحمت آنرا هم کشیده بود یکی تحقیق در باره کلمه رفض و رافضی و دیگر در باره اهمیت کتاب که هر دو موضوع به نظر من اهمیت فوق العاده دارد بویژه برای خوانندۀ فارسی زبان این هر دو موضوع بسیار ارزشمند است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;گرچه من کتاب را برای نشر فرستادم به امید آنکه هنگام چاپ این نقص را جبران کنم اما دوستان در کتابخانه عقیده لطف کرده و یاد آوری کردند که در باره اهمیت کتاب چیزی نوشته شود. حال که فرصت میسر و بهانه ای هم پیدا شد به توفیق خداوند متعال با اختصار نقص موجود را جبران می کنم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;در باره رفض و روافض کوتاه و مختصر در مقدمۀ کتاب مطلبی نقل کرده ام.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;و اما در بارۀ اهمیت کتاب باید عرض کنم که این کتاب از چند جهت اهمیت و ارزش فوق العاده دارد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;اول:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; اینکه مناظره امام جعفر صادق با یک رافضی به خیرالقرون بر می گردد و گنجینه ارزشمندی از قرن دوم هجری است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;دوم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; اینکه کتاب مستند است و چندین نسخۀ مخطوط و دستنویس دارد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;سوم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; اینکه کتاب بر وفق منهج محدثین و با سند متصل روایت شده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;چهارم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; اینکه محتوای این کتاب با شخصیتی از بارزترین شخصیتهای علمی و تاریخی و اهل بیت پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم یعنی امام جعفر صادق رضی الله عنه و رحمت الله علیه ارتباط دارد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;پنجم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; اینکه موضوع کتاب بغرنج ترین و پیچیده ترین مسأله ای است که در تاریخ اسلام بین اهل سنت و اهل بدعت یعنی روافض و به تبع عموم شیعیان وجود دارد. یعنی موضوع امامت و صحابه رضی الله عنهم أجمعین.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;ششم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; اینکه حضرت جعفر بن محمد صادق رحمت الله علیه که شیعیان اثناعشری مدعی هستند مذهبشان به ایشان منتسب است در این مناظره به نمایندگی از اهل سنت و خاندان نبوت و اهل بیت پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم و علمای سلف عقیده حقه فرقۀ ناجیۀ منصوره یعنی اهل سنت و جماعت که عقیده عموم مسلمین و مستند به قرآن کریم و سنت صحیح و عقل سالم است را بیان فرموده اند. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;هفتم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; با نشر این سند تاریخی مهم از اهل بیت پیامبر صلی الله علیه و آله وسلم روافض و اهل بدعت دشمنان صحابه رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم هویت ضد قرآنی و ضد عقل خود را از دست می دهند و دیگر هیچ پناهگاهی ندارند که با پشتوانه آن خود را به اسلام و قرآن و اهل بیت منسوب بدانند وقتی اهل بیت اینگونه آنان را رسوا نموده و طرد کرده اند پس به طور قطع از گردونه رقابت در چهار چوب اسلام خارج می گردند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;هشتم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; با نشر این کتاب واین سند تاریخی مهم فرق بین شیعه به معنی دوستی با اهل بیت پیامبر و بین رافضه دشمنان صحابه پیامبر خود به خود روشن و آشکار می گردد. دیگر روافض حق ندارند که به بهانه دوستی و محبت علی و سایر اهل بیت پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم خود را شیعه علی و اهل بیت معرفی کنند. شیعه علی کسی است که با صحابه رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم همانند امام جعفر صادق دوست باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;نهم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; ارزش این کتاب به زبان فارسی خلأ بزرگی را پر می کند، زیرا که متأسفانه در جامعۀ فارسی زبان ما تا کنون اینگونه تفهیم شده که اهل بیت یعنی شیعه و شیعه یعنی روافض و دشمن صحابه که نشر این کتاب خطوط قرمز را مشخص خواهد کرد که هر شیعه رافضی نیست و هر رافضی شیعه نیست شیعیان اهل بیت و دوستداران امام جعفر صادق دوست صحابه و دشمن روافض هستند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;دهم:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt; و آخرین مورد در اهمیت و ارزش کتاب مناظره امام جعفر صادق رضی الله عنه این است که یک سند تاریخی مهم و ارزشمند در اختیار جامعه اهل سنت قرار می گیرد تا اینکه خوشحال و مطمئن باشند و&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;قوت قلب حاصل کنند و بدانند که دوستی اهل بیت رضی الله عنهم تنها با شعار و ادعا نیست دوستان واقعی اهل بیت ما اهل سنت هستیم، هر مسلمان سنی در هر جای جهان بداند و شکر و سپاس خدا را بجای آرد که دوستی واقعی اهل بیت علیهم السلام و رضی الله عنهم نیز از افتخارات ما اهل سنت است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;دلیلش این است که&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;عامل حقیقی به عقیدۀ اهل بیت ما هستیم همچنانکه پیامبر گرامی صلی الله علیه و آله وسلم در بارۀ روز عاشورا که دیدند یهود در مدینه آن روز را روزه می گیرند وقتی علت را جویا شدند گفته شد این روز نجات حضرت موسی علیه السلام از دست فرعون است فرمودند: &amp;laquo;&lt;span style=&quot;color: red&quot;&gt;نحن أحق بموسی&lt;/span&gt;&amp;raquo; ما شایسته تر به دوستی با حضرت موسی هستیم. ما هم به مدعیان کاذب محبت اهل بیت عرض می کنیم &amp;laquo;&lt;span style=&quot;color: red&quot;&gt;نحن أحق بأهل بیت رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم&lt;/span&gt;&amp;raquo; ما اهل سنت شایسته تر به دوستی و محبت اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم هستیم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;بارالها ترا شکر و سپاس بی کران و بی پایان بر همۀ نعمتهایت، بر نعمت وجود وانسانیت و اسلام و ایمان و عقیدۀ صحیح اهل سنت و محبت صحابه و اهل بیت و سایر نعمتهایت الحمدلله اولا و آخرا.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;امیدوارم که با نشر نسخۀ فارسی مناظره امام جعفر صادق نسخۀ عربی نیز در سایت عقیده گذاشته شده و به زبانهای مهم دیگر نیز ترجمه شود. إن شاءالله.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; (&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;به قلم مترجم کتاب)&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;/book/1032/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: Tahoma,sans-serif; font-size: 12pt&quot; lang=&quot;FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;برادران وخواهران عزیز می توانند این کتاب ارزشمند را از کتابخانه عقیده دانلود نمایند.&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>شیعۀ امامیه اثناعشری</title>
<link>http://qalamlib.com/news/305</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;پس از اینکه شیعیان برخی از عقاید شان را علنی ساختند و &amp;nbsp;عایشه مادر مومنان و صدیقه بنت صدیق و محبوبۀ رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم را دشنام دادند و به آنچه که منافقان وی را متهم ساخته بودند، متهم نمودند در حالیکه پروردگار جهانیان وی را از این تهمت مبرا داشت و آیاتی را فرستاد که تا روز قیامت تلاوت می گردد چهره حقیقی آنها برملا گشت.&lt;br /&gt;
شیعیان بعد از اینکه ابوبکر صدیق و عمر فاروق رضی الله عنهما را دشنام دادند و تکفیر نمودند و چنین پنداشتند که این دو بزرگوار در جهنم در مرتبه پایین تر از ابلیس اند و این در حالیست که ابلیس از کسانی که پایین تر از وی در جهنم می باشند تعجب می نماید!&lt;br /&gt;
و پس از اینکه شیعیان دوازده امامی عقاید شان را در کتب و ماهواره ها علنی ساختند و از برنامۀ آینده شان در ادارۀ جهان اسلام پرده برداشتند و اینکه مهدی غایب موهوم کعبه را ویران می سازد و به شهر کوفه آن را نقل میدهد و دستان فرزندان بنی شیبه را که کلید کعبه را تا امروز به ارث برده اند _بعد از اینکه این کلید را از رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم تسلیم شده اند_ قطع می نماید و قریش را به قتل می رساند و کسانی را که در شهر رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم میباشند می کشد و ابوبکر وعمر را زنده از قبرهای شان بیرون آورده و می سوزاند و به مدت چهل روز خون مسلمین را مباح قرار میدهد!!&lt;br /&gt;
پس بعد از اینکه شیعه های امامیه عقاید شان را اینچنین علنی ساختند بر هر مسلمان در گوشه و کنار زمین واجب می گردد که شیعه های امامیه جعفری را بشناسد؟&lt;br /&gt;
زیرا این امر از مهمترین مسایلی است که بر تمامی مسلمانان واجب است که همه ابعاد آن را بدانند واینکه چگونه می توانند خود را از شر و آزار این فرقه رهایی بخشند؟&lt;br /&gt;
تاریخ پیدایش فرقه امامیه اثنا عشری&lt;br /&gt;
این فرقه در نیمه قرن سوم در سال 255 هجری قمری پدید می آید دقیقا هنگامی که حسن عسکری رحمه الله بدون فرزند از دنیا می رود پیروانش بعد از وفات وی به چهارده فرقه تقسیم می شوند. و این فرقه مدعی است که حسن عسکری فرزندی داشت اما چون بر زندگی وی خوف داشت او را از انظار پنهان داشت و مخفی ساخت. البته بعد از اینکه همه علوم را به وی می آموزد و در حالیکه فرزندش بیش از سه سال نداشت حسن عسکری زبانش را بر دهان وی می گذارد و این کودک همه علوم اولین و آخرین را از وی دریافت می کند!! آنها بر این گمانند که پدرش در حالیکه وی سه سال داشت می میرد و او در سردابی در شهر سامرای عراق بعلت هراس از دشنمانش مخفی می شود. سپس هزاران خرافه دیگر را برای وی می بافند و وی را امام دوازدهم می گردانند که آغازش از علی رضی الله عنه است و به امام غایب منتهی می گردد. از همه پیامبران و پدرانش بلکه همه مخلوقات، وی را افضل می دانند و می گویند: که اولین غیبت وی، غیبت صغری بود که هفتاد و چند سال ادامه داشت و بر این زعم هستند که در این مدت وی را نوابی بود که با ایشان صحبت می کردند&amp;nbsp;و خمس و کمک های شیعیان و فتوا های آن ها را به وی نقل می رساندند و او کتبا به امور آنها رسیدگی می کرد و سپس غیبت کبری را زعم کردند که تا امروز ادامه دارد!&lt;br /&gt;
علمای شیعه اعمالی را به این امام مزعوم نسبت می دهند که در هنگام خروجش به آن اقدام می نماید و از جملۀ این کارها ویران ساختن بیت الله الحرام و نقل سنگهای آن به شهر کوفه و کشتن خاندان بنی شیبه و حجاج بیت الله و نابود کردن قریشی ها بعد از کشتن امام حرم و بیرون آوردن صدیق و فاروق _رضی الله عنهما_ از قبرهایشان و به آتش کشیدن آنها و کشتار جمعی اهل مدینه و مسکن گزیدن در شهر کوفه و پایتخت گردانیدن این شهر و سپس به مدت چهل روز خونهای مسلمین را مباح دانستن و ... تا اینکه یاران و اصحابش که این چنین رفتار و کرداری دارند و قلبهایشان همچون قطعه های آهن سخت می گردد، از کشتار خسته می شوند پس امام به قتل آن ها امر مینماید و سپس بر همه جهان حکم می راند!&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;عقاید ویژه امامی ها که آن ها را از تمامی مسلمانان متمایز می گرداند:&lt;br /&gt;
امامی ها با کلیه فرقه های شیعه که قبل از آنها بودند تفاوت دارند در حالیکه فرقه های شیعه بیش از صد فرقه اند (نگاه به کتاب فرق الشیعه از نوبختی) و آنها از همه مسلمین متمایزند زیرا ائمه بعد از رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم را در دوازده نفر حصر می کنند و&amp;nbsp;مدعی اند که با امامت علی رضی الله عنه آغاز می گردد و به امام مخفی شده در سرداب خاتمه می یابد و هر امامتی در غیر این دوازه امام، باطل است. پس امامت ابی بکر رضی الله عنه و تمامی خلفا و حکام مسلمین از صدر اسلام تا به امروز بلکه تا روز قیامت را باطل می شمارند و می گویند که خلافت ابی بکر و عمر و عثمان _رضی الله عنهم_ همه خلافتهای غصب شده و باطل اند. این دوازده امام که از علی رضی الله عنه آغاز می گردد&amp;nbsp;و به امام غایب خاتمه می یابد ایمان به تمامی آنها فرض است و کسی که به امامت این دوازده امام ایمان ندارد کافر است و معتقد اند که اینها از تمامی انبیا و مرسلین بهترند و کسی که به آنها ایمان نیاورد، کافر است.&lt;br /&gt;
این ها با این عقیده از دیگر فرقه های شیعه که بیش از صد فرقه می باشند&amp;nbsp;و از دیگر طوایف مسلمین جدا گشته و خود را اثنا عشری نامیده اند و همه فرقه های شیعه را که قبل از آن ها بودند یا تا کنون هستند مانند زیدیه و اسماعیلیه، تکفیر نمودند.&lt;br /&gt;
و بنابر این عقیده علی رضی الله عنه را نیز باید تکفیر نمایند بلکه همه کسانی را که زعم داشتند که این ها اهل بیت و خاندان رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم بودند زیرا هیچ یک از آنها این عقیده اثنا عشری را نمی شناختند گذشته از اینکه به آن معتقد باشد و به آن دعوت کند! و همه مسلمین از همه مذاهب نزد فرقه اثناعشری ها کافر می باشند زیرا کسیکه به معتقد شان ایمان نداشته باشد، کافر است.&lt;br /&gt;
اثناعشری ها به خاطر اثبات عقاید ویژه شان که بر اساس آن از دیگر مسلمین جدا گشته اند، هزاران روایت را جعل نمودند.&lt;br /&gt;
هنگامی که امامی ها با این عقیده از دیگر مسلمین متمایز گردیدند به این دلیل که از این عقیده تا 250سال در جهان اسلام اثری نبود و گروه های دیگر نیز دارنده چنین عقیده ای نبودند و امامی ها می دانستند که معتقد شان مبنی بر کوچکترین دلیلی از کتاب یا سنت و یا سخنی از اهل بیت&amp;nbsp;و یا اصحاب رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم نیست پس هزاران مرویات دروغ را در این زمینه تراشیدند.&lt;br /&gt;
آنها مدعی شدند که تمامی پیامبران به مهدی مخفی در سرداب بشارت داده اند و قرآن و رسول الله _صلی الله صلی الله وآله وسلم_ و همه پدرانش به آمدن وی مژده داده اند وی با دوستانش در غیبت صغری وغیبت کبری ملاقات می کند و به وی نامه های نوشته شده می رسد و او نیز به این نامه ها پاسخ می دهد.&lt;br /&gt;
از این قبیل دروغ ها وخرافات و چرندیات زیادی ساخته و پرداخته شد مثلا در زمینه ازدواج مادرش با پدرش و ولادتش و رضاعتش و مخفی شدن در هر دو مرحله صغری و کبری و با کسانی که وی آنها را ملاقات می کند و اینکه او اکنون کجا است؟ و در غیبت کبری با چه کسانی ملاقات نموده است و اعمالی که آن را بعد از خروجش انجام میدهد همه این ها در صدها مجلد از روایات دروغین نوشته شد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;و در تایید این افکار هزاران حدیث را ساختند که گویا هر امامی که آن ها وی را امام ساخته اند به این عقیده دعوت می کردند.&lt;br /&gt;
اعمالی که امام غایب شیعیان پس از خروجش انجام می دهد&lt;br /&gt;
امامی ها روایات مکذوبی را تراشیده اند درمورد کارهای امام دوازدهم بعد از خروجش از سرداب سامرا، از قبیل کشتار جمعی مسلمین ، ویران ساختن کعبه و نقل آن به شهر کوفه و حکم به تورات و رها نمودن حکم به قرآن و قبل از این آنها بر این باورند که قرآنی که محرف نیست علی رضی الله عنه آن را از صحابه _رضی الله عنهم _ پنهان ساخته است و آن را نوشته و ائمه دوازدگانه آن را به ارث برده اند. و می گویند که امام غایب قرآن حقیقی را بیرون خواهد آورد اما وی به تورات فیصله می نماید و به آرای خود حکم می کند و در هنگام اصدار حکم علیه انسانی، حجتی و دلیلی را مطالبه نمی نماید. این اعمال ننگین را به تفصیل در کتاب های شان نوشته اند و از آنجمله می توان به آنچه که (یاسر خبیث) برخی از آن را در نوار ها و مقاله هایش، قبل از اینکه از کویت بگریزد ظاهر ساخت، و همچنین شبکه های ماهواره ای شیعه اشاره کرد.&lt;br /&gt;
امامی ها همه متفق اند که وقت ظهور امام دوازدهم فرا رسیده است.&lt;br /&gt;
علمای شیعه و بزرگان شان امروز بر این اند که زمان زمان ظهور مهدی است و همه دلایل اشاره براین دارد و خود را آماده ساخته اند تا تحت امرش باشند و فرامین وی را در هنگام ظهورش اجراء نمایند و در این زمینه کتاب های مفصلی را نوشته اند مانند کتاب (یوم الخلاص از کامل سلیمان) و (مهدی و وقت الظهور از محمد صدر) و (الممهدون للمهدی از کورانی). و احمدی نژاد رییس جمهور ایران نیز گفته است که به زودی درفش را به امام دوازدهم قبل از انتهای مدت ریاست جمهوری اش تسلیم می کند!!&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
عقاید امامی ها با اسلام منافات دارد.&lt;br /&gt;
عجیب است که امامی ها به عقایدی معتقد اند که به طور کلی با اسلام منافات دارد چگونه انسانی در دایره اسلام باقی می ماند در حالیکه معتقد است که کعبه در جایش نیست و جایگاه صحیح آن کوفه است نه مکه. و کسی که این اشتباه را تصحیح می کند امام دوازدهم است که از اعمالش، ویرانی کعبه و نقل سنگ های آن از مکه به کوفه است (نویسندگان کتاب وقت الظهور محمد صدر و دیگران ثروتمندان شیعه را تشویق داشتند که اموالشان شان را در کوفه سرمایه گزاری کنند و در آنجا زمین بخرند چون قیمت این زمین ها هنگامی که امام دوازدهم کعبه را به این شهر نقل می دهد، بسیار گران می شود!!!).&lt;br /&gt;
عقاید امامی ها دربارۀ قرآن.&lt;br /&gt;
چگونه انسانی می تواند مومن به الله متعال و به قرآن کریمی که بر رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم نازل شده باشد در حالیکه این انسان معتقد است که قرآن کنونی که در نزد مسلمین است و مسلمین آن را تلاوت و حفظ نموده و به آن عمل می کنند قرآن حقیقی نیست. قرآن حقیقی قرآنیست که آن را علی رضی الله عنه جمع کرد و در زندگی اش آن را پنهان داشت و حتی در هنگام خلافتش نیز آن را همچنین پنهان نگه داشت و نزد فرزندانش بعد از خود آن را امانت گذاشت تا اینکه به امام دوازدهم رسید. &amp;nbsp;پس قرآن حقیقی همچنان مخفی است تا اینکه امام &amp;nbsp;غائب ظهور نماید!!&lt;br /&gt;
چگونه انسانی مسلمان می باشد در حالی که معتقد است مهدی چنین جنایات ننگین و کفرآمیزی را از روز نخست خروجش تا آخر زندگی اش انجام میدهد.&lt;br /&gt;
و اینکه عایشه صدیقه همسر رسول الله، مادر مومنان صدیقه دختر صدیق زن فاجره ای بود -العیاذ بالله- و میگویند که قرآنی که برائتش را نازل کرده است قرآن حقیقی نیست و مهدی هنگامی که خارج می شود وی را از قبرش بیرون می سازد و حد زنا می زند..!!&lt;br /&gt;
و اینکه اصحاب رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم بدترین مخلوقات اند و کافرتر از همه کافران اند&amp;nbsp;و عذاب دو یار رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم، ابی بکر و عمر _رضی الله عنمها_ بزرگتر از عذاب ابلیس است و آن دو بزرگوار اکنون تعذیب می گردند و در آتش جهنم بسر می برند!!&lt;br /&gt;
و اینکه ایمان به دوازده امام فرض است و کسی که به آنها ایمان نیاورد کافر است بنابر این علی رضی الله عنه و همه فرزندانش بلکه همه آل بیت کافرند چون از هیچ کدام از این بزرگواران کلمه دوازده امام روایت نشده است و نه اصحاب شان از فرقه های دیگر شیعه این دوازده امام را می شناختند و این معقتد فاسد که گویا ایمان به ائمه دوازدگانه از علی تا امام غایب فرض است در نیمه قرن سوم هجری ظهور کرد و بنابر این اعتقاد فاسد همه مسلمین کافرند و علی رضی الله عنه و همه آل بیت و هر کسی که نسبت به وی دعوای امامت شده است نیز داخل این دایره کفرند&amp;nbsp;چون هیچ یک از اینها نه این معتقد را می شناختند و نه شنیده بود که این دوازده امام به نص قرآن امامند و برهمه مسلمین فرض است که به این ها ایمان بیاورند و از انها طاعت کنند و کسیکه به این معتقد، ایمان نداشته باشد کافر است.&lt;br /&gt;
بدین ترتیب در می یابیم که اثنا عشری ها با این معتقد، خود را از نعمت عقل محروم گردانده اند و جای شگفت این است که همه تمامی عقایدی که فرقه امامیه به آن ایمان دارند بطلانش با قرآن و عقل، آشکار و مبرهن است.&lt;br /&gt;
کعبه در مسجد حرام است و آیه های محکم و اجماع امت اسلام نسل اندر نسل همه نشاندهنده این حقیقت است، پس چگونه یک مسلمان عاقل می پذیرد که کعبه در جای اصلی اش نیست و اگر مهدی آمد به کوفه نقل داده می شود ؟!&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;با قرآن و عقل ثابت است که رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم با اصحابش رضی الله عنهم که آن ها را بی نهایت دوست میداشت و آنها نیز وی را بیش از جانشان دوست میداشتند&amp;nbsp;و دختران برخی از آنها را به همسری گرفت و دخترانش را به ازدواج آنها درآورد و باطن و ظاهر آنها از گذرگاه وحی بر وی آشکار بود و همه اصحاب وی بودند و نبی صلی الله صلی الله وآله وسلم همه آنها را می شناخت و نه آنچنانکه این مجرمان نسبت می دهند که وی _صلی الله صلی الله وآله وسلم_ آن ها را لعنت می کرد و بد میگفت و کفر و نفاق شان را میدانست و با این همه با آنها تصنعی برخورد می کرد و چون از آنها خوف داشت با آنها تقیه می کرد!! حاشا که الله چنین رسولی را با چنین اخلاقی که این مجرمان به وی نسبت می دهند برگزیند!! الله متعال به ایمان و داخل شدن آن بزرگواران به جنت در آیات زیادی از قرآن شهادت می دهد، الله بعد از حادثه بدر به کفار می فرماید:&amp;quot;إِنْ تَسْتَفْتِحُوا فَقَدْ جَاءَكُمُ الْفَتْحُ وَإِنْ تَنْتَهُوا فَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْ وَإِنْ تَعُودُوا نَعُدْ وَلَنْ تُغْنِيَ عَنْكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْئًا وَلَوْ كَثُرَتْ وَأَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُؤْمِنِينَ &amp;quot; (الانفال 19)&lt;br /&gt;
ترجمه: [اى مشركان] اگر شما پيروزى [حق] را مى&amp;rlm;طلبيد اينك پيروزى به سراغ شما آمد [و اسلام پيروز شد] و اگر [از دشمنى] بازايستيد آن براى شما بهتر است و اگر [به جنگ] برگرديد ما هم بر مى&amp;rlm;گرديم و [بدانيد] كه گروه شما هر چند زياد باشد هرگز از شما چيزى را دفع نتوانند كرد و يقينا الله با مؤمنان است.&lt;br /&gt;
پس الله به ایمان آنها شهادت داد و گفت که الله با آنها است و بعد از حادثه احد می گوید:&amp;quot;وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ الْمُؤْمِنِينَ مَقَاعِدَ لِلْقِتَالِ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ&amp;quot; (ال عمران 121)&lt;br /&gt;
ترجمه: و (به يادآور) زماني را كه صبحگاهان از ميان خانواده خود براي انتخاب اردوگاه جنگ براي مؤ منان، بيرون رفتي، و خداوند شنوا و دانا است.&lt;br /&gt;
الله گواهی بر ایمان کسی میدهد که همراه با رسول الله _صلی الله صلی الله وآله وسلم_ و در رکاب ایشان جنگید (اما رافضی ها می گویند که آنها کافر بودند و کفر را در زندگی رسول الله _صلی الله صلی الله وآله وسلم_ پنهان داشتند یعنی منافق بودند و پس از وی نیز مرتد شدند)&amp;nbsp;این در حالیست که الله متعال در قرآن در مورد آنها می گوید:&amp;quot;مِنَ الْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَيْهِ فَمِنْهُمْ مَنْ قَضَى نَحْبَهُ وَمِنْهُمْ مَنْ يَنْتَظِرُ وَمَا بَدَّلُوا تَبْدِيلًا&amp;quot; (الاحزاب 23)&lt;br /&gt;
ترجمه: از ميان مؤمنان مردانى&amp;rlm;اند كه به آنچه با الله عهد بستند صادقانه وفا كردند برخى از آنان به شهادت رسيدند و برخى از آنها در [همين] انتظارند و [هرگز عقيده خود را] تبديل نكردند.&lt;br /&gt;
الله متعال شهادت می دهد که آنها به آنچه در عهد ایمان خود با الله بسته بودند وفا کردند و به نصرت رسول الله _صلی الله صلی الله وآله وسلم_ شتافتند و کسیکه از اینها مرد و یا در قید حیات باقی ماند در این عهد تبدیلی و تغییری ایجاد نکردند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;الله متعال در غزوه حدیبیه گواهی میدهد که از آنها راضی است و فتح نزدیکی را نصیب آنها می گرداند که فتح خیبر است:&amp;quot;لَقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنْزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا (18) وَمَغَانِمَ كَثِيرَةً يَأْخُذُونَهَا وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا &amp;quot; (الفتح 18)&lt;br /&gt;
ترجمه: الله از مؤمناني كه در زير آن درخت با تو بيعت كردند راضي و خشنود شد، الله آنچه را در درون قلب آنها (از صداقت و ايمان) نهفته بود ميدانست، لذا آرامش را بر دلهاي آنها نازل كرد، و فتح نزديكي، به عنوان پاداش، نصيب آنها فرمود.&lt;br /&gt;
و الله متعال بار دیگر خبر داد که در غزوه تبوک (عسره) همه را آمرزیده است. &amp;quot; لَقَدْ تَابَ اللَّهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ الَّذِينَ اتَّبَعُوهُ فِي سَاعَةِ الْعُسْرَةِ مِنْ بَعْدِ مَا كَادَ يَزِيغُ قُلُوبُ فَرِيقٍ مِنْهُمْ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ إِنَّهُ بِهِمْ رَءُوفٌ رَحِيمٌ &amp;quot; (التوبه 117)&lt;br /&gt;
ترجمه: خداوند رحمت خود را شامل حال پيامبر، و (همچنين) مهاجران و انصار كه در زمان عسرت و شدت (در جنگ تبوك) از او پيروي كردند، نمود، پس از آنكه نزديك بود دلهاي گروهي از آنها از حق منحرف شود (و از ميدان جنگ باز گردند) سپس الله توبه آنها را پذيرفت كه او نسبت به آنان مهربان و رحيم است.&lt;br /&gt;
و الله عزوجل در کلام جاویدانش خبر میدهد که سابقین اولین کسانی که در راه و روش نیک آنها از آنان تبعیت و پیروی نمودند در بهشت برین پروردگار جاویدانند:&amp;quot;وَالسَّابِقُونَ الْأَوَّلُونَ مِنَ الْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ وَالَّذِينَ اتَّبَعُوهُمْ بِإِحْسَانٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي تَحْتَهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ&amp;quot; (التوبه 100)&lt;br /&gt;
ترجمه: و پيشروان نخستين از مهاجران و انصار و كسانى كه به نيكوكارى از ايشان پيروى كرده&amp;rlm;اند [تابعان&amp;rlm;]، خداوند از آنان خشنود است و آنان نيز از او خشنودند و براى آنان بوستانهايى آماده كرده است كه جويباران از فرودست آن جارى است و جاودانه در آنند، اين رستگارى بزرگ است&amp;rlm;.&lt;br /&gt;
وکسی که الله را در این همه تکذیب کند و معتقد باشد که همه صحابه _رضی الله عنهم_ به جز سه یا چهار صحابی، همه کفار و مرتد و مخالف رسول الله صلی الله صلی الله وآله وسلم بودند و باوی در زندگی و بعد از مرگش عناد می ورزیدند بدون شک چنین شخصی زندیق و مجرم و افاکی است که ذره ای از روشنی ایمان قلبش را دق الباب ننموده است و بعد از این تکذیب تکذیبی نیست، &amp;quot;وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِآيَاتِهِ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ &amp;quot; (الانعام 21)&lt;br /&gt;
ترجمه: چه كسي ستمكارتر از كسي است كه بر الله دروغ بسته يا آيات او را تكذيب نموده، مسلما ظالمان روي رستگاري نخواهند ديد.&lt;br /&gt;
شگفت آور تر از همه این است که انسانی به دو امر متناقض ایمان داشته باشد که یکی دیگری را نقض نماید. آیا ممکن است انسانی به الله و کتاب فرستاده شده اش ایمان داشته باشد درحالیکه سخن الله متعال را رد می کند و تکذیب می نماید چنانکه در برائت مادر مومنان عایشه صدیقه و فضیلت ایشان و فضیلت اصحاب پیامبر _صلی الله صلی الله وآله وسلم _ آیات بیشماری در قرآن کریم موجود است اما شیعیان همۀ این فضایل را رد می کنند!!&lt;br /&gt;
جالب است بدانید ایمان به دوازده امام اصلا قبل از وفات حسن عسکری کسی که امامی ها وی را امام یازدهم می دانند وجودی نداشت و امام علی _رضی الله عنه_ &amp;nbsp;هنگامی که متولی خلافت میگردد هرگز این چنین سخنی را به زبان نمی آورد و نه به مقتضای آن عمل می کند بلکه به ضد آن اقدام می نماید با صدیق و فاروق و عثمان _رضی الله عنهم_ بیعت می کند و وزیر صادق برای آنها می باشد و دخترش ام کلثوم را به همسری عمر رضی الله عنه در می آورد و خودش از کنیزان بنی حنیفه ازدواج می کند کسانی را که ابوبکر بنابر ارتداد و امتناع شان از پرداخت زکات با آنها می جنگد، و بعد از خود کسی را تعیین نمی کند که خلافت یا امامت را در دست گیرد و هرگز از امامت ساخته و پرداختۀ شیعه سخنی به میان نمی آورد و نه به مقتضای آن عمل می کند. این معتقد فاسد به کفر فرزندش حسن بن علی رضی الله عنهما نیز می انجامد کسی که بعد از بیعت با وی، به معاویه بن ابی سفیان رضی الله عنهما تنازل می نماید تا معاویه خلافت را در دست گیرد، و نیز به کفر دیگر ائمه می انجامد چون بسیاری از آنها از مشاورین و وزرای دولت بنی امیه و بنی عباس بودند.&lt;br /&gt;
پس بنابر این معتقد امامیه، تمامی ائمه کافرند!!&lt;br /&gt;
امامی ها با ساختن عقاید باطل خود ندانسته تمامی فرزندان آل بیت را (به جز آن دوازده نفر) که مطالبه خلافت می کردند مانند حسن بن حسن بن علی بن ابی طالب&amp;nbsp;و زید بن حسین بن علی بن ابی طالب و دیگران را تکفیر می نمایند.&lt;br /&gt;
سوالی که مطرح می شود این است که اگر دین اثناعشری که متناقض با بدیهیات عقل و آنچه رسول صلی الله صلی الله وآله وسلم آورده است می باشد، پس چرا این جمع غفیر از مردم به این عقاید معتقدند؟&lt;br /&gt;
جواب این است که این دین را جمعی از حاقدین و کینه توزان علیه دین اسلام اساس گذاشته اند و برای آن اصولی وضع کرده اند که رسیدن به حق را دور می سازد.&lt;br /&gt;
دین اثناعشری بر اساس دروغ بنا شده است: کودکی تولد می گردد و به مخفی گاه پنهان میگردد وی مهدی منتظر است وی کسی است حسن عسکری او را متولی امر بعد از وفاتش می گرداند این دروغ هزاران دروغ دیگری را می زاید!! روایاتی که ولادت و تعلیم و فضل و غیاب و خروج و اعمال مهدی را یکایک بیان می دارد!! و بافتن دروغ مبنی بر اینکه الله متعال خبر این امام را در همه کتاب هایش و بر تمامی انبیاء و رسلش فرستاده است و رسول خاتم _صلی الله صلی الله وآله وسلم_ و همه ائمه به آمدن وی بشارت داده اند.&lt;br /&gt;
پس کسی که به رویات فراوانی از این قبیل که به ائمه اهل بیت نسبت داده می شود دربارۀ کودکی گوش میدهد برای وی دشوار می گردد که همه را تکذیب کند؟!&lt;br /&gt;
اصل دوم امامیه تقیه است ومدعی اند که این مذهب تمامی ائمه است و به مخالفان شان سخن مخالف حق می گفتند و این اصل آنها را واداشت که سخنان ضد و نقیض را بر زبان آورند و این متناقضات را جمع کنند و به ائمه نسبت دهند و مدعی شوند که برخی حقند و آنچه که مخالف آن است امام را آن را از باب تقیه گفته است!! و این حرکت امامیه زمینه تعارضات و تناقضات گسترده آنها را به آسانی و سادگی بدون شرم و حیا مهیا می سازد!!&lt;br /&gt;
سومین امری که در انتشار مذهب امامیه نقش بازی کرد واجب دانستن خمس بر کسی که معتقد به این اعتقاد است، می باشد و این خمس هزاران انسان را آماده این ساخت که برای نشر اکاذیب مذهب باطل و متناقض امامی خود را فارغ بسازند و آنچه را حوزه های علمیه می نامند و مسئولیت آموزش و تعلیم این مذهب می باشد تاسیس نمایند و آن را در قم و نجف وسایر شهرها گسترش دهند.&lt;br /&gt;
خمس بر هر انسان شیعی فرض است چه درآمد مالی اش کم باشد چه زیاد. آخوندها بوسیله خمس اموال هنگفتی را به چنگ آورده و از آن در نشر مذهب و دعوت به سوی آن استفاده می کنند و اما در مقابل این خمس، اگر مردم به عملی از اعمال ویژه دین شیعه عمل نمایند بزرگان امامیه آنها را به جنت و درجات عالیه بشارت می دهند و اگر چه این عمل سینه زنی در سالروز شهادت حسین بن علی _رضی الله عنهما_ باشد. یا نکاح متعه که به خیال آنها از نزدیکترین اعمال به الله متعال است و اگر کسی با زنی متعه کرد و سپس غسل نمود الله از هر قطره آب غسل(نجس) وی سی هزار ملک می آفریند و تا روز قیامت برای وی دعا می کنند!! و بشارت هایی از این قبیل که از حد و حصر بیرونند و عوام شیعه امامی را که خمس می دهند به طمع می اندازد، همانند بشارت به بهشت و درجات عالیه در ازای اعمالی که امامیه را از دیگران متمایز می گرداند در حالیکه این اعمال از بزرگترین گناهان می باشد اما آخوندها، این اعمال را بهترین عبادتها قلمداد می کنند!!&lt;br /&gt;
و از اسباب نشر این مذهب در بین عوام الناس و جهال، تکالیف اندک آن می باشد که به مجرد اعتقاد به فضایلی که آن را به آل بیت نسبت میدهند انسان به جنت داخل می گردد فضایلی که در آن تمامی صفات الوهیت و ربوبیت (که مخصوص الله است) را در ائمه مدعی شده اند مانند اینکه علی _رضی الله عنه_ در روز قیامت مردم را محاسبه می کند نه الله. و علی جنت و جهنم را توزیع و تقسیم میکند و اتباعش را به جنت داخل می گرداند و دشمنانش را در جهنم داخل میکند؟! و معتقدند که ائمه شان می آفرینند و رزق میدهند و زنده می گردانند و می میرانند&amp;nbsp;و آنچه بخواهند از احکام، آن را حاکم میگردانند و بدین ترتیب تمامی صفات الوهیت و ربوبیت را به آنها نسبت می دهند و اینکه ائمه بهتر و برتر از انبیا و مرسلین و تمامی مخلوقاتند.&lt;br /&gt;
این افکار فریبنده سبب انتشار این مذهب در بین عوام و بی سوادان می گردد.&lt;br /&gt;
یکی دیگر از اسباب نشر این مذهب استفاده از کینه و دشمنی بر ضد اسلام بود که بعد از فروپاشی دولت ساسانی در ایران در قلبهای برخی از فرزندان مجوسی متولد گردید و در نتیجه آنها علیه دین مقدس اسلام دسیسه نمودند و در سایه (ادعای محبت) آل بیت استفاده کرده و علیه دین اسلام در زیر این عنوان جنگیدند.&lt;br /&gt;
تمامی اینها اسبابی اند که در نشر این مذهب با اینکه با عقل و وحی الهی مخالف است نقش مهمی بازی کرده اند.&lt;br /&gt;
خطر آینده ای که همۀ امت اسلام را تهدید می کند&lt;br /&gt;
امروز مسلمانان با مصیبت بسیار بزرگ و فتنه عظیمی مواجهند که به جز الله کسی دیگر حجم فراگیر این خطر را نمی داند و آن اینکه امامیه برای اولین بار در تاریخ موفق شدند که دولتی را به نام مهدی غایب پایه گذاری نمایند.&lt;br /&gt;
واگر امام دوازدهم (مهدی شیعه) زاده نشده و اصلا وجودی ندارد اما دولت امامیه اثناعشری در ایران به اسم مهدی برپا گردیده و این دولت از ولی فقیه کسی که به ادعای آنها نایب امام زمان است دستور می گیرد و وی حکومت می کند و قانون این دولت&amp;nbsp;و نظام آن و همه ارکان مجالس (مجلس نخبگان و تشیخص مصلحت و مجلش شورا و...) و تمامی دستگاههای اجرایی و نیروهای مسلح و پلیس و سپاه پاسداران همه &amp;nbsp;و همه بر اساس اسم امام ساخته و برپا شده اند و به نیابت وی عمل می کنند و تمامی آنها &amp;nbsp;در هر لحظه منتظر خروج وی می باشند!!!!.&lt;br /&gt;
امامی که هرگز وجود خارجی ندارد امروز در ایران حاکم است و به اسمش قوانین صادر میگردد و همۀ اوامر اجراء میگردد پس امام دوازدهم (مهدی شیعه) تنها اعتقادی در قلب نیست که در خارج وجود نداشته باشد بلکه عقیده ای است که به آن عمل میگردد، پس امام دروغین توسط نواب دروغینش بر جهان حکومت می کند!!!&lt;br /&gt;
اما برای اینکه ظهور کند و خارج گردد برنامه ای را برای وی ریخته اند که وی آن را اجراء نماید. (و این برنامه سراسر انتقام از مسلمانان و عربها می باشد که الله قرآن را در بین آنها و به زبان آنها نازل نمود و آنها اسلام را به سرزمین فارس رسانده و بر حکومت جور ساسانی پایان بخشیدند) مهدی شیعیان در آغاز، امام حرم مکه را در روز جمعه به قتل می رساند و دستان فرزندان بنی شیبه را قطع می کند و قریش را یکسره ریشه کن می نماید و حجاج را به قتل می رساند سپس به مدینه منوره رفته ابوبکر و عمر را از قبرهای شان بیرون آورده و به آتش می افگند و مادر مومنان عایشه را سنگسار می کند و اهل مدینه را می کشد سپس به مکه باز می گردد تا کعبه را ویران نماید و آن را به کوفه نقل دهد سپس تورات را از طبریه بیرون می کند و به آن حکم &amp;nbsp;می نماید سپس تا چهل روز خون مسلمین را مباح می گرداند تا همه را نابود بگرداند سپس پدرانش را همه زنده &amp;nbsp;می نماید تا ملک عظیم وی را بنگرند پس کسانی را که بر پدرانش ستم نموده اند و حکومت نموده اند، زنده می گرداند تا همه خلفا و سلاطینی را که یکی پس از دیگری بر امت اسلام حاکم بوده اند، را به قتل برساند و قبل از روز قیامت همه را محاسبه نماید.&lt;br /&gt;
این برخی از دست آوردهای مهدی (موعود شیعیان) است که معتقدند پس از آنکه ظهور نمود آن را انجام میدهد و هم اینک زمان ظهورش فرارسیده است.&lt;br /&gt;
همه روایاتی را که در زمینه انجام دادن اعمالی آورده اند که مهدی در هنگام ظهورش به آن اقدام می نماید به جز وقت مناسب سیاسی هیچ چیزی دیگری مانع تنفیذ آن نمی گردد و امروز آن وقت مناسب سیاسی برای آنها فرا رسیده است تا بر جهان اسلام یورش برند و بر حرمین شریفین مسلط گردند. امروز امت اسلامی در تفرقه و حیرت به سر میبرد و اکثر اهل سنت، این دسیسه بزرگ را درک نمی کنند و این خطر را احساس نکرده اند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;امروزه جهان غرب مسلمانان را با زیرکی تمامی می فریبند و دولت اثنا عشری را بر آنها مسلط میگردانند زیرا این دولت در نهایت میتواند اسلام را نابود نماید اسلامی که دشمنان اسلام و یهود و نصارا از آن در هراس اند. اگر مسلمانان جهان متوجه این دسیسۀ آنها نشوند آیندۀ دردناکی در انتظار آنها خواهد بود مانند آیندۀ عراق و افغانستان که غرب و در رأس آن آمریکا این دو کشور مسلمان را دو دسته تقدیم ایران نمود.&lt;br /&gt;
پس آیا مسلمانان از این دسیسه ها و توطئه های بزرگی که علیه آنها چیده می شود و آنچه که در انتظار شان است آگاهند؟!!!&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
برای آشنایی بیشتر با مذهب شیعه این کتابها را مطالعه نمایید:&lt;br /&gt;
نگاهی به عقاید شیعه&lt;br /&gt;
پژوهشی پیرامون اصول و فروع شیعه دوازده امامی- در 3 جلد&lt;br /&gt;
گره های کور در مذهب شیعه&lt;br /&gt;
گفتاری با حق جویان شیعه&lt;br /&gt;
گفتگویی آرام با دوست شیعه ام&lt;br /&gt;
گفتگوهای عقلانی با شیعیان اثنی عشری منابع شیعه در میزان نقد علمی&lt;br /&gt;
نقد و بررسی اصول و پایه های مذهب شیعه دوازده امامی&lt;br /&gt;
نامه ای از یک خواهر دلسوز به یک خواهر شیعه&lt;br /&gt;
قطره ای از دریای خرافات شیعه&lt;br /&gt;
عقیده&amp;zwnj; عصمت بین امام و فقیه از دیدگاه شیعه امامیه&lt;br /&gt;
شیعه گری&lt;br /&gt;
شیعه و شیعه&amp;zwnj;گری&lt;br /&gt;
شیعه و سنت&lt;br /&gt;
شیعه و حسینیه ها&lt;br /&gt;
شیعه و تصحیح - جدال بین شیعه و تشیع&lt;br /&gt;
شیعه و اهل بیت&lt;br /&gt;
سرخاب و سفید آب - شیعه پاسخ نمی دهد&lt;br /&gt;
سؤالاتی که باعث هدایت جوانان شیعه شد&lt;br /&gt;
رجال شیعه در ترازوی قضاوت&lt;br /&gt;
حکایت مناظره ای تاریخی - تحریف قرآن نزد شیعه&lt;br /&gt;
تکامل فکر سیاسی شیعه از شورا تا ولایت فقیه&lt;br /&gt;
بطلان عقاید شیعه&lt;br /&gt;
اسلام ناب بدون خرافات شیعه&lt;br /&gt;
استدلال های باطل شیعه از قرآن و بیان بطلان آن&lt;br /&gt;
اخبار و راویان شیعه&lt;br /&gt;
آلفوس - 2 جلد - پاسخ عقلی به دروغهای تاریخی در فرهنگ شیعه&lt;br /&gt;
گفتگویی آرام با دکتر محمد حسینی قزوینی شیعه اثنا عشری&lt;br /&gt;
گفتگویی آرام و مفید بین محمد و احمد&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>مژده به تاجیکان!...Китобҳои Тоҷикӣ</title>
<link>http://qalamlib.com/news/304</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برگردان کتابهای فارسی به تاجیکی&lt;br /&gt;
کتابخانه عقیده: متأسفانه روند فعالیت اسلامی و بیدارگری دینی در تاجیکستان بسیار کند به پیش می&amp;zwnj;رود. غل و زنجیر ظلم و ستم و استبداد نظام حاکم بر دست و پای بیدارگران اسلامی سنگینی می&amp;zwnj;کند. در مقابل تمامی افکار و اندیشه&amp;zwnj;های فریبکارانه و انحرافی چون؛ مسیحیت ، قادیانیت ، اسماعیلیت و شیعه اثنا عشری رافضی و غیره .. در کمال آزادی مشغول فعالیتند. و تعدادی از فرزندان فقیر و بیسواد امام بخاری و امام ترمذی تاجیک شکار اینگونه افکار و اندیشه&amp;zwnj;های خرافاتی شده در منطقه آشوب به پا کرده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
کتابخانه عقیده در راستای خدمت به فرهنگ اسلامی و بیدارگری ملت تاجیک در تلاش است با همکاری و همیاری علما و دعوتگران برومند تاجیک گزیده&amp;zwnj;ای از کتابهای مفید در این زمینه را به خط تاجیکی برگرداند.&lt;br /&gt;
امید است اندیشمندان و روشنفکران و علمای تاجیک آستین همت بالا زده در این راستا با ما همیار شوند.&lt;br /&gt;
از خداوند متعال عاجزانه تمنا داریم در کار ما برکت نهاده آنرا قبول درگاه خویش قرار دهد.&lt;br /&gt;
مجموعه اول کتابهای تاجیکی که به سایت اضافه شده&amp;zwnj;اند از قرار زیر می&amp;zwnj;باشند:&lt;br /&gt;
تضاد در عقیده&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
چرا سنی شدم&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
ربحت الصحابه&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
بهترین انسانها بعد از پیامبران&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
Табдили китобҳои Форсӣ ба Тоҷикӣ (срилик)&lt;br /&gt;
Китобхонаи Ақидаҳ: Мутаассифона раванди фаъолияти Исломӣ ва бедории динӣ дар Тоҷикистон бисёр ба сустӣ ва кундӣ ба пеш меравад. Ғул ва занҷири зулму ситам ва истибдоди низоми ҳоким дар даст ва пойи бедоргарон ва даъватгароин Исломӣ сангинӣ карда, ҳукумат тамоми қувваро ба он сафарбар дорад, то аз густариши Ислом ҷалавгирӣ кунад. Дар муқобил тамоми афкор ва андешаҳои фиребкорона ва мунҳариф мисли: масеҳияту қодёният, исмоилият ва Шиъаи дувоздаҳимомаи рофизӣ ва ғайра, бо камоли озодӣ машғули фаъолиятанд ва теъдоди зиёде аз фарзандони фақир ва бесоводи имоми Бухорӣ ва Тирмизии тоҷик шикори ингуна афкор ва андешаҳои хурофотӣ шудаанд ва дар минтақа ошубе ба по карданд.&lt;br /&gt;
Бинобарин &amp;quot;китобхонаи ақидаҳ&amp;quot; ба хотири хидмат ба фарҳанги Исломӣ ва &amp;nbsp;бедории миллати Тоҷик дар талош аст бо ҳамкорӣ ва ёрии уламо ва даъватгарони баруманди Тоҷик ва минтақа, гӯзидае аз китобҳои муфидро дар ин замина ба хатти Тоҷикӣ баргардонад.&lt;br /&gt;
Умед аст, ки андешмандон ва равшанфикрону уламои Тоҷик остини ҳиммат боло карда дар ин ҷода бо мо ҳамкор шаванд.&lt;br /&gt;
Аз Худованди Мутаъол оҷизона таманно дорем дар ин кори мо баракат ниҳода, онро қабули даргоҳи хеш қарор диҳад.&lt;br /&gt;
Маҷмуъаи аввали китобҳои Тоҷикӣ, ки ба сайт изофа шуданд, аз қарори зер иборатанд:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
Тазод дар ақидаҳ&lt;br /&gt;
Чаро Суннӣ шудам&lt;br /&gt;
Саҳобаро ба даст овардам&lt;br /&gt;
Беҳтарин инсонҳо баъд аз Паёмбарон&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>امیری مراجع شیعه را خلع سلاح کرد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/300</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%&quot;&gt;کتابخانه عقیده: &amp;quot;دوباره سرخ آب و سفید آب&amp;quot; چون پتکی بر سر عقلهای همیشه در خواب فرود آمد..&lt;br /&gt;
آقای علی حسین امیری خود را شیعه هدایت یافته&amp;zwnj;ای معرفی می&amp;zwnj;کند که از منجلاب بدعتها و خرافات شیعه رهایی یافته، شرفیاب نور هدایت قرآن کریم شده است، و از شرکیات و بدعات دست شسته ابراهیم وار بتهای جهالت را شکسته، سینه خویش را با گردنبند طلایی توحید ابراهیمی واراسته، بار دیگر در کتابخانه اصلاحگرای فارسی سر و گردنی به نمایش گذاشته است.&lt;br /&gt;
اینبار استاد &amp;quot;امیری&amp;quot; تنها 99 تیر از کمان اندیشه بر سینه جهل و خرافه رها کرده است. ایشان یک تنه تمامی جهان تشیع ـ البته اینبار انگشت اشاره&amp;zwnj;اش مستقیما آخوندها و مراجع شیعه را نشان رفته ـ را به مبارزه طلبیده با اعتماد به نفس بی&amp;zwnj;مانندی روئین تن چون جد امجدش حضرت سلمان فارسی رضی الله عنه از هیکل علمی جهان تشیع خواسته تنها به ده درصد 10% از پرسشهای حیران و بی&amp;zwnj;پاسخ او جواب دهند، تا ایشان ریش و سبیلش را تراشیده به صورتش سرخ آب و سفید آب بمالد!&lt;br /&gt;
(عوام و بازاریها در ایران در پاسخ مدعی، مثلی می آورند با این مضمون: اگر چنین و چنان شد من ریش و سبیلم را می تراشم و به جای آن سرخاب و سفیدآب می&amp;zwnj;مالم.)!&lt;br /&gt;
نویسنده توانای شیعه هدایت یافته چندی پیش کتابی مختصر منتشر ساخت به عنوان &amp;quot;سرخ آب و سفید آب ـ شیعه پاسخ نمی&amp;zwnj;دهد&amp;quot;، اسلوب ساده و عام فهم ایشان انقلابی در فکر تشیع صفوی به پا نموده کاخهای کاغذی آنها را درهم درید. شیعه مات و مبهوت در برابر آن خلع سلاح شدند. البته طبق معمول برای ماست مالی کردن حکایت پژوهشگری صفوی بنام &amp;quot;مصطفی جوادی نسب&amp;quot; به اصطلاح ردیه بسیار مزخرفی بر کتاب نوشت که در واقع خاکستر در چشمان شیعه پاشیدن بود تا حقیقت را نبینند! او به شیوه آخوندهای شیعه صفوی تلاش کرده بود با تحریف پرسشهای بی&amp;zwnj;پاسخ امیری، و سر و ته بری آنها ماهیچه&amp;zwnj;های قدرتش را به نمایش گذارد که بجایی نرسیده بود. نویسنده محترم جوابیه&amp;zwnj;ای در رد آن تلاش بی&amp;zwnj;نتیجه شیعه به نام &amp;quot;بن بست&amp;quot; نوشت. و بار دگر شیعه را خلع سلاح نمود.&lt;br /&gt;
کتاب پیشین آقای امیری شهرت جهانی کسب کرده مورد قبول کتابخانه عربی جهان اسلام واقع شده، با عنوان &amp;quot;التحدی السافر&amp;quot; به عربی برگردانده شد. تا از این زبان مشترک جهان اسلام به سایر زبانهای جهانی ترجمه و چاپ شود.&lt;br /&gt;
اینبار آقای امیری دست روی زخم چرکین نهاده می&amp;zwnj;خواهد به اصطلاح نمایندگان امام زمان را ـ به تعبیر خودشان ـ از سوراخ موش بیرون کشد تا به جهانیان نشان دهد که آخوند و مرجع شیعه طبلی توخالی بیش نیست.&lt;br /&gt;
او به این نتیجه رسیده که سخن گفتن با تکفیریهای جاهل شیعه، و خوارج حزب اللهی بی&amp;zwnj;نتیجه است. حالا از مراجع و آخوندهای شیعه می&amp;zwnj;خواهد تنها به 10% ده درصد از 99 سؤال ایشان پاسخی دهند که قابل قبول عقل ومنطق بشری و یا مطابق قرآن کریم باشد. تا ایشان دست غلامی آخوندها بر سینه زده، بار دگر شیعه گردد!&lt;br /&gt;
علی حسین امیری که با یقین و ایمانی راسخ توانسته از زیر بار بردگی آخوندهای سودجو و مذهب فروش خود را بیرون کشد بسیار دلسوزانه به ملت و قوم خویش می&amp;zwnj;اندیشد و در تلاش است آن نور هدایتی که در قلبش تابیده را به سینه&amp;zwnj;های دوستان و خانواده و عزیزانش منتقل کند.&lt;br /&gt;
در مقدمه کتاب (دوباره سرخ آب و سفید آب) می&amp;zwnj;خوانیم:&amp;quot; البته برای خواننده عزیز شیعه که هموطن من است و من از صمیم دل امیدوارم هدایت شود می&amp;zwnj;گویم که اگر در تاریخ به مطالعه&amp;zwnj;ای عمیق بپردازی می&amp;zwnj;فهمی که تفکر حضرت علی علیه السلام و شیعیان نخستین چیزی نبوده جز:&lt;br /&gt;
1-عدالتخواهی.&lt;br /&gt;
2-آزادی اندیشه و بیان&lt;br /&gt;
3-صلح جویی&lt;br /&gt;
4-عرفان&lt;br /&gt;
5-محبت و اتحاد&lt;br /&gt;
6-مبارزه با تندروهای دینی و غالیان.&lt;br /&gt;
و در یک کلام، شیعه چیزی نبوده جز یک حزب سیاسی، معتقد به این نکته که اگر بناست خلیفه&amp;zwnj;ای انتخاب شود بهتر است که آن خلیفه از خاندان پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم باشد. ولی پیام واقعی آخوندهای رافضی مدعی تشیع پس از 1400 سال این شده است:&lt;br /&gt;
1-ترویج خرافات&lt;br /&gt;
2-ساختن دکان مذهب در کنار دین&lt;br /&gt;
3-افسانه&amp;zwnj;های تاریخی&lt;br /&gt;
4-دشمنی و کین&amp;zwnj;توزی با سایر مذاهب&lt;br /&gt;
5-تندروی و غلو&lt;br /&gt;
6-اصل شدن ائمه (که باید پیرو دین باشند) نه در کنار دین بلکه فوق دین!!!.....&amp;quot;.&lt;br /&gt;
شایسته است هر فرد شیعه با خواندن این کتاب محکی به اندیشه&amp;zwnj;ها و افکاری که از نیاکان به ارث برده زند، و عقل خود را قاضی و داور قرار دهد..&lt;br /&gt;
برای داونلود کتاب (دوباره سرخ آب و سفید آب) اینجا را کلیک نمایید.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>دیدار نماینده کتابخانۀ عقیده با علامه تونسوی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/294</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;نماینده ارسالی سایت عقیده به پاکستان امروز جمعه 7 آبان 1389 ش، با حضرت علامه مولانا محمد عبدالستار تونسوی (مدظله العالی) ملاقات نمودند. در این ملاقات که افرادی از مشتاقان شیخ و طلبه علم حضور داشتند، با تقدیم برخی کتابهای علمی به حضرت مولانا از تلاشهای ایشان برای بثمر رساندن نهال توحید در پاکستان تجلیل به عمل آمد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;مولانا محمد عبدالستار تونسوي از فارغ&amp;zwnj;التحصيلان دانشگاه ديوبند اسلامي در سال 1946 ميلادي است که بنابر توصیه استاد بزگوارش حضرت مولانا حسین احمد مدنی بعد از فراغت از تحصیل در دارالعلوم دیوبند، به شهر لکهنو رفت و&amp;nbsp;از محضر امام اهلسنت و الجماعت مولانا عبدالشکور فاروقی لکهنوی کسب فیض نمود و در خدمت امام اهلسنت هند به تحقیق و مطالعه در مورد فرقه ساختگی شیعه پرداخت و در این موضوع به تخصص دست یافت.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;اما باز هم عطش علمی اش سیراب نشد و برای تحقیق بیشتر راهی&amp;nbsp;نجف و كربلا و تهران شد و به تحقیق و مطالعه فرقه شیعه ادامه داد و در دروس علمای بزرگ شیعه شرکت کرد و به كتاب&amp;zwnj;هایی كه در لکهنو دسترسي نداشت، دسترسي حاصل كرد و پس از سالها تحقیق و جستجو و مطالعه به كشورش پاكستان بازگشت. و برای آگاه ساختن مسلمانان از خطر تشیع سازمان اهلسنت پاکستان را تشکیل داد و به پرده کشیدن از چهره واقعی شیعه و اعتقادات پوچ و باطل و چه بسا اندیشه ها و باورهای کفرزای شیعه پرداخت وبا تلاشهای شبانه‫روزیشان تعداد بسیار زیادی از پیروان تشیع، به توحید بازگشته، از افکار و اندیشه ها و باورهای مشرکانه خود دست کشیدند. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;مولانا عبدالستار با تعدد زیادی از علمای بزرگ فرقه شیعه مناظره كرده است. و همیشه مناظرات ایشان حقیقت شیعه و چهره ننگ و سودجویانه علمای آنان را برملا ساخته است، و از این روست که تیغ خون آشام صفویت از دیر زمانی است که در پی به شهادت رساندن ایشان است، ولی به شکرانه حق تا کنون چنین فرصتی را بدست نیاورده‫اند!&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;تشیع پاکستان پس از روی کار آمدن انقلاب خمینی در ایران، خود را زیر چتر رهبریت ایران قرار داده، با تشکیل گروهکهایی مسلحانه چون &amp;quot;سپاه محمد&amp;quot; روش ترور و تصفیه جسدی علمای اهل سنت را اختیار کرده است. و صدها عالم و دانشمند موحد طی سه دهه گذشته توسط این خفاشان خون آشام جام شهادت نوشیده‫اند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;مولانا عبدالستار تونسوی از جمله افرادی است که در لیست سیاه ددان خونخوار قرار گرفته است. ایشان در کنار دهها سخنرانی و مناظره نویسنده برخی رسائل علمی چون: &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ رساله حقیقت ماتم.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ رساله شان صدیق اکبر&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ رساله شان حضرت فاروق اعظم.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ رساله شان عثمان ذی النورین.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ رساله شان حیدر کرار&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ رساله جنازة الرسول (صلی الله علیه وسلم)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ حقیقت فقه جعفریه.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ـ ازالة الشک عن مسئلة فدک.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;می باشند. دو تا از رسالهای ایشان با عناوین &amp;quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;/view/book/544/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;بطلان عقائد شیعه&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&amp;quot;، و &amp;quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;view/book/1001/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;مناظره تاریخی تحریف قرآن نزد شیعه&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&amp;quot; به فارسی برگردانده شده است. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;رساله مناظره ایشان که به فارسی ترجمه شده، حکایت مناظره ای است که در سال 1956 میلادی بوقوع پیوسته است. این مناظره علمی در منطقه سرگانه ملتان صورت گرفت، در این منطقه قوم سرگانه که اکثریت آن مسلمان هستند زندگی می کنند و تعدای از زمین داران این قوم شیعه هستند و به خاطر روابط فامیلی بین اهل سنت و شیعیان احیانا بحث و مناظره صورت می‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;گرفت. برخی از شیعیان متعصب و افراطی از اهل سنت خواستند علمای خود را برای مناظره دعوت دهند و آنان هم علمای خود را دعوت خواهند داد. اهل سنت به پیشنهاد لبیک گفتند. و نمایندگانی از هر دو گروه همراه با سید گلاب شاه از علمای شیعه ساکن ملتان به خدمت مولانا محمد علی جالندهری دبیر کل مجلس تحفظ ختم نبوت آمده و از ایشان تقاضا کردند یکی از علمای اهلسنت را برای مناظره با علمای شیعه اعزام نمایند و با پذیرفتن مولانا محمدعلی شرائط مناظره تصویب شده و دو ماه پس از آن در تاریخ 13 اکتبر 1956 میلادی علمای فریقین در منطقه سرگانه حاضر شده و تا سه روز مناظره بین فریقین در سه موضوع برگزار شد. و در نهایت مناظره در حالیکه بسیاری از شیعیان منطقه به مذهب اهل سنت و جماعت گرویده، از شرکیات و بدعات و خرافات خود دست کشیدند پایان یافت. در این مناظره اسامی زیر از سوی اهل سنتشرکت داشتند: &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: right; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;مناظر: مولانا عبدالستار تونسوی&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;مدیر: مولانا الله یارخان&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;معاون&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;علامه سید احمد شاه بخاری&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;مولانا محمد علی جالندهری و مولانا لال حسین هم در این جلسه حضور داشتند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;سرپرست: حاجی مهر شوق محمد سرگانه&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;&amp;nbsp;و از سوی اهل تشیع:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;مناظر&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;شیخ علامه محمد اسماعیل رئیس دارالتبلیغ گوجره&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;مدیر: شیخ امیر محمد قریشی&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;معاون: سید ضمیر الحسن، سید گلاب شاه ملتانی، شیخ مشتاق احمد، شیخ سیف الله جعفری، شیخ غلام محمد محمودی&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;سرپرست: حق نواز سرگانه&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;و موضوع مناظره&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;: تحریف قرآن نزد فرقه شیعه&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;در این مناظره مولانا تونسوی با صراحت اعلام داشت که:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;من در این مناظره با جرات کامل اعلام می کنم تمام علمای شیعه تا قیامت نمی توانند یک روایت صحیح از امامان معصوم ارائه دهند که آن روایت با صراحت بر عدم تحریف قرآن دلالت کند.&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;این مناظره تاریخی با استدلالهای غیر قابل انکار ثابت ساخت مصادر و کتابهای شیعه قرآن؛ کلام پاک خداوند را تحریف شده می‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;دانند، و پیروان نا آگاه شیعه که کورکورانه از آخوندهای مکار صفویت پیروی می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;کنند، نا دانسته خود را طعمه گمراهی ساخته&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black&quot;&gt;‫اند. پس از این مناظره تعداد بسیار زیادی از شیعیانی که در جلسات مناظره ها شرکت داشتند، به مذهب اهل سنت؛ مذهب توحید و قرآن وسنت پیامبر اکرم (صلی الله علیه وسلم ) گرویدند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>مکۀ مکرمة؛ تاریخ و خاطره</title>
<link>http://qalamlib.com/news/293</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مکۀ مکرمة؛ تاریخ و خاطره&lt;br /&gt;
ستایش از آن الله است. از آن پروردگاری که شعائر اسلام را والا داشته و آن را برای بندگان خود واضح و روشن گرداند... او که میان ماه&amp;zwnj;ها و روزها برتری قرار داد و حج را رکنی از ارکان این دین بزرگ گرداند...&lt;br /&gt;
وی را سپاس می&amp;zwnj;گویم ـ که او پاک و منزه است ـ و شکرش را به جای می&amp;zwnj;آورم و عفو زیبایش را می&amp;zwnj;خواهم و برای گناهان و معاصی از او آمرزش می&amp;zwnj;خواهم و از وی هدایت و توفیق و داخل شدن در زمرۀ کسانی را می&amp;zwnj;خواهم که &amp;laquo;گفتند پروردگار ما الله است سپس استقامت ورزیدند&amp;raquo;...&lt;br /&gt;
اما بعد:&lt;br /&gt;
{ یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَلْتَنظُرْ نَفْسٌ مَّا قَدَّمَتْ لِغَدٍ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ خَبِیرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ} [حشر: 18](اى كسانى كه ایمان آورده&amp;rlm;اید از الله پروا دارید و هر كسى باید بنگرد كه براى فردا[ى خود] از پیش چه فرستاده است و [باز] الله خدا بترسید در حقیقت&amp;rlm;الله به آنچه مى&amp;rlm;كنید آگاه است)&lt;br /&gt;
{ وَاعْلَمُواْ أَنَّ اللّهَ یَعْلَمُ مَا فِی أَنفُسِكُمْ فَاحْذَرُوهُ } [بقره: 235](و بدانید كه الله آنچه را در دل دارید مى&amp;rlm;داند پس از [مخالفت] او بترسید)&lt;br /&gt;
اوقات خود را حفظ نمایید که این اوقات با قیمت قابل سنجش نیستند و و کارها را با ترازوی شرع بسنجید و نیت&amp;zwnj;ها و اهداف خود را درست گردانید و با اخلاص فضیلت این اعمال را به دست آورید و جهان غیب را در حال پنهان و آشکار به یاد داشته باشید که چه خوب است مراقبت نفس و چه باارزش است!&lt;br /&gt;
روزهای باارزش خود را پیش از از دست رفتن آن غنیمت شمارید، این روزهایی که خداوند آن&amp;zwnj;ها را شرف و فضیلت داده است.&lt;br /&gt;
ای مسلمانان: در این روزهای مبارک، مکه به استقبال جمع حاجیان می&amp;zwnj;رود و مسجد الحرام مهمانان خداوند را در آغوش می&amp;zwnj;گیرد. حاجیانی که از هر بلندی و پستی و از هر دور و نزدیک آمده&amp;zwnj;اند تا ندای پروردگار را لبیک گویند و تا دستور خلیل وی (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) را اجابت کنند:&lt;br /&gt;
{ وَأَذِّن فِی النَّاسِ بِالْحَجِّ یَأْتُوكَ رِجَالاً وَعَلَى كُلِّ ضَامِرٍ یَأْتِینَ مِن كُلِّ فَجٍّ عَمِیقٍ ( 27) لِیَشْهَدُوا مَنَافِعَ لَهُمْ } [حج: 27-28]&lt;br /&gt;
(و در میان مردم براى حج بانگ برآور تا [زایران] پیاده و [سوار] بر هر شتر لاغرى كه از هر راه دورى مى&amp;rlm;آیند به سوى تو روى آورند (27) تا شاهد منافع خویش باشند)&lt;br /&gt;
حاجیان مشتاقانه و آرزمندانه می&amp;zwnj;آیند... در حالی که در مسیر خود بسوی بیت الله می&amp;zwnj;روند، شادی آنان را در برگرفته و امید بخشیده شدن گناهان و دستیابی به بهشت&amp;zwnj;های خداوندی را دارند رکن پنجم از ارکان دینشان را در مقدس&amp;zwnj;ترین نقطۀ روی زمین به انجام می&amp;zwnj;رساند.&lt;br /&gt;
این است مکۀ مکرمه، تاریخ و خاطرات...&lt;br /&gt;
{ إِنَّ أَوَّلَ بَیْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِی بِبَكَّةَ مُبَارَكاً وَهُدًى لِّلْعَالَمِینَ (96) فِیهِ آیَاتٌ بَیِّـنَاتٌ مَّقَامُ إِبْرَاهِیمَ وَمَن دَخَلَهُ كَانَ آمِناً } [آل عمران: 96-97]&lt;br /&gt;
(در حقیقت نخستین خانه&amp;rlm;اى كه براى [عبادت] مردم نهاده شده همان است كه در مكه است و مبارک و براى جهانیان [مایۀ] هدایت است (96) در آن نشانه&amp;rlm;هایى روشن است [از جمله] مقام ابراهیم، و هر كه در آن درآید در امان است)&lt;br /&gt;
پیامبران به سوی این خانه حج کرده&amp;zwnj;اند و امام حنفا (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) در آن نماز گزارده است... از مکه نور هدایت تابیدن گرفت و رسالت توحید آغاز گردید تا آنکه همۀ زمین را در برگرفت و جهان را تغییر داد و زیباترین و بزرگترین تمدنی را که جهان شناخت پایه گذارد...&lt;br /&gt;
مکه مرکز جهان و سمبل وحدت مسلمانان و منبع نور است برای جهانیان... بهترین سرزمین&amp;zwnj;هاست نزد خداوند و محبوبترین آن&amp;zwnj;هاست نزد رسول خدا ـ صلی الله علیه وسلم ـ&lt;br /&gt;
این مکه است (مادر شهرها) که زادگاه بهترین انسان&amp;zwnj;هاست... پیامبر ما بر خاک آن رشد یافت و بر زمین آن راه رفت... مکه در عرض نیم قرن زندگی پیامبر خدا (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) را بر خاک خود مشاهده کرد. چه شرفی بالاتر از این شرف است؟ اگر این خاک سخت می&amp;zwnj;گفت چه سیرتی را بیان می&amp;zwnj;کرد و چه تاریخی را بر می&amp;zwnj;شمرد؟!&lt;br /&gt;
در این سرزمین جبرئیل امین ـ علیه السلام ـ با وحی نازل شد و در این سرزمین رسول خدا (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) کلمۀ توحید را بر کوه صفا فریاد زد...&lt;br /&gt;
اگر کعبه لب می&amp;zwnj;گشود و اگر زمزم و مقام ابراهیم سخن می&amp;zwnj;گفتند چنین بیان می&amp;zwnj;کردند که روزی اینجا ابوبکر بود و عمر بود، عثمان بود و علی بود و دیگر اصحاب بودند... آنان که دنیا را نورانی کردند و زمین را پاک ساختند... و در اینجا بود که توحید با بت پرستی به نبرد پرداخت تا آنکه خداوند دین خود را پیروز ساخت...&lt;br /&gt;
اینجا بود که پیامبر (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) در برابر کعبه ایستاد تا آنکه مبادی این دین را بیان نماید و تا آنکه مترقی&amp;zwnj;ترین برنامۀ انسانی را طرح بریزد... طرحی که همۀ تمدن&amp;zwnj;ها تاکنون از ترسیم آن ناتوان مانده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
حجاج بیت الله الحرام: رسیدن شما به این خانۀ محترم خداوند مبارک باد... این شعائر و این احساس بر شما مبارک باد... بر شما مبارک باد این زمان شریف و این مکان شریف و این اعمال بس عظیم... خداوند را برای این نعمت&amp;zwnj;های حمد و شکر گوید که او اعلام نموده برای شاکران افزون خواهد داد.&lt;br /&gt;
خوش آمدید... شما مهمان خداوندید که گرامی&amp;zwnj;داشت و احترامش واجب است...&lt;br /&gt;
خداوند حجتان را آسان گرداند و شما را از هر گزندی محفوظ بدارد و حجتان را مبرور و تلاشتان را مشکور سازد و از ما و شما اعمالمان را بپذیرد.&lt;br /&gt;
ای مسلمانان: قصد نمودن این سرزمین پاک باعث پاک شدن گناهان و از بین رفتن آنان میشود و بلکه بالاتر از این، حج مبرور پاداشی ندارد به جز بهشت... و این سخن پیامبرتان (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) است.&lt;br /&gt;
چه اندازه درون&amp;zwnj;ها برای مکه مشتاق شده و چقدر قلب&amp;zwnj;ها برای آن بی&amp;zwnj;تاب گشته اند... و چه انسان&amp;zwnj;هایی که در شوق و سوز آن گریسته&amp;zwnj;اند... چه انسان&amp;zwnj;ها که حسرت دیدن &amp;laquo;وادی محسر&amp;raquo; را دارند... آرزو دارند شبی در منا بمانند و ساعتی در عرفه توقف کنند یا در شب مزدلفه شریک باشند و در ازدحام جمرات حضور داشته باشند... یا آنکه طواف خانه کنند و اشک بریزند...&lt;br /&gt;
و همچنان موکب حجاج از هر راه دور و نزدیک سرازیر است...&lt;br /&gt;
چه زیباست صدای لبیک که بر هواپیماها در آسمان و در کشتی&amp;zwnj;ها در دریا و در اتوموبیل&amp;zwnj;ها در جاده&amp;zwnj;ها به گوش می&amp;zwnj;رسد...&lt;br /&gt;
لبیک اللهم لبیک... لبیک لا شریک لک لبیک... إن الحمد و النعمة لک والملک... لا شریک لک.&lt;br /&gt;
مقصد یگانه و هدفی یگانه... این قافله&amp;zwnj;های ایمان است... این سفر زندگی است که به جایی که دل&amp;zwnj;ها بدان گرایش دارند... بسوی سمبل اسلام و قبلۀ مسلمانان.&lt;br /&gt;
ای حجاج بیت الله الحرام... منزلت حج نزد خداوند متعال بس بزرگ است و این شعیره در دین جایگانی عظیم دارد... خداوند این شعیره را با این سخن خود واجب گردانده است که:&lt;br /&gt;
{ وَلِلّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَیْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَیْهِ سَبِیلاً وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ الله غَنِیٌّ عَنِ الْعَالَمِینَ} [آل عمران: 97]&lt;br /&gt;
(و براى الله حج آن خانه بر عهده مردم است كسى كه بتواند به سوى آن راه یابد و هر كه كفر ورزد یقینا الله از جهانیان بى&amp;rlm;نیاز است)&lt;br /&gt;
اما در مورد فضل آن ابوهریره رضی الله عنه روایت کرده است که رسول الله (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;عمره تا عمره کفاره ای است برای بین آن دو و حج مبرور پاداشی ندارد جز بهشت&amp;raquo; [به روایت بخاری و مسلم]&lt;br /&gt;
همچنین در صحیح آمده است که از رسول خداوند (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) پرسیده شد: کدام یک از اعمال بهتر است؟ ایشان فرمودند: &amp;laquo;ایمان به خداوند عزوجل&amp;raquo; سپس پرسیدند: پس از آن چه؟ ایشان فرمود: &amp;laquo;جهاد در راه خداوند&amp;raquo; باز پرسیده شد: سپس چه عملی؟ فرمود: &amp;laquo;حج مبرور&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
حج مبرور تجارت دنیا&amp;nbsp;&amp;nbsp;آخرت و پیروزی در هر دوی آنها است.&lt;br /&gt;
از ابن مسعود رضی الله عنه روایت است که گفت: رسول الله (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;حج و عمره را در پی هم انجام دهید که آن دو فقر را از بین می&amp;zwnj;برند و گناهان را چنان پاک می&amp;zwnj;کنند که آتش ناپاکی آهن را پاک می&amp;zwnj;سازد&amp;raquo; [به روایت احمد و ترمذی با سند صحیح]&lt;br /&gt;
و در صحیحین آمده است که رسول الله (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) فرمودند: &amp;laquo;هر که حج این خانه را به جای آورد و بد دهانی و گناه نکرد به مانند روزی که مادرش او را به دنیا آورد بر خواهد گشت&amp;raquo; یعنی به مانند روز تولد از گناهان پاک خواهد شد... این به همراه چند برابر شدند حسنات و بالا رفتن درجات است.&lt;br /&gt;
از جابر رضی الله عنه از رسول الله (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) روایت است که ایشان فرمودند: &amp;laquo;نماز در این مسجد من بافضیلت&amp;zwnj;تر است از هزار نماز در دیگر مساجد مگر مسجد الحرام، و نماز در مسجد الحرام صد هزار بار بافضیلت&amp;zwnj;تر است از نماز در دیگر مساجد&amp;raquo; [به روایت احمد و ابن ماجه با سند صحیح و اصل این حدیث در صحیح است]&lt;br /&gt;
این یعنی نماز در مسجد الجرام به اندازۀ نماز 54 سال ارزش دارد.&lt;br /&gt;
آیا پس از این کسی برای اینکه دلش هوای حرم کرده است ملامت خواهد شد؟ این جدای از مواقف رحمت در عرفات و مشعر الحرام و منی و طواف خانۀ خدا و سعی بین صفا و مروه و رمی جمرات است، که همۀ این&amp;zwnj;ها از مواقف رحمت و اجابت دعایند.&lt;br /&gt;
اما عرفات... و تو چه می&amp;zwnj;دانی که عرفات چیست! رسول الله (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;هیچ روزی نیست که خداوند در آن بیشتر از روز عرفات بندگانی را از آتش نجات داده باشد و او در عرفات [به بندگانش] نزدیک می&amp;zwnj;شود سپس بخاطر آنان بر ملائکه&amp;zwnj;اش فخر مباهات می&amp;zwnj;کند و می&amp;zwnj;گوید: اینها چه می&amp;zwnj;خواهند؟&amp;raquo; [به روایت مسلم]&lt;br /&gt;
آن&amp;zwnj;ها رحمت پروردگار و بهشت او را می&amp;zwnj;خواهند... آنها مغفرت گناهانشان و آزادی از آتش را می&amp;zwnj;خواهند... آنان از حاهای دور دنیا آمده&amp;zwnj;اند... خانواده و سرزمین خود را ترک گفته&amp;zwnj;اند&amp;nbsp;&amp;nbsp;و هر چه را توانسته&amp;zwnj;اند خرج کرده&amp;zwnj;اند تا به به این مکان&amp;zwnj;ها شریفه برسند...&lt;br /&gt;
آن هم در زمانه&amp;zwnj;ای که می&amp;zwnj;بینی برخی از ثروتمندان از ادای این فریضه تنبلی می&amp;zwnj;کنند و پول و وقت خود را در راه سفر و تفریح و خوشگذرانی و غفلت هدر می&amp;zwnj;دهند و حتی یک بار هم به حج نرفته&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
این&amp;zwnj;ها بدانند که رکنی از ارکان اسلام را ترک گفته&amp;zwnj;اند... عمر بن خطاب رضی الله می&amp;zwnj;گوید: هر که وضع مالی خوبی داشت و حج را به جای نیاورد و مرد، اگر خواست به مانند یهودیان و مسیحیان بمیرد.&amp;raquo; و به مانند این سخن از علی بن ابی&amp;zwnj;اطلب رضی الله عنه نیز روایت شده است.&lt;br /&gt;
پس باید که شخص توانگر تقوای خداوند را پیشه ساخته و پیش از از دست دادن فرصت دست به کار شود و اگر ناتوانی یا مرگ او را غافلگیر ساخت آنگاه عذر آوردن برای او سودی نخواهد داشت.&lt;br /&gt;
أعوذ بالله من الشیطان الرجیم:&lt;br /&gt;
{ وَلِلّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَیْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَیْهِ سَبِیلاً وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ الله غَنِیٌّ عَنِ الْعَالَمِینَ } [آل عمران: 97]&lt;br /&gt;
(و براى الله حج آن خانه بر عهده مردم است [البته بر] كسى كه بتواند به سوى آن راه یابد و هر كه كفر ورزد یقینا الله از جهانیان بى&amp;rlm;نیاز است)&lt;br /&gt;
خداوند ما و شما را به واسطۀ کتابش و سنت پیامبرش، برکت و سود رساند، و برای خود و شما از خداوند متعال مغفرت می&amp;zwnj;خواهم.&lt;br /&gt;
ای مومنان... ای حجاج خانۀ خدا. اکنون که خداوند شما را به خانه&amp;zwnj;اش رسانده است شعائر او را پاس دارید تا تقوا و ایمانتان افزون گردد:&lt;br /&gt;
{ ذَلِكَ وَمَن یُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِن تَقْوَى الْقُلُوبِ } [حج: 32]&lt;br /&gt;
(این است [فرایض خدا] و هر كس شعایر الله را بزرگ دارد در حقیقت آن از تقوای دلهاست)&lt;br /&gt;
از پاسداشت شعائر خداوندی این است که: عمل را به نیکی انجاکم داده و بر کامل انجام دادن آن حریص بوده و از روش رسول خدا (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) پیروی نماییم. ایشان می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;مناسکتان را از من فراگیرید&amp;raquo;&lt;br /&gt;
همچنانکه پی گرفتن رخصت&amp;zwnj;ها و سهل انگاری در انجام مناسک، زیان است و نقص.. خداوند متعال می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
{ وَأَتِمُّواْ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلّهِ } [بقره: 196]&lt;br /&gt;
(و براى الله حج و عمره را به پایان رسانید)&lt;br /&gt;
همچنین دوری از آنچه باعث نقصان در حج و عمره می&amp;zwnj;شود و استفاده از زمان و مکانی که خداوند آن را بزرگ داشته است، ازجملۀ بزرگداشت شعائر الهی است.&lt;br /&gt;
همچنین دوری کردن از بحث و جدل و صر و صدا، زیرا قبولی حج و مغفرت گناهان، وابسته به ترک این کارها است. خداوند متعال می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
{ الْحَجُّ أَشْهُرٌ مَّعْلُومَاتٌ فَمَن فَرَضَ فِیهِنَّ الْحَجَّ فَلاَ رَفَثَ وَلاَ فُسُوقَ وَلاَ جِدَالَ فِی الْحَجِّ } [بقره: 197]&lt;br /&gt;
(حج در ماههاى معینى است پس هر كس در این [ماه]ها حج را [برخود] واجب گرداند [بداند كه] در اثناى حج همبسترى و گناه و جدال [روا] نیست)&lt;br /&gt;
پیش از این سخن رسول الله (صلی الله علیه وعلی آله وسلم) گذشت، آنجا که می&amp;zwnj;فرماید: &amp;laquo;هر که حج کند و سخن ناروا نگفته و گناه نورزد به مانند روزی که مادرش وی را به دنیا آورد باز خواهد گشت&amp;raquo;&lt;br /&gt;
پاکسازی درون و ازدیاد ایمان و به دست آوردن تقوا آنگاه خواهد بود که مسلمان با ادب و خشوع به عبادت پروردگارش روی آورد...&lt;br /&gt;
چنانکه لازم است پیش از آغاز کارهای حج دربارۀ احکام شرعی آن پرسش شود. چه بسا حاجیانی که بر اساس نادانی به عبادت خداوند می&amp;zwnj;پردازند و نه سوال می&amp;zwnj;کنند و نه فرا می&amp;zwnj;گیرند و چه بسا افرادی که اگر پیش از کار سوال کرده بودند در مشکل واقع نمی&amp;zwnj;شدند...&lt;br /&gt;
همچنین بر دوش مسئولان و دست اندر کاران مسئولیتی بس بزرگ نهاده شده و باید در این باره تقوای خداوند را در پیش گیرند زیرا همه مسئولند و همه در مورد افراد تحت مسئولیت خود مورد سوال قرار خواهند گرفت.&lt;br /&gt;
ای مومنان: همانا اصلی که این خانه بر آن بنا شده است توحید پروردگار جهانیان است. او که در کتابش فرموده است:&lt;br /&gt;
{ وَإِذْ بَوَّأْنَا لِإِبْرَاهِیمَ مَكَانَ الْبَیْتِ أَن لَّا تُشْرِكْ بِی شَیْئاً } [حج: 26]&lt;br /&gt;
(و چون براى ابراهیم جاى خانه را معین كردیم [بدو گفتیم] چیزى را با من شریک مگردان)&lt;br /&gt;
و خداوند در خلال آیات خح چنین می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
{ فَاجْتَنِبُوا الرِّجْسَ مِنَ الْأَوْثَانِ وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ (30)حُنَفَاء لِلَّهِ غَیْرَ مُشْرِكِینَ بِهِ } [حج: 30-31]&lt;br /&gt;
(پس از پلیدى بتها دورى كنید و از گفتار باطل اجتناب ورزید (30) در حالى كه گروندگان خالص به الله باشید نه شریک &amp;rlm;گیرندگان [براى] او)&lt;br /&gt;
پس اعمال خود را پاک سازید و در همۀ کارهای شرعی&amp;zwnj;تان و در همۀ زندگی به سنت پایبند باشید زیرا شرک، اعمل انسان را باطل می&amp;zwnj;سازد و همیشه پایبند به یاد خداوند باشید این ویژگی بارز حج است و این اعلام توحید است و سمبل حج... خداوند متعال می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
{ وَاذْكُرُواْ اللّهَ فِی أَیَّامٍ مَّعْدُودَاتٍ } [بقره: 203]&lt;br /&gt;
(و الله را در روزهایى معین یاد كنید)&lt;br /&gt;
و می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
{ فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُواْ اللّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ } [بقره: 198]&lt;br /&gt;
(پس چون از عرفات كوچ نمودید الله را در مشعر الحرام یاد كنید)&lt;br /&gt;
و همچنین می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
{ فَإِذَا قَضَیْتُم مَّنَاسِكَكُمْ فَاذْكُرُواْ اللّهَ } [بقره: 200]&lt;br /&gt;
(و چون آداب ویژه حج&amp;rlm; خود را به جاى آوردید الله را یاد کنید)&lt;br /&gt;
و باز می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
{ لِیَشْهَدُوا مَنَافِعَ لَهُمْ وَیَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ فِی أَیَّامٍ مَّعْلُومَاتٍ } [حج: 28]&lt;br /&gt;
(تا شاهد منافع خویش باشند و نام الله را در روزهاى معلومى به یاد آورند)&lt;br /&gt;
و در پایان درود و سلام فرستید بر بهترین انسان&amp;zwnj;ها و پاک&amp;zwnj;ترین آنان، رسول خداوند&amp;nbsp;&amp;nbsp;محمد بن عبدالله...&lt;br /&gt;
خداوندا درود و سلام و برکت فرست بر بنده و پیامبرت محمد و بر اهل بیت پاکش و بر صحابۀ نیکوکارش. خداوندا راضی و خشنود باش از امامان هدایتگر، خلفای راشدین، ـ ابوبکر و عمر و عثمان و علی ـ و از دیگر صحابۀ پیامبرت و از همۀ کسانی که بر روش آنان رفته و از سنت آنان پیروی نموده&amp;zwnj;اند. ای پروردگار جهانیان.&lt;br /&gt;
خداوندا حجاج و معتمرین را حفظ نما و نسک آنان را آسان گردان و حجشان را کامل نما و از ما و آنان بپذیر ای پروردگار جهانیان.&lt;br /&gt;
خداوندا اسلام و مسلمانان را عزت ده و شرک و مشرکان را خوار بگردان و این سرزمین و دیگر سرزمین&amp;zwnj;های مسلمان را در امن و امان بدار. خداوندا هر که را برای ما و دین ما ارادۀ بد دارد به خود مشغول ساز و مکر او را در نابودی وی قرار ده.&lt;br /&gt;
خداوندا ما را در سرزمین&amp;zwnj;های ما ایمن بدار و مسئولان و والیان امر ما را اصلاح نما.&lt;br /&gt;
خداوندا گرانی و وبا و ربا و زنا و زلزله&amp;zwnj;ها و سختی&amp;zwnj;ها و فتنه&amp;zwnj;های بد آشکار و پنهان را از ما دور بدار.&lt;br /&gt;
خداوندا اوضاع مسلمانان را اصلاح نما خداوندا اوضاع مسلمانان را در هر جای جهان اصلاح نما. خداوندا آنان را بر حق و هدایت و کتاب و سنت جمع گردان. خداوندا جان آنان را حفظ نما و آنان را در سرزمینشان در امان بدار و زندگی آنان را آسان نما و اوضاع آنان را نیک گردان و دشمانشان را نابود ساز.&lt;br /&gt;
خدایا مستضعفان را در هر مکانی یاری ده. خدایا آنان را در فلسطین یاری ده. خداوندا مجاهدان را در بیت المقدس یاری ده. خدایا آنان را بر حق جمع گردان.&lt;br /&gt;
خداوندا، دینت را و کتابت را و سنت پیامبرت و بندگان مومنت را یاری ده.&lt;br /&gt;
خداوندا مسجد الاقصی و همۀ آن سرزمین مقدس را از تجاوز متجاوزان ناپاک، پاک گردان. خداوندا ای زندۀ پایدار، ای زندۀ پایدار، ای زندۀ پایدار، پناه تو محکم است و ثنای تو جلیل، ای آنکه لشکرش شکست نمی&amp;zwnj;پذیرد و وعده&amp;zwnj;اش خلاف نمی&amp;zwnj;شود. تو پاک و منزهی...&lt;br /&gt;
خداوندا شب ستمگران به طول انجامید... خداوندا صهیونیست&amp;zwnj;ها در طغیان و تجاوز زیاده&amp;zwnj;روی نمودند... خداوندا دستی از حق برای آنان مهیا ساز تا قدرت آنان را بشکند و آنان را نابود سازد. خداوندا عذاب خود را بر آنان نازل ساز.&lt;br /&gt;
پروردگارا ما را در دنیا و آخرت نیکی عطا کن و از آتش دوزخ دور بدار. خداوندا گناهان ما را بیامرز و عیب&amp;zwnj;های ما را بپوشان و کارهای ما را آسان گردان و ما را به آنچه رضایت تو در آن است برسان.&lt;br /&gt;
خداوندا تو را برای رحمتت و بارانت شکر می&amp;zwnj;گوییم. خداوندا ما باز از فضلت مسالت داریم. خداوندا از رحمت تو بی&amp;zwnj;نیاز نیستیم... پروردگارا خیر و رحمت را بر دیگر سرزمین&amp;zwnj;های ما نیز فراگیر گردان.&lt;br /&gt;
خداوندا تویی آن خدایی که معبودی به حق جز تو نیست. تویی بی&amp;zwnj;نیاز و ما نیازمندیم.... باران را بر ما نازل نما و مار از از مایوسان مگردان.خداوندا بندگان و سرزمین&amp;zwnj;ها در نیاز و حاجتی هستند که جز تو کسی توانایی رفع آن را ندارد. خداوندا ما را عطا نما و محروممان نگردان و ما افزون ده و از ما کم ننما.&lt;br /&gt;
بندگان خداوند:{إِنَّ اللّهَ یَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالإِحْسَانِ وَإِیتَاء ذِی الْقُرْبَى وَیَنْهَى عَنِ الْفَحْشَاء وَالْمُنكَرِ وَالْبَغْیِ یَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ (90) وَأَوْفُواْ بِعَهْدِ اللّهِ إِذَا عَاهَدتُّمْ وَلاَ تَنقُضُواْ الأَیْمَانَ بَعْدَ تَوْكِیدِهَا وَقَدْ جَعَلْتُمُ اللّهَ عَلَیْكُمْ كَفِیلاً إِنَّ اللّهَ یَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ} [نحل: 90-91]&lt;br /&gt;
(در حقیقت&amp;rlm; الله به دادگرى و نیكوكارى و بخشش به خویشاوندان فرمان مى&amp;rlm;دهد و از كار زشت و ناپسند و ستم باز مى&amp;rlm;دارد به شما اندرز مى&amp;rlm;دهد باشد كه پند گیرید (90) و چون با الله پیمان بستید به پیمان خود وفا كنید و سوگندهاى [خود را] پس از استوار كردن آنها مشكنید با اینكه الله را بر خود ضامن [و گواه] قرار داده&amp;rlm;اید زیرا الله آنچه را انجام مى&amp;rlm;دهید مى&amp;rlm;داند)&lt;br /&gt;
برگرفته شده از خطبه حرم مکی&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مدرسۀ حج وعمره</title>
<link>http://qalamlib.com/news/292</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-justify: kashida; text-align: justify; line-height: 200%; text-kashida: 0%&quot;&gt;یکی از ستونهای سترگ دین اسلام فریضه حج است. نمادی از شکر گزاری پروردگاری که به ما ثروتی ارزانی داشته، وما را از مرحله پست ناداری به درجه ای از بی نیازی بالا برده که می توانیم روی خودمان اعتماد کنیم. در این مرحله از توان مادی، خداوند متعال عبادت حج را بر مسلمان فرض قرار می دهد.&lt;br /&gt;
مسلمانی که از توان اقتصادی پایینی برخوردار است موظف است در راه بدست آوردن ثروت از راه حلال تلاش نماید تا بتواند به درجه ای برسد که توان برگزاری عبادت حج را بدست آورد.&lt;br /&gt;
واین خود نشانه ای است از اینکه اسلام فقر وناداری را نمی پسندد، وهمواره با آن در جنگ وستیز است، چرا که فقر در واقع برادر کفر است. ودر چهار سوی دنیا می بینیم که مذاهب فاسد وحرکتهای دروغین از فقر وناداری ملتها سوء استفاده کرده آنها را به گمراهی می کشانند!..&lt;br /&gt;
البته عبادت حج چون یک فریضه جهانی ومشترک مسلمانان همه دنیاست، از سوی مسئولین برنامه حج مقررات وضوابطی گذاشته شده تا مسلمانان بتوانند به نحو احسن این فریضه الهی را بجای آورند. این مقررات در جای خود باعث شده یک مسلمان در کشور خودش یک جمله کارهای اداری را پیش ببرد وچند سالی را نیز در صف رسیدن نوبتش سپری کند. در مواردی نیز مجبور است مبلغ ثبت نام برای حج را در بانکهای ربوی گرو بگذارد. این نقطه جای دارد از سوی علماء واندیشمندان وفقیهان مسلمان مورد بحث وبررسی قرار گیرد.&lt;br /&gt;
برخی از مردم برای فرار از مشکلات اداری وانتظاری که سر راه حج است، به یک بار عمره ویا چند بار عمره رفتن اکتفا می کنند. وآنرا اخیرا در کشور ما &amp;quot;حج عمره&amp;quot; نام نهاده اند!&lt;br /&gt;
که این خود یک نوع تحریف واقعیت وسوء تفاهمی است که باید رفع شود. حج یک فریضه الهی است که در هنگام فرض شدن حکمش چون نماز وروزه است، و با هیچ سنت ونوافلی نمی توان آنرا خنثی کرد! در حالیکه عمره یک سنت نبوی است.&lt;br /&gt;
آیا می توان بجای ادای دو رکعت نماز فرض صبح، صد رکعت نماز نوافل بجای آورد؟! هرگز! نماز نوافل ویا عمره بدون شک اجر وپاداش خودش را دارد اما هرگز باعث بر طرف شدن فرضیت حج از مسلمان نمی شود.&lt;br /&gt;
پس اشخاصی که دهها بار به عمره رفته اند وتا کنون فکر حج رفتن را ندارند می بایستی این سوء تفاهم را در خود اصلاح نمایند!..&lt;br /&gt;
برادر وخواهر حاجی؛ حالا که فرصت رفتن به بیت الله را بدست آورده ای لازم است به برخی از درسهایی که از حج می توان گرفت اشاره کنم:&lt;br /&gt;
1.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;حج وعمره تان را فقط وفقط برای&amp;nbsp;الله بجای آورید.&lt;br /&gt;
همیشه نیت وهدف در دین الله سبحانه و تعالی عمده واساس هر کاری است. یعنی اینکه میزان اجر وپاداش شما در هر کاری به نیتها وهدفهایتان از انجام آن ارتباط مستقیم دارد. و الله متعال از ما خواسته است حج وعمره را تنها وتنها برای او بجای آوریم. &amp;quot;وأتموا الحج والعمرة لله&amp;quot;. یعنی اینکه هدفمان از ادای این عبادت تنها رضایت الهی باشد، نه کسب شهرت ونام ونشان &amp;quot;حاجی بودن&amp;quot;! ودر این راستا تنها وتنها آن حرکات وعباداتی را انجام دهیم که مورد رضایت الهی واقع شود.&lt;br /&gt;
2.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;چون عبادت حج از ما مال وثروت مناسبی را می طلبد. ما در مدرسه حج درس انفاق وبخشش وکرم می آموزیم.&lt;br /&gt;
3.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;یک مسلمان در آن جمع با شکوه حج خودش را چون مرده ای می یابد که از قبر دنیا بر انگیخته شده است، والآن پیش پروردگارش آمده تا جوابگوی آنچه کرده است باشد. اینجاست که بایستی به خود آید وفکر وذهنش را از همه ی دنیا ببرد وتنها وتنها گریان وپشیمان از آنچه کرده دروازه رحمت الهی را بکوبد. واز او ـ وتنها ـ او رحمت ومغفرت طلبیده، رضایت وخشنودی تنها او را بخواهد.&lt;br /&gt;
عبادت حج در لباس احرام یک مسلمان را با صحنه ای از روز محشر آشنا می سازد. گویی او را برای آنروز آماده می سازد. وخوشا بحال آن مسلمانی که این درس را دریافته، در روزهای بعدی زندگیش همیشه روز محشر را در جلوی چشمان خود دارد!&lt;br /&gt;
نقطه دیگر اینکه لباس احرام چون کفن هیچ جیبی ندارد! واین درسی است دیگر؛ گویا همانطور که کفن به یک مرده می گوید؛ از دنیا هیچ نمی توانی با خود ببری، لباس احرام به مؤمن می رساند؛ که ای مسلمان دنیا برای اندوختن نیست، برای عمران وسازندگی آخرتت است. دنیا مزرعه ایست برای آخرت نه انباری برای موشهای موذی ویا آیندگان...&lt;br /&gt;
4.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;در عبادت حج یک مؤمن کار وزندگی، پدر ومادر، فرزندان وبرادران وخواهران وخویشان ودوستانش را در کشور خود رها نموده، به سوی بیت الله می رود. در این راه سختیها، بی خوابیها، گرسنگیها، تشنگیها، احساس غربت ودوری و... را تنها برای رسیدن به رضایت الهی تحمل می کند. واین خود درسی است از هجرت. اینجاست که یک حاجی بایستی وقتی مکه، غار حرا، غار ثور، مدینه وسایر اماکن سرزمین رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم را مشاهده می کند بایستی رسول الله و یاران او و جهاد و تلاش و زحمات بیدریغ آنان را جلوی چشمانش مجسم کند، واز ته دل محبت و دوستی آنها را صدا بزند، و از ته قلب با آنها عهد وپیمان ببندد که همواره بر راه آنان ثابت قدم بماند. اینجاست که شایسته هر حاجی است قبل از رفتن به حج حداقل یکبار زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم را مفصلا مطالعه کند.&lt;br /&gt;
5.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سختیهای حج درس جهاد و تلاش وزحمت وجان کندن را به مسلمان می آموزد. به او می گوید که تو را برای تنبلی و تن پروری نیافریده اند. تو مسلمانی ومسلمان بودن یعنی تلاش وزحمت، یعنی حرکت وکوشش.&lt;br /&gt;
شایسته است این سختیها در ذهن مسلمان خاطره ی سختیهایی که پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;ویاران او در صحنه های پر خون جهاد برای رساندن این دین به ما متحمل شده اند را زنده کند. ویک مسلمان با یاد آوری آن زحمتها و مشقتهای پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم روح جهاد وتلاش را در خود بیدار سازد.&lt;br /&gt;
وخانمها این مژده پیامبر را با سینه ای باز وسری افراشته گوشواره گوشهایشان کنند که ایشان خطاب به آنها فرمودند: &amp;quot;لکن أفضل الجهاد حج مبرور&amp;quot; ـ برای شما والاترین جهاد حجی است که مورد قبول درگاه الهی واقع شود ـ .&lt;br /&gt;
6.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;در هنگام ادای فریضه حج یک مسلمان به درستی احساس می کند؛ او تنها نیست، بلکه در عمق تاریخ ریشه دارد.&lt;br /&gt;
این خانه ای که جلوی روی اوست را پدرش ابراهیم بنا نهاده، واین جای پاهای اوست. این آب زمزم یادگار حضرت اسماعیل است، واین صفا ومروه رمزی است از دلهره ی مادر پریشانش هاجر..&lt;br /&gt;
اینجاست که مؤمن می بیند ریشه اش با پیامبران رقم زده شده است. وقتی در کنار خانه خدا قدم می زند، یا در بین صفا ومروه شتابان می رود، ویا بسوی &amp;nbsp;منا وعرفات راه می افتد، احساس می کند قدمهایش را روی ردپای پیامبران خدا، وسرور بشریت؛ رسول اکرم صلی الله علیه وآله وسلم ویاران راستین او می نهد. اینجا ناخود آگاه باید از ته دل آن ستارگان آسمان هدایت را ندا دهد که؛ من پایم را جای پای شما نهاده ام. من تا آخرین لحظه ی زندگیم چون شمایان خواهم زیست.&lt;br /&gt;
7.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;بیش از سه چهار ملیون انسان؛ زن ومرد، پیر وجوان، از همه انحای جهان گرد هم می آیند تا به خدایشان بگویند ما تنها وتنها تو را می پرستیم، وما بندگان وبردگان توایم، ما را به بندگی وبردگی خود بپذیر...&lt;br /&gt;
در اینجا نه مرد زنی را می بیند، ونه زن مردی را تماشا می کند، همه ی شهوتها خمول ومرده اند، تنها محبت وعشق عشق عبادت است، وشوق کسب رضایت پروردگار یکتا!...&lt;br /&gt;
حاجی در اینجا در می یابد؛ در کنار ایمان به الله متعال همه ی شهوتهای سرکش بشری هیچ وپوچ جلوه می دهند. دیگر برای یک حاجی ترک اعتیاد وترک عادات زشت، وترک سیگار ودیگر بیماریهای اخلاقی واجتماعی بسیار آسان می شود. او توانست شهوتی سرکشتر را با ریسمان ایمان وتوکل به خدا به سادگی مهار کند. حالا که برگشته می تواند هر شهوت دیگری را نیز به سادگی در خود کنترل کند.&lt;br /&gt;
8.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;در هنگام مناسک حج حاجی که به فرشته ای از ایمان وهمت تبدیل شده، با شیطان لعنتی اعلان جنگ ودشمنی می کند. وبا سنگ ریزه هایی که رمزی است از آغاز جنگ با او به ستیز بر می خیزد. به او می گوید: ای شیطان لعنتی دیگر تو را پیش من جایی نیست. من با تو در ستیزم وتا آخرین لحظه زندگیم با تو می جنگم. وحاضر نیستم هرگز زیر بار تو بروم.&lt;br /&gt;
9.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;حج مدرسه ای است از اطاعت وفرمانبرداری الله متعال. همه روزه حاجیان می پرسند؛ وظایف امروز چیست؟ وهمه در پی هم بسوی عبادت آنروز روانه می شوند. به منا وعرفات می روند.. طواف می کنند.. موهایشان را می تراشند.. قربانی سر می برند.. در بین این ملیونها حاجی هرگز نمی شنویم که؛ چرا باید چنین کنم؟ چرا در هنگام طواف خانه کعبه را در دست چپ خود قرار دهیم. چرا شیطان را با کفش نزنم ورویش تف نیندازم، وتنها با سنگریزه با او اعلان جنگ کنم. چرا به عرفات بروم؟..&lt;br /&gt;
هرگز چنین سؤالهایی را در حج نمی شنوی، همه مشغول عبادتند وطاعت مطلق از فرامین الهی.&lt;br /&gt;
حاجی از اینجا درس می گیرد؛ همواره با الله و مطیع کامل فرامین ودستورات او باشد.&lt;br /&gt;
او در می یابد؛ پروردگار حج خود همان پروردگار نماز و پروردگار روزه و جهاد وسایر عبادات است.&lt;br /&gt;
پس او در سایر عبادات نیز الله متعال را همانگونه که در حج اطاعت نموده اطاعت و فرمانبرداری خواهد کرد.&lt;br /&gt;
انسانی که به حج می رود پس از برگشتن به یک شخصیت دیگری تبدیل می شود. او چون کسی است که پس از مرگ زنده شده حشر ومیدان عرصات، وبهشت وجهنم را دیده، به کوتاهیها واشتباهاتش پی برده، سپس به دنیا بازگردانده شده تا تجربه ای جدید از فهم ودرکی نو از زندگی را به نمایش بگذارد. این تصوری است از حج کسی که &amp;quot;حج&amp;quot; او در پیشگاه الهی پذیرفته شده است....&lt;br /&gt;
حج مبرور وسعی مشکور وذنب مغفور....&lt;br /&gt;
حجتان مبارک ومورد قبول درگاه الله متعال بادا!...&lt;br /&gt;
ادارۀ کتابخانه عقیده&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>عضویت در خبرنامه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/291</link>
<description>&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;

&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;برای اشتراک در خبرنامه سایت &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/add_edit_email.shtml&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;اینجا&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; را فشار دهید&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>شیخ محمد جمیل زینو رحمت الله علیه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/290</link>
<description>&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شیخ محمد جمیل زینو در شهرستان حلب سوریه در سال 1925م برابر با تاریخ 1344هـ به دنيا آمد. هنگامی که شیخ رحمه الله به سن ده سالگی رسید وارد یکی از مدرسه های خصوصی گردیده نوشتن و خواندن را آموخت. پس از سپری نمودن چند سال در این مدرسه، به مدرسه &amp;quot;دار الحفاظ&amp;quot; پیوست و مدت پنج سال را در این مدرسه گزراند که طی آن قرآن کریم را با تجوید حفظ نمود، سپس وارد مدرسۀ دیگری بنام &amp;quot;دانشکدۀ شرعی&amp;quot;&amp;nbsp;واقع در شهرستان حلب &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;گردید&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;و فعلا بنام &amp;quot;دبیرستان شرعی&amp;quot; یاد می شود و متعلق به وقف اسلامی است. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;در این مدرسه که علوم شرعی و عصری تدریس می شد شیخ محمد جمیل زینو تفسیر، فقه حنفی، نحو، صرف، تاریخ، حدیث و علوم حدیث و غیره علوم شرعی را فرا گرفت و در زمينه علوم عصری، فیزیک، شیمی، ریاضیات و زبان فرانسوی و سایر علوم مثل الجبر که مسلمانان در گذشته در آن پیشتاز جهان بودند را فرا گرفت.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شیخ محمد جمیل زینو در سال 1948 ديپلم دبیرستان را بدست آورد و در جملۀ شاگردانی انتخاب شد که باید به دانشگاه الازهر مصر فرستاده شوند لیکن شیخ به دلایل مشكلات صحى نتوانست رهسپار مصر شود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;سپس&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;وی وارد دارالمعلمین شهرستان حلب شد و پس از فراغت به حیث مدرس در یکی از مدارس این شهرستان حدود 29 سال ایفای وظیفه نمود. بعد از استعفا از تدریس، رهسپار مکه مکرمه جهت ادای عمره گردید و با شیخ علامه ابن باز رحمت الله علیه آشنا گردید. وقتی شیخ ابن باز&amp;nbsp;دریافت که شیخ زینو صاحب عقیدۀ راسخ و درست است وی را به حیث مدرس در مسجد الحرام در ایام موسم حج تعین نموده پس از پایان مراسم حج وی را بخاطر دعوت به اردن فرستاد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شیخ محمد زینو در مسجد جامع صلاح الدین واقع در شهرستان &amp;quot;رمثا&amp;quot; به حیث امام و خطیب و مدرس قرآن مشغول دعوت شد و در خلال حضورش در این شهر از مدارس مختلف این شهر دیدار بعمل آورد و طلاب علم را با عقیده و ارزشهای والای اسلام&amp;nbsp;آشنا می نمود. مردم این شهر که با شیخ زینو محبت خاصی داشتند سخنان وی را با سینۀ فراخ می پذیرفتند. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شیخ محمد جمیل زینو در رمضان سال 1400 بمنظور ادای عمره راهی مکه مکرمه شد و پس از گذشت موسم حج با یکی از شاگردان دار الحدیث مكه مكرمه آشنا شد. این شاگرد از شیخ زینو خواهش نمود تا به حیث مدرس در دارالحدیث مكه مكرمه ایفای وظیفه نماید زیرا به وجود استادى ورزیده مثل ايشان به ویژه متخصص علوم حدیث نیاز دارند. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;مدیر دار الحدیث مكه مكرمه وقتی متوجه شد که شیخ محمد جمیل زینو با علامه ابن باز رحمت الله علیه روابط دوستانه دارد و با وی همفکر است از شیخ استقبال گرم نمود و وی را به حیث مدرس تفسیر، توحید، قرآن کریم، حدیث و غیره دروس دینی تعین نمود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شیخ محمد جمیل زینو به كمك الله متعال توانست برخی از کتب دينى را تألیف و بچاپ برساند که در همه کشورهای جهان به زبانهای مختلف منتشر گردیده است. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;کتب شیخ زینو به زبانهای انگلیسی، فرانسوی، بنگالی، اندونیزی، ترکی، اردو، فارسی و غیره زبانهای ترجمه و نشر گردیده است.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;الله متعال این کوششهای شیخ محمد جمیل زینو را در میزان حسناتش بپذیرد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;شیخ محمد جمیل زینو &amp;quot;رحمت الله علیه&amp;quot; بعد از &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;اینکه عمری را در خدمت به اسلام و مسلمین سپری نمود در&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;روز جمعه 29/10/1431هـ در سن هشتاد و هفت سالگی در &amp;nbsp;مكه مكرمه درگذشت (انا لله و انا الیه راجعون). &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;نماز جنازه شیخ محمد جمیل زینو پس از نماز عشا در مسجد الحرام ادا گردید و در تشیع جنازۀ شیخ زینو بسیاری از بزرگان و دانشمندان و اهل فضل و زائرين بيت الله الحرام شرکت ورزيدند.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;ادارۀ کتابخانۀ عقیده از بارگاه الله متعال برای شیخ محمد جمیل زینو جنت الفردوس استدعا نموده و مجموعه ای از کتابهای ایشان را خدمت برادران و خواهران مسلمان تقدیم می نماید.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#800080&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/428/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;از قرآن و حدیث عقیده ات را بیاموز&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/739/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;اسلام و بزرگداشت زن&amp;rlm;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/453/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;تفسیر بزرگترین سوره قرآن - سوره حمد&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/226/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;راهنمای مربیان برای تربیت دختران و پسران&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/969/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;روش گروه رستگار در پرتو کتاب و سنت&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/609/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;عقیده هر مسلمان&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/866/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ندای ایمان در پرتو قرآن و سنت&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/990/&quot; target=&quot;_top&quot;&gt;نقش توحید در زندگی انسان&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/book/849/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;چگونه قرآن را تفسیر کنیم و تفسیر سورۀ فاتحه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ آموزش حج و عمره همراه با تصوير</title>
<link>http://qalamlib.com/news/289</link>
<description>&lt;p&gt;كتابِ آموزش حج و عمره همراه با تصوير&lt;br /&gt;
مكّهء مكرمه بهترین زمین و محبوبترین مكان نزد الله جل جلاله است، در آن مسجد الحرام و كعبه مشرفه وجود دارد كه الله جل جلاله آنرا قبله مسلمانان قرار داده است ، و تمامی مردم در هر شبانه روز پنج بار برای اطاعت از الله جل جلاله و اجابت ندای حق بسوی آن رو میكنند، مكه مهد انبیاء و مقام پدرمان إبراهیم عليه السلام و مبعث پیامبرمان محمد صلی الله عليه وآله وسلم است.&lt;br /&gt;
حج ركن پنجم از اركان اسلام است، و تمامی أمت اسلام از عصر نبوت بر وجوب حج اقرار دارند و آنهم بر مسلمان بالغ و عاقل و آزاد كه استطاعت مالی و بدنی داشته باشد&lt;br /&gt;
حج و عمره برای كسی كه نیت خود را برای الله جل جلاله خالص كند، و اعمال آنرا بطوری كه در قرآن و سنت شریف آمده انجام دهد، فضیلت بسیار بزرگی را دارد.&lt;br /&gt;
واينك در اين ايام مبارك كه مراسم حج نزديك مي باشد كتابخانه عقيده كتابِ آموزش حج و عمره همراه با تصوير را خدمت برادران و خواهران مسلمان تقديم می كند كه اميدواريم مورد استفاده عزيزان قرار &amp;nbsp;گیرد و الله تعالی حج خانۀ مبارک خود را نصیب همه مسلمانان بنماید. برای داونلود نمودن این کتاب به بخش فقه و احکام&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتابخانه مراجعه نمایید.&lt;br /&gt;
و یا با فشار بر روی اسم کتاب می توانید آنرا&amp;nbsp;&amp;nbsp;مستقیما داونلود نمایید:&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/556/&quot;&gt;آموزش حج و عمره همراه با تصویر&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابهایی در بررسی و تحلیل زندگی خلفای راشدین به چاپ رسید</title>
<link>http://qalamlib.com/news/288</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl; text-align: justify;&quot;&gt;به یاری و توفیق روزافزون پروردگار یکتا و همت ادارۀ کتابخانۀ عقیده، نوشته‫های علمی و پژوهشی و تاریخی جناب دکتر علی محمد صلابی نویسنده نامدار لیبی به فارسی برگردانیده و به چاپ رسید.&lt;br /&gt;
آثار تاریخی این نویسنده در کتابخانه عربی معاصر از جایگاه ویژه‫ای برخوردارند. به یاری برخی از اساتید بزرگوار تاریخچه خلفای راشدین در 5 جلد به فارسی ترجمه و در بازار کتاب در اختیار خوانندگان فارسی زبان قرار گرفته است.&lt;br /&gt;
این مجموعه پنج جلدی که با طرح جلد بسیار زیبایی در اختیار عموم قرار گرفته است حاوی موارد زیر است:&lt;br /&gt;
1.ابوبکر صدیق رضی الله عنه - بررسی و تحلیل زندگانی خلیفه اول&lt;br /&gt;
2.عمر بن خطاب رضی الله عنه - بررسی و تحلیل زندگانی خلیفه دوم&lt;br /&gt;
3.عثمان بن عفان رضی الله عنه - بررسی و تحلیل زندگانی خلیفه سوم&lt;br /&gt;
4.علی بن ابی طالب رضی الله عنه - بررسی و تحلیل زندگانی خلیفه چهارم&lt;br /&gt;
5.حسن مجتبی رضی الله عنه- بررسی و تحلیل زندگانی خلیفه پنجم&lt;br /&gt;
لازم به تذکر است نویسندۀ این سلسله از کتابها گوشه‫ هایی از تاریخ جهان اسلام را از زمان پیامبر اکرم (علیه الصلاة و السلام) تا خلافت عثمانی در کتابهای مختلفی مورد بحث و بررسی قرار داده است.&lt;br /&gt;
ایشان تاکنون بیش از 26 کتاب در زمینه‫ های مختلف نوشته‫اند که 17 کتاب آن در مورد تاریخ و شخصیتهای تاریخ ساز اسلام می‫باشد.&lt;br /&gt;
سایت شخصی دکتر علی محمد صلابی&lt;br /&gt;
امید می رود صاحبان قلم آستین همت بالا زده، تمامی مؤلفات این نویسنده، و شاهکارهای علمی و پژوهشی سایر نویسندگان جهان را به کتابخانه فارسی معاصر اضافه کنند.&lt;br /&gt;
شایان ذکر است اشاره شود، کتابخانه عقیده (بزرگترین و شاخصترین کتابخانه اسلامی فارسی در شبکه انترنت) پیش از این 7 کتاب از این نویسنده را به صورت رایگان در اختیار عموم خوانندگان خود قرار داده است.&lt;br /&gt;
مجموعۀ کتابهای دکتر علی محمد صلابی به زبان فارسی&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>وفات مؤلف کتاب تاریخ قرآن کریم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/287</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;دکتر عبدالصبور شاهین &amp;quot;رحمه الله&amp;quot;&amp;nbsp;از دانشمندان و دعوتگران اسلامی در سر زمین مصر و جهان اسلام بشمار می رفت، وی در پهلوی تدریس و تالیف خطیب مسجد جامع عمرو بن العاص در شهر قاهره نیز بود و بیش از (70) کتاب را تألیف و یا&amp;nbsp;ترجمه نموده است. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;دکتر شاهین به حیث استاد در دانشکدۀ دار العلوم دانشگاه قاهره ایفای وظیفه می نمود و پس از مدت کوتاه یکی از معروفترین متفکران و دعوتگران عصر حاضر در مصر و سطح جهان اسلام گردید. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;دکتر شاهین در شورای عالی (پارلمان مصر) نیز عضویت داشت، همچنان به عنوان استاد در بخش مطالعات اسلامی و عربی در دانشگاه ملک فهد عربستان سعودی ایفای وظیفه نموده است.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&amp;nbsp;وی دهها آثار ارزشمند و مهم را از خود به جا گذاشت که معروفترین آن: &amp;quot;دستور اخلاق در قرآن&amp;quot; و &amp;quot;مفصل آیات قرآن&amp;quot; و &amp;quot;ترتیب معجمی&amp;quot; و &amp;quot;تاریخ قرآن کریم&amp;quot; و &amp;quot;دایره المعارف مادران مؤمنان&amp;quot; و &amp;quot;صحابیات در اطراف پیامبر صلی الله علیه و سلم&amp;quot; و &amp;quot;پدرم آدم علیه السلام&amp;quot; است. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;دکتر عبد الصبور شاهین به زبان فرانسوی مسلط بود و چندین کتاب را از فرانسوی به عربی ترجمه نموده است.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;متفکر و نویسندۀ معروف دکتر &amp;quot;عبدالصبور شاهین&amp;quot; عصر روز یکشنه 17 شوال سال 1431هـ ق برابر با 4 میزان/مهر 1389هـ ش در سن 82 ساگی وفات نمود. &amp;quot;انا لله و انا الیه راجعون&amp;quot;.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;یکی از کتابهای معروف استاد شاهین رحمه الله کتاب &amp;quot;تاریخ قرآن کریم&amp;quot; می باشد که ترجمۀ فارسی آن در کتابخانۀ عقیده نشر گردیده است، مؤلف رحمه الله در مقدمۀ این کتاب می فرماید:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; letter-spacing: -0.2pt&quot;&gt;&amp;quot;&lt;span style=&quot;color: blue&quot;&gt;کسانی که عبارت &lt;span style=&quot;color: rgb(255,0,0)&quot;&gt;&amp;laquo;تاریخ قرآن کریم&amp;raquo;&lt;/span&gt; را می&amp;zwnj;خوانند، چه بسا تصور کنند که مطلب واضح و روشن است؛ به طوری که صفحات اندکی دربارة این موضوع که غیر محققانه به جنبه&amp;zwnj;های این تاریخ روشن و پر حجم می&amp;zwnj;پردازد، بر ایشان کافی است در حالی که این تاریخ، در حقیقت تاریخ شکوفایی این امت بزرگ با تمدن جاودانه&amp;zwnj;اش می&amp;zwnj;باشد؛ گویی تاریخی با این درجه از اهمیت ممکن است، ساده و بدون ابهام و صرف حوادثی باشد که در زمان و مکان مشخصی رخ داده&amp;zwnj;اند و زمان و مکان بیانگر تمامی جنبه&amp;zwnj;های آن می&amp;zwnj;باشد. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: blue&quot;&gt;مهم&amp;zwnj;ترین جنبة این تاریخ، بُعد روان&amp;zwnj;شناختی عناصر مختلفی است که در عرصة آن وارد شدند؛ چه مؤمنانی که پرچم اعتقاد و عقیده را برای دفاع از دین خدا برداشتند و چه ملحدانی که منکر شایستگی مؤمنان در تحقق هدفشان گشتند و چه منافقانی که مزورانه عمل کردند&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; letter-spacing: -0.2pt&quot;&gt;&amp;quot;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: blue&quot;&gt;.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&amp;nbsp;روحش شاد باد&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;برادران و خواهران عزیز می توانند کتاب مذکور را با کلیک بر روی اسم کتاب داونلود نمایند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&amp;quot;&lt;a href=&quot;/book/548/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;تاریخ قرآن کریم&lt;/a&gt;&amp;quot;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>رمضان و قرآن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/283</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جبرئیل: ای محمد، امت پس از تو در فتنه و آزمایش سختی می‫افتد!&lt;br /&gt;
رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم): ای جبرئیل، راه حل چیست؟&lt;br /&gt;
جبریل: قرآن؛ کلام الله، در آن خبر پیشینیان، و آیندگان است. و دستور زندگانی است برای شما. و آن ریسمان محکم الهی، و راه راست است. سخن نهائی است و هیچ بیهودگی را در آن راهی نیست. هیچ ستمگری آنرا کنار ننهاده، ومخالفت آنرا بجای نه آورده، مگر اینکه خداوند کمرش را شکسته. و هیچ کس علم هدایت را در غیر آن نجسته مگر اینکه گمراه گشته. با تکرار خواندن هرگز کهنه نشده از دل نمی‫رود. عجایب آن تمام نشدنی است. هر کس سخن قرآن گوید راستگوست. و هر کس به قرآن دستور دهد عادل است. و هر کس به قرآن عمل کند پاداش و اجر گیرد. و هر کس بنا به قرآن تقسیم کند انصاف را رعایت نموده. ( به روایت امام احمد)&lt;br /&gt;
آری! این است قرآن؛ کلام پاک رحمان، اساسنامه و قانون مسلمان زیستن، دستور و برنامه الهی برای بشریت، سنگر و دژ محکم در برابر گمراهیها، نور هدایت از تاریکیها، راهنمای راه راست و خوشبختی دو جهان:&lt;br /&gt;
&amp;rlm;&amp;laquo;قَدْ جَاءكُم مِّنَ اللّهِ نُورٌ وَكِتَابٌ مُّبِينٌ&amp;rlm;&amp;raquo; (سوره مائدة آيه&amp;nbsp;15)&lt;br /&gt;
{&amp;rlm;از سوي خدا نوري (كه پيغمبر است و بينشها را روشني مي&amp;zwnj;بخشد) و كتاب روشنگري (كه قرآن است و هدايت&amp;zwnj;بخش مردمان است) به پيش شما آمده است}.&amp;rlm;&lt;br /&gt;
رسول اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) فرمودند: این قرآن سفره میهمانی کریمانه خداوند است. هر آنچه در توان دارید از سفره سخاوت الهی برگیرید. این قرآن ریسمان الهی، و نور هدایت، و شفاء و داروی مفید است. هر کس به آن چنگ زند را حفاظت می‫کند. و رهایی است برای هر کس که از او پیروی کند. قرآن به کژی و گمراهی نمی‫رود تا نیاز به اصلاح داشته باشد. گهرهای آن هرگز تمام شدنی نیست. و با بسیار خواندن از دل نمی‫رود. قرآن را تلاوت کنید که خداوند برای تلاوت آن به شما اجر و پاداش نیکو می‫دهد. برای تلاوت هر حرفی ده نیکی برایتان نگاشته می‫شود. البته من نمی‫گویم (الم) یک حرف است، بلکه &amp;quot;الف&amp;quot; یک حرف، و &amp;quot;لام&amp;quot; یک حرف، و &amp;quot;میم&amp;quot; یک حرف است. ( به روایت امام حاکم)&lt;br /&gt;
این است قرآن، شفاعت روز قیامت، و امام و رهنمای هدایت بشریت، و رمز سعادت انسان، و خداوند بر رمضان این منت را نهاده که شرف نزول قرآن را به این ماه اختصاص داده است.&lt;br /&gt;
&amp;laquo;شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِيَ أُنزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَى &amp;rlm;&amp;raquo; (سوره بقرة آيه&amp;nbsp;185)&lt;br /&gt;
{&amp;rlm;ماه رمضان است كه قرآن در آن فرو فرستاده شده است . تا مردم را راهنمائي كند و نشانه&amp;zwnj;ها و آيات روشني از ارشاد ( به حق و حقيقت ) باشد و ( ميان حق و باطل در همه ادوار ) جدائي افكند} .&amp;rlm;&lt;br /&gt;
در این ماه مبارک کتاب هدایت پرهیزکاران نازل شد:&lt;br /&gt;
&amp;rlm;&amp;laquo;&amp;rlm;ذَلِكَ الْكِتَابُ لاَ رَيْبَ فِيهِ هُدًى لِّلْمُتَّقِينَ &amp;rlm;&amp;raquo; (سوره بقرة آيه&amp;nbsp;2)&lt;br /&gt;
&amp;rlm;{اين كتاب هيچ گماني در آن نيست و راهنماي پرهيزگاران است}.&amp;rlm;&lt;br /&gt;
این کتاب رمز هدایت و رستگاری انسان است: &amp;laquo; هُدًى لِّلنَّاسِ &amp;raquo; (هدایت و راهنمایی برای مردم)&lt;br /&gt;
گویا قرآن تصریح می‫کند هر آن کس که از قرآن هدایت نپذیرد از انسانیت بدور است:&lt;br /&gt;
&amp;rlm;&amp;laquo; أُوْلَئِكَ كَالأَنْعَامِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ أُوْلَئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ &amp;rlm;&amp;raquo; (سوره أعراف آيه&amp;nbsp;179)&lt;br /&gt;
{اينان&amp;nbsp;همسان چهارپايانند و بلكه سرگشته&amp;zwnj;ترند . اينان واقعاً بي&amp;zwnj;خبر ( از صلاح دنيا و آخرت خود ) هستند}.&amp;rlm;&lt;br /&gt;
و رابطه‫ای است بس عمیق بین نازل شدن قرآن و روزه!..&lt;br /&gt;
همانطور که خداوند متعال به ماه مبارک رمضان این شرف را داد تا حامل قرآن باشد. به آن شرف میزبانی روزه را نیز داد، چرا که روزه بهترین وسیله‫ای است که بر شهوتها و غرائز بشری چیره شده، راه تابیدن پرتوهای نورانی قرآن را بر قلبها هموار می‫سازد.&lt;br /&gt;
آمیزش قرآن و رمضان، و روابط و خویشاوندی بسیار نزدیک آنها هر انسان عاقلی را تشویق می‫کند تا در ساعات ملکوتی روزها و شبهای رمضان بیش از هر وقت دیگری به تلاوت قرآن و سعی در فهم و درک معانی آن مشغول گردد. جبریل امین (علیه السلام) هر ساله در رمضان قرآن را با پیامبر اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) می‫خواندند. و از شاگردان مکتب رسالت و پارسایان و صالحان آمده است که در هر سه روز، و یا هر هفت روز، و برخی هر ده روز، و حتی برخی هر روزه یکبار قرآن کریم را بطور کامل تلاوت می‫کردند!&lt;br /&gt;
در نتیجه این پیوند قوی بین آن بزرگان و قرآن کریم، کلام الهی بهار دلهایشان، و نور سینه‫هایشان، و بر طرف کننده نگرانیهایشان، و شستشو دهنده غمهایشان بود. و همیشه در سعادت و شادکامی بدور از همه بیماریهای روانی و اضطرابات و تشنجها و استرسهای روحی بسر می‫بردند. خود آن حضرت (صلی الله علیه وآله وسلم) آنچنان شیفته و غرق قرآن بودند که قرآن بصورت کامل بر شخصیت ایشان تجلی کرده بود، و در حقیقت پیامبر اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) قرآنی زنده بود که با دو پا در میان انسانها قدم می‫زد.&lt;br /&gt;
حضرت ابوبکر (رضی الله عنه)؛ شاگرد ارشد مکتب رسالت به مجرد شنیدن و یا تلاوت آیات کلام الله مجید چشمانش چون ابر بهاری باریدن می‫گرفت.&lt;br /&gt;
و حضرت عثمان (رضی الله عنه)؛ شاگرد نمونه و داماد رسول اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) می‫فرمودند: اگر قلبهایمان پاک باشد هرگز از قرآن سیر نمی‫شویم!&lt;br /&gt;
و داماد دیگر ایشان حضرت علی (رضی الله عنه) می‫فرمودند: سوگند بخدا که در قرآن هیچ آیه‫ای نیست مگر اینکه من می‫دانم در چه موردی، و در کجا نازل شده است.&lt;br /&gt;
بله، شاگردان مدرسه رسالت اینچنین با قرآن انس گرفته بودند، و زندگیشان در سایه قرآن ودر پرتو درس و تعلیم و تعلم و تفسیر و آموزش آن سپری می‫شد. و این است رمز سعادت و خوشبختی و نیک نامی آنها...&lt;br /&gt;
قرآن اساسنامه و قانون اساسی این امت است، خداوند آنرا نوری قرار داده تا پرده تاریکیها را بدرد. و آنرا رهنمایی برای حفاظت از گمراهیها، و سعادت و زندگی قلبها، و صفای عقلها، و برنامه اخلاق، و شفای بیماریهای عقلی و روحی و روانی و جسمانی، و رحمت و شفقت، و مهر و عطوفت زندگانی، و خلاصه سعادت و خوشبختی دنیا و آخرت قرار داده است.&lt;br /&gt;
خداوند متعال می‫فرمایند:&lt;br /&gt;
&amp;rlm;&amp;laquo;إِنَّ هَذَا الْقُرْآنَ يِهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ وَيُبَشِّرُ الْمُؤْمِنِينَ الَّذِينَ يَعْمَلُونَ الصَّالِحَاتِ أَنَّ لَهُمْ أَجْراً كَبِيراً &amp;rlm;&amp;raquo; (سوره إسراء آيه&amp;nbsp;9)&lt;br /&gt;
اين قرآن ( مردمان را ) به راهي رهنمود مي&amp;zwnj;كند كه مستقيم&amp;zwnj;ترين راهها ( براي رسيدن به سعادت دنيا و آخرت ) است ، و به مؤمناني كه ( برابر دستورات آن ) كارهاي شايسته و پسنديده مي&amp;zwnj;كنند ، مژده مي&amp;zwnj;دهد كه براي آنان ( در سراي ديگر ) پاداش بزرگي ( به نام بهشت ) است .&amp;rlm;&lt;br /&gt;
و هر گاه مسلمان از قرآن فاصله گیرد، نور و رحمت و هدایت و شفاء و سعادت از زندگیش فاصله می‫گیرد و در تاریکی و بدبختی و اضطرابات و استرستهای روحی و روانی و مشکلات زندگی غرق گشته، زندگی برای او چون قفسی تنگ می‫شود که هر لحظه آن چون سالی سپری می‫شود.&lt;br /&gt;
آنهایی که از زندگی کابوسیشان می‫نالند، و در چنگال مشکلات پرسه می‫زنند باید دریابند که راه نجاتشان در قرآن کریم و تلاوت و خواندن ترجمه و تفسیر و تعلیم و تعلم آن نهفته است! همه باید دریابیم که قضیه قرآن یک حکایت گزرا و ساده نیست که بتوان از آن براحتی گذشت، حکایت و مرز سعادت و خوشبختی در دو جهان، و یا شقاوت و بدبختی است.&lt;br /&gt;
و خوب بخاطر داریم آن هنگامی را که رسول هدایت به تنهایی در غار حرا مشغول تفکر در خلقت آسمانها و زمین بود، و با خدای خود ـ که وجدان و ضمیرش او را بسوی آن خدای ناشناخته خوانده بود ـ راز و نیاز می‫کرد. در یک آن جبریل، پیک وحی الهی بر او فرود آمده او را به خواندن دعوت نمود. و او را قبل از تقدیم قرآن چند بار در آغوش گرفته بشدت فشار داد، تا جایی که نزدیک بود نفس از کالبد آن حضرت بدر آید!&lt;br /&gt;
نزول آیات مبارکه قرآن بر پیامبر اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) نیاز به آمادگی پیشین داشت. تا رسول هدایت بشریت قرآن را با جدیت و تمام قدرت و توان خود در سینه خود جای دهد.&lt;br /&gt;
برادر و خواهر عزیز:&lt;br /&gt;
تصور کن رمضان امسال چون جبریل امین؛ پیک هدایت و رستگاری است که من و شما را محکم به آغوش خود فشرده، و با شدت گرما و تشنگی و گرسنگی ما را آماده پذیرش کلام الهی نموده است.&lt;br /&gt;
بیا قرآن را آنچنان بخوانیم و در پی فهم و درک معانیش باشیم که گویا بر ما نازل شده است. و پیامش از آن من و شماست. و مسئولیت هدایت بشریت بر دوش من و شما نهاده شده است. و فراموش نکنیم پیامبر خدا (صلی الله علیه وآله وسلم) زندگیش را برای قرآن وقف کرده بود. به یاران و شاگردانش تعلیم می‫دادند و از آنها گوش می‫گرفتند، معنای کلام پاک را برایشان شرح می‫دادند، و می‫فرمودند: بهترین شما کسی است که قرآن را آموخته به دیگران بیاموزاند. ( به روایت امام بخاری از حضرت عثمان ـ رضی الله عنه ـ)&lt;br /&gt;
برای آن افرادی که تا کنون همت نکرده اند قرآن را آنچنان که بر پیامبر اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) نازل شده تلاوت کنند، و یا معانی آنرا بفهمند، هنوز هم دیر نشده است! همانطور که برای بدست آوردن مال و فراهم کردن احتیاجات زندگی زودگذر خود تلاش می‫کنند برخیزند و به مسجد روند، ـ و یا به هر صورتی که امکان دارد ـ اول تلاوت درست قرآن و سپس ترجمه معانی آنرا بیاموزند. تا هم در زندگیشان خوشبخت و سعادتمند گردند و هم در آخرتشان...&lt;br /&gt;
و بدانند که آموختن یک آیه از قرآن بیش از آنچه از ثروت و مال می‫توانند بدست آوردند برایشان با ارزشتر خواهد بود. قرآن آن توشه‫ای است که می‫توانند با خود به قبر ببرند، و آن یاوری است که در لحظات دشوار آخرت برایشان شفاعت می‫کند، در حالیکه ثروت و دارائی آنها را رها کرده باعث فتنه و جنگ و جدال بازماندگانش می‫شود:&lt;br /&gt;
&amp;rlm;&amp;laquo; كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِّيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُوْلُوا الْأَلْبَابِ &amp;rlm;&amp;raquo; (سوره ص آيه&amp;nbsp;29)&lt;br /&gt;
&amp;rlm;{( اي محمّد ! اين قرآن ) كتاب پر خير و بركتي است و آن را براي تو فرو فرستاده&amp;zwnj;ايم تا درباره آيه&amp;zwnj;هايش بينديشند ، و خردمندان پند گيرند}.&amp;rlm;&lt;br /&gt;
و والدین گرامی نیز فرزندانشان را شیفته قرآن کنند.&lt;br /&gt;
رسول الله (صلی الله علیه وآله وسلم) می‫فرمایند: هر کس قرآن را خوانده بدان عمل کند، پدر و مادرش را در روز قیامت تاجی بر سر می‫نهند که روشنائیش بسیار زیباتر است از روشنائی خورشید اگر در خانه‫های دنیا می‫بود. ( به روایت امام ابو داود)&lt;br /&gt;
این پاداش پدر و مادر قرآن خوان است، حال خود تصور کن که خود او را چه مکانت و جایگاه ومنزلتی است!&lt;br /&gt;
در روز قیامت به قاری قرآن گفته می‫شود: در بهشتهای برین بالا برو و در حالیکه قرآن ـ را آنچنان که در دنیا می‫خواندی ـ تلاوت می‫کنی. جایگاه تو جای آخرین آیه‫ای است که می‫خوانی! ( به روایت امام ترمذی با سند صحیح)&lt;br /&gt;
و ماه رمضان فرصتی است طلائی برای آشتی کردن با قرآن، و فرصتی است زودگذر برای شیفته و عاشق قرآن شدن، و جای دارد همیشه این فرموده رسول هدایت (صلی الله علیه وآله وسلم) را جلوی دیدگان خویش داشته باشیم که:&lt;br /&gt;
( روزه و قرآن روز قیامت برای دوستشان شفاعت می‫کنند، قرآن می‫گوید: پروردگارا شبها او را بی‫خواب نگه داشته‫ام. و روزه می‫گوید: بار الها، در روزهای گرم او را تشنه نگه داشته‫ام) و آنگاه خداوند شفاعت آنها را می‫پذیرد.&lt;br /&gt;
آیا شرفی بزرگتر و برتر از این هست که دوست رمضان و قرآن و عاشق و شیفته آن دو شویم؟!&lt;br /&gt;
چرا که هر کس در سینه‫اش قرآن نباشد بفرموده پیامبر اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) چون خانه ویرانه‫ای است. و خدای ناکرده از جمله کسانی نباشیم که در روز قیامت از آنها شکایت می‫شود:&lt;br /&gt;
&amp;rlm;&amp;laquo;وَقَالَ الرَّسُولُ يَا رَبِّ إِنَّ قَوْمِي اتَّخَذُوا هَذَا الْقُرْآنَ مَهْجُوراً &amp;rlm;&amp;raquo; (سوره فرقان آيه&amp;nbsp;30)&lt;br /&gt;
{&amp;rlm;و پيغمبر ( شكوه&amp;zwnj;كنان از كيفيّت برخورد مردمان با قرآن ) عرض مي&amp;zwnj;كند ، پروردگارا ! قوم من اين قرآن را ( كه وسيله سعادت دو جهان بود ) رها و از آن دوري كرده&amp;zwnj;اند ( و از ترتيل و تدبّر و عمل بدان غافل شده&amp;zwnj;اند )}.&amp;rlm;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>همراه با رسول اکرم  صلى الله عليه وآله وسلم  در رمضان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/282</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام ابن قیم (رحمه الله) مى فرمايد: رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;بهترین روش و کاملترین نمونه استفاده از فرصت طلائی رمضان بود. ایشان به بهترین صورت وبا آسانترین و دلچسب‫ترین روش بیشترین فایده‫های ایمانی را از این ماه مبارک می‫بردند.&lt;br /&gt;
روزه ماه مبارک رمضان در دومین سال هجرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;به مدینه بر مسلمانان فرض شد. و پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در سال یازدهم هجری چشم از جهانی فانی بربستند. ایشان 9 رمضان را در زندگی پرفروغشان روزه گرفتند.&lt;br /&gt;
در ابتدا روزه بصورت اختیاری فرض شده بود. هر کس می‫خواست روزه می‫گرفت و هر کس نمی‫خواست بجای آن بینوائی را غذا می‫داد. سپس اختیار برداشته شد و روزه بر همگان واجب قرار داده شد.&lt;br /&gt;
تنها به خانمها و پیرمردان این فرصت داده شد، که در صورت ناتوان بودن از&amp;nbsp;روزه گرفتن، بجای هر روز روزه یک بینوا و یا مستمندی را غذا دهند.&lt;br /&gt;
و همچنین به بیماران و مسافرها این رخصت داده شد، که روزه نگیرند، و پس از شفا یافتن، و استقرار یافتن به تعداد روزهایی که افطار کرده، و روزه نگرفته‫اند روزه بگیرند.&lt;br /&gt;
و همچنین زنان حامله و یا شیر دهی که روزه گرفتن برای آنها مضر است، روزه نمی‫گیرند و پس از رفع خطر قضاء روزهایی که روزه خورده‫اند را بجای می‫آورند.&lt;br /&gt;
و در حالتی که خطر متوجه صحت خود آنها نباشد، و تنها از اینکه مبادا خطری متوجه فرزندشان شود روزه نمی‫گیرند، همراه با بجای آوردن قضاء روزه، می‫بایستی بجای هر روزی نیز یک فقیری را غذا دهند. چونکه ترک روزه از بابت خطر بیماری نبوده، تنها برای مراعات صحت چون افطار آدم صحتمند در اول اسلام می‫باشد.&lt;br /&gt;
سعی بسیار در بجای آوردن انواع عبادتها&lt;br /&gt;
از روش عبادت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;این بود که در ماه رمضان بسیار می‫کوشید تا از هر نوع عبادت در حد امکان بجای آورد. حضرت جبرئیل ـ علیه السلام ـ نیز در رمضان خدمت آن حضرت می‫آمد و با ایشان&amp;nbsp;قرآن می‫خواند. پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;همیشه از همه‫ی انسانها سخاوتمندتر و بخشنده‫تر بود، و در رمضان بیش از پیش سخاوت می‫نمود، و وقتی با جبرئیل ملاقات می‫نمود از نسیم وزان نیز با سخاوت‫تر و بخشنده‫تر می‫شد. آن حضرت در رمضان بیش از همیشه صدقه و خیرات می‫داد، و به همگان نیکی می‫کرد و قرآن تلاوت می‫نمود، و نماز بجای می‫آورد و همواره مشغول ذکر و عبادت الله متعال بود، و در مسجد به اعتکاف می‫نشست.&lt;br /&gt;
ماه رمضان را بکلی به عبادت مشغول بود، و آنچنان که در ماه مبارک رمضان به طاعت و عبادت و بندگی الله متعال می‫پرداخت در هیچ ماه دیگری از سال چنین نمی‫کرد. تا جائیکه برای ضایع نشدن لحظه‫ای از شب و روزش چند روز متوالی را بدون اینکه افطار کند روزه می‫گرفت تا فرصت بیشتری برای عبادت داشته باشد.&lt;br /&gt;
البته صحابه و یارانش را از روزه‫ی متواصل منع می‫کرد. آنها می‫گفتند: شما بطور متواصل روزه می‫گیرید، و چند روز متوالی افطار نمی‫کنید، ما نیز می‫خواهیم چون شما باشیم. آن حضرت به آنها می‫فرمودند:&amp;quot; من چون شما نیستم، من نزد پروردگارم می‫باشم و او مرا غذا می‫دهد و سیراب می‫کند&amp;quot;.(به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری)&lt;br /&gt;
و از روی رحمت و شفقت پیروان و امتش را از استمرار روزه منع می‫نمودند. و به کسانی که بسیار اصرار دارند اجازه دادند افطارشان را تا وقت سحر بتأخیر اندازند.&lt;br /&gt;
در صحیح بخاری از ابو سعید خدری آمده است که ایشان از پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;شنیدند که آن حضرت می‫فرمودند:&amp;quot; روزه‫یتان را با روزه روز دیگر وصل نکنید. حالا اگر کسی از شما خواست روزه‫اش را استمرار دهد، تنها تا وقت سحر ادامه دهد&amp;quot;. این می‫تواند نوعی استمرار و بهم‫پیوستن روزه‫ها و آسانترین روش برای روزه‫دار باشد. و در حقیقت آن شام روزه دار است که آنرا با کمی تأخیر در وقت سحر میل می‫فرماید. و روزه دار در شبانه‫روز یک وعده غذا دارد، حالا اگر آنرا در سحر میل بفرماید چون کسی است که شامش را بجای اول شب در آخر شب میل می‫کند.&lt;br /&gt;
روش پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در هلال اول ماه&lt;br /&gt;
پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;روزه‫ی ماه مبارک را پس از دیدن هلال اول ماه، و یا گواهی دادن یک شاهد که ماه را دیده، شروع می‫کرد. باری روزه‫ی ماه مبارک را با اعتماد به گواهی ابن‫عمر، و یک بار دیگر با گواهی یک صحرانشین شروع کرد. و از آنها قسم نخواست. فقط به اطلاع رسانی آنها اعتماد نمود، اگر چه این خبر رسانی گواهی و شهادتی از سوی آنها بود، پیامبر از آنها نخواست که سوگند بخورند. واگر هلال اول ماه را نمی‫دید و کسی گواهی نمی‫داد که هلال را دیده، آن حضرت&amp;nbsp;سی‫روز ماه شعبان را کامل می‫نمود، و سپس روزه‫ی رمضان را شروع می‫کرد.&lt;br /&gt;
و اگر چنانچه آسمان ابری می‫بود، و امکان دیدن ماه نمی‫بود، سی‫روز شعبان را کامل می‫نمود، سپس روزه رمضان را شروع می‫کرد.&lt;br /&gt;
آن حضرت نه روز ابری را روزه می‫گرفت، و نه به روزه گرفتن آن دستور می‫داد، بلکه دستور داد در صورت ابری بودن آسمان شعبان را سی‫روزه حساب کنند، سپس رمضان را شروع کنند. و این با این فرموده پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;که:&amp;quot; اگر چنانچه آسمان ابری شد حسابش را بجای آورید&amp;quot;.(&amp;quot;فَإِنْ غُمَّ عَلَيْكُمْ فَاقْدُرُوا لَهُ&amp;quot; [به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری].)&lt;br /&gt;
هیچگونه تضادی ندارد. چرا که؛ قدر بمعنی: حساب اندازه گرفته شده است، یعنی اینکه اگر چنانچه هوا ابری بود ماه شعبان را کامل ـ سی روز ـ حساب کنید. آنگونه که در حدیث ثابت دیگری که امام بخاری روایت نموده آمده است:&amp;quot; ماه شعبان را کامل کنید&amp;quot;.(&amp;quot;فَأَكْمِلُوا&amp;nbsp;عِدَّةَ شَعْبَانَ&amp;quot;.[به روایت امام بخاری].) و ماه؛ سی روزه کامل می‫شود.&lt;br /&gt;
روششان در پایان دادن ماه&lt;br /&gt;
همانطور که اشاره شد آن حضرت مسلمانان را با گواهی یک فرد مسلمان به روزه امر می‫کرد. ولی در پایان دادن به ماه مبارک رمضان دو گواه را به شهادت می‫طلبید.&lt;br /&gt;
اگر چنانچه گواهان یا دو شاهد با تأخیر می‫رسیدند، یعنی در روز اول عید و بعد از وقت نماز عید، گواهیشان را می‫پذیرفت و به مسلمانان دستور می‫داد افطار کنند، و در فردای آن روز نماز عید را در وقتش بجای می‫آورد.&lt;br /&gt;
با پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در افطارشان&lt;br /&gt;
امام ابن قیم (رحمه الله) آورده‫اند: آن حضرت&amp;nbsp;&amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در اول وقت افطار می‫کردند و مسلمانان را تشویق می‫نمودند تا در وقت افطار عجله کنند، و سحر نیز میل می‫فرمودند و مؤمنان را به سحر خوردن و تأخیر دادن آن تا آخر وقت تشویق می‫کردند.&lt;br /&gt;
از کمال شفقت و مهربانیشان بر پیروانشان این بود که آنها را تشویق می‫کردند با خرما افطار کنند، و اگر خرمایی در دسترس نبود با آب.&lt;br /&gt;
چرا که معده‫ی خالی چیز شیرین را بهتر قبول می‫کند، و آن برای سلامتی بسیار مفیدتر است، بخصوص برای چشم و قدرت بینائی بسیار مفید است.&lt;br /&gt;
و اما آب: جگر بر اثر روزه کمی خشک می‫شود، و وقتی با آب ‫تر می‫گردد، بهتر می‫تواند پس از آن از غذا استفاده ببرد. برای همین برای تشنه‫ی گرسنه بهتر است قبل از میل کردن غذا کمی آب بنوشد، و بعد از آن غذا بخورد.&lt;br /&gt;
اینها همه بجانب آن فوائد و خاصیتهایی که خرما و آب در پاک نمودن قلب دارند. البته اینها را جز اهل دل و عرفان درک نمی‫کنند.&lt;br /&gt;
ـ آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;قبل از نماز افطار میل می‫فرمودند.&lt;br /&gt;
ـ افطار آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;چند دانه رطب بود ـ البته اگر می‫یافتند ـ و اگر رطبی نمی‫بود چند دانه خرما میل می‫فرمودند. و اگر چیزی از آن نمی‫یافت، با مقداری آب افطار می‫کردند.&lt;br /&gt;
ـ از ایشان آورده‫اند که چون افطار می‫نمودند، می‫فرمودند: &amp;quot;ذَهَبَ الظَّمَأُ, وَابتَلَّتِ العُروقُ، وَثَبَتَ الْأجْرُ إِنْ شَاءَ اللهُ تَعَالى&amp;quot;([به روایت امام ابوداود سیستانی].).&lt;br /&gt;
( تشنگی رفت، روده‫ها تر شد، و به خواست الله متعال پاداش نوشته شد).&lt;br /&gt;
و از ایشان آورده‫اند که می‫فرمودند:&amp;quot; برای روزه‫دار در هنگام افطار کردنش دعائی است که رد نمی‫شود&amp;quot;.(&amp;quot;إِنَّ لِلصَّائِم عِنْدَ فِطْرِه دَعْوةً مَا تُرَدُّ&amp;quot; [به روایت ابن ماجه].)&lt;br /&gt;
و از ایشان ثابت است که می‫فرمودند:&amp;quot; اگر شب از آنسو بیاید، و روز از این سو برود، روزه دار افطار کرده است&amp;quot;.(&amp;quot;إِذَا أَقْبَل اللَّيْلُ مِنْ هَاهُنَا، وَأَدْبَرَ مِنْ هَاهُنَا, فَقَدْ أَفْطَرَ الصَّائِمُ&amp;quot; [به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری].)&lt;br /&gt;
در شرح فرموده‫ی ایشان گفته‫اند که؛ اگر چه روزه‫دار نیت نکرده باشد، در حقیقت با وارد شدن وقت افطار، انگار که افطار کرده است. همانگونه که با طلوع خورشید ما وارد صبح می‫شویم و با غروب آن وارد شب.&lt;br /&gt;
آداب روزه‫دار..&lt;br /&gt;
پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;روزه‫دار را از دشنام دادن، و بدگویی، و دعوا و مرافه براه انداختن بشدت برحذر داشته، و حتی از اینکه جواب دشنام و ناسزا را بدهد منع کرده، و به او دستور داده تا در مقابل بد زبانها و کسانی که به او توهین می‫کنند و ناسزایش می‫گویند تنها ـ و با کمال افتخار ـ بگوید: من روزه دارم. (&amp;quot;إِنِّي صَائِمٌ&amp;quot; [به روایت امام بخاری و امام مسلم نیشابوری].)&lt;br /&gt;
برخی گفته‫اند: با زبان بگوید.&lt;br /&gt;
برخی گفته‫اند: به خودش یادآوری کند، و در دلش بگوید تا دچار غرور و خودپسندی نگردد.&lt;br /&gt;
برخی گفته‫اند: اگر روزه‫اش فرض بود؛ با زبان بگوید، چرا که میدان خودستائی نیست. و اگر روزه‫اش نفلی بود در دلش بخودش بگوید تا دچار ریا و خودنمایی نگردد.&lt;br /&gt;
سنت پیامبر در سفرهای رمضان&lt;br /&gt;
پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;بارها در ماه مبارک رمضان به سفر رفته‫اند، احیانا روزه گرفته و احیانا روزه نگرفته‫اند، و یارانش را نه به روزه گرفتن وادار کرده و نه از روزه خوردن بازداشته است.&lt;br /&gt;
و در جنگها وقتی به دشمن نزدیک می‫شدند به آنها دستور می‫داد روزه‫یشان را بخورند تا در جنگ با دشمن نیرومندتر و قویتر باشند.&lt;br /&gt;
اما اگر در سفر جنگی و یا ستیزی نمی‫بود آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;می‫فرمودند که افطار نمودن رخصتی است. هر کس خواست آنرا اختیار کند، و هر کس خواست روزه بگیرد هیچ اشکالی ندارد.&lt;br /&gt;
برخی از باشکوهترین نبردهای بین حق و باطل در این ماه مبارک بوقوع پیوسته است، چون؛ غزوه‫ی بدر و غزوه فتح مکه.&lt;br /&gt;
و آن حضرت در همه‫ی این سفرها هرگز طول مسافت سفر را برای روزه خوردن مسافر معین نکرده است، و هیچ حکم ثابتی در این زمینه از آن حضرت روایت نشده است.&lt;br /&gt;
صحابه و یاران آن حضرت نیز وقتی تصمیم سفر می‫گرفتند، بدون در نظر گرفتن بیرون رفتن از محوطه‫ی&amp;nbsp;خانه‫های شهر روزه‫یشان را می‫خورده‫اند، و می‫گفتند که این راه و روش پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;بوده است.&lt;br /&gt;
عبید فرزند جبر می‫گوید: با ابوبصره غفاری از یاران رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در ماه رمضان با کشتی‫ای از شهر فسطاط به قصد سفر حرکت کردیم، قبل از اینکه از خانه‫های شهر دور شویم، گفت تا سفره را پهن کردند. و به من گفت: بفرما. گفتم: آیا خانه‫های شهر را نمی‫بینی؟ ایشان با تعجب پرسیدند: آیا مخالفت سنت و روش رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;می‫کنی؟([به روایت امام احمد و ابو داود سیستانی].)&lt;br /&gt;
محمد بن کعب می‫گوید: خدمت انس بن مالک؛ یار و خدمتگذار رسول اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در ماه رمضان رسیدم، ایشان لباس سفر پوشیده آماده سفر بودند، و چهارپایانش را آماده حرکت کرده بود. درخواست غذائی کرد و شروع کرد به خوردن.&lt;br /&gt;
من از ایشان پرسیدم: آیا این از سنت پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;است؟! ایشان فرمودند: بله، این سنت رسول الله &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;است. سپس سوار شده حرکت کردند. ([امام ترمذی این حدیث را حسن شمرده است].)&lt;br /&gt;
این روایات بطور واضح، روشن می‫سازد کسی که در ماه مبارک رمضان قصد سفر می‫کند، می‫تواند روزه‫اش را بخورد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
بوسه در رمضان&lt;br /&gt;
بارها اتفاق می‫افتاد که وقت فجر می‫رسید در حالیکه ایشان از همبستری با همسرشان در حالت جنابت بودند، بعد از فجر ـ یعنی بعد از اذان ـ غسل می‫گرفتند و روزه می‫گرفتند.&lt;br /&gt;
و همسرانشان را در روزهای رمضان با زبان روزه می‫بوسیدند، و می‫گفتند: آنگونه که مضمضمه کردن ـ شستن دهان در وقت وضو ـ روزه را باطل نمی‫کند بوسه نیز روزه را باطل نمی‫کند. (البته شاید اشاره به این نقطه لازم باشد که فقهاء بوسه را برای کسانی که خودشان را نمی‫توانند کنترل کنند ناپسند و مکروه شمرده‫اند!)&lt;br /&gt;
دستور پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;برای کسی که از روی فراموشی چیزی بخورد یا بنوشد.&lt;br /&gt;
و از دستورات آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;است: بر کسی که از روی فراموشی چیزی بخورد یا بنوشد قضاء روزه لازم نیست، و در حقیقت او در مهمانی الله متعال بوده، و الله متعال او را غذا داده و آب نوشانیده، و این خورد و نوش به او نسبت داده نمی‫شود.&lt;br /&gt;
و تنها در صورت تصرفی که از خود انسان انجام می‫گیرد روزه‫اش باطل می‫شود. و خوردن و نوشیدن در فراموشی چون خورد و نوش در خواب است، و کسی که در خواب است و یا آدمی که در فراموشی است، مسئولیت تصرفاتشان را ندارند.&lt;br /&gt;
آنچه روزه را باطل می‫کند&lt;br /&gt;
از آن حضرت ثابت است که؛ خوردن، و نوشیدن،(و آنچه در حکم خورد و نوش است. چون؛ آمپولهای خوراکی یا مقوی.) و استفراغ و حجامه (خارج کردن خون فاسد از جسم) باعث باطل شدن روزه‫ی روزه‫دار می‫شود.&lt;br /&gt;
وبه حکم قرآن جماع (همبستری با همسر) نیز روزه را چون خوردن و نوشیدن باطل می‫کند. و در مورد سرمه بچشم زدن هنگام روزه هیچ حکم ثابتی از پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;روایت نشده. و از ایشان ثابت شده که با دهان روزه مسواک می‫زده‫اند.&lt;br /&gt;
ـ و امام احمد آورده است که آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در حالیکه روزه داشتند آب روی سرشان می‫ریختند.&lt;br /&gt;
ـ و با دهان روزه مضمضه و استنشاق (شستن دهان و بینی در هنگام وضوء و غسل) می‫کردند، البته روزه‫دار را از زیاده روی در استنشاق منع می‫کردند. (تا مبادا آب از راه بینی‫ وارد حلق شود).&lt;br /&gt;
ـ امام احمد می‫گوید: هیچ روایت درستی در دست نیست که نشان دهد پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;با دهان روزه حجامه می‫کرده‫اند. (خارج کردن خون فاسد از جسم)&lt;br /&gt;
ـ همچنین هیچ روایت درستی نیست که نشان دهد آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;از مسواک زدن در اول روز یا آخر آن منع کرده باشد.&lt;br /&gt;
اعتکاف پیامبر &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم&lt;br /&gt;
رسول اکرم &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;همیشه تا آخر عمر مبارکشان ده روز آخر رمضان را در مسجد به اعتکاف می‫نشستند، تنها یک بار اتفاق افتاد که اعتکافشان در رمضان ترک شد، که بجای آن در ماه شوال به اعتکاف نشستند.&lt;br /&gt;
و یکبار نیز برای رسیدن به پاداش شب قدر ده روز اول رمضان را به اعتکاف نشستند، سپس ده روز وسط آنرا، و سپس ده روز آخر را، آنگاه دریافتند که شب قدر یکی از شبهای دهه‫ی آخر رمضان است، از آنروز تا روزی که به الله متعال پیوست همیشه ده روز آخر ماه مبارک را به اعتکاف می‫نشستند.&lt;br /&gt;
ـ دستور می‫دادند با پارچه‫ گوشه‫ای از مسجد را خیمه زنند، تا در آن دور از مردم با پروردگارش به راز و نیاز پردازد.&lt;br /&gt;
ـ و روزی که می‫خواست به اعتکاف بنشیند، نماز فجر را می‫خواند و داخل خیمه‫ی اعتکافشان می‫شد.&lt;br /&gt;
ـ ایشان هر ساله ده روز به اعتکاف می‫نشستند، و در سالیکه وفات کردند بیست روز به اعتکاف نشستند.&lt;br /&gt;
ـ جبریل هر سال یک بار قرآن را بر پیامبر &amp;nbsp;اسلام صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;عرضه می‫کرد، تنها در سالیکه رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;وفات نمودند دو بار قرآن را با رسول الله خواندند.&lt;br /&gt;
ـ وقتی می‫خواست به اعتکاف بنشیند تنها داخل خیمه خود می‫شد.&lt;br /&gt;
ـ در حال اعتکاف مگر برای احتیاجات ضروری یک فرد به خانه‫اش نمی‫رفت.&lt;br /&gt;
ـ و احیانا تنها سرشان را از مسجد به داخل خانه‫ی همسرشان عائشه صديقه رضي الله عنها (که کنار مسجد بود) دراز می‫کردند، و ایشان در حالیکه عادت ماهانه داشتند سر آن حضرت را می‫شستند و شانه می‫زدند.&lt;br /&gt;
ـ احیانا برخی از همسرانشان شبانه در اعتکاف بدیدن آن حضرت می‫آمدند، و وقتی می‫خواستند برگردند، آن حضرت آنها را تا خانه‫هایشان بدرقه می‫کردند.&lt;br /&gt;
ـ با هیچ یک از همسرانش در حال اعتکاف همبستری نکرده‫اند و نه کسی از آنها را بوسیده‫اند.&lt;br /&gt;
ـ وقتی به اعتکاف می‫نشستند، رخت خوابشان را در جای اعتکافشان پهن می‫کردند.&lt;br /&gt;
ـ و اگر در اعتکاف می‫بود و برای ضرورتی از مسجد خارج می‫شد، و در راه خبر بیماری را می‫شنید، برای بیمارپرسی و عیادت راهش را تغیر نمی‫داد.&lt;br /&gt;
ـ باری پیامبر محبوبمان صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;در خیمه‫ای ترکی که بر درش حصیری آویزان کرده بود به اعتکاف نشستند. با گوشه‫نشینی و دوری از مردم می‫خواستند روح اعتکاف و اهداف آنرا دریابند. در حقیقت اعتکاف پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;با آنچه بسیاری از نادانان انجام می‫دهند که اعتکافشان جای دید و بازدید، و گفت و شنود، و بخور و ببر است بکلی متفاوت است. این گونه اعتکافها چیزی است غیر از اعتکاف آن مقام والای رسالت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم .&lt;br /&gt;
الله متعال همه‫ی مؤمنان را توفیق دهد تا به نحو احسن از دستورات و فرامین و سنت آن حضرت &amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم &amp;nbsp;پیروی کنند.&lt;br /&gt;
سايت عقيده افتخار دارد كه مجموعه كتابهاى مفيدى را دربارۀ این&amp;nbsp;ماه پر فیض و برکت و احكام&amp;nbsp;روزه خدمت شما عزیزان معرفى نماید که در بخش فقه و احکام كتابخانه عقيده نشر گردیده است امیدواریم این ماه، ماه رحمت و مغفرت و رهایی از آتش جهنم برای همۀ مسلمانان باشد.&lt;br /&gt;
رمضان مبارک و فضایل آن&lt;br /&gt;
ماه مبارک رمضان شاهراه رستگاری&lt;br /&gt;
فقط برای جوانان در رمضان&lt;br /&gt;
باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;br /&gt;
حکمت و فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه سپر پارسایان&lt;br /&gt;
فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه - فضائل، فوائد، احکام و آداب&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره 12 اول رمضان&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;از سوي دیگر به مناسبت ماه پر فیض و برکت رمضان&amp;nbsp;سايت نوار اسلام صفحه اى خاص به این مناسبت اختصاص داده است، در این صفحه موضوعات علمی و فقهی و اخلاقی مورد نیاز مسلمانان در اين ماه ارائه شده است كه شامل:&amp;nbsp;صفحه نوارهاى رمضان، کتابخانه نوار اسلام، مقاله های نوار اسلام، شنيدن قرآن کريم، فتاوای رمضان، طلب فتوای فوری، تلاوت قرآن کريم و مسابقات ارائه می باشد.&lt;br /&gt;
امیدواریم با دیدار از این صفحه&amp;nbsp;از موضوعات آن استفاده نمایید و هر چه بیشتر با فضایل و احکام اسلام و این ماه فضیل که ماه قرآن و ماه نجات از آتش جهنم است آشنا شوید&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب باطل کننده‌های معاصر روزه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/281</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در ماه مبارک رمضان هم و غم یک مسلمان این است که روزۀ خود را به وجه احسن به جا آورد و در آن کمی و کاستی و یا باطل کننده ای رخ ندهد و همه میدانیم که عموماً هر يک از شش مورد زير روزه را باطل مي&amp;zwnj;کند&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;1 و 2 خوردن و آشاميدن عمدی، لذا اگر کسي از روي فراموشي چيزي را بخورد يا بنوشد (روزه او باطل نمي&amp;zwnj;شود و) نه قضاي روزه بر او لازم است و نه کفاره.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;3- استفراغ عمدی، پس اگر خودبخود استفراغ کرد نه قضاي روزه بر او لازم است و نه کفاره.&lt;br /&gt;
4 و 5- حيض و نفاس، اگرچه در آخرين لحظات روز باشد، بدليل اجماع علماء.&lt;br /&gt;
6- جماع، با ارتکاب عمل جماع روزه باطل و کفاره واجب مي&amp;zwnj;شود.&lt;br /&gt;
اما بسياری از مسلمانان در اين زمان با مسايلی در هنگام روزۀ ماه مبارک رمضان روبرو می شوند که یا در آن شبهه ای وجود دارد و یا فهم حکم شرع در این مسایل جدید برایشان مشکل می باشداين&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتاب شامل&amp;nbsp;&amp;nbsp;توضیح بعضی از باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر&amp;nbsp;&amp;nbsp;روزه و&amp;nbsp;&amp;nbsp;تبیین آنها و ترجیح اقوال علماء پیرامون آن مى&amp;zwnj;باشد به به لطف و کرم الهی در بخش&amp;nbsp;فقه و احکام کتابخانۀ عقیده نشر شده است، امیدواریم که مورد استفادۀ عزیزان قرار گیرد.&lt;br /&gt;
داونلود کتاب:&amp;nbsp;&amp;nbsp;باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین سايت عقيده افتخار دارد كه مجموعه كتابهاى مفيدى را دربارۀ این&amp;nbsp;ماه پر فیض و برکت و احكام&amp;nbsp;روزه خدمت شما عزیزان معرفى نماید که در بخش فقه و احکام كتابخانه عقيده نشر گردیده است امیدواریم این ماه، ماه رحمت و مغفرت و رهایی از آتش جهنم برای همۀ مسلمانان باشد.&lt;br /&gt;
رمضان مبارک و فضایل آن&lt;br /&gt;
ماه مبارک رمضان شاهراه رستگاری&lt;br /&gt;
فقط برای جوانان در رمضان&lt;br /&gt;
باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;br /&gt;
حکمت و فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه سپر پارسایان&lt;br /&gt;
فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه - فضائل، فوائد، احکام و آداب&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره 12 اول رمضان&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
از سوي دیگر به مناسبت ماه پر فیض و برکت رمضان&amp;nbsp;سايت نوار اسلام صفحه اى خاص به این مناسبت اختصاص داده است، در این صفحه موضوعات علمی و فقهی و اخلاقی مورد نیاز مسلمانان در اين ماه ارائه شده است كه شامل:&amp;nbsp;صفحه نوارهاى رمضان، کتابخانه نوار اسلام، مقاله های نوار اسلام، شنيدن قرآن کريم، فتاوای رمضان، طلب فتوای فوری، تلاوت قرآن کريم و مسابقات ارائه می باشد.&lt;br /&gt;
امیدواریم با دیدار از این صفحه&amp;nbsp;از موضوعات آن استفاده نمایید و هر چه بیشتر با فضایل و احکام اسلام و این ماه فضیل که ماه قرآن و ماه نجات از آتش جهنم است آشنا شوید&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>رمضان ماه رحمت و مغفرت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/280</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الحمد لله و الصلاة و السلام علی رسول الله و علی آله و صحبه و بعد..&lt;br /&gt;
بزرگترین نفعی كه انسان می تواند در این ماه كریم به دست بیاورد توبه و بازگشت به سوی پروردگار و محاسبه نفس است.&lt;br /&gt;
درب توبه باز است و عطای الهی در دسترس و فضل و بزرگواری اش هر صبح و شام در برابر ماست؛ اما كجاست آن بازگشته و كجاست آن خواهان مغفرت الهی؟&lt;br /&gt;
این را الله متعال&amp;nbsp;فرموده است: (قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّـهِ إِنَّ اللَّـهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ )&lt;br /&gt;
{بگو ای بندگان من كه بر خودتان با گناهان اسراف روا داشته اید، از رحمت پوردگار ناامید نشوید الله&amp;nbsp;همه گناهان را می بخشد، اوست آمرزنده مهربان} زمر/53&lt;br /&gt;
این ماه فصل توبه و مغفرت است، ماه گذشت و برگشت است، این زمانی است باارزشتر از هر زمان دیگر.&lt;br /&gt;
از رسول الله&amp;nbsp;صلی الله علیه و سلم به سند صحیح روایت شده است كه فرمود:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;الله&amp;nbsp;دست خود را بر شب می گستراند كه گناهكار روز توبه كند و دست خود را بر روز می گستراند كه گناهكار شب توبه كند تا وقتی كه خورشید از مغرب طلوع كند&amp;raquo;. &amp;nbsp; [به روایت امام مسلم نیشابوری]&lt;br /&gt;
بدی های ما بسیار است و گذشت او بیشتر، گناهان ما بزرگند و رحمت او بزرگتر، لغزشهای ما عظیمند و مغفرت او باعظمت تر.&lt;br /&gt;
الله متعال می فرماید:&amp;nbsp;&amp;nbsp;(وَالَّذِينَ إِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً أَوْ ظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ ذَكَرُوا اللَّـهَ فَاسْتَغْفَرُوا لِذُنُوبِهِمْ وَمَن يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا اللَّـهُ وَلَمْ يُصِرُّوا عَلَى مَا فَعَلُوا وَهُمْ يَعْلَمُونَ){و آنهایی كه اگر عمل زشتى انجام دادند یا [با انجام گناه] به خود ظلم كردند به یاد الله افتاده و برای گناهان خود از او طلب آمرزش كردند و چه كسی گناهان را می بخشد جز الله و در حالی كه می دانند بر انجام آنچه از گناهان [در گذشته] انجام داده اند پافشاری نكردند} آل عمران/135&lt;br /&gt;
پافشاری نكردند،&amp;zwnj; بر انجام گناه اصرار ننمودند، اشتباه كردند اما [در حضور الله متعال] به اشتباه خود اعتراف كردند، گناه كردند اما استغفار نمودند، و بد كردند اما پشیمان شدند، و الله نیز آنها را مورد آمورزش خود قرار داد.&lt;br /&gt;
از رسول الله &amp;ndash; صلی الله علیه و سلم &amp;ndash; با سند صحیح روایت است كه فرمود:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;به خاك مالیده شود بینی آنكه رمضان را دریافت و مورد آمرزش قرار نگرفت&amp;raquo;&amp;nbsp;[به روایت ترمذی و حاكم. نگا: صحیح الجامع 3510]&lt;br /&gt;
رمضان فرصتی است كه دیگر تكرار نمی شود، چنین فرصتی پیش نمی آید مگر اندك، آیا هست تلاشگری كه از آن استفاده برد؟&lt;br /&gt;
گناهان سال، همه سال از پرونده كسی كه در این ماه با الله متعال صادق باشد پاك می شود اگر از گناهان كبیره اجتناب كند...&lt;br /&gt;
در حدیث قدسی الله سبحانه و تعالی خطاب به بندگانش می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;ای بندگان من، شما شب و روز گناه می كنید و من تمام گناهان را می بخشم، پس از من طلب بخشش كنید تا شما را بیامرزم&amp;raquo; [به روایت امام مسلم]&lt;br /&gt;
گناه جزو طبیعت ماست اما برخی از ما توبه می كنند و برمی گردند و از الله متعال طلب آمرزش می كنند و برخی دیگر بر آن پایفشاری می كنند و ادامه داده و تكبیر می ورزند و این گروه دومی همان گروه نگونبخت و گم شده از راه هدایتند.&lt;br /&gt;
باز الله متعال در حدیث قدسی می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;ای فرزند آدم، تو مرا فرانخواندی و به من امید نبستی مگر اینكه هر آنچه كرده بودی را بخشیدم و [تعداد گناهانت] برایم مهم نیست&amp;raquo; [به روایت ترمذی]&lt;br /&gt;
ای روزه داران این ماه فرصت ماست برای توبه نصوح و این روزها همه اش غنیمت است. آیا از این فرصت و از این غنیمت استفاده می بریم؟&lt;br /&gt;
خیلی ها رمضان گذشته را با ما روزه گرفتند سپس به سوی پروردگار بازگشتند، رفتند، با اعمال خود و آثار خود را بر جا گذاشتند. و ما به این رمضان رسیدیم.&lt;br /&gt;
برادرم، خواهرم، می دانی كه:&lt;br /&gt;
از علامتهای قبول روزه داران به درگاه الله متعال متعال صدق در توبه و عزم به بازنگشتن به گناه و پشیمانی از آن است. (وَهُوَ الَّذِي يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَعْفُو عَنِ السَّيِّئَاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ){و اوست كه توبه را از بندگانش می پذیرد و از بدی ها می گذرد و می داند كه چه می كنید} شوری/25&lt;br /&gt;
و از رسول الله صلی الله علیه و سلم روایت است كه:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;قسم به آنكه جانم در دست اوست اگر شما گناه نكنید [به مانند فرشتگان] حداوند شما را خواهد برد و گروهی را خواهد آورد كه گناه كنند و از الله متعال طلب بخشش كنند و بخشیده شوند&amp;raquo; [به روایت مسلم]&lt;br /&gt;
آنكه در رمضان توبه نكند كی توبه خواهد كرد؟ آنكه در این ماه به سوی پروردگارش بازنگردد كی برخواهد گشت؟&lt;br /&gt;
بعضی از روزه داران در ماه رمضان به راه درست می روند اما تا رمضان تمام شد و روزه پایان یافت به همان حال قبل از رمضان باز می گردند و تمام آنچه را در رمضان ساخته اند ویران می كنند و تمام عهدهایی را كه با پروردگار بسته اند زیر پا می گذارند. تمام عمر همینطور در ساختن و ویران كردن و بستن و نقض كردن می گذرد...&lt;br /&gt;
بسیاری از سلف [گذشتگان صالح از صحابه و تابعین و تابع تابعین] با پایان یافتن رمضان در فراقش می گریستند و بر رفتنش تاسف می خوردند و این از صفای دل و روشنی درونشان بود.&lt;br /&gt;
دوستان عزيز!&lt;br /&gt;
سايت عقيده افتخار دارد كه مجموعه كتابهاى مفيدى را دربارۀ این&amp;nbsp;ماه پر فیض و برکت و احكام&amp;nbsp;روزه خدمت شما عزیزان معرفى نماید که در بخش فقه و احکام كتابخانه عقيده نشر گردیده است امیدواریم این ماه، ماه رحمت و مغفرت و رهایی از آتش جهنم برای همۀ مسلمانان باشد.&lt;br /&gt;
رمضان مبارک و فضایل آن&lt;br /&gt;
ماه مبارک رمضان شاهراه رستگاری&lt;br /&gt;
فقط برای جوانان در رمضان&lt;br /&gt;
باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;br /&gt;
حکمت و فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه سپر پارسایان&lt;br /&gt;
فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه - فضائل، فوائد، احکام و آداب&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره 12 اول رمضان&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرارسیدن ماه پرفیض و برکت رمضان مبارک باد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/279</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حمد وسپاس بيکران و ستايش ومدح وثنای بی&amp;zwnj;مانند از آنِ آن ذات پاک يکتائی که امت ما را بر امتهای پيشين برتريها داد، اله و خالقی که به ما ماه پر نور و برکت رمضان را هديه کرد، خدائی که شب قدر را به ما ارزانی داشت تا با يک شب اجر هزار ماه طاعت و عبادت بدست آريم&amp;hellip;&lt;br /&gt;
سلام و درود و صلوات پر بار بادا رسول هدايت را، راهنمای بشريت وهادی انسان از سياه چالهای ظلمت و تاريکی بسوی مراتب والای نور و هدايت&amp;hellip; پيام آور توحيد و رسالت&amp;hellip; آنکه پرتو ماه پر نور رمضان بر دستان مبارکش از جانب پروردگارمان به ما ارزانی داشته شد&amp;hellip;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رمضان ايستگاه پر نور سال است&amp;hellip; در رمضان حقيقت هر انسان برملا می&amp;zwnj;شود و پرده از واقعيتش بر کشيده می&amp;zwnj;گردد&amp;hellip; تو گويی رمضان ندای رب العالمين است &amp;hellip; برای بندگانی که هميشه گناه و کوتاهی خويش بر دوش شيطان لعين می&amp;zwnj;اندازند و شانه از زير بار کوتاهي&amp;zwnj;های خويش خالی می&amp;zwnj;کنند&amp;hellip;&lt;br /&gt;
ندای پر طنين آسمانی است که با صلابت قلبها را بخود می&amp;zwnj;آرد که ای بندگان خدا&amp;hellip; حال که ما شيطانها را به زنجير کشيده&amp;zwnj;ايم درهای جهنم سوزناک را قفل و زنجير زده&amp;zwnj;ايم و درهای بهشت&amp;zwnj;های برين را باز گشوده&amp;zwnj;ايم&amp;hellip; به ميدان آی و خودت را نشان ده.&lt;br /&gt;
ثابت کن که کيستی و چه در توان داری&amp;hellip; با دستان خود جايگاهت را در بهشتهای والای الهی رقم زن&amp;hellip;&lt;br /&gt;
آری! رمضان ماه نور و يکرويی است&amp;hellip; ماه مرد خدا بودن و يا شيطان شدن (!) است.. آنکه در رمضان ره خدا نجويد و پا در ره شيطان نهد او ديگر راه شيطان نپيموده ويا در دام شيطان نيفتاده، بلکه او خود شيطانی است از شياطين بشر&amp;hellip; چرا که در رمضان شيطانی نيست که او را از راه به چاه کشد&amp;hellip; اين صفات شيطانی است که در خون و رگ او با او آميخته شده و فطرت و وجدان ايمانی او را درهم شکسته از او موجودی ديگر در کالبد انسانی پرورده&amp;hellip; که اگر توان ديدن او را با آينه صدق و صفای ايمانی داشته باشی همان چهره ننگ و عصيانگر شيطان را در چهار چوب کالبدی انسانيش خواهی ديد&amp;hellip;&lt;br /&gt;
بار دگر رمضان به ديدار انسانيت می&amp;zwnj;آيد در حاليکه هنوز سرزمينهای مسلمانان غرق در خون است&amp;hellip; رمضان به اميد اينکه شايد خونهای سال گذشته خشک شده باشند و ملتهای اسلامی ره بسوی رشادت برده باشند و يا اينکه از خواب سنگين خرگوشی بيدار شده باشند بار دگر فرا رسيد&amp;hellip; اما ديد که با تلاقهای خون مسلمانان مظلوم سيلاب شده، درياچه&amp;zwnj;های خون اقيانوس گشته&amp;hellip; کمرهای مسلمانان در هر جای دنيا زير تازيانه&amp;zwnj;های کفر به زانو در افتاده است&amp;hellip;&lt;br /&gt;
چشمان رمضان چنين حيره و حيران به جهان دوخته گشته&amp;hellip; اما چه کند که او را زبانی و توانی نيست.&lt;br /&gt;
آيا گمان می&amp;zwnj;بری که اگر رمضان را توانی بود و خبر از قصه هميشگی ظلم و ستم، ذلّت و خواری &amp;hellip; آيا بار دگر می&amp;zwnj;آمد&amp;hellip; گمانم هرگز!&lt;br /&gt;
آيا اگر رمضان را زبانی می بود با صدای بلند داد بر نمی آورد که:&lt;br /&gt;
ـ ای مسلمانان بر خيزيد&amp;hellip; اين چه عزا وچه ماتم است؟ تا کی در زير تازيانه های ظالمان شراب ذلت وخواری را مستانه می نوشيد؟&lt;br /&gt;
من آمده ام تا گناهانتان را شستشو دهم، بيائيد دست در دستانم نهيد تا پاک شويد وبه سوی درگاه پروردگارتان دستان لرزان اميد وآرزو دراز کنيد شايد که خداوند در شما همت حرکت نهد&amp;hellip; برخيزيد وکيان ظلم وستم از زمين برچينيد&amp;hellip;&lt;br /&gt;
اما چه که بغض گلوی رمضان را محکم فشرده وتوان سخن از او ربوده است&amp;hellip; وای کاش مسلمانان پيام رمضان دريابند وحرف ناگفته را خود شنوند.&lt;br /&gt;
سايت عقيده افتخار دارد كه مجموعه كتابهاى مفيدى را دربارۀ این&amp;nbsp;ماه پر فیض و برکت و احكام&amp;nbsp;روزه خدمت شما عزیزان معرفى نماید که در بخش فقه و احکام كتابخانه عقيده نشر گردیده است امیدواریم این ماه، ماه رحمت و مغفرت و رهایی از آتش جهنم برای همۀ مسلمانان باشد.&lt;br /&gt;
رمضان مبارک و فضایل آن&lt;br /&gt;
ماه مبارک رمضان شاهراه رستگاری&lt;br /&gt;
فقط برای جوانان در رمضان&lt;br /&gt;
باطل کننده&amp;zwnj;های معاصر روزه&lt;br /&gt;
حکمت و فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه سپر پارسایان&lt;br /&gt;
فقه روزه&lt;br /&gt;
روزه - فضائل، فوائد، احکام و آداب&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره 12 اول رمضان&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>به مناسبت ماه مبارك رمضان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/278</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الحَمْدُلِلهِ رَبِّ العَالمِینْ، وَالصَّلاَةُ وَالسَّلاَمُ عَلىَ نَبِینّا مُحَمّدٍ &amp;shy;&amp;shy;المَبعٌوثُ رَحْمَة لِلعَالمِین، وَعَلى آلِهِ وَأصْحَابهِ وَمَنْ دَعَا بِدَعْوَتِهِ إلىَ یوْمِ الدِّین.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;أمّا بعد:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;(یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آَمَنُوا كُتِبَ عَلَیْكُمُ الصِّیَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِینَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ) [البقرة/183]&lt;br /&gt;
&amp;laquo;ای&amp;zwnj; مؤمنان&amp;zwnj;! بر شما روزه&amp;zwnj; فرض&amp;zwnj; گردانیده&amp;zwnj; شد همان&amp;zwnj;گونه&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; بر آنان&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; پیش&amp;zwnj; از شما بودند، فرض&amp;zwnj; شده&amp;zwnj; بود باشد كه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; تقوی&amp;zwnj; گرایید&amp;raquo;&lt;br /&gt;
همچنین&amp;zwnj; روزه&amp;zwnj; از ابعاد و جنبه&amp;zwnj;های&amp;zwnj; گوناگونی &amp;zwnj;پدیدآورنده&amp;zwnj; تقوى&amp;zwnj; است، كه&amp;zwnj; مهم&amp;zwnj;ترین&amp;zwnj; این&amp;zwnj; ابعاد عبارتند از:&lt;br /&gt;
1- روزه، نفس&amp;zwnj; انسان&amp;zwnj; را در آشكار و نهان&amp;zwnj; بر خشیت&amp;zwnj; و بیم&amp;zwnj; از الله متعال &amp;zwnj;تربیت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كند زیرا جز پروردگار بزرگ، هیچ&amp;zwnj; كس&amp;zwnj; دیگری&amp;zwnj; ناظر و مراقب&amp;zwnj; شخص&amp;zwnj;روزه&amp;zwnj;دار نیست&amp;zwnj; و این&amp;zwnj; از بزرگترین&amp;zwnj; فواید روحی&amp;zwnj; روزه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
2- روزه، از حدت&amp;zwnj; و غلیان&amp;zwnj; شهوت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كاهد، چنان&amp;zwnj;كه&amp;zwnj; در حدیث&amp;zwnj; شریف&amp;zwnj; آمده&amp;zwnj;است: &amp;laquo;الصوم&amp;zwnj; جنه&amp;zwnj;&amp;laquo;یعنی: روزه&amp;zwnj; سپر نگه&amp;zwnj;دارنده&amp;zwnj;ای&amp;zwnj; از آلودگی&amp;zwnj; به&amp;zwnj; شهوات&amp;zwnj; وارتكاب&amp;zwnj; گناهان&amp;zwnj; است&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
3- روزه، احساس&amp;zwnj; شفقت&amp;zwnj; و رحمت&amp;zwnj; به&amp;zwnj; همنوع&amp;zwnj; را در انسان&amp;zwnj; بیدار می&amp;zwnj;سازد.&lt;br /&gt;
4- روزه، تحقق&amp;zwnj;بخش&amp;zwnj; معنای&amp;zwnj; برابری&amp;zwnj; میان&amp;zwnj; توانگران&amp;zwnj; و فقرا و اشراف&amp;zwnj; و عوام &amp;zwnj;است&amp;zwnj; و این&amp;zwnj; از فواید اجتماعی&amp;zwnj; روزه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
5- روزه، انسان&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; نظم&amp;zwnj; و برنامه&amp;zwnj;ریزی&amp;zwnj; و مهار نمودن&amp;zwnj; اراده&amp;zwnj; عادت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;دهد.&lt;br /&gt;
6- روزه، بنیه&amp;zwnj; جسمی&amp;zwnj; را تجدید نموده، سلامتی&amp;zwnj; و نیروی&amp;zwnj; حافظه&amp;zwnj; را تقویت&amp;zwnj; و بدن&amp;zwnj; را از رسوبها و تخمیرات&amp;zwnj; زیانبخش&amp;zwnj; می&amp;zwnj;رهاند، چنان&amp;zwnj;كه&amp;zwnj; این&amp;zwnj; معنی&amp;zwnj; و بیش&amp;zwnj; از آن&amp;zwnj; نیز در این&amp;zwnj; حدیث&amp;zwnj; شریف&amp;zwnj; آمده&amp;zwnj; است: &amp;laquo;صوموا تصحوا: روزه&amp;zwnj; بگیرید تا تندرست&amp;zwnj;شوید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان!&lt;br /&gt;
بدون شك این ماه یكی از آن نعمتهایی است كه خداوند جل جلاله به وسیله آن بر بندگانش منت نهاده چیزی كه آن را علامت و نشانه خیرها و فرصتی برای انجام عمل صالح قرار داده است نعمتی كه از گذشته تا به حال و به طور مستمر ادامه خواهد داشت. در این ماه خداوند متعال قرآن را كه برای مردم هدایت و دلیل روشن و وسیله تشخیص حق از باطل است را نازل كرده است.&lt;br /&gt;
غزوه بدر كبری كه خداوند به سبب آن اسلام و اهلش را عزت و شرك و اهلش را ذلیل كرد و نامش را یوم الفرقان نهاد در این ماه روی داد.&lt;br /&gt;
در این ماه فتح بزرگی كه به وسیله آن خانه خداوند جل جلاله از لوث وجود بتها پاك شد و مردم گروه گروه بعد از آن به دین خداوند وارد شدند تحقق یافت. در این ماه پنج ویژگی به امت محمد اهداء گردید چیزی كه قبل از آن به هیچ امتی داده نشده بود.&lt;br /&gt;
بزرگترین نفعی كه انسان می تواند در این ماه كریم به دست بیاورد توبه و بازگشت به سوی پروردگار و محاسبه نفس است.&lt;br /&gt;
درب توبه باز است و عطای الهی در دسترس و فضل و بزرگواری اش هر صبح و شام در برابر ماست؛ اما كجاست آن بازگشته و كجاست آن خواهان مغفرت الهی؟&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نامه ای سر گشاده به نویسندگان ومترجمان و ناشران محترم...</title>
<link>http://qalamlib.com/news/277</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-justify: kashida; text-align: justify; line-height: 200%; text-kashida: 0%&quot;&gt;شاید بسیاری از مردم نمی دانند که کار یک نویسنده مسلمان، یا یک ناشر، و حتی یک کتابفروش با هدف هرگز از کار یک مجاهدی که جان بر کف نهاده در جبهه حق علیه باطل با خون سرخ خود بر کالبد پستیها وکفر خط قرمز می کشد، کمتر نیست...&lt;br /&gt;
کتاب اسلامی سدهای کفر و شرک را در هم می کوبد. و بر عقلهای مرده و گمراه روح توحید می دمد، و در صحنه زندگی مردانی می پروراند که بار سنگین جامعه را بر دوش می کشند، و تا لحظاتی پیش چون جسد مرده ای سربار جامعه بودند.&lt;br /&gt;
و آنچه در اینجا می توان گفت اینست که هرگز قلم نمی تواند در کنار شمشیر فخر بفروشد مگر آنگاه که چون شمشیر صادق و بی ریا باشد! ودر کارش جز رضایت پروردگار یکتا و رسیدن بدو هیچ نخواهد.&lt;br /&gt;
حال بگذارید سخنم را با مثالی چند واضحتر سازم:&lt;br /&gt;
به کتاب &amp;quot;أربعین نووی&amp;quot; و&amp;quot;ریاض الصالحین&amp;quot; امام نووی توجه کن. این دو کتاب از نظر کار علمی و پژوهشی هیچ ارزشی ندارند! کتاب أربعین عبارت است از چهل حدیث که ایشان از کتابهای آماده حدیث گلچین کرده اند. واحادیث پیامبر اکرم همه اشت گل است و با ارزش، و چون این کار از یک دانش آموز ابتدائی هم بر می آید! وما امثال این گلچینها در کتابخانه اسلامی صدها کتاب داریم! وکتاب &amp;quot;ریاض الصالحین&amp;quot; هم گلچینی است از احادیث پیامبر اکرم علیه الصلاة والسلام چون کتاب أربعین البته با حجمی بزرگتر!&lt;br /&gt;
در حقیقت امام نووی با این دو کتابش ـ از نظر علمی و پژوهشی ـ هیچ به کتابخانه اسلامی اضافه نکرده اند! نه در راه بدست آوردن حدیث رنجهای بخاری ومسلم وسایر علماء حدیث را متحمل شده اند و نه هیچ زحمت دیگری! تنها کتابهای آن بزرگان را بدست گرفته گلچینی اختیار نموده...&lt;br /&gt;
حال پرسشی که خود را مطرح می سازد اینست که:&lt;br /&gt;
پس چرا این دو کتاب ـ وسایر کتابهای این مؤلف ـ آنچنان مورد قبول خاص وعام گشته است؟ تا جایی که بیشتر جوانان مسلمان امروزی أربعین نووی در جیب دارند. وتقریبا هیچ خانه ای از کتاب ریاض الصالحین خالی نیست؟!&lt;br /&gt;
تنها تبریر و تفسیری که برای این موفقیت بزرگ این دو کتاب می بینم همان اخلاص وصداقت و بی ریایی مؤلف و یا بعبارت درستر گرد آورنده این دو کتاب است.&lt;br /&gt;
کتاب &amp;quot;تحفه اثنا عشریه&amp;quot; نوشته امام توحید شاه عبد العزیز فرزند ارشد مجدد قرن دوازدهم امام شاه ولی الله دهلوی کتابی است در باب خود بی مانند. که متأسفانه تا کنون به عربی برگردانده نشده است.&lt;br /&gt;
این کتاب در زبان فارسی و بین فارسی خوانان از اهمیت بسیار زیادی برخوردار است. ومصدر بسیار مهمی است برای تصحیح مفاهیم غلط در جامعه فارسی زبانان امروزی.&lt;br /&gt;
این کتاب می تواند ـ البته اگر به عربی ترجمه شود ـ در جهان اسلام انقلابی به پا کند. و مختصری از آن به عربی بر گردانده شده است. چیزی&amp;nbsp;که همیشه مرا به حیرت می انداخت این بود که چرا این مختصر جایگاهی که شایسته آن است را در کتابخانه اسلامی پیدا نکرده است؟!&lt;br /&gt;
مثلا چرا در بحثهای علمی و پژوهشی آن جایگاهی که شایسته آن است را بدست نیاورده؟ چرا از عربی به زبانهای دیگر دنیا ترجمه نگشته، و ... و خیلی چراهای دیگر...&lt;br /&gt;
چندی پیش خواستم جواب این سؤالاتی که ذهنم را مشغول داشته بود را بیابم. وقتی مقدمه مترجم را مطالعه نمودم و دیدم که چطور کتاب به این ارزشمندی را به یک حاکم سیاسی روز اهدا نموده و چگونه آن حاکم را مدح و ستایش کرده، دریافتم که کارش از کجا لنگ می زند!!&lt;br /&gt;
کار کتاب اسلامی چون بخشی از خدمت به قرآن و تصویری است از زنده بودن قرآن و حفاظت از مرام آن، یعنی کاری است در راستای آنچه خداوند متعال بر عهده گرفته &amp;quot; انا نحن نزلنا الذکر وانا له لحافظون&amp;quot; ـ الحجر/9 ـ اگر چنانچه ذره ای هم از معیارهای اخلاص وصداقت، امانت و حق شناسی، پرهیزگاری و تقوا، کم بیاورد هرگز موفق نخواهد شد.&lt;br /&gt;
و اگر بویی از ریا و خود خواهی، و از تجارت و جشع و طمع، و از مکر و حیله، و... در آن باشد هرگز میوه اش به ثمر نخواهد رسید.&lt;br /&gt;
اینجاست که جای دارد هر انسان عاقلی که در این راستا گام می نهد؛ اولا احساس کند که در چه سنگر مهمی ایستاده است. سپس چشمانش را به سعادت اخروی بدوزد، و هرگز اجازه ندهد شیطان او را از این قله شامخ و بلند انسان سازی ذره ای بلغزاند، که لغزیدن از این جایگاه جز مرگ و نابودی در دره های تنگ و تاریک هیچ به ارمغان نخواهد آورد.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتاب کارنامۀ امام زمان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/276</link>
<description>&lt;p&gt;از قدیم و ندیم گفته&amp;zwnj;اند: سنگ اول را چون نهد معمار کج.. تا ثریا مى رود دیوار کج!&lt;br /&gt;
مخترعان مذهب شیعه خیمه مذهب را بر روی عمود امامت بنا نهادند. و مفکوره&amp;zwnj;ی آنها بر این بود که امامت پس از حضرت علی بصورت عمودی به فرزندش حسن، و پس از او بصورت افقی به برادرش حسین، و از آن پس سیر عمودی تا بروز قیامت خواهد داشت.&lt;br /&gt;
این ماجرا با جذر و مدهای بسیار عجیبی که در پی آن پس از هر امامی مذهب شیعه به دهها فرقه تقسیم می&amp;zwnj;گشت به پیش رفت. تا اینکه با فاجعه&amp;zwnj;ی مرگ امام حسن عسکری امام یازدهم قطار بیکباره ایستاد!&lt;br /&gt;
امام حسن عسکری در سال 260 هجری در سامرا بدون اینکه صاحب فرزندی شود وفات کردند. میراثش نیز بین مادرش &amp;quot;حدیث&amp;quot; و برادرش &amp;quot;جعفر&amp;quot; تقسیم شد.&lt;br /&gt;
این مرحله در تاریخ تشیع بمرحله&amp;zwnj;ی حیرانی مشهور است. شیعه حیران و پریشان که چه کنیم، بحال خود مانده بودند.&lt;br /&gt;
این پریشانی باعث شد 14 مذهب جدید به لیست مذهبهای تشیع اضافه شود. برخی به بن بست رسیدن امامت راضی شدند. برخی مرگ حسن عسکری را انکار کرده او را مهدی نامیده غائب کردند. برخی مرگش را که بچشمان خود دیده بودند انکار نکرده گفتند دوباره زنده شده، و از دید مردم پنهان شده است. و....&lt;br /&gt;
آخرین گروه که همان دوازده امامیها باشند با استدلالهای بسیار عجیبی که؛ دنیا تا روز قیامت بر شاخ امامی باید سوار باشد برای حسن عسکری فرزندی خیالی زائیده او را محمد نام گذاشتند، که بعدها شناسنامه&amp;zwnj;اش را عوض کرده نام &amp;laquo;مهدی&amp;raquo; را برایش زیبنده&amp;zwnj;تر دیدند، و این موجود فلسفی را که وجود خارجی نداشت از دید مردم پنهان تصور کرده، امام غائب نامیدند.&lt;br /&gt;
این امامی که از رحم فلسفه بدنیا آمد در طول تاریخ تشیع حکم یک تریاک مسکن و افیون را بازی کرده و می&amp;zwnj;کند.&lt;br /&gt;
هر جا آخوندها مال و منال و آبروی مردم را به چپاول گیرند با سرپوش &amp;quot;مهدی&amp;quot; دزدیهای خودشان را می&amp;zwnj;پوشانند. خود را نائبان بر حق مهدی خیالی جای زده از مردم ساده &amp;quot;خمس&amp;quot; ـ یک پنجم ـ دست رنجشان را به تاراج می&amp;zwnj;برند. دخترهای زیبایشان را طعمه شهوترانی خود قرار داده صیغه می&amp;zwnj;کنند. هر جا کارشان گره خورد؛ دروغ و مکر و نیرنگ را &amp;quot; تقیه &amp;quot; نامیده کارشان را راه می&amp;zwnj;اندازند.&lt;br /&gt;
نام &amp;quot;مهدی&amp;quot; را بعنوان مسکنی برای خاموش کردن آتش خشم و غضب و سرپوش نهادن بر عقل و چشم و گوش مردم بنفع خود بکار می&amp;zwnj;گیرند.&lt;br /&gt;
برای همین &amp;quot;مهدی&amp;quot; در پیش آنها همیشه زنده است. در کنار قبرهایشان، در چاه جمکران، و در برنامه&amp;zwnj;های روضه خوانی، و در دوشیدن مال از مردم، و در جلسه&amp;zwnj;های شهوترانیشان و...&lt;br /&gt;
همچنین وقتی آخوندها حکومت را بدست می&amp;zwnj;گیرند، و یا با حاکمان چپاولگر و فرعونیان ظالم کاخ نشین و هم کاسه می&amp;zwnj;شوند، نام مهدی سرپوشی خواهد بود بر ظلم و ستم و چپاول و دزدی حکومتها.&lt;br /&gt;
چهره&amp;zwnj;ی ننگ ایران امروز تصویری زنده است از آنچه تاریخ بارها در حکومتهای صفویان و فاطمیان و آل بویه و غیره شاهد آن بوده است.&lt;br /&gt;
کسانی که خود را سربازان امام زمان ـ که نام دیگری است برای مهدی و اشاره&amp;zwnj;ایست به خدایی او، و اینکه کنترل زمین و زمان بدست اوست! ـ به زن و دختر مردم تجاوز می&amp;zwnj;کنند، ملیاردها دلار پول نفت و ثروت ملی کشور را در بانکهای خارجی برای خود انبار می&amp;zwnj;کنند. فقر و بیکاری و فساد و فحشا را برای مردم به ارمغان می&amp;zwnj;آورند، و... و نهایتا با مسکن اینکه؛ ای مردم حرفی نزنید که امام مهدی خودش سکان این کشور را دست گرفته و ناخدای میهن است. و رهبر نائب اوست و همیشه با او در تماس است و بدون دستور او کوچکترین حرکتی نمی&amp;zwnj;کند... بر گردن مردم سوار می&amp;zwnj;شوند.&lt;br /&gt;
مردم ساده لوح نیز چون گوسفندان درپی این مأموران مهدی ناپیدای خاموش در حرکتند و از ترس اینکه مبادا کوچکترین اعتراضی آنها را به دره کفر و الحاد پرت کند و از رحمت بیدریغ و خیالی مهدی افسانه&amp;zwnj;ای محروم بمانند و مورد عقاب سخت و بی مهری شدید دولت قرار گیرند جیک هم نمی&amp;zwnj;زنند!!..&lt;br /&gt;
یک نگاه گذرا در روند رشد نام &amp;quot;مهدی&amp;quot; در ایران خود شاهد گواهی است برای عاقلان.&lt;br /&gt;
مهدی که تنها یک نام و امید بود، در طول جنگ ایران وعراق هشت سال تمام شیعیان ایرانی و عراقی را بجان هم انداخت. اینها در اینطرف مرز بدستور مهدی و زیر فرمان او حرکت می&amp;zwnj;کردند و آنها در آنطرف مرز و 4 ملیون شیعه نادان قربانیان شعار &amp;quot;مهدی بیا.. مهدی بیا&amp;quot; شدند!&lt;br /&gt;
پس از جنگ مدتی مهدی کم رنگتر شد. و با آمدن حکومت احمدی نژاد بصورت بسیار جدیتری وارد صحنه سیاست شد. کشت و خورد و برد و کرد و کسی هم چیزی نگفت! و هنوز هم ماجرا در جریان است...&lt;br /&gt;
از قدیم گفته&amp;zwnj;اند: تا نباشد چیزکی مردم نگویند چیزها!..&lt;br /&gt;
پس این مهدی و این افسانه از کجا سبز شد؟ آیا دین مبین اسلام کسی بنام &amp;quot;مهدی&amp;quot; را می&amp;zwnj;شناسد. حقیقت این شخص چیست؟ و او کیست؟&lt;br /&gt;
پرسشی است که در ذهن هر انسانی می&amp;zwnj;تواند سبز شود.&lt;br /&gt;
این کتاب با زبانی بسیار ساده چهره&amp;zwnj;ی مهدی افسانه&amp;zwnj;ای را برای خواننده بر ملا می&amp;zwnj;کند. و تصویری گویا از حقیقت مهدی واقعی نیز عرضه می&amp;zwnj;دارد.&lt;br /&gt;
نویسنده نمی&amp;zwnj;خواهد ایده و باور خود را به مردم تلقین کند. او از خانواده&amp;zwnj;ای شیعه برخواسته، مهار خود را از دست آخوند جماعت گرفته بدست عقل خود داده، و با عقل و درایت به اسلام واقعی پی برده، و در این کتاب سعی دارد با عقل و هوش خواننده سخن گوید. و به او بگوید؛ بیندیش، فکر کن، تدبر کن، با دقت توجه کن، بنگر، حقیقت را درخواهی یافت...&lt;br /&gt;
بیائید با نویسنده همگام شویم، تا مهدی واقعی را از مهدی تقلبی و ساختگی بشناسیم....&lt;br /&gt;
و این هم لینک کتاب در کتابخانه عقیده&lt;br /&gt;
کارنامۀامام زمان&lt;br /&gt;
برای شناخت بیشتر تاریخچه مهدی در مذهب شیعه، خوانندگان محترم را به خواندن بخش &amp;quot; فرضیه&amp;zwnj;ی وجود مهدی &amp;quot; در کتاب (تکامل فکر سیاسی شیعه از شورا تا ولایت فقیه) نوشته؛ دانشمند و پژوهشگر شیعه معاصر احمد الکاتب تشویق می&amp;zwnj;کنیم.&lt;br /&gt;
خوانده عزیز، برای معلومات بیشتر در باره امام زمان شیعه، به کتابهای ذیل مراجعه کنید:&lt;br /&gt;
1- بررسى علمى در احاديث مهدى، نوشته&amp;zwnj; آیت الله ابوالفضل برقعی&lt;br /&gt;
2- آمدن مهدي افسانه است، نوشته&amp;zwnj; دکتر محمد جودت الیوسف&lt;br /&gt;
3-&amp;nbsp;مهدي موعود يا مهدي موهوم؟ نوشته&amp;zwnj; دكتر عبدالرحیم ملا زاده (ابوالمنتصر)&lt;br /&gt;
4- عجيب ترين دروغ تاريخ، نوشته&amp;zwnj; دکتر عثمان الخمیس&lt;br /&gt;
5- غایب همیشه غایب، نوشته&amp;zwnj; علی حسین امیری&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نيم رخی از سيمای پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَ آله وسَلَّمَ</title>
<link>http://qalamlib.com/news/275</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نیم رخی از سیمای پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله وسَلَّمَ &amp;nbsp;&lt;br /&gt;
اهمیت سیرت&lt;br /&gt;
متأسفانه اهمیت وجایگاه زندگینامه و یا سیرت پیامبر اكرم &amp;nbsp;صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;بر بسیاری از مسلمانان بدرستی واضح و روشن نیست.&lt;br /&gt;
شاید بهترین توصیفی كه می تواند اهمیت سیرت را به تصویر بكشد همان سخن خویشان ویاران وشاگردان آن حضرت بود كه می فرمودند: پیامبر قرآنی بود كه با دو پا درمیان انسانها راه می رفت.&lt;br /&gt;
وچون از مادر مؤمنان عائشه صدیقه؛ همسر گرانقدر آن حضرت از اخلاق پیامبر پرسیده شد فرمودند: اخلاقشان قرآن بود!&lt;br /&gt;
قرآن كریم این واقعیت را در یك آیه؛ كه تا روز رستاخیز حنجره های قاریان با ندای ملكوتی تلاوت آنرا برای گوشهای عاشقان رسالت می سرایند، ثبت كرده است: { وَإِنَّكَ لَعَلى خُلُقٍ عَظِیمٍ}(قلم/4) (&amp;rlm;تو دارای خوی سترگ ( یعنی صفات پسندیده و افعال حمیده ) هستی).&lt;br /&gt;
به عبارتی واضحتر می توان گفت: برای درك صحیح ودرست مفاهیم قرآنی هر مسلمان نیاز دارد سیرت پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ را به دقت وارسی كند. یعنی اینكه قرآن مرامی است نظری از معیارهای والا وبرتری كه ساختار فرد وجامعه ونهایتاً سعادت بشریت را تضمین می كند وسیرت پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;سیمای تطبیقی وعملی این مفاهیم است.&lt;br /&gt;
وچون انسان نیاز به تصویری روشن وعملی از این معیارهای انسان ساز داشت، خداوند پیك خود را از میان همین انسانها اختیار نمود. حكمت بشریت حضرت پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;در قرآن نیز چنین بیان شده است. واگر این رسول هدایت فرشته ای می بود، بدون شك این ایراد مطرح می شد كه ما انسانها را توان تقلید فرشتگان نیست!&lt;br /&gt;
سخنان آن حضرت؛ آن به شهادت وگواهی قرآن كریم جز وحی الهی ودر راستای شرح وتفسیر آن نبود: {وَمَا یَنطِقُ عَنِ الْهَوَى، إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْیٌ یُوحَى&amp;rlm;} (النجم/3و4) همراه با روش زندگیشان،&amp;zwnj; در كنار قرآن كریم قرار گرفته، شرح وتفسیر گویا ودرستی از معانی كلام پاك را به مسلمانان می&amp;zwnj;آموزاند.&lt;br /&gt;
از اینروست كه هر فرد مسلمان موظف است در كنار درك اساسنامه ی دین خود؛ كه همان قرآن كریم، به كلام پاك پروردگار یكتاست، از سیرت وزندگی رسول الله آگاهی كامل داشته باشد.&lt;br /&gt;
موفق الدین عبدالطیف بغدادی پیام پرمعنایی دارند كه جای دارد بدان اشاره كنم. ایشان می گویند: زندگی یك مسلمان باید تصویری باشد از سیرت وزندگی رسول الله وشاگران ودست پروده های مكتب آن حضرت. زندگینامه حضرت رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;را بخوان، وقدم در جای پای آن حضرت بگذار، وتا حد توان سعی كن شبیه او باشی؛ در خورد وخوراكت، در لباس وپوشاكت، در خواب وبیداریت، در صحت وبیماریت، در خوشیها وسختیهایت، در راه ورسم عبادت وبندگی پروردگارت، در رفتار با خانواده وخویشان ویاران ودوستانت، در برخورد با دشمنات، و... همیشه وهمه جا پیامبرت را تقلید كن وبدان كه به اندازه ی مشابهتت با آن حضرت خوشبختی وسعادت خویش را رقم زده ای ...&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتابهای سیرت&lt;br /&gt;
در تاریخ بشریت از آدم تا به این دم كه در سایه ی پیشرفت تكنولو&amp;zwj;ژی، آدم از غور هسته تا مسیر سالهای نوری در آسمان را گام زده، انسان تصویری به گویایی ووضاحت وروشنی وشمولیت از هیچ كسی را به روشنی وواضحت سیمای رسول الله تقدیم نكرده است.&lt;br /&gt;
دانشمندان مسلمان همه ی جوانب زندگی پیامبراكرم از گفتار وكردار آن مقام گرفته تا شكل وشمایل ایشان، تا ابزار ووسایلی كه استفاده می كرده اند، تا همسران وخویشان&amp;nbsp;او، وتا یاران ودوستانش وحتی لبخندها وخشمها واشاره هایشان را ثبت وضبط كرده اند. بگونه ای كه با جرأت می توان ادعا نمود یك نگارنده ویا نقاش خوب می تواند از روز به روز ولمحه لمحه ی زندگی آن مقام والا تصویر برداری كند.&lt;br /&gt;
در زمینه های مختلف سیرت پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;كتابهای بسیاری نوشته شده است.&lt;br /&gt;
البته بیشتر كتابهای عربی كه از زندگی آن حضرت سخن گفته اند، جنگهای آن حضرت را معیار فهرست بندی خود قرار داده اند. به نظر نویسنده این معیار نگارش چندان موفق نبوده است!&amp;zwnj;چونكه دایره جنگ ویا غزوات در زندگی آن حضرت بسیار تنگ است. در طی 23 سال دعوت اسلامی تنها پیامبر رهبری 9 غزوه كه در آن جنگ صورت گرفته را به عهده داشتند كه بسیاری از آنها تنها چند ساعت از روز را در برگرفته است.&lt;br /&gt;
یعنی به معدل یك غزوه چند ساعته در طول هر دو ونیم سال (30 ماه)!&lt;br /&gt;
پس غزوه ودرگیری نظامی در زندگی آن حضرت بخلاف آنچه در فهرست كتابهای سیرت عربی نمایان است، بسیار كم رنگ است. البته شاید دلیل این روش فهرست بندی بر می گردد به عادات وتقالید عرب در تعیین تاریخ خود. عربها پیش از اسلام ـ چون سایر انسانها ـ &amp;nbsp;تاریخ خود را بر اساس حوادث مشهور وبزرگ رقم می زدند، از اینروست كه ما مثلاً در مورد تولد رسول الله می گوئیم: ایشان در سال &amp;quot;عام الفیل&amp;quot; ـ سال حمله ابرهه با فیلهایش به مكه ـ &amp;nbsp;به دنیا آمده اند ودر مورد شخص دیگر می گوئیم؛ دو سال قبل از غزوه بدر وفات كردند، یا در مورد مادر مؤمنان خدیجه كبری می گوئیم كه چند ماه قبل از هجرت رسول الله به مكه وفات كردند!...&lt;br /&gt;
گویا بازتاب این روش تاریخ نگاری اذهان نویسندگان عرب ـ وكسانیكه از آنها تقلید كرده اند ـ را به سوی اعتماد بر جنگها كه بدون شك حوداث مهمی در زندگی آن حضرت بودند كشانده است. البته اكنون این شیوه در ترتیب حوادث زندگی آن حضرت نزد بسیاری از نویسندگان عرب، وبیشتر نویسندگان وتاریخ نگاران عجم، و بخصوص در شبه قاره هند، بسیار كم رنگتر شده است.&lt;br /&gt;
ونویسنده نیز بر این اعتقاد است كه كتابهای سیرت باید به تمام زمینه های زندگی آن حضرت توجه داشته باشند، ومیدانی را بر حساب میدانی دیگر اهمیت ندهند. یا اینكه نوشته های خود را در چارچوبهای معینی مشخص سازند؛ چون كتابهای نوین در: &amp;nbsp;فقه سیرت، جانب اقتصادی سیرت، زمینه های سیاسی سیرت، پرتو اخلاق در سیرت، رسول الله در خانواده ، رسول الله در مسجد ومحراب، واخلاق رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;در میدان كارزار، رسول الله در رهبری دولت مدینه، تعلیم وتربیت در پرتو زندگی پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;وغیره ...&lt;br /&gt;
البته این هرگز به این معنا نیست كه به مغازی پیامبر پرداخته نشود! تاریخ نگاران اسلامی ریز ودرشت حوادث جنگها را به تصویر كشیده اند وشاگردان مكتب رسالت تمام آن حوادث را برای ما ثبت كرده اند ، وبر خواندن وآموختن آنها بسیار تأكید ورزیده اند، تا بدانجا كه علی بن الحسین بن علی بن ابی طالب می فرمایند:&amp;quot; پدران ما غزوه ها وسریه ها (جنگهای زمان پیامبر) را چون سوره های قرآن به ما می آموختند! (به روایت خطیب بغدادی).&lt;br /&gt;
جنگهای پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;در كنار اینكه مدرسه هایی است از دلیری&amp;nbsp;وشجاعت ورادمردی وایثار وگذشت، مكتبهایی است از اخلاق در بهترین صورت آن، وتجلی پرتو ایمان در والاترین درخشش وگذشت وجوانمردی در تصاویری كه فهم ودرك آن نیاز به قلبهایی آگنده محبت واخلاص دارد.&lt;br /&gt;
وچون مسلمانان از این ثروت بزرگ اخلاقی ومیراث وبرنامه مدیریت رفتاری برخوردار بودند همیشه در جنگهایشان مهذب، وبا فرهنگ وتمدن انسان دوستانه با دشمن برخورد می كرده اند، برخلاف پیروان دیانتهای دیگر كه میراثی در این زمینه از پیامبرانشان ویا رهبرانشان به ارث نبرده اند.&lt;br /&gt;
به طور مثال مسیحیان وكلیمیان كه از چنین برنامه وفرهنگی محرومند، در جنگهایشان از حیوانات درنده نیز پست تر بوده اند ومیدان كارزار فلسطین وآتشی كه كلیمیان (یهودها) آنرا برافروخته اند، ومیدانهایی چون عراق وافغانستان كه فتنه&amp;nbsp;افروز آن مسیحیان هستند شاهدی گویا بر این مدعا است...&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;فعالیتهای نظامی رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;&lt;br /&gt;
در 13 سال دعوت وتلاش زندگی مكه، با وجود آن همه زجر وشكنجه وظلم&amp;nbsp;واستبداد ودیكتاتوریت وفرعون منشی قریشیان، رسول اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;هرگز دست به سلاح نبردند. بارها اتفاق افتاده كه در زیر یوغ ستمگران كاسه صبر یاران وشاگردان آن حضرت لبریز شده، به ایشان مشورت داده اند تا دشمن قسم خورده، تشنه به خون خود را غافل گیر ساخته، تارومارش كرده، روزگارش سیاه كنند! ولی رسول الله كه طبق برنامه پیش می رفت،واز دستورات پروردگارش سرانگشتی كنار نمی رفت، هرگز كوس جنگ، ویا حتی دفاع، ننواخت تا حجت دعوت بر مردمان تمام گردد، وكینه ودشمنی جنگ وخون بر مسیر دعوت تأثیر منفی نگذارد. گذشت پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;ومدارا با قریشان نه تنها از شدت استبداد ونیرنگ آنها نكاست بلكه فتیله ی فتنه افروزی وشهوت خونریزی وستم را در آنها شعله ورتر كرد، وكار به جایی رسید كه تحمل استبداد آنها غیر قابل برداشت بود. از اینرو مسلمانان خانه وكاشانه، مال وثروت خود را رها كرده از مكه فرار نموده، بسوی شهر یثرب (مدینه) هجرت كردند ودر آنجا پایه های اولیه حكومت اسلامی را پایه ریزی نمودند.&lt;br /&gt;
روند دشمنی قریش با مسلمانان داخل مكه، وخارج آن شدت گرفته وهمواره در پی براندازی دولت اسلام بودند. این روابط تیره واین مكرو حیله ها ونیرنگهای قریشیان باعث شد كه سرنوشت منطقه به شیوه ای نوین رقم خورد، وفراز ونشیبهایی در روابط دوگانه صورت گیرد وستیزها وجنگهای مسلحانه جزئی از این جزرومد بود، كه می توان آنها را از نقطه نظر مسلمانان به دو دسته تقسیم نمود.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;غزوه ها&lt;br /&gt;
همیشه رسول الله می خواستند در همه سختیها علم بردار میدان بوده، &amp;nbsp;بار سنگین مسئولیت را خود بدوش كشند ولی شركت آن حضرت در همه میادین؛ باعث مشقت وسختی بسیاری برای شاگردان ویاران آن حضرت می شد. آن حضرت می فرمایند: سوگند به خداوندی كه جان محمد در دست اوست اگر ترس از مشقت وسختی بر مسلمانان نمی بود، هرگز از لشكری كه در راه خدا به جهاد می رود عقب نمی ماندم. ولی در توانم نیست كه همه مسلمانان را مسلح نموده با خود ببرم، ودر توان هر مسلمانی هم نیست كه خودش را مسلح وآماده كرده همراه من حركت كند وبر مسلمانان بسیار سخت وناگوار است كه از لشكری&amp;nbsp;كه من فرمانده اش هستم عقب بمانند. (به روایت امام مسلم نیشابوری)&lt;br /&gt;
از اینرو آن حضرت تنها رهبری وفرماندهی برخی از جنگها ویا لشكركشیها ویا مانورهای نظامی را شخصاً&amp;zwnj; به عهده داشتند كه به آنها غزوه می گویند.&lt;br /&gt;
در طول زندگی رسول الله 26 یا 27 غزوه صورت گرفت. علت اختلاف عدد در این است كه رسول الله پس از فتح خیبر مستقیماً بسوی &amp;quot;وادی القری&amp;quot; لشكر كشی كردند، برخی از سیرت نگاران این دو معركه را به دلیل اینكه پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;پس از خیبر به مدینه بازنگشته اند، یك غزوه شمرده اند. وبرخی آنها را دو غزوه دانسته اند!&lt;br /&gt;
اولین غزوه رسول الله پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ &amp;nbsp;غزوه &amp;quot;بودان&amp;quot; یا الأبواء&amp;quot; نام دارد كه در ماه صفر سال دوم هجری صورت گرفت، وآخرین غزوه آن حضرت غزوه &amp;quot;تبوك&amp;quot; است كه در ماه رجب سال نهم هجری بود.&lt;br /&gt;
در بیشتر غزوه هایی كه پیامبر فرماندهی آنها را به عهده داشتند هیچگونه جنگ ویا خونریزی صورت نگرفت وبیشتر آنها مانورهای نظامی بود، تنها در 9 غزوه از 27 غزوه آن حضرت جنگ وخونریزی اتفاق افتاده كه عبارت بودند از : غزوه بدر، احد، خندق، بنی قریظه، خیبر، فتح مكه،&amp;nbsp;حنین، طائف، تبوك.&lt;br /&gt;
در برخی از این 9غزوه چون فتح مكه تنها تعداد بسیار اندكی كشته شدند، وبرخی از آنها چون غزوه بدر بیش از یك یا چند ساعت طول نكشید. البته برخی از این جنگها با وجود خسارتهای جانبی؛ چون غزوه خندق مدت زمان زیاد و زحمات فراوانی را در برگرفت. در این غزوه لشكر ده هزار نفری كافران نزدیك به یك ماه مسلمانان را در محاصره قرار داد.&lt;br /&gt;
بزرگترین لشكری كه پیامبر فرماندهی آنرا به عهده داشته اند، لشكر تبوك بود كه تعداد سپاهیان اسلام در برخی روایات به سی هزار رقم زده می شود كه در آن نیز خسارات جانی بسیار اندكی گزارش شده است!&lt;br /&gt;
شاید لازم به یادآوری نباشد كه پیامبر اكرم پیامبر اكرم صَلَّى اللَّهُ عَلَیْهِ وَ آله سَلَّمَ ودین مبین اسلام از خونریزی به شدت متنفر است، ورسول الله جز در حالتهایی بسیار استثنائی مسیر حركت لشكر خود را اعلام نمی داشتند، وهمیشه سعی می كردند دشمن را غافل گیر ساخته با كمترین خسارتهای جانی از دو طرف به اهداف خود دست یابند.&lt;br /&gt;
در بیشتر موارد تا غزوه خندق یا احزاب، سپاه كفر جنگ ووقت وجای آن را بر مسلمانان تحمیل می كرد، ولی پس از شكست سهمگینی كه احزاب (گروههای) متحد كفر از بت پرستان ویهودیان، در غزوه خندق خوردند، معادله رهبری منطقه به كلی تغییر پذیرفت وپیامبراكرم در یك جمله آنرا به تصویر كشیدند!&lt;br /&gt;
&amp;quot;الآن نغزوهم ولایغزوننا، نخن نسیر إلیهم&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;از این به بعد ما بسوی آنها لشكر می كشیم، وآنها توان لشكر كشی را نخواهند داشت، وما بسوی آنها حركت می كنیم&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سریه ها ویا گشتها&lt;br /&gt;
لشكر كشیها ویا مانورهای نظامی ویا جنگهایی كه آن حضرت شخصاً در آنها حضور نداشتند، وفرماندهی آنها را به یكی از یارانش سپرده بودند را سریه یا بعثه &amp;quot;گشت&amp;quot; می گویند.&lt;br /&gt;
سیرت نگاران در تعداد این مانورهای نظامی بنا به طبیعت آنها اختلاف نظر دارند، كمترین عددی كه در این زمینه ذكر شده 35 وبیشترین آن 66 سریه است. امام ابن حزم تعداد گشتها ومانورها وسریه ها را 47 سریه شمرده است.&lt;br /&gt;
غالباً این سریه ها به نام میدان ویا روستا وشهری كه در آن صورت گرفته اند، ویا به نام فرمانده سریه در كتابهای سیرت نامگذاری شده اند.&lt;br /&gt;
در بیشتر این مانورهای نظامی هیچ گونه جنگ وخونریزی صورت نگرفت. در واقع هدف از این مانورها در كنار آموزش جنگی افراد، وتربیت فرماندهان نظامی، ابراز قدرت مسلمانان وآمادگی آنها در دفاع از دولت خود بود، تا قبیله های مهاجم همیشه از مسلمانان حساب برده، جرأت حمله به مدینه را نداشته باشند.&lt;br /&gt;
به عبارت دیگر این سریه ها به دستور قرآن جامعه عمل می پوشانید كه فرموده اند:&lt;br /&gt;
{وَأَعِدُّواْ لَهُم مَّا اسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍ وَمِن رِّبَاطِ الْخَیْلِ تُرْهِبُونَ بِهِ عَدْوَّ اللّهِ وَعَدُوَّكُمْ وَآخَرِینَ مِن دُونِهِمْ لاَ تَعْلَمُونَهُمُ اللّهُ یَعْلَمُهُمْ وَمَا تُنفِقُواْ مِن شَیْءٍ فِی سَبِیلِ اللّهِ یُوَفَّ إِلَیْكُمْ وَأَنتُمْ لاَ تُظْلَمُونَ }(الأنفال/60) ترجمه: (&amp;rlm;برای ( مبارزه با ) آنان تا آنجا كه می&amp;zwnj;توانید نیروی ( مادی و معنوی ) و (از جمله) اسبهای ورزیده آماده سازید ، تا بدان ( آمادگی و ساز و برگ جنگی ) دشمنِ خدا و دشمن خویش را بترسانید ، و كسان دیگری جز آنان را نیز به هراس اندازید كه ایشان را نمی&amp;zwnj;شناسید و خدا آنان را می&amp;zwnj;شناسد . هر آنچه را در راه خدا ( از جمله تجهیزات جنگی و تقویت بنیه دفاعی و نظامی اسلامی ) صر</description>
</item><item>
<title>اطلاعیه کتابخانه عقیده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/274</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ&lt;br /&gt;
الحَمْدُ لِلهِِ رَبِّ العَالمِينْ، وَالصَّلاَةُ وَالسَّلاَمُ عَلىَ نَبِينّا مُحَمّدٍ &amp;shy;&amp;shy;المَبعٌوثُ رَحْمَة لِلعَالمِين، وَعَلى آلِهِ وَأصْحَابهِ وَمَنْ دَعَا بِدَعْوَتِهِ إلىَ يوْمِ الدِّين.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;أمّا بعد:&lt;br /&gt;
(فَبَشِّرْ عِبَادِ الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ أُولَئِكَ الَّذِينَ هَدَاهُمُ اللَّهُ وَأُولَئِكَ هُمْ أُولُو الْأَلْبَابِ)&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;الزمر١٧ - ١٨&lt;br /&gt;
&amp;laquo;پس به [آن&amp;rlm;] بندگانم مژده بده، كسانى كه سخن [ها] را مى&amp;rlm;شنوند، آن گاه از بهترینش پیروى مى&amp;rlm;كنند. اینانند كسانى كه الله هدایتشان كرده و ایشان خردمندانند&amp;raquo;&lt;br /&gt;
برادران وخواهران عزیز!&lt;br /&gt;
به لطف الله متعال کتابخانه عقیده توانست در مدت زمان کوتاهی به همت دست اندرکاران زحمتکش آن تبدیل به بزرگترین کتابخانه الکترونیکی اهل سنت در سراسر دنیا گرد و صدها کتاب در موضوعات مختلف اسلامی و اخلاقی و اجتماعی را به برادران و خواهران مسلمان تقدیم نماید.&lt;br /&gt;
همه این موفقیت ها و دست آوردها به کمک و یاری الله متعال و زحمات شبانه روزی کسانی میسر گردید که هدف آنها فقط اعلای کلمة الله و بیداری امت اسلامی بوده و هرگز به دنبال نام و نشان و ریا و حقوق مادی &amp;nbsp;نبوده بلکه هدف اصلی رضای الله متعال بوده است.&lt;br /&gt;
مؤسس وب سایت عقیده شیخ اسحاق دبیری رحمه الله می باشد، شیخ دبیری رحمه الله در مسیر دعوت و خدمت به اسلام و مسلمین ده ها کتاب تألیف نموده و همچنین تعداد زیادی از کتابهای عربی در زمینه های مختلف را به زبان فارسی ترجمه کرده و یا در ترجمه و مراجعه و تصحیح آن سهیم بوده اند که مجموع آن به بیش از 500 کتاب میرسد و بسیاری از اين كتابها به زیور طبع آراسته گردیده است که در کتابخانه عقیده &amp;nbsp;www.aqeedeh.com&amp;nbsp;&amp;nbsp;در دسترس مسلمانان قرار دارد.&lt;br /&gt;
در سال 1429هـ ق شیخ اسحاق دبیری رحمه الله با مشوره دوستان نزدیک خود تصمیم گرفتند که وب سایت عقیده را که از سال 1426 هـ ق سایت شخصی ایشان بود تبدیل به کتابخانۀ بزرگ الکترونیکی نمایند تا به عنوان یک پروژۀ وقفی و دعوی در خدمت مسلمانان باشد، و به لطف الله متعال و کوشش ها و زحمت ایشان و همکارانشان در مدت زمان کوتاهی کتابخانه عقیده تبدیل به بزرگترین مرجع مسلمانان فارسی زبان در زمینه علوم اسلامی گردید.&lt;br /&gt;
ناگفته نماند که سایت عقیده نخستین سایت تخصصی در مورد علوم اسلامی به زبان فارسی بوده و مرجع علماء و دانشجویان و طلاب علم و سایتها و شبکه های رادیویی و تلویزیونی فارسی زبان می باشد.&lt;br /&gt;
بعد از وفات شیخ اسحاق رحمه الله همکاران ایشان این برچم توحید را بر زمین نگذاشتند بلکه با کوشش و پشت کار بیشتری راه ایشان را ادامه دادند و الحمدلله سایتهای مهم دیگری نیز&amp;nbsp;زیر پوشش کتابخانه عقیده شروع به کار نمود که از آن جمله می توان از سایت اسلام تکس و&amp;nbsp;&amp;nbsp;صدای اسلام نام برد.&lt;br /&gt;
اما با مرور زمان و پیشرفتهای چشمگیر مجموعه سایتهای &amp;quot;عقیده&amp;quot; بعضی انسانهای فرصت طلب &amp;nbsp;و سودجو&amp;nbsp;در صدد سوء استفاده از مجموعه سایتهای عقیده برآمدند که برای توضیح حقایق، ادارۀ مجموعۀ سایتهای عقیده تصمیم گرفت طی این اطلاعیه مواردی را خدمت شما عزیزان روشن نماید:&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سایت عقیده متعلق به هیچ کشوری نیست بلکه متعلق به مسلمانان فارسی زبان می باشد.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سایت عقیده وابسته به هیچ گروه و حزب سیاسی &amp;nbsp;و یا مدارس دینی ایرانی و یا افغانی و غیره نمی باشد.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سایت عقیده کاملاً مستقل بوده و به موسسه های تبلیغی و دعوی و یا وهمی در جهان مانند &amp;quot;شبکة الآل&amp;quot; &amp;nbsp;و شبکه نور و غیره... هیچگونه ارتباطی ندارد.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;سایت عقیده برپایه و کمک و فکر و نظر هیچ وب سایت دیگری از جمله &amp;quot;اسلام خالص&amp;quot; و &amp;quot;کتابسرا&amp;quot; تاسیس نشده بلکه دارای فکر و منهج مستقل می باشد.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;بیشتر كتاب هاى کتابخانه فقط جهت نشر الکترونیکی بر روی کامپیوتر بوده و هرگونه نشر و چاپ این کتابها برای اغراض تجارتی بدون اخذ مجوز كتبی از ناشر، غیر مجاز می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;هیچ موسسه دعوی و یا دارالنشر و کتابخانه ای حق چاپ کتابهای سایت عقیده را بدون اخذ مجوز کتبی از ادارۀ کتابخانه عقیده ندارد.&lt;br /&gt;
ادارۀ مجموعه سایتهای عقیده&lt;br /&gt;
رجب 1431هـ ق&lt;br /&gt;
تیر/سرطان 1389هـ ش&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی مجموعه کتابهایی در مورد جایگاه والای سنت در اسلام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/273</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;معرفی مجموعه کتابهایی در مورد جایگاه والای سنت در اسلام&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
سخن از سنت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در ساختمان فكری اسلام&amp;nbsp;&amp;nbsp;به عنوان یكی از منابع شریعت اسلامی در نهایت اهمیت قرار دارد.&lt;br /&gt;
بدون شک، سنت، دومین مصدر از مصادر قانونگذاری اسلامی است که پس از قرآن مجید، دومین جایگاه تشریع را به خود اختصاص داده است.&lt;br /&gt;
اهمیت سنت و جایگاه آن در تشریع اسلامی، از آنجا معلوم می شود که سنت، بیانگر آيه های قرآن و شارح احکام آن است و انکار سنت به عنوان یکی از منابع تشریع، پیامدی جز انکار عملی بسیاری از اصول و احکام مسلّم اسلام ندارد.&lt;br /&gt;
ما اكنون در دوره&amp;zwnj;ای هستیم كه نظامهای متعدد جهانی دچار اضطراب شده اند و از ایجاد آرامش و آسایش برای ملتهای جهان ناتوانند. هرچند كه رهبران غالب و چیره بر ملتهای جهان به عیبها و ایرادهائی مبتلا هستند كه منجر به این پریشانی عالمی شده است اما بدون شك اسباب مستقیم بدبختی جهانیان همان نظامهائی است كه تا كنون شایستگی آنها برای حل مشكلات انسانی ثابت نشده است به گونه ای كه بتوانند بشریت را از دست جنگها و درگیریها برهانند و او را از دلهرة حاصل از جنگهای جهانی خونبار دور سازد، و این آرامش را پس از زندگی سختی كه در فضای تاریك و سیاه خونریزی و نابودی و تخریب داشته است برایش فراهم آورد.&lt;br /&gt;
عقیدة ما مسلمانان این است كه اگر این جهان خواستار خوشبختی و آرامش برای خویش است چاره ای جز رجوع به تعالیم و دستورهای پاك الله متعال، كه دور از تحریف و دگرگونی و تغییر است ندارد.&lt;br /&gt;
امت اسلامی، توجه ویژه ای به تبلیغ دین اسلام و حفاظت و حراست از آن مبذول داشته اند و در این میان تلاشهای گسترده و خجسته ای در زمینه پاسداری از سنت نبوی به عنوان دومین اصل و منبع قانونگذاری اسلامی نموده اند. صحابه رضی الله عنهم اجمعین در عرصه حفظ، فهم و تبلیغ سنت رسول اکرم صلی الله علیه وآله وسلم به نسلهای پس از خود، از هیچ کوششی دریغ نکردند.&lt;br /&gt;
شریعت اسلامی&amp;nbsp;چه در مصادر اولیه آن و چه در كاوشهای فقیهان و امامان مذاهب دارای زمینه ای گسترده و راه و روشی وسیع است كه هر حادثه ای را در بر می&amp;zwnj;گیرد، هر مشكلی را حل می&amp;zwnj;كند و ترازوی عدالت را میان افراد، جوامع و حكومتها برقرار می&amp;zwnj;كند و برای هر ملت مطیع و بیدار و پیشرفته و رو به رشد و برای زندگی دنیایی آنها در تمام زمینه ها، دولتی عادل و صلح طلب ایجاد می&amp;zwnj;كند كه در صورت صلح طلبی دیگران، صلح دوست است. ارزش عقیده و اخلاق و آزادی واقعی را حمایت می&amp;zwnj;كند و دست هر تجاوز گر گناه كار و سركش نیرنگ باز را از این عرصه كوتاه می&amp;zwnj;كند.&lt;br /&gt;
منابع اصیل شریعت اسلامی نزد مسلمان، مشهور مورد اطمینان و محفوظ است و شكی نیست كه سنت پاك نبوی صلى الله عليه وآله وسلم كه دومین منبع اسلام است. دارای جزئیات بسیار، نظم فراگیر و وسعت دامنه است. حال اگر كتاب الله قواعد عمومی قانونگذاری و احكام كلی را در بر گرفته و به این دلیل به جاودانگی حقیقی رسیده است، باید دانست كه سنت گرامی پیامبر اسلام به شرح این قواعد عمومی، تثبیت آن نظم فراگیر و بیان فروعات و جزئیات احكام كلی، پرداخته است و این مسئله برای هر كسی كه سنت نبی صلی الله علیه وآله وسلم را به طور كامل بررسی كند آشكار می&amp;zwnj;شود. از این رو شریعتمداران مسلمان چاره ای جز اعتماد به سنت، پناه بردن به آن، توجه به آن و راهنمایی خواستن از احكام قطعی آن در جهت حل رویدادهای جدید را ندارند.&lt;br /&gt;
سنت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در گذشته &amp;nbsp;و عصر حاضر مورد هجوم دشمنان اسلام قرار گرفته است و با این هجوم در صدد فتنه افكنی میان مسلمین و نابودی این ركن محكم شریعت اسلامی هستند و در این اواخر گروهی که به دروغ بر خود نام قرآنی ها نهاده اند درحالیکه جاهل ترین انسانها به قرآن کریم می باشند در پی ضربه زدن به اسلام با طعن در سنت و احادیث رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم هستند. سبب وجود اینگونه افراد که از افرازات کثیف مذهب باطل رفض می باشد هرگز شگفت انگیز نیست در طول تاریخ روافض همواره خنجر مسمومی بر جسم امت اسلامی بوده اند. اینکه وجود اینگونه افراد منحرف در جامعه روافض چه طبیعی و چه صحنه سازی باشد نتیجه حتمی خرافات گرایی مفرط در جامعه شیعه است و اين خود دليل آشكاري بر بطلان اين دين باطل و مذهب منحرف ميباشد وسند گویایی بر کینه و دشمنی آشتی ناپذیر اهل بدعت و دشمنان صحابه رضي الله عنهم&amp;nbsp;با اهل سنت..&lt;br /&gt;
از آنجا که فهم اسلام، بدون پذیرش سنت به عنوان یکی از منابع تشریع، امری محال و غیرممکن است، لذا دشمنان اسلام، همواره کوشیده اند تا اهداف شوم خود را از طریق شبهه افکنی در این اصل مهم، دنبال کنند و بدین ترتیب اسلام را از ریشه، هدف قرار دهند.&lt;br /&gt;
در راستای بیداری امت اسلامی و دفاع از سنت وآشنایی بیشتر مسلمانان با سنت رسول اکرم صلی الله علیه وآله وسلم و بیان مکانت و منزلت عظیم سنت در شریعت اسلامی کتابخانه عقیده تصمیم گرفت که مجموعه ای از کتابهای مهم در این ارتباط را به شما عزیزان معرفی نماید تا باشد که برادران و خواهران مسلمان ما با سنت رسول الله صلی الله علیه وآله بیشتر آشنا شوند. و بتوانند در مقابل دشمنان اسلام و سنت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم از عقیده خود دفاع نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شما می توانید با فشار دادن بر روی اسم کتاب آنرا داونلود نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;اول: کتابهایی که حاوی مباحث علمی و مفصل می باشد:&lt;br /&gt;
&amp;middot; جایگاه سنت در قانونگذاری&lt;br /&gt;
&amp;middot; بررسی سنت نبوی در نوشته&amp;zwnj;های دشمنان اسلام و پاسخ به آنها&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;گلزارهای شاداب در دفاع از سنت ابو القاسم صلى الله علیه وآله وسلم&lt;br /&gt;
&amp;middot; نگاهی به&amp;zwnj; اعتبار و جایگاه سنت&lt;br /&gt;
&amp;middot; سنت و جایگاه آن در شریعت اسلامی&lt;br /&gt;
&amp;middot; الاعتصام در شناخت بدعت و سنت - دو جلد&lt;br /&gt;
&amp;middot; بیش از هزار سنت در شبانه روز&lt;br /&gt;
&amp;middot; جایگاه و منزلت سنت در اسلام&lt;br /&gt;
&amp;middot; ردی بر نظریه مستشرقین در مورد سنت نبوی شریف&lt;br /&gt;
&amp;middot; سنت در گذرگاههای تاریخ&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دوم: كتابهای مختصر در سنت:&lt;br /&gt;
&amp;middot;احادیث شیعه پسند در کتب اهل سنت&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;بزرگداشت سنت&lt;br /&gt;
&amp;middot;منزلت سنت در اسلام&lt;br /&gt;
&amp;middot;وجوب عمل به سنت رسول الله و كفر كسى كه آنرا انكار كند&lt;br /&gt;
&amp;middot;پیروی از کتاب، سنت و فهم سلف صالح&lt;br /&gt;
همچنین در کتابخانه عقیده دو بخش جداگانه به نامهای:&lt;br /&gt;
&amp;middot;احادیث نبوی و علوم آن&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;سیرت و سنت نبوی&lt;br /&gt;
وجود دارد که شامل بیش از&amp;nbsp;&amp;nbsp;90 کتاب در موضوعات مختلف مرتبط با سنت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم می باشد.&lt;br /&gt;
وصلى الله على سیدنا محمد وعلى آله وصحبه وسلم&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب و كتابخانه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/271</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;كتاب و كتابخانه&lt;br /&gt;
نقش كتاب در انتقال علوم&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
كتاب، محصول تجربه&amp;rlm;های بشری و خلاقیت&amp;rlm;های ذهنی و آموخته&amp;rlm;های دراز مدت انسان است. سهم كتاب در انتقال دانش&amp;rlm;ها گاهی به مراتب بیشتر و فراتر از دیگر ابزار آموزشی است. پدید آوردن آثار علمی و فرهنگ مكتوب از توصیه&amp;rlm;های مهم اولیای دین است و به گسترش دانش كمك می&amp;rlm;كند و به عنوان یك میراث فرهنگی برای نسل&amp;rlm;های آینده ماندگار می&amp;rlm;شود.&lt;br /&gt;
كتاب وسیله&amp;rlm;ای است كه دانش بشری به مدد آن از تباه شدن مصون می&amp;rlm;ماند و به آیندگان منتقل می&amp;rlm;شود. از این&amp;rlm;رو پیشوایان امت اسلامى توجه ویژه&amp;rlm;ای به فرهنگ مكتوب داشتند و همواره پیروان خویش را به حفظ دانش و نوشتن آن سفارش می&amp;rlm;فرمودند.&lt;br /&gt;
توجّه اسلام به حفظ و گسترش میراث علمی، جایگاه والای دانش و كتاب را از دیدگاه این دین مبین نشان می&amp;rlm;دهد.&lt;br /&gt;
كتاب&amp;rlm;های ناسالم&lt;br /&gt;
بی&amp;rlm;تردید، به همان اندازه كه می&amp;rlm;توانیم از كتاب بهره بگیریم، ممكن است در معرض آفت&amp;rlm;ها و خطرهای نوشته&amp;rlm;های سست و بیمار و مسموم و انحرافی هم قرار گیریم. راه دادن كتاب&amp;rlm;های ناسالم به مدرسه&amp;rlm;ها و خانه&amp;rlm;ها، در واقع مسمومیت فكری و اخلاقی نسل ما را به دست خودمان فراهم می&amp;rlm;آورد. بنابراین، نظارت بر چاپ كتاب و بررسی محتوای آن، در جامعه سلامت خواه و دوراندیش ضروری است. آنان كه به سلامت اندیشه و باورها و گرایش&amp;rlm;های افراد جامعه دل&amp;rlm;بستگی دارند، نمی&amp;rlm;پذیرند كه در عرضه آثار منتشر شده، حدّ و مرز و نظارت و محدودیتی نباشد.&lt;br /&gt;
كتاب و كتاب&amp;rlm;خانه&lt;br /&gt;
وقتی كتاب، حاصل اندیشه&amp;rlm;ها و تجربه&amp;rlm;های اهل اندیشه و معرفت باشد، كتابخانه نیز كانون همایش صاحب نظران و موزه پرطراوت و شاداب دانشمندان و صاحبان معارف خواهد بود. همان&amp;rlm;گونه كه در باغ و بوستان، خاطر انسان نشاط می&amp;rlm;یابد، سیر در بوستان كتاب نیز مشام جان را شاداب و معطر می&amp;rlm;سازد. بی&amp;rlm;مناسبت نیست كه در روایات ما، از كتاب به عنوان بوستان دانشمندان یاد شده4 و همدم و سخن&amp;rlm;گویی شایسته به شمار آمده است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;كسی كه قدم در كتابخانه می&amp;rlm;گذارد، به گلگشت دل&amp;rlm;انگیز و مجمع دانشمندان و دانایان قدم نهاده است. طبیعی است كه در چنین محیطی، انسان احساس نشاط می&amp;rlm;كند و روحش بالنده می&amp;rlm;شود.&lt;br /&gt;
مطالعه و كتابخوانی&lt;br /&gt;
وقتی جهل و بی&amp;rlm;خبری، جامعه&amp;rlm;ای را از پای درآورد، یا شبهه&amp;rlm;ها ذهن جوانان را فلج كند، بدون شك یكی از مهم&amp;rlm;ترین كارهایی كه می&amp;rlm;تواند آفت جهل را بزداید، مطالعه است و آنچه می&amp;rlm;تواند شبهه&amp;rlm;های ذهنی را دفع كند و ایمان و اطمینان را به قلب&amp;rlm;ها باز آورد، كتاب&amp;rlm;خوانی است. گرفتاران در چنبره پرسش&amp;rlm;ها و محاصره شدگان در میان انبوه شبهه&amp;rlm;ها، می&amp;rlm;توانند برای استمداد فكری به كتابخانه مراجعه كنند و از آن&amp;rlm;جا نیرو گیرند و به جنگ شبهه&amp;rlm;ها بروند و پاسخی در برابر القائات و شبهه&amp;rlm;افكنی&amp;rlm;های دیگران بیابند.&lt;br /&gt;
آثار روحیِ انس گرفتن با كتاب&lt;br /&gt;
بی&amp;rlm;گمان، هیچ ذخیره و میراثی سودمندتر و با ارزش&amp;rlm;تر از كتاب نیست؛ چرا كه كتاب، مایه آرامش روحی انسان است. كسی كه به كتاب&amp;rlm;ها تسلّی و آرامش بیابد، هرگز آرامش را از دست نخواهد داد. &amp;nbsp;كتاب همدمی است كه اندوه را می&amp;rlm;زداید و مطالعه كننده را از تنهایی در می&amp;rlm;آورد و به او حكمت&amp;rlm;های جان&amp;rlm;پرور می&amp;rlm;آموزد.&lt;br /&gt;
بردباری كتابدار در برخورد با كودكان&lt;br /&gt;
در كتابخانه&amp;rlm;هایی كه در مدرسه&amp;rlm;ها، مسجدها و روستاها تأسیس می&amp;rlm;شود، نحوه برخورد متولیان كتابخانه با مراجعه&amp;rlm;كنندگان بسیار مهم است. مراجعه&amp;rlm;كنندگان به كتابخانه&amp;rlm;ها، گاهی كودكان و نوجوانانند و گاهی بزرگ&amp;rlm;ترها و حتی دانش&amp;rlm;آموختگان و اهل معرفت. نحوه برخورد با هریك از این گروه&amp;rlm;ها متفاوت است و آیین مناسب خود را می&amp;rlm;طلبد. اگر سر و كار كتابدار با كودكان است، حوصله و بردباری بیشتری لازم است تا هم بازیگوشی كودكان، زیان&amp;rlm;هایی به بار نیاورد و هم آنان به كتابخانه و مطالعه رغبت كنند.&lt;br /&gt;
امین بودن كتابدار&lt;br /&gt;
یكی از وظایف اخلاقی كتابدار، امین بودن و متعهد بودن است. كتابدار، نسبت به كتاب&amp;rlm;ها باید امین باشد و از ضایع شدن و مفقود شدن آنها ناراحت شود و خراب شدن كتاب&amp;rlm;ها او را رنج دهد و كتاب&amp;rlm;ها را مثل فرزندان خود بداند. او باید در امانت دادن كتاب دقت و تعهد لازم را نشان دهد، تا با گم شدن و كم شدن كتاب&amp;rlm;ها مواجه نشود.&lt;br /&gt;
شناخت كافی از سلامت و صحت كتاب&lt;br /&gt;
یكی از مفیدترین اطلاعات برای كتابخوان، شناختن آثار خوب و جدید، شناخت نویسندگان متعهد و سالم و آگاهی از مؤسسات انتشاراتی متعهد است. نشان &amp;laquo;استاندارد&amp;raquo; به عنوان نشانه مرغوبیت كالا، نباید تنها در فرآورده&amp;rlm;های خوراكی و مصرفی و كالاهای خانگی و صنعتی مورد نظر باشد، بلكه آثار فرهنگی و فرآورده&amp;rlm;های علمی و فكری هم باید مطابق استانداردهای عقلانی و دینی و ارزشی تهیه شود تا جامعه را به فساد و تباهی و بیماری نكشد. روشن است كه خوانندگان آثار و خریداران كتاب و مشتریان مطبوعات و جراید نیز باید به این علایم استاندارد توجه كنند و هر كتاب را نخرند و نخوانند و به هر نویسنده و ناشر، اطمینان صد در صد نكنند و تا شناخت كافی از سلامت و صحت كتاب خاصی پیدا نكرده&amp;rlm;اند، در روح و اندیشه خود و فرزندانشان را به روی كالاهای ناسالم و زیان&amp;rlm;بار فكری نگشایند.&lt;br /&gt;
علت عمده كتاب&amp;rlm;گریزی در جامعه&lt;br /&gt;
یكی از مشكلات و كاستی&amp;rlm;های جامعه ما گریز از كتاب و پایین بودن سطح فرهنگ مطالعه است. این نقیصه، ریشه&amp;rlm;ها و علت&amp;rlm;های مختلفی می&amp;rlm;تواند داشته باشد كه شاید در رأس آنها &amp;laquo;عدم احساس ضرورت&amp;raquo; است. تا وقتی انسان در وضعیت &amp;laquo;نیاز&amp;raquo; قرار نگیرد، در پی رفع آن نخواهد افتاد. اگر در پاسخ شبهه&amp;rlm;های اعتقادی و پرسش&amp;rlm;های سیاسی دربمانیم، یا در مجلس و محفلی كه از موضوع خاصی صحبت به میان می&amp;rlm;آید، احساس كنیم در آن زمینه بی&amp;rlm;اطلاعیم و شرمسار شویم و احساس كنیم از چرخه زمان و گردونه پرشتاب مسایل علمی و فكری جامعه عقب مانده&amp;rlm;ایم، نسبت به خلأ و نیاز آگاه می&amp;rlm;شویم و این می&amp;rlm;تواند شوق به مطالعه و كتابخوانی را در ما تقویت كند.&lt;br /&gt;
شناخت سیر مطالعاتی&lt;br /&gt;
بدون شك تناسب محتوا و سبك كتاب، با مخاطبی كه آن را به دست می&amp;rlm;گیرد و می&amp;rlm;خواند، عامل مهمی برای برقراری رابطه و لذت بردن از خواندن است. كتاب دشوار، گاهی به جای جاذبه، دافعه دارد و به جای شوق&amp;rlm;آفرینی، بیزار كننده می&amp;rlm;شود. در این&amp;rlm;جا هوشیاری و دقت كسی كه كتاب را برای مخاطب، انتخاب می&amp;rlm;كند، نقش عمده دارد. برای كودك و نوجوان مطالعه كننده، مراعات سلسله مراتب و سیر تدریجی مطالعه نیز مؤثر است. نوجوانان به مطالعه داستان علاقه&amp;rlm;مندند. بهره&amp;rlm;گیری از این علاقه و عرضه كتاب&amp;rlm;های قصه در مرحله نخست، عامل ایجاد علاقه به مطالعه است. وقتی نوجوان داستان&amp;rlm;های جذّاب خواند، با كتاب مأنوس می&amp;rlm;شود و انس با كتاب و مطالعه، او را در مراحل بعدی به خواندن كتاب&amp;rlm;های متنوع علمی، تاریخی و اخلاقی می&amp;rlm;كشاند. مربّی موفق و كتابدار پخته و هنرمند كسی است كه این سیر مطالعاتی را بشناسد و به كار گیرد.&lt;br /&gt;
نظم و برنامه&amp;rlm;ریزی در كتابخوانی&lt;br /&gt;
بی&amp;rlm;تردید، از مهم&amp;rlm;ترین عوامل مفید ساختن كتابخوانی، برخورداری از نظم و برنامه است. تخصیص وقت مناسب و منظم برای مطالعه، بسیار كارساز است. مطالعه نامنظم، ملال&amp;rlm;آور و ناپایدار است. در هر كاری از جمله مطالعه، كار اندك ولی پیوسته و منظم، بسیار ثمربخش&amp;rlm;تر از كار پرحجم، ولی مقطعی و گذراست. با برنامه&amp;rlm;ریزی منظم برای مطالعه، مشكل كمبود وقت كه خیلی&amp;rlm;ها آن را وسیله و بهانه فرار از مطالعه قرار می&amp;rlm;دهند، حل می&amp;rlm;شود. بسیاری از بزرگان از همین رهگذر، در حركتی آرام امّا مستمر، توانسته&amp;rlm;اند كارهای عظیم صورت دهند. بسیاری از اثرهای ماندگار و جاویدان، محصول همین&amp;rlm;گونه كار دراز مدت و با صبر و حوصله و خسته نشدن و شتاب نداشتن است.&lt;br /&gt;
خواندن بهترین&amp;rlm;ها&lt;br /&gt;
از آن&amp;rlm;جا كه امروزه دامنه علوم و موضوعات و كتاب&amp;rlm;ها گسترش یافته است، بنابراین بر كتابخوانان عزیز است كه فرصت و نیرو و مجال را به خواندن بهترین&amp;rlm;ها و لازم&amp;rlm;ترین&amp;rlm;ها اختصاص دهند. دانش، بیش از آن است كه بتوان بر آن احاطه یافت؛ پس از هر دانشی بهترین آن را برگیرید. عمل به این سخن سبب می&amp;rlm;شود تا مطالعه كنندگان و كتابخوانان ارجمند با مشكل كمبود وقت، كم&amp;rlm;تر مواجه شوند، به اهداف مطالعاتی بهتر دست یابند، و از هرز رفتن فرصت&amp;rlm;ها و صرف شدن سرمایه در پای كارهای بیهوده و مطالعات كم ارزش و بی&amp;rlm;ثمر، جلوگیری نمایند.&lt;br /&gt;
آفت كتابخوانی&lt;br /&gt;
یكی از آفت&amp;rlm;های هركار برنامه&amp;rlm;دار، برخورد با حوادث و پیشامدها و كارهای پیش&amp;rlm;بینی نشده است. به تعبیر دیگر، با وجود برنامه مطالعاتی یا درسی، ممكن است كارهایی برای انسان پیش آید كه، در آن برنامه وقفه یا اختلال پدید آورد و فرد را از رسیدن به هدف باز دارد. اراده و تصمیم جدی، می&amp;rlm;تواند انسان را بر این موانع غلبه دهد. خود فرد است كه اگر بخواهد، می&amp;rlm;تواند از برهم خوردن نظم مطالعاتی جلوگیری كند و مصمم و استوار، بر ادامه و استمرار كار، پافشاری كند. اگر بنا باشد مسایلی همچون بی&amp;rlm;حالی، آمدن مهمان، بیماری یكی از بستگان، برخورد با یك دوست صمیمی، و خستگی از كار روزانه، و... روند مطالعه را مختل سازد، هرگز انسان به هدف&amp;rlm;های متعالی دست نخواهد یافت.&lt;br /&gt;
غذای روح&lt;br /&gt;
مطالعه، غذای روح و درمان بیماری&amp;rlm;های فكری است. كتاب، معلمی ساده و صمیمی و همیشه در دسترس است كه بی&amp;rlm;ادعا و بدون تكلف و منّت، آنچه دارد در اختیار ما می&amp;rlm;گذارد. مطالعه، با نیّت خالص، عبادتی بزرگ است. لحظه&amp;rlm;ای نشستن در كتابخانه، حضور در محضر اندیشمندان قرون و فرزانگان زمان است. كتابخانه، معبد اهل علم و محراب پاكِ دانشجویی و علم&amp;rlm;آموزی است. هركه از كتاب و مطالعه بیگانه است، غریب و بی&amp;rlm;مونس است.&lt;br /&gt;
نقش كتاب و كتابخانه در بالندگی جوامع&lt;br /&gt;
كتاب و كتابخانه، مجموعه ارزشمندی را شكل می&amp;rlm;دهد كه می&amp;rlm;تواند در راه شكوفایی و بالندگی افراد و جوامع نقش سازنده&amp;rlm;ای ایفا نماید. كتاب، یكی از راه&amp;rlm;های كسب دانایی و توانایی است كه آدمی را در فهم و درك راست از ناراست، مدد می&amp;rlm;رساند. كلید گذر از زندان و محدودیت و ورود به دنیایی گسترده و ژرف، بهره&amp;rlm;وری از كتاب است. كتابخانه&amp;rlm;ها را می&amp;rlm;توان نهادهایی دیرینه و تأثیرگذار دانست كه در فرآیندهای آموزشی و پژوهشی، ایجاد و توسعه عادت به مطالعه، پایدارسازی همبستگی&amp;rlm;های اجتماعی، حفظ ارزش&amp;rlm;ها، احیای تفكر دینی، ایجاد اعتماد به نفس و استقلال فردی و اجتماعی، و حتی در فرآیندهای اقتصادی نقش مهم و مؤثری دارند.&lt;br /&gt;
كتابخانه، حافظ میراث&amp;rlm;های فرهنگی&lt;br /&gt;
كتابخانه&amp;rlm;ها، حافظان میراث&amp;rlm;های فرهنگی و مالكیت&amp;rlm;های فكری، مكان&amp;rlm;هایی امن برای غنی سازی اوقات فراغت و ابزاری برای ایجاد تعادل و گسترش عدالت به&amp;rlm;شمار می&amp;rlm;روند. بر همین اساس است كه &amp;laquo;كارلایل&amp;raquo; كتابخانه را &amp;laquo;دانشگاهی برای همه&amp;raquo; می&amp;rlm;نامد. برخی نیز كتابخانه عمومی را به &amp;laquo;قلب جامعه&amp;raquo; تشبیه كرده و زندگی افراد را بدان وابسته دانسته&amp;rlm;اند. در هر حال كتابخانه&amp;rlm;ها نمادهایی از ارزش&amp;rlm;های معنوی، فرهنگی، اجتماعی، سیاسی و اقتصادی جامعه تلقی می&amp;rlm;شوند. از این&amp;rlm;رو كتابخانه&amp;rlm;ها باید دارای كتاب&amp;rlm;ها و منابع و مواد دیداری و شنیداری مناسب، متنوع و مفید باشند؛ چرا كه پربار بودن مجموعه كتابخانه، سبب اقبال هرچه بیشتر مردم به آن مراكز و رویكرد فعال آنان به امر مطالعه و گسترش فرهنگ كتاب می&amp;rlm;شود.&lt;br /&gt;
خانواده، نقطه آغازین ایجاد عشق به كتابخوانی&lt;br /&gt;
برای ایجاد علاقه به كتاب و كتابخوانی، عوامل متعددی نقش دارند كه نخستین آنها &amp;laquo;خانواده&amp;raquo; است. در واقع نقطه آغازین ایجاد عشق و علاقه به كتاب و كتابخوانی از خانواده آغاز می&amp;rlm;گردد؛ زیرا طبق دیدگاه روان&amp;rlm;شناسان، شخصیت و هویت كودك در قدم اول در خانواده شكل می&amp;rlm;گیرد. به طور طبیعی والدین علاقه&amp;rlm;مند به كتاب فرزندانی دوستدار مطالعه خواهند داشت و عكس آن نیز صادق است. تجربه نشان داده است كه فرزندانی كه در خانواده&amp;rlm;های اهل دانش بزرگ می&amp;rlm;شوند، میزان مطالعه و گرایش به كتابخوانی در آنان نسبت به خانواده&amp;rlm;هایی كه تمایلی به كتاب و مطالعه ندارند بسیار بیشتر است. اكثر علما و دانشمندان در خانواده&amp;rlm;هایی رشد نموده&amp;rlm;اند كه والدین آنان اهل مطالعه و پژوهش بوده&amp;rlm;اند. زمانی كه فرزندی می&amp;rlm;بیند كه كتابخانه&amp;rlm;ای در خانه هست و پدر و مادر و همگی اعضای خانواده، ساعاتی را به مطالعه اختصاص می&amp;rlm;دهند، دیگر، حتی نیاز به گفتن این&amp;rlm;كه &amp;laquo;باید مطالعه كنی&amp;raquo; وجود ندارد.&lt;br /&gt;
نقش آموزش و پرورش در ترویج فرهنگ كتابخوانی&lt;br /&gt;
آموزش و پرورش به عنوان بزرگ&amp;rlm;ترین مجموعه آموزشی كشور، می&amp;rlm;تواند با بسترسازی بنیادین و برنامه&amp;rlm;ریزی دقیق و بلند مدت، علاقه به كتاب و كتابخوانی را در بین نسل جوان و نوجوان تقویت نماید. اگر در برنامه آموزشی كشورهای پیش&amp;rlm;رفته تأمل كنیم متوجه می&amp;rlm;شویم كه فرهنگ&amp;rlm;سازی برای مطالعه را از آموزش و پرورش آغاز می&amp;rlm;نمایند. بنابراین ضروری به نظر می&amp;rlm;رسد كه با بهره&amp;rlm;گیری از مشاوران و روان&amp;rlm;شناسان برجسته، فرهنگ مطالعه و كتاب&amp;rlm;خوانی در شخصیت كودكان مستحكم و بنیادین گردد. مطمئن باشیم كه اگر زمینه ترویج فرهنگ كتاب&amp;rlm;خوانی را در آموزش و پرورش ایجاد كنیم، دیری نمی&amp;rlm;پاید كه جامعه&amp;rlm;ای كتابخوان و توسعه یافته خواهیم داشت و ثمره آن پیشرفت همه&amp;rlm;جانبه كشور خواهد بود.&lt;br /&gt;
هدیه فرهنگی&lt;br /&gt;
بدون شك پدر و مادر نقش مهمی در ترویج فرهنگ كتاب&amp;rlm;خوانی در خانواده دارند. آنان برای این&amp;rlm;كه حس كتاب&amp;rlm;خوانی را در فرزندانشان تقویت نمایند، می&amp;rlm;توانند از كتاب به عنوان اهرمی برای تشویق استفاده نمایند.&lt;br /&gt;
بسیار مناسب خواهد بود كه كتاب را به عنوان هدیه&amp;rlm;ای معنوی در لابه&amp;rlm;لای دیگر هدایا فراموش ننماییم و با این عمل قدمی بسیار مهم در اعتلای فرهنگ كتاب&amp;rlm;خوانیِ فرزندانمان برداریم.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>پیام به ناشرين و نویسندگان و مترجمين محترم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/270</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بسم الله الرحمن الرحیم&lt;br /&gt;
الحَمْدُ لِلهِِ رَبِّ العَالمِینْ، وَالصَّلاَةُ وَالسَّلاَمُ عَلىَ نَبِینّا مُحَمّدٍ &amp;shy;&amp;shy;المَبعٌوثُ رَحْمَة لِلعَالمِین، وَعَلى آلِهِ وَأصْحَابهِ وَمَنْ دَعَا بِدَعْوَتِهِ إلىَ یوْمِ الدِّین.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;أمّا بعد:&lt;br /&gt;
ناشرین و نویسندگان و مترجمین محترم&lt;br /&gt;
السلام علیکم &amp;nbsp;ورحمه الله وبرکاته&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اخیرا در برخی از کتاب های فارسی ملاحظه شده که مترجمین و یا مؤلفین محترم از ذکر لفظ عربی احادیث رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم خودداری کرده و به ترجمه فارسی آن اکتفا می کنند، که احتمالا جهت پایین آوردن هزینه چاپ می باشد، ولی این موضوع به نوبه خود نکات منفی زیر را در بر دارد:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;1 ـ شکی نیست رسول الله صلی الله و علیه وآله سلم در عباراتی کوتاه پرمغزترین معانی را به مخاطب می رسانده اند یعنی صاحب &amp;laquo;جوامع الکلم&amp;raquo; بوده اند, که خود یکی از معجزه های ایشان می باشد, ولی این معجزه در ترجمه به کلی از بین می رود.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;2 ـ عادت دادن خواننده به دوری از الفاظ عربی، این عمل نقش به سزایی در بیگانه کردن مردم با سرچشمه های اصلی دین یعنی قرآن کریم و سنت مکتوب دارد که به زبان عربی استف پس از آنجایی که نصوص دین عربی هستند باید سعی کنیم تا مردم را با این زبان بیشتر آشنا کنیم&amp;nbsp;نه اینکه با حذف متن عربی حدیث و احیانا آیات قرآن کریم در دور شدن آنها از اسلوب زبان عربی آنها را یاری دهیم!&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;3 ـ از آنجایی که هیچ شخصی بعد از رسول الله صلی الله و علیه وآله سلم معصوم نیست لذا ممکن است مترجم در فهم معنی حدیث دچار اشتباه شود ـ که این مورد در برخی کتابها به کثرت یافت می شود ـ حال اگر متن عربی حدیث وجود داشته باشد می توان این اشتباهات را تصحیح نموده و از سوء فهم و برداشت اشتباه خواننده جلوگیری نمود.&lt;br /&gt;
لذا کتابخانه عقیده از تمامی برادران و خواهران گرامی خاصتا مسئولان محترم کتابخانه ها و ناشرین خواهشمند است در تالیف و ترجمه درج متن عربی آیات قرآن کریم &amp;nbsp;و احادیث شریف نبوی صلی الله علیه وآله وسلم کوتاهی نکنند.&lt;br /&gt;
همچنین بیشتركتابهای فارسی كه به دسترس مردم قرار می گیرد، بعد از ذکرنام رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم حرف(ص) و بعد ازنام انبیاء(ع) و بعد از نام صحابی حرف (رض) و بعد ازنام علمای بزرگ حرف (رح) رامی نویسند. فراتر ازآن برخی قبل از ذکرحدیث شریف چنین می نویسند: &amp;quot;پیامبرگفت، رفت، خورد، نوشیدو.... و یا محمد ص گفت و.... و یا &amp;nbsp;عایشه روایت کرد و یا &amp;quot;ابوحنیفه و مالک می گوید&amp;quot; و امثال آن.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;سبب آنرا نمیدانیم که این رمزها وکلمات از عجلۀ بسیاراست و یا اینکه از بی توجهی و یا العیاذبالله از ندانستن قدر و منزلت رسول اکرم رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم و صحابه کرام وعلمای امت؟!&amp;nbsp;الله جل جلاله می فرماید:&lt;br /&gt;
(لَا تَجْعَلُوا دُعَاءَ الرَّسُولِ بَیْنَكُمْ كَدُعَاءِ بَعْضِكُمْ بَعْضًا) النور: ٦٣&lt;br /&gt;
&amp;laquo;فراخواندن رسول الله رادر میان خود، مانند فراخواندن بعضی ازخودتان به بعضی دیگر قرارندهید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
مفسرین درتفسیراین آیت فرموده اند: یعنی پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم را چنان موردخطاب قرار ندهید که همدیگر را در بعضی حالات با بی پروایی و از روی بی مبالاتی مورد خطاب قرار میدهید.&lt;br /&gt;
برمسلمان واجب است پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم را با کمال ادب واحترام یاد نماید و ایشان را گرامی بدارد وحرمت ایشان را چنان که شایستۀ مقام آن حضرت صلی الله علیه وآله وسلم است بگذارد، چه درگفتار باشد یا نوشتن. بطور مثال به جای (گفت) کلمۀ فرمودند استعمال شود.&lt;br /&gt;
قاضی ابوبکر العربی: می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;quot;حرمت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم درحال وفات، همچون حرمت ایشان درحال حیات است، وسخن منقولشان بعداز وفاتشان در والایی وعظمت خود همچون سخن مسموع از زبانشان درحال حیات ایشان است. پس چون سخن ایشان خوانده میشود، برهرشخص حاضری واجب است که صدای خویش را از آن بلندتر نکند و ازآن روی نگرداند چنان که این کار درحیات ایشان واجب بود&amp;quot;.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
حالا اگرکسی از ما بخواهد نزد ریس جمهور یا وزیر و یا هرشخصیتی صاحب مقام برود، چقدرمیکوشد تا با کلمات ادبی و تشریفاتی وی رامخاطب قراردهد تا ازشأن وی کاسته نشود. پس پیامبر بزرگ اسلام و رهبربشریت صلی الله علیه وآله وسلم اولی تر واحق تر ومقدم ترازهرانسانی درجهان به تقدیروتوقیر وتجلیل میباشند.الله جل جلاله میفرماید:&lt;br /&gt;
(النَّبِیُّ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِینَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ) الأحزاب:٦&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;پیامبربه مؤمنان ازخودشان سزاوارتراست&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم می فرمایند:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;بخیل کسی است که نام من نزد وی برده شود اما برمن درود نفرستد&amp;raquo;.روایت ترمدی.&lt;br /&gt;
علمای کرام فرموده اند: طوریکه هنگام نام بردن و یاشنیدن نام رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم درود فرستادن برمسلمان لازم است همچنین درنوشتن نیز درود فرستادن بروی لازم است. خواهش ما از مؤلفین ومترجمین و ادارات انتشارات اینست که موارد ذیل را قبل از نشر کتاب و یا مقاله مراعات نمایند:&lt;br /&gt;
عوض(محمد) رسول الله، عوض حرف(ص) صلی الله علیه وآله وسلم و عوض(ع) علیه السلام &amp;nbsp;و بجای (رض) رضی الله تعالی عنه&amp;nbsp;و بجای (رح) رحمه الله و قبل ازنام ازواج مطهرات لفظ (ام المؤمنین) و بعد آن رضی الله تعالی عنهارا بنویسند، همچنان کوشش شود عوض کلمۀ (خدا و یا خداوند) لفظ الجلاله (الله جل جلاله) نوشته شود. برخی ازنویسندگان بدور رفته کلمۀ (یزدان ) که نام یکی از معبودان مشرکین است را بجای اسم الله جل جلاله می نویسند. قابل تذکراست که حروف (ص، رض، رح، صلم،ع ) رامستشرقین بخاطر اختصار کارشان در تحقیقات و پژوهش علوم اسلامی اختراع نموده و بکار برده اند که با تأسف میان مسلمانان نیز رواج یافته است. امید که برادران و خواهران محترم به اهمیت این نکته پی برده از شعایر و حرمات دینی تعظیم و بزرگداشت به عمل آورند. طوریکه الله جل جلاله فرموده است:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;(وَمَنْ یُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِنْ تَقْوَى الْقُلُوبِ) الحج: ٣2&lt;br /&gt;
&amp;laquo;و هر کس شعایر الله را بزرگ دارد پس درحقیقت این (تعظیم) ازتقوای دلهاست&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
وآخردعوانا ان الحمدلله رب العالمین.&lt;br /&gt;
با تشکر فراوان&lt;br /&gt;
ادارۀ کتابخانه عقیده&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>چگونه فرزندان خود را تربيت كنيم؟</title>
<link>http://qalamlib.com/news/269</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;چگونه فرزندان خود را تربیت كنیم؟&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
تربیت فرزندان در سایه نظام خانوادگی جزو بخش&amp;zwnj;هائی از تربیت فرد محسوب می&amp;zwnj;گردد که براساس آن انسانی شایسته و مفید برای زندگی در جامعه شکل می&amp;zwnj;گیرد، چنین انسانی تکالیف محوله را به خوبی بانجام می رساند و مسؤولیت خویش را به نحو احسن ادا می&amp;zwnj;کند.&lt;br /&gt;
کتابی که اینک خدمت شما عزیزان تقدیم می گردد، کوششی در جهت بیان راه و روش جامع و صحیح&amp;zwnj; تربیت فرزندان در اسلام است.&lt;br /&gt;
و چنانچه خوانندة گرامی موفق به مطالعة آن شود در می&amp;zwnj;یابد که قوانین و نظام تربیت&amp;zwnj;اسلامی بسیار دقیق و حساب شده است، راهی است که به سبب آن تکامل و تعالی انسان در دین و دنیا تحصیل خواهد شد، و معلوم می&amp;zwnj;گردد که اسلام در این باره شیوه&amp;zwnj;ای منحصر بفرد و اختصاصی دارد و اگر دست&amp;zwnj;اندرکاران پرورش و تربیت&amp;zwnj;انسانی آنرا بکار بندند، خوشبختی، امنیت و پیشرفت را برای مردم خود تضمین کرده و هرج و مرج و تبهکاری و ناامنی را از جامعة خود می&amp;zwnj;زدایند. آنگاه همگان خواهند فهمید که اسلام دین زندگی است، سرشار از آگاهی بوده و پیشتاز اصلاح و پرورش انسانی است و اگر جامعة بشری به دستوراتش عمل کند و دولت&amp;zwnj;ها برمبنای اصول و قوانین آن برنامه&amp;zwnj;ریزی و حرکت کنند و جوامع از چشمة جوشان آن سیراب شوند، صلح و آرامش سراسر گیتی را فرا می&amp;zwnj;گیرد و مردم در زیر سایه درخت تنومند اسلام، معنا و لذت خوشبختی را درک خواهند کرد.&lt;br /&gt;
نویسندۀ محترم در مقدمۀ این کتاب می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;quot;نکته&amp;zwnj;ای که مرا به تالیف این کتاب واداشت، عدم وجود نوشته&amp;zwnj;ای در زمینة تربیت &amp;zwnj;وپرورش فرزندان در بین کتب اسلامی بود، یا حداقل اینجانب با وجود جست&amp;zwnj;وجو در این مورد به آن دست نیافته&amp;zwnj;ام، منظورم کتابی است که در زمینه&amp;zwnj;های مختلف تربیت فرزند از ولادت تا رسیدن به سن تکلیف در فصولی مستقل و مجزا بحث کند&amp;quot;.&lt;br /&gt;
کتاب حاضر نتیجة تلاشی فراوان همراه با جستجوئی طولانی در بهره&amp;zwnj;گیری از مراجع و منابع مهم در تربیت فرزند است که شامل تمامی ادوار آن تا رسیدن به سن تکلیف می&amp;zwnj;باشد که امید است برای دست اندرکاران مفید واقع شود. و الله متعال به نویسنده و مترجم و کسانی که در نشر آن همکاری نمودند پاداش نیکو در دنیا و آخرت نصیب فرماید.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزیز می تواند کتاب چگونه فرزندان خود را تربیت كنیم؟&lt;br /&gt;
را با فشار بر روی اسم کتاب در این صفحه از کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;br /&gt;
چگونه فرزندان خود را تربیت كنیم؟&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>خمس جزيۀ آخوندها بر شيعيان ساده دل</title>
<link>http://qalamlib.com/news/268</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;خمس جزیۀ آخوندها بر شیعیان ساده دل&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خمس جزیه ای است كه آخوندهای شیعه به ناحق از شیعیان بیچاره می گیرند و در راه عیاشی و خوشگذرانی خود مصرف می کنند&amp;nbsp;در حالیکه صدها هزار شیعۀفقیر&amp;nbsp;در فقر و گرسنگی و دربدری دست و پا میزنند.&lt;br /&gt;
روحانیون شیعه در کشورهای صنعتی برای خود&amp;nbsp;از پول خمس شیعیان کارخانه ها ساخته اند و بانکهای خارجی مملو از پول های جمع آوری شده خمس می باشد.&lt;br /&gt;
با نگاهی دقیق و تدبّری عمیق به کتاب خدا و سنّت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به آسانی روشن می&amp;zwnj;شود که زکات و خُمسی که اکنون بین شیعیان معروف و معمول است چندان ارتباطی به دین مبین اسلام که یگانه شاهراه سعادت دارین و تنها طریق وصول به فوز و فلاح در دنیا و آخرت است، ندارد.&lt;br /&gt;
بلکه می&amp;zwnj;توان گفت پاره&amp;zwnj;ای از آن ساختۀ آراء و بافتة أهواء رجالی است که چندان به حکمت احکام و حُرمت و عظمت اسلام توجهی نداشته&amp;zwnj;اند! و هم و غمشان پرکردن جیبهایشان بوده است وهمچنین این عمل &amp;nbsp;از تعصبات جاهلانه و یا سیاست خصمانۀ عدّه&amp;zwnj;ای مُغرض مایه می&amp;zwnj;گیرد.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران محترم ! كتابخانه عقیده در راستای بیداری امت اسلامی کتابهایی را در مورد &amp;quot;خمس&amp;quot; خدمت شما عزیزان معرفی می کند که شما به وسیلۀ این کتابها &amp;nbsp;به حقایق مهمی پی می برید.&lt;br /&gt;
اهمیت این حقایق در این است كه هر كس از آن اطلاع یابد انقلاب كاملی در نظر و دیدگاه او به وجود می&amp;zwnj;آید، و برداشتی كه در گذشته از خمس داشته است كاملاً تغییر می&amp;zwnj;كند، و برای اولین بار فرق بسیار بزرگ سنّت&amp;zwnj;های موروثی را با حقایق مجهول و ناشناخته در می&amp;zwnj;یابد! كه بعد از آن برای آن كه به خاطر حقیقت علیه سنّت غلط و اشتباه بشورد به چیزی جز جرأت و شهامت و استقلال در اظهار نظر نیاز نخواهد داشت.&lt;br /&gt;
برخی از این حقایق عبارتند از:&amp;zwnj;&lt;br /&gt;
حقیقت اول:&amp;zwnj;&lt;br /&gt;
پرداختن خمس درآمدها به فقیه هیچ دلیل ندارد و در منابع معتبر حدیث شیعه هیچ اساس و ریشه&amp;zwnj;ای ندارد.&lt;br /&gt;
حقیقت دوم:&amp;zwnj;&lt;br /&gt;
این از حقیقت اوّل بزرگتر و عجیب&amp;zwnj;تر است! اما با وجود آن پوشیده و ناشناخته مانده و توده مردمی كه معتقدند پرداختن خمس واجب است از این حقیقت خبر ندارند... این حقیقت عبارت است از:&lt;br /&gt;
بسیاری از روایت&amp;zwnj;هایی كه از ائمه نقل شده&amp;zwnj;اند می&amp;zwnj;گویند كه لازم نیست شیعیان خمس بپردازند و به خصوص در زمان غیبت امام خمس از آنها ساقط است و تا ظهور (مهدی منتظر) ادای آن لازم نیست.&lt;br /&gt;
حقیقت سوم:&lt;br /&gt;
روایت&amp;zwnj;ها می&amp;zwnj;گویند دادن خمس به خود امام اگر حاضر باشد واجب نیست، بلكه پرداختن خمس مستحب است، و فرد مختار است كه آن را بپردازد یا نپردازد، و دادن خمس واجب نیست.&lt;br /&gt;
حقیقت چهارم:&lt;br /&gt;
این حقیقت بسیار ناشناخته و هیجان انگیز است!!&lt;br /&gt;
علمای گذشته مذهب شیعه همانند شیخ مفید (ت 413هـ)، سید مرتضی علم الهدی (ت 436هـ) و شیخ الطائفه ابی جعفر طوسی (ت 460هـ) و غیره كه از پایه&amp;zwnj;های مذهب شیعه شمرده می&amp;zwnj;شوند هرگز بیان نكرده&amp;zwnj;اند كه خمس باید به فقها پرداخت شود، و بلكه اصلاً چنین چیزی به ذهن آنها خطور نكرده است.&lt;br /&gt;
حقیقت پنجم:&lt;br /&gt;
این حقیقت بسیار شگفت انگیز است!!&lt;br /&gt;
اگر دادن خمس را به فقیه با دادن خمس به امام مقایسه كنیم این حقیقت بلافاصله آشكار می&amp;zwnj;شود زیرا با مقایسه كردن این دو امر خواهیم دید كه هر دو حكم كاملاً با هم متضاد هستند........&lt;br /&gt;
حقیقت ششم:&lt;br /&gt;
در اصل نصف خمس به خود امام می&amp;zwnj;رسد، و آن حق خدا و پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم و خویشاوندان است، اما نصف دیگر آن حق یتیمان و مستمندان و واماندگان در راه از بنی&amp;zwnj;هاشم است كه امام باید آن را به اینها بپردازد، نه اینكه برای خودش بردارد.&lt;br /&gt;
حقیقت هفتم:&lt;br /&gt;
نظریه خمس به صورت اخیر خمس را به دو نصف تقسیم می&amp;zwnj;كند- چنان كه در حقیقت ششم بیان شد- نصف آن به فقیه به عنوان نایب امام تعلق می&amp;zwnj;گیرد، و نصف دیگر آن به فقرای بنی&amp;zwnj;هاشم (یتیمان و مستمندان و مسافران بنی&amp;zwnj;هاشم) پرداخت می&amp;zwnj;شود، و از غنی و توانگر ذكری به میان نیامده است.&lt;br /&gt;
حقیقت هشتم:&lt;br /&gt;
برای دادن خمس به فقها هیچ دلیلی نیست، و هیچ روایتی از هیچ امام معصومی نقل نشده است كه بگوید خمس اموال باید بیرون كرده شود و به فقهاء داده شود.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند این حقایق را مفصلا در کتابهایی که &amp;nbsp;در بخش رد شبهات&amp;nbsp;کتابخانه عقیده نشر گردیده مطالعه نمایند.&lt;br /&gt;
با فشار بر روی اسم كتاب آنرا داونلود نمایید:&lt;br /&gt;
مسأله خمس مأخوذ از کتاب و سنت&lt;br /&gt;
خمس از دیدگاه قرآن و اهل بیت&lt;br /&gt;
خمس از نظر حدیث و فتوی&lt;br /&gt;
خمس غنایم&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ جواب یک دهاتی به آقای محلاتی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/267</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;کتابِ جواب یک دهاتی به آقای محلاتی&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br /&gt;
این کتاب ردی است از استاد بزرگوار حیدر علی قلمداران بر کتاب &amp;laquo;جواب مناقشات برخطبۀ غدیر و وجوب خمس أرباح مکاسب و مسألة شفاعت&amp;raquo;، تألیف آیت الله ذبیح الله محلاّتی&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
محلاتی کتابی به عنوان &amp;laquo;جواب مناقشات برخطبة غدیر و وجوب خمس أرباح مکاسب و مسألة شفاعت&amp;raquo; در ردّ مقالة علاّمه آیت الله سیّد &amp;laquo;ابوالفضل برقعی قمی&amp;raquo; که در مجله رنگین کمان در ردّ بر خطبة غدیر &amp;ndash;که شیعه آن را به رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم نسبت داده&amp;zwnj;اند- نوشته و به طریق سؤال، گفته&amp;zwnj;هایی که خود به علامة برقعی بسته، آورده و خود با کلمة جواب به خیال خود ردّ کرده است! در حالیکه در نزد اشخاص مطّلع، جُز بر آگاهی مردم دانا به تعصّب و کم اطلاعی خود، نیفزوده است چنانکه در این کتاب معلوم خواهد شد.&lt;br /&gt;
مساله مهم در این کتاب موضوع غدیر که از روزهای أول یعنی گذشت بیش از صد سال از هجرت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم دستاویز سیاست و عداوت کسانی شد که با حکومت و زمامداران آن روز اسلام مخالفت داشتند و از ناحیۀ دشمنان وحدت اسلامی نیز تقویت می&amp;zwnj;شد و در نتیجه این ماجرا از صورت حقیقی خود خارج گردید و در دست انداز سیاست، معنی و منظور دیگری به آن دادند و هر مغرض و متعصبی آمد و چیزی بر آن زیاد کرد تا بدین غایت رسید!! که در این کتاب با گوشه هایی از این جنایات دشمنان اسلام آشنا خواهید.&lt;br /&gt;
همچنین در&amp;nbsp;قسمت پایانی کتاب بحث مفصلی درباره خمس وجود دارد که باطل بودن این&amp;nbsp;عمل شیعیان را آشکار می نماید.&lt;br /&gt;
یرادران و خواهران عزیز می توانند کتاب جواب یک دهاتی به آقای محلاتی را با فشار بر این جمله از کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
در پایان بعد از معرفی کتاب مختصری در باره نویسنده آن بیان می نماییم تا با سیرت این بزرگمرد آشنا شوید.&lt;br /&gt;
متأسفانه کمتر کسانی در ایران بزرگ با علماء و دانشمندانی همچون آیت الله شریعت سنگلچی و آیت الله العظمی سید رضا بن ابوالفضل البرقعی, و علامه اسماعیل آل اسحاق و استاد حیدر علی قلمداران و دکتر علی مظفریان, ودکترمرتضی راد مهر و دهها عالم و دانشمند دیگری آشنا هستند که مذهب پدری را با تشخیص دقیق رها کرده ومکتب حق را برگزیده&amp;zwnj;اند, گرچه شخصیتهای مذکور همگی به رحمت خدا رفته&amp;zwnj;اند اما آثار گرانبهایشان نشان دهنده و معرف شخصیتهای والای این بزرگواران است&lt;br /&gt;
استاد حیدر علی قلمداران &amp;quot;رحمه الله&amp;quot; در طول زندگی شخصیتی راستگو, عفیف, راست کردار, عابد, زاهد, شجاع, سخاوتمند و صریح اللهجه بود و همه&amp;zwnj;ی کسانی که به نحوی با ایشان ارتباط نزدیک داشته&amp;zwnj;اند ایشان را انسانی والا, بی&amp;zwnj;پیرایه, بی&amp;zwnj;تکلف, و بی&amp;zwnj;اعتناء به خوراک و پوشاک می&amp;zwnj;شناختند. گویا استاد در این راستا به هم نامش علی رضی الله عنه و سایر بزرگان دین اقتداء کرده بود. و زندگی اش شباهب زیادی به زندگی سلف و پیشگامان راستین این امت داشت.&lt;br /&gt;
با وجوی که می&amp;zwnj;توانست در پناه نام بلند و پر آوازه و در پرتو قلم و علم و تحقیقات وافرش به مناصب و مدارج دنیوی دست یابد و برای خود و خانواده&amp;zwnj;اش زندگی مرفهی فراهم آورد اما مشی زاهدانه اش مانع گرایش او به قدرت زمان و نیل به متاع و حطام دنیا و در پیش گرفتن تقیه و همراهی با خرافات و اباطیل گردید, و هرگز حقیقت را در پای جو حاکم ذبح نکرد, بلکه نام و نان و متاع زود گذر دنیا را فدای حق و حقیقت نمود. خوشا به سعادتش.&lt;br /&gt;
شما می توانید با فشار بر روی&amp;nbsp;این جمله با زندگینامه کامل استاد حیدر علی قلمداران آشنا شوید.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
قابل ذکر است که استاد حیدر علی قلمداران تألیفات و تصنیفات و ترجمه و نوشته های فراوان و مقالات مهم دینی به یادگار مانده است که شما می توانید بعضی از کتابهای ایشان را که در کتابخانه عقیده نشر گردیده است از اینجا دریافت نمایید.&lt;br /&gt;
تألیفات استاد حیدر علی قلمداران&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتاب زنان پیرامون پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/265</link>
<description>&lt;p&gt;زنان پیرامون پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&lt;br /&gt;
اگر مردان اسوه و الگو بسیارند، زنان اسوه و الگو از حیث کیفیت کم&amp;zwnj;اهمیت&amp;zwnj;تر از آنان نیستند. زن مسلمان در صدر اسلام در ثبات و استواری عقیده از مردان کمتر نبود و از نظر فداکاری و کوشش در راه عقیده&amp;zwnj;اش از هیچ چیز فروگذار نکرد؛ تا حدی که ضرب المثل عشق و زیبایی,در این عرصه گشت. این زنان مسلمان در راه اسلام&amp;zwnj;شان, همه وجود &amp;nbsp;خود را در طبق اخلاص نهادند و در راه اعتقادات راستین خود, هرگونه خواری و ستم و آزار و مرگی را آسان می&amp;zwnj;شمردند.&lt;br /&gt;
این از جهت کیفیت، و اما از جهت کمیت، روشن است که زنان از حیث شمار، نیمی از جمعیت اجتماع را تشکیل می&amp;zwnj;دهند. اگر این را در نظر داشته باشیم که آن&amp;zwnj;ها نیمی دیگر از جمعیت را نیز به وجود آورده اند، به اهمیت بیشتر آن&amp;zwnj;ها و نقش عظیم ایشان, در ساختن اجتماع پی می&amp;zwnj;بریم, زن در اجتماع&amp;nbsp;چنان شمشیری است که هم در راه صلاح و نیکی و هم در راه فساد و زشتی می&amp;zwnj;توان از آن بهره برد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;زن نیز اگر به راه صلاح درآید و به انجام وظیفه واقعی و هدف ترسیم شده&amp;zwnj;اش بپردازد، سنگ بنای بایسته&amp;zwnj;ای خواهد بود، برای ساختن جامعه&amp;zwnj;ای اسلامی و منسجم با اخلاق قوی و پایه&amp;zwnj;های استوار.&lt;br /&gt;
لذا اسلام اهتمام بسیاری به زن دارد و همچنین در بارة تربیت و پاسداشت او، تأکید کرده است و حقوقی را از نظر شرعی برای زنان قرار داده است، که با سرشت و فطرت او سازگار است؛ به گونه&amp;zwnj;ای که این حقوق در هیچ امتی از امت&amp;zwnj;های پیشین هرگز سابقه ندارد.&lt;br /&gt;
اسلام در سایة این عنایت و توجه بسیار، زن مسلمانی را به اجتماع بشری معرفی کرد که از نسل وی مردانی به وجود آمدند, که زمین را با دانش و عدل پر کردند و این مردان پرچم&amp;zwnj;های سرافرازی خویش را در قلب آسیا و شمال آفریقا و مرزهای اروپا برافراشتند؛ و باعث شدند تا ساکنان این مناطق, دین و شریعت و زبان و فرهنگ و ادب خود را رها کرده و در عوض قلوب&amp;zwnj;شان را متدین سازند و جان&amp;zwnj;ها را آسایش بخشند که از قدیم گفته اند: &amp;laquo;پشت هر مرد بزرگی، زنی بزرگ وجود دارد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
شاعر چه نیکو سروده است:&lt;br /&gt;
الأم مدرسة إذا أعددتها&lt;br /&gt;
أعددت شعباً طيب الأعراق&lt;br /&gt;
الأم رَوْضٌ إنْ تعهد الحيا&lt;br /&gt;
بالري أورق أيما إيراق&lt;br /&gt;
الأم أستاذ الأساتذة الأولى&lt;br /&gt;
شغلت مآثرهم مدى الأفاق&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;مادر, مدرسه&amp;zwnj;ای است که هرگاه او را آماده&amp;zwnj;سازی ملتی با اصالتی نیکو را آماده ساخته&amp;zwnj;ای.&lt;br /&gt;
مادر چون بوستانی است که اگر او را آبیاری نمایی، گل و برگ خواهد، چه گل و برگی.&lt;br /&gt;
مادر استاد استادان نخستین است. استادانی که آثارشان اُفق&amp;zwnj;ها را در نور دیده است.&lt;br /&gt;
اما هنگامی که زن از وظیفه اصلیش، هدفی که اسلام برای او ترسیم کرده منحرف شود و بدی&amp;zwnj;هایش را آشکار سازد، نشانه&amp;zwnj;های خیر و نیکی&amp;zwnj;های وجودش محو گردد و در نتیجه به جنگ&amp;zwnj;افزاری بیرحم بدل می&amp;zwnj;شود برای نابود ساختن و هلاکت امت&amp;zwnj;ها و گسستن پیوندهای آنان.&lt;br /&gt;
به همین دلیل است که می&amp;zwnj;بینیم اولین رهبر و معلم امت اسلام حضرت رسول صلی الله علیه وآله وسلم امتش را از خطر زن و انحراف او، آگاه ساخته است؛ همانطور که آن&amp;zwnj;ها را از خطر دشمنی, به خاطر دنیا برحذر داشتند. ابوسعید خُدری رضی الله عنه از رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم نقل کرده که ایشان فرمودند:&lt;br /&gt;
&amp;laquo; دنیا شیرین وتر و تازه است و الله متعال شما را در دنیا جانشین خود قرار داده است، بنگرید که چه می&amp;zwnj;کنید؟ از دنیا و زنان بپرهیزید و در روایتی دیگر آمده است که &amp;laquo;همانا نخستین فتنة بنی اسرائیل در میان زنان بود&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;و از اسامه بن زید رضی الله عنه روایت شده که فرمود: رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمودند: &amp;laquo;بعد از من فتنه&amp;zwnj;ای بدتر از زنان، برای مردان به جای نمانده است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و دشمنان اسلام دریافته بودند که نقش زن مسلمان در بنای اسلام از زمان رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم تا به امروز چه بوده است. اسلام به آن&amp;zwnj;ها عزتی داد که علمای عامل و مجاهدان راستین به امت اسلام بخشیدند، کسانی چون عمر بن خطاب و خالد بن ولید و صلاح الدین ایوبی و... و عایشه دختر ابوبکر صدیق &amp;nbsp;و اسماء و ام عماره و خنساء رضی الله عنهم اجمعین &amp;nbsp;و... . دشمنان اسلام بهترین وسیله برای نابودی اسلام را ، داوری بر سر عقیدة زن مسلمان یافته اند؛ در نتیجه از روی خباثت و پستی دست به توطئه&amp;zwnj;هایی زدند تا زن را از وظیفة اصلی&amp;zwnj;اش باز دارند و آن بیعت بزرگ را [که با رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم انجام داده اند] را از دستش بگیرند و تحت عناوین پرزرق و برقی چون آزادی، مساوات، پیشرفت علم&amp;zwnj;آموزی، انقلاب، شکستن غل و زنجیرها, نوآوری، تجددطلبی و شعارها و عناوین گمراه&amp;zwnj;کننده او را به پرتگاه پستی و بیهودگی بیندازند.&lt;br /&gt;
این است که ما از یکی از سردمداران استعمارگر می&amp;zwnj;شنویم که جام شراب و زنِ خُنیاگر در از میان&amp;zwnj;بردن ملل مسلمان، بیش از هزار توپ جنگی کارگر است و آن ملت را در گرداب عشق به مادیات و شهوات غرق می&amp;zwnj;سازند. و یکی از فراماسونران بزرگ گفته است: (ما باید زن را به دست آوریم، هر روزی که به سمت ما کشیده شود به حرام موفق می&amp;zwnj;شویم تا سپاه پیروز دین را متلاشی سازیم).&lt;br /&gt;
در پرو تکول&amp;zwnj;های دانشمندان صهیونیست، چنین آمده است: (لازم است که همواره بنای اخلاقیات را در همه جا ویران سازیم تا به آسانی بر همگان سلطه یابیم. فروید ,که از ما است روابط جنسی را در برابر پرتو نور خورشید نمایان ساخت, تا این که در نظر جوان چیز مقدس و محترمی باقی نماند و تمام همت او این باشد که غریزة جنسی&amp;zwnj;اش را ارضاء کند و در چنین زمانی است که اخلاقش را از دست می&amp;zwnj;دهد).&lt;br /&gt;
در برابر این خطری که جمعیت زنان مسلمان ما را محاصره کرده است برای این که در راه یاری&amp;zwnj;رساندن به حقیقت, برخی از تکالیفی که بر گردن ماست را به انجام رسانیم و در راه بیدارگری زن مسلمان, برای این که بتواند نقش طبیعی و مهم خود را یعنی ساختن امت ایفا کند، نویسندگان محترم کتاب زنان مشهور در عصر رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم را تألیف نمودند.&lt;br /&gt;
این کتاب در بردارندة اهداف بسیاری است از جمله:&lt;br /&gt;
1- ستایش عظمت حضرت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم و تبیین استحکام مبانی و اصول مکتب اسلام که این زنان سرآمد و شایسته و مربیان کوشا را پرورش داده است. زنانی که وظیفة پرروش نسلی مسلمان را به خوبی انجام داده اند و این نسل مسلمان، سردمداران غرب را به وحشت افکنده اند؛ تا جایی که بیسمارک (صدر اعظم مشهور آلمان) می&amp;zwnj;گوید: به من ده هزار مسلمان بدهید تا به وسیله آنان همة جهان را فتح کنم.&lt;br /&gt;
2- درس&amp;zwnj;ها و عبرت&amp;zwnj;هایی برای همة همسران از خلال بررسی سیرة رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم و رفتار ایشان با همسران و دختران&amp;zwnj;شان.&lt;br /&gt;
3- توصیف زنان فاضل صحابی رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم که اینان با رضایت و رفتار نیکو در مقابل هووهایشان تعدد زوجات را می&amp;zwnj;پذیرفتند.&lt;br /&gt;
4- ارایه نمونه&amp;zwnj;هایی از زنانی مسلمان که در کمال عفت، ساده&amp;zwnj;زیستی، میانه&amp;zwnj;روی و تعادل بر سختی زندگی با شوهران&amp;zwnj;شان شکیبایی ورزیدند، با این هدف که زنان در همه عصرها از آنان درس بگیرند و آنان را الگو قرار دهند و از مدپرستی رها شوند و ثروت&amp;zwnj;های جامعه را از تلف&amp;zwnj;شدن در امور بیهوده و بی&amp;zwnj;ارزش حفظ کنند. اسلام امر بیهوده&amp;zwnj;ای نیست بلکه نیرویی است که می&amp;zwnj;تواند جهان را بسازد.&lt;br /&gt;
5- از اهداف این کتاب یادآوری اسلام ناب و صحیح, به زنان مسلمان است که آن از طریق الگوبرداری از سیرة رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم ، زندگی همسران ایشان (امهات مؤمنین) و دختران پاک&amp;zwnj;دامنش و همچنین از طریق سیرة زنان پیکارگر و یاور رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم که هیچگاه از فرمان ایشان سرپیچی نورزیدند و حتی در اطاعت امر ایشان بر یکدیگر پیشی می&amp;zwnj;گرفتند، امکان&amp;zwnj;پذیر است و همین زنان به سبب دارابودن این خصلت&amp;zwnj;های نیک، یکی از دلایل پیروزی ارتش اسلام شدند.&lt;br /&gt;
در پایان امیدواریم که الله متعال این کتاب را وسیله&amp;zwnj;ای برای برانگیختن روح همت و حماسه در میان خواهران و زنان و دختران ما قرار دهد و در نتیجه آن&amp;zwnj;ها را بیشتر به سمت تمسک به اسلام سوق بدهد، تا در شمار همسران و مادران شایسته قرار بگیرند و بتوانند نسلی مسلمان و شایسته و مجاهد را پرورش دهند، تا برای رهایی جهان از دست جاهلیت جدیدی که در آن زندگی می&amp;zwnj;کنند به پا خیزند. امیدواریم که مسلمانان به مقام&amp;zwnj;های بالایی که پیشتر داشتند دست یابند؛ همانگونه که پیشتر قافلة اسلام را به سوی مجد و عظمت عالی و قلة تمدن حقیقی رهبری می&amp;zwnj;کردند.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران گرامی می توانند با فشار بر روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1092/&quot;&gt;زنان پیرامون پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ صهرین عثمان و علی رضی الله عنهما</title>
<link>http://qalamlib.com/news/264</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عثمان و علی رضی الله عنهما دو تن از خلفای راشدین و هر دو داماد پیامبر بزرگوار اسلام صلی الله علیه وآله وسلم می باشند...در این کتاب با سیرت این دو صحابی بزرگ آشنا می شود و خیلی از واقعیت های آن دوران برایتان آشکار می شود...&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتابِ صهرین عثمان و علی رضی الله عنهما&lt;br /&gt;
عثمان و علی رضی الله عنهما دو تن از خلفای راشدین و هر دو داماد پیامبر بزرگوار اسلام صلی الله علیه وآله وسلم می باشند.&lt;br /&gt;
حکومت اسلام در شش ساله اول خلافت حضرت عثمان رضی الله عنه در اثر لیاقت و حسن تدبیر این خلیفه راشد چه در ایران و چه در جاهای دیگر کماکان قوی و مقتدر بود و خیلی خوب پیش می&amp;zwnj;رفت. علاوه بر این که ایرانیان و رومیان متمرد را که می&amp;zwnj;خواستند از اطاعت این حکومت سرباز زنند، سرکوب و آن&amp;zwnj;ها را باز مجبور به اطاعت نمود و سر جایشان نشاند، بلکه علاوه بر این موفقیت مهم، به فتوحاتی اضافه بر آنچه که دو خلیفه قبل موفق شده بودند، دست یافت و باقیمانده خاک ایران و افغانستان و قسمت&amp;zwnj;های جنوب شرقی و نواحی شمالی ایران و نیز مستعمرات شرقی دولت روم را گرفت و در قلمرو خود قرار داد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;اراده و نقشه عثمان س این بود که، به خاک اصلی روم حمله و آن را تصرف کند؛ ولی فرصت این کار از دستش در رفت. زیرا در سال هفتم خلافتش در خود شبه الجزیره و در مراکز مهم آن فتنه از کمین&amp;zwnj;گاه سر برآورد و به تدریج به راه افتاد. یعنی دشمنان دین و دولت اسلام که تظاهر به اسلام می&amp;zwnj;کردند ولی در باطن دشمن سرسختِ اسلام بودند و در آتش حقد و کینه می&amp;zwnj;سوختند، آوای تظلم و دادخواهی علیه عمال عثمان سر دادند. بعداً به خود عثمان تعرض کردند؛ آواز واعدالتاه سر دادند و تدریجاً به حدی افکار عمومی را علیه عثمان مشوب کردند که حتی اذهان صحابه کرام در مدینه نیز مکدر گردید و از کارگزاران و عمال عثمان بیزار شدند و از خود او رنجیدند.&lt;br /&gt;
این ماجرا زمینه مساعدی برای این دشمنان فراهم ساخت و به آن&amp;zwnj;ها میدان و مجال داد تا آنچه را در دل ناپاک نهان می&amp;zwnj;داشتند، طبق یک نقشه حساب شده عیان نمایند و به عمل درآورند. سرانجام نیز به مدینه مرکز خلافت و حکومت اسلام یورش بردند و خلیفه مسلمین عثمان بن عفان t را به قتل رسانیدند.&lt;br /&gt;
با شهادت حضرت عثمان، وحدت مسلمین [که رسول الله آن را به وجود آورد و ابوبکر و عمر آن را تقویت کردند و در حفظ آن کوشیدند] از بین رفت.&lt;br /&gt;
آری، شهادت حضرت عثمان همانطور که خود او در گرماگرم فتنه به فتنه&amp;zwnj;انگیزان در مدینه فرموده بود، باعث بروز دشمنی&amp;zwnj;های حاد و خون&amp;zwnj;ریزی&amp;zwnj;های زیادی در بین مسلمین گردید. از این رو دیگر خبر و اثری از جهاد با دشمن در خارج و فتح جدید و توسعه دایرة حکومت اسلامی نبود، تا آنگاه که معاویه پس از شهادت حضرت علی بن ابی طالب بی&amp;zwnj;رقیب و یکه تاز گردید. قدرت&amp;zwnj;های متفرقه را یک جا در دمشق به دست گرفت و همان دشمنان دوست&amp;zwnj;نمای آشوب&amp;zwnj;گر را شناسائی کرد و ماهرانه از بین برد. پس از فراغت از این کار شروع به جهاد نمود و به نواحی مجاور مرزهای غربی حکومت اسلام که هم&amp;zwnj;پیمان با روم بودند حمله و آن&amp;zwnj;ها را تصرف کرد.&lt;br /&gt;
حضرت علی کرم الله وجهه هنگامی به خلافت رسید که اوضاع جامعه مسلمین در اثر شهادت حضرت عثمان به حدی آشفته بود که امید هر امیدواری به یأس و ناامیدی مبدل می&amp;zwnj;شد. زیرا همان دشمنان فتنه&amp;zwnj;انگیز آشوب&amp;zwnj;گری که عثمان خلیفه مسلمین را به قتل رسانده بودند و بیت المال مسلمین را غارت کرده بودند، به آرزوی خود رسیده و بر شهر مدینه مرکز حکومت اسلام کاملاً تسلط یافته بودند. قدرت در دست آن&amp;zwnj;ها بود. مسلمین در ولایات و ایالات به دو فرقه منقسم شده بودند فرقه&amp;zwnj;ای طرفدار عثمان و خواهان خون عثمان بودند و فرقه&amp;zwnj;ای دیگر که از زمره همین دشمنان بودند بدخواه عثمان و بر ضد طرفداران عثمان بودند. این دو فرقه بر ضد یکدیگر در مقابل هم قرار گرفتند.&lt;br /&gt;
لذا دوره خلافت این شخص عظیم جهان اسلام، دوره پرآشوب تاریخ اسلام بود و تقریباً یکسره در کشمکش&amp;zwnj;های سیاسی و جنگ&amp;zwnj;های داخلی گذشت. نقشه&amp;zwnj;های صحیح و خداپسندانه این خلیفه راشد که برای اصلاح امور مسلمین در نظر داشت، صورت نگرفت. نه جنگ&amp;zwnj;ها و منازعات داخلی به او مجال داد تا آنچه می&amp;zwnj;خواست و آنطور که در نظر داشت عمل کند و نه همراهان و طرفدارانش او را چنان که اراده داشت آزاد می&amp;zwnj;گذاشتند تا به دلخواه خویش تصمیم بگیرد و اقدام کند و گرنه بی&amp;zwnj;هیچ تردید مسیر اسلام غیر از آن هدف که شد و اوضاع مسلمین غیر از این بود که اکنون هست.&lt;br /&gt;
خیلی واضح است که حضرت علی در چنین اوضاع آشفته&amp;zwnj;ای که گفتیم و با چنین مردم خودسری که شنیدیم، نمی&amp;zwnj;توانست آنچنانکه در دل داشت، از عهده کار برآید تا آنچه را که برای اصلاح امور آشفته امت محمد r لازم بود، انجام دهد.&lt;br /&gt;
ناگفته نماند که بودند در بین همراهان حضرت علی مردم به حق مؤمنی از قبیل عمار بن یاسر و ضرار بن حمزه که مانند انصار انبیاء، مخلص و وفادار بودند؛ از دنیا بیزار و از علائق دنیا دل کنده بودند. مطیع مخلص حضرت علی بودند و او را بر جانِ خویش مقدم و اولی می&amp;zwnj;دانستند.&lt;br /&gt;
شدت اخلاص و محبت آن&amp;zwnj;ها نسبت به حضرت علی به حدی بود که وقتی از ضرار بن حمزه سؤال شد از شنیدن شهادت علی در چه حالی افتادی؟ گفت: مصیبتی دیدم مانند مصیبت و فاجعه مادری که فرزندش را جلو چشمش و در دامانش سر ببرند ولی این اشخاص در صفوف حضرت علی گروه کوچکی بودند که نمی&amp;zwnj;توانست با آن&amp;zwnj;ها مستقلاً کار کند.&lt;br /&gt;
حضرت علی چنانکه در نهج البلاغه آمده و در این کتاب نقل شده از توده طرفدارانش گله&amp;zwnj;ها داشت. آن&amp;zwnj;ها را روی منبر مسجد کوفه ملامت و سرزنش می&amp;zwnj;فرمود.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزیز! آنچه در این مقدمه در بارة عثمان و علی ب مختصر و فشرده بیان شده با مطالعه این کتاب، بیشتر در بارة آنان خواهید خواند. آنچه در این کتاب می&amp;zwnj;خوانید از منابع تاریخی موثق و مورد اعتماد نقل شده اند. امید است انشاء الله این کتاب بسیاری از اشتباهات و شبهاتی را که در اذهان مسلمان قرار دارد رفع نماید.&lt;br /&gt;
این کتاب را می توانید با فشار بر روی اسم آن از کتابخانه عقیده داونلود نمایید.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1086/&quot;&gt;کتابِ صهرین عثمان و علی رضی الله عنهما&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ شمشیر بران بر اشراک و بدعات دوران</title>
<link>http://qalamlib.com/news/263</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ شمشیر بران بر اشراک و بدعات دوران&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
برادران وخواهران مسلمان!&lt;br /&gt;
هدف از آفرینش زمین و آسمان و جن و انسان و فرشته و حیوانات و همۀ موجودات توحید و یکتا پرستی ذات یگانه الله جل جلاله&amp;nbsp;است یعنی ذات یگانه او را شناختن و او تعالی را به یگانگی پرستیدن و تنها از او کمک خواستن. که ما در کاست اول سلسلۀ توحید مفصلاً در این باره صحبت نمودیم.&lt;br /&gt;
الله تبارك و تعالی می فرماید: (وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِیَعْبُدُونِ) [ذاریات: 56].&lt;br /&gt;
&amp;laquo;من جن و انس را نیافریدم جز براى اینكه عبادتم كنند&amp;raquo;&lt;br /&gt;
باید بدانیم که بعضی از اعمالی كه عده ای از انسانها ندانسته انجام می دهند شرک بوده، &amp;nbsp;و یا در مقابل&amp;nbsp;ومخالف با مفهوم عبادت الله جل جلاله و یا ضدیت با لا اله الا الله&amp;nbsp;قرار دارد، شرک ورزیدن به الله&amp;nbsp;جل جلاله و مخالفت با لا اله الا الله عملی خطرناک و نابود کنندۀ دنیا وآخرت انسان می باشد، که ما می خواهیم بعضی از مهمترین آنها را خدمت شما عزیزان بیان کنیم و قبل از همه باید بدانیم که برای شناخت چیزی نیاز به دو مساله وجود دارد:&lt;br /&gt;
1ـ شناخت حقیقت آن چیز&lt;br /&gt;
2ـ شناخت اضداد آن یا آنچه با آن مخالف است.&lt;br /&gt;
الله جل جلاله می فرماید: (وَلَئِنْ سَأَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ لَیَقُولُنَّ اللَّهُ قُلْ أَفَرَأَیْتُمْ مَا تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ إِنْ أَرَادَنِیَ اللَّهُ بِضُرٍّ هَلْ هُنَّ كَاشِفَاتُ ضُرِّهِ أَوْ أَرَادَنِی بِرَحْمَةٍ هَلْ هُنَّ مُمْسِكَاتُ رَحْمَتِهِ قُلْ حَسْبِیَ اللَّهُ عَلَیْهِ یَتَوَكَّلُ الْمُتَوَكِّلُونَ) &amp;nbsp;[زمر: 38].&lt;br /&gt;
&amp;laquo;و اگر از آنها بپرسى: &amp;laquo;چه كسى آسمانها و زمین را آفریده؟&amp;raquo; حتما مى&amp;rlm;گویند: &amp;laquo;الله&amp;raquo; بگو: &amp;laquo;آیا هیچ دربارۀ معبودانى كه غیر از الله سبحانه وتعالی مى&amp;rlm;خوانید فكر مى&amp;rlm;كنید كه اگر الله زیانى براى من بخواهد، آیا آنها مى&amp;rlm;توانند گزند او را برطرف سازند؟! و یا اگر رحمتى براى من بخواهد، آیا آنها مى&amp;rlm;توانند جلو رحمت او را بگیرند؟!&amp;raquo; بگو: &amp;laquo;الله مرا كافى است; و همۀ متوكلان تنها بر او توكل مى&amp;rlm;كنند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
در این آیه، الله جل جلاله به پیامبرش می&amp;zwnj;فرماید: به اینها بگو كه از طرفی اعتراف می&amp;zwnj;كنید كه اللهجل جلاله ، یگانه خالق آسمانها و زمین است. پس چرا در عبادت به سوی دیگران روی می&amp;zwnj;آورید؟!&lt;br /&gt;
این روشِ معمولِ قرآن، است كه مشركان را بوسیلة توحید ربوبیت كه قبولش دارند، در مورد توحید الوهیت كه قبولش ندارند مؤاخذه می&amp;zwnj;كند.&lt;br /&gt;
در مسند امام احمد رحمه الله: از عمران بن حصین رضی الله عنه روایت شده كه &amp;laquo;رسول الله صلی الله علیه وآله وأصحابه وسلم انگشتری در دست مردی دیدند. پرسیدند: این چیست؟ مرد گفت: این برای واهنه است(یعنی بیماری ناتوانی جسم) رسول الله صلی الله علیه وآله وأصحابه وسلمفرمودند: آنرا در بیار زیرا فایده&amp;zwnj;ای جز اینكه ناتوانی تو را افزایش می&amp;zwnj;دهد، نخواهد داشت. و افزودند كه اگر در حالی بمیری كه آنرا پوشیده&amp;zwnj;ای، هرگز رستگار نخواهی شد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
ولی متأسفانه امروزه می بینیم كه خیلی از مسلمانان گرفتار همین شرک گردیده اند یکی نخی را به مچ دست خود بسته ودیگری مهره ای را به شانۀ فرزندش و آن یکی پارجه ای را به فلان زیارتی، تا به زعم خودشان حاجت شان را برآورده سازند و یا مصیبتی را از آنها دور گردانند.&lt;br /&gt;
و طبق روایت دیگری رسول الله صلی الله علیه وآله وأصحابه وسلم فرموده اند: (كسیكه مهره&amp;zwnj;ای برای شفا بیاویزد، شرك ورزیده است).&lt;br /&gt;
همچنین داخل&amp;zwnj;کردن کارهای نو و بی&amp;zwnj;اصل در دین انکارِ کمال دین و انکار اتمامِ نعمت می&amp;zwnj;باشد؛ عقائد باشند یا اعمال. بعد از تکمیل دین، هر سخن نو و هر فعلِ جدید و هر عمل بی&amp;zwnj;اصل، هر حیله و هر طریقه در دائرة شریعت فضول و لا یعنی و ضلال بشمار میرود.&lt;br /&gt;
بعض انسانها با تقلید از پیروانِ ادیان و مذاهب گمراه از آنها متأثر شده کارهایی مثل کارهای آنها را در جامعه اسلامی به این نیت ترویج می&amp;zwnj;دهند که دین خود و خداپرستیِ خود را خوش&amp;zwnj;رنگ و مزین عرضه نمایند. بالعموم اینچنین مردم دارای جذبات، حرارت و حمیتِ مذهبی از اثرِ خاصی می&amp;zwnj;باشند و می&amp;zwnj;خواهند که در میدانِ عمل بر مذهب و عقائدِ خود از دیگران سبقت برند. و بعضی قطع نظر از جذبه و شوقِ مذهبی فقط جهتِ اغراض ذاتی و جلب منفعتِ نفسانی و مادی در دین سخنها و کارهای نو شامل می&amp;zwnj;کنند، و بجاآوری آنها را موجبِ ثواب و برکت و تقرب قرار می&amp;zwnj;دهند و کسی که از همنوائی و همکاری ایشان اباء ورزد او را بی&amp;zwnj;دین و دشمن و گستاخ می&amp;zwnj;نامند. لذا اگر آنها منع کرده شوند، و بدی و مضرتِ کارهای بی&amp;zwnj;اصلِ آنها جلوِ آنها آشکار کرده شود، فوری برای مبارزه و معارضه در می&amp;zwnj;آیند و نقد نسبت به خود را هیچ گاه تحمل کرده نمی&amp;zwnj;توانند، و در هتکِ عزت و تمسخر و اذیت&amp;zwnj;رسانی منع&amp;zwnj;کننده می&amp;zwnj;پردازند، اما جاذبه و محبتی که در دلِ آن صاحبِ دعوت نسبت به قرآن و سنت و پیامبر اسلام علیه و آله وأصحابه افضل التحیات والتسلیمات موجود می&amp;zwnj;باشد، مجبورش می&amp;zwnj;کند که علَم جهاد را بر علیه آن دشمنِ الله و رسول صلی الله علیه وآله وأصحابه وسلم و دشمنِ دین و جامعة بشریت در اهتزاز درآرد، و مردمِ جهان را از بندگی و غلامی بندگان، به شاهراه عبادت و توحیدِ خداوند ذوالجلال و از ظلم ادیانِ باطله، به سوی عدالتِ اسلام و از رذائل به سوی فضائلِ اخلاقی و انسانی دعوت &amp;zwnj;دهد، تا این که دینِ اسلام در دنیا منتشر شود، و نغمة جانفزای قرآن در اطراف و اکنافِ عالَم پخش گردد و سلطة توحید بر عالمِ انسانیت مسلط شود، و چهره شرک و بدعت مختفی گردد و پرچمِ اسلام در نشیب و فراز به اهتزاز درآید، و پرچم کفر و شرک و بدعت سرنگون گردد و حزبِ الله مظفر و سعادت&amp;zwnj;های دنیا و آخرت را نائل شده، لشکرِ شیطان خائب و خاسر ماند.&lt;br /&gt;
کتابی که اینک خدمت شما عزیزان معرفی می گردد اثر &amp;nbsp;استاذ دانشمند مولانا محمد عمر نقشبندی مجددی میباشد که مشتمل بر اثباتِ توحید به عناوینِ مختلفه و نفی شرک و مذمتِ آن، و عقائد مشرکین نسبت به ذات و صفاتِ رب العالمین، تعریف علم غیب، نفی علم غیب از غیر الله، بیان حکمت و فلسفة عبادتِ غیر الله، بیان وسیله و معنی وسیله و اقسامِ توسل، تفصیلاتِ شرک فی العبادة، بیان سدّذرائع شرک، بیان تعریف بدعت و معنی مأخذِ آن، تعریف اصطلاحی بدعت، اقسامِ بدعت به بدع حقیقیه و اضافیه و فرق آنها، بیان فرق بین بدع و مصالحِ مرسله و استحسان، بیان اسقاطِ مروج، بیان بعضی مسائلِ متفرقه و بدعات متصوفه و جواب بعضی روایاتِ مبتدعین می باشد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;این رساله کتابی است مختصر که خواننده اگر بنظر انصاف و طلب هدایت مطالعه نماید، برایش یقیناً چراغ راه ثابت خواهد شد. و ناگفته نماند که در ردِ بدعات و شرکیات کتابی این چنین جالب و مستند و مؤثر در رشتة خود در زبانِ فارسی تا هنوز منتشر نشده است، و سزد که هر مسلمان فارسی&amp;zwnj;دان یک جلد از این کتاب را در خانه داشته باشد، تا این که بتواند زندگی خود را بر اساس تعلیماتِ قرآن و ارشادات پیغمبر اکرم صلی الله علیه وآله وأصحابه وسلم استوار کند.&lt;br /&gt;
شما عزیزان می توانید این کتاب را از کتابخانه عقیده داونلود نمایید و به اطلاع برادران و خواهرانی که با ارسال ایمیل به اداره سایت از ما درخواست نسخه چاپ شده کتابهای سایت را نموده اند می رسانیم که کتابخانه عقیده فقط در راستای نشر الکترونیکی کتاب ها فعالیت دارد و چاپ و ارسال کتاب های سایت به عهدۀ نویسندگان و مترجمان و کتابخانه ها و دارالنشرهایی می باشد که در این زمینه فعالیت دارند.&lt;br /&gt;
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&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1080/&quot;&gt;شمشیر بران بر اشراک و بدعات دوران&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>&quot;دین ستیزی نافرجام&quot; ردی بر کتاب «تولّدی دیگر»</title>
<link>http://qalamlib.com/news/261</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گزر عمر عجب حکایتی دارد!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و قلم را عجب توانی است...&lt;br /&gt;
لاغر اندامی بی جان که چون بر زمین افتد از نام عاجز و ز نشان عاجزتر است و چون بر انگشتان سوار گردد نام یار خود را بر سقف فلک می‫نگارد و یا در قعر پستی زیر آوار لعن و نفرین خلایق دفنش می‫کند.&lt;br /&gt;
شجاع الدین شفا کاتب محمد رضا شاه پهلوی، که در دوران ستم شاهی با کمر خم کردن بر در سرور خویش حلقه بردگی خدمت در شورای فرهنگی سلطنتی را بگوش آویزان کرده بود، در 27 فروردین 1389 بدور از دعای مهین خویش در حالیکه از فرهنگ و شخصیت و هویت ملیش رانده شده بود، در گمنامی فرانسه مرد!&lt;br /&gt;
&amp;quot;شفا&amp;quot; از جمله اشخاصی است که با جفا به قلم او را اجیر هوای خویش کردند، و عقل و منطق را نه تنها بها ندادند بلکه با بی رحمی زیر پای خویش دفن کردند...&lt;br /&gt;
چه خوش وصف کرده قرآن کریم اینگونه افراد را:&lt;br /&gt;
(وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يُجَادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُنِيرٍ) الحج 8&lt;br /&gt;
&amp;laquo;و از میان مردم کسی است که درباره خدا بدون دانش و رهنمود و کتاب روشنگری به مجادله می&amp;zwnj;پردازد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
چرخ گردون با انقلاب مردمی ایران کچکول گدائی در دست شاهان ستمگر نهاده، آنها را از عرش ستم بر فرش خاک واژگون کرد. و چون شاه گریخت نوکران بدو پیوستند.&lt;br /&gt;
البته این تحول تاریخی را شاهانی در لباس مقدس روحانیت از دست ملت ربودند. و دین را متدین نماها صاحب شدند، و قرآن شد اسیر اهریمنی جدید به نام &amp;quot;ولایت فقیه&amp;quot;، و رهبر از شاه که &amp;quot;سایه خدا &amp;quot; بر زمین بود سر و گردنی بالا زد و شد؛ &amp;quot;عصای خشم خدا&amp;quot;، و نائب و سخنگو و وزیر و جلاد او بر زمین که جز صفات قهر و خشم و غضب و ستم و خونریزی از خدایی که کتابش او را بخشاینده و مهربان می‫نامد هیچ به ارث نبرد!&lt;br /&gt;
غالبا کینه‫ی این چهره‫ی زشت و منکر متدین نماها، همراه با از دست دادن &amp;quot;معاونت فرهنگی دربار پهلوی&amp;quot; جناب &amp;quot;شفا&amp;quot; را آنچنان آشفته خاطر و پریشان ساخته بود که تنها راه رسیدن به شهرت را در به مبارزه طلبیدن پروردگار عالمیان دید..&lt;br /&gt;
شفا خواست با باد دهانش خورشید تابان حقیقت را خاموش کند. قلم ناتوان خود را گرفته شروع کرد به تازیدن به دیانت، و خیانت به امانت، گویا نمی دانست: &amp;laquo;مَنْ صَارَعَ الْحَقَّ صُرِعَ&amp;raquo;. (هر کس با حق در افتد برافتد.)&lt;br /&gt;
آنچه از حقد و کینه‫ی او تراوش کرده بود را استادی که قلمش را به دست عقل و منطق خویش داده بود، یعنی؛ استاد مصطفی حسینی طباطبائی در کتاب &amp;quot;دین ستیزی نافرجام&amp;quot; جواب داد تا شاید قلب بیمار آقای &amp;quot;شفا&amp;quot; شفا یاد!&lt;br /&gt;
ولی دوصد حیف که هیچ خبری در این باره روایت نشده، و گویا شجاع الدین شفا نخواست شرف توبه و بازگشت به حقیقت را داشته باشد، و در حالی جان از کالبدش پرید که جز نفرین عقل و قلم با خود هیچ توشه‫ راهی بهمراه نبرد!&lt;br /&gt;
اجازه می‫خواهم چند جمله‫ای از مقدمه‫ی کتاب استاد طباطبائی برای شماخواننده عزیز بیاورم شاید اشتهایتان را برای خواندن کتاب باز کنم!&lt;br /&gt;
(خوانندگان محترم به خوبی می&amp;zwnj;دانند که تعصّب داشتن به معنای پافشاری در آراء باطل، نشانۀ خودخواهیِ بیش از اندازه و کم خردی است و سخن متعصّبانه چه در دفاع از بی&amp;zwnj;دینی گفته شود یا رنگ دینی به خود گیرد، نزد خردمندان ارزش و اعتباری ندارد. جای تأسّف است که آقای شجاع الدین شفا به علّت تحوّلات سیاسی کشور و محرومیّت از امتیازات درباری، در مخالفت با اسلام و قرآن به وادی تعصّب افتاده است. کتاب ایشان را در واقع باید &amp;laquo;سیاه&amp;zwnj;نامه&amp;raquo; خواند که با بدبینی تمام نسبت به همه ادیان و به ویژه اسلام نگاشته شده است. نویسنده در هیچ یک از ادیان الهی حتّی یک نقطۀ روشن و آموزش صحیح نمی&amp;zwnj;بیند، هیچ کمالی در پیامبران بزرگ و شخصیّت&amp;zwnj;های برجستۀ دینی ملاحظه نمی&amp;zwnj;کند، به آئین&amp;zwnj;های سه گانۀ یهود و مسیحیّت و اسلام جز دروغ&amp;zwnj;سازی و افسانه&amp;zwnj;سرایی سخنی را نسبت نمی&amp;zwnj;دهد و با این روش می&amp;zwnj;خواهد جامعۀ ایرانی را به &amp;laquo;تولّدی دیگر&amp;raquo; فرا خواند! آیا این کار، شدنی است؟ آیا اقداماتی که به نیّت &amp;laquo;براندازی ادیان&amp;raquo; تاکنون در دنیا صورت گرفته، به موفّقیّت انجامیده است؟ آیا دنیا در قرن ما شاهد این رویداد نبود که تلاش&amp;zwnj;های کمونیزم بر ضدّ دین به جایی نرسید بلکه به فروپاشی و انهدام خودش انجامید؟ آیا دنیا شاهد نبود که توده&amp;zwnj;های مردم دوباره، راهی کلیساها و مساجد شدند؟ آقای شفا! آنچه را که آزمون شکست خورده است چرا باید از نو پی گرفت؟ مگر حکیمان نگفته&amp;zwnj;اند : &amp;laquo;مَنْ جَرَّبَ الْمُجَرَّبَ حَلَّتْ بِهِ الْنَّدَامَةُ&amp;raquo;؟ ( به قول پارسی زبانان: آزموده را آزمودن خطاست.)&lt;br /&gt;
آقای شفا در راه ستیزه با دیانت، گاهی به سخن کسانی دست می&amp;zwnj;آویزد که اتّفاقاً دربارۀ اسلام از تمجید و ستایش خودداری ننموده&amp;zwnj;اند و شفا این معنا را نادیده می&amp;zwnj;گیرد و اساساً به روی خود نمی&amp;zwnj;آورد! دکتر گوستاولوبون یکی از این افراد به شمار می&amp;zwnj;آید که جناب شفا از او به عنوان &amp;laquo;صاحب&amp;zwnj;نظری از جهان غرب&amp;raquo; یاد می&amp;zwnj;کند و از سخنانش گواه می&amp;zwnj;آورد. این مرد کتاب مشهوری بنام &amp;laquo;تمدّن عرب&amp;raquo; به زبان فرانسه نگاشته (که آن را به عربی و فارسی ترجمه کرده&amp;zwnj;اند) و در آنجا آئین اسلام را بسیار ستوده است و دربارۀ پیامبر ارجمند آن می&amp;zwnj;نویسد:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;ما اگر بخواهیم ارزش اشخاص را به کردار و آثار نیکشان بسنجیم، به طور مسلّم محمّد بزرگترین مرد تاریخ است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
شخص دیگری که آقای شفا در دین&amp;zwnj;شناسی بدو اعتماد دارد و پیاپی سخنان وی را شاهد می&amp;zwnj;آورد، ولتر نویسندۀ نامدار فرانسوی است که &amp;laquo;دیکسیونر فلسفی&amp;raquo; او مورد استفاده شفا قرار گرفته و در نقد تورات و انجیل از آن بهره می&amp;zwnj;گیرد. هر چند ولتر در آغاز کار نسبت به اسلام خوشبین نبود (و حتّی نمایش&amp;zwnj;نامه&amp;zwnj;ای بر ضدّ پیامبر اسلام صلی الله علیه وآله وسلم ترتیب داد) ولی پس از پژوهش بیشتر به خطای خود پی برد و نوشت: &amp;laquo;من در حقّ محمّد بسیار بد کرده&amp;zwnj;ام&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
همین ولتر است که سرانجام بدین نتیجه دست یافت که به صراحت نوشت: &amp;laquo;دین محمّد دینی است معقول و جدّی و پاک و دوستدار بشریّت&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
امّا آقای شفا که زادۀ مسلمانان و فرزند محیط اسلامی است این انصاف را نشان نمی&amp;zwnj;دهد و متأسفانه جز اهانت به اسلام و قرآن راهی نمی&amp;zwnj;پیماید. وی در کتاب &amp;laquo;تولّدی دیگر&amp;raquo; سعی می&amp;zwnj;کند گزارش&amp;zwnj;های تحریف شدۀ یهودیان را به حساب آموزش&amp;zwnj;های پاک قرآن گذارد و آیات متعدّد قرآنی و آثار اسلامی را که از تحریف&amp;zwnj;های اهل کتاب خبر می&amp;zwnj;دهند بکلّی نادیده می&amp;zwnj;گیرد و شگفت آن که از همان آثار دست خورده و تحریف شده نیز اطّلاعات درستی بدست نمی&amp;zwnj;دهد و انواع دروغ&amp;zwnj;ها را دربارۀ تورات و انجیل کنونی به قلم می&amp;zwnj;آورد!)&lt;br /&gt;
آقای شفا در کتابش که کچکولی است از اتهام و تضاد گویی پس از حمله‫های بیرحمانه و نا انصافیهای مکرر در حق اسلام چنین اذعان می‫کند: &amp;laquo;از قتل عام کارتاژها تا تأسیس سنت بارتلمی، از جنگ&amp;zwnj;های صلیبی تا مبارزات مذهبی کاتولیک&amp;zwnj;ها و پروتستان&amp;zwnj;ها، از خیمه&amp;zwnj;های آتشی که هزاران نفر به جرم ارتباط با شیطان در آن سوختند تا چرخ&amp;zwnj;های شکنجۀ انگیزیسیون که استخوان&amp;zwnj;های هزاران نفر دیگر در آنها خورد شد یا زبان&amp;zwnj;هایشان از حلقه&amp;zwnj;ها بیرون کشیده شد، پرچم مسیحیّت مقدّس از درون دریایی از خون سر بر افراشت. در همان سال&amp;zwnj;ها جهان اسلام که هنوز از آسیای میانه تا کرانه&amp;zwnj;های اقیانوس اطلس را در بر می&amp;zwnj;گرفت با برخورداری از شرایط ممتاز نخستین قرون امپراتوری اسلامی نیمه برتر و بسیار پیشرفته&amp;zwnj;تر جهان باستان بود&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
شاید این مصداق همان مثال پارسی خودمان است که &amp;quot;دروغگو را حافظه نباشد&amp;quot;!&lt;br /&gt;
و اکنون که با مرگ این دین ستیز نامراد و ناکام&amp;nbsp;دفتر زندگی در دنیا بسته شد تا در قیامت جزای اعمال خود را ببینید، کتابخانه عقیده کتاب &amp;quot;دین ستیزی نافرجام&amp;quot; نوشتۀ استاد طباطبائی را که در رد کتاب &amp;laquo;تولّدی دیگر&amp;raquo; نگاشته اند را خدمت شما عزیزان معرفی می نماید.&lt;br /&gt;
با فشار بر روی اسم کتاب آنرا داونلود نمایید.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1083/&quot;&gt;&amp;quot;دین ستیزی نافرجام&amp;quot;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>شاه عبدالعزیز دهلوی رحمه الله و کتاب تحفه اثناعشری</title>
<link>http://qalamlib.com/news/259</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%&quot;&gt;
&lt;p&gt;ایشان امام و عالم نامدار، و علامه&amp;zwnj;ی محدّث؛ شاه عبدالعزیز پسر شاه ولی الله فرزند عبد الرحیم عمری دهلوی می‫باشند. ایشان از بزرگترین علمای سرشناس عصر خویش بودند. مردم روزگار آن حضرت او را به &amp;laquo;حجة الله&amp;raquo; و &amp;laquo;سراج الهند&amp;raquo; لقب داده‫اند.&lt;br /&gt;
شاه عبدالعزیز -رحمه الله- به سال: 1159 هـ در خانه&amp;zwnj;ی پدر بزرگوارشان شاه ولی الله دهلوی (رحمه الله) چشم بدنیا گشود، در خردسالی قرآن&amp;zwnj;کریم را حفظ نمود، و علوم متداوله را نزد پدر بزرگوارش فرا گرفت؛ برخی کتاب&amp;zwnj;ها را نزد ایشان خواند و خیلی از مسایل را نیز از پدر شنید، و خود نیز به تحقیق، درایت، تفحّص و اهتمام به مسایل علمی پرداخت به گونه&amp;zwnj;ای که در آغاز جوانی در میدان تحقیق علمی سرآمد اقران شده بود. هنوز شانزده سال بیش نداشت که والد ماجدش شاه ولی الله دهلوی به دیار باقی شتافت، و شاه عبدالعزیز نزد علمای بزرگ &amp;ndash;که از شاگردان پدرش بودند- به ادامه&amp;zwnj;ی تحصیل پرداخت.&lt;br /&gt;
ایشان قدی بلند، چهره&amp;zwnj;ی گندم&amp;zwnj;گون، اندامی لطیف، چشم&amp;zwnj;های درشت، ریش انبوه داشت. و خط نسخ و رقعه را با زیبائی تمام می&amp;zwnj;نوشت. و چون خود از سران مجاهدین و صاحب فتوای مشهور جهاد بر علیه انگلیس در شبه قاره&amp;zwnj;ی هند بود، در تیر اندازی و اسب&amp;zwnj;سواری مهارت ویژه‫ای داشت.&lt;br /&gt;
ایشان رحمه الله یکی از نوادر روزگار بود؛ حافظه&amp;zwnj;ی قوی و فهمی سرشار داشت. و انسانی بسیار فاضل و مؤدب بود. از پانزده سالگی به تدریس پرداخت، او شاگردانی تربیت نمود و در میدان درس و تدریس آوازه&amp;zwnj;اش در همه&amp;zwnj;ی هندوستان پیچید، و از هر گوشه کنار کشور طالبان علوم نبوّت به خدمتش می&amp;zwnj;رسیدند.&lt;br /&gt;
ایشان از بیست و پنج سالگی به برخی امراض دردناک از قبیل: جذام (خوره)، برص و کوری مبتلا گردید، و برخی چهارده مرض دردناک در بدن ایشان را شمرده‫اند. با وجود این از تدریس، افتاء، ارشاد، تصنیف و تدریس باز نماند.&lt;br /&gt;
شاه عبدالعزیز با وجود این همه درد، طبعی لطیف، برخوردی نیکو، حافظه&amp;zwnj;ی قوی، زبانی گویا، گفتاری شیرین و چهره&amp;zwnj;ای خندان داشت. و با تواضع، فروتنی و هوشیاری خاصی حقائق علمی را مورد بررسی قرار می&amp;zwnj;داد.&lt;br /&gt;
ایشان تألیفات زیادی دارد، که نزد دانشمندان امت اسلامی مقبولیت ویژه&amp;zwnj;ای پیدا کرده است، ایشان در مسایل عقیدتی نکاتی بسیار گویا و روشن را بر شیعیان خرده گرفته، با براهین آشکار و دلایل روشن این فرقه را مبتدع و گمراه ثابت کرده است. مذهب خودساخته‫ی شیعه هرگز نتوانسته جوابی در قبال آنچه امام عبدالعزیز مطرح ساخته‫اند بیابد، به همین دلیل کتابهای آن حضرت در کشورهایی چون ایران بکلی ممنوع اعلام شده است. شیعه صفوی با زور بازو می‫خواهد بر برهان و دلیل گویا غلبه یابد! نوشته‫های آن حضرت باعث بازگشت تعداد بسیار زیادی از شیعیان به اسلامی که قرآن آنرا مطرح ساخته، و رسول اکرم (صلی الله علیه وآله وسلم) برای بشریت به ارمغان آورده شده است. کتابهای مزبور از مشهورترین تصنیفات شاه عبدالعزیز دهلوی (رحمه الله) است:&lt;br /&gt;
1- تفسیر قرآن کریم مسمی به &amp;laquo;فتح العزیز&amp;raquo;، این کتاب را در شدت مرض و هنگام ضعف و ناتوانی شدید بر شاگردان املا نمود که در چند مجلد بزرگ بوده است، اما بیشتر آن&amp;nbsp;در انقلاب هند از بین رفته، و تنها دو جلد از اول و آخر آن باقی مانده است. قابل یادآوری است که مفقود شدن تفسیر فتح العزیز داستانی دردناک دارد، و دست&amp;zwnj;های کثیفی در نابودی این تفسیر نقش داشته اند&lt;br /&gt;
2- الفتاوى فی المسائل المشكلة.&lt;br /&gt;
3-تحفهء اثناعشریة (نصیحة المؤمنین وفضیحة الشیاطین)، این کتاب رد علمی قوی بر شیعیان رافضی می&amp;zwnj;باشد. و در ایران&amp;nbsp;ممنوع است.&lt;br /&gt;
4-بستان المحدثین، فهرست کتاب&amp;zwnj;های حدیثی و تراجم تفصیلی راویان آنها می&amp;zwnj;باشد، ولی متأسفانه این کتاب به پایه&amp;zwnj;ی اکمال نرسیده است.&lt;br /&gt;
5- العجالة النافعة، این کتاب در اصول حدیث و به زبان فارسی می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
6-السر الجلیل فی مسألة التفضیل، جزوه‫ای در فضیلت وبرتری برخی از خلفای راشدین (به ترتیب خلافت بر برخی دیگر) است.&lt;br /&gt;
7-سرّ الشهادتین، جزوه‫ی گرانبها و نفیسی است در شهادت حسن و حسین (رضی الله عنهما).&lt;br /&gt;
8- میزان البلاغة، متنی گران&amp;zwnj;سنگ در علم بلاغت.&lt;br /&gt;
شیخ عبدالعزیز دهلوی (رحمه الله) در ماه شوال سال: 1239هـ به عمر هشتاد سالگی درگذشت، و کنار قبر والدش در دهلی به خاک سپرده شد. خدا رحمت کند این عاشقان پاک&amp;zwnj;طینت را.&lt;br /&gt;
تفصیل زندگی این ابرمرد میدان علم و جهاد را در:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;الإعلام بمَن فی تاریخ الهند من الأعلام المسمى بـ &amp;laquo;نزهة الخواطر وبهجة المسامع والنواظر&amp;raquo; تألیف شیخ الشریف عبد الحی بن فخر الدین الحسنی الندوی 7 / 275- 283 ط. 1398هـ دائرة المعارف العثمانیة حیدر آباد دكن- هند نگاه کنید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار بر روی اسم کتاب تحفهء اثناعشریه در این صفحه آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/254/&quot;&gt;داونلود کتاب تحفهء اثناعشریه&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتاب امامت در پرتو نصوص</title>
<link>http://qalamlib.com/news/258</link>
<description>&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;امامت در پرتو نصوص&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;همانا شیعيان رافضى معتقد هستند که امامت نیز همچون نبوت است و بدون وجود نصی از طرف الله جل جلاله که&amp;zwnj; توسط رسولش ابلاغ گشته&amp;zwnj;، برای هیچ کسی امکان&amp;zwnj;پذیر نیست و امامت همچون نبوت لطفی از جانب پروردگار است و جائز نیست که هیچ عصر و زمانی خالی از امامی واجب الاطاعه&amp;zwnj; باشد که&amp;zwnj; از طرف الله جل جلاله منصوب شده است و هیچ&amp;zwnj;گاه انسان حق انتخاب و تعیین امام ندارد و حتی خود امام حق ندارد کسی را به عنوان امام پس از خود تعیین کند. گفتنی است که&amp;zwnj; در این باره ده&amp;zwnj;ها روایت را بر زبان ائمه وضع کرده&amp;zwnj;اند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;در این شکی نیست که پس از دفن جسد مبارک پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم مسلمانان درباره&amp;zwnj;ی مسأله امامت و خلافت اختلاف پیدا کردند؛ گروه انصار در سقیفه&amp;zwnj;ی بنی ساعده جمع شدند و خواستند در میان خود خلیفه&amp;zwnj;ای انتخاب کنند و بعضی دیگر راه میانجی&amp;zwnj;گری برگزیدند و گفتند: در میان ما یعنی انصاری&amp;zwnj;ها امیری انتخاب می&amp;zwnj;کنیم و در میان شما یعنی مهاجرین امیر دیگری انتخاب کنید؛ انصاری&amp;zwnj;ها رئیس خود یعنی سعدبن عباده را برای این امر کاندید کردند، اما هنگامی که ابوبکر صدیق رضي الله عنه فرموده پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم را برای آنها نقل کرد و به آنها خبر داد که پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم فرموده است: (الأئمة من قریش).&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&amp;laquo;امام مسلمانان باید قریشی نسب باشد&amp;raquo;.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;همه&amp;zwnj;ی انصار از درخواست خود برگشتند و در سقیفه&amp;zwnj;ی بنی ساعده هر کسی که حاضر بود به ابوبکر صدیق رضي الله عنه بیعت دادند و سپس عموم مسلمانان در مسجد به ابوبکر صدیق رضي الله عنه بیعت نمودند و گروهی از بیعت تأخیر کردند، اما بعداً همه&amp;zwnj;ی مسلمانان دست بیعت را به طرف او دراز کردند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;اما به مرور زمان غلو افراط و دسایش دشمنان اسلام از جمله یهود سبب شد فرقه شیعه رافضی ظهور کند که اساس عقايد را، &amp;laquo;امامت&amp;raquo; قرار دادند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&amp;nbsp;آنان امامت را از اصول دين بشمار مي آورند. بدون اعتقاد به امامت ايمان را ناقص مي پندارند. نزد آنها اصول دين پنج است:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;1-توحيد&amp;nbsp;2- عدل&amp;nbsp;3- نبوت&amp;nbsp;4- امامت&amp;nbsp;5- معاد &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;و از نظر آنان &amp;laquo;ولايت&amp;raquo; تعبيري از جنبه عملي &amp;laquo;امامت&amp;raquo; مي باشد. به گفته شيعيان، بنياد اسلام بر پنج چيز استوار است:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;1-نماز&amp;nbsp;2- روزه&amp;nbsp;3- زكات&amp;nbsp;4- حج&amp;nbsp;5- ولايت&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;از ميان اينها، ولايت افضل است. برخي از دانشمندان شيعه با افزودن طهارت و جهاد، بنياد اسلام را هفت چيز دانسته اند كه افضل و بالاتر از همه آنها &amp;laquo;ولايت&amp;raquo; مي باشد.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;خلاصه گفتار شيعه درباره امامت اين است كه جهت ارشاد و هدايت امت بر الله تعالي واجب است كه امام تعيين كند. بدين منظور، تا قيام قيامت، دوازده امام تعيين كرده است. يازده امام رخت از جهان بربسته اند. اولين امام، حضرت علي رضی الله عنه مي باشد و امام دوازدهم، امام غايب است كه به او &amp;laquo;امام منتظر&amp;raquo; نيز گفته مي شود.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;در این كتاب كوشش شده تا تئوری امامت مورد بحث و بررسی قرار گیرد و باطل بودن آن با دلایل علمی ثابت گردد. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;برادران و خواهران عزیز می توانند با فشار بر روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1059/&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium&quot;&gt;امامت در پرتو نصوص&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 6pt 0cm; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Tahoma&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>معاویه رضی الله عنه را بشناسید</title>
<link>http://qalamlib.com/news/257</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;معاویه رضی الله عنه را بشناسید&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اصحاب و یاران گرامى پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم شاگردان مکتب نبوت، پیشگامان دین، مشعل هدایت و به شهادت قرآن وسنت بهترین امت، و برسایر مسلمانان برترى دارند.&lt;br /&gt;
صحابه رضی الله عنهم به بركت صحبت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;و به اساس پیشگامى در اسلام، و بنا بر مجاهداتیكه در راه الله به خرج داده اند، داراى مقام عالى، وجایگاه والاى هستند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;صحابه اشخاصی اند كه الله در قرآن و پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم در احادیث صحیحه محبت و رضایت شان را از آنها اعلام داشته است؛ بنابرآن بر ما مسلمانان نیز لازم است كه به تأسى از قرآن وسنت به آنها محبت واحترام داشته باشیم.&lt;br /&gt;
صحابه رضی الله عنهم مؤمنان واقعى بودند كه دلهاى شان مملو از ایمان واخلاص، وایمانشان خالصانه، و از آلایش شرك ونفاق پاك بود؛ لذا مى بینیم كه قرآن در آیه هاى متعدد ایمان آنها را اساس و معیار ایمان دیگران قرارداده است كه این خود دلیل ایمان راستین آنها است. همانگونه که حدیثهای صحیح لازم مى گرداند كه آنها را جز به خیر و نیكى یاد نكنیم.&lt;br /&gt;
موضوع صحابه, تنها موضوع تاریخی محض نیست که هر تر و خشکی را&amp;nbsp;که در حاشیه و یا متن کتاب های تاریخ دید، بدون تفکیک اینکه از کدام منبع ومصدر اخذ گردیده؟ راوی آن کیست؟ و بدون&amp;nbsp;تشخیص صحت و سقم سند آن، این روایات تاریخی را&amp;nbsp;مدار اعتبار قرار داده، وبر مبنای آن طعن وانتقادی را بر یاران گرامی پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;روا داشت، بلکه بالاتر از آن، قضیهء دین است؛ چون صحابه رضی الله عنهم سند دین ما هستند، و عدالت آنها&amp;nbsp;به اتفاق اهل سنت از قرآن وسنت به ثبوت رسیده است.&lt;br /&gt;
آیات و احادیث صحیح بغض وعداوت با اصحاب، و روا داشتن طعن وسب به آنها را نشانهء کفر، نفاق وبى دینى معرفی کرده است..&lt;br /&gt;
چرا انتخاب سخن از معاویه رضی الله عنه؟&lt;br /&gt;
چون بسیاری از راویان تاریخ وتاریخ نویسان و برخی از طفیلیهای عرصهء علم وافراد مغرض بر مبنای روایات تاریخی &amp;ndash; که 99%&amp;nbsp;آن، موضوع, جعلی ویا ضعیف است- و با اعتماد بر منابع بیگانه وغیر موثق، تهمتها و برچسپ هایی را بر این صحابی بزرگ چسپانیده اند که دامن او از آلودگی آن کاملا پاک و مبرا بوده است، ویا برخی نظرهای اجتهادی او را بصورت مبالغه آمیز بزرگ ساخته، در نظر عامه گناه بزرگی جلوه داده اند.&lt;br /&gt;
برعکس از تمام خوبیها، قهرمانیها، فتوحات و ابتکارهای بی نظیر سیاسی، نظامی و اداری او چشم پوشی نموده اند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
لذا خواستم که گوشهء از زندگی این یار گرامی پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم وخلیفهء مجاهد را &amp;ndash; که نه تنها با نقل و روایت بلکه با تدبیر، سیاست حکیمانه وجهاد خود وسیلهء نشر و تبلیغ دین به نسل های آینده بود-&amp;nbsp;در روشنی آیات، احادیث صحیح، روایات تاریخی موثق ودیدگاه صحابه و ائمۀ دین توضیح نمایم؛ زیرا سخن از معاویه رضی الله عنه، در حقیقت سخن از&amp;nbsp;آن شخصیتی است که در مدرسهء نبوت تربیه و آموزش یافته است.&lt;br /&gt;
سخن از معاویه رضی الله عنه، در حقیقت سخن از&amp;nbsp;آن یار گرامی پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم است که به شهادت قرآن مورد رضایت الله قرار یافته، مستحق بهشت برین گشته است.&lt;br /&gt;
سخن از معاویه رضی الله عنه، سخن از&amp;nbsp;آن شخص امینی است که پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در بزرگترین امانت الهی(وحی) بر وی اعتماد کرده کاتب وحی تعیین نموده است.&lt;br /&gt;
معاویه رضی الله عنه بزرگترین شخصیت سیاسی اسلام است که نه تنها تاریخ اسلام بلکه تاریخ بشریت از تکرار نظیر آن عاجز مانده است. اگر این ابر مرد تاریخ از دیگر ملت ها میبود، او را با خط زرین&amp;nbsp;در سرفهرست شخصیت های بزرگ تاریخ ثبت میکردند&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
سخن از معاویه رضی الله عنه، در حقیقت سخن از&amp;nbsp;آن امیر مجاهد و مبتکری است که برای نخستین بار&amp;nbsp;جنگ دریایی را ابتکار و به راه انداخته، به زبان پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم مستحق جنت گردیده است.&lt;br /&gt;
معاویه رضی الله عنه آن خلیفهء مدبر&amp;nbsp;و فاتحی است که فتوحات اسلامی را بعد از&amp;nbsp;سالها توقف، دوباره بروی مسلمانان ولشکر اسلامی گشوده است.&lt;br /&gt;
معاویه رضی الله عنه از دیدگاه سلف و بزرگان دین حیثیت حجاب&amp;nbsp;و پرده ای را نسبت به دیگر صحابه رضی الله عنهم دارد، شخصی این صحابی بزرگ را مورد انتقاد قرار داد، دیگران مانند: عمرو بن عاص، مغیره بن شعبه رضی الله عنهم، ویا بالاتر از آنان طلحه، زبیر،&amp;nbsp;ام المومنین عایشه صدیقه رضی الله عنهم اجمعین&amp;nbsp;و ... نیز از شر او در امان نمی ماند.&lt;br /&gt;
در این باره محدث شام&amp;nbsp;ابو توبه ربیع بن نافع حلبی میگوید: معاویه رضی الله عنه حجاب یاران رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم است، کسی این حجاب را&amp;nbsp;بردارد، جرأت انتقاد به دیگر اصحاب را نیز پیدا میکند.&lt;br /&gt;
اینک در زمانی که شیعیان رافضی و عده ای جاهل منتسب به اهل سنت زبان بدگویی و توهین به سیدنا معاویه رضی الله عنه گشوده اند، کتابخانه عقیده تصمیم گرفت برای رفع شبهات دشمنان اسلام و صحابه رضی الله عنهم اجمعین کتابهایی را در سیرت این یار بزرگوار رسول اکرم صلی الله علیه وآله وسلم خدمت برادران و خواهران مسلمان معرفی نماید تا باشد که امت اسلامی با حقیقت این بزرگمرد تاریخ اسلام بهتر آشنا شوند.&lt;br /&gt;
معاویه بن ابی سفیان رضی الله عنهما شاگرد مکتب نبوت و کاتب وحی&lt;br /&gt;
دیدگاه منصفان درباره معاویه بن ابی سفیان رضی الله عنهما&lt;br /&gt;
معاویه رضی الله عنه را بهتر بشناسیم&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ عقیده و ایمان از دیدگاه اسلام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/256</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتابِ عقیده و ایمان از دیدگاه اسلام&lt;br /&gt;
اين كتاب در زمینۀ عقیده و باور اسلامی، نگاشته شده است.&lt;br /&gt;
كتابِ عقیده و ایمان از دیدگاه اسلام همچنان که از نامش پیدا است کتابی است در زمینه عقیده وباور اسلامی که از دومنبع اصلی یعنی قرآن و سنت پیامبر بزرگوار اسلام صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;برگرفته شده که این دو منبع سنگ زیرین و اساس عقیدة گروه نخستین این امت را بنا نهاده&amp;rlm;اند.&lt;br /&gt;
فکر نمی کنم کسی مخالف این واقعیت باشد که عقیده و باور گروه نخست این امت، عقیده ای پاک وصاف همچون آب دریاها و نیرومند و استوار همچون کوههای سر به فلک کشیده بوده است والله متعال به وسیله صاحبان این عقیده و باور، مسیر تاریخ بشریت را تغییر داد.&lt;br /&gt;
پس ما باید عقیده و باور خود به منبع های اصلی خود یعنی منابعی که نیاکان و سلف صالح از اهل بيت و صحابه و صالحان این امت به وسیله آنها سیراب شده و از چشمه&amp;rlm;های آن بهرمند شدند بازگردانیم.&lt;br /&gt;
قضیه بازگشت به قرآن و سنت مسئله&amp;rlm;ای است که امروزه گروههای زیادی با زبان وسخنرانی ومقالات ونوشته&amp;rlm;های خود ادعای آن را دارند اما در میدان عمل و کردار و در مجال استلال با آن مخالف بوده و آشکارا می بینیم که رأی و نظر انسان را بر نصوص قرآنی و احادیث نبوی ترجیح داده و مسیری جدا از مسیر حق و راهی غیراز راه ا سلام و قرآن را در معامله و داد و ستدهایشان در پیش گرفته اند.&lt;br /&gt;
به همین دلیل كتابخانۀ عقیده همیشه تلاش کرده که بر بازگشت به این دو مصدر یعنی قرآن و سنت صحیح پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم، به خصوص در زمینه های عقیده و شریعت بیشترتأکید نماید و شبهه&amp;rlm;های دشمنان اسلام را &amp;nbsp;براي شما عزيزان روشن نماید.&lt;br /&gt;
در این کتاب به مباحث فراوان دیگری نیز اشاره شده، مانند تعریف عقیده و جایگاه آن در شریعت و حکم انکار کردن آن، یا رد یکی از اصول آن، گاهی هم نويسنده به بیان شبهه&amp;rlm;ی کسانی پرداخته که هم در قدیم و هم در این عصر آن را مطرح نموده&amp;rlm;اند، مانند تکفیر مردم به صرف ارتکاب گناه.&lt;br /&gt;
در بحث ایمان به الله متعال نیز در اين كتاب دلایل کافی برای اثبات وجود الله، مناقشه و مجادله با بی باوران و رد نظریه&amp;rlm;های الحادی و آنهایی که می&amp;rlm;گویند دنیا به صورت تصادفی به وجود آمده، یا اینکه طبیعت آن را به وجود آورده، بیان شده است.&lt;br /&gt;
پس از آن به بیان راههای شناخت پروردگار خود یعنی آیات کونی وآیات قرآنی پرداخته شده و موضوع را با الهام ازآیات قرآن وسنت پاک پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم دنبال نموده و این مسایل لب و اساس و محور اصلی کتاب را تشکیل داده است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;نويسنده در پایان به بیان و توضیح مفهوم واقعی توحید و یگانگی الله متعال و چگونگی تحقق آن پرداخته و مفهوم لا اله الاّ الله و معنی و شرایط آن را بیان داشته، همچنانکه به بیان مسایلی که با توحید در تضاد هستند و آن را نقض می کنند (شرک) توجه نموده است.&lt;br /&gt;
اميدواریم الله متعال به نویسنده و مترجم و ناشر این کتاب گرانبها اجر عظیم در دنیا و آخرت نصیب نماید.&lt;br /&gt;
و آرزو می کنیم که الله متعال این کتاب را چراغ هدایتی بر فراز راه حق جویان قرار دهد.&lt;br /&gt;
شما می توانید با فشار بر روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده دریافت نمایید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نامۀ ارسالی یکی از دوستان به کتابخانه عقیده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/255</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;بسم الله الرحمن الرحیم&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;این نامه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt; از سوی یکی از دوستانی که به ما لطف و حسن ظن داشته، و از سایت کتابخانه عقیده استفاده کرده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;اند فرستاده شده. اداره سایت با تشکر از این برادر عزیز، و سایر دوستانی که با ما در مکاتبه هستند، نامه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی این عزیز محترم را که خودشان انتشارش را بلا مانع اعلام کرده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;اند بدلیل اشاره&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی بسیار زیرکانه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;یشان که نشان&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;دهنده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی فهم و درک عمیقشان به قضایای مذهبی است. و عقل این نعمت بزرگ الهی را بخوبی مورد استفاده قرار داده است، جلوی خوانندگان عزیز قرار می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;دهد. شاید در راستای بیداری ملت عزیز فارسی&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;زبانمان با ما بیش از پیش همگام و همصدا گردند.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;هدف تعریف و دست زدن و تشویق کردن و تبلیغات و هوار زدن برای سایت و اداره&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی آن نیست، هدف رساندن بانگ توحید به گوش همه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی فارسی&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;خوانان جهان، آنانی که رسول اکرم صلی الله هلیه وآله وسلم آنها را ستود و در حقشان گفت: اینان کسانیند که اگر حقیقت در آسمان باشد بسوی آن بال و پر می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;کشند.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;وما بدرستی باور داریم که بدون شک روزی آفتاب بر سرزمین فارس تابیدن خواهد گرفت که در آن بانگ توحید و یکتاپرستی کرانه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی آسمان را فرا گرفته است! و فرا رسیدن این روز بزرگ را بسیار نزدیک احساس می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;کنیم. و ایمان داریم که این دین بزرگ را نیازی به ما نیست. اگر ما در راهش جان دهیم به خود احترام گذاشته&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ایم و به جان خود بها داده، برای خود ارزش قائل شده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ایم. در غیر اینصورت خداوند سربازانی دیگر را برای خدمت به دین خود خواهد گماشت.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;سایت عقیده همه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی جوانان برومند و فهمیده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی سرزمین فارس، و همه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی فارسی زبانان و فارسی خوانان را برای سرباز شدن در راه دعوت به توحید&amp;nbsp;بسیج می&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;کند. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;دستان پرمهرتان را در دستان دلسوزانه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;ی ما بگذارید و همه با هم بر آوریم ندای : &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;الله اکبر!...هیچ معبود و خدا و یاوری نیست مگر الله یکتا.. و محمد فرستاده و رسول اوست...&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;متن نامه&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: red; font-size: 12pt&quot;&gt;ی برادر عزیزمان ناصر اسدی:&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;باسلام خدمت تمامی عزیزان و زحمت کشان سایت بسیار مفید عقیده.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;من هم یک شیعه و ایرانی هستم مثل اکثر هموطنانم اما نا آگاه و نا اطلاع از اکثر اتفافات دینی که رهبران ما با چند درجه اختلاف فاز با حق و حقیقت به ما تلقین کردند.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;نمونه از این نا آگاهی من می توانم به جرأت ثابت کنم در بین هم&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;‫&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;سنهای خود بنده ـ یعنی از متولدین سال 59 تا 70 ـ فقط با پرسش؛ و آن اینکه علی (ع) با عمر(ع) چه نصبتی دارند حتما 99 درصد به این سوال جوابی ندارند!!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;بنده اکثر کتابهای سایت عقیده را دانلود و مطالعه کردم و به سوالهایی که همیشه در ذهنم بود رسیدم و انشاالله با وجود سایت عقیده به تمامی سوالات دینی خود خواهم رسید.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;برادر عزیزمان که در نامه ای در مورد فیلتر شدن سایت عقیده یک نامه ای دندان شکن به آن دسته از افرادی که خود رهبران دینی مردم ابلاغ می کنند ولی در رساندن اطلاعات صحیح سوی تفره و یاوه گویی را درپیش می گیرند و حق گویان و حق نویسان را با قلبی خسیس و کینه توز و با حرف جنگ و خون از سر راه خود بر می دارند تا به اهداف شوم که نگه داشتن مردم در عمق نا اطلاعی است واز این کار خود بسیار سود می جویند! البته که سایت عقیده را فلیتر خواهند کردند.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;حرف دل برای گفتن زیاد است و وقت کم، همین بس و همین را باید بدانیم که آن که از منبر مبارک پیامبر اسلام بالا رود و یار و یاور پیامبر اسلام (ص) را لعن کند نه از اسلام خبر دارد نه از دین و نه از دنیا و نه آخرت بلکه دین فروش است با اطلاعات ناقص و ناصحیح مردم را گمراه خواهد کرد با وجود این افراد طبیعی است که دین اصیل محمد (ص) را به فراموشی خواهد رفت و یک دین دست ساز که آهن الات پرستی و به سرو صورت کوبیدن و گریبان دریدن است ترویج خواهد شد دینی که رهبر آن به منبر پیامبر احترامی نمی گذارد و بدون سلام&amp;nbsp;و صلوات بر آن بالا می رود طبیعی است که دینی دست ساز و آلوده به شرک و غیره است.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;&amp;nbsp;عجبا در این دیار بنیان گذار این دین که خدا شاهد و گواه تمامی سختیها مشقت هایی است که پیامبر اسلام (ص) برای ترویج آن کشیده است در روز وفاتش که آسمان و زمین ماتم می گیرد در بین مردم و حامی آن انگار که اتفاقی نیافته است&amp;nbsp;&amp;nbsp;و اصلا رسولی نبوده است اما به خاطر نوه پیامبر (ص) که درجه اجتهادی و دینی آن هزاران مرتبه پایین تر از رسول خدا است و اهدافش هم برای ترویج دین نبوده و صرفا یک مسئله سیاسی و قدرتی است چه ها که نمی کنند!! با این اوصاف برای اینان که با نوحه خوانی و مدیحه سرای جیب این ملت را خالی می کنند و خبری از اسلام قرآن ندارند فیلتر شدن سایت روشنگر و صد درصد اسلامی عقیده طبیعی خواهد بود. همان طور که قرآن کریم آنان را مریض و خسیس و کینه توز خوانده است و برادرمان هم با اشاره به آیه دهم سوره مبارکه بقره آنان را مریض و کینه توز توصیف کرده است خداوند عذابشان را شدید کند حق همیشه با حق گویان است موفق و پایدار باشید&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;تهران : ناصر اسدی&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; color: black; font-size: 12pt&quot;&gt;نمایش و ارسال این نامه در سایت و به خوانندگان سایت بلامانع است&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;

&lt;div dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: right; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>الگوی هدایت - تحلیل وقایع زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/251</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الگوی هدایت - تحلیل وقایع زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم&lt;br /&gt;
بررسی سیرت پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم برای مسلمانان، حائز اهمیت است؛ چراکه چندین هدف را تحقق می&amp;zwnj;بخشد و یکی از مهم&amp;zwnj;ترین آنها اقتدا به پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم است که این شناخت از طریق شخصیت، کارها، سخنان و تقریرات ایشان حاصل می&amp;zwnj;گردد. با بررسی سیرت پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم، مسلمانان نسبت به ایشان بیش از پیش احساس محبت می&amp;zwnj;کنند و این محبت، در وجودشان رشد می&amp;zwnj;نماید. همچنین با بررسی زندگی پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم با زندگی یاران آن حضرت که در کنار او جهاد نمودند نیز آشنا می&amp;zwnj;شود و این بررسی، او را به دوست داشتن آنان و حرکت در مسیر آنها و پیروی از راهشان فرا می&amp;zwnj;خواند. سیرت پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم، زندگی آن حضرت را با تمام جزئیات از ولادت تا وفات از جمله : کودکی، جوانی، زندگی، دعوت و جهاد و شکیباییها و پیروزیهایش بر دشمنان را برای مسلمانان، روشن می&amp;zwnj;نماید و این مسئله اثبات می&amp;zwnj;گردد که پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;علاوه بر مسئولیت خطیر رسالت، پدر، همسر، رهبر، نظامی، حاکم، سیاستمدار، مربی، دعوتگر و زاهد و قاضی نیز بوده است. بنابراین، مسلمانان تمامی خواسته&amp;zwnj;های خویش را در سیرت پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم می&amp;zwnj;یابند.&lt;br /&gt;
دعوتگر در سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم روشهای دعوت و مراحل آن را می&amp;zwnj;آموزد. با شیوه مناسب برای هر مرحله از مراحل دعوت، آشنا می&amp;zwnj;شود و از این راهکارها در چگونگی ارتباط با مردم و دعوت آنها به اسلام استفاده می&amp;zwnj;نماید و به کوشش بزرگی که رسول اکرم برای اعلای کلمه الله مبذول داشته است، پی می&amp;zwnj;برد و می&amp;zwnj;داند که در برابر مشکلات و موانع و دشواریها چگونه عمل کند و موضع درستی که در برابر سختیها و مشکلات باید اتخاذ شود، کدام است؟&lt;br /&gt;
مربی، در سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم درسهایی در مورد تربیت و چگونگی تأثیر گذاشتن بر مردم به طور عموم و بر صحابه به طور خاص می&amp;zwnj;یابد و به این موضوع پی می&amp;zwnj;برد که چگونه از آنها نسل تربیت یافته و بی&amp;zwnj;نظیری به وجود آورد و امتی ساخت که امر به معروف نهی از منکر می&amp;zwnj;کند و به خدا ایمان دارد و به وسیلة آنان دولتی تشکیل داد که عدالت را در شرق و غرب عالم، گسترش داد.&lt;br /&gt;
فرماندهان نظامی در سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم با نظمی دقیق و برنامه&amp;zwnj;ای هدفدار در فنون فرماندهی لشکرها و قبایل و ملتها و امتها آشنا می&amp;zwnj;شوند و نمونه&amp;zwnj;های روشنی در برنامه&amp;zwnj;ریزی و دقت در به کارگیری و اجرا نمودن طرحها می&amp;zwnj;یابند و به این موضوع پی می&amp;zwnj;برند که پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم برای تبلور مبادی عدالت و احیای قواعد شورا و نظام مشورتی میان لشکر و فرماندهان و حاکم و مردم، سعی و تلاش بی&amp;zwnj;وقفه می&amp;zwnj;نموده است.&lt;br /&gt;
سیاستمداران نیز از سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم نحوة رفتارش را با سرسخت&amp;zwnj;ترین دشمنان سیاسی&amp;zwnj;اش می&amp;zwnj;آموزند؛ دشمنانی مانند عبدالله بن ابی بن سلول که اظهار اسلام می&amp;zwnj;کرد و در درون خود، کفر و دشمنی با پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم را پنهان می&amp;zwnj;نمود و علیه او توطئه می&amp;zwnj;کرد و اقدام به شایعه پراکنیهایی می&amp;zwnj;کرد که موجب ناراحتی رسول اکرم می&amp;zwnj;گردید و هدفش این بود تا پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم را مستأصل سازد و مردم را از او گریزان و متنفر کند، اما پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم چگونه با او رفتار کرد و چگونه او را با کینه&amp;zwnj;هایش تحمل نمود تا اینکه سرانجام، حقیقت برای همه آشکار شد و مردم او را ترک گفتند. حتی نزدیک&amp;zwnj;ترین افرادش او را رها کردند و همه مطیع دستور و فرامین پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم گشتند.&lt;br /&gt;
علما نیز از سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم آنچه را که به آنان در فهمیدن و فهماندن کتاب خدا کمک می&amp;zwnj;نماید می&amp;zwnj;آموزند؛ زیرا عمل پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;تفسیر قرآن کریم است و در سیره، می&amp;zwnj;توان به اسباب نزول آیات پی برد بنابراین، آشنایی با زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;علما و دانشمندان را برای فهمیدن و فهماندن آیات قرآن و استدلال از آن و به سربردن با حوادث آن، یاری می&amp;zwnj;کند و آنها احکام شرعی و اصول سیاست اسلامی را از آن، استخراج می&amp;zwnj;نمایند و به معارف درستی در علوم مختلف اسلامی دست می&amp;zwnj;یابند و در پرتو سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم است که علما، ناسخ و منسوخ و دیگر علوم را درک می&amp;zwnj;نمایند و روح اسلام و اهداف والای آن را درمی&amp;zwnj;یابند. همچنین انسانهای متّقی و پرهیزگار با مفاهیم زهد و حقیقت و هدفش آشنا می&amp;zwnj;شوند.&lt;br /&gt;
سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم برای تاجران نیز الگو و نمونه است؛ چراکه تاجران، از سیره، مقاصد تجارت و قوانین و راههای آن را می&amp;zwnj;آموزند و آنهایی که گرفتار مشکلات هستند، بالاترین درجات صبر و پایداری را از سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم فرا می&amp;zwnj;گیرند و در نتیجه اراده&amp;zwnj;هایشان برای حرکت در راه دعوت به اسلام، تقویت می&amp;zwnj;گردد و اعتمادشان به خداوند عزوجل بیشتر می&amp;zwnj;شود و به طور حتم به این نکته پی می&amp;zwnj;برند که سرانجام، از آن پرهیزگاران است.&lt;br /&gt;
آخرالامر اینکه امت، از سیره پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم آداب والا و اخلاق پسندیده و عقاید سالم و عبادت درست و روح بلند و پاکیزگی قلب و محبت جهاد در راه خدا و شوق شهادت را می&amp;zwnj;آموزد. بدین جهت بود که علی بن الحسین فرمود: &amp;laquo;ما غزوه&amp;zwnj;های پیامبر را همانند سوره&amp;zwnj;های قرآن یاد می&amp;zwnj;گرفتیم&amp;raquo; و از محمد بن عبدالله شنیدم که به نقل از عمویم زهری می&amp;zwnj;گفت: در دانش غزوه&amp;zwnj;ها، دانش دنیا و آخرت نهفته است و اسماعیل بن محمد بن سعد بن ابی وقاص گفت: &amp;laquo;پدرم جنگهای پیامبر را به ما می&amp;zwnj;آموخت و آن را برای ما تکرار می&amp;zwnj;کرد&amp;raquo; و می&amp;zwnj;گفت: &amp;laquo;اینها شاهکار پدرانتان است، آنها را از یاد نبرید.&amp;raquo;&lt;br /&gt;
بررسی سیره و رهنمود&amp;zwnj;های پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم در تربیت امت و تشکیل حکومت، به علما و رهبران و فقها وحاکمان کمک می&amp;zwnj;کند تا با شناسایی عوامل پیشرفت و سقوط، راه قدرت یافتن اسلام و مسلمانان را دریابند و با شناخت کامل سیرت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم در تربیت افراد و پرورش انسانهای مؤمن و احیای جامعه و برپایی دولت، آشنا شوند و مسلمانان حرکت پیامبر اکرم &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم را در تمامی مراحل دعوت و توانایی او را در مواجه شدن با روشهای مشرکان دربارة مبارزه با دعوت، می&amp;zwnj;شناسند و برنامه&amp;zwnj;ریزی دقیق اورا در هجرت به حبشه و تلاش ایشان برای قانع کردن اهل طائف با دعوت و عرضه کردن اهداف خود در موسم حج بر قبایل و دعوت تدریجی آن حضرت از انصار، برای پذیرفتن اسلام و سپس هجرت مبارک ایشان به مدینه را مشاهده می&amp;zwnj;نمایند.&lt;br /&gt;
کتابخانۀ عقیده در این روزهای فرخنده که مصادف با میلاد با سعادت پیامبر بزرگوار اسلام صلی الله علیه وآله وسلم می باشد یکی از بهترین کتابهایی را که در مورد سیرت آنحضرت نوشته شده خدمت شما عزیزان معرفی می کند.&lt;br /&gt;
شما می توانید با فشار بر روی اسم کتاب آنرا از بخش سیرت و سنت نبوی دریافت نمایید.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/666/&quot;&gt;الگوی هدایت - تحلیل وقایع زندگی پیامبر اکرم صلی الله علیه وآله وسلم&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب گفتگوهای عقلانی با شیعیان اثنی عشری</title>
<link>http://qalamlib.com/news/250</link>
<description>&lt;p&gt;معرفی كتاب گفتگوهای عقلانی با شیعیان اثنی عشری&amp;nbsp;&amp;nbsp;- منابع شیعه در میزان نقد علمی&lt;br /&gt;
نخستین بار نام پرفسور احمد الغامدی استاد دانشگاه ام القری در مکه مکرمه با کتاب&amp;nbsp;&amp;nbsp;گفتگویی آرام با دکتر محمد حسینی قزوینی شیعه اثنا عشری&amp;nbsp;معروف گردید در این کتاب پرفسور احمد الغامدی چهره حقیقی قزوینی این رافضی دروغگو را برملا ساخت.&lt;br /&gt;
قزوینی مانند همجنسان خود با شعار دروغین وحدت و گفتگوی در پی اغفال و فریب مسلمانان جهان است که یکی از نمونه های آن برنامه های این حقه باز در شبکه سلام رافضی می باشد.&lt;br /&gt;
به هر حال گفتگو با قزوینی سبب شد که باب تحقیق و کنکاش در عقاید شیعه به روی پرفسور احمد الغامدی باز گردد و ایشان با تحقیقات خود در کتب رافضه به نتایج جالبی رسیدند و از همه جالبتر اینکه هر کسی که در مذهب شیعیان رافضی بیشتر تحقیق و مطالعه نموده بیشتر به حقیقت این فرقۀ باطل پی برده است.&lt;br /&gt;
ما همه بر این عقیده هستیم که تنها راه حل برای این امت با همه طوایف و فرقه&amp;rlm;هایش این است که به کتاب الله متعال یعنی قرآن کریم رجوع نمایند و قرآن را داور روایات نقل شده به دست خود قرار دهند و هرچه را موافق آن بود قبول نمایند و آنچه را مخالف بود نپذیرند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;سپس به سراغ سنت بروند و آن را مورد بررسی قرار دهند و با قواعد روایت، آن را مورد داوری قرار بدهند و آنچه را که بر اساس این قواعد صحیح بود بپذیرند و آنچه را مخالف بود ردّ نمایند. بدین طریق، می&amp;rlm;توانیم به حقیقت دست یابیم و در نتیجه آراء و دیدگاه&amp;lrm;ها به هم نزدیک شده و مفاهیم تصحیح می&amp;rlm;شوند، زیرا امت مبتلا به حیله و نیرنگ دشمنانی شده که خواهان تباه ساختن عقیده آن و متفرق ساختن آن- با جعل روایات کذب در کتاب&amp;lrm;ها و روایت&amp;rlm;های آن طوایف- هستند و بسیاری از پاکان و عاشقان دین از روی جهل و غفلت قربانی این دسیسه شده&amp;lrm;اند و این امید وجود دارد که چون بیدارشان کرد بیدار شوند.&lt;br /&gt;
شواهد این امر در کتب طوایف مخالف حق بسیار فراوان است. یکی از مهمترین این طوایف، طایفه شیعه دوازده امامی است. این حقیقت برای بسیاری از افراد این طایفه روشن شده و خود در مورد آن سخن گفته&amp;lrm;اند. برخی از این افراد که بیدار شده&amp;lrm;اند عقیده خود را تصحیح کرده&amp;lrm;اند و این امر را اعلان داشته&amp;lrm;اند- مثال&amp;rlm;هایی در این باره ذکر خواهد شد-، برخی دیگر این امر را مخفی داشته&amp;lrm;اند و این امر را برای علاقه&amp;rlm;مندان خود بیان کرده&amp;lrm;اند. برخی دیگر همچنان منتظر فرصت مناسب برای اعلان آن می&amp;rlm;باشند. برخی دیگر به عمد یا از روی خطا در تلاش برای تأویل حقایق هستند و هدف خود را بحث از حقیقت قرار نداده&amp;lrm;اند، بلکه هدفشان را این قرار داده&amp;lrm;اند که هر نقدی را که متوجه طایفه آنان می&amp;rlm;شود ردّ کنند و به همین دلیل از رؤیت حقیقت محروم شده&amp;lrm;اند.&lt;br /&gt;
به همین دلیل لازم است که آن شواهد جمع آوری شود و مورد بررسی قرار بگیرد تا دیگر افراد آن طایفه بیدار شوند و تا که شاید خداوند متعال حقیقت را برایشان آشکار سازد و به راه مستقیم برگردند و امت متحد شود.&lt;br /&gt;
اما چون جمع آوری همه آن شواهد- از کتابهای این طایفه- نیاز به تلاش زیادی دارد، زیرا نمی&amp;rlm;توان همه را در یک کتاب گردآورد و به کتاب&amp;rlm;های زیادی نیاز دارد که خواندن و مطالعه آنها به دلیل حجم زیاد حتی برای تمام شیعیان دوازده امامی مشکل است، به همین دلیل پرفسور احمد الغامدی همه این شواهد را در این بحث به صورت مختصر جمع&amp;rlm;آوری کرده&amp;lrm; است تا که شاید در بیان حقیقت کافی باشد.&lt;br /&gt;
در این کتاب پرفسور احمد الغامدی به بررسی شش جنبه از این شواهد اکتفا کرده است که عبارتند از:&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;احوال اشخاصی که شیعیان دوازده امامی اظهار می&amp;rlm;دارند که یاران و اصحاب ائمه و راویان مذهبشان هستند.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;راویان عقائد شیعه دوازده امامی که از آن اصحاب روایت کرده&amp;lrm;اند.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;احوال روایاتی که به ائمه معصوم از نگاه این طائفه منسوب شده است.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;تاثیر اختلاف روایات منسوب به ائمه این گروه، بر فتاوای علمایشان.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جایگاه علمای متقدم طائفه در نزد علمای متأخر آنان.&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;وضعیت منابع شیعی و میزان صلاحیت آنها برای اثبات عقیده و شریعت.&lt;br /&gt;
روش بحث به صورت خلاصه چنین است:&lt;br /&gt;
بیان امور سابق از خلال منابع شیعه دوازده امامی و تحلیل آنها و بیان نتایج مترتب بر آنها به یک روش گفتگویی.&lt;br /&gt;
این کتاب مشتمل بر بیست و یک مبحث است. در ذیل هر مبحث دو مطلب ذکر شده است: نخست: بیان یکی از قضایای بحث. دوم: تحلیل آن قضیه و بیان نتائج مترتب بر آنچه که تحت عنوان &amp;laquo;وقفات&amp;raquo; وارد شده است.&lt;br /&gt;
هر کدام از این بیست و یک مبحث به تنهائی برای بیدار کردن عقلای این مذهب- مشروط بر اینکه تفکر و تأمل داشته باشند- کفایت می&amp;rlm;کند.&lt;br /&gt;
همچنین امید این را داریم که این بحث عقل مخلصان این گروه را جهت تأمل و بازگشت برای رسیدن به حقیقت روشن سازد و تنها به تقلید بسنده نکنند، خصوصاً اینکه علمای این طایفه بر شیعیان واجب کرده&amp;lrm;اند که خود بحث نموده و تقلید نکنند.&lt;br /&gt;
كتابخانه عقیده با آرزوی وحدت و یکپارچگی امت اسلام این کتاب ارزشمند را خدمت برادران و خواهران گرامی تقدیم می کند، شما می توانید با فشار بر روی اسم کتاب در پایین این صفحه آنرا داونلود نمایید.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/802/&quot;&gt;گفتگوهای عقلانی با شیعیان اثنی عشری&amp;nbsp;&amp;nbsp;- منابع شیعه در میزان نقد علمی&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب زندگی سعادتمندان چاپ شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/249</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;کتاب زندگی سعادتمندان&amp;nbsp;چاپ شد&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
این کتاب گامی است در راستای وحدت امت اسلامی و زدودن اختلافاتی که به نام شیعه و سنی توسط دشمنان اسلام در بین امت اسلامی دامن زده می شود موضوع این کتاب جایگاه و مقام &amp;nbsp;اصحاب بزرگوار رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;است، آنانی که چشمانشان را با دیدار محبوب عزیزتر از جان خود محمّد مصطفی صلی الله علیه و آله وسلم سرمه زدند، و ارواحشان را با همنشینی خلیل مجتبی صفا و قلب&amp;zwnj;هایشان را با آن علم و دانش و تزکیه، پاکی بخشیدند. علم ودانشی که از چشمۀ گوارای علم آن سرور محبوب جوشیده است، آری اصحاب رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم روح و روان خویش را از آب حیات چشمۀ نبوت سیراب نموده و به ملکوت ترقی و تعالی یافتند.&lt;br /&gt;
این رساله با آیات روشن قرآن کریم و احادیث شریف نبوی و سخنان گهر بار اهل بیت رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم و موضع&amp;zwnj;گیری&amp;zwnj;های شگفت&amp;zwnj;آور که بر جایگاه عالی آن نسل فاضل، نسل تعلیم یافتۀ قرآن و شاگردان مکتب رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم دلالت می&amp;zwnj;کند مزین شده است.&lt;br /&gt;
جوانان مسلمان امروزه بیش از هر چیز نیاز مبرم و شدید به اطلاع و شناخت، نسبت به فضائل یاران پیامبر صلی الله علیه و آله وسلم که منبع کَرَم بودند و در اثر تربیت رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم به درجات و جایگاه عالی نائل گشتند، دارند، چنان مقام و منزلتی که مانند (قلۀ بلند و شامخ) نمونه و الگو در تاریخ بشری شده&amp;zwnj;اند، و امروز جوان مسلمان اگر به خوبی نتواند به چنین نسل نمونه و الگوی بی&amp;zwnj;نظیری اقتداء نماید معذور است، زیرا سیرت و اخبار آن برگزیدگان؛ با غبار تحریف و اغراض شخصی و افراط و تفریط، و سوء تأویل پوشیده شده، طوری که نسبت به ایشان چنان غل و غش و کینه&amp;zwnj; در سر می&amp;zwnj;پروراند که نعمت ایمان ایشان را انکار می&amp;zwnj;کند! در حالی که این یک واجب دینی است بر هر مؤمنی که در حد توان برای تصحیح تاریخ، یا اشتباهاتی که صدر اسلام را زیر سؤال می&amp;zwnj;برد تلاش کند، و این کار را از برترین عبادت&amp;zwnj;ها به حساب آورد، و آن&amp;zwnj;قدر در این راه سعی و تلاش شود تا جوانان مسلمان نمونه&amp;zwnj; و الگویی از بزرگان اسلام و نیاکان صالح و شایستۀ خویش را پیش روی داشته باشند، و با ایشان تجدید عهد و پیمان نماید، و راه و روش خویش را [با آینۀ شفاف ایشان] اصلاح نمایند.&lt;br /&gt;
امیدواریم که برادران و خواهران مسلمان با خواندن این کتاب بیشتر با اخلاق و سیرت اهل بیت و یاران رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;در قرآن کریم و سنت مطهر و اقوال علماء خاصتا ائمه اهل بیت رضی الله عنهم آشنا شوند.&lt;br /&gt;
به یاری الله متعال این کتاب به همت مراکز اسلامی در حرمین شریفین به زیور طبع آراسته گردید.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/870/&quot;&gt;برای داونلود کتاب زندگی سعادتمندان بر روی این جمله فشار دهید.&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب شاهراه اتحاد ( بررسی نصوص امامت ) چاپ شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/248</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب شاهراه اتحاد چاپ شد&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزیز&lt;br /&gt;
کتاب &amp;laquo;شاهراه اتحاد&amp;raquo; به سبب حساسیت شدید روحانیت شیعه نسبت به موضوع کتاب در زمان حیات استاد قلمداران رحمه الله به صورت تایپ شده تکثیر و مخفیانه منتشر شد. اما نه توسط استاد بلکه توسط دوستانی در تهران این امر را به عهده داشتند. این کتاب حاوی بررسی حوادث پس از رحلت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم و واقعه سقیفه بنی ساعده و موضوع خلافت بعد از پیامبر اسلام صلی الله علیه وآله وسلم و بحث جنجال بر انگیز امامت می باشد.&lt;br /&gt;
فرقه شیعه امامیه مسأله امامت را از اصول دین و مذهب و آن را منصوص از جانب الله متعال و رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم می داند و منكر آن را از دین دور و از سعادت مهجور و مخلّد در آتش جهنّم می شمارد، گرچه فرد ایمان به الله و رسول صلى الله علیه وآله وسلم داشته باشد و به تمام و ظایف دینی عمل كند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;مدرك و مستند شیعه در این گفتار و عقیده فقط اخبار و احادیثی است كه در كتبشان ذكر شده و مدّعی تواتر مضمون آنها می باشند و گرنه در كتاب الله از مسأله امامت ذكری صریح و خبری واضح نیست مگر به زور تأویل و تقدیر و حمل به خبر و این كار با قرآن كریم كاری نارواست، زیرا الله متعال قرآن را كتاب و نور مبین و روشن و بدون ابهام و مایه هدایت مردم و قابل درك و فهم و تدبّر خوانده و آیات كتابش را برای شناخت حقّ و باطل میزان و فرقان قرار داده و باید مسلمین اولاً آن را بفهمند تا حقّ و باطل را با آن بسنجند و حتی به دستور ائمه رضی الله عنهم مكلّف اند هر خبر موافق با قرآن را پذیرفته و خبر مخالف قرآن را طرد كنند، پس باید اگر به راستی تابع ائمه اطهارند اخبار را حمل به قرآن كنند، نه آنكه قرآن را تأویل كرده و حمل به خبر نمایند.&lt;br /&gt;
به هر حال ضروری است اخبار و احادیثی كه راجع به &amp;quot;امامت&amp;quot; و نص بر آن رسیده است، بررسی شود و تحقیق كاملی در آنها صورت گیرد، زیرا نمی توان در امری كه از اصول دین و موجب سعادت یا شقاوت اخروی است از پیشینیان تقلید كرد، خصوصاً كه در كتاب خدا كه فروع جزئیه بسیاری در آن بیان شده از این اصل مهم خبری نیست و با اینكه حق تعالی فرموده: &amp;quot;وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِینَ حَتَّى نَبْعَثَ رَسُولاً&amp;quot; یعنی: &amp;quot;ما تا زمانی كه پیامبری نفرستیم (كه دین را تعلیم كند، كسی را) عذاب نمی كنیم&amp;quot; (الاسراء/15) و باز فرموده: &amp;quot;حَتَّى یبَینَ لَهُمْ مَا یتَّقُونَ&amp;quot; یعنی: &amp;quot;تا برای ایشان آنچه را كه باید بپرهیزند بیان فرماید&amp;quot; (التوبه/15) چگونه به این اصل كه در قرآن نیامده، عقاب فرموده یا ثواب می دهد؟!&lt;br /&gt;
دانشمند ارجمند و استاد عالیقدر &amp;quot;حیدر علی قلمداران&amp;quot; رحمه الله در این كتاب نصوص امامت را كه سد راه وحدت بین مسلمانان شیعه و سنی قرار گرفته را مورد بحث و بررسی قرار داده است، انتظار ما از خوانندگان گرامی این است كه هدف مؤلف را كه ایجاد و حدت و اتفاق و همدلی میان مسلمین بوده و به همین جهت و قت خود را برای این تحقیق مصروف داشته و كتاب خود را &amp;quot;شاهراه اتحاد&amp;quot; نامیده اند، در نظر گرفته و به دیده انصاف و بیطرفی و بدون پیشداوری بدان بنگرند نه با بغض و تعصب و عناد، زیرا تعصب و لجاج مانع فهم حقائق است و مدعیان تشیع چون مدار افكار و عقاید خود را تعصب مذهبی قرار داده اند در بسیاری از امور و عقاید دانسته یا نادانسته حتی با ائمه خویش مخالفت می ورزند و چه بسـا بر خلاف رفتار و گفتار آن بزرگواران عمل می كنند كه از آن جمله است ایجاد تفرقه و انتقاد و بدگویی از سایر فرق اسلامی، این كار بر خلاف روش و سیرت امام المتقین حضرت علی رضی الله عنه است زیرا آن حضرت با خلفای راشدین مراوده داشت و به نماز جماعت وجمعه ایشان حاضر می شد و همواره ایشان را به لحاظ فكری كمك كرده و مشكلات ایشان را حل و با ایشان معامله برادری اسلامی می نمود وحتی فرزندان خود را به نام خلفاء می نامید و یكی از فرزندان وی &amp;quot;عمر بن علی&amp;quot; و دیگری &amp;quot;عثمان بن علی&amp;quot; و دیگری &amp;quot;ابو بكر بن علی&amp;quot; است و چنانكه در &amp;quot;الارشاد&amp;quot; شیخ مفید و سایر كتب حدیث و تواریخ ذكر شده دختر خود و فرزند حضرت فاطمه زهراء رضی الله عنها یعنی حضرت &amp;quot;أم كلثوم&amp;quot; را به عقد ازدواج حضرت عمر بن خطاب رضی الله عنه درآورد و او را به دامادی خویش پذیرفت و در محاصره خانه عثمان با دست خود به خانه وی آب می برد و دو فرزند عزیزش امام حسن و امام حسین ـ رضی الله عنهما ـ را به پاسداری از خانه وی گماشت و در كلمات خود از ایشان به خوبی یا دكرده و نسبت به ایشان بدگویی نمی كرد.&lt;br /&gt;
سخنی درباره مؤلف كتاب:&lt;br /&gt;
استاد حیدر علی قلمداران رحمه الله فرزند اسماعیل در سال 1292 خورشیدی در روستای دیزیجان در 55 کیلو متری جاده قم- اراک از توابع شهرستان قم در خانواده ای کشاورز و نسبتاً فقیر چشم به جهان گشود, در پنج سالگی مادرش را از دست داد, و به علت فقر وعاجز ماندن از پرداخت حتی دو قران پول مکتب خانه روستا از حضور در کلاس درس زن آخوند محروم بود, فقط پشت در می ایستاد و مخفیانه به درس پیرزن گوش می داد, باری بدلیل پاسخ دادن به همه ی پرسشهای پیرزن که بچه ها از آن عاجز مانده بودند اجازه یافت مجانی در کلاس شرکت کند.&lt;br /&gt;
به علت نداشتن قلم و کاغذ و شوق روز افزون خواندن و نوشتن از دوده ی حمام به جای مرکب و از کاغذهای اضافی ریخته به جای دفتر استفاده می کرد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;حیدر علی در سن پانزده سالگی پدرش را نیز از دست داد، حیدر علی در سن بیست و هفت سالگی ازدواج کرد و در سی سالگی به خدمت اداره ی فرهنگ قم در آمد از آن پس که دائره ی تحقیقات و مطالعات وی گسترش یافته و قلمش از مهارت خوبی بهره یافته بود در روزنامه های استوار و سرچشمه در قم و وظیفه, در تهران مقاله می نوشت مجله یغما نیز مقالات و اشعار زیبای استاد را چاپ می کرد وهمچنین مقالات فقهی و ارزشمندی در مجله ی وزین حکمت نیز نشر گردیده است.&lt;br /&gt;
جریان ترور و دیگر حوادث ناگوار زندگی استاد قلمداران&lt;br /&gt;
پس از انتشار مخفیانه کتاب شاهراه اتحاد (بررسی نصوص امامت) و کمی پیش از پیروزی انقلاب یکی از آیات عظام قم به نام شیخ مرتضی حائری فرزند آیت الله شیخ عبد الکریم حائری مؤسس حوزه ی علمیه ی قم بواسطه ی شخصی از آقای قلمداران خواست که به منزل ایشان برود فردای آن روز که آقای قلمداران به خانه آقای حائری رفته بود ایشان به استاد گفته بود: آیا کتاب نصوص امامت را شما نوشته اید؟ استاد پاسخ می دهد: بنده نمی گویم من ننوشته ام اما در کتاب که اسم بنده به چشم نمی خورد! آقای حائری گفتند: ممکن است شما را به سبب تألیف این کتاب به قتل برسانند! آقای قلمداران فرمود: چه سعادتی بالاتر از این که انسان به خاطر عقیده اش کشته شود سپس آقای حائری گفتند: اگر می توانید همه را جمع آوری نموده و در خاک دفن کنید یا بسوزانید! ایشان پاسخ داد: در اختیار بنده نیست, فرد دیگری چاپ کرده, شما همه را خریداری کنید و بسوزانید! از طرفی این همه کتاب کمونیستی و تبلیغ بهائیگری در این کشور چاپ و منتشر می شود چرا شما در باره ی آنها اقدامی نمی کنید؟!&lt;br /&gt;
پس از گذشت چند ماه از پیروزی انقلاب در تابستان 1358 خورشیدی شب بیستم رمضان سال 1399 هجری قمری که استاد قلمداران طبق عادت هر سال تابستان را در روستا می گذراند جوان مزدوری که از جانب کوردلان متعصب تحریک و مسلح شده بود نیمه شب وارد خانه ی استاد شد و او رادر حالت خواب ترور کرده و گریخت, لیکن علی رغم فاصله بسیار کم گلوله فقط پوست گردن ایشان را زخمی کرد و در کف اتاق فرو رفت.&lt;br /&gt;
طبق اظهاراتی که از خود استاد نقل شده روز قبل از حادثه جوانی از قم نزد او آمده بود و در مورد پاره ای عقاید و نظریات ایشان و نیز درباره ی کتاب سؤالاتی کرده بود! بدون شک نوشتن کتاب خمس و شاهراه اتحاد انگیزه ی قوی این ترور بوده است.&lt;br /&gt;
در هر صورت مشیت و تقدیر الهی مرگ استاد قلمداران را اقتضا نکرده بود!&lt;br /&gt;
دیگر واقعه ی تلخ زندگی استاد قلمداران زندانی کردن او در زندان ساحل قم بود ازخود استاد شنیده شده که می فرمود: &amp;laquo;روزی که من در اثر دو سکته ی مغزی پی در پی روی تخت خوابیده بودم دو نفر از طرف دادگاه انقلاب قم به منزل ما آمدند و بنده را به جرم واهی ضدیت با انقلاب اسلامی با مقداری از کتابهایم با خود بردند وحتی اجازه ندادند داروهای خود را بردارم این در شرایطی بود که بنده اصلا قادر به کنترل ادرارم نبودم و برای مواقع ضروری دستگاه مخصوص به همراه داشتم سپس مرا به زندان ساحل قم منتقل کردند و در حالی که فقط یک پتوی زیر انداز در سلول داشتم به علت شکسته بودن شیشه ی سلول تا صبح از سرما به دیوار می چسبیدم و شام هم به من نرسید زیرا سایر زندانیان چپاول کردند فقط یکی از زندانیان از سهم غذای خودش مقداری به من داد صبح هم اوضاع به همین منوال بود لذا مجبوراً نیت روزه کردم.&lt;br /&gt;
این بود معرفی کوتاهی از آثار استاد حیدر علی قلمداران مطالب بیشتر در مورد ایشان را در اینجا بخوانید.&lt;br /&gt;
در پایان الله سبحانه وتعالی را سپاسگذاریم که توفیق عنایت فرمود تا این کتاب ارزشمند به زیور طبع آراسته گردد.&lt;br /&gt;
دوستان عزیز می توانند برای دانلود كتاب به این صفحه مراجعه نمایند:&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/320/&quot;&gt;داونلود كتاب شاهراه اتحاد&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب &quot;دلیل و برهان در تبرئه ابوهریره از بهتان&quot; چاپ شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/247</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب دلیل و برهان در تبرئه ابوهریره از بهتان چاپ شد&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
دشمنان اسلام و سنت پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم ، خاصتاً منافقان در عصرما&amp;nbsp;&amp;nbsp;و در گذشته &amp;nbsp;زبان اعتراض و طعنه به ابوهریره رضی الله تعالی عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;گشوده&amp;zwnj;اند و می&amp;zwnj;کوشند تا مردم در مورد صداقت ابوهریره رضی الله تعالی عنه و صحت روایات او دچار تردید شوند. اما اینها اولین کسانی نیستند که به مخالفت و دشمنی با سنت و حدیث پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم برخاسته&amp;zwnj;&amp;zwnj;اند بلکه آنها در این راه از هواپرستان گذشته پیروی می&amp;zwnj;کنند، ولی خداوند با وجود توطئه و مکر دشمنان دین همواره سنت و حدیث را پیروز و سربلند نموده است. آنچه دشمنان معاصر زمزمه می&amp;zwnj;کنند با آنچه گذشتگان گفته&amp;zwnj;اند به هم نزدیک و دارای ریشة واحدی است اما یاوه&amp;zwnj;گویی&amp;zwnj;ها هر دو گروه فرق واضحی دارد و آن اینکه هواپرستان گذشته و منحرفان و ملحدان آن زمان دارای علم و درایت و آگاهی بود&amp;zwnj;ه&amp;zwnj;اند اما هواپرستان و منافقان معاصر نماد جهالت و جسارت هستند و از سخنانشان به وضوح پیداست که آنها سخنان دیگران را به زبان می&amp;zwnj;آورند و ادای آنها را درآورده و از آنها تقلید می&amp;zwnj;کنند ولی تقلید را خوب انجام نمی دهند، و خود را از اهل حق برتر می&amp;zwnj;دانند و به آنها توهین روا می&amp;zwnj;دارند و برای رسیدن به این هدف روش&amp;zwnj;های متعددی را در پیش گرفته&amp;zwnj;اند که بارزترین این روش&amp;zwnj;ها عبارتند از :&lt;br /&gt;
أ- متهم کردن بزرگترین ناقلان دین و سنت و حافظان حدیث به کفر! و ادعای اینکه تربیت&amp;zwnj;یافتگان مکتب محمدصلی الله علیه وآله وسلم کافر هستند، و روایات معتبرشان به صراحت این عقیده را بیان کرده است. علامة آنها تستری در کتابش &amp;laquo;احقاق الحق!!&amp;raquo; می&amp;zwnj;گوید : همان&amp;zwnj;گونه که موسی برای هدایت آمد و مردمان زیادی از بنی&amp;zwnj;اسرائیل را هدایت کرد و آنگاه در دوران حیات او همه مرتد شدند و کسی جز هارون بر ایمانش باقی نماند، همین گونه محمدصلی الله علیه وآله وسلم آمد و مردمان زیادی را هدایت کرد ولی بعد از وفات ایشان صلی الله علیه وآله وسلم همه به عقب برگشتند و مرتد شدند... .&lt;br /&gt;
هدف&amp;nbsp;این منافقان&amp;nbsp;دشمنی با اصحاب پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم است بنابراین بعد از ابوهریره رضی الله تعالی عنه نوبت طعنه&amp;zwnj;زدن به دیگر اصحاب پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و ناقلان سنت او به امت اسلامی می&amp;zwnj;رسد آنها بزرگترین ناقلان سنت و ائمه و حافظان آن را متهم کرده&amp;zwnj;اند که آنان کافر بوده&amp;zwnj;اند!! و طبق عقیده آنها تربیت&amp;zwnj;یافتگان مکتب محمد صلی الله علیه وآله وسلم کافرند، و روایات معتبر آنها این عقیده را به صراحت بیان کرده است.&lt;br /&gt;
و یکی دیگر از روش&amp;zwnj;های آنها این است که می&amp;zwnj;گویند : فراگرفتن حدیث پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم جز از طریق اهل بیت درست نیست، و منظور آنها از اهل بیت دوازده امام آنهاست&lt;br /&gt;
بنابراین یکی از آنها که به نام عبدالحسین شرف&amp;zwnj;الدین موسوی که هم&amp;zwnj;کیشانش او را آیت&amp;zwnj;الله العظمی!! می&amp;zwnj;گویند کتابی تألیف کرده و در آن به ابوهریره رضي الله عنه طعنه زده است و دروغ&amp;zwnj;ها و اعتراضاتی ذکر کرده تا اینگونه این صحابی بزرگوار را بدنام کند، بعد از آن از شکم این کتاب دو کتاب دیگر به نام&amp;zwnj;های &amp;laquo;ابوهریره شیخ المغیره&amp;raquo; تألیف محمد ابوریه کشیده&amp;zwnj;اند، و این مؤلف شیوه استادش را در پیش گرفته اما بیشتر از او راه انحراف را در پیش گرفته و از حقیقت فاصله گرفته است، و بعد از تألیف این کتاب یهودیان و شیعه بی&amp;zwnj;درنگ آن را خریدند و توزیع کردند و امروزه سایتهای رافضی و شاگردان و پیروان عبدالله بن سبای یهودی آنرا نوشخوار می کنند.&lt;br /&gt;
این منافقان در حقیقت دعوتگران به سوی تفرقه هستند که امت را به گروه&amp;zwnj;ها و دسته&amp;zwnj;ها تقسیم می&amp;zwnj;کنند و اینگونه اسلام لقمه&amp;zwnj;ای راحت برای هر دشمنی خواهد بود، بنابراین برخود لازم دیدیم تا به شبهات اینها و دروغ&amp;zwnj;پردازی&amp;zwnj;ها و یاوه&amp;zwnj;گویی&amp;zwnj;هایشان پاسخ دهیم، و وجه مشترک همه اینها را بیان کنم و با توکل به الله و به توفیق او حق را با دلیل و برهان ارائه دهم. خلاصه مطلب اینکه هدف آنها طعنه زدن به ابوهریره رضی الله تعالی عنه نیست بلکه این کارشان مقدمه&amp;zwnj;ای برای از بین بردن اسلام است و این فرومایگان از آنجا که می&amp;zwnj;خواهند این شریعت و آیین پاک را از میان بردارند و با آن مخالفت نمایند به حاملان و ناقلان آن که تنها راه و وسیله رسیدن ما به اسلام است طعنه می&amp;zwnj;زنند. آنان بهترین خلیفه را فحش و ناسزا می&amp;zwnj;گویند و در دل خود دشمنی با دین را پنهان می&amp;zwnj;نمایند و با این وسیله شیطانی زشت اسلام را هدف قرار داده&amp;zwnj;اند، آنان تنها در مورد ابوهریره رضی الله تعالی عنه چنین شیوه&amp;zwnj;ای را در پیش نگرفته&amp;zwnj;اند بلکه در برابر همه اصحاب پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم موضعی خصمانه گرفته&amp;zwnj;اند و همه را که در رأس آنها ابوبکر و عمر و عثمان رضی الله عنهم قرار دارند کافر می&amp;zwnj;شمارند و مورد مذمت قرار می&amp;zwnj;دهند. ابوهریره رضی الله تعالی عنه بر گردن مسلمین حق دارد که از او دفاع کنند چون دفاع از ابوهریره رضی الله تعالی عنه یعنی دفاع از سنت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و حمایت آن از طعنه باطل&amp;zwnj;گرایان و مفسدان.&lt;br /&gt;
امیدواریم کتابهایی که در کتابخانه عقیده در دفاع از این صحابی جلیل رضی الله تعالی عنه نشر شده پرده از اتهاماتی که به این صحابی بزرگوار زده شده بردارد و باور باطل دشمنان ابوهریره رضی الله تعالی عنه را درهم بشکند و حقیقت آنها و دروغشان را آشکار سازد،&lt;br /&gt;
ناگفته نماند که هواپرستان و بدعت&amp;zwnj;گذاران چیز تازه&amp;zwnj;ای نگفته&amp;zwnj;اند بلکه آنها کوشیده&amp;zwnj;اند تا طعنه&amp;zwnj;ها و اعتراضات نیاکانشان را زنده نمایند و آن را زرق و برقی نو داده و پیرایش کنند و مقداری به آن بیافزایند.&lt;br /&gt;
بنابراین با انگیزه خیرخواهی برای الله متعال و پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم و برای دین و ائمه مسلمین و عموم مردم و دفاع از حق و پاسخگویی به اتهامات باطل&amp;zwnj;گرایان و منافقان رافضی و دفاع از مؤمنان اقدام به &amp;nbsp;نشر کتابهایی در دفاع از این صحابی بزرگوار نمودیم که الحمدلله یکی از این کتابهای&amp;nbsp;ارزشمند به همت دوستداران واقعی اهل بیت و صحابه رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به زیور طبع آراسته گردید و برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار دادن بر روی اسم این کتاب در این صفحه آنرا داونلود و یا مطالعه نمایند.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/373/&quot;&gt;دليل و برهان در تبرئه ابوهريره از بهتان&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/375/&quot;&gt;مناقب صحابى جليل ابوهريره رضي الله عنه&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ خلفای راشدین در قلمرو نظم و نثر فارسی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/245</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تشیع صفوی مذهبی تنگ نظر و تکفیری و خونین بود که چون قارچ سمی در قرن دهم ایران زمین را بلعید، و کمر شکوه و عظمت ایران را از عرش ثریا به فرش خاک زد. و نام نامین ایران را از تاریخ جهان حذف نمود. و فارسی و ادبیات آنرا زنده بگور کرد. و در سایه فقر و تنگدستی مجبور شد با تقلب در همه چیز سعی کند نام و نشان دیگران را بر شانه‫ی خالی خود بچسپاند!..&lt;br /&gt;
حقد و کینه، مکر و دروغ، نیرنگ و تکفیر، دشنام و ناسزا گفتن از صفات و ویژگیهای این مذهب خرافاتی است.&lt;br /&gt;
اگر انسان در قلمرو نظم و نثر فارسی به کنکاش و جستجو بپردازد و از گنج&amp;lrm;های پر دُرّ و مروارید فرهنگ ایران زمین، گوهرهای فروزانی را برگزیند، و به مشتاقان ادب و هنر تقدیم نماید تعجب خواهید کرد که بسیاری از فرزانگان ادبیات فارسی از علمای نامور اهل سنت می باشند.&lt;br /&gt;
این گوهرهای تابان و گلها و شکوفه&amp;lrm;ها و ریاحین، نوشته&amp;lrm;ها و اشعاری هستند که در بوستان ادب و فرهنگ فارسی ایرانی، در دواوین شعرا، در تذکره&amp;lrm;ها، در تواریخ و در کتابها و آثار ادبی و عرفانی منظوم و منثور در بیان شخصیّت والای خلفای راشدین رضی الله عنهم نوشته یا سروده شده&amp;lrm;اند.&lt;br /&gt;
عظمت کار در حدّی است که هرگاه شاعر یا نویسنده&amp;zwnj;ای خواسته است که ممدوحش را بستاید و یا او را به صفات نیکو ترغیب کند، او را به صدق ابوبکر، عدل عُمَر، حلم و شرم عثمان، علم و پرهیزگاری علیس ستوده است....&lt;br /&gt;
کتابخانه عقیده تصمیم گرفت که یکی از کتابهای جالبی که به نام خلفای راشدین در قلمرو نظم و نثر فارسی نشر شده را خدمت برادران و خواهران مسلمان تقدیم نماید که امیدواریم مورد استفاده شما عزیزان قرار گیرد.&lt;br /&gt;
شما می توانید با فشار بر روی اسم کتاب در پایین این جمله آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایید&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1027/&quot;&gt;کتابِ خلفای راشدین در قلمرو نظم و نثر فارسی&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ حکایت مناظره ای تاریخی - تحریف قرآن نزد شیعه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/244</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هیچ شکی نیست که قرآن کتاب الله متعال است و معجزه جاودان رسالت و نبوت پیامبر بزرگوارمان حضرت محمد مصطفی صلی الله علیه و آله وسلم می باشد و الله متعال آن را برای هدایت و راهنمائی بشر نازل فرمود و قرآن&amp;nbsp;&amp;nbsp;برنامه بدون بدیل و هدایتگر مردم به صلاح امور دین و دنیای آنهاست كه آنان را از تاریكی و ظلمات به نور و روشنی تا روز قیامت رهنمون شده و آنان را به راه راست هدایت می نماید.&lt;br /&gt;
به اعتقاد همه مسلمانان&amp;nbsp;&amp;nbsp;قرآن با نقل متواتر، بطور نوشته و شفاهی نسل از نسل&amp;nbsp;&amp;nbsp;بدون هیچ گونه تغییر و تبدیلی به ما رسیده است&amp;nbsp;&amp;nbsp;و حفاظت از این کتاب عظیم را خود پروردگار جهانیان بر عهده گرفته است چنانچه می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;﴿إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّکْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ﴾.&amp;nbsp;یعنی: &amp;laquo;ما قرآن را نازل کردیم و همانا ما نگهدار آنیم&amp;raquo;..&lt;br /&gt;
والله متعال می&amp;zwnj;فرماید:.﴿لاَ یَأْتِیهِ الْبَاطِلُ مِن بَیْنِ یَدَیْهِ وَلاَ مِنْ خَلْفِهِ﴾.یعنی: &amp;laquo;هیچ گونه باطلی، نه از پیش رو و نه از پشت سر، به آن راه نمی&amp;zwnj;یابد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و به اعتقاد همه علمای اسلام هر کس کوچکترین شکی در کلام الله بودن آیه های قرآنی داشته باشدو یا یک لفظ از قرآن را انکار نماید یا بگوید آیه ای به قرآن افزوده شده است و یا چیزی از آن کم شده است و یا الفاظی تغییر داده شده اند&amp;nbsp;&amp;nbsp;از دائره اسلام خارج شده و کافر می گردد؛ چنانچه علامه ابن حزم در کتاب محلی می نویسند:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;و ان القرآن الذی فی المصاحف بایدی المسلمین شرقا و غربا فما بین ذلک من اول القرآن الی آخر المعوذتین کلام الله عزوجل و وحیه انزله علی قلب نبیه محمد صلی الله علیه و سلم من کفر بحرف منه فهو کافر&lt;br /&gt;
ترجمه: بی شک قرآنی که در دست همه مسلمانان جهان قرار دارد از اول تا آخر معوذتین کلام خداوندی و وحی الهی است که بر قلب پیامبرش محمد صلی الله علیه و سلم نازل فرموده است و هر کس یک حرف از آن را انکار نماید کافر می شود.&lt;br /&gt;
قاضی عیاض از ابو عثمان حداد نقل می&amp;zwnj;کند که او فرموده است:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;تمام کسانی که پیروان توحید هستند بر این اتفاق دارند که انکار یک حرف از قرآن کفر می&amp;zwnj;باشد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
ابن قدامه می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
اگر شخصی سوره&amp;zwnj;ای از قرآن یا آیه&amp;zwnj;ای یا کلمه&amp;zwnj;ای و یا حرفی از آن را انکار کند، در بین مسلمانان اختلافی&amp;nbsp;&amp;nbsp;وجود ندارد بر اینکه او کافر می&amp;zwnj;باشد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
بغدادی می&amp;zwnj;فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;اهل سنت تکفیر نموده آن گروه از شیعه را که چنین می&amp;zwnj;پندارند که امروزه قرآن و سنت قابل حجیت نیست بخاطر اینکه - طبق گفتار آنها- صحابه بعضی از قرآن را تغییر داده و برخی دیگر را تحریف نموده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
این قول اجماعی همه علماء و بزرگان اسلام در مورد قرآن می باشد که هر کس یک لفظ از قرآن را انکار کند و یا اعتقاد به تحریف و تغییر در قرآن داشته باشد کافر و از دائره اسلام خارج می باشد.&lt;br /&gt;
اما عده اى از فرقه شیعه که خود را مسلمان می نامد به عقیده باطل تحریف قرآن معتقدند.&lt;br /&gt;
یکی از بزرگترین دلائلی که علمای جهان اسلام &amp;nbsp;این فرقه را از دائره اسلام خارج می دانند عقیده باطل این فرقه نسبت به کتاب عظیم الشان قرآن است، شیعیان&amp;nbsp;&amp;nbsp;طبق اظهارات&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتابهای معتبر و اقوال آخوندهای بزرگ این فرقه اعتقاد دارند قرآن عظیم&amp;nbsp;&amp;nbsp;مورد تحریف قرار گرفته است، یعنی آیه هائی از قرآن حذف شده است و آیه هائی به قرآن افزوده شده است و علمای شیعه تحریف قرآن را نه به عنوان روایت بلکه به عنوان یک عقیده مسلم و قطعی در کتابهایشان بیان کرده اند.&lt;br /&gt;
اما همه می گویند شیعیان همین قرآن را می خوانند و همین قرآن را قبول دارند و حتی مسابقات قرآنی برگزار می کنند و غیره؟&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;در پاسخ آنها می گویم برای شناخت هر فرقه باید به کتب آن فرقه مراجعه نمود و دین و مذهب یک گروه و فرقه از مردم شناخته نمی شود بلکه باید به کتابهای آن مذهب مراجعه نمود، مثلا اگر کسی بخواهد در مورد مسیحیت و یا یهودیت قضاوت کند باید به کتب مسیحیان و یهودیان مراجعه نماید و نمی توان برای قضاوت در مورد یک دین و مذهب و یا حتی یک گروه با توجه به نظر و افکار افراد گروه و یا مذهب قضاوت نمود و الان ما هم اگر می خواهیم فرقه شیعه و عقائدش را بدانیم باید به کتابهای شیعه مراجعه کنیم زیرا آخوندهای شیعه مانند یهودیان بسیاری از حقائق مذهب خود را از عوام مخفی و پنهان نموده و طبق عقیده ای دیگر بنام تقیه تا ظهور مهدی به این نفاق ادامه خواهند داد، الان ما نگاهی به کتابهای شیعه می اندازیم تا ببینیم کتابهای شیعه در مورد تحریف قرآن چه می گویند.&lt;br /&gt;
گزارش تحریف شدن قرآن در احادیث شیعه آنقدر زیاد و چشمگیر است که علمای شیعه&amp;nbsp;&amp;nbsp;معتقدند از ارکان تشیع باور به تحریف قرآن است و این سخن مخالفان شیعه نیست بلکه&amp;nbsp;&amp;nbsp;چنانچه خواهد آمد بزرگترین علمای تاریخ تشیع چنین اظهار نظر کرده اند.&lt;br /&gt;
چنانچه ابو الحسن عاملی می&amp;zwnj;گوید: نزد من &amp;laquo;تحریف قرآن و تغییرش&amp;raquo; از ضروریات مذهب شیعه می باشد....&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزیز می توانند برای اطلاع بیشتر از این عقیده منحرف، كتابِ حکایت مناظره ای تاریخی - تحریف قرآن نزد شیعه را كه جدیدا به سایت كتابخانه عقیده اضافه شده است با فشار بر روی اسم کتاب در پایین این صفحه داونلود نمایند.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1001/&quot;&gt;&amp;nbsp;كتابِ حکایت مناظره ای تاریخی - تحریف قرآن نزد شیعه&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتاب به روشنی آفتاب</title>
<link>http://qalamlib.com/news/243</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در چند سال اخیر علمای اهل تشیع پشت پا بر همه قواعد زده و واضحات تاریخ اسلام را منکر میشوند چنانکه به وقت مباحثه بارها دیده ایم، یار غار بودن حضرت ابوبکر صدیق رضی الله عنه &amp;nbsp;و ازدواج سیدنا عثمان رضی الله عنه با دو دختر حضرت رسول صلی الله علیه وآله وسلم را منکر میشوند و جدیداً کارشان بالا گرفته تا جایی که ازدواج حضرت عمر رضی الله عنه با ام کلثوم رضی الله عنها ، دختر و عزیزه حضرت علی رضی الله عنه را نیزمنکر میشوند! نه تنها این ازدواج را، بلکه وجود ام کلثوم رضی الله عنها را انکار میکنند!&lt;br /&gt;
این دکاندارن مغرض چون دکانهای خود را در معرض خطر و خود را نزدیک به ور شکستگی دیدند مصمم شده تا به هر نحوی این ازدواج را مردود اعلام کرده تا به این ترفند سائلان و حقیقت جویان را دست به سر کرده و چند صباحی بر عمر ولایت فقیهشان (بخوانید قبیحشان) بیافزایند.&lt;br /&gt;
برای نابود کردن حق حتی حاضرند حضرت علی رضی الله عنه را به بدترین صفات موصوف کنند ولی حاضر به بستن دکانهای خود نیستند! حضرت علی رضی الله عنه را به دیوثی! به بی عرضه گی، به ترسویی و دهها صفت زشت و ناپسند، به صورت خواسته و ناخواسته متهم کرده اند تا شاید بدینوسیله چند صباحی بر عمر دولت خود بیافزایند!!&lt;br /&gt;
البته این را نیز بدانید: این انکار چیز عجیبی نیست که از این عالم نماها سر زده! بلکه آنها در رد حقایق استادند و هر روز چیز جدیدی را کشف میکنند که علمای 1000 سال پیش حتی به ذهن آنها خطور نمیکرده و اصولاً جرات چنین هذیان گویی ها را نداشته اند. چون میدانستند زیر رگبار مشت و لگد&amp;quot; علم تاریخ&amp;quot; دوام نخواهند آورد و مضحکه همه خواهند گردید!&lt;br /&gt;
روافض علیهم لعنت الله اصل را بر کافر بودن حضرت عمر رضی الله عنه (زبانشان لال)&amp;nbsp;&amp;nbsp;گذاشته و به وسیله همین فکر تمام شبهات خنده دار و بعضاً شرم آور خود را بنا نهاده اند. قصد تالیف این کتاب نیز جواب دادن به شبهات آنهاست.&lt;br /&gt;
لازم به ذکر است که متن شبهه از دو مقاله سایت ولیعصر (سایت قزوینی رافضی) گرفته شده که یکی مختصر و دومی مفصل است! و نویسنده به دلیل طولانی بودنشان در هر بحثی فقط اصل شبهه را نقل میکند تا خواننده بهتر بفهمد و باعث گنگ بودن موضوع نشود.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزيز مي توانند با فشار بر روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/1000/&quot;&gt;&amp;nbsp;به روشنی آفتاب - ازدواج امیرالمومنین عمر با ام کلثوم رضی الله عنهما&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب تئوری امامت در ترازوی نقد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/242</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نویسنده محترم در این&amp;nbsp;کتاب می&amp;zwnj;کوشد تا نشان دهد که تئوری امامت &amp;ndash; آنچنانکه در بین اهل تشیع رایج است &amp;ndash; در ترازوی نقد وزنی ندارد و نیازمند به تجدید نظر و بازسازی تئوریک است.&lt;br /&gt;
برای اینکه این کتاب را بهتر بشناسید لازم است که اندکی دربارۀ مؤلف صحبت نماییم...&lt;br /&gt;
مؤلف&amp;nbsp;&amp;nbsp;این کتاب آقای استاد &amp;laquo;حجت الله نیكوئی&amp;raquo; اهل قم و از استادان معاصر به شمار میروند. اما معلومات مفصلی در مورد وی در دسترس نمیباشد.&lt;br /&gt;
وی در شهر قم بدنیا آمد و بعد از اتمام دیپلوم در همان شهر، وارد دانشكدۀ زبان انگلیس (قسمت ترجمه) در دانشگاه پیام نور شد، و در آنجا ادامۀ تحصیل داد و بعداً بعنوان كارمند در &amp;laquo;سازمان تبلیغات اسلامی&amp;raquo; مشغول به كار شد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;استاد نیكوئی توجه زیادی به مطالعۀ كتاب های دینی و بحث دربارۀ حقایق دین، در متن كتابهای قدیم و جدید داشت، و میل شدید به نقد و بررسی عقاید اساسی دین داشت و هیچ عقیده&amp;zwnj;ای را نمی&amp;zwnj;پذیرفت جز اینكه با دلایل قاطع وبراهین محكم ثابت شده باشد.&lt;br /&gt;
اقامت ایشان در قم و نزدیكی او به حوزۀ علمیه و كتابخانه های متعدد و بسیار غنی آن باعث شده كه مطالعات زیادی نه فقط از كتب شیعه بلكه از كتابهای اهل سنت و سایر فرق و مذاهبی اسلامی داشته باشد. و همچنین عمل وی در سازمان تبلیغات اسلامی باعث گسترش معلومات ایشان ومطالعۀ آراء مختلف در همۀ جهات شد.&lt;br /&gt;
آقای &amp;laquo;نیكوئی&amp;raquo; نزد آیت الله شیخ نعمت الله صالحی نجف آبادی [صاحب كتاب شهید جاوید] رفت و آمد میكرد و از روح نقادی آن شیخ بزرگوار استفاده هایی كرد، و همچنین كتابهای دكتر عبد الكریم سروش را مطالعه نمود و تحت تاثیر افكار آن قرار گرفت بویژه كتاب &amp;laquo;قبض وبسط تئوریك شریعت&amp;raquo; است.&lt;br /&gt;
كما اینكه از بعضی كلمات &amp;laquo;نیكوئی&amp;raquo; اینچنین برمیآید كه ایشان كتابهای استاد مرحوم حیدر علی قلمداران را نیز مطالعه كرده بویژه كتاب &amp;laquo;شاهراه اتحاد یا بررسی نصوص امامت&amp;raquo; و گفته های قلمداران را خیلی پسندید.&lt;br /&gt;
در حدود سن سی سالگی آقای &amp;laquo;نیكوئی&amp;raquo; كتابی تالیف كرد به اسم &amp;laquo;تئوری امامت در ترازوی نقد&amp;raquo; كه در آن با كمال جرأت و صراحت تئوری امامت آنچنانکه در بین شیعۀ امامیة رایج است در ترازوی نقد گذاشت و ثابت كرد كه این نظریه وزنی ندارد و نیازمند به تجدید نظر و بازسازی تئوریک است.&lt;br /&gt;
البته انتشار این كتاب (كه در حدود پانزده یا بیست سال پیش صورت گرفت) سر و صدایی در محافل دینی براه انداخت، و تعدادی از علمای بزرگ شیعه به مخالفت این كتاب پرداختند، و مؤلف آن را دعوت به مناظره نمودند.&lt;br /&gt;
در این راستا مؤلف (نیكوئی) با شیخ فاضلی بنام &amp;laquo;علی شیروانی&amp;raquo; كه از شاگردان ممتاز آیت الله محمد تقی مصباح یزدی مهمترین استاد ومدافع تشیع سنتی در حوزه است، مناظرۀ حضوری و چند جلسه داشته، كه بدون نتیجه متوقف شد، سپس با آقایی به نام شیخ &amp;laquo;حسن رحیم پور اصغری&amp;raquo; مناظرات و مباحثات غیر مستقیم داشته كه آنهم بدون نتیجه به پایان رسید.&lt;br /&gt;
در این مدت البته آقای نیكوئی به خاطر عقاید مخالف شیعۀ او، از كارش اخراج شد و بعداً هم به زندان رفت، و از زندان با تعهد كتبی و اقرار به اینكه او اشتباه كرده و تمام ادلۀ راستین شیعه را خوب مطالعه نكرده آزاد شد.&lt;br /&gt;
بعد از آزادی، استاد &amp;laquo;نیكوئی&amp;raquo; از صحنه های علمی متواری و به زندگی عادی مشغول شد.&lt;br /&gt;
اینک&amp;nbsp;کتابخانۀ عقیده یکی از آثار گرانبهای ایشان را تقدیم حقجویان می کند باشد که غافلان به خود آیند و راه حق را از راه باطل بشناسند.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/975/&quot;&gt;&amp;nbsp;کتاب تئوری امامت در ترازوی نقد&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>شهداى گمنام کربلا</title>
<link>http://qalamlib.com/news/241</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شهداى گمنام کربلا&lt;br /&gt;
بدون شک واقعه کربلا یکی از وقایع دلخراشی است که در تاریخ اسلام به ثبت رسیده است. در این واقعه بسیاری از فرزندان، نزدیکان و یاران حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه به شهادت رسیدند. ما در این واقعه نامهای بسیاری چون علی اصغر، عباس، جعفر و غیره را در رسانه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ها، کتاب&amp;zwnj;ها و غیره بارها شنیده&amp;zwnj;ایم که با آب و تاب برای آنها سوگواری شده و حتی کودکان هم با این نامها آشنایی کامل پیدا کرده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
جالب است بدانید در میان این نامها، نامهایی همچون ابوبکر، عمر و عثمان نیز دیده می&amp;zwnj;شود که از نزدیکترین افراد به حضرت امام حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه بوده&amp;zwnj;اند. بطور مثال حضرت حسین برادرانی به نامهای ابوبکر، عمر و عثمان داشته&amp;zwnj;اند وحتی فرزندی به نام ابوبکر داشته که همه آنان در واقعه کربلا در کنار حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه و در کنار برادران دیگرشان به همان دلیلی که آنان به خون غلتیدند، به شهادت رسیدند اما امروزه هیچ نامی از آنها برده نمی&amp;zwnj;شود.&lt;br /&gt;
حال سؤال این است که اگر حضرت علی&amp;nbsp;&amp;nbsp;و حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهما با حضرات ابوبکر، عمر، و عثمان رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهم (نعوذ بالله) دشمنی داشته&amp;zwnj;اند چرا این نامها را بر فرزندان خود گذاشته&amp;zwnj;اند؟ کدام عقل سلیم حاضر است باور کند که حضرت عمر رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه حضرت فاطمه را به شهادت می&amp;zwnj;رساند و حضرت علی نام عمر را بر فرزندش می&amp;zwnj;گذارد؟ چرا هیچ&amp;zwnj;گاه نامی از این شهدا در عزاداریها برده نمی&amp;zwnj;شود؟ این شهدا به کدامین گناه گمنام مانده&amp;zwnj;اند؟&lt;br /&gt;
و هزاران چرای دیگر که هیچ&amp;zwnj;گاه برای آن جواب قانع کننده دیگری نخواهید یافت؛ مگر اینکه بپذیریم که صحابه هیچ&amp;zwnj;گونه دشمنی با هم نداشته&amp;zwnj;اند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;اما برخی از انسانهای بعد از آنان، بدون توجه به اعلام رضایت خالق یکتا از صحابه، به آنان افترا بسته و به خود جرأت توهین به برگزیدگان الهی را می&amp;zwnj;دهند.&lt;br /&gt;
در ادامه به ذکر برخی از نزدیکان حضرت حسین رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه که در واقعه کربلا به شهادت رسیدند می&amp;zwnj;&amp;zwnj;پردازیم:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;برادران حضرت حسين رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه&lt;br /&gt;
1-&amp;nbsp;عباس بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب، ابوالفضل (هنگام شهادت 34 سال داشتند)&lt;br /&gt;
۲-ابوبکر بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب (مادرشان ليلی بنت مسعود بن خالد ربعی بود)&lt;br /&gt;
3-عمر بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب (مادرشان صهباء بنت ربيعه بود)&lt;br /&gt;
4-عثمان بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
5-&amp;nbsp;محمد بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب (محمد اصغر)&lt;br /&gt;
6-عبدالله بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب (هنگام شهادت 25 سال داشتند)&lt;br /&gt;
7-&amp;nbsp;جعفر بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب (هنگام شهادت 19 سال داشتند)&lt;br /&gt;
فرزندان حضرت حسين رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه&lt;br /&gt;
1-&amp;nbsp;علی بن الحسين (علی اکبر)&lt;br /&gt;
2-ابوبکر بن الحسين&lt;br /&gt;
3-عبدالله بن الحسين (هنگام شهادت 25 سال داشتند)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اهل بيت ديگر حضرت حسين رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنه&lt;br /&gt;
1-ابوبکر بن الحسن بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
2-&amp;nbsp;عبدالله بن الحسن بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
3-قاسم بن الحسن بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
4-عون بن عبدالله بن جعفر بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
5-محمد بن عبدالله بن جعفر بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
6-جعفر بن عقيل بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
7-عبدالرحمن بن عقيل بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
8-عقيل بن ابی&amp;zwnj;طالب&lt;br /&gt;
9-مسلم بن عقيل (در کوفه به شهادت رسيدند)&lt;br /&gt;
10-عبدالله بن مسلم بن عقيل&lt;br /&gt;
11-محمد بن ابی سعيد بن عقيل&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;الله متعال حسين بن علي و همراهان قهرمانش را كه در راه اسلام از جان گذشتند رحمت کند، درود سلام&amp;nbsp;&amp;nbsp;الله بر آنان باد.&lt;br /&gt;
برای اطلاع بیشتر از رابط صحابه و اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم کتاب&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتاب دوستی و خویشاوندی میان اهل بیت و صحابه&amp;nbsp;&amp;nbsp;را مطالعه نمایید.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/634/&quot;&gt;دریافت نسخه پی دی اف با کیفیت بالا و آماده چاپ&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-----------------------------------&lt;br /&gt;
منابع و مراجع:&lt;br /&gt;
1-کشف الغمه، للإربلی 2/67.&lt;br /&gt;
2-أعلام الوری، للطبرسی 203 ، 255.&lt;br /&gt;
3-الإرشاد، للمفيد 186، 196.&lt;br /&gt;
4-الفصول المهمه، لإبن الصباغ، 126 ، 152.&lt;br /&gt;
5-تاريخ اليعقوبی، 2/213،288.&lt;br /&gt;
6-التنبيه والإشراف، 263.&lt;br /&gt;
7-وحلاء العيون، للمجلسی، 582.&lt;br /&gt;
8-مقاتل الطالبين، لإبی الفرج الإصفهانی، 83، 86، 87، 188.&lt;br /&gt;
9-الاختصاص للمفيد، 78&lt;br /&gt;
10-&amp;nbsp;&amp;nbsp;البدايه والنهايه، 8/210 - 203.&lt;br /&gt;
11-&amp;nbsp;&amp;nbsp;جمهرة الانساب العرب، 33.&lt;br /&gt;
12-&amp;nbsp;&amp;nbsp;الفتوح، 5/202.&lt;br /&gt;
13-&amp;nbsp;&amp;nbsp;الحسن والحسين سيدا شباب اهل الجنة، محمد رضا&lt;br /&gt;
14-شهيد اعظم، ابوالکلام آزاد&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>بدعت هايي كه در عاشورا صورت مي گيرد و بايد از آن دوري جست</title>
<link>http://qalamlib.com/news/239</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بدعت هایی كه در عاشورا صورت می گیرد و باید از آن دوری جست&lt;br /&gt;
در این روز با عظمت و مبارك مردم بدعت هایی را اختراع نموده و مرتكب اعمال زشت و ناپسند می گشتند، شیخ الاسلام می نویسد: شیطان بعد از شهادت حضرت حسین رضی الله عنه توانست دو بدعت طی آن ایجاد نماید: یكی بدعت ماتم و عزاداری و زدن به سر و صورت، و گریه و فغان و تشنگی كشیدن و مداحی و نوحه سرایی كه طی آن بزرگان صدر اسلام مورد لعن و طعن قرار می گیرند، حتی كسانیكه در جرم شهادت حضرت حسین رضی الله عنه دست نداشتند مورد لعن و دشنام قرار می گیرند و قصه ها وحكایتهای كاذب و دروغینی را ساخته اند، این اعمال باعث گردید تا در میان مسلمانان اختلاف و تفرقه ایجاد گردد. ماتم گرفتن و عزاداری كردن و گریه و فغان بر مردگان باتفاق همة مسلمانان جایز نیست. و اینكه بر غم ها و مصیبتهای گذشته، ناله و فغان صورت گیرد از گناهان بزرگ بشمار می رود كه خداوند و پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم از آن منع نموده اند، همچنانكه بدعت شادی و سرور در روز عاشورا درست نیست و پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و خلفای بعد از ایشان اینكار را سنت نگذاشته اند، پس اینروز نه روز شادی و سرور است و نه روز غم واندوه. منهاج سنت 2/322، مجموع فتاوی25/310 وكشاف القناع 2/396&lt;br /&gt;
از دیگر بدعت ها در این روز پختن حبوبات و توزیع آن بر فقرا و مساكین است. و ادعا دارند كه اینكار ثواب زیادی دارد، ولی تشخیص كارهایی كه ثواب دارد دلیل قاطع&amp;nbsp;&amp;nbsp;كه از پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم ثابت شده باشد می خواهد، لیكن دلیلی وجود ندارد پس این كار بدعت و گمراهی می باشد. دین خالص از سبكی 8/417&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;و از دیگر بدعت های اختراع شده در این روز، پوشیدن لباس جدید، و خرج و خوراك خیلی خوب و خریدن ضروریات منزل و سرمه كشیدن و حنا كردن و غسل نمودن، دید و بازدیدها و زیارت مساجد و قبرستانها و آرامگاه ها، و دیگر بدعتهایی كه نه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و نه خلفای راشدین و نه علمای بزرگ اسلام مانند امامان چهار مذهب اهل سنت و نه اوزاعی و ثوری و&amp;nbsp;&amp;nbsp;اسحق بن راهویه و&amp;nbsp;&amp;nbsp;لیث و غیره این اعمال را انجام داده و سنت گذاشته اند. فتاوی شیخ الاسلام 25/312&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;احادیثی كه درین مورد ذكر است همه موضوع و ساختگی است. سفر سعادت صـ167&lt;br /&gt;
همچنین تأخیر زكات تا روز عاشورا بدعت است بطور مثال زكات در ماه صفر یا ربیع الاول بر او واجب&amp;nbsp;&amp;nbsp;می گردد ولی آنرا تا روز عاشورا به تأخیر می اندازد، شاید قبل از عاشورا بمیرد یا مفلس گردد، در اینصورت زكات بر ذمة وی باقی می ماند و از این بدتر اینكه تأخیر در دادن حقوق دیگران ظلم محسوب می گردد. پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم می فرمایند (درنگ نمودن غنی در ادای حقوق ظلم است&amp;zwnj;). سفر سعادت صـ167&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;از بدعت&amp;nbsp;&amp;nbsp;هایی كه بعضی از زنان در این روز به آن اعتقاد دارند، حنا كردن است كه گویا اگر كسی اینكار را نكرد حق عاشورا را ادا ننموده است، همچنین خریدن عنبر و چوب خوش بو&amp;nbsp;&amp;nbsp;و دود نمودن آن، كه گویا اگر اینكار صورت نگیرد گناه بزرگی مرتكب شده اند. عجیب اینكه همین چوب را تا سال آینده نگه میدارند و در طول سال از آن استفاده می كنند و معتقدند كه اگر دود و بوی خوش آن به زندانی برسد از زندان رها خواهد شد. همچنین اعتقاد دارند كه این خوش بوئی علاج نظر و مرض است. چنین اعتقادی خطرناك است و دلیل قاطع و محكم می طلبد، اما دلیلی وجود ندارد و این گونه اعمال را زنها از خودشان اختراع نموده اند. سفر سعادت صـ167&lt;br /&gt;
پیامبرگرامیمان صلی الله علیه وآله وسلم ارتكاب هر گونه بدعت در دین الله، و عمل نمودن به آن را به شدت منع نموده اند. و اینرا واضح كرده اند كه خداوند را باید مطابق سنت و عملكرد پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم عبادت كرد، و نه بر حسب گفته و اختراعات دیگران. چنانكه میفرمایند: &amp;laquo;هركس عملی انجام دهد كه دین ما آنرا تأیید نكند مردود است&amp;raquo;.مسلم&lt;br /&gt;
ودر لفظ دیگری چنین روایت شده است:&amp;laquo;هر كسی در این دین ما چیزی ایجاد كند كه از آن نیست، مردود است&amp;raquo;. متفق علیه&lt;br /&gt;
یعنی:هر كاری كه مطابق سنت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم نباشد&amp;nbsp;&amp;nbsp;مردود بوده و قابل قبول نیست.&lt;br /&gt;
پس بدعت هایی كه ذكر شد در عهد پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و یارانش و در عهد تابعین وجود نداشته، بلكه بعد از شهادت حضرت حسین رضی الله عنه در سال 61 هجری ظاهر گردید، و در سال های بعد خصوصاً در عهد دولت فاطمیان اشكال مختلفی بخود گرفت و در اكثر كشور های شیعه نشین مانند ایران، عراق و بعضی مناطق مصر و لبنان و هند و پاكستان و افغانستان بشكل عجیبی انتشار یافت.&lt;br /&gt;
عوامل اساسی انتشار این بدعت ها و امثال اینها بی خبری مسلمانان از دین، و سكوت و عدم انكار چنین اعمالی است، اگر هر مسلمانی به اندازة وسع و توان خودش اطرافیانش را آگاه می كرد هرگز به این حد&amp;nbsp;&amp;nbsp;نمی رسید و جامعة اسلامی، سالم باقی می ماند.&lt;br /&gt;
پیامبرصلی الله علیه وآله وسلم امتشان را از بدعت و نوآوری در دین بر حذر داشته اند چنانكه میفرماید:&amp;laquo;از امور نو پیدا (در دین) بپرهیزید، زیرا هر امر نوپیدا بدعت و هر بدعتی گمراهی است&amp;raquo;. سنن ابی داود 4/201ـ صححه البانی 3/871صحیح سنن ابی داود&lt;br /&gt;
پس برادر و خواهر مسلمان! باید در راه از بین بردن بدعت ها كوشا باشیم، و در روز عاشورا به هر مسلمانی كه آغشتة بدعت است دوستانه بفهمانیم كه این اعمال نادرست است و او را تشویق به ترك آن كنیم تا همه مان&amp;nbsp;&amp;nbsp;در دنیا و آخرت رستگار گردیم.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند با فشار دادن به روی اسم کتاب آنرا از کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قاتلان حسین رضی الله عنه را بشناسید&lt;br /&gt;
حقیقت عاشورا&lt;br /&gt;
جوابهای نورانی در مورد عاشورای حسینی&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;چه کسانی حسین رضی الله عنه را به شهادت رساندند؟&lt;br /&gt;
روز عاشورا را چگونه بگذرانیم&lt;br /&gt;
شیعه و حسینیه ها&lt;br /&gt;
نگرشی نو به تاریخ صدر اسلام&lt;br /&gt;
توسل - وساطت بین الله و بندگان&lt;br /&gt;
زیارت از دیدگاه ائمه&lt;br /&gt;
زیارت قبور بین حقیقت و خرافات&lt;br /&gt;
احكام میت و آداب سوگوارى&lt;br /&gt;
یزید ابن معاویه&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نواراسلام شماره 4 اول محرم1430هـ&lt;br /&gt;
ماهنامه الکترونیک سایت نوار اسلام شماره&amp;nbsp;16 اول محرم 1431هـ&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>گلچینی از روایات اهل بیت و صحابه دربارۀ روزۀ عاشورا</title>
<link>http://qalamlib.com/news/238</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;گلچینی از روایات اهل بیت و صحابه دربارۀ روزۀ عاشورا&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
اگرتاجران حرفه ای فصل هر محصولی را خوب می دانند و خوب می دانند که چه وقتی برای عرضه آن و سود چند برابر مناسب است همینطور حرفه ای ها می دانند چه وقت چه عبادتی مناسب است!&lt;br /&gt;
تاجرهای ماهر به دنبال خوشی و نعیمی هستند که تمام شدنی نیست و این ممکن نیست مگر در بهشت، بهشتی که عرضش به اندازه آسمانها و زمین است...&lt;br /&gt;
اکنون به خودم و به تمام تاجرهای ماهر یادآور می شوم که... ما هم اکنون در موسمی هستیم که با فصل میوه و سبزی تفاوت دارد..&lt;br /&gt;
ما هم اکنون در فصل روزه قرار داریم! روزه؟ بله! رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;بهترین روزه بعد از رمضان روزه ماه الله محرم است و بهترین نماز بعد از نماز فریضه نماز شب (تهجد) است&amp;raquo; [به روایت بخاری ومسلم]&lt;br /&gt;
این دعوتی است به بهترین روزه بعد از رمضان؛ روزه ماه خداوند، ماه محرم که این موسمی است بسیار مناسب برای آن عبادت بزرگ&lt;br /&gt;
عبادت روزه...&lt;br /&gt;
اما&lt;br /&gt;
اگر در درون خود احساس ضعف می کنیم و عزیمت اندکمان اجازه نمی دهد این ماه را بسیار روزه باشیم حداقل سعی کنیم بر اساس این حدیث ابن عباس رضی الله عنه روز نهم و دهم را روزه باشیم:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;وقتی رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به مدینه رسید مشاهده کرد که یهود روز عاشوراء (دهم محرم) را روزه می گیرند، پس از آنان پرسید: این روزه چیست؟ گفتند: این روز خوبیست، این روزی است که در آن خداوند بنی اسرائیل را نجات داد و موسی [به شکرانه آن] در آن روزه گرفت. پس رسول الله صلی الله علیه و سلم گفت: به تحقیق که من از شما به موسی [نزدیکتر] و شایسته ترم، پس خود روزه گرفت و دستور به روزه آن داد&amp;raquo; [به روایت بخاری ومسلم]&lt;br /&gt;
و همچنین بر اساس حدیثی که ابوموسی اشعری رضی الله عنه روایت می کند که: &amp;laquo;یهود روز عاشورا را عید می داشتند، پس رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم فرمود شما آن را روزه بگیرید&amp;raquo; [به روایت بخاری ومسلم]&lt;br /&gt;
و بر اساس روایت ابن عباس رضی الله عنهما که گفت: &amp;laquo;روزی را ندیدم که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم روزه اش را اهمیت دهد جز این روز، یعنی روز عاشورا و این ماه یعنی ماه رمضان&amp;raquo; [به روایت بخاری]&lt;br /&gt;
و حدیث ابی قتاده رضی الله عنه که گفت: &amp;laquo;از رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم درباره روزه روز عاشورا پرسیدند پس فرمود: کفاره گناهان سال گذشته است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و همچنین حدیث ابن عباس رضی الله عنهما که گفت: &amp;laquo;هنگامی که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم روز عاشورا را روزه گرفت و دستور به روزه اش داد، گفتند: ای رسول الله! این روزی است که یهود و نصاری آن را بزرگ می دارند. پس فرمود: هنگامی که سال آینده بیاید ان شاءالله روز نهم محرم را نیز روزه خواهیم گرفت. ابن عباس می گوید: سال بعد نیامد مگر اینکه رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم وفات فرمودند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و در روایت دیگر آمده است: &amp;laquo;اگر تا سال بعد زنده باشم روز نهم را نیز روزه خواهم گرفت&amp;raquo; [به روایت مسلم]&lt;br /&gt;
و همچنین بر اساس حدیثی که ربیع دختر معوذ رضی الله عنها روایت کرده و فرموده است: &amp;laquo;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم بسوی محله های انصار پیام فرستاد که هرکه صبح را بدون روزه آغاز کرده ادامه آن را روزه بگیرد [به حرمت آن در ادامه روز چیزی نخورد] و هر که روزه دار است روزه اش را ادامه دهد. ربیع می گوید: ما آن روز را روزه می گرفتیم و فرزندانمان را نیز به روزه وامی داشتیم و برایشان عروسکهایی از پشم درست می کردیم وهرگاه یکی از کودکانمان برای غذا گریه می کرد آن عروسک ها را به او می دادیم تا اینکه وقت افطار فرا برسد&amp;raquo;. [به روایت بخاری ومسلم]&lt;br /&gt;
از امام صادق و ايشان از پدرش امام باقر عليهما السلام روايت مي كند كه علي عليه السلام فرمود:&amp;zwnj;&amp;laquo;در عاشورا روزه بگيريد، نهم و دهم زيرا كه گناه يك سال را مي بخشد&amp;raquo;. تهذيب الأحكام 4/299 ، الإستبصار 2/134&lt;br /&gt;
از ابوالحسن روايت است كه فرمود:&amp;laquo;رسول الله صلي الله عليه وآله وسلم روز عاشورا روزه گرفتند&amp;raquo;. تهذيب الأحكام4/29&lt;br /&gt;
از علي عليه السلام روايت است كه فرمود:&amp;laquo; نهم و دهم عاشورا احتياطاٌ روزه بگيريد، زيرا كه اين كفارة گناهان سال گذشته است اگر كسي يادش نبود و خورد هر وقت يادش آمد از همان لحظه روزه اش را تكميل كند&amp;raquo;. مستدرك الوسائل 1-594&lt;br /&gt;
از ابن عباس عليه السلام روايت است كه فرمود:&amp;laquo;هر گاه ماه محرم شروع شد، بشمار، به روز نهم كه رسيدي روزه بدار- راوي مي گويد: گفتم آيا حضرت محمد صلي الله عليه وآله وسلم در چنين روز، روزه مي گرفتند؟ فرمودند: بله&amp;raquo;. إقبال الأعمال ص554 وسائل الشيعة 7/347&lt;br /&gt;
از امام صادق عليه السلام روايت است كه فرمود:&amp;laquo;هنگامي كه كشتي نوح عليه السلام در روز عاشورا بر جودي استقرار يافت نوح عليه السلام به همة انسانها و جنهايي كه در كشتي بودند دستور داد كه در آنروز(عاشورا) روزه بگيرند و اين همان روزي است كه خداوند توبة آدم عليه السلام را پذيرفت&amp;raquo;. مستدرك الوسائل 1/594&lt;br /&gt;
در این احادیث درسهای بسیاری از اهمیت روزه عاشورا وجود دارد؛ همانطور که می بینید سلف این امت از صحابه واهل بيت عليهم السلام &amp;nbsp;اهمیت بسیاری به روزه عاشورا می دادند همانطور که در این احادیث آشکارا میبینیم....&lt;br /&gt;
اینجا باید این سوال را از خودمان بپرسیم که کجاست آن احادیت در تربیت فرزندانمان که متاسفانه خیلی از آنها بیشتر وقت خود را به این بهانه که هنوز کم سن وسال هستند در اماکن وقت کشی به سر می برند. ای کاش ما از این احادیث ضرورت شروع به تربیت فرزندانمان در سننین قبل از تکلیف را درک کنیم و آنان را بر اساسی محکم و جدی تربیت نماییم تا از آنان علمایی ربانی و دعوتگرانی صادق و فرماندهانی فاتح به بار آوریم.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;به این مناسبت کتابخانه عقیده تصمیم گرفت مجموعه ای از کتابهای مرتبط به این ماه مبارک را خدمت شما عزیزان تقدیم نماید تا مسلمانان از حقیقت این ماه&amp;nbsp;&amp;nbsp;و روز عاشورا آگاه شوند همچنين راهي از راه هاي شيطان كه بعضي از برادران و خواهران ما را به بيراهه برده است مسدود گردد.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>جايگاه كتابخانه در تفكر مسلمانان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/236</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;جايگاه كتابخانه در تفكر مسلمانان&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(ن وَالْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَ&amp;nbsp;﴿١﴾&amp;nbsp;؛ شأن و عظمت قلم و به تبع آن كتاب كه خداي متعال بارها در قرآن كريم از آن نام مي برد، خود گوياي ارزشي است كه كتاب و كتابت در نزد پروردگار جهان داراست. اسلام دين علم و دانش است و مسلمانان را به دانش اندوزي توصيه مي كند، انسانهاي دانا را با انسانهاي نادان برابر نمي داند و در خواست پيامبر از خدا اين است كه علمش افزوان شود. توصيه هاي ويژه رسول الله e و شيفتگي مسلمانان به ياد گرفتن و ياد دادن باعث پيدايش دستاوردهاي بزرگ مادي و معنوي بوده است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;با ظهور اسلام، كتابت وحي و پس از آن ضبط احكام و احاديث آغاز شد، و از قرن دوم هجري نگارش و ترجمه كتب در رشته هاي مختلف شروع شد. در پي تأليف و ترجمه كتب و به منظور حفظ و نگهداري ميراث علمي و فرهنگي بشر اولين كتابخانه ها در ممالك اسلامي بوجود آمدند. تا جايي كه در قرن چهارم و پنجم هجري كتابخانها هاي بزرگي در سراسر ممالك اسلامي وجود داشت. در واقع پيدايش كتابخانه از آغازين روزهاي اسلام، دستاورد بزرگداشت علم و دانش ميباشد.&lt;br /&gt;
در فرهنگ اسلامي شكوهمندي هايي است كه جهان بشري را به شگفتي و سپاس وامي دارد. كتابهايي كه انديشمندان مسلمان نگاشته اند، كتابخانه هايي كه مسلمانان بويژه خلفاي مسلمان بنيان نهاده اند،&amp;zwnj;از جلمه شكوهمندي هايي است كه همگان را به تعظيم وا داشته است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;آنچه در اين مقال شايان گفتگو است، همين توجه ويژه اي است كه مسلمانان به كتابخانه ها داشته اند، كتابخانه در واقع، قلب هر مؤسسه آموزشي، پژوهشي و تربيتي است. قوت و ضعف تعليم و تربيت و تحقيق در هر جامعه اي وابسته به قوت و ضعف مراكز علمي ـ آموزشي آن جامعه است و قوت و ضعف مراكز علمي آموزشي وابسته به قوت و ضعف آن مركز ( يعني كتابخانه ها) است.&lt;br /&gt;
&amp;zwnj;از تتبع و استقراء در مدارك اسلامي چنين بر مي آيد كه مسلمانان قدرت و قوت تحقيقات نجومي، فن آوريهاي پزشكي، پژوهشهاي علمي، تربيتي و ديني خود را در قرون طلايي تمدن اسلام مرهون شكوفايي و رونق مجموعه هاي بزرگ و ميليوني كتابخانه هاي خود هستند. مسلمانان بسيار سريع به جايگاه برتر كتابخانه ها بعنوان حافظان ميراث علمي و فرهنگي بشر، و نقش آموزشي ـ پژوهشي و تربيتي آن در جامعه و مراكز تعليم و تربيت پي بردند و با همتي تام و عزمي راسخ براي تشكيل و سازماندهي كتابخانه ها آستين همت بالا زدند.&lt;br /&gt;
اولين كتابخانه در اسلام&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;مي توان گفت اولين كتابخانه مسلمانان در زمان حضرت معاويه رضي الله عنه توسط خود ايشان بنيان نهاده شده است. يوسف العش در كتاب خود مي نويسد: &amp;laquo;نخستين بيت الحكمه ( كتابخانه اي) كه شناسايي آن براي ما ممكن هست متعلق به حضرت معاويه رضي الله عنه بوده است كه پس از دست به دست شدن بين وارثان او به دست خالد بن يزيد بن معاويه افتاد و خالد بن يزيد اولين فرد در تاريخ اسلام است كه كتابخانه اي عمومي تأسيس كرد[أ1]&lt;br /&gt;
&amp;laquo;در واقع بايد گفت كه در زمان خلافت چهار خليفه نخست، نمي توان از مجموعه كتابها به عنوان كتابخانه ها صحبتي به ميان آورد. اما باظهور سلسله اموي در دمشق و فتح ايران، بين النهرين و شمال آفريقا،&amp;zwnj; دنياي فرهنگي اسلام وارد مرحله جديدي شد، اولين قدم در اين مهم ( كتابخانه) از طرف مؤسس اين سلسله يعني معاويه بن ابي سفيان رضي الله عنه برداشته شد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;مدارك تاريخيِ روشني در دست است كه جمع آوري كتاب چه به صورت شخصي و چه به صورت عمومي از زمان حكومت بني اميه شروع شده است. به گونه اي كه اولين مدارك موجود در باره موجوديت كتابخانه در دنياي اسلامي كه مشابه كتابخانه هاي عمومي امروز مي باشد به زمان خالد بن يزيد مربوط مي باشد.&amp;raquo;[2]&lt;br /&gt;
كتابخانه ها ونقش آموزشي آنها&lt;br /&gt;
كتابخانه ها همواره نقش بسزايي در امر آموزش داشته اند تا جايي كه بيشتر كتابخانه هاي اسلامي، &amp;zwnj;در سده هاي ميانه، بنيادهاي آموزشي و فرهنگي بودند كه در كنار آموزش، كار كتابخانه هاي نوين را هم بر دوش مي كشيدند. نمونه هاي بسياري از كتابخانه هايي كه كار آموزش در آنها انجام مي گرفت وجود دارد.&amp;laquo;در كاخ علي بن يحياي منجم (275هـ) كتابخانه بزرگي بود به نام خزانة الحكمة كه مردم از جاهاي گوناگون براي مطالعه بدان روي مي آوردند. حتي براي دانشجوياني كه مي خواستند در گوشه&amp;zwnj;اي&amp;nbsp;&amp;nbsp;از كتابخانه زندگي كنند تسهيلات و هزينه&amp;zwnj;هايي آماده شده بود و به آنان خوراك نيز داده مي شد.&lt;br /&gt;
جعفر بن حمدان موصلي كتابخانه&amp;zwnj;اي سرشار داشت كه هر كس مي&amp;zwnj;توانست از آن بهره مند شود،&amp;zwnj;حتي به دانشجويان تهيدست كمكهاي مالي مي&amp;zwnj;كرد، و خود در آنجا به تدريس مي نشست.&lt;br /&gt;
ابوعلي سوار كتابخانه&amp;zwnj;اي داشت كه به دانشجويانش ماهانه مقرّري رسمي مي&amp;zwnj;پرداخت. و ديگر از كتابخانه بزرگ و زيباي بصره مي توان نام برد&amp;nbsp;&amp;nbsp;كه دانشجويان براي بهره&amp;zwnj;مند شدن از اين كتابخانه شگفت انگيز به آنجا مي آمدند و در درس استادي كه هميشه علم كلام مي&amp;zwnj;آموخت شركت مي جستند و سرانجام در كتابخانه خزانه شاپور گفت و شنودها و مناظره&amp;zwnj;هايي چهره مي&amp;zwnj;بست كه ابو العلاء&amp;zwnj;مصري از سرشناس ترين جهره&amp;zwnj;هاي آن بود.&amp;raquo;[3]&lt;br /&gt;
فراواني، شكوه و عظمت كتابخانه&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شور و اشتياق مسلمانان به علم و دانش و به تبع آن كتاب و كتابت و به پاس بزرگداشت منزلت كتاب، &amp;zwnj;و جهت حفظ ميراث علمي و فرهنگي بشر، آنان را بر آن داشت تا توجهي جدي و شايان به كتابخانه ها داشته باشند. از اين روكتابخانه هاي بسيار و معظمي بنيان نهاده شد.&lt;br /&gt;
دكتر شلبي در كتاب خود &amp;laquo;تاريخ آموزش در اسلام&amp;raquo; مي&amp;zwnj;نويسد: &amp;laquo;كتابخانه&amp;zwnj;ها آنچنان فراوان بودند كه به سختي مي&amp;zwnj;توان مسجد و يا بنياد علمي&amp;zwnj;اي يافت كه فاقد كتابخانه باشد. بدينسان گروههاي مختلفي از طبقات اجتماعي گوناگون از اين مجموعه&amp;zwnj;ها بهره مي&amp;zwnj;گرفتند و نيز كمتر مدرسه&amp;zwnj;اي در عراق، خراسان، سوريه و مصر پيدا مي&amp;zwnj;شد كه كتابخانه&amp;zwnj;اي نداشته باشد،&amp;zwnj;در واقع به سختي مي&amp;zwnj;توان تك مدرسه&amp;zwnj;اي بدون مجموعه كتابخانه يافت.&amp;raquo;[4]&lt;br /&gt;
توجه جدي مسلمانان به كتابخانه&amp;zwnj;ها باعث پيدايش ساختمانهايي سترگ و مستقل براي كتابخانه&amp;zwnj;ها شد.&amp;laquo;مسلمانان به ساختن ساختمانهايي&amp;nbsp;&amp;nbsp;به عنوان كتابخانه&amp;zwnj;هاي همگاني اهميتي سترگ مي&amp;zwnj;دادند. برخي از كتابخانه&amp;zwnj;ها همانند كتابخانه شيراز،&amp;zwnj; &amp;laquo;كردوبا&amp;raquo; (قرطبه) قاهره و بغداد در ساختمانهايي جداگانه قرار داشتند با اتاقهايي بسيار براي كاربردهاي گوناگون و تالارهايي كه جهت مطالعه و تحقيق و اتاقهايي جهت&amp;nbsp;&amp;nbsp;نسخه برداري از دست نوشتها و اتاقهايي براي برگزاري نشستها وانجمنهاي ادبي، به گونه&amp;zwnj;اي كه تمام اتاقها از ابزار آسايش وراحتي جهت مطالعه پر بود.&amp;raquo;[5]&lt;br /&gt;
آدامز متز در كتاب خود مي نويسد:&amp;laquo;خواجه نظام الملك در نظاميه بغداد كتابخانه عظيمي را براي دانشجويان و روشنفكران تأسيس كرد كه بودجه آن به &amp;laquo;يك ميليون و 54 هزار&amp;raquo; فرانك طلا مي&amp;zwnj;رسيد. خليفه المستنصر بالله عباسي كتابخانه بزرگي براي ملل و نحل مختلف شرق در بغداد بنيان نهاد كه صدها كتابدار وصدها هزار جلد نسخه خطي در آن موجود بود. كتابخانه خليفه العزيز فاطمي يك ميليون و شصد هزار جلد كتاب داشت كه در اين كتابخانه وسايل گوناگون نجومي،&amp;zwnj; نقشه كرات آسماني،&amp;zwnj; و يك نقشه بسيار بزرگ جهان نما روي پارچه ابريشمي كبود كشيده شده بود.&amp;raquo;[6]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جهت ارايه تصوير مختصري از عظمت و شكوه كتابخانه&amp;zwnj;هاي مسلمانان مي توان نام و شمار كتابهاي تعدادي از كتابخانه&amp;zwnj;هاي بزرگ در تمدن اسلامي را به اختصار به شرح ذيل نام برد: [7]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;بيت الحكمة بغداد&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;4000000&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جلد&lt;br /&gt;
كتابخانه شاپور بغداد &amp;nbsp;10000&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جلد&lt;br /&gt;
كتابخانه سلطنتي قاهره 1000000&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جلد&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;بيت الحكمة قرطبة&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;400000&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جلد&lt;br /&gt;
كتابخانه دارالحكمة قاهره 100000&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جلد&lt;br /&gt;
كتابخانه طرابلس شام&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;3000000&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جلد&lt;br /&gt;
كتابخانه مراغه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;400000&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;جلد&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و همچنين جهت ارائه تصويري بهتر و روشنتر از جايگاه كتابخانه در تفكر مسلمانان سلف مي&amp;zwnj;توان حقيقت تاريخي ذيل را ياد آور شد،&amp;zwnj; در بررسي تاريخ كتابخانه&amp;zwnj;هاي مسلمانان حقايق وشگفتي هاي بسياري مشاهده مي&amp;zwnj;شود. از جمله:&amp;laquo;هنگامي كه نوح بن منصور ساماني به صاحب بن عباد وزارت را پيشنهاد كرد نپذيرفت، يكي از دلايلش اين بود كه جابه جا كردن كتابخانه&amp;zwnj;اش كه نزديك 400&amp;nbsp;&amp;nbsp;بار شتر بود دشوار مي&amp;zwnj;نمود. بدينسان او ماندن دركنار كتابهايش را بر وزارت ترجيح داد، &amp;zwnj;وي اجازه استفاده آزادانه از كتابخانه&amp;zwnj;ا&amp;zwnj;ش رابه همگان داده بود و حتي براي آنهايي كه از كتابخانه بيشتر استفاده مي كردند، جوايزي تعيين كرده بود. و هنگام وفات، كتابخانه بزرگ خود را كه بالغ بر&amp;nbsp;&amp;nbsp;206&amp;nbsp;&amp;nbsp;هزار جلد كتاب بود به شهر ري بخشيد.))[8]&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آنچه در اين مختصر گفته شد قطراتي از اقيانوس شكوهمندي هاي اسلام است. اين شكوه و عظمت و اين توجه قابل تحسين مسلمين به كتابخانه&amp;zwnj;ها زماني ما را بيشتر شگفت زده مي نمايد كه بدانيم تمام اين دستاوردها و ساير دستاوردهاي علمي، هنري، فرهنگي و تربيتي مسلمانان درست در زماني صورت مي گيرد كه طليعه داران علم و تكنولوژي عصر حاضر در آن دوران در خواب قرون وسطايي خود بسر مي بردند،&amp;zwnj; بگونه&amp;zwnj;اي كه نه تنها با مجموعه هاي ميليوني كتابخانه&amp;zwnj;ها كاملاً بيگانه بودند بكله حتي بسياري از كتابهاي علمي در گوشه&amp;zwnj;هاي كليسا به زنجيرها كشيده شده بود و اجازه استفاده عمومي از آنها نبود.&lt;br /&gt;
اما سوگمندانه حوادث بسياري باعث سقوط تمدن و فرهنگ اسلامي شد و با افول تمدن و فرهنگ در سرزمينهاي اسلامي كتابخانه&amp;zwnj;ها نيز در غروب غمناكي فرو رفتند. حملات وحشيانه مغول و تاتار، يورش غربيان به كتابخانه&amp;zwnj;ها، بي همتي و بي علاقگي حكام داخلي و به تبع آن مردم پس از حملات وحشيانه مغولها و تاتارها سبب شد تا بسياري از كتابخانه&amp;zwnj;ها به اصطبل!! تبديل شوند، بسياري توسط سربازان به غارت بروند و بسياري توسط دلالان طمعكار كتاب خريداري شوند و اين سقوطي بود كه خيزشي بدنبال نداشت.&lt;br /&gt;
در بررسي تطبيقي اوضاع كنوني كتابخانه&amp;zwnj;هاي اسلامي و غربي به وضوح مي&amp;zwnj;توان به عدم خيزش كتابخانه&amp;zwnj;هاي اسلامي و رشد همه جانبه كتابخانه&amp;zwnj;هاي غير اسلامي پي&amp;zwnj;برد.&lt;br /&gt;
نگاهي كوتاه به وضعيت كتابخانه&amp;zwnj;هاي غير اسلامي&lt;br /&gt;
به عنوان نمونه،&amp;zwnj;فقط به بررسي وضعيت كتابخانه&amp;zwnj;هاي يك كشور اكتفاء مي نمائيم( آنهم به صورت آماري و مختصر.)&lt;br /&gt;
كشور روسيه با داشتن 360 هزار كتابخانه داراي مجموعه&amp;zwnj;اي از بزرگترين كتابخانه&amp;zwnj;هاي دنيا و بخصوص آسياست. از مجموعه 360 هزار كتابخانه ياد شده، 128هزار آن بصورت كتابخانه عمومي در معرض استفاده عموم مردم است.&lt;br /&gt;
كتابخانه لنين،&amp;zwnj;با مجموعه 36 ميليوني! خود در صدر كتابخانه هاي روسيه قرار دارد. مجموعه اين كتابخانه به 247 زبان! مي باشد كه 25 ميليون آن به زبان روسي و بقيه به زبانهاي ديگر است. بطور مثال اين كتابخانه در حدود 20 هزار جلد كتاب در باره ادبيات ايران است!. روزانه به طور تقريبي 7000&amp;nbsp;&amp;nbsp;نفر مراجعه كننده روسي و غير روسي دارد و سالانه بيش از 12ميليون جلد كتاب به امانت مي دهد. علاوه بر كتابخانه لنين مي توان از كتابخانه لنينگراد با مجموعه 28 ميليوني آن نام برد.&lt;br /&gt;
همچنين كتابخانه ملي علم و صنعت روسيه با مجموعه 10 ميليوني و كتابخانه آخوندوف با مجموعه 5/4 ميليوني د رحال سرويس دهي به دنياي اطلاعاتي و پژوهشي خود هستند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;از ديگر كشورها مي&amp;zwnj;توان كتابخانه ملي چين، &amp;zwnj;فرانسه، آلمان، بريتانيا و آمريكا و ساير كشورها را نام برد كه هر كدام از آنها داراي مجموعه هاي 20 الي 30 ميليوني هستند. علاوه بر اين كتابخانه كنگره آمريكا داراي 80 ميليون جلد! مواد كتابي و غير كتابي است كه در حال حاضر پيشگام عرضه كتابداري نوين به جهان مي&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
با اين تفصيل به خوبي مي توان پي برد كه: اگر مسلمانان قدرت و قوت تحقيقات، پژوهشها و فن آوريهاي خود را در گذشته مرهون كتابخانه&amp;zwnj;هاي بزرگ خود بوده&amp;zwnj;اند، امروزه غربيها نيز قدرت و قوت تحقيقات علمي و نو آوريهاي صنعتي خود را مرهون كتابخانه هاي عظيم و باشكوه خود هستند.&lt;br /&gt;
كتابخانه&amp;zwnj;ها در عصر الكترونيك&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
آنچه شايان توجه است وضعيت كتابخانه&amp;zwnj;ها درعصر الكترونيك مي&amp;zwnj;باشد.&amp;laquo;موج انقلاب اطلاعاتي كه در چند دهه ديگر به كمال خواهد رسيد به زودي تحولي شگرف در تمام شؤون زندگي ايجاد مي&amp;zwnj;كند و اين امري است اجتناب ناپذير. آنچه مهم است انطباق با چنين شرايط ويژه پيشرفت تكنولوژي واطلاعاتي است. كتابخانه&amp;zwnj;ها در عصر الكترونيك مفهوم امروزي خود را از دست خواهند داد، &amp;zwnj;نظام ارتباطي بي&amp;zwnj;كاغذ بر دنيا حاكم خواهد شد،&amp;zwnj; و سلطه كامپيوتر و ارتباطات از راه دور همه جا را تحت پوشش خود قرار خواهد داد.&amp;raquo;[9]&lt;br /&gt;
استفاده از نوارهاي مغناطيسي براي ثبت و ظبط اطلاعات منجر به كنار گذاشتن كاغذ خواهد شد. كتاب الكترونيكي ،&amp;zwnj;كتاب مرجع الكترونيكي، كتابخانه الكترونيكي قابل حمل، جاي مشابه&amp;zwnj;هاي خود را در وضع فعلي خواهد گرفت.&amp;raquo;[10]&lt;br /&gt;
كتابخانه&amp;zwnj;ها به عنوان ابزاري در خدمت علم و تكنولوژي و معارف بشري همواره بايد خود را پابه پاي چنين پيشرفتهائي بكشانند و الا محكوم به زوال و فنا خواهند ماند. &amp;laquo;در برابرتحول سريع تكنولوژي اطلاعات،&amp;zwnj;بعيد به نظر مي&amp;zwnj;رسد كه كتابخانه به عنوان نهادي بتواند پايداري كند،&amp;zwnj;كتابخانه هايي مي توانند به بقاي خود ادامه دهند كه خواستار تلاش و پويايي باشند و بخواهند با واقعيات خود را تطبيق دهند.&amp;raquo;[11]&lt;br /&gt;
در اين شرايط حساس و در عالم وابستگي تكنولوژي و صنعتي و به ويژه اطلاعاتي ،&amp;zwnj;شايسته است بار ديگر با همتي تام و با عزمي راسخ به سازماندهي كتابخانه&amp;zwnj;هاي مساجد ،&amp;zwnj;مدارس و دانشگاههاي اسلامي بپردازيم،&amp;zwnj;شايد در سايه همت و تلاش و با توكل به قدرت خداوند بتوانيم شمه&amp;zwnj;اي از دستاورهاي گذشته خود را كسب نماييم و بار ديگر شكوهمنديهايي بيافرينيم كه مسلمانان سلف آفريدند، از اين رو پيشنهاد مي شود:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1-در جهت رشد و شكوفايي مجموعه كتابخانه خود كوشا باشيم،&amp;zwnj;به گونه&amp;zwnj;اي كه مجموعه شايسته و قابل توجهي براي مساجد، مدارس و دانشگاههاي خود فراهم آوريم.&lt;br /&gt;
2- مجموعه ها را بر اساس يكي از طبقه بنديهاي رايج در دنيا سازماندهي نمائيم. بخصوص كتابخانه&amp;zwnj;هاي مساجد ومدارس ،&amp;zwnj;كه بدون سازماندهي و به شيوه&amp;zwnj;اي ابتدايي و در واقع بدون هيچ گونه شيوه&amp;zwnj;اي اداره مي شوند.&lt;br /&gt;
3-در جهت كامپيوتريزه كردن مجموعه خود و همگام شدن با امكانات اطلاع رساني روز گامهاي اساسي وحساب شده&amp;zwnj;اي برداريم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اميد كه كتابخانه&amp;zwnj;ها بتوانند جايگاه خود را در جوامع اسلامي ما بيابند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;--------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;
[1] - عش،&amp;zwnj;يوسف ، كتابخانه هاي عمومي و نيمه عمومي عربي در قرون وسطي ، ترجمه اسد الله علوي ص، : 36&lt;br /&gt;
[2] - مكي السباعي، محمد، نفش كتابخانه هاي مساجد در فرهنگ و تمدن اسلامي، ترجمه علي شكويي،ص: 12&lt;br /&gt;
[3] - شلبي، احمد، تاريخ آموزش در اسلام، ترجمه محمد حسين ساكت، ص: 123&lt;br /&gt;
[4] - همان،&amp;zwnj;ص: 152&lt;br /&gt;
[5] - همان ص: 152&lt;br /&gt;
[6] - متز، آدامز، زندگي مسلمانان در قرون وسطي، ترجمه علي مظاهري ص: 239&lt;br /&gt;
[7] - زيدان،&amp;zwnj;جرجي ، تاريخ تمدن اسلام، ترجمه علي جواهر كلام، ص: 637&lt;br /&gt;
[8] - مكي السباعي، محمد ، نقش كتابخانه هاي مساجد در فرهنگ و تمدن اسلامي، ترجمه علي شكويي،&amp;zwnj;ص: 145&lt;br /&gt;
[9] - لنكستر، ف،&amp;zwnj;ويلفرد، كتابخانه ها و كتابداران در عصر الكترونيك، ترجمه اسدالله آزاد، ص: 44&lt;br /&gt;
[10] - همان،&amp;zwnj;ص: 90&lt;br /&gt;
[11] - همان،&amp;zwnj;ص: 200 جايگاه كتابخانه&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>روش امام طبری در تاریخ نگاری</title>
<link>http://qalamlib.com/news/235</link>
<description>&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal align=center&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;روش امام طبری در تاریخ نگاری&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;نویسنده: دکتر محمد امحزون &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;مترجم: عادل حيدری &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;امام طبری رحمه الله زندگی علمی خویش را با گام نهادن در مسیر تحصیل علم حدیث آغاز نمود به همین دلیل طبیعی بود که در سبک تاریخ نگاری روش محدثین را در پیش گیرد بدینصورت که روایتهای تاریخی را جمع آوری نموده و آنها را با سند به گوینده اش نسبت دهد مانند شیخی که از او دانش فرا گرفته است یا انسان معتمدی که در واقعه شرکت داشته و یا نسبت بدان از آگاهی لازم برخوردار باشد و یا اینکه آنرا از طریق کتابی معتبر با سند و نیز شنیدن ویا خواندن آن در نزد استادی همراه با اجازه نقل آن ، و بدین منوال در بیشتر روایتهای خویش به روش محدثین در اهتمام ورزیدن به نسبت قول به گوینده پایبند می باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;خودش پیرامون این موضوع می گوید : کسی که به کتاب ما نظر می افکند بایستی بداند که تکیه من در آنچه در این کتاب ذکر نموده ام بر اخباری است که آنها را بیاد دارم و یا آثاری که آنها را به گوینده شان نسبت داده ام بدون اینکه بدلائل عقلانی و استنباط های فکری نظری بیفکنم مگر در مواضعی بسیار نادر و اندک) و اینگونه امام طبری رحمه الله حرص خویش بر نسبت قول به گوینده را بیان می کند و اینکه به هیچ وجه به دلائل عقلی و استنباطهای فکری اجازه دخالت در تفسیر وقائع تاریخی و نگارش آن نخواهد داد و این خود بیانگر حرص امام طبری رحمه الله در بیان هر آنچه شنیده است از جهات متعدد می باشد و پس از آن تحقیق وپژوهش و بررسی و قبول و رد را واگذار نموده است به کسی که خود خواهان تحقیق باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;از آنجایی که تاریخ صدر اسلام و خصوصا دوران فتنه از حساسیت ویژه ای به نسبت ادوار دیگر تاریخ برخوردار است به دلیل روایتهای فراوانی که نقل بیشتر آنها بر اساس احساسات حاکم در دوران و یا وابستگی های سیاسی و تعدد اندیشه ها بوده و نیز درآمیزی روایات با عواملی چون فراموشی و گرایش ها و دگر اندیشی ها، به سختی می توان حکم به صحت روایتها نمود ، زیرا این امر مستلزم اظهار نظر کردن و حکم نمودن پیرامون مسئله ای است که گشایش آن بس دشوار می نماید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;به همین دلیل امام طبری رحمه الله دیدگاههای متفاوت پیرامون راویان و مصدر روایت را ذکر می کند با پایبندی به شیوه تاریخ نگاری خویش یعنی جمع اصول و تدوین آن در قالب روایت و مسئولیت روایت را به رجال سند و کسانی که آنرا روایت کرده اند واگذار می کند و خود این مسئله را در کتابش تبیین می نماید آنجایی که می فرماید: (اخبار و آثاری که در این کتاب وجود دارد خبرهایی است که ما از گذشتگان شنیده ایم و چه بسا خواننده کتاب آنها را انکار کند و زشت وقبیح بداند زیرا که وجهی از صحت و هیچ معنایی در حقیقت در آن مشاهده نمی نماید، اما بایستی دانست که این مسئله از جانب ما نیست بلکه از جانب کسانی است که این خبرها را به ما رسانده اند و ما آنچه را شنیده بودیم همانگونه نقل نموده ایم )&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;یکی از شیوه هایی که امام طبری در تاریخ نگاری به آن اهمیت داده است پرهیز از دخالت دادن سلیقه شخصی در کتابش می باشد لهذا دیدگاههای متفاوت را بدون هیچگونه تعصبی بیان می نماید و چنانچه خودش نظری داشته باشد آنرا در اختیار نمودن روایات و یا بعبارتی دیگر گرفتن برخی از روایتها و ترک دیگر روایتها اعمال می کند بدون اینکه در قضایایی که بیان می کند حکم قاطعی صادر کرده باشد و حتی روایتی را بر روایت دیگر ترجیح نمی دهد مگر در مواردی بسیار اندک و نادر.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;التزام و تمسک امام طبری به این روش او را واداشت که روایتهای مختلف پیرامون حادثه و خبری را که به او رسیده نقل کند و بهنگام تقابل روایات چنین می گوید: ( پیرامون این مسئله اختلاف وجود دارد ) سپس روایتهای مختلف را از راویانش ذکر می کند مثلا می گوید: بعضی چنین گفته اند و بعضی چنان گفته اند ، هشام کلبی چنین می گوید . ویا مثلا می گوید: از فلانی نقل شده که چنین سخنی گفته است ، و یا فلانی سخنی گفت و دیگران چنین گفتند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;اما نقد و مقابله پیرامون روایتهایی که در مورد سالها می باشد من جمله سالهای وفات، جنگ ها، تعیین استانداران و امرای اقلیم و امرای حج به وضوح در روش امام طبری آشکار می باشد مثلا چنین می گوید: در فلان سال و فلان روز ابوالعباس در منطقه جدری وفات یافت&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;و هشام کلبی می گوید : در فلان روز وفات یافته است ( و روزی دیگر را ذکر می کند ) و یا مثلا می گوید: بعضی چنین می گویند و بعضی چنان می گویند ، واقدی چنین گفته است، و نیز می گوید: فلان جنگ در فلان سال رخ داده است اما واقدی می گوید :که این جنگ در سالی دیگر یعنی سال فلان به وقوع پیوسته است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;و اینچنین اگر پیرامون یک مسئله روایتهای متعددی وجود داشت امام طبری معتقد بود بایستی تمام آنها را ذکر نمود تا ادای دین کرده باشد که در این راستا نهایت تلاش خویش را در جمع آوری روایتهای مختلف در مورد مسئله می نماید و انگاه که به روایتی طولانی می رسد گاهی اوقات آنرا قطع می کند تا موضع خلاف پیرامون مسئله را بیان نماید ( نگا: 4/ 466،468،469) و هنگامی که از آن فارغ شد به متن روایت باز می گردد و سخنی می گوید که بیانگر بازگشت وی به مسئله گذشته واز سر گرفتن مجدد آن می باشد مثلا می گوید : سخن را باز می گردانیم به مسئله سابق وحدیث…( نگا: 4/470)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;مسئله ای که باید بدان توجه کرد این است که این شیوه ای که امام طبری در تاریخ نگاری بکار می برد سبب گیج شدن خواننده و در آمیختن موضوعات در نزد وی می شود که در بسیاری از موارد سبب می شود خواننده موضوع اصلی را فراموش کند زیرا در میدان تک موضوعی بودن حادثه تاریخی با چالش مواجه می شود. و شایسته و سزاوار بود که امام روایتها را یکی پس از دیگری بصورت کامل از ابتدا تا انتهای آن ذکر می نمود تا بدینصورت در ذهن خواننده تصویر واقعه با توجه به جهات مختلف به خوبی نقش بندد و خود بتواند با موازنه میان دیدگاههای مختلف و مقایسه آنها با دیدی مثبت به موضوع بنگرد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;امام طبری رحمه الله در ترتیب تاریخ خود تسلسل حوادث را در نظر می گیرد و وقائع را بر اساس وقوع سالی پس از سال دیگر ذکر می کند مثلا از هجرت تا پایان سال 202 هـ ـ ( 914 م ) و در هر سال حوادثی را که در آن رخ داده و شایان ذکر است را بیان می دارد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;و حجم پرداختن به سالها بنابر کثرت و یا اندک بودن حوادث و اهمیت اخبار و یا رسیدها به وی تفاوت می کند و بر این اساس حجم صفحات پرداختی به سالها را کوتاه و یا طولانی می نماید ، مثلا در مورد بعضی از سالها به چند سطر اکتفا می کند( مثلا سال 25) و بعضی از سالها یک و یا دو صفحه ( 48 و 29 ) و برخی از سالها حجم آنها از صد صفحه نیز می گذرد ( 36 و 35 ) و اگر حادثه ای طولانی مدت باشد آنرا به چند دسته تقسیم نموده و بر اساس سالیانی که حادثه را در بر می گرفته آنرا بیان می دارد .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;اما شیوه ی امام در نقل حوادث هر سال به یک منوال نیست چنانچه گاهی اوقات یک حادثه تاریخی را بیان می دارد سپس به تفصیلات و روایات وارده در آن می پردازد ( 4\ 442) و گاهی تعدادی از حوادث واقعه در سالی را ذکر می کند سپس به تفصیلات برخی از آنها می پردازد ( 4\317) و نیز گاهی به ذکر حوادث به وقوع پیوسته در سال در چند سطر بسنده می کند. و در پایان هرسال تعدادی از شخصیت های مشهوری که در آن سال دار فانی را وداع گفته اند را نام می برد ، اما این شیوه در کتاب شایع نیست بلکه آنچه که معمولا امام آنرا در پایان هر سال ذکر می کند اسامی بکار گماردگان سرزمینها یا امرای حج و یا هر دوی آنها در آن سال می باشد، و در سالهایی که نبردهایی را درپی داشته است به ذکر اخبار و احوال مجاهدین می پردازد کما اینکه به زمستانها و تابستانها و قلعه ها و شهرهایی که مسلمانان فتح نموده اند اشاره می کند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;به نسبت اخباری که ارتباطی به زمان خاصی نداشته باشند مثلا زندگی نامه ها امام رحمه الله زندگی هر خلیفه را پس از ذکر وفاتش بیان می دارد و پس از اینکه حوادث عصرش را بر اساس تسلسل زمانی بیان می کند آنرا با عرض زندگی نامه وی بدون مقید شدن به زمان خاتمه می بخشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;چیزی که شایان ذکر است این است که امام طبری رحمه الله به شیوه ذکر سالیان در کل کتاب خویش مقید نبوده بلکه در حوادث خاص به تاریخ اسلام بدان توجه می کند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;اما در بخش چهارم- از پیدایش آدم تا هجرت رسول الله صلی الله علیه وسلم- روشی دیگر را در پرداختن به حوادث در پی می گیرد و آنها را بر اساس سالی پس از دیگری ذکر نمی کند بلکه شیوه ای را در پیش می گیرد که اکثر مؤرخین قدماء در ذکر پیدایش خلق سپس ذکر انبیاء و پس از آن حوادثی که در روزگارانشان رخ داده و پادشاهانی که در عصرشان می زیسته اند و اخبارشان بدان می پردازند، وهمچنین امتهای هم عصر با آنان و امتهایی که پس از آنان پا به عرصه نهادند تا ظهور اسلام و بعثت رسول الله صلی الله علیه و سلم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;بسیار اتفاق می افتد که امام طبری برای توثیق حوادث ویا تشویق بدان نصوص تاریخی بر گرفته از نامه ها، خطبه ها،گفتگوها و بویژه شعر را در تاریخش ذکر می کند همچنان تلاش می نماید نصوصی را که روایت می کند بدون هیچگونه تغییری بیان دارد به همین سبب مشاهده می شود بسیاری از اصطلاحات و الفاظ غیر عربی در کتاب همچنان بر جای خود مانده اند(2/51،54،62) .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;اما روش امام طبری در اثبات مصادر : چنانچه امام طبری رحمه الله چیزی را از کتابی نقل کند کم اتفاق می افتد که عنوان آنرا ذکر کند بلکه تنها به ذکر مؤلف آن بسنده می کند مثلا می گوید: واقدی چنین می گوید _ ویا- ابومخنف چنان می گوید… . و هرگاه چیزی را بصورت شفاهی خود از کسی شنیده باشد می گوید : فلانی با من چنین گفت… واگر همراه با راوی محدثی که خبر را برای او بازگو کرده نیز باشد و یا دیگران چنین می گوید: فلانی با من گفت که شنیدم فلانی و فلانی چنین می گفتند سپس سند را به مصدر اصلی اش می رساند.و گاهی اوقات امام در تاریخ خویش به اخبار روایت شده از طریق ارسال ( خبر معنن و یا خبری که لفظ صریح در آن نباشد) تکیه می کند مثلا چنین می گوید: سری به من چنین نوشت که از شعیب و شعیب از سیف چنین نقل می کند (4/262) و غالبا حریص بر ذکر سند بصورت متصل می باشد مگر در برخی موارد مثل این گفته اش: گفته شده، واز فلان ذکر شده (5/172) .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;امام طبری رحمه الله در تاریخ خود برای حوادث به وقوع پیویسته در سالی در بدایت ذکر همان سال عناوین خاصی تحت یک عنوان عام قرار می داد مثل این گفته وی : سپس سال 35 فرارسید ذکر اخبار وحوادث مشهور در این سال ، اما در ذکر حوادث کوچک به چند سطر بسنده می کند و چنان بیان می دارد: سپس فلان سال فرا رسید ، و حوادثی که در آن سال رخ داده را ذکر می نماید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;اما پیرامون عدالت راویان امام طبری رحمه الله خود را مقید به قیدهایی که اهل حدیث در برخورد با روایتهای راویان ضعیف بدان متمسک شده اند نمی بیند، لهذا در تاریخ خود اقوال کلبی و فرزندش هشام و همچنین واقدی و نیز سیف بن عمر ، و ابومخنف و غیره از راویان ضعیف که متهم به دروغگویی و جعل احادیث هستند را ذکر می کند ، وعلت هم این است که امام طبری رحمه الله از روش خاصی پیروی می کند که بر علمای حدیث واضح و آشکار است و آنهم بیان آنچه بدانها رسیده شده با ذکر سند ، که از میان این اخبار و روایتها صحیحش گرفته خواهد شد و غیر صحیح شناخته شده و طبق ضوابط شرع و قواعد علم روایت رد می شود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;بدینصورت امام طبری رحمه الله با این کرده خویش غافل و نا آگاه از صدها روایتی نبود که آنها را از انسانهای متروک و متهم نقل می کند بلکه ایشان از روشی تبعیت می کند که نزد علمای جرح و تعدیل مرسوم و متداول می باشد و ذکر اخبار انسانهای متروک و متهم و تدوین آن در کتابی دلالت بر استدلال و احتجاج بدان نیست مثلا گفته می شود : حدیث فلان شخص روایت می شود اما بدان احتجاج نمی شود ” ویا” حدیثش فقط در جهت شناخت ذکر می شود ” ویا ” جائز نیست روایت از این اشخاص مگر در نزد آگاهان به علم روایت .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;در این راستا حافظ ابن حجر بهنگام بیان زندگانی امام طبرانی رحمه الله بیان می دارد که دانشمندان حدیث در گذشته در کتب خویش احادیث موضوع را ذکر می کردند با ذکر سند زیرا معتقد بودند چون حدیث را با سندش ذکر نموده اند خود در این مورد تبرئه نموده و مسؤلیت را به دیگران واگذار نموده تا در سند آن بنگرند .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;وچون امام طبری رحمه الله از علمای حدیث بود در کتاب خویش از این روش تبعیت می کند و در واقع او صاحب اخبار و روایاتی نیست که بیان می دارد بلکه روایات صاحبانی دارند که امام با ذکر نام آنها مسؤلیت را از دوش خود برداشته است ، و آن اشخاص در قدر و منزلت با یکدیگر متفاوتند و اخبار آنها از لحاظ ارزش علمی در یک سطح نمی باشد ، در میان این روایتها صحیح و نیز ضعیف و همچنین احادیث دروغین نیز مشاهده می شود که بر اساس صداقت و امانتداری راویان و یا دروغگو بودن آنها در این مورد حکم می شود. لهذا لازم است اسانید و متون روایات را بر اساس قواعد معتبر در نزد علماء بررسی نمود تا به درجه آن از لحاظ صحت و ضعف پی برد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;بنابر این در یک روش علمی آدرس دادن به تاریخ طبری و یا دیگر کتبی که روایات را با سند ذکر می کنند بدون بررسی سند روایت امری مطلوب نمی باشد، زیرا کسی که سند را ذکر می کند مسؤلیت را از دوش خود برداشته است .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;از دیگر نکات قابل ملاحظه در تاریخ طبری این است که یکی از دلایلی که امام طبری به ذکر روایتهای صحیح بسنده نمی کند این است ایشان می خواهند خواننده از دیدگاههای متفاوت دیگری که پیرامون مسئله وجود دارد آگاهی یابد و گاهی اوقات از مصادر غیر معتمد روایتی را نقل می کند حال اینکه اگر نیک بنگریم همین روایتها به هنگام معارضه با روایتهای دیگر چه بسا گره گشا خواهند بود و نقص هایی که در روایات دیگر وجود دارد را جبران می نمایند و یا چون در اصل حادثه با روایتهایی که از مصادر صحیح نقل می شوند اشتراک دارند تقویت می شوند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;همانا امام طبری و سایر علمای برجسته و مورد اعتماد در مسئله ذکر روایتهای ضعیف مانند قاضی و داوری هستند که هنگامی که می خواهند پیرامون قضیه ای جستجو کنند تمام ادله و شواهد متعلق به آن قضیه را جمع آوری می نمایند با وجود اینکه خود می دانند بسیاری از آنها پوچ و غیر قابل اعتماد است اما آنها هر چیز را به اندازه خودش می سنجند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;لهذا امام طبری رحمه الله به هیچ عنوان در ذکر اخبار کوتاهی نمی کند گرچه راوی خبر به ضعف متهم باشد زیرا امام خوف از این داشتند که با عدم نقل روایت دانسته ای و لو از برخی نواحی از بین برود اما امام طبری هر خبر را با سند به روایت کننده اش نسبت می دهد تا خواننده با اندیشیدن به حال راویان به صحت و یا ضعف خبر واقف شود ، بدینوسیله امام رحمه الله معتقد است حق خود را ادا نموده است خصوصا که وی تمام نصوصی را که بدستش رسیده و روایتهای مختلف آن را در مقابل خواننده قرار داده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;شیخ الإسلام ابن تیمیة رحمه الله در مورد فوائد ذکر خبر واحد از طرق متعدد ولو اینکه ضعیف باشند چنین می فرمایند: ( همانا تعدد طرق همراه با عدم اتفاق عادتا سبب آگاهی به مضمون منقول – یعنی قدر مشترک در اصل خبر- می شود و لکن این مسئله در مورد علم به احوال ناقلین سود زیادی نمی بخشد- یعنی درگیری میان آنها و جهتی که احتمال دارد بعضی بدان تعصب داشته باشند- در چنین مواردی از روایتهای انسانهای مجهول و یا دارای حافظه ضعیف نفع حاصل می شود، لهذا اهل علم چنین روایتهایی را ذکر نموده و می گفتند: برای شاهد گرفتن و اعتبار چیزهایی رواست که برای غیر آن روا نیست، و امام احمد رحمه الله می فرمود: گاهی اوقادث حدیث شخصی را ذکر می کنم فقط در راستای اعتبار.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;نیک است که بدین مسئله اشاره نبود که سعه صدر ائمه اهل سنت امثال امام طبری رحمه الله در نقل روایات مخالفین دلیل بر فهم و امانتداری آنها و نیز رغبتشان در این مورد بوده که خوانندگان از تمام اخبار وارد شده پیرامون حادثه آگاهی یابند ، در حالی که آنها بخوبی می دانستند که خواننده زیرک و آگاه در خواهد یافت که اشخاصی امثال ابومخنف و ابن کلبی پیرامون مسائلی که بدان تعصب دارند در موضع اتهام قرار دارند که شایسته است پیرامون روایتهایشان تحقیق و بررسی نمود تا حقائق را از شایعات و اخبار دروغین جدا ساخت.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;اما کسانی که در نقل اخبار از تاریخ طبری از هوای نفس پیروی می نمایند و یا از روش امام طبری رحمه الله غافل هستند و پیرامون راویان خبر تحقیق و تفحص نمی کنند و به ذکر نام تاریخ طبری و شماره صفحه در حاشیه کتاب بسنده می کنند و گمان می برند تنها وظیفه ای که بر دوش آنهاست همین است در واقع با این کرده خویش در حق امام طبری رحمه الله ستم روا می دارند و به وی اهانت می کنند ، و گناهی بر دوش امام طبری رحمه الله نیست پس از اینکه مصادر اخبار را در کتاب خویش ذکر نموده است ، بلکه وظیفه خواننده است که با تحقیق پیرامون مصادر روایات و اخبار به صحت و ضعف آنها پی ببرد .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;و این روش نمی توان از آن استفاده نمود مگر با آگاهی یافتن به علم جرح و تعدیل که به جستجو پیرامون احوال راویان می پردازد و شروط بهره گیری از اخبارشان را بیان می دارد ، همچنانکه شایسته است معیارهایی را که علماء در نقد متون روایات بیان داشته اند مراعات نمود خصوصا بیان ویژگی های عمومی مجتمع اسلامی و شرایط آن در ادوار تاریخ و تمامی این موارد شامل پردازش به تاریخ اسلامی می باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-bidi-language: FA&quot; dir=ltr&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT size=3 face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>اختلاف مسلمین در مورد حدیث غدیر خم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/234</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;اختلاف مسلمین در مورد حدیث غدیر خم&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
در هنگام تحقیق وقایع تاریخ اسلام و بررسی احادیث رسول الله صلی الله علیه و سلم متوجه روایاتی می شویم که در موقعیت ها و ظروفی ویژه و جهت بیان یا تاکید بر موضوعاتی خاص ایراد شده است. این گونه موارد، مجالی مناسب برای کسانی فراهم می آورد که در پی آنند تا بر اعتقادات و ادعاهای خویش دلیلی مناسب و محکم بیاورند لذا آن گونه که خود خواسته اند از این روایات بهره برده و چه بسا دیگران را نیز مورد نکوهش قرار داده اند.&lt;br /&gt;
بارزترین نمونه از این نوع روایات و وقایع، واقعه ی غدیر خم و حدیث مشهور به حدیث غدیر خم است که در سال پایانی حیات رسول الله صلی الله علیه و سلم در هنگام برگشت از حجة الوداع روز هجدهم ذی الحجة سال دهم هجری به وقوع پیوست که بعدها به عنوان اساس و ریشه اعتقادات شیعه در بحث امامت مورد توجه خاص قرار گرفت.&lt;br /&gt;
سعی بر آن داریم تا در این مختصر به بحث و بررسی تاریخی این واقعه از یک سوی و تحقیق معنای لغوی و اصطلاحی الفاظ حدیث از دیگر سوی بپردازیم و در ادامه دلایل هر قول را نیز مختصراً بیان کنیم لذا بحث را به ۶ بخش جداگانه تقسیم می کنیم: ۱- روایات وارده و تحقیق اسناد حدیث غدیر خم ۲- معنای لغوی و اصطلاحی لفظ ولی در قرآن و سنت و لغت ۳- سبب ورود حدیث غدیر ۴- احتجاج به حدیث غدیر ۵- قول شیعه و بررسی ادله آن ۶- قول اهل سنت و جماعت و بررسی ادله آن.&lt;br /&gt;
بخش اول: روایات وارده و تحقیق اسناد حدیث غدیر خم:&lt;br /&gt;
حدیث غدیر از طریق بعضی از صحابه و غالباً همراه با سبب ایراد آن در کتب حدیث آورده شده به گونه ای که اصل ورود آن را تایید می کند هر چند بخاری و مسلم آن را به این لفظ روایت نکرده اند. ذیلاً به نمونه هایی از این روایات از مشهورترین کتب حدیث اشاره می کنیم:&lt;br /&gt;
الف) مسند امام احمد:&lt;br /&gt;
براء بن عازب روایت می کند: در سفری همراه پیامبر بودیم، هنگام ظهر در منطقه ای به نام غدیر خم منزل کردیم، بعد از آن که نماز ظهر را خواندیم رسول الله صلی الله علیه و سلم دست علی بن ابی طالب را گرفتند و فرمودند: ( مَن کُنتُ مولاه فعلیّ مولاه، اللهم وال مَن والاه و عادِ مَن عاداه) سپس عمر بن خطاب علی را ملاقات کردند و به ایشان گفتند: (هنیئاً یا ابن ابیطالب أصبحتَ و أمسیتَ مولی کلّ مومن و مومنة)/ مسند امام احمد ۴/۲۸۱. این حدیث را به خاطر وجود علی بن زید که همان إبن جدعان باشد ضعیف دانسته اند. در روایتی دیگر عبدالرحمن بن ابی لیلی می گوید: در منطقه رَحبه (منطقه ای در عراق در نزدیکی قادسیه) علی را دیدم که مردم را سوگند می داد هر کس سخن پیامبر را در غدیر خم شنیده است بلند شود و گواهی دهد. ۱۲ نفر که همگی از اهل بدر بودند بلند شدند و بر شنیده خود گواهی دادند (مسند امام احمد۱/۱۱۹). بُریدة أسلمی این حدیث را همراه واقعه ای دیگر روایت می کند و می گوید:&lt;br /&gt;
همراه علی بن ابیطالب در سریه یمن بودیم و چون برگشتیم من به نزد پیامبر رفتم و از علی شکایت کردم، پیامبر چهره اش تغییر کرده و فرمودند: ای بریدة! آیا من أولی تر به مومنین از خودشان نیستم؟ گفتم: بله ای رسول خدا، ایشان فرمودند: (من کنت مولاه فعلی مولاه)/مسند امام احمد۵/۳۴۷.&lt;br /&gt;
ب) جامع الصحیح (سنن) ترمذی:&lt;br /&gt;
ترمذی این حدیث را یک جا بدون ذکر سبب خاص از زید بن أرقم روایت می کند (سنن ترمذی۵/۶۳۷) و در جایی دیگر از عمران بن حصین حدیث را با لفظی دیگر به بعد از سریه یمن، وقایع رخ داده در آن و شکایات مردم از علی نسبت می دهد که رسول الله صلی الله علیه و سلم را ناراحت کرده و فرمودند: ( ما تریدون مِن علی؟ ما تریدون من علی؟ إن علیّاً منّی و أنأ منه و هو ولی کلّ مومن بعدی) ترمذی این حدیث را حسن غریب می داند زیرا تنها از طریق جعفر بن سلیمان روایت شده که بسیاری از محدّثین او را به بدگویی ابوبکر و عمر متهم کرده اند (سنن ترمذی۵/۶۳۷ &amp;ndash; المستدرک حاکم۳/۱۱۰).&lt;br /&gt;
ج) سنن ابن ماجه:&lt;br /&gt;
ابن ماجه این حدیث را یک جا از ابن جدعان روایت می کند که بیان علت ضعفش گذشت (سنن ابن ماجه۱/۴۵) و در جایی دیگر روایت می کند که معاویه در مجلسی از علی نالید اما سعد بن ابی وقاص که در آنجا حاضر بود خطاب به او گفت: آیا درباره مردی سخن می گویی که رسول الله صلی الله علیه و سلم درباره او فرمود: ( مَن کنت مولاه فعلی مولاه) و ( أنت مِنّی بمنزلة هارون من موسی إلا أنه لا نبیّ بعدی ) و ( لأعطینّ الرایة رجلاً یحب الله و رسوله )/ سنن ابن ماجه۱/۴۵.&lt;br /&gt;
د) الخصائص نسأئی:&lt;br /&gt;
نسأئی از زید بن أرقم بعد از بیان قصه غدیر خم و اجتماع مردم، از پیامبر روایت می کند که فرمودند: ( من کنت ولیه فهذا ولیه، اللهم وال من والاه و عاد من عاداه)/خصائص ص۱۵.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;همچنین شبیه به روایت این حدیث را از طریق زید بن یثیع از عبدالرحمن بن ابی لیلی در رحبه روایت می کند/خصائص ص۱۶.&lt;br /&gt;
ابن جریر طبری مجموع طرق این حدیث را در دو مجلد صرفنظر از صحت و سقم آن جمع آوری کرده است. همچنین شیخ ناصر الدین ألبانی در سلسلة الصحیحة اکثر روایات وارده در مورد این حدیث را جمع آوری کرده و غالب آنها را صحیح دانسته است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بخش دوم: معنای (ولی) در قرآن و سنت و لغت:&lt;br /&gt;
ماده (ولی) دارای مشتقات متعددی در لغت عرب است که هر کدام خود معانی مختلفی دارند و بسیاری از این معانی در احادیث و بعضی در قرآن استفاده شده است. ذیلاً به بعضی از مشتقات این لفظ و معانی هر کدام اشاره می شود:&lt;br /&gt;
الف) مَولی: که دارای معانی مختلفی است مثل: ۱- صدیق و نصیر و مُحب ( فإخوانکم فی الدین و موالیکم/ أحزاب۵) (ذلک بأن الله مولی الذین آمنوا و أن الکافرین لا مولی لهم/ محمد۱۱) ،&lt;br /&gt;
(مُزینة و جُهینة و أسلم و غفار موالی الله و رسوله /بخاری مناقب۲و۶) (إنما أولیائی المتقون/ابوداود فتن۱). ۲- عصبیّت و ابن عم: (و إنی خفت الموالی من ورائی /مریم۵). ۳- حلیف و هم پیمان. ۴- معتِق و معتَق: (نهی رسول الله صلی الله علیه و سلم عن بیع الولاء و هبته /نسأئی۶/۱۲۳). ۵- ناصر: (نعم المولی و نعم النصیر /حج۷۸). ۶- ولی نعمت: (و هو کَلّ علی مولاه /نحل۷۶). ۷- مالک و عبد. ۸- ولی شرعی (أیما امرأة نکحت بغیر إذن مولاها - و فی روایة ولیّها &amp;ndash; فنکاحها باطل /ترمذی نکاح۱۴) (&amp;hellip;فلیملل ولیّه بالعدل /بقره۲۸۸) (السلطان ولیّ من لا ولیّ له /ترمذی نکاح۱۴).&lt;br /&gt;
ب) موالاة ضد معاداة: به معنای متابعت و پیروی کردن.&lt;br /&gt;
ج) وِلایة (با کسره واو) به معنای امارت و نصرت، و با فتحه واو (وَلایة) به معنای نسب و نصرت،&lt;br /&gt;
یعنی معنای نصرت برای لفظ ولایۀ در هر دو صورت (کسر و فتح واو) مشترک است.&lt;br /&gt;
د) أولی: به معنای تهدید و وعید (أَوْلَى لَكَ فَأَوْلَى &amp;nbsp;/قیامة۳۴).&lt;br /&gt;
بعضی دیگر از مشتقات این ماده عبارتست از: التّولیه، وَلّی، استَولی، التَولّی.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;با توجه به تعدد معنای (وَلی) در می یابیم که اطلاق معنایی خاص برای لفظ (مَولی) در حدیث غدیر کاری بسیار دشوار است و نیاز به قرینه دارد. امام شافعی رحمة الله علیه می گوید:&lt;br /&gt;
مقصود ولایت اسلام است چنانچه خداوند می فرماید: (ذَلِكَ بِأَنَّ اللَّـهَ مَوْلَى الَّذِینَ آمَنُوا وَأَنَّ الْكَافِرِینَ لَا مَوْلَى لَهُمْ/محمد۱۱).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بخش سوم: سبب ورود حدیث&lt;br /&gt;
چنانچه در بخش بررسی روایات حدیث غدیر نیز بیان شد تعدادی از طرق روایت این حدیث به صورت مطلق و بدون اشاره به سببی خاص نقل شده است اما گروه دیگری از روایات همراه با سبب ورود برای این حدیث نقل شده است که مجموع آنان به دو سبب بر می گردد: ۱- سریه علی بن ابیطالب به سوی یمن ۲- برگشت پیامبر از حجة الوداع و نزول آیه (یا أیها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربّک&amp;hellip; /مائده۶۷). ذیلاً به هر کدام از این دو سبب ورود به صورت خلاصه اشاره می کنیم:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الف) سریه علی بن ابیطالب به سوی یمن:&lt;br /&gt;
رسول الله صلی الله علیه و سلم در سال دهم هجری خالد بن ولید را به سوی اهل یمن فرستاد تا آنان را به اسلام دعوت کند اما چون بعد از شش ماه نتیجه ای نگرفت علی بن ابیطالب را با تعدادی به یمن فرستاد تا جانشین خالد شود. علی بن ابیطالب می گوید: به پیامبر گفتم: مرا به سوی قومی می فرستی که مُسن تر از من هستند و من جوانم و قضاوت نمی دانم. پیامبر دست بر سینه ام گذاشت و فرمود: (اللهم ثبّت لسانه واهد قلبه). علی بن ابیطالب چون به نزدیکی یمن رسید مردم به استقبال او آمدند و علی نیز بعد از نماز صبح، نامه پیامبر را برای ایشان قرائت کرد و سبب شد قبیله همدان مسلمان شوند و دیگر طوائف یمن نیز در پی آنان مسلمان شدند. علی قضیه اسلام آنان را طی نامه ای به رسول الله صلی الله علیه و سلم خبر داد و ایشان نیز از این خبر بسیار خوشحال شدند. (تاریخ الأمم و الملوک طبری ۳/۱۳۲).&lt;br /&gt;
بخاری شبیه به این حکایت را روایت می کند اما علت فرستاده شدن علی را گرفتن خُمس می داند و از بُریده أسلمی روایت می کند: من به سبب اینکه علی بن ابیطالب بهره ای از خمس را برای خود برداشته بود ناراحت شدم لذا بعد از برگشت قضیه را برای پیامبر بازگو کردم اما ایشان فرمودند: ای بریده! آیا از علی ناراحت شدی؟ گفتم: آری، ایشان فرمودند: از او ناراحت مباش زیرا او بیش از آن در مال صدقه حق دارد. (فتح الباری ۸/۵۴). ابن حجر و امام احمد (مسند۵/&lt;br /&gt;
۳۴۷) روایات دیگری را نیز از سبب ناراحتی بریده آورده اند. ترمذی از عمران بن حصین روایتی را ذکر می کند که علی از مال خمس کنیزی را برای خود برداشت و همین سبب ناراحتی دیگران شد و چون به پیامبر رسیدند به نزد ایشان شکایت کردند اما پیامبر در پاسخ فرمودند: (ما تریدون من علی؟ ما تریدون من علی؟ إن علیّاً منّی و أنأ منه و هو ولی کل مومن بعدی). (سنن ترمذی۵/۶۳۲).&lt;br /&gt;
ابن کثیر از یزید بن رکانۀ ضمن حکایت سریه علی به یمن روایت می کند: علی برای اینکه زودتر به مکه برسد و در حجۀ الوداع همراه پیامبر باشد شخصی را جانشین خودش ساخت و خود به مکه رفت. چون لشکر به مکه نزدیک شد علی به استقبال آنان رفت اما مشاهده نمود که آنان از لباس بیت المال (جزیه) پوشیده اند لذا از آنان ناراحت شد و امر کرد که لباس ها را بیرون بیاورند. همین امر سبب ناراحتی آنان شد و آن گاه که به نزد پیامبر رسیدند از علی شکایت کردند. إبن کثیر در تحلیل این قضیه می گوید: چون قیل و قال و شکایت درباره علی زیاد شد پیامبر در راه برگشت از حجۀ الوداع به مدینه، آنان را در غدیر خم جمع کرد تا ذهنیت آنان را نسبت به علی اصلاح کند. (البدایۀ و النهایۀ مجلد سوم ص۱۰۶). روایات دیگری از این حدیث، حاکی از آن است که پیامبر بعد از برگشت به مدینه نیز به مناسبتی این حدیث را تکرار کرده است.&lt;br /&gt;
ب) نزول آیه تبلیغ (یا أیها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربک فإن لم تفعل فما بلّغت رسالته والله یعصمک من الناس والله لا یهدی القوم الکافرین /مائده۶۷).&lt;br /&gt;
بعضی از محدثین و مفسرین روایات ضد و نقیضی را از أبی سعید خدری، عبدالله بن مسعود و عبدالله بن عباس در مورد سبب نزول آیه ذکر کرده اند. ابن مردویه و ابن أبی حاتم و إبن عساکر روایتی را از أبی سعید خدری نقل می کنند مبنی بر اینکه این آیه در غدیر خم در مورد علی بن ابیطالب نازل شده است (تاریخ دمشق۴۲/۲۳۷) اما در روایتی دیگر ابن ابی حاتم از عنتره روایت می کند که افرادی به ابن عباس گفتند: اگر چیز ناگفته ای نزد توست برای ما باز گوی؛ ایشان در جواب گفتند: آیا نمی دانید که خداوند فرمود: (یا أیها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربک &amp;hellip;) و&lt;br /&gt;
رسول الله نیز چیزی را برای ما ناگفته نگذاشت (فتح القدیر۲/۵۷). همچنین ابن أبی حاتم از جابر بن عبدالله انصاری در ضمن حکایتی از یکی از غزوه های پیامبر (غزوه ذات الرقاع و نقشه قتل پیامبر)، نزول این آیه را به آن حکایت نسبت می دهد (تفسیر ابن کثیر۲/۷۹). همچنین ابن مردویه از ابن عباس روایت می کند که از پیامبر در مورد سخت ترین آیه ای که بر ایشان نازل شده پرسیدند و ایشان پاسخ دادند: من در منطقه مِنی در موسم حج (اوائل بعثت) بودم و مشرکین مرا احاطه کرده بودند که جبرئیل این آیه را بر من نازل کرد؛ من نیز بر خاستم و مردم را به توحید و قبول رسالت فرا خواندم اما هیچ کس باقی نماند مگر آن که بر صورت من سنگ و خاک و آب دهان پاشید (فتح القدیر۲/۵۷). همچنین ابن مردویه در روایتی دیگر از عائشه و ابی سعید خدری به سبب نزول دیگری برای این آیه اشاره می کند.&lt;br /&gt;
امام فخر رازی در تفسیر کبیر به ۱۰ سبب مختلف درباره نزول این آیه اشاره می کند و نهایتاً یک روایت را ترجیح می دهد و می گوید: با وجود تعدد روایات، اما أولی تر آنست که آیه را به ایمن داشتن پیامبر از مکر یهود و نصاری نسبت دهیم تا اینکه پیامبر بعد از نرول این آیه بدون ترس به تبیلغ دین بپردازد، و این با قبل و بعد آیه نیز مناسبتی کامل دارد (تفسیر کبیر۱۲/۴۹).&lt;br /&gt;
اکثر روایاتی که سبب نزول آیه را قبل از واقعه غدیر خم می داند در ادامه به نزول آیه (الیوم أکملت لکم دینکم و أتممت علیکم نعمتی و رضیت لکم الإسلام دینا /مائده۳) بعد از حدیث غدیر خم اشاره می کند زیرا امامت علی بن ابیطالب را در حکم کامل شدن دین و إتمام نعمت پروردگار بر بندگان می دانند (تاریخ دمشق۴۲/۲۳۷) در حالی که در صحیح بخاری آمده است:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;یهود به عمر بن خطاب گفتند: شما در کتابتان آیه ای را می خوانید که اگر درباره ما نازل شده بود آن روز را عید می گرفتیم. عمر به آنان گفتند: من می دانم که آن آیه کی و کجا نازل شده و پیامبر در آن زمان کجا بوده است؛ آن در روز عرفه بود و ما نیز در سرزمین عرفه بودیم (فتح الباری۸/۲۱۸). امام مسلم به این روایت اضافه می کند: و آن روز جمعه بود (مسلم تفسیر۴). در همین معنا از امام احمد و ترمذی نیز احادیثی نقل شده است. ابن جریر از طریق سفیان بن وکیع از عنتره روایت می کند که چون در روز حج اکبر آیه (الیوم اکملت لکم دینکم &amp;hellip;) نازل شد عمر گریه کرد؛ پیامبر از ایشان پرسیدند: چه چیزی تو را به گریه انداخت؟ ایشان گفتند: (أبکانی أنّا کنّا فی زیادۀ من دیننا فأما إذا کمل فإنه لم یکمل شیء إلا نقص) تفسیر طبری۶/۵۲.&lt;br /&gt;
با توجه به روایاتی که بعضی از آنها ذکر شد در می یابیم که نسبت دادن نزول آیه ( یا ایها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربک &amp;hellip;) و همچنین آیه (الیوم أکملت لکم دینکم و أتممت علیکم نعمتی و رضیت لکم الإسلام دینا) به قضیه غدیر خم و بحث امامت و خلافت علی بن ابیطالب نیاز به توجیهات و تاویلات فراوانی دارد که چه بسا سبب ردّ و یا تضعیف روایات صحیح تر دیگری شود.&lt;br /&gt;
بخش چهارم: احتجاج به حدیث غدیر خم&lt;br /&gt;
بررسی احتجاج به مضموم و مفهوم حدیث غدیر خم می تواند طریقی مهم و مفید جهت رسیدن به نتایج مناسب در مورد مقصود از ایراد این حدیث باشد. اما روایات صحیحی که در این زمینه بتوان بر آن اعتماد نمود وجود ندارد و مجموع روایات دارای صورت هایی از ضعف و غرابت هستند اما به بعضی از این روایات به فرض صحت آنها اشاره می کنیم:&lt;br /&gt;
الف) مناشده علی بن ابی طالب در رحبه:&lt;br /&gt;
بارزترین روایت در این زمینه روایت منسوب به عبدالرحمن بن ابی لیلی در مسند امام احمد (۱/۱۱۹) است که در بخش اول به آن اشاره شد (روایت مناشده علی بن ابی طالب در رحبه که از اهل بدر خواست بر شنیده ی خود در روز غدیر گواهی دهند). این روایت را ابن حجر نیز نقل می کند اما بعضی از رجال سند آن را منسوب به رفض و حدیث را ضعیف می داند. (الاصابۀ فی تمییز الصحابۀ۲/۴۰۸-۴/۸۰) همچنین ابن کثیر این روایت را از امام احمد نقل می کند و آن را غریب می داند (البدایۀ و النهایۀ۵/۲۴۳) و حتی هیثمی نیز در کتابش این روایت را ضعیف دانسته است (مجمع الزوائد۹/۱۰۷). با وجود چشم پوشی از ضعف این روایت، اگر به تاریخ و مکان ایراد این روایت برگردیم در می یابیم علی بن ابیطالب در کوفه و در سال ۳۵ هجری یعنی در زمان خلافتش به حدیث غدیر احتجاج می کند تا&amp;nbsp;&amp;nbsp;بدین وسیله توجه مردم شرور کوفه را به خود جلب کند تا چه بسا از عناد و مخالفت های خویش دست بردارند لذا بعید است که علی خواسته باشد در آن موقعیت و در میان آن قوم، سخنی از غصب خلافت و حقوق خویش و آن نیز در میان آن قوم زده باشد.&lt;br /&gt;
ب) احتجاج علی به حدیث غدیر در روز جمل:&lt;br /&gt;
مسعودی در مروج الذهب روایت می کند: سپس علی طلحه را صدا زد و گفت: ای أبا محمد! چه چیزی تو را خارج کرده است؟ طلحه گفت: طلب خون عثمان. علی گفت: خداوند هلاک کند آن را که مستحق تر به خون عثمان است، آیا نشنیدی که رسول الله صلی الله علیه و سلم فرمودند: (اللهم وال مَن والاه و عاد من عاداه) و تو نیز اولین کسی بودی که بیعت کردی اما نقض عهد کردی؟ پس طلحه با شنیدن این سخنان استغفار کرده و برگشت (مروج الذهب۲/۳۷۳). این حدیث را مسعودی روایت کرده و حاکم در مستدرک آن را ضعیف دانسته است اما با وجود آن، چون به مضمون روایت بنگریم در می یابیم که مناظره علی با طلحه قبل از واقعه جمل صرفاً به خاطر پیشگیری از وقوع جنگ بین مومنین و لزوم نصرت علی به عنوان امیر المومنین است و بدین خاطر نیز علی بن ابی طالب به قسمت اول حدیث (من کنت مولاه فعلی مولاه) اشاره ای نمی کند.&lt;br /&gt;
ج) سلام انصار به علی در رحبه:&lt;br /&gt;
امام احمد از ریاح بن حرث روایت می کند: گروهی در رحبه به نزد علی بن ابیطالب آمدند و گفتند: (السلام علیک یا مولانا!) علی در جواب گفتند: چگونه من مولای شما هستم در حالی که شما قومی عرب هستید؟ آنان گفتند: شنیدیم که پیامبر در روز غدیر فرمودند: (من کنت مولاه فعلی مولاه). ریاح بن حرث می گوید: چون رفتند در پی آنان رفتم و پرسیدم اینان چه کسانی بودند؟ گفته شد: گروهی از انصار که ابوایوب انصاری نیز در میان آنان بود (مسند امام احمد۵/۴۱۹). ظاهر این روایت نشان می دهد که برداشت آنان از معنای مَولی غیر از معنایی بود که در لغت عرب استعمال می شد و بدین سبب بود که علی بر قول آنان اعتراض کرد. در روایتی دیگر آمده است که آنان از لفظ مَوالی استفاده کردند (مَوالیک یا أمیر المومنین) و علی نیز معنای حقیقی لفظ مَولی را برای آنان بیان کرد اما راوی از ذکر آن معنا خودداری کرده است (مسند امام احمد۵/۴۱۹). شاید مقصود آنان معنای رعیت و مرئوس بود در حالی که علی بر اساس لغت معنای ناصر و مُحب را در نظر داشت و در این صورت از این روایت می توان در بحث معنای لغوی لفظ (مَولی) استفاده کرد.&lt;br /&gt;
بخش پنجم: قول شیعه در مورد حدیث غدیر خم و دلائل آن:&lt;br /&gt;
شیعه این حدیث را نص و دلیلی قاطع بر خلافت علی بن ابیطالب می داند و بر گفته ی خویش دلائلی می آورد که مهمترین آن در ذیل آورده می شود و مورد بررسی قرار می گیرد:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دلیل اول: نزول آیه (أَیُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَیْكَ مِن رَّبِّكَ )&lt;br /&gt;
روایتی که نزول آیه را به قضیه غدیر خم نسبت می دهد در بخش سوم ذکر شد لذا در اینجا به کیفیت استدلال به این آیه می پردازیم:&lt;br /&gt;
علامه مجلسی در بحارالأنوار می گوید: (خبرهای گذشته در مورد نزول آیه ( یا ایها الرسول بلغ &amp;hellip;) بیانگر آنست که مراد از مَولی (در حدیث غدیر) همان أولی به تصرف یعنی امام و خلیفه است زیرا تهدید پروردگار به اینکه اگر امر خداوند را ابلاغ نکنی هیچ امری از رسالتت را ابلاغ نکرده ای و همچنین ضمانت عصمت برای او اقتضاء می کند مقصود آیه ابلاغ حکمی مهم باشد که ابلاغش اصلاح دین و دنیا را برای همه مردم در بر داشته باشد تا به وسیله ی آن حلال و حرام تا روز قیامت مشخص شود. لذا پذیرش آن بر مردم سخت آمد؛ در احتمالات معنای مَولی نیز معنای خلافت از همه قوی تر است و مقصود خلافت علی است زیرا به وسیله آن احکام دین باقی می ماند و امور مسلمانان سامان می یابد و چون کینه مردم (که غالب آنان نیز منافق بودند) مظنّه برپایی فتنه بود پس خداوند تضمین نمود که پیامبر را از شر آنان مصون بدارد (بحار الانوار۳۷/۲۴۹).&lt;br /&gt;
بررسی سبب نزول آیه تبلیغ و همچنین بحث معنای لغوی لفظ مَولی ( به ترتیب در بخش سوم و اول) گذشت اما در مورد دیگر ادعاهایی که علامه مجلسی جهت اثبات خلافت علی و فوائد آن ذکر کرده است تنها شایسته است به این مطلب اشاره شود که با وجود آنکه خلافت بعد از رسول الله صلی الله علیه و سلم به علی بن ابی طالب نرسید اما بسیاری از دغدغه ها و فوائدی که ایشان برای خلافت علی برشمرده اند برآورده شد لذا نمی توان ادعا نمود که اصلاح امور مسلمین بعد از رحلت پیامبر به خلافت علی بن ابی طالب متوقف بوده است. همچنین لازم به ذکر است که بدنیّتی و نسبت نفاق به اصحاب رسول الله صلی الله علیه و سلم ادعایی بزرگ و خطرناک به حساب می آید که ساحت پیامبر و یاران بزرگوارش رضوان الله تعالی علیهم أجمعین از آن بری و پاکیزه است.&lt;br /&gt;
علامه طباطبائی در تفسیر مشهور المیزان در تناسب موضوع آیه تبلیغ با محور کلی سوره مائده (بحث اهل کتاب) می گوید: در زمان نزول این آیه، قدرت و شوکت اهل کتاب شکسته شده بود لذا دلیلی بر ترس پیامبر از آنان وجود نداشت بنابراین این آیه با محور کلی سوره تناسبی ندارد و این آیه ای منفرد و جداست که جداگانه نیز نازل شده است (المیزان فی تفسیر القرآن۶/۴۲).&lt;br /&gt;
در سخن علامه طباطبائی دو نکته قابل تأمل است: اولاً لفظ (یا ایها الرسول) تنها دو مرتبه در قرآن آمده است؛ مرتبه اول در آیه ۴۱ همین سوره که به اتفاق اکثر مفسرین در مورد یهود نازل شده است و مرتبه دوم نیز در آغاز آیه تبلیغ که در مضمون خطاب آن تردید کرده اند اما آنچه بدیهی است استفاده از لفظ (رسول) جهت انکار عدم اعتقاد به رسالت پیامبر است لذا بعید می نماید که مقصود افرادی از مومنین باشند که جان و مال خویش را فدای رسول الله صلی الله علیه و سلم کرده اند. ثانیاً ادعای شکسته شدن شوکت یهود در هنگام نزول این آیه در صورتی صحیح است که بتوان زمان نزول آیه را به بعد از حجۀ الوداع نسبت داد و این مستلزم انکار و ردّ روایات صحیحی است که زمان نزول آیه را به مکه نسبت می دهد لذا پذیرش آن از لحاظ علمی ناصحیح است.&lt;br /&gt;
همچنین در مورد پایان این آیه (إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ)، شیعه معتقد است که اولاً مقصود کسانی است که در اطراف پیامبر بودند و ثانیاً عدم هدایت آنان به معنای عدم توفیق آنان در اجرای مکر و کیدشان است (المیزان۶/۵۲). این سخن از دو جهت قابل نقد است: اولاً نسبت کفر به اصحاب پیامبر سخنی گزافه است که از آن به خدا پناه می بریم ثانیاً طبق رأی شیعه،&lt;br /&gt;
چگونه خداوند جلو مکر اصحاب پیامبر را گرفت در حالی که آنان خلافت را از علی غصب نمودند.&lt;br /&gt;
لذا مقصود از کفر در این آیه طبق رأی مفسرین، کتمان و انکار آیات پروردگار است که یهود مرتکب آن بود (أفتؤمنون ببعض الکتاب و تکفرون ببعض&amp;hellip;/بقره۸۵). و آخرین ادعای شیعه در مورد این آیه اینکه خداوند این آیه را عمداً در سوره مائده و در سیاق موضوع اهل کتاب قرار داده است تا مبادا کسی از وجود آن آگاهی یابد و در پی تحریف آن برآید (تفسیر نمونه۴/۲۷۰).&lt;br /&gt;
دلیل دوم: نزول آیه (ألیوم أکملت لکم دینکم و أتممت علیکم نعمتی و رضیت لکم الإسلام دینا)&lt;br /&gt;
شیعه معتقد است نزول این آیه بعد از قضیه غدیر و اعلان جانشینی علی بن ابیطالب از سوی پیامبر است و شاهدی است بر اینکه خلافت ایشان در حکم تکمیل کننده ی دین و تمام کننده ی نعمت پروردگار بر مردم است زیرا امامت اصلی عظیم از اصول دین است (خلاصۀ عبقات الأنوار فی إمامۀ الأئمۀ الأطهار۸/۲۷۵).&lt;br /&gt;
چنانچه در سبب نزول این آیه گذشت جمع کثیری از محدثین مثل بخاری، مسلم، احمد، ترمذی،&lt;br /&gt;
نسأئی، ابن جریر، ابن منذر، ابن حبان و بیهقی روایت کرده اند که این آیه در موسم حجۀ الوداع و روز عرفه (که مصادف با روز جمعه بود) بر پیامبر نازل شده است بنابراین در اینجا تنها به بعضی از وجوه استدلال به این آیه طبق نظر شیعه اکتفا می کنیم:&lt;br /&gt;
صاحب تفسیر المیزان بعد از بیان و مردود دانستن تمامی احتمالات موجود در مورد نزول این آیه می گوید: بعید نیست که منظور از لفظ کافرین در قسمت اول این آیه (الیوم یئس الذین کفروا من دینکم فلا تخشوهم واخشون، الیوم أکملت لکم دینکم &amp;hellip;) طبق آیه ۱۰۹ سوره بقره (ودّ کثیر من أهل الکتاب لو یردّونکم من بعد ایمانکم کفّارا حسداً من عند أنفسهم من بعد ما تبیّن لهم الحق فاعفوا و اصفحوا حتی یأتی الله بأمره&amp;hellip;) کفار از اهل کتاب باشند و مقصود از فرا رسیدن امر پروردگار در آیه ۱۰۹ سوره بقره (حتی یأتی الله بأمره) تبلیغ امر خداوند و اتمام نعمت بر مومنین به وسیله ولایت علی بن ابیطالب باشد زیرا به وسیله ولایت و امامت ایشان، اهل کتاب از دین اسلام مأیوس شدند لذا بدین ترتیب اشکال عدم تناسب آیات سوره مائده نیز برطرف می شود (المیزان فی تفسیر القرآن۵/۱۷۶).&lt;br /&gt;
اولاً تناقص در گفتار گذشته و حال صاحب المیزان کاملاً روشن است زیرا ایشان در تفسیر آیه تبلیغ سعی بر آن داشتند تا لفظ (کافرین) را به اصحاب پیامبر نسبت دهند اما در اینجا این کفر را با استفاده از آیه ای دیگر به اهل کتاب نسبت دادند ثانیاً این سخنی سنگین است که ادعا شود پیامبر در طول دوران مبارزاتش نتوانسته اهل کتاب را مایوس کند تا اینکه ولایت علی بن ابی طالب آنان را از ضربه زدن به اسلام مأیوس می سازد.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
فخر رازی نیز در تفسیر خویش با استدلال عقلی، به انکار قول شیعه در مورد این آیه می پردازد (تفسیر کبیر۱۱/۱۳۹).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دلیل سوم: نزول آیه (سَأَلَ سَائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ )&lt;br /&gt;
بعضی از تفاسیر شیعی از امام جعفر صادق نقل می کنند: آنگاه که پیامبر صلی الله علیه و سلم علی را به جانشینی منصوب کردند و فرمودند: (من کنت مولاه فعلی مولاه) این خبر در همه جا پیچید. پس نعمان بن حارث فهری به نزد پیامبر آمد و گفت: ما را امر کردی که به یگانگی خداوند گواهی دهیم و اینکه تو فرستاده او هستی و ما را به جهاد و حج و روزه و نماز و زکات امر کردی پس ما نیز پذیرفتیم سپس راضی نشدی تا اینکه غلامی را بر ما حاکم ساختی و گفتی: (من کنت مولاه فعلی مولاه) پس آیا این امری از سوی توست یا خداوند؟ پیامبر فرمودند: بلکه از نزد خداوند است. نعمان پشت کرد و گفت: (اللهم إن کان هذا هو الحق من عندک فأمطر علینا حجارۀ من السماء أو ائتنا بعذاب ألیم /أنفال۳۲). خداوند نیز سنگی از آسمان نازل کرد و او را هلاک نمود سپس خداوند این آیه را نازل فرمود: (سأل سائل بعذاب واقع) /المیزان فی تفسیر القرآن۲۰/۱۱).&lt;br /&gt;
سبب نزول این آیه در اکثر کتب حدیث و تفسیر مشهور است. بخاری از انس بن مالک روایت می کند: ابوجهل گفت: (اللهم إن کان هذا هو الحق من عندک فأمطر &amp;hellip;) پس خداوند نیز این آیه را نازل کرد: (و ما کان الله لیعذبهم و أنت فیهم و ما کان الله معذبهم و هم یستغفرون) (فتح الباری۸/۲۴۸). همچنین ابن جریر طبری از ابن عباس و مجاهد در مورد آیه (سأل سائل بعذاب واقع) روایت می کند: این آیه در جواب درخواست عذاب از سوی کفار نازل شد (جامع البیان فی&amp;nbsp;&amp;nbsp;تفسیر القرآن۲۹/۴۴).&lt;br /&gt;
دلیل چهارم: شعر حسان بن ثابت&lt;br /&gt;
بعضی از کتب ضمن نقل قضیه غدیر خم، ابیاتی را از حسان بن ثابت روایت می کنند که به&lt;br /&gt;
تفسیر و تشریح حدیث غدیر می پردازد. خوارزمی در کتاب المناقب از ابی سعید خدری روایت&lt;br /&gt;
می کند که بعد از قضیه غدیر و نزول آیه (أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا) حسان به پیامبر گفت: اجازه بدهید تا ابیاتی بگویم؛ پیامبر به ایشانفرمودند: (قل علی برکۀ الله)؛ سپس حسان این ابیات را سرود:&lt;br /&gt;
&amp;laquo; ینادیهم یوم الغـدیر نبیّهم&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;*&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;بخـمّ واسمـع بالرسول منادیا&lt;br /&gt;
بأنی مولاکم نعم و ولیکم&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;*&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;فقالوا و لم یبدوا هناک التقامیا&lt;br /&gt;
إلهک مولانا و أنت ولینا&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;*&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;فلا تجدن فی الخلق للأمر عاصیا&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;فقال له قم یا علیّ فإننی&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;*&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;رضیتک من بعدی إماماً و هادیا &amp;raquo;.&lt;br /&gt;
وجه استدلال به این ابیات آنست که سراینده ی آن صحابی است و با اجازه و در حضور رسول الله صلی الله علیه و سلم سروده شده و مورد تقریر پیامبر واقع شده است اما این ابیات را تنها در کتبی می توان یافت که مورد استدلال شیعه است مثل (کشف الغمّۀ فی معرفۀ الأئمۀ،&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;تذکرۀ الخواص، فرائد السمطین و مناقب خوارزمی). با نگاهی به این روایت در می یابیم که مجموع روات، آن را از طریق ابی هارون عبدی (عمارۀ بن جوین عبدی بصری) روایت کرده اند و او کسی است که مورد تکذیب اکثر محدّثین واقع شده است. ابن حجر می گوید: چگونه او را متهم به کذب نکنند در حالی که ابن عدی در الکامل از بهز بن أسد روایت می کند: به نزد ابی هارون عبدی رفتم و گفتم: چیزی از آنچه از ابی سعید نوشته ای برایمان بیاور. او کتابی آورد که در آن نوشته بود: از أبی سعید شنیدم که می گفت: (عثمان را در قبرش نهادند در حالی که کافر به خداوند بود). به او گفتم: آیا بر این گفته اقرار داری؟ او گفت: دقیقاً همان است که دیدی. پس کتاب را به سویش انداختم زیرا این کذبی بزرگ بر أبی سعید خدری است (تهذیب التهذیب۴/۲۴۸).&lt;br /&gt;
این اصلی ترین دلائل شیعه بود که در کتب مختلف شیعه در مورد حدیث غدیر خم به آن استدلال شده است.&lt;br /&gt;
بخش ششم: قول اهل سنت و جماعت در مورد حدیث غدیر خم:&lt;br /&gt;
محمد رشید رضا در تفسیر المنار می گوید: اهل سنت می گویند این حدیث (حدیث غدیر خم) دلالت بر ولایت به معنای امامت و خلافت نمی کند و این معنا در قرآن نیامده است بلکه مراد از لفظ ولایت، ولایت نصرت و مودتی است که خداوند آن را در میان مومنین جاری ساخته است (والمومنون و المومنات بعضهم أولیاء بعض /توبه۷۱) و معنای این حدیث چنین است که هر کس من ناصر و محبّ او هستم پس علی نیز ناصر و مُحب اوست یا به عبارتی دیگر کسی که مرا دوست دارد و نصرت می دهد علی را دوست بدارد و نصرت دهد (تفسیر المنار۶/۴۶۵).&lt;br /&gt;
این خلاصه عقیده اهل سنت و جماعت است و بر قول خویش دلائلی از قرآن، سنت، لغت عرب و تاریخ می آورند که مشهورترین آنها عبارتست از:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دلیل اول: مولی به معنای أولی به تصرف نیامده است&lt;br /&gt;
آلوسی در تفسیر روح المعانی می گوید: از لحاظ لغوی، لفظ مَولی به معنای أولی به تصرف نمی آید و اهل لغت بر این مطلب اقرار دارند و می گویند: وزن مَفعل هیچ گاه به معنای أفعل نمی آید و اگر نیز آن را جایز بدانیم منحصراً به معنای أولی به تصرف نمی آید بلکه احتمال دارد أولی به محبت، أولی به تعظیم و أمثال آن بیاید و چه بسیار مواضعی که لفظ أولی آمده است اما نمی توان آن را أولی به تصرف معنا نمود مثل این سخن پروردگار (إن أولی الناس بإبراهیم للذین اتّبعوه و هذا النبی والذین آمنوا) /برگرفته از روح المعانی۶/۱۹۵.&lt;br /&gt;
إبن تیمیه می گوید: میان ولی و مَولی و امثال آن با لفظ والی فرق است؛ باب ولایت که در معنا ضد عداوت است متفاوت است با باب ولایتی که به معنای امارت است. معنای حدیث (غدیر) ولایتی است که ضد عداوت است و پیامبر نفرمودند: (مَن کنت والیه فعلیّ والیه) بلکه فرمودند: (مَن کنت مولاه فعلیّ مولاه) و معنا نمودن مَولی به والی باطل است (منهاج السنۀ النبویّه۴/۸۷).&lt;br /&gt;
روح المعانی می گوید: سخن پیامبر طبق روایات (اللهم وال من والاه و عاد من عاداه) است و اگر مقصود أولی به تصرف بود یقیناً پیامبر می فرمود: (اللهم وال من کان فی تصرفه و عاد من لم یکن کذلک) بنابراین مقصود پیامبر ایجاب محبت و مودت علی کرّم الله وجهه است و اگر مقصود خلافت ایشان بود حتماً به آن تصریح می کردند (روح المعانی۶/۱۹۵).&lt;br /&gt;
همچنین دلیلی وجود ندارد که مشخص کند مقصود پیامبر از لفظ مَولی در دو طرف حدیث (مَولی و والِ) متفاوت بوده است و بدیهی است اگر مقصود از دعای پیامبر (اللهم وال من والاه) أولی به تصرف و امارت باشد لازم است هر کس علی را امام بداند خود نیز به مقام امامت برسد و این امری باطل است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دلیل دوم: در خطبه حجۀ الوداع سخنی از خلافت به میان نیامده است&lt;br /&gt;
ابن هشام از ابن اسحاق در مورد حجۀ الوداع نقل می کند: پیامبر بعد از انجام مناسک حج&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;خطبه ای ایراد نمود و فرمود: ای مردم! سخن مرا بشنوید چه بسا بعد از این دیگر مرا در این موقف نبینید. سپس مردم را نسبت به امور مختلفی متذکر شدند سپس فرمودند: ای مردم!&lt;br /&gt;
سخنم را بگیرید زیرا من به شما ابلاغ کردم و در میان شما بر جای گذاشتم آنچه را که اگر به آن پایبند باشید هیچ گاه گمراه نمی شوید: کتاب خداوند و سنت پیامبرش. سپس مردم را به رعایت دوستی و برادری دعوت نمودند و سپس فرمودند: (اللهم هل بلّغت؟) آیا ابلاغ کردم؟ مردم پاسخ دادند: آری ای رسول خدا؛ ایشان فرمودند: پروردگارا شاهد باش. (السیرۀ النبویّه ابن هشام۴/۲۵۱).&lt;br /&gt;
از روایت فوق چند مطلب قابل برداشت است: اولاً این آخرین موقف عمومی است که پیامبر در آن به ایراد سخن می پردازد لذا اصول احکام و نصایح را در آن به مردم متذکر می شود و تأکید می فرماید که مردم باید آن را خوب به خاطر بسپارند؛ ثانیاً عبارت (اللهم هل بلّغتُ؟) بیانگر آنست که هر آنچه رسول الله صلی الله علیه و سلم در این خطبه ایراد می کنند مصداق و مضمون آن چیزی است که خداوند به ایشان امر کرده است تا به مردم ابلاغ نمایند اما در آن هیچ اشاره ای به خلافت بعد از خود نمی کند در حالی که مناسب ترین جایگاه به حساب می آمد.&lt;br /&gt;
دلیل سوم: آیه تبلیغ نمی تواند بعد از حجۀ الوداع نازل شده باشد&lt;br /&gt;
ابن تیمیه در منهاج السنۀ می گوید: این آیه (آیه تبلیغ نمی تواند بعد از حجۀ الوداع نازل شده باشد زیرا پیامبر قبل از آن، همه چیز را ابلاغ نموده بود و در آن زمان ترسی از کسی نداشت که نیازی به محافظت الهی داشته باشد بلکه در حجۀ الوداع تمامی کسانی که از مکه و مدینه و دیگر نواحی حضور داشتند مسلمان و فرمانبردار پیامبر بودند و منافقین نیز علیرغم اصرار بر نفاق خویش، کسی در میان آنان نبود که بخواهد با پیامبر مخالفت کند یا اینکه پیامبر از او ترسی داشته باشد پس دلیلی وجود ندارد که خداوند در چنین مرحله ای بگوید: ابلاغ کن آنچه خدا به تو امر کرده است زیرا اگر ابلاغ نکنی رسالتت را ابلاغ نکرده ای و خداوند تو را از دشمنی مردم مصون می دارد (منهاج السنۀ النبویّۀ۴/۸۵).&lt;br /&gt;
دلیل چهارم: پیامبر بعد از رجوع از حجۀ الوداع تا زمان رحلت به امر خلافت اشاره ای نکردند&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر حدود ۸۰ روز بعد از برگشت از حجۀ الوداع رحلت کردند و بیش از ۱۰ روز در بستر بیماری بودند و در زمان بیماری به چندین امر مهم اشاره کردند که مهمترین آنها عبارتست از:&lt;br /&gt;
۱- سفارش نسبت به انصار چنانچه می فرمایند: ای گروه مهاجرین! با انصار به خوبی رفتار کنید زیرا مردم در حال زیادت هستند اما انصار زیاد نمی شوند و آنان پشتوانه من بوده اند پس به خوبان آنان خوبی کنید و از بدیهای آنان بگذرید. ۲- فرمان تجهیز لشکر اسامه چنانچه می فرمایند: ای مردم! لشکر اسامه را تجهیز کنید پس به خدا سوگند اگر در مورد فرماندهی او چیزی گفتید پس در مورد فرماندهی پدرش قبل از او نیز همان را گفته بودید. همانا او لایق فرماندهی است همان گونه که پدرش لایق فرماندهی بود. ۳- دعا برای اسامه چنانچه محمد بن اسامه از پدرش نقل می کند: آنگاه که حال پیامبر سنگین شد من و دیگر مردم به مدینه آمدیم و من بر پیامبر وارد شدم اما ایشان ساکت بودند و حرفی نمی زدند پس دستشان را به سوی آسمان بالا بردند و سپس بر من گذاشتند پس من دانستم که ایشان برای من دعا می کنند. ۴-&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;فرمان خداوند به نماز گذاردن ابوبکر با مردم چنانچه عائشه رضی الله عنها روایت می کنند: چون حال پیامبر ناخوش شد ایشان فرمودند: به ابوبکر بگویید با مردم نماز بخواند (سیره ابن هشام۴/۳۰۰).&lt;br /&gt;
با نگاهی به موارد مذکور و موارد مشابه، در می یابیم که ایشان هیچ اشاره ای به امر خلافت بعد از خود نکردند در حالی که می دانستند به زودی به رفیق أعلی خواهند پیوست و تنها ابوبکر را به عنوان جانشین خویش در امامت نماز برگزیدند و همین نیز سبب شد اصحاب بعد از رحلت پیامبر به آن استدلال کنند و بگویند: آیا کسی را که پیامبر برای رهبری دینمان برگزیده است برای رهبری دنیای خویش بر نگزینیم.&lt;br /&gt;
دلیل پنجم: روایت امام مسلم مبنی بر سفارش پیامبر به اهل بیت در منطقه خُم&lt;br /&gt;
امام مسلم در کتاب صحیح خویش از یزید بن حیان نقل می کند: من و حصین بن سبرۀ و عمر بن مسلم به نزد زید بن أرقم رفتیم و چون در نزد ایشان نشستیم حصین بن سبره به زید گفت:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;یقیناً تو خیر فراوانی را درک کرده ای، پیامبر را دیده ای، سخنش را شنیده ای، با او به جهاد رفته ای و با او نماز خوانده ای، یقیناً تو خیر فراوانی را درک کرده ای! پس برای ما چیزی بگوی از آنچه از رسول الله صلی الله علیه و سلم شنیده ای. زید بن أرقم گفت: ای پسر برادرم! یقیناً سن من بالا رفته و هم صحبتی من با ایشان قدیمی شده است و بسیاری از چیزهایی را که از ایشان شنیده ام فراموش کرده ام پس آنچه را برای شما گفتم بپذیرید و آنچه را نگفتم مرا مکلّف به آن نکنید. سپس فرمودند: پیامبر روزی در جمع ما خطبه ای خواند در میان آبی که آن را خُم (غدیر خم) می نامیدند که در میان مکه و مدینه واقع بود، ایشان بعد از حمد و ثنای پروردگار فرمودند: ( أما بعد، ای مردم! من بشری هستم که چه بسا فرستاده ی پروردگارم (ملک الموت) به نزدم بیاید و پاسخ بگیرد)؛ سپس فرمودند: (و أنأ تارک فیکم الثقلین، أولهما کتاب الله فیه الهدی و النور فخذوا بکتاب الله و استمسکوا به) یعنی من دو چیز سنگین را در میان شما باقی می گذارم: اولی آن دو، کتاب خداست که هدایت و نور در آنست پس کتاب خدا را بگیرید و متمسک به آن باشید. سپس پیامبر بسیار نسبت به کتاب خداوند ترغیب و توصیه نمودند،&lt;br /&gt;
سپس فرمودند: (و أهل بیتی، أذکرکم الله فی أهل بیتی، أذکرکم الله فی أهل بیتی، أذکرکم الله فی أهل بیتی) یعنی ( و باقی می گذارم در میان شما اهل بیتم را، خداوند را به یاد شما می آورم در رعایت اهل بیتم &amp;hellip;) سپس حصین بن سبرۀ به زید بن أرقم گفت: چه کسانی اهل بیت او هستند؟ آیا زنانش جزء اهل بیتش هستند؟ زید گفت: آری زنانش اهل بیت اویند اما اهل بیت او کسانی هستند که صدقه بر آنان حرام شده است. حصین پرسید: و آنان چه کسانی هستند؟ زید گفت: آل علی و آل عقیل و آل جعفر و آل عباس که صدقه بر آنان حرام شده استآنان حرام شد (صحیح مسلم۸/۱۹۰).&lt;br /&gt;
شاید این حدیث بتواند جمع بین اقوال مختلف در مورد مفهوم و مقصود حدیث غدیر خم باشد و&lt;br /&gt;
بدین خاطر است که در نزد اهل سنت، خاندان رسول الله صلی الله علیه و سلم دارای جایگاه&lt;br /&gt;
ویژه ای هستند و از میان آنان، علی بن ابیطالب و خانواده ایشان را روشنایی چشمان خویش و یادگار بیت نبوی می دانند و بر محبت و مودت ایشان بر خود می بالند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;سید محمد صالح مهجور&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;mdash;&amp;ndash;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فهرست مراجع:&lt;br /&gt;
۱- قرآن کریم&lt;br /&gt;
۲- فتح الباری شرح صحیح بخاری- ابن حجر عسقلانی - دار احیاء التراث العربی- الطبعۀ الأولی&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;ndash; ۱۴۰۸ه&lt;br /&gt;
۳- شرح نووی بر صحیح مسلم &amp;ndash; دار أبی حیان &amp;ndash; الطبعۀ الأولی &amp;ndash; ۱۴۱۵ ه&lt;br /&gt;
۴- سنن ترمذی (الجامع الصحیح) &amp;ndash; دار إحیاء التراث العربی &amp;ndash; بیروت&lt;br /&gt;
۵- سنن أبی داود &amp;ndash; دار الکتب العلمیۀ &amp;ndash; بیروت &amp;ndash; الطبعۀ الأولی &amp;ndash; ۱۳۹۳ ه&lt;br /&gt;
۶- سنن ابن ماجه &amp;ndash; دار الفکر&lt;br /&gt;
۷- مسند امام احمد بن حنبل &amp;ndash; دار الفکر&lt;br /&gt;
۸- المستدرک حاکم نیسابوری &amp;ndash; دار الفکر &amp;ndash; بیروت &amp;ndash; ۱۳۹۸ ه&lt;br /&gt;
۹- مجمع الزوائد و منبع الفوائد - حافظ ابی بکر هیثمی &amp;ndash; دار الکتاب العربی &amp;ndash; الطبعۀ الثالثۀ &amp;ndash;&lt;br /&gt;
۱۴۰۲ هـ&lt;br /&gt;
۱۰- المعجم الکبیر - حافظ طبرانی &amp;ndash; دار احیاء التراث العربی &amp;ndash; الطبعۀ الثالثه&lt;br /&gt;
۱۱- التفسیر الکبیر - امام فخر رازی&lt;br /&gt;
۱۲- جامع البیان فی تفسیر القرآن - محمد بن جریر طبری &amp;ndash; دار المعرفۀ &amp;ndash; ۱۴۰۳ ه&lt;br /&gt;
۱۳- فتح القدیر &amp;ndash; محمد بن علی شوکانی &amp;ndash; مطبعۀ مصطفی الحلبی و أولاده بمصر &amp;ndash; الطبعۀ الاولی &amp;ndash; ۱۳۴۹ ه&lt;br /&gt;
۱۴- تفسیر القرآن الحکیم مشهور به تفسیر المنار &amp;ndash; محمد رشید رضا &amp;ndash; مطبعۀ المنار &amp;ndash; الطبعۀ&lt;br /&gt;
الاولی &amp;ndash; ۱۳۴۹ه&lt;br /&gt;
۱۵- تفسیر القرآن العظیم &amp;ndash; ابن کثیر قرشی &amp;ndash; دار المعرفۀ &amp;ndash; ۱۴۰۱ ه&lt;br /&gt;
۱۶- روح المعانی - علامه آلوسی بغدادی &amp;ndash; دار إحیاء التراث العربی&lt;br /&gt;
۱۷- السیرۀ النبویۀ - إبن کثیر &amp;ndash; دار المعرفۀ ۱۴۰۲ ه&lt;br /&gt;
۱۸- السیرۀ النبویۀ - ابن هشام &amp;ndash; دار أحیاء التراث العربی&lt;br /&gt;
۱۹- البدایۀ و النهایۀ - ابن کثیر &amp;ndash; دار الفکر - الطبعۀ الاولی &amp;ndash; ۱۹۶۶ ه&lt;br /&gt;
۲۰- تاریخ الامم و الملوک - امام محمد بن جریر طبری &amp;ndash; دار سویدان &amp;ndash; بیروت&lt;br /&gt;
۲۱- مروج الذهب و معادن الجوهر &amp;ndash; علی بن حسین بن علی مسعودی &amp;ndash; دار المعرفۀ&lt;br /&gt;
۲۲- تاریخ مدینۀ دمشق &amp;ndash; ابن عساکر &amp;ndash; دار الفکر &amp;ndash; ۱۴۲۱ه&lt;br /&gt;
۲۳- لسان العرب &amp;ndash; ابن منظور مصری &amp;ndash; دار صادر &amp;ndash; بیروت&lt;br /&gt;
۲۴- الصحاح &amp;ndash; اسماعیل بن حماد جوهری &amp;ndash; دار العلم الملایین &amp;ndash; ۱۴۰۴ ه&lt;br /&gt;
۲۵- النهایۀ فی غریب الحدیث و الأثر &amp;ndash; ابن أثیر &amp;ndash; موسسه اسماعیلیان &amp;ndash; قم &amp;ndash; ۱۳۶۴ ش&lt;br /&gt;
۲۶- الکامل &amp;ndash; محمد بن یزید مبرد &amp;ndash; موسسۀ الرسالۀ &amp;ndash; الطبعۀ الثالثۀ &amp;ndash; ۱۴۱۸ ه&lt;br /&gt;
۲۷- منهاج السنۀ النبویه &amp;ndash; شیخ الاسلام احمد بن تیمیه &amp;ndash; مکتبۀ الجمهوریۀ &amp;ndash; القاهره&lt;br /&gt;
۲۸- مجموع الفتاوی &amp;ndash; شیخ الاسلام احمد بن تیمیه -&amp;nbsp;&amp;nbsp;دار عالم الکتب &amp;ndash; الریاض &amp;ndash; ۱۴۱۲ ه&lt;br /&gt;
۲۹- سلسلۀ الاحادیث الصحیحۀ &amp;ndash; محمد ناصر الدین ألبانی &amp;ndash; المکتب الاسلامی &amp;ndash; ۱۴۰۵ ه&lt;br /&gt;
۳۰- الغدیر &amp;ndash; علامه امینی &amp;ndash; دار الکتب العلمیه &amp;ndash; ۱۳۹۷ ه&lt;br /&gt;
۳۱- المیزان فی تفسیر القرآن &amp;ndash; علامه محمد حسین طباطبائی &amp;ndash; موسسه مطبوعاتی اسماعیلیان &amp;ndash; ۱۳۹۱ ه&lt;br /&gt;
۳۲- اصول کافی &amp;ndash; ابی جعفر کلینی رازی &amp;ndash; انتشارات مسجد چهارده معصوم&lt;br /&gt;
۳۳- المناقب - خوارزمی &amp;ndash; موسسه نشر اسلامی ۱۴۱۷ ه&lt;br /&gt;
۳۴- خلاصۀ عبقات الأنوار فی امامۀ الأئمۀ الاطهار &amp;ndash; علی حسینی میلانی &amp;ndash; انتشارات سید&lt;br /&gt;
الشهداء قم &amp;ndash; ۱۴۰۴ه&lt;br /&gt;
۳۵- اثبات الامامۀ &amp;ndash; علامۀ محمد بن الشیخ عبد علی آل جبار &amp;ndash; انتشارات هادی&lt;br /&gt;
۳۶- تفسیر نمونه &amp;ndash; جمعی از نویسندگان &amp;ndash; دار الکتب الاسلامی &amp;ndash; تهران &amp;ndash; چاپ پانزدهم &amp;ndash; ۱۳۷۸ش&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
کتابهایی در مورد امامت و غدیر&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عقیده امامت و حدیث غدیر&lt;br /&gt;
شاهراه اتحاد یا بررسی نصوص امامت&lt;br /&gt;
راهی دیگر براى کشف حقیقت&lt;br /&gt;
غدیر خم&lt;br /&gt;
خلافت و امامت&lt;br /&gt;
خلافت و امامت 2&lt;br /&gt;
حـدیـث&amp;zwnj; غـدیـر، مولای&amp;zwnj; مؤمنان&amp;zwnj; و ما اهل&amp;zwnj; سنّت&amp;zwnj;&lt;br /&gt;
تکامل فکر سیاسی شیعه از شورا تا ولایت فقیه&lt;br /&gt;
نقد و بررسی اصول و پایه های مذهب شیعه دوازده امامی&lt;br /&gt;
خلافت و انتخاب&lt;br /&gt;
درسی از ولایت&lt;br /&gt;
چرا نام حضرت علی رضی الله عنه در قرآن نیست؟&lt;br /&gt;
تهمت به علی در نهج البلاغه&lt;br /&gt;
ای شیعیان جهان بیدار شوید&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ يادي از وداع حجاج، از سرزمين مقدس مكه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/232</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt; &lt;strong&gt;كتابِ يادي از وداع حجاج، از سرزمين&amp;nbsp;مكه&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(خدا حافظ) مكه، اى منـزلگاه وحي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى محل طلوع نور.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى قبله دنيا.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;وداع اى خانه خدا.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى مقام إبراهيم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى زمزم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى غار حراء.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خدا حافظ اى منى.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى عرفات.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى مشاعر دوست داشتنى.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى اعمال حج و نشانه&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;هاى خدا.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اى يادگار زيبا.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى گرانترين خاطره&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ها.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اى شيرين&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ترين اميدها و آرزوها.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى زيباترين زمان زندگي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اى بهترين لحظات.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با تو خداحافظى مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;كنيم در حاليكه قلب ما، خوار و زار و فروتن است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و نفس ما خاشع است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اميدواريم كه باز هم تو را ببينيم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از خدا مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;خواهيم كه ما را بار ديگر بسوي تو برگرداند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و باز هم به ديدار تو موفق شويم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و به ديدن تو باز هم بزرگوار و بزرگوارتر شويم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى خدا چقدر فراق و جدائي سخت است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى خدا چقدر دورى و جدائي تلخ است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى خدا چقدر وداع دشوار است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اي مكه.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خداحافظ اي مكه.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;چقدر كلمه خداحافظي دشوار است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و چقدر پر حرارت و سوزنده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لحظه&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ي وداع و خداحافظي فراموش نشدني است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لحظه&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ي وداع اشكها گرم مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و انسان به هر شجاعتي كه باشد بگريه مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;افتد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و قدرتمندان در برابر آن كوچك و حقير مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;شوند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و زورگويان در برابر آن از پا مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;افتند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پس كسي كه كعبه، خانه خدا را وداع مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;گويد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كسي كه مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;رود و حرم خدا.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مقام ابراهيم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ركن اليماني.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;چاه زمزم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و آب زمزم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;طواف.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و مشاعر مقدسه را پشت سر مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;گذارد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;چگونه مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;تواند لحظه&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ي وداع را تحمل كند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;چگونه مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;تواند لحظه&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ي خداحافظي را از ياد ببرد و فراموش كند؟&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى حجاج گرامي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى عزيزان مسافر.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اى برادر رفتني.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اى ميهمان كوچ كننده.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ما برادرانت در بلد الحرام.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ما كه با شنيدن صداي لبيك تو شاد شديم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و با نگاه به احرام تو خوشبخت شديم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و با بلند كردن الله اكبر ولا اله الا الله گفتن تو اُنس گرفتيم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و گوش، و جان و روح ما با رايحه دعا و راز و نياز تو معطر گرديد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;چگونه همراهى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ات را فراموش كنيم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;چگونه به تو خداحافظ بگوييم؟&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ميهمان عزيز:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حالا كه مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;روي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بدان كه دلهاي ما با توست.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اشكهاي ما تو را وداع مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;گويد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دين تو، كه امانتي در دست توست.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كار تو و خودت را به خدا مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;سپاريم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آري!!&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ما مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;دانيم هنگامى كه حج خود را به پايان رسانيدي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اعمال حج تمام شد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاد و خوشحال هستي كه به سوي خانواده&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ات باز مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;گردي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و براي ديدار وطنت لحظه شماري مى&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;كني.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پس از خداوند خواهانيم كه تو را با سلامتي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و شادابي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و بهره&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;اي نيك از حج.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و پاداش نيك.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و حج مبرور و مقبول.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و پاك از گناه به خانوده&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ات برسي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;يادى از وداع حجاج، درد دلي است با حجاج بيت الله شريف در آن زمان كه بعد از اداي مناسك حج به سوي ديار خويش برمی گردند. برادران و خواهران محترم می توانند این کتاب را از &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=341&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;بخش اخلاق &lt;/a&gt;&lt;u&gt;و تربیت&lt;/u&gt; کتابخانه عقیده بدست آورند. و یا با فشار بر روی اسم کتاب آنرا داونلود نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;div align=&quot;right&quot;&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=341&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;داونلود کتاب یادی از وداع حجاج&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>طواف بیت الله الحرام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/231</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;طواف بیت الله الحرام&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هنگامی كه حاجی پس از رسیدن به كعبه مشرفه و آغاز عبادت حج به طواف بیت الله الحرام می پردازد و پروانه وار به گرد محور توحید می چرخد ، كیف عجیبی در خود احساس می كند آری هنگامی كه می بیند هزاران پروانه سفید مانند او با عشق و ولوله دل انگیز زمزمه كنان در حركتند به خاطر طاعت پروردگار و فرمانبرداری از اوامر او دارند با او راز و نیاز می كنند و هر كس در عالمی از رؤیاها و خیالات شیرین خود بسر می برد اینجا است كه بندة مؤمن ارزش این عبادت را احساس می كند و عملا حلاوت&amp;nbsp;&amp;nbsp; و شیرنی آنرا در دلش دارد می چشد ، واقعاً منظرعجیب و پر خاطره ای است ، هزاران انسان متفاوت ، متفاوت در همه چیز از كشور های مختلف ، از قبایل مختلف با رنگها و اخلاقهای مختلف، اما&amp;nbsp; در عین حالی همرنگ و همشكل وهمدل آری همدل كه فقط ایمان به خدا دلهای آنان را به هم نزدیك كرده است و با یكرنگ كردن لباس احرام گویا زبان حالشان فریاد می زند كه ما فرزندان یك پدر و مادریم&amp;nbsp; ما یكی هستیم ، لذا همه با یك حالت مشغول یك عبادتند و آن اینكه &lt;strong&gt;سبحان الله&lt;/strong&gt; گویان، &lt;strong&gt;لا اله الا الله &lt;/strong&gt;گویان و &lt;strong&gt;الله اكبر&lt;/strong&gt; گویان و با دعا و نیایش و راز و نیازی كه هر كسی با زبان خودش دارد با پروردگارش انجام می دهد دارد به دور خانه می چرخد، طواف می كند هفت بار به دور خانه می چرخد این عبادت اسمش طواف است از مقابل حجراسود یا سنگ سیاه شروع می كند و بطرف راست كه خانه در سمت چپ طواف كننده قرار داشته باشد می چرخد، این عبادت است، با این عمل بندة مؤمن خودش را به خدا نزدیك می كند، خودش را پیش خدا شیرین می كند، ناتوانی&amp;nbsp; و نیاز مندی خودش را ظاهر می كند، طبیعی است كه این عمل مانند هر عبادت دیگری زمانی ارزش پیدا می كند كه مطابق روش و سیرت رسول اكرم ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ انجام گیرد،&amp;nbsp;&amp;nbsp; هر كس درجه پیروی اش از پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ بیشتر باشد نمرات و جوایزش بیشتر خواهد بود .&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;طواف اولین كاری است كه حاجی پس از رسیدن به مكه مكرمه انجام می دهد، از ام المؤمنین عایشه صدیقه رضی الله عنها روایت است كه فرمود: ( &lt;strong&gt;إن اول شئ بدأ به حین قدم النبی ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ أنه توضا ثم طاف&lt;/strong&gt; )&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ هنگامی كه به مكه تشریف آوردند اولین كاری كه انجام دادند این بود كه وضو گرفتند و طواف كردند &amp;raquo; جابر ابن عبدالله رضی الله عنه در باره چگونگی حج پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ چنین می فرماید:&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; (&lt;strong&gt;....... حتی اذا أتینا البیت معه استلم الركن فرمل ثلاثة ومشی اربعاً&lt;/strong&gt; )&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; تا اینكه با ایشان به پای خانة كعبه آمدیم ركن (كه منظور حجر اسود است) را استلام فرمودند آنگاه (طواف را شروع كردند) سه مرتبه نیم دو و چهار مرتبه بطور عادی طواف كردند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عبدالله ابن عمر رضی الله عنهما می فرماید: (&lt;strong&gt;إن رسول الله ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ كان اذا طاف فی الحج او العمرة اول ما یقدم سعی ثلاثة أطواف و مشی أربعة ثم سجد سجد تین ثم یطوف بین الصفا والمروة&lt;/strong&gt; )&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ هر گاه برای حج یا عمره ای تشریف می آوردند همین كه می رسیدند اول طواف می كردند و در طواف سه بار نیمه می دویدند و چهار بار آهسته می رفتند، آنگاه دوركعت نماز می خواندند، و سپس بین صفا و مروه سعی می كردند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دلائل مشروع بودن طواف بیت الله الحرام در كتاب و سنت فراوان است ، و احادیثی كه در این معنی از رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ نقل گردیده متواتر است ، پس این عمل یكی از طاعات و وسائل قربتی است كه مؤمن خودش را بوسیله آن به پروردگارش نزدیك می كند ، و خداوند این عمل را از بندگانش دوست می دارد و می پسندد ، لذا به آن امر فرموده وتشویق كرده و آنرا ركنی از اركان مهم حج قرار داده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;چنانكه می فرماید:&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;)&lt;/span&gt; &lt;strong&gt;وَأَذِّنْ فِی النَّاسِ بِالْحَجِّ یأْتُوكَ رِجَالاً وَعَلَى كُلِّ ضَامِرٍ یأْتِینَ مِنْ كُلِّ فَجٍّ عَمِیقٍ&amp;nbsp; لِیشْهَدُوا مَنَافِعَ لَهُمْ وَیذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ فِی أَیامٍ مَعْلُومَاتٍ عَلَى مَا رَزَقَهُمْ مِنْ بَهِیمَةِ الْأَنْعَامِ فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْبَائِسَ الْفَقِیرَ&amp;nbsp; ثُمَّ لْیقْضُوا تَفَثَهُمْ وَلْیوفُوا نُذُورَهُمْ وَلْیطَّوَّفُوا بِالْبَیتِ الْعَتِیقِ&lt;/strong&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;(&lt;/span&gt; (الحج:29-27)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;در میان مردم برای حج ندا در ده كه پیاده و سوار بر هرشتر لاغری &amp;ndash;كه از هر راه دور می آیند &amp;ndash; رو بسوی تو آرند، تا در منافعی كه برای آنان هست حضور داشته باشد ، و نام خداوند را در روزهای معین بر چار پایان زبان بسته ای كه روزیشان داده ایم ببرند (وقربانی كنند)آنگاه از آن بخورید وبه درمانده بینوا هم بخورانید آنگاه باید آلایشها را بزدایند ، و نذرهایشان را وفا كنند و پیرامون بیت العتیق طواف كنند&amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و خداوند متعال پیامبر اولوالعزم حضرت ابراهیم علیه السلام كه او را خلیل (دوست بسیار مهربان ) خودش خوانده و فرزند ایشان حضرت اسماعیل علیه السلام را مأمور كرده كه خانه اش را بسازند و پاك كنند و آنرا برای طواف كنندگان و قیام كنندگان و ركوع كنندگان ، آماده كنند ، چنانكه می فرماید :&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;)&lt;/span&gt; &lt;strong&gt;وَعَهِدْنَا إِلَى إِبْرَاهِیمَ وَإِسْمَاعِیلَ أَنْ طَهِّرَا بَیتِی لِلطَّائِفِینَ وَالْعَاكِفِینَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ&lt;/strong&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;(&lt;/span&gt; (البقره:125)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; و به ابراهیم و اسماعیل سفارش كردیم كه خانه ام را برای غریبان (مسافران ) مقیمان و نماز گذاران پاكیزه گردانید&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و می فرماید: &lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;)&lt;/span&gt; &lt;strong&gt;وَإِذْ بَوَّأْنَا لِإِبْرَاهِیمَ مَكَانَ الْبَیتِ أَنْ لا تُشْرِكْ بِی شَیئاً وَطَهِّرْ بَیتِی لِلطَّائِفِینَ وَالْقَائِمِینَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ&lt;/strong&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;(&lt;/span&gt; (الحج:26)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; و چنین بود كه برای ابراهیم جایگاه خانه كعبه را معین كردیم (وگفتیم ) كه برای من هیچگونه شریك میاور و خانه ام را برای غریبان و مقیمان و نماز گذاران پاكیزه دار&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از خلال آنچه گذشت درمی یابیم كه طواف خانه خدا عبادت بزرگ و طاعت بسیار پر معنایی است كه خداوند آنرا از بندگانش دوست می دارد و می پسندد، لذا آنان را بدان امر فرموده است. و در مقابل ، اجر بزرگ و پاداش بسیار عظیمی به آنان عنایت خواهد فرمود، بلكه همچنانكه عرض كردیم طواف ركن مهمی از اركان حج و عمره است ، این امر می رساند كه طواف چقدر منزلت رفیع و ارزش والایی را داراست، تا جایی كه حج وعمره جز با انجام طواف ناتمام است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فایده بزرگ و درس مهمی كه می توان از این أمر گرفت این است كه طواف فقط در یك جا ثابت است و آن خانة خداست، علاوه برآن در هیچ جایی از جهان طواف درست نیست ، زیرا هیچ گونه دلیلی بر مشروعیت طواف در جای دیگر وجود ندارد، بلكه چنین عملی كاملا باطل و گمراهی است كه مرتكب آن گویا خانه مخلوق را دارد با خانه خدا یكی می داند ، در حالیكه خانه خدا صرفا جهت ذكر و عبادت و توجه بسوی ذات پاك او بنا شده است علمای مسلمین در این امر اتفاق نظر دارند كه هر گونه طوافی در هر جایی از جهان جز خانه كعبه باطل و گناه است ، پس بنابر این طواف كردن به دور قبه ها و ضریح ها و قبرها و سنگها و درختها&amp;nbsp; و غیره به هیچ عنوان جایز نیست.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فرمایشات علماء دراین خصوص بسیار است، من در اینجا سعی خواهم كرد بطور اختصار نمونه ای از اقوال علمای مسلمین را بیاورم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام نَووی رحمة الله علیه می فرماید : ( &lt;strong&gt;ولا یجوز أن یطاف بقبره ـ صلی الله علیه و آله وسلم&lt;/strong&gt; ـ) &amp;laquo;جایز نیست كه به قبر رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ طواف شود&amp;raquo; مطالب زیادی ذكر می كند آنگاه می فرماید: ( &lt;strong&gt;ولا یغتر لمخالفة كثیرین من العوام و فعلهم، ذلك فان الاقتداء والعمل إنما یكون بالاحادیث و اقوال العلماء و لا یلتفت إلی محدثات العوام و غیرهم وجهالاتهم&lt;/strong&gt;) &amp;laquo;به مخالفت بسیاری از عوام و كردار آنان نباید فریب خورد، زیرا (پس از قرآن كریم ) فقط احادیث (صحیحه) واقوال علماء است كه معیار اقتداء وعمل است پس به بدعتهای عوام ودیگران!&amp;nbsp;و جهالتهای آنان نباید توجه كرد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سپس می فرماید : در صحیحین از ام المؤمنین عایشه صدیقه رضی الله عنها روایت شده كه رسول خدا ـ صلی الله علیه -و آله وسلم ـ فرمودند: ( &lt;strong&gt;من احدث فی أمرنا هذا ما لیس منه فهو رد&lt;/strong&gt;).&amp;laquo; كسی كه در این دین ما چیزی پدید آورد كه از آن نیست پس بدعتش مردود است &amp;raquo; و در روایت مسلم آمده ( &lt;strong&gt;من عمل عملا لیس علیه امرنا فهورد&lt;/strong&gt; ).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;كسی كه عملی انجام دهد كه در این دین ما سند ندارد عملش مردود است&amp;raquo; واز حضرت&amp;nbsp; ابوهریره رضی الله عنه روایت است كه فرمود: رسول خدا ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ فرمودند: (&lt;strong&gt;لا تجعلوا قبری عیدا وصلوا علی فان صلاتكم تبلغنی حیثما كنتم&lt;/strong&gt;).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; قبر مرا جشن گاه قرار ندهید ، وبر من درود بفرستید، كه درود شما هر جایی باشید به من می رسد&amp;raquo; فضیل ابن عیاض رحمةالله علیه می فرماید : &amp;laquo; راههای هدایت را پیروی كن و از اینكه پیروان آن كم هستند دل مزن و از راههای ضلالت و گمراهی بپرهیز و از اینكه پیروان باطل زیاد اند دلگیر مباش &amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;و اگر كسی گمان می كند كه دست كشیدن وحركات نا مشروع دیگر بیشتر باعث حصول بركت می گردد در جهالت و غفلت است، زیرا بركت در موافقت شریعت است، چگونه ممكن است كه فضیلت وبركت در مخالفت حق باشد &amp;raquo; پایان كلام امام نَوَوی رحمة الله علیه.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شیخ الاسلام رحمة الله علیه می فرماید :&amp;laquo; مسلمانان اتفاق نظر دارند كه طواف جز به خانة كعبه جائز نیست ، پس به صخرة بیت المقدس و حجرة پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ و قبة كوه عرفات و دیگر جا ها طواف جایز نیست &amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین می فرماید : &amp;laquo;هیچ جایی در زمین نیست كه مانند كعبه طواف شود ، كسی كه معتقد باشد طواف جز كعبه به جای دیگری جایز است بدتر از كسی است كه متعقد باشد نماز بسوی غیر كعبه جایزاست زیرا پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ هنگامی كه از مكه به مدینه هجرت فرمودند هیجده ماه ( یا شانزده ماه) به طرف بیت المقدس كه قبله بود، نماز می گذاردند سپس خداوند قبله را تغیر داد و كعبه را قبله قرار داد ، و خداوند این مسئله را در قرآن( سورة بقرة) بیان فرمود از آن پس پیامبر ـ صلی الله علیه و آله وسلم ـ&amp;nbsp; و بقیه مسلمین&amp;nbsp; بسوی كعبه نماز خواندند، وكعبه برای همیشه قبلة مسلمین قرار گرفت كما اینكه قبلة ابراهیم علیه السلام و بقیة پیامبران نیز كعبه بود، پس اگر امروز كسی صخرة بیت المقدس را قبله قرار دهد و بطرف آن نماز بخواند كافر و مرتد است كه باید توبه كند، با وجود اینكه بیت المقدس ﭗیش از این قبله هم بوده، پس كسی كه به جای دیگری طواف می كند چی در حالیكه طواف به غیر از كعبه را هر گز خدا مشروع نفرموده است &amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در پرتو سخنان امام نووی و شیخ الاسلام رحمة الله علیهما&amp;nbsp; و دیگر علماء مشخص می شود كه طواف به هر جای دیگری غیر از خانة خدا چقدر خطرناك است كه چه بسا خدای نكرده ممكن است انسان را به شرك بكشاند در حالی كه ممكن است كسی از روی ارادت ومحبت این كار را انجام دهد اما شیطان دشمن آشكار انسان است پس نباید برای او زمینه فراهم كرد، با كمال تأسف امروز می ببینم كه در بعضی جاها مردم مسلمان از روی جهالت&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; و سادگی و بر اثر نا آگاهی دارند دور بعضی قبرها یا قبه ها یا ضریحها و غیره طواف می كنند و اقعا كار نادرستی است زیرا چنین عملی از نظر شرعی نه تنها مستندی ندارد كه صد در صد غلط است چون ما در هیچ جای قرآن وسنت كه دو منبع اساسی اسلام هستند نداریم كه مثلا قبر فلانی یا ضریح فلانی را باید طواف كرد، پس این اشتباه بزرگ كه ابتداء از روی محبت و ارادت شروع می شود با كمك و فریب شیطان ممكن است خدای نكرده انسان مؤمن را به شرك بكشاند ، پس &amp;laquo; علاج واقعه را قبل از وقوع باید كرد &amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتاب با پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در حج</title>
<link>http://qalamlib.com/news/228</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;معرفی کتاب &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;با پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در حج&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اين رساله همان طوری كه از نام آن پيداست سفری مبارک و خاطرات زيبا و دلچسب با رسول خدا صلی الله علیه وآله وسلم در موسم حج است كه از مصادر موثق حديثی و از بين احاديث صحيح انتخاب شده است و گوشه هايی از احوال پيامبر صلی الله علیه وآله وسلم را درحج طوری واضح می گرداند كه خوانندۀ محترم شايد اينطورتصور نمايد كه قبل از اين به هزار و چهار صد سال در حجّة الوداع با رسول الله همسفر است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لحظه به لحظه از زمان حركت از مدينه منوره، دراثنای سفر و بالآخره طواف كعبة معظمه و ايستادن به عرفات و بازگشت دوباره بسوی مدينه عبادت، قيادت و برخورد پیامبر گرامی اسلام صلی الله علیه وآله وسلم با اقشار مختلف اعم از اهل و اقارب، دوستان و صحابه كرام، زنان و مردان را مشاهده&amp;nbsp; می نمايد و لذت می برد كه چگونه رسول الله اين توده های عظيم انسانی را سر پرستی و قيادت كرده اند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و امروزه كه از يك طرف اختلاف و تفرقه امّت اسلامی را به ضعف و فلاكت نشانده و از جانب ديگر&amp;zwnj; حركتهای ضد دينی (سيكولر، ماسونی و...) با اهداف و برنامه های دقيق بر پيكر امت اسلامی خنجر می زنند، بر دعوتگران و اصلاح گران&amp;nbsp; مسلمان لازم است تا از حج، اين كنگرة جهانی اسلام استفادة بيشتر نمايند، برای حجّاج درس محبت و وحدت و دوری از تفرقه و اختلاف داده، در ذهن های آنها مفهوم {امّت اسلامی} و عروج دوبارة اين امت را ترسيخ نمايند تا هريك از حجاج كه به کشور خويش باز ميگردند، منارة نور و رمز وحدت در سرزمين های خویش باشند، تا باشد كه ازين طريق گامی مهم در جهت رشد، شموليت و جهانگيری افكار اسلامی بر داشته سير هجومی و صعودی در مقابل حملات دشمن داشته باشيم و عملا ثابت سازيم كه افكار ضد اسلامی در مقابل ما يارای جوابدهی و رمقی برای دفاع از خويشتن ندارند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در این روزهای مبارک حج برادران و خواهران مسلمان می توانند این کتاب جالب را &amp;nbsp;از بخش &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=8&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;سیرت و سنت نبوی &lt;/a&gt;در کتابخانه عقیده دریافت نمایند و برای انتقال به صفحه مخصوص کتاب بر روی اسم کتاب در پایین این صفحه فشار دهید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=956&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;strong&gt;با پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم در حج&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>حقیقت اظهار برائت و بیزاری از مشرکان در حج</title>
<link>http://qalamlib.com/news/227</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;حقیقت اظهار برائت و بیزاری از مشرکان در حج&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;اسلام و شرک دو اندیشۀ متضادیست که با رسیدن یکی، دومی آن از بین می رود، مثل شب و روز، آفتاب و مهتاب، ازینرو اولین اقدام مسلمانان بعد از برقراری امنیت وثبات درمکه، پاک کاری و برچیدن مظاهر و آثار شرک بود، بلکه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;این موضوع را جدی گرفته و با شتاب بخاطر محو آن دست بکار شدند، و در فتح مکه هنگامیکه وارد آن شدند درگرداگرد خانۀ کعبه سیصدوشسصت بت نصب شده بود، با چوبی که در دست داشتند بر آن بتان می کوبیدن واین آیۀ کریمه را می خواندند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;(وَقُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ ) الإسراء: ٨١(وبگو! حق آمد وباطل نا بود شد)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;همچنان این آیه را نیز می خواندند:(قُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَمَا يُبْدِئُ الْبَاطِلُ وَمَا يُعِيدُ) ٤٩سباء&amp;nbsp;&amp;nbsp;(بگو- ای محمد به آنان &amp;ndash; حق آمد (اسلام و توحید و قرآن) و دیگر باطل از سر نمی گیرد و بر نمی گردد).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;و آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;از داخل شدن به کعبه امتناع ورزیدند تا زمانیکه بتها را از آن بیرون آوردند، عبدالله ابن عباس رضی الله عنه &amp;nbsp;فرمود: (هنگامیکه رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;وارد مکه شدند از داخل شدن به خانۀ کعبه خودداری نمودند، زیرا داخل آن بتها وجود داشت، سپس امر فرمودند تا بتها بیرون آورده شود). صحيح بخاري&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;سپس هنگامیکه الله عزوجل این آیت را نازل کرد:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;(يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنَّمَا الْمُشْرِكُونَ نَجَسٌ فَلَا يَقْرَبُوا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ بَعْدَ عَامِهِمْ هَذَا) التوبة: ٢٨&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;(ای مؤمنان! حقیقت این است که مشرکان نجس اند، پس نباید که به مسجد الحرام نزدیک شوند بعد از این سال).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;به اطاعت امر الله عزوجل مبادرت ورزیده به ابوبکر صدیق &amp;nbsp;رضی الله عنه &amp;nbsp;امر فرمودند تا به مردم اعلان نماید که:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;(بعد از این سال(سال نهم هجرت) مشرک حق ندارد حج کند). متفق عليه&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;دراین حج سعی ورزیدند تا با مشرکین بطور علنی مخالفت خویش را اعلان داشته، و با پیروی از خط مشی ابراهیم &amp;nbsp;علیه السلام &amp;nbsp;اسلام را در بسیاری از شعایر و احکام حج بپیماید، و در یکی از خطبه هایشان به مردم اعلان نمودند که: (راه و روش مابا آنها(مشرکان) مخالف است).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;سپس از اعمال و کردار مشرکین اظهار برائت نموده، درخطبۀ روز عرفه چنین فرمودند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;(آگاه باشید! هرآنچه از امور جاهلیت است در زیر دو گامم نهاده شده است و خونهای جاهلیت هدر است و اولین خونی را که از خونهای دورۀ جاهلیت بی اعتبار می شمارم، خون ربیعه بن الحارث است که در قبیلۀ بنی سعد برای شیرخوارگی داده شده بود و بوسیلۀ قبیلۀ هذیل بقتل رسید، و سود زمان جاهلیت بی اعتبار است و نخستین سود از سودهای مان در دوران جاهلیت را که بی اعتبار میشمارم، سود عباس بن عبدالمطلب است که همه اش را بی اعتبار اعلان میکنم). صحيح مسلم&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;مخالفت آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;با مشرکین آشکار بود، ایشان بر این نکته تأکید می ورزیدند که دین و آیین مسلمانان با ملت حق گرای ابراهیم علیه السلام &amp;nbsp;یکی بوده واختلافی وجود ندارد، بنابراین ایشان ابن مربع رضی الله عنه &amp;nbsp;را به عرفات فرستادند تا به مردم اعلان بدارد که: (ای مردم بر مشاعر تان &amp;ndash; در عرفه &amp;ndash; باقی بمانید، زیرا شما بر سنت و طریقت ابراهیم علیه السلام &amp;nbsp;قرار دارید). صحيح مسلم&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;چون قریش وقوف در مزدلفه را اختراع نموده بودند. همچنان آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;بخاطر اظهار مخالفت با مشرکین اعلان نمودند که امت ایشان از تاریخ شکوهمند و عظیمی توحید برخوردار اند که مردمان برگزیده و یکتا پرست الله عزوجل در ادای این نسک پیشقدم بودند از اینرو در چند مقام، حج انبیای پیشین را از کعبۀ مشرفه یاد آور شدند از جمله: زمانیکه آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;از وادی ازرق می گذشتند پرسیدند: (این کدام وادی است؟ گفتند: این وادی ازرق است آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;فرمودند: (مثل اینکه من موسی علیه السلام &amp;nbsp;را می بینم که از گردنۀ کوه پایین می آید و با تلبیه به درگاه الله عزوجل تضرع و زاری می کند) سپس آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;بر کوه هرشا آمده پرسیدند: این کدام کوه است؟ گفتند: کوه هرشا. فرمودند: مثل اینکه یونس بن متی را نگاه می کنم که بر شتر سرخٍ پر پشم سوار است و پیراهنی از پشم بر تن دارد، و افسار شترش از لیف خرماست، تلبیه میگوید). صحيح مسلم&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;همچنان آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;فرمودند: (قسم بذاتیکه جانم در دست اواست! عیسی بن مریم از فج الروحاء نیت احرام حج یا عمره، و یا هر دو را با همدیگر خواهد بست) &amp;nbsp;صحيح مسلم&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;اما شعایر و اعمالی که ایشان &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;از روی قصد، بخاطر مخالفت با مشرکین انجام دادند، عمده ترین آنرا ذیلا یاد آور می شویم:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;تلبیه&lt;/strong&gt;: مشرکان عهد جاهلیت تلبیه را با کلمات شرکی آمیخته نموده می گفتند: (الاشریکا هولک، تملکه و ما ملک). یعنی: (مگرشریکی داری که در ملکیت تو قرار دارد و مالک چیزی نیست). اما تلبیه ای که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;به امتشان تعلیم دادند ، تعهد به دوام عبودیت و عاجزی و ذلت، اخلاص، و اعتراف به یگانگی و عظمت الله عزوجل را در بر دارد، پس شعار توحید، روح و مقصد تمامی عبادتها است، و تلبیه کلید این عبادت بزرگ است که فقط با آن میتوان به حج داخل شد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;وقوف عرفه&lt;/strong&gt;: پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;با حضور یافتن شان در موقف بزرگ عرفات مخالفت خویش را با کفار و مشرکین قریش اظهار نمودند، زیرا قریش و قبایل هم کیش آن، قبلا در مزدلفه وقوف می کردند و می گفتند: ما (اهل الله) و حرم نشینان او هستیم، و جز از داخل حدود حرم، از جای دیگر به سوی منی روانه نمی شویم). متفق علیه&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;حرکت به سوی مزدلفه&lt;/strong&gt;: همچنان رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;بخاطر مخالفت با مشرکین، از عرفه بعد از غروب آفتاب روانه مزدلفه، و از مزدلفه بسوی منی قبل از طلوع آفتاب روانه شدند، زیرا مشرکین عهد جاهلیت، عرفه را قبل از غروب آفتاب ترک می نمودند و مزدلفه را بعد از طلوع آفتاب، چنانکه از مسور بن مخرمه رضی الله عنه &amp;nbsp;روایت شده که فرمود:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;در عرفه خطبۀ بما ایراد نمودند. ایشان صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;در این خطبه بعد از ثنا و ستایش الله عزوجل چنین فرمودند: (همانا مشرکین و بت پرستان ازاینجا(عرفه)نزدیک غروب آفتاب، هنگامیکه آفتاب بر سرکوه ها مانند عمامه که بر سرمردان می باشد، حرکت می نمودند پس روش ما با آنها مخالفت دارد ، و از مشعر الحرام هنگام طلوع خورشید از بالای کوه ها که مانند عمامۀ سر مردان می باشد، روانه منا می شدند، پس راه و روش ما با آنها مخالف است). سنن بیهقی و حاکم&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;عمره بعد از حج&lt;/strong&gt;: چنانکه آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;بعد از ادای حج، به ام المومنین عایشه رضی الله عنها اجازه عمره دادند، تا با رسم و رواج مشرکان مغایرت صورت گیرد، زیرا مشرکان عمره بعد از حج را روا نمی دیدند تا آنکه ماه صفر داخل گردد. طوریکه از ابن عباس رضی الله عنه &amp;nbsp;روایت است که فرمود:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;(سوگند به خداوند! آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;عایشه صدیقه &amp;nbsp;را در ماه ذی الحجه بمنظور مخالفت با مشرکان عمره دادند، زیرا قریش وهم کیشان شان می گفتند: هرگاه پشم شتران بسیار گردد، وزخمهای پشت آنها عافیت یابد، و ماه صفر داخل گردد، پس از آن عمره برای کسیکه بخواهد، روا گردد، آنها عمره را در ماه ذی الحجه و محرم، حرام می دانستند). سنن ابو داود&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;همچنان رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;بمنظور به خشم آوردن مشرکین، در اماکنی که آنها به الله عزوجل و پیامبرش کفر ورزیده و اعلان دشمنی نموده بودند، شعایر و مراسم دین اسلام را بر پا و عملی نمودند، طوریکه درمنا فرمودند: (فردا در خیف بنی کنانه از وادی محصب فرود خواهیم آمد، جایی که مشرکان قریش وبنی کنانه گرد آمده و بر ضد بنی عبدالمطلب با هم پیمان بستند که با آنان خویشاوندی نکنند، و خرید و فروش ننمایند، تا آندم که رسول خدا صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;را برای کشتن به آنان تسلیم نمایند). بخاری&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;لیکن الله عزوجل نه تنها نیرنگ و توطيۀ مصمم گشتۀ آنان علیه رسول اکرم صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;را محو ونا بود ساخت، بلکه برنامه و دسیسه های شان را دگرگون ساخته و ناکام و نا امید شده به مقصود نرسیدند. سپس پیامبر خویش را نصرت بخشید و کلمۀ توحید را بلند و دین وآیین راست و مستقیم خود را کامل نمود. ابن قیم میفرماید: (آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;همیشه سعی می ورزیدند تا در جاهایی که مراسم و شعایر کفر به اجرا در می آمد، شعار توحید را بلند و پا برجا نمایند، چنانکه امر فرمودند تا در موضع بتهای لات و عزی در طایف، مسجد بنا گردد). زادالمعاد&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;مخالفت با مشرکین منحصر به اعمال پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;نبوده بلکه اصحاب کرام را نیز در مواردی که به آنها ارتباط می گرفت امر می فرمودند، مانند امر ایشان به مسلمانان غیر قریش اینکه احرام ببندند تا با فرامین مشرکین که آنرا خود پدید آورده بودند، مخالفت صورت گیرد، زیرا مشرکان قریش مردمان غیر قریش را که برای طواف می آمدند امر مینمودند تا با لباسهای شان طواف نمایند و اگر کسی احرام بر تن میداشت اجازۀ طواف را نداشت، مگر اینکه برهنه طواف نماید!&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;لیکن پیامبر &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;در سال نهم هجرت امر فرمودند تا در حج اعلان گردد که(بعد از امسال نباید شخصی برهنه به خانۀ کعبه طواف نماید). بخاری&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;همچنان آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;به آن عده یارانشان که قربانی را با خود نبرده بودند امر فرمودند تا حج تمتع نمایند، تا مخالفت با نسک و مراسم مشرکین صورت گیرد، زیرا مشرکین عمره نمودن در ماه های حج را از زشت ترین گناهان و گستاخی با ماه های حج می شمردند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;چنانکه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;انصار را امر نمودند تا میان صفا و مروه مخالف با رسم جاهلیت، سعی نمایند: (میان صفا و مروه سعی نمایید زیرا الله عزوجل آنرا برشما لازم گردانیده است). ابن خزیمه&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;انصار در عهد جاهلیت چنین عادت داشتند که در وقت ارادۀ حج، بنام بت های شان نیت حج می کردند و سعی میان صفا و مروه را گناه می شمردند، چنانکه ام المؤمنین عایشه صدیقه رضی الله عنها این موضوع را به عروه بن زبیر بیان نمود: (عروه بن زبیر رضی الله عنه &amp;nbsp;به خاله اش حضرت عایشه صدیقه رضی الله عنها فرمود: بنابر این آیه (کسی که بین صفا و مروه سعی ننماید، بروی گناهی نیست) باکی نیست که بین این دو طواف ننمایم، حضرت عایشه صدیقه رضی الله عنها فرمودند: خواهر زادۀ عزیزم! اگر معنای آیه طوری که تو تأویل نمودی می بود، چنین می گفت: (باکی نیست که طواف ننماید)، ولی این آیه در بارۀ انصار نازل گردید که پیش از مسلمان شدن، در وقت ارادۀ حج به نام بت (منات) که یکی از معبودان آنها بود، و روی تپۀ بلندی قرار داشت، نیت حج می کردند، و از سعی نمودن بین صفا و مروه خود داری نموده آنرا گناه می شمردند، هنگامی که مسلمان شدند، از رسول الله &amp;nbsp;صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;از حکم سعی بین صفا و مروه پرسیده گفتند: یا رسول الله! ما از سعی نمودن میان صفا و مروه احساس گناه می کردیم، و همان بود که این آیت مبارکه نازل گردید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;(إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ) البقرة: ١٥٨&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;(درحقیقت صفا و مروه از شعایر الهی است).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;همانا الله عزوجل حج و عمرۀ کسی را که میان صفا و مروه سعی نکند، کامل نمی گرداند). متفق علیه &amp;nbsp;لذا ابن قیم: نگاشته است: (شریعت اسلام در همه امور بویژه مناسک، برمخالفت مشرکین انجام یافته است).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;پس خوشا به حال کسیکه راه و روش پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;را سرمشق زندگی خویش قرار داده در هر قدم پیرو سنت ایشان بوده و از واقع شدن در مخالفت با ایشان بشدت حذر کرده و از پیروی یا مشابهت با مشرکین اجتناب می نماید، زیرا آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;در تمام امور زندگی با مشرکان مخالفت نموده و فرموده اند: (کسیکه از قومی تقلید کرد پس وی از آنهاست). سنن ابی داوود&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;همچنان آنحضرت صلی الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;فرموده اند: (کسیکه مردمی را دوست بدارد با آنها حشر خواهد شد). حاکم&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;اماکسانی که امروز به نام برائت از &amp;nbsp;مشرکین در سرزمین حرمین و در مراسم حج داد وفریاد راه می اندازند باید در قدم اول از بت و بتخانه هایی که در کشورشان به نام اهل بیت رسول الله ساخته اند اعلان برائت و بيزاری نمایند...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;از کتاب (احوال النّبي في الحج) &amp;nbsp;تأليف فیصل البعدانی با تصرف&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتاب حافظ شکن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/223</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;حافظ شکن&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هیچ فردی نمی تواند شهرت دیوان حافظ در بین فارسی زبانان انکار نماید؛ حالا این شهرت بخاطر ابیات فصیح و بلیغ حافظ بوده، و یا اینکه پادشاهان و امرای که نام آنها در این دیوان آمده و مداحی شده اند در گسترش و تعمیم دیوان او نقش آفرینی کرده اند تا زبانزد مردم شده و شهرتی کسب کنند، و یا اینکه شخص حافظ با فکر اباحی که داشته عموم مردم را به معصیت و باده نوشی و گرفتن زلف یار دعوت نموده و مردم نیز با استدلال به ابیات و او خواندن آنها در مجالس و شب نشینی ها باعث تشهیر کتاب حافظ گشته اند... .&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بهر حال موضوعی است که واقع شده و مردم بدان مبتلا می باشند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علامه ابوالفضل برقعی قمی نیز این خطر را احساس کرده بود که دیوان حافظ سبب گسترش بیکاری و تعطیلی جامعه و رو آوردن به رباب و کباب و توهین به علم و علماء می شود؛ لهذا کتاب &amp;laquo;حافظ شکن&amp;raquo; را بطور رد بر دیوان حافظ سروده و جواب اشعار او را به شعر داده است و از حربة او بر ردش استفاده نموده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با مراجعه به دیوان حافظ شکن خواننده متوجه می شود که علامه برقعی در کار خویش تا حد زیادی موفق و کامیاب بوده است؛ ایشان اشعار و غزلهای حافظ را با همان سجع و قافیه تردید می&amp;nbsp; نماید و اشعار نغز و دلکش می سراید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در کتاب ایشان فواید و لطایف وافری به چشم میخورد که معلومات علمی، فرهنگی و تاریخی بی شماری در دسترس خواننده قرار می دهد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علامه برقعی عالم مفسر، محدث، نحوی، فلسفی و شاعر بلیغ است و کتابهای زیادی دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;البته طوری که خود علامه برقعی نیز تصریح می نماید غرض حافظ از سرودن این اشعار و غزلها جلب نمودن رضایت پادشاه و حاکم زمان بوده و بدنبال مفاد مادی می گشته است؛ لهذا در توشیح و بازنگری اشعار خویش دقت بسیار می نموده و کوشش فراوان داشته است. اما علامه برقعی با وجود مصروفیت ها و تألیفات دیگر در مدت بسیار کمی (کمتر از یکسال) حافظ شکن را سروده است؛ لهذا بعید نمی باشد که گاهی اشعار برقعی در فصاحت و بلاغت به پایة اشعار حافظ نرسد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لازم به تذکر است که نسخة دستنویس کتاب &amp;laquo;حافظ شکن&amp;raquo; به خط خود علامه برقعی در 347 صفحه می باشد که به خط خیلی خوانا و واضح نوشته شده است و مقدمة بسیار جالب و گران سنگ نیز دارد که در صفحة اخیر کتاب تاریخ پایان یافتن آن ذکر شده و آمده است: سال 1371 ق. هـ..&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دوستان عزیز می توانند&amp;nbsp; این کتاب را از بخش شعر و ادب کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/book/906/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;strong&gt;داونلود کتاب حافظ شکن&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب شرح عقیده طحاویه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/222</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;شرح عقیده طحاویه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;امام ابوجعفر احمد بن محمد طحاوی رحمه الله، متوفی سال 322 هجری قمری کتابی را تألیف کرده که در برگیرنده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; مسائلی از اصول دین است که انسان مسلمان به معرفت و اعتقاد و تصدیق آن نیاز دارد؛ مسائلی از قبیل توحید، صفات الله متعال، قدر، نبوت، معاد و قضایا و مسائل اعتقادی دیگر و آنچه که بنا به باور اهل سنت و جماعت از سلف صالح به عقیده بر می&amp;lrm;گردد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تمام دانشمندان گذشته و حال، کتاب مذکور را تأیید و قبول نموده&amp;lrm;اند و این کتاب زبانزد عام و خاص شده و از شهرت والایی برخوردار است و دانشمندان زیادی به شرح و توضیح آن پرداخته&amp;lrm;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام طحاوي داراي دانشي راسخ واستوار بوده، و در مذهب حنفي جايگاه خاصي داشته است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ايشان بزرگترين كسي است كه باورهاي اعتقادي اين گروه از امامان اهل سنت را بيان نموده است، و او در نزد فقها ومحدثين موثق و مورد اعتماد است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اكثريت امت اسلامي متني را كه طحاوي آورده مقبول تلقي كرده اند، و تعداد زیادی از دانشمندان اسلامی، چه قبل از مؤلف اين کتاب و چه بعد از وی به شرح عقیده&amp;zwnj;ی طحاوی همت گماشته&amp;lrm;اند. و به احتمال زیاد اکثر شارحان در شرح&amp;lrm;های خود از منهج اصیل و برگرفته از قرآن و سنت صحیح و فهم این دو بر اساس فهم صحابه و تابعین که از زبان پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم كه بهترین مردمان هستند، پیروی نکرده&amp;lrm;اند بلکه فقط از منهج اهل کلام پیروی نموده&amp;lrm;اند؛ کلامی که به منطق یونانی تکیه دارد و بسیاری از مسلمانان فریب آن را خورده و بدان اهتمام و توجه خاصی داشته و آن را در مسائل عقیدتی برای رفع اختلافات، به عنوان حَکَم قرار داده&amp;lrm;اند در نتیجه دچار انحرافات وگمراهی&amp;lrm;ها و سرگردانی&amp;lrm;هایی شده&amp;lrm;اند که بسیاری از آنان تنها در اواخر حیاتشان، بیدار شده&amp;lrm;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما امام علامه محمد ناصر الدین آلبانی که یکی از مفاخر امت اسلامی و از جمله خادمین سنت نبوی صلى الله عليه وآله وسلم مي باشد نيز &amp;nbsp;شرحی بر این کتاب نوشته است که از جملۀ&amp;nbsp;صحیحترین شروح می باشد و اینک خدمت برادران و خواهران مسلمان تقدیم می گردد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لازم به یادآوریست که سه شرح دیگر عقیده طحاویه نیز در کتابخانۀ عقیده موجود می باشد که دوستان عزیز می توانند با فشار بر روی اسم کتاب در انتهای این صفحه آنرا داونلود نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برای دریافت&amp;nbsp;شروح موجود در کتابخانه عقیده &amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;داونلود کتا&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مدینۀ منوره شهر زیبای پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/221</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;مدینۀ منوره شهر زیبای پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مدینۀ منوره شهر پیامبر گرامی اسلام این روزها با ورود هزاران نفر از شیفتگان و زائران حرم نبوی صلى الله علیه وآله وسلم از سراسر نقاط جهان حال و هوای دیگری دارد. زائران با حضور در مدینه منوره خود را برای برگزاری پرشکوه حج&amp;nbsp; مهیا می سازند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مدینۀ منوره و طیبة الطیبة شهر رسول اكرم صلی الله علیه و آله و سلم، محل نزول وحی، و جایی است كه جبریل امین علیه السلام خدمت رسول اكرم صلی الله علیه و آله و سلم فرود می آمد، مدینه مركز ایمان و شهر ملاقات و زندگی مهاجرین و انصار است، شهر كسانی كه مدینه و ایمان را بر گزیدند و بر همه چیز ترجیح دادند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;شهر رسول اكرم صلی الله علیه و آله و سلم&quot; border=&quot;0&quot; height=&quot;249&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/resized_3.jpg&quot; width=&quot;325&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مدینۀ منوره اولین پایتخت مسلمانان است كه پرچم جهاد فی سبیل الله از آن افراشته شد، و كاروانهای حق برای نجات بشریت از تاریكی های ضلالت و گمراهی، و هدایت آنان به نور حق رهسپار گردید، از همین مدینه منوره بود كه&amp;nbsp; نور حق درخشیدن گرفت و جهان را با شعاع هدایت و ایمان روشن نمود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;از همین مدینه منوره بود كه  نور حق درخشیدن &quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/resized_4.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مدینه منوره شهر هجرت مصطفى صلی الله علیه و آله و سلم است، ایشان برای هجرت شان مدینه را انتخاب كردند، و تا آخرین رمق حیات در همین شهر مقدس زندگی نمودند، و نهایتا در همین شهر جان به جان آفرین سپردند، و در همین شهر دفن شدند، و از همین شهر بر انگیخته خواهند شد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;حرم نبوی شریف&quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/resized_5.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مرقد ایشان اولین قبری خواهد بود كه در روز محشر باز شده و ایشان از آن بر خواهند خواست، غیر از قبر ایشان جای قبر هیچ پیامبر دیگری به طور یقینی مشخص نیست.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این مدینۀ مباركه شهری است كه خداوند به آن عزت و افتخار بخشیده و آنرا بر سایر شهرها برتری داده است. پس از مكۀ مكرمه خداوند این شهر را بهترین جای روی زمین قرار داده است.از فضائل این شهر مقدس و مبارك این است كه خداوند متعال آنرا حرم امن قرار داده&amp;nbsp; چنانكه مكۀ مكرمه را حرم امن قرار داده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از پیامبر گرامی صلی الله علیه و آله و سلم روایت است كه فرمودند:(ان ابراهیم حرم مكة، و إنی حرمت المدینة) &amp;nbsp;&amp;nbsp;صحیح مسلم.یعنی: &amp;laquo;ابراهیم علیه السلام مكه را حرم قرار داده و من مدینه را حرم قرار می دهم&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از فضائل دیگر مدینه این است كه ایمان، به مدینه باز میگردد، چنانكه پیامبر صلی الله علیه و آله و سلم فرمودند:(إن الایمان لیارز إلى المدینة كما تأرز الحیة إلى جحرها) صحیح بخاری و صحیح مسلم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;یقیناً ایمان به مدینه باز خواهد گشت هم چنانكه مار به سوراخش باز میگردد&amp;raquo;. &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;معنایش این است كه سر انجام ایمان به مدینه باز خواهد گشت، و در مدینه باقی خواهد ماند و مسلمانان از سراسر جهان قصد سكونت مدینه را خواهند كرد، و انگیزۀ شان در این امر ایمان و محبت این شهر مقدس و مبارك &amp;nbsp;خواهد بود كه خداوند آنرا حرم قرار داده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;مسجد قباء&quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/resized_6.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از دیگر فضائل مدینۀ طیبه این است كه پیامبر صلی الله علیه و آله سلم بر صبر و تحمل سختیها و دشواریهای مدینۀ منوره ترغیب دادند، و فرمودند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(المدینة خیر لهم لو كانوا یعلمون) &amp;laquo;مدینه بهتر است برای آنان اگر بدانند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این مطلب را در مورد كسانی فرمودند كه در فكر كوچ كردن از مدینه و جستجوی رفاه و آسایش و مال فراوان و روزی گسترده بودند. &amp;nbsp;&amp;nbsp;صحیح مسلم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از دیگر فضائل مدینۀ منوره این است كه، پیامبر صلی الله علیه و آله و سلم از یك سو حرمت و عظمت آنرا بیان فرمودند و از سوی دیگر خطر بدعت گذاری و حمایت از بدعت را توضیح دادند لذا می فرمایند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(المدینة حرم من عیر إلى ثور، من أحدث فیها حدثا أو آوى محدثا فعلیه لعنة الله والملائكة والناس أجمعین لا یقبل الله منه صرفا و لا عدلا)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;مدینه از كوه عیر (در جنوب) تا كوه ثور (در شمال) حرم است، كسی كه در آن بدعتی ایجاد كند یا بدعت گذاری را پناه دهد پس لعنت خدا و فرشتگان و تمام مردم بر او باد، خداوند هیچ فرض و نفلی از او &amp;nbsp;نخواهد پذیرفت&amp;raquo;. صحیح بخاری و مسلم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از دیگر فضائل مدینۀ منوره این است كه رسول الله صلی الله علیه و آله و سلم برای آن دعای بركت نمودند از جمله می فرمایند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(اللهم بارك لنا فی ثمرنا و بارك لنا فی مدینتنا و بارك لنا فی صاعنا و بارك لنا فی مدنا) &amp;laquo;پروردگارا! در میوۀ مان بما بركت عنایت فرما، در شهر ما (مدینه) به ما بركت عنایت فرما، و در پیمانۀ ما به ما بركت عنایت فرما&amp;raquo;. &amp;nbsp;صحیح مسلم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;مقبرۀ شهدای احد&quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/resized_2.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران عزیز می توانند برای دریافت معلومات بیشتر &amp;nbsp;دربارۀ مدینه منوره &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=256&quot; target=&quot;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب &lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=256&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;فضائل مدينه منوره و آداب سکونت و زيارت آن&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; را با فشار بر روى &amp;nbsp;اسم کتاب داونلود نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>شهر مبارک  مکّه مكرمه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/220</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;شهر (مبارک) مکّه مكرمه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اسمهای آن، حدود آن، آغاز پيدايش&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;1ـ اسمهای آن:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شهر مبارکی که الله جل جلاله آنرا را مبارک و حرمت، مشرَّف و تقدیس نهاده است، به علت منزلت رفیع آن دارای نام&amp;zwnj;های فراوان است، از جمله نام&amp;zwnj;هایی که در قرآن کریم ذکر شده است عبارتند از:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مکّة: مشهورترین نام آن است: الله جل جلاله می&amp;zwnj;فرماید:(وَهُوَ الَّذِي كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنْكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُمْ بِبَطْنِ مَكَّةَ مِنْ بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا). [فتح:24].&amp;laquo;او الله است كه دست آنها (مشركان) را از شما، و دست شما را از آنان در دل مكه (يعني حديبيه) كوتاه كرد، بعد از آنكه شما را بر آنها پيروز نمود; و الله به آنچه انجام مى&amp;rlm;دهيد بيناست&amp;rlm;&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بکّة: یکی دیگر از نام&amp;zwnj;های شهر مکّه است که قرآن می&amp;zwnj;فرمايد:&amp;nbsp;(إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِلْعَالَمِينَ). [آل عمران:96].&amp;laquo;نخستين خانه&amp;rlm;اى كه براى مردم (و نيايش الله) قرار داده شد، همان است كه در سرزمين بكّه است، كه پربركت، و مايه هدايت جهانيان است&amp;rlm;&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;أُم القُری: نام دیگر آن ام القری است که الله جل جلاله می&amp;zwnj;فرماید:(وَكَذَلِكَ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ قُرْآَنًا عَرَبِيًّا لِتُنْذِرَ أُمَّ الْقُرَى وَمَنْ حَوْلَهَا وَتُنْذِرَ يَوْمَ الْجَمْعِ لَا رَيْبَ فِيهِ فَرِيقٌ فِي الْجَنَّةِ وَفَرِيقٌ فِي السَّعِيرِ) &amp;nbsp;[شوری:7].&amp;laquo;و اين گونه قرآنى عربى (فصيح و گويا) را بر تو وحى كرديم تا &amp;laquo;ام&amp;rlm;القرى&amp;rlm;&amp;raquo; (مكّه) و مردم پيرامون آن را انذار كنى و آنها را از روزى كه همه خلايق در آن روز جمع مى&amp;rlm;شوند و شك و ترديد در آن نيست بترسانى؛ گروهى در بهشتند و گروهى در آتش سوزان!&amp;rlm;&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و به اتفاق مفسرین ام القری همان شهر مکّه است و بدین نام خوانده شده است&amp;nbsp; زیرا شریف&amp;zwnj;تر و برتر از سایر شهرها، و نزد الله و رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم محبوب&amp;zwnj;تر است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;البلد الأمین: از جمله نام&amp;zwnj;های مکّه بلد الأمین است الله جل جلاله می&amp;zwnj;فرماید:&amp;nbsp;(وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ * وَطُورِ سِينِينَ * وَهَذَا الْبَلَدِ الْأَمِينِ *). &amp;nbsp;[التین:1ـ3].&amp;laquo;قسم به انجير و زيتون * و سوگند به &amp;laquo;طور سينين&amp;rlm; * و قسم به اين شهر امن ( مكّه)&amp;raquo;.و بلد (شهر) امین همان شهر مکه است بدون اختلاف میان مفسرین ...، ونام&amp;zwnj;های فراوان دیگری که این شهر پر امن و امان به آن خوانده شده است .&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;2 ـ حدود حرم:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به علت اهمیت این موضوع و احکام شرعی فراوانی که الله جل جلاله در رابطه با آن برای حرم خویش وضع نموده است تعیین حدود بیت الحرام به وحی الهی بوده است. پس جبرئیل فرود آمد تا به ابراهیم ؛ بنیانگذار و سازنده کعبه حدود بیت الحرام را نشان دهد، و ابراهیم خلیل مرز و حدود حرم را وضع می&amp;zwnj;نمود، و حدود حرم در زمان رسول الله تجدید گردید رسول خدا صلى الله عليه وآله وسلم در سال فتح مکه، اسد خزاعی را فرستاد تا حدود حرم را تعیین نمود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابونعیم از ابن عباس رضي الله عنه روایت می&amp;zwnj;نماید که پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم در سال فتح مکّه اسد خزاعی را فرستاد تا نشانه&amp;zwnj;های حرم را تجدید بنا کرد که ابراهیم آنرا با راهنمایی جبرئیل نهاده بود، ابن حجر گفته است که اسناد این حدیث حَسَن است .&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و همینطور علامات حرم تا به امروز بر حسب نیاز تجدید می&amp;zwnj;گردد .&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام نووی: می&amp;zwnj;گوید: بدان که شناخت نشانه&amp;zwnj;های حرم مهمترین چیزی است که می&amp;zwnj;بایست به آن عنایت شود زیرا احکام فراوانی به آن تعلق بسته است .&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;3 ـ آغاز ساخت حرم و کعبه معظمه:&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;موضوع آغاز ساخت کعبه معظمه و حرم و مناسک حج بنابر آنچه که در قرآن وارد گشته است با ابراهیم خلیل الرحمن و پسرش اسماعیل إ ارتباط دارد، حافظ ابن کثیر گفته است:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(ظاهر قرآن اقتضاء می&amp;zwnj;نماید که ابراهیم ؛ اولین کسی است که آنرا بنا و تأسیس نهاده است)&amp;nbsp; گرچه نصوص وارده در این زمینه احتمال وجود ساخت آنرا قبل از ابراهیم ؛ نفی نمی&amp;zwnj;نمایند. والله أعلم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اما در مورد ساختن کعبه و پرداختن ابراهیم به آن با یارى پسرش اسماعیل عليهما السلام الله جل جلاله چنين می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;(وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَاهِيمُ الْقَوَاعِدَ مِنَ الْبَيْتِ وَإِسْمَاعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ). [بقره:127].&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;و (نيز به ياد آوريد) هنگامى را كه ابراهيم و اسماعيل، پايه&amp;rlm;هاى خانه (كعبه) را بالا مى&amp;rlm;بردند، (و مى&amp;rlm;گفتند): پروردگارا! از ما بپذير، كه تو شنوا و دانايى!&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روایات صحیحی از پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم در زمینه آغاز امرِ حرم و داستان ساختن آن وارد گشته است، بخاری در کتاب صحیح خود از سعید بن جبیر روایت می&amp;zwnj;نماید که ابن عباس رضي الله عنهما گفته است:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اولین كمربند(مِنْطَق) [با كسر ميم و سكون نون وفتح طا] که زنان اتخاذ نموده&amp;zwnj;اند از طرف مادر اسماعیل بوده است، منطقی را اتخاذ نمود، که آثار و نشانه فرار كردن را از ساره گم كند (چون وقتى هاجر اسماعيل را بدنيا آورد ساره بسيار ناراحت شد ، سپس ابراهیم هاجر و پسرش اسماعیل [که شیر خواره بود] را به نزد بیت بالاتر از زمزم آورد. آن هنگام کسی در آنجا نبود و آبی نیز وجود نداشت و کیسه&amp;zwnj;ای از خرما و مشك آبى کنار آنها گذاشت سپس ابراهیم روانه و رهسپار شد و هاجر (مادر اسماعیل) او را دنبال کرد و گفت: ای ابراهیم کجا می&amp;zwnj;روی؟ و ما را در این درّه که نه انسان و نه چیزی در آن مى&amp;rlm;باشد تنها می&amp;zwnj;گذاری؟ چند بار سخن خود را به او گفت. ولی او به وی التفات نمی&amp;zwnj;نمود، وبالأخره به ابراهیم گفت: آیا الله جل جلاله به تو دستور داده است؟ گفت: آری.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گفت: در این صورت مرا تباه نمی&amp;zwnj;گرداند، سپس برگشت و ابراهیم رهسپار گردید تا اینکه به گردنه&amp;zwnj;ای رسید جایی که از دیدگان پنهان شد و به بیت الحرام رو نمود و دستش را بلند کرد و با این کلمات خدایش را فراخواند و فرمود:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(رَبَّنَا إِنِّي أَسْكَنْتُ مِنْ ذُرِّيَّتِي بِوَادٍ غَيْرِ ذِي زَرْعٍ عِنْدَ بَيْتِكَ الْمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُوا الصَّلَاةَ فَاجْعَلْ أَفْئِدَةً مِنَ النَّاسِ تَهْوِي إِلَيْهِمْ وَارْزُقْهُمْ مِنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ). &amp;nbsp;[ابراهیم:37].&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;پروردگارا! من بعضى از فرزندانم را در سرزمين بى&amp;rlm;آب و علفى، در كنار خانه&amp;rlm;اى كه حرم توست، ساكن ساختم تا نماز را برپا دارند؛ تو دلهاى گروهى از مردم را متوجه آنها ساز؛ و از ثمرات به آنها روزى ده؛ شايد آنان شكر تو را بجاى آورند!&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و مادر اسماعیل به شیر دادن اسماعیل پرداخت و از آن آب هم می&amp;zwnj;نوشید تا اینکه آب مشک به پایان رسید و هر دو تشنه شدند، و به پسرش نگریست که (از شدت تشنگی) بر خود می&amp;zwnj;پیچید، از کراهت و ناراضی اینکه به وی بنگرد راه افتاد، کوه صفا نزدیکترین کوه به وی بود بالای آن رفت. سپس به درّه رو کرد تا بنگرد آیا کسی را می&amp;zwnj;بیند؟ و هیچ کس را ندید، از کوه (صفا) پایین آمد، به درّه که رسید، لباس را جمع نمود، با تلاش طاقت فرسایی سعی نمود تا از درّه بگذرد، سپس به کوه مروه آمد و از آن بالا رفت تا نظاره کند که آیا کسی را می&amp;zwnj;بیند، کسی را ندید، هفت بار این عمل (آمد و رفت از صفا به مروه و بالعکس) را انجام داد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابن عباس رضي الله عنه فرموده است: پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم فرموده است (این است حکمت سعی مردم میان دو کوه) وقتی که بر کوه مروه صعود کرد صدایی را شنید به خود گفت: ساكت شو، دوباره آنرا شنید، و گفت اگر مدد (آب و نانی) با خودداری صدایت را شنیدم، به سمت صدا رفت، در مکان زمزم با فرشته&amp;zwnj;ای روبرو گردید، فرشته با عقب خود، ـ يا گفت: با بال خود ـ به (زمين زد) تا اینکه آب نمایان و ظاهر گشت، و با دستان خویش برای آن آبگیری درست کرد، و آب را در مشک خویش می&amp;zwnj;ریخت و بعد از آنکه در مشک ریخت آب فوران و بالا می&amp;zwnj;آمد. ابن عباس رضي الله عنه گفته است که: پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم فرموده است: الله جل جلاله مادر اسماعیل را بیامرزد اگر زمزم را آزاد می&amp;zwnj;گذاشت (و آبگیر نمی&amp;zwnj;ساخت و با مشت پر نمی&amp;zwnj;کرد) زمزم چشمة روان و پرآبی می&amp;zwnj;بود، می&amp;zwnj;گوید: مادر اسماعیل آب را نوشید و بچه&amp;zwnj;اش را شیر داد و فرشته به وی گفت: هراس هلاک شدن را نداشته باشید، در این مکان این پسر و پدر او خانة خدا را بناء می&amp;zwnj;نمایند و الله جل جلاله اهل خویش را هلاک نمی&amp;zwnj;گرداند، و بیت همچون تپه ارتفاع می&amp;zwnj;یابد و سیلهایی از چپ و راست آنرا در برمی&amp;zwnj;گیرند همینطور بود تا اینکه کاروانی از طایفه (جُرهُم) که از راه کداء&amp;nbsp; آمده بودند از کنار آنها عبور نمودند و در دامنه مکّه توقف کردند و پرنده&amp;zwnj;ای را با حالت دور و چرخش در آسمان دیدند و گفتند این پرنده بر روی آب چرخ می&amp;zwnj;خورد حتماً در این درّه و اطراف آن آب وجود دارد، در حاليكي خبر نداريم كه آبي در اينجا باشد، یکی یا دو نفر را فرستادند و آنها به آب برخورد نمودند و برگشته و آنان را از وجود آب خبر نمودند و با هم به طرف آب روی آوردند. و هاجر مادر اسماعيل کنار آب بود، گفتند: آیا اجازه می&amp;zwnj;دهید که نزد شما منزل گزینیم، گفت آری: به شرطی که هیچ حقی در آب نداشته باشید، گفتند آری.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابن عباس رضي الله عنه از زبان پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم بیان می&amp;zwnj;نماید: آنها (کاروان) با هاجر مواجه گشتند و او هم دنبال همسایه&amp;zwnj;ای بود، نزد وی سکنی گزیدند و به دنبال اهل خویش فرستادند و آنان نیز با آنها منزل نمودند و خانه&amp;zwnj;ها زياد شد و پسر (اسماعیل) به سن جوانی رسید و زبان عربی را از آنها فرا گرفت و چون به جوانی رسید با آنها رقابت می&amp;zwnj;کرد و آنان را شگفت زده کرده بود و چون به سن ازدواج نایل گشت زنی از طایفه خود را به همسری وی درآوردند، و مادر اسماعیل از دنیا برفت، ابراهیم بعد از ازدواج اسماعیل برگشت تا بازمانده خویش را ببیند، اسماعیل را نیافت از همسرش درباره او جویا شد گفت: بیرون رفته است تا برایمان روزی طلب کند، سپس از زندگی و اوضاع آنان پرسید، گفت: در تنگنا و سختی به سر می&amp;zwnj;بریم و نزد او شَکْوَه نمود. ابراهیم گفت: هرگاه همسرت آمد سلام مرا به او برسانید و به او بگوئید آستانه درب را تغییر دهد، وقتیکه اسماعیل برگشت مثل اینکه بویی برده بود، فرمود: آیا کسی پیش شما آمده بود، زن گفت، آری پیرمردی با چنين مشخصاتي پیش ما آمد و در مورد تو از من جویا شد، او را اطلاع دادم، و در مورد معیشت و زندگی&amp;zwnj;مان سؤال نمود گفتم در تنگنا و مضیقه می&amp;zwnj;باشیم، گفت: آیا شما را هم به چیزی توصیه و سفارش نمود؟ گفت بله: به من گفت تا سلام وی را به تو برسانم و می&amp;zwnj;گفت اینکه چهارچوب زیرین درگاهش را تغییر دهد، اسماعیل گفت: آن پیرمرد پدرم بوده است و مرا دستور داده است تا از توجدا شوم، و به خانواده&amp;zwnj;ات بپیوند، او را طلاق داد و با زن دیگری از آن طایفه ازدواج نمود، مدت زیادی ابراهيم از آنها دور بود پس پیش آنها آمد، اسماعیل را نیافت، نزد همسر وی رفت و از اسماعیل جویا شد همسرش گفت: دنبال طلب روزی برای ما بیرون رفته است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گفت: وضعیت شما چطور است؟ و از اوضاع و زندگی آنها سؤال کرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همسر اسماعيل: ما در خوبی و خوشی به سر می&amp;zwnj;بریم، و الله را سپاس نمود فرمود: خوراکتان چیست؟&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گفت: گوشت.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گفت: نوشیدنی&amp;zwnj;تان چیست؟&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گفت: آب.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;فرمود: الهى در گوشت و آب برای آنان برکت قرار دهید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیامبر اسلام صلى الله عليه وآله وسلم فرموده است: آن هنگام آنها بذری نداشته&amp;zwnj;اند و چنانچه بذر می&amp;zwnj;داشتند بر فزونی و برکت آن نیز دعا می&amp;zwnj;کرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابراهیم گفت: هرگاه همسرت آمد سلام مرا به او برسانید و به او بگوئید آستانه دروازه&amp;zwnj;اش را ثابت نگه دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;وقتیکه اسماعیل آمد گفت: آیا کسی پیش شما آمده است گفت: آری، پیر خوش سیمایی نزدمان آمده بود و تمجید نمود، و از شما سؤال کرد، به او گفتم: که دنبال کسب معاش است، در مورد چگونگی معیشتمان از من پرسید، به او گفتم: در خوبی و خرّمی به سر می&amp;zwnj;بریم، اسماعیل گفت: آیا شما را به چیزی سفارش و توصیه ننمود؟ گفت: آری، او سلام&amp;nbsp; می&amp;zwnj;رساند، و دستورت می&amp;zwnj;دهد تا آستانه دروازه&amp;zwnj;ات را ثابت نگه داری، اسماعیل گفت: او پدرم بوده است و منظورش از آستانه درب شمائید. به من امر نموده تا شما را نگه دارم و از تو جدا نشوم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سپس ابراهيم مدتی نامعلوم از آنها بدور بود و بعد از آن برگشت و اسماعیل زیر درخت تنومندی در نزدیکی زمزم در حال تیز کردن تیر و خدنگش بود وقتیکه ابراهیم را دید به سوی او شتافت و به طریق غیر قابل توصیف یکدیگر را در آغوش گرفتند سپس ابراهیم گفت: ای اسماعیل الله جل جلاله مرا به انجام کاری دستور داده است اسماعیل گفت: هر آنچه پروردگارت دستور داده است انجام دهید، گفت: مرا یاری می&amp;zwnj;نمائید؟ اسماعیل گفت: شما را یاری می&amp;zwnj;نمایم. ابراهیم گفت: الله جل جلاله مرا دستور داده است تا در اینجا خانه&amp;zwnj;ای بسازم و به تپه بلندی در همان اطراف اشاره کرد همانجا دیوارهای خانه را بالا بردند و اسماعیل سنگ می&amp;zwnj;آورد و ابراهیم آنرا می&amp;zwnj;ساخت تا اینکه خانه ارتفاع یافت و حجرالاسود را آورد و آنرا گذاشت، ابراهیم می&amp;zwnj;ساخت و اسماعیل به وی سنگ می&amp;zwnj;داد، و می&amp;zwnj;گفتند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;(رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ) [البقره:127].&amp;laquo;پروردگارا! از ما بپذير، كه تو شنوا و دانايى!&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همواره می&amp;zwnj;ساختند تا بر گردِ بیت بچرخند و می&amp;zwnj;گفتند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ). پس این خانه نخستین خانه&amp;zwnj;ای است که در زمین برای عبادت ساخته شده است کما اینکه قرآن می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِلْعَالَمِينَ). [آل عمران:96].&amp;laquo;نخستين خانه&amp;rlm;اى كه براى مردم (و نيايش الله) قرار داده شد، همان است كه در سرزمين مكه است، كه پر بركت، و مايه هدايت جهانيان است&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بخاری از ابوذر رضي الله عنه روایت می&amp;zwnj;کند که او فرموده است گفتم: ای رسول الله نخستین مسجدی که در زمین بنا نهاده شد کدام مسجد است؟ فرمود: &amp;laquo;مسجد الحرام، گفتم: سپس کدام مسجد بنا نهاده شده است؟ فرمود: مسجد الاقصی، گفتم: فاصله میان (ساختن) آنها چند سال بود؟ فرمود چهل سال، سپس هر کجا نماز فرا رسید آنرا اقامه نمائید فضیلت و برکت در آن است و الله جل جلاله اعلام داشته است که او نشانه&amp;zwnj;ها و راهنماهای آشکاری که دلالت بر ساختن آن به وسیله ابراهیم ؛ نماید در آن باقی و نگه داشته است و الله جل جلاله آنرا تعظیم و مبارک گردانیده است و قرآن می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(فِيهِ آَيَاتٌ بَيِّنَاتٌ مَقَامُ إِبْرَاهِيمَ وَمَنْ دَخَلَهُ كَانَ آَمِنًا وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ). [آل عمران:97].&amp;laquo;در آن، نشانه&amp;rlm;هاى روشن، (از جمله) مقام ابراهيم است؛ و هر كس داخل آن (خانه خدا) شود؛ در امان خواهد بود، و براى الله بر مردم است كه آهنگ خانه (او) كنند، آنها كه توانايى رفتن به سوى آن دارند. و هر كس كفر ورزد (و حج را انكار كند، به خود زيان رسانده)، الله از همه جهانيان، بى&amp;rlm;نياز است&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قتاده و مجاهد فرموده&amp;zwnj;اند: که مقام ابراهیم از نشانه&amp;zwnj;های روشن است . از آنچه گذشت عظمت جایگاه این شهر مبارک و علو منزلت و ارزش آن نمایان می&amp;zwnj;گردد و ذکر پیاپی نصوص مذکور در تعدد نام&amp;zwnj;های این شهر و بیان حدود و مبدأ بنیان آن و آنچه که در بیان حرمت آن ذکر می&amp;zwnj;گردد بر عظمت و علو منزلت این شهر دلالت می&amp;zwnj;نماید. والله أعلم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند برای معلومات بیشتر کتاب&lt;/p&gt;

&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/485/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;فضایل و احکام مکه مکرمه&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;را با فشار دادن بر روی اسم کتاب داونلود نمایند.&lt;/div&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتابِ زندگانی ملکۀ عفت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/217</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin-right: -0.2pt; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;معرفی کتابِ زندگانی ملکۀ عفت&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin-right: -0.2pt; text-align: justify;&quot;&gt;در خانوادة نبوت, ملکة عفت ام المؤمنین عایشه صدیقه رضی الله عنها &amp;nbsp;مقام بالا و ارزش درخشانی داشت. تاریخِ اسلام از نامِ نیک ایشان درخشنده و روشن است، لیکن دشمنانِ دوست نمای ظاهر میشِ باطن گرگ، زبان طعنه و بدگویی نسبت به سربازانِ پیامبر و جماعت صحابه رضی الله عنهم دراز کرده و آنها را هدفِ تیرهای طعنه و سرزنش قرار داده و کارهای اساسیِ آنها را بی&amp;zwnj;اساس شمرده و دروغ&amp;zwnj;ها در بارة آنها ساختند تا بدین وسیله اتحاد اسلامی را متزلزل و شربت شیرینِ یگانگی مسلمانان را تلخ و ناگوار سازند آنان حتی به بزرگوارانی که در حَرَم پیامبر بوده اند نیز جسارت کرده اند یعنی به کسانی که قرآن مجید آنها را پاک و مقدس دانسته و آنها را اُمَّهاتِ مُؤمِنین نامیده است، چرا که اگر خدای نخواسته آنها نیکوسیرت نبودند و لکه&amp;zwnj;ای بر دامن عفت و دین&amp;zwnj;داریِ آنها می&amp;zwnj;بود، هیچ وقت خداوند ذُوالجلال آنها را برای حبیب خود انتخاب نمی&amp;zwnj;کرد و آنها را مادران مؤمنین لقب نمی&amp;zwnj;داد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin-right: -0.2pt; text-align: justify;&quot;&gt;حضرت اُم المؤمنین عایشه مانند نفوس قدسیه همان قدر که بزرگوار و پاکدامن هستند، همان قدر هم مظلوم و بُردبار هستند، چون گروهی در تاریخ امت اسلام بودند و هستند که سعی دارند هر طور شده، ثابت کنند که العیاذبالله خداوند متعال برای پیامبر آخرالزمان زن&amp;zwnj;هائی انتخاب کرده که عفیف نبوده و با خانوادة نبوت تناسب نداشته اند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در این کتاب برادران و خواهران مسلمان با سیرت ملکۀ عفت ام المؤمنين محبوبۀ رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم حضرت عایشه صدیقه بنت صدیق رضی الله عنهما آشنا خواهید شد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برای داونلود کتاب بر روی اسم کتاب در این صفحه فشار دهید&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/939/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;زندگانی ملکۀ عفت&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابهایی در رد مسیحیت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/216</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابهایی در رد مسیحیت&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مبارزه و کشمکش بین حق و باطل از ازل جاریست و تا ابد ادامه دارد. مذاهب، فرقه ها و گروههای مختلفی با اغراض و اهداف متفاوت همیشه کوشیده اند تا به هر نوع ممکن در مقابل مذهب حق قد علم نموده و نور آن را خاموش سازند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و بعد از اینکه دین مقدس اسلام ظهور کرد، باطل پرستان و کجروان سعی نمودند هر طوری که شده جلو گسترش این دین را بگیرند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;یهودیان از همان ابتدا (گرچه خود یارای مقابله نداشتند) اما با نفاق و دو رنگی همیشه دشمنان اسلام را یاری رسانده اند و یا خود نیز تا آنجايی که توان داشتند وارد میدان شدند. جهان مسیحیت که یکی از بزرگترین ادیان عالَم است نیز در سالهای نخست دعوت اسلامی دست به کار شده، و گروهی از علما و کشیش های نجران را جهت مناظره و بحث علمی به مدینه منوّره فرستادند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و از آن پس برخورد های نظامی بین مسیحیان و مسلمانان ادامه داشته تا اینکه در زمان عمر فاروق رضى الله عنه مسلمانان ضربه ها ی کاری را بر جهان مسیحیت وارد نموده، و امپراطوری آنان را شکست فاحش دادند و همین طور در زمان خلفای بنی امیّه و بنی عباس نیز در هر میدان ذلت و خواری نصیب مسیحیان بوده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خلفای عثمانی نیز از خود تقصیر نشان ندادند، بارها تا قلب اروپا پیش رفتند و با دشمن در خانۀ خودش پیکارها نمودند تا اینکه سلطان محمد فاتح رحمه الله قسطنطنیه را فتح نموده و ضمیمه امپراطوری قوی اسلامی کرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جنگهای صلیبی نیز تداوم همین کشمکش بوده و جهان مسیحیت اقدام به انتقامجوئی از مسلمانها نمود اما ابر مرد مسلمان صلاح الدین ایّوبی رحمه الله &amp;nbsp;آنها را درهم شکسته، مجد و عظمت اسلام را برای همه به نمایش گذاشت.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در مقابل مسیحیها و صلیبیان نیز از کوشش باز نایستاده حکومت اسلامی را در اندلس (اسپانیا) از بین برده و بزرگترین مراکز علمی جهان آنروز نظیر قرطبه، اشبیلیه و طلیطله را بطور فجیع ویران نموده و دادگاه های تفتیش عقائد، هزاران مسلمان را به بدترین وجه ممکن به قتل رساندند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در این اواخر نیز مسیحیان - بعد از فروپاشی اتحاد جماهیر شوروی و نظام کمونیستی - مسلمانان را تنها دشمن خویش دانسته از هر فرصت مناسب استفاده می نمایند تا ضربه هاي کاری را بر اسلام و مسلمین وارد نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;عملات نظامي به كشورهاي اسلامي، كمك و مساعدت هزاران مؤسسه تبشیری و عیسوی در قاره افریقا و کشورهای فقیر آسیائی تداوم همین کشمکش و مبارزه است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما غافل از اینکه:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(&lt;strong&gt;يُرِيدُونَ لِيُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَاللَّهُ مُتِمُّ نُورِهِ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ&lt;/strong&gt;) الصف: ٨&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo; مى&amp;rlm;خواهند با دهانهايشان نور الله&amp;nbsp; را خاموش گردانند ولي الله كامل كنندۀ نور خود است و هر چند كه كافران دوست نداشته باشند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آري نور الله متعال به این آسانی خاموش شدنی نیست... همه روزه در اخبارها و سایتهای انترنیتی خبر مسلمان شدن عدّه زیادی از كفار و خاصتاَ مسیحیان وبخصوص علما و کشیش های آنها را در داخل امریکا و اروپا و ديگر نقاط جهان می خوانیم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اين دلیلی قاطع بر حقانیت دین مبین اسلام و باطل بودن ادیان تحریف شدۀ مسیحیت و یهودیت می باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;مسیحیت تحريف ش&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;دۀ &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;امروزی بر سه بنا استوار است: &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ol&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot; value=&quot;NaN&quot;&gt;عقیدهء تثلیث یا خدایان سه گانه.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot; value=&quot;NaN&quot;&gt;صَلْب یا (به دار کشیده شدن) و تقدیس آن و فدا شدن مسیح عليه السلام .&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot; value=&quot;NaN&quot;&gt;&amp;nbsp;محاسبهء مسیح با مردم در روز رستاخیز.&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كه تضاد &amp;nbsp;این فکر و عقیده با فطرت سالم و عقل و منطق سبب روی آوردن مسیحیان به دین مبین اسلام گردیده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در راستای آگاهی بیشتر برادران و خواهران&amp;nbsp;عزیز خاصتا جوانان مسلمان، با دین باطل مسیحیت کتابخانه عقیده تصمیم گرفت که مجموعه ای از کتابهایی را که در رد مسیحیت توسط علمای افاضل جهان اسلام نگاشته شده است را &amp;nbsp;خدمت شما عزیزان معرفی نماید تا باشد که دعوتگران مسلمان به سلاح علم مسلح شوند و&amp;nbsp; برادران و خواهران عزیز با&amp;nbsp; عقاید باطل و تحریف شدۀ مسیحیت بیشتر آشنا شده و پی به مکر و حیله های آنان ببرند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با فشار بر روی اسم کتاب می توانید آنرا داونلود نمایید&lt;br /&gt;
صلیب شکسته&lt;br /&gt;
مسیحیت در آیینه حقایق&lt;br /&gt;
مسیحیت را بشناسید&lt;br /&gt;
فریب جدید در ائتلاف تثلیث و توحید&lt;br /&gt;
دعوت مسیحیان به توحید در پرتو تعالیم قرآن و انجیل&lt;br /&gt;
مسجد یا کلیسا؟&lt;br /&gt;
موقف اسلام در مورد کفر یهود و نصارا&lt;br /&gt;
خیانت در گزارش تاریخ 3 جلد&lt;br /&gt;
آشنایی با ادیان در قرآن&lt;br /&gt;
از آهنگ پاپ تا آهنگ ناب&lt;br /&gt;
دشمنی یهود و نصاری با اسلام&lt;br /&gt;
به سوی نور جلد اول&lt;br /&gt;
به سوی نور جلد دوم&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب دوستی و خویشاوندی میان اهل بیت و صحابه آمادۀ چاپ</title>
<link>http://qalamlib.com/news/215</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب دوستی و خویشاوندی میان اهل بیت و صحابه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در تاریخ بشریت سابقه&amp;nbsp; ندارد كه شاگردان و&amp;nbsp; یاران پیامبری پس از ایمان وكسب دهها و صدها مدال افتخار، با خاندان پیامبرشان به ستیز ستیز بپردازند، اما متاسفانه دجالان دین فروش و دشمنان پیامبر و صحابه با تحریف تاریخ و دروغ پردازیهای تخیلی و افسانه ای چنین وانمود كرده اند كه گویا پیامبر ما حضرت محمد&amp;nbsp; صلى الله علیه وآله وسلم در تفهیم و اجرای رسالت خود نعوذ بالله ناكام بوده، و در تمام مدت بیست و سه سال دوران طلایی تاریخ بشر، كه ایشان نمونه&amp;zwnj;ی كامل از یك انسان كامل با پشتیبانی وحی و نظارت الهی، رهبری جهان معنویت را به عهده داشته، نتوانسته - جز چند نفری كه تعدادشان حد اکثر از عدد انگشتان دو دست بیشتر نیست - شاگردانی را پرورش دهد كه پس از وی حد اقل باخانواده ایشان رابطه صمیمی داشته باشند!.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;روابط خویشاوندی بین پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و اصحاب کرام رضی الله عنهم اجمعین&quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/04.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بسیار عجیب است! چگونه باید اینگونه افسانه هایی را باور كرد، در حالی كه طبق شواهد روشن و براهین قاطع، صحابه و اهل بیت نه تنها یار و یاور یكدیگر بودند، بلكه با وجود بعضی رنجشهای طبیعی در جامعه بشری، پیوند ناگسستنی بین آنان وجود داشت و بشدت به یكدیگر احترام داشتند و با یكدیگر پیوند خویشاوندی برقرار میكردند، و به نامهای یكدیگر افتخار می&amp;zwnj;ورزیدند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;نامگذاری های فرزندان علی علیه السلام به نام های صحابه&quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/01.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;یکی از دلایل وجود الفت و محبت و روابط حسنه، بین اصحاب بزرگوار و اهل بیت پیامبر ارتباط خویشاوندی سببی و نسبی است، علاوه بر آن که اهل بیت فرزندانشان را با نام اصحاب نام&amp;zwnj;گذاری می&amp;zwnj;کردند.&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام علی رضی الله عنه پسرانش را با نام خلفای راشدین نام&amp;zwnj;گذاری کرد، از جمله چند پسر به نام&amp;zwnj;های عمر و عثمان و ابوبکر داشت.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام زین العابدین رضی الله عنه یکی از دخترانش را عائشه نامید، و فرزندانی به نام&amp;zwnj;های عبدالرحمن و عمر داشت که برادر پدری و مادری زید بن علی بود.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;موسی بن جعفر ملقب به کاظم رحمه الله&amp;nbsp; یکی از پسرانش را ابوبکر و یکی را عمر، و یکی از دخترانش را عائشه و دیگری را أم&amp;zwnj;سلمه نامید.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین یکی از دختران امام علی بن موسی الرضا رحمه الله عائشه نام داشت.&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روابط خویشاوندی بین اهل بیت و صحابه رضی الله عنهم اجمعین&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;روابط خویشاوندی بین اهل بیت و صحابه رضی الله عنهم اجمعین&quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/02.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;محمد باقر بن زین العابدین بن حسین: با ام فروه دختر قاسم بن محمد بن ابوبکر صدیق &amp;nbsp;ازدواج کرد و جعفر صادق از او متولد شد.&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادر و خواهر گرامی! با چشم بصیرت ببینید که، اهل بیت با خانوادۀ ابوبکر و عمر و دیگر صحابه رضی الله عنهم اجمعین ارتباط خویشاوندی برقرار کرده&amp;zwnj;اند! همان ابوبکر و عمری که امروز مدعیان محبت اهل بیت آنها را لعن و نفرین می کنند.&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام علی رضی الله عنه دخترش (ام کلثوم) را به عقد ازدواج عمر بن خطاب رضی الله عنه درآورد، و این دلیل ارتباط محکم بین آن&amp;zwnj;هاست.&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;ul&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حسن بن علی بن ابی طالب: با حفصه دختر عبدالرحمن بن ابوبکر ازدواج کرد.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رقیه دختر حسن بن علی بن ابی طالب: به ازدواج عمرو بن زبیر بن عوام در آمد.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ملیکه دختر حسن بن علی بن ابی طالب: با جعفر بن مصعب بن زبیر ازدواج کرد و دختری به نام فاطمه از آن&amp;zwnj; زن و شوهر متولد شد.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;موسی بن عمر بن علی بن حسین بن علی بن ابی طالب: با عبیده دختر زبیر بن هشام بن عروه بن زبیر بن عوام ازدواج کرده و عمر درج و صفیه و زینب از او متولد شدند.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;محمد بن عبدالله نفس زکیه بن المثنی بن حسن سبط بن علی بن ابی طالب: با فاخته دختر فلیح بن محمد بن منذر بن زبیر ازدواج کرده و پسری به نام طاهر از آن&amp;zwnj;ها متولد شد.&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رقیه و أم&amp;zwnj;کلثوم دختران رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم &amp;nbsp;یکی پس از دیگری با عثمان بن عفان رضی الله عنه &amp;nbsp;ازدواج کردند، و هیچ کدام از علمای شیعۀ امامیه این ازدواج و ارتباط دامادی و پدر زنی عثمان با پیامبر را انکار نکرده&amp;zwnj;اند.&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin-right: 18pt; text-align: justify;&quot;&gt;و نمونه های دیگری که در کتابهای بخش اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم در کتابخانه عقیده به تفصیل بیان شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin-right: 18pt; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img align=&quot;baseline&quot; alt=&quot;دختران پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم &quot; border=&quot;0&quot; hspace=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/khabar/03.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آری برادران و خواهران عزیز! عشق و محبت و احترام صحابه و اهل بیت نسبت به یكدیگر چنان در رگ و خون آنان عجین شده بود كه بوی عطر صفا و صمیمیت آن تا امروز نیز مشام جهانیان را عطر آگین می&amp;zwnj;كند، اما بیمارانی كه حس بویایی شان كار نمی&amp;zwnj;كند و همواره دچار زكام و سرما خوردگی هستند؛ از استشمام این&amp;nbsp; نعمت بزرگ محرومند و شاید هم مدعی شوند كه بوی گند به مشامشان می&amp;zwnj;رسد، راست می&amp;zwnj;گویند؛ چون مریضند، اگر سالم بودند تشخیص می&amp;zwnj;دادند كه ادعای بوی گند دروغ است؛ جهان عطر آگین است ولی آنها مانند كوری هستند كه عصاكش آنان دیگرانند و خدا نكند كه خودِ عصاكش هم كور باشد&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما اینکه امروز عده ای به نام تشیع و محبت اهل بیت این حقایق را رد می کنند و یا آنرا از مردم پنهان می کنند، می ترسند که بازار آنها کساد می شود! و دیگر کسی خمس نمی پردازد! دور و بر بعضی ها خلوت می شود! و بیکار می گردند! و بسیاری مضرات دیگر.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتابی که اینک معرفی می شود، امیدواریم بتواند این واقعیت را روشن كند و این واقعیت ساده و روشن و منطبق با عقل و نقل&amp;nbsp; و فطرت سالم را با همین صفحات اندك و بدون نیاز به كتابها و مراجع بیشتر برای همه&amp;zwnj;ی حق جویان و وحدت خواهان واقعی روشن نموده، و راه وحدت و محبت و همزیستی مسالمت آمیز را برای مسلمین هموار گرداند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتابی که اینک می خواهیم خدمت شما عزیزان معرفی نماییم خیلی کوتاه و مختصر اما مستند و آراسته با تصاویر زیبا می باشد که امیدواریم الله تبارک و تعالی آنرا به عنوان خدمتی در راستای تحکیم وحدت اسلامی و زدودن اختلاف و فتنه در بین مسلمانان&amp;nbsp; قبول نموده و به نویسنده و مترجم و کسانی که در تهیه و تریب آن همکاری نمودند اجر عظیم در دنیا و آخرت نصیب نماید.&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/634/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;دریافت نسخه پی دی اف با کیفیت بالا و آماده چاپ&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;
&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب وحدت و شفقت بین صحابه و اهل بیت و آیت الله جعفر سبحانی و آقای عبدالله حیدری</title>
<link>http://qalamlib.com/news/213</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;حضرت آیت الله العظمی جعفر سبحانی و آقای عبدالله حیدری&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;سلام علیکم &lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;با شتاب و سراسیمگی و البته با جدیت از شماها نزد خداوند شکایت خواهم کرد، تقصیر من مسلمان ساده چیست که راه روشن و مستقیم را بر من مشتبه کرده اید؟! &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;سالیان سال است که با شما حضرت آیت الله و آثار و خدمات شما آشنا هستم و گمان نیک داشتم که دارید به اسلام خدمت می کنید و برای نجات امت اسلامی کمر بسته اید، اخیرا کتابی بدستم رسید که با کمال شگفتی دیدم حضرت عالی به هر وسیلۀ ممکن کوشیده اید راه وحدت را بروی مسلمین ببندید نمی فهمم چرا؟! &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;یک دیپلمۀ ساده ای مثل بنده که فقط با نور قرآن و توفیق خداوند اخیرا توانسته ام جلو پای خودم را ببنیم چگونه باور کنم، که شخصیتی همچون حضرت عالی با اینکه شعار وحدت سر می دهید از تحقق عملی وحدت در جامعه نگران هستید! &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;کتابی که شما آنرا نقد کرده اید من نویسنده و مترجم آنرا نمی شناسم اما چون نویسندۀ آن عرب است ترجیح دادم با مترجم ارتباط برقرار کنم، &lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;کتاب وحدت و شفقت بین صحابه و اهل بیت&lt;/font&gt; را چند سال پیش خوانده بودم و به نظرم کار مفیدی بود و از علاقه شدید نویسنده و مترجم آن به وحدت امت اسلامی شدیدا متأثر و خوشحال شدم، اما وقتی نقد شما را بر این کتاب خواندم ناگزیر اصل کتاب را مجددا با دقت بیشتری مطالعه نمودم، برخلاف انتظار دیدم حضرت عالی گویا قسم خورده اید که نگذارید عملا وحدتی بین مسلمین محقق شود!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;آخر چرا؟!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;کتاب وحدت و شفقت که جبهه ای باز نکرده بود فقط با تکیه بر جریانات تاریخی غیر قابل انکار خواسته ثابت کند که پیشگامان نخستین اسلام با هم الفت و محبت فراوانی داشته اند شاهد این مدعا هم این است که اهل بیت فرزندان خودشان را به نامهای کسانی نامگذاری کرده اند که ما و شما آنها را غاصب و ظالم و منافق می خوانیم. و حضرت امیر جگرگوشۀ خود را به ازدواج کسی داده که شما علمای محترم ما شیعیان قرنهاست او را بدترین دشمن دین و اسلام و اهل بیت معرفی می کنید! بالآخره ما نفهمیدیم که اگر ثابت شود که واقعا با هم صمیمی بوده اند چه مشکلی پیش خواهد آمد کجای کشتی اسلام درز خواهد کرد؟! &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;از شما علما شنیده ایم که یکی از محدود مواردی که انسان مجاز است دروغ بگوید برای ایجاد صلح و رفع کدورت بین دو مسلمان است، نه تنها مجاز که با این دروغ گفتن ثواب می برد! پس اجازه دهید این پرسش را خیلی جدی مطرح کنم و منتظر پاسخ آن باشم که اگر وحدتی بین صحابه و اهل بیت ثابت شود و این امر سبب گردد که امت اسلامی عملا راه وحدت را در پیش گیرند و کینه و تفرقه و اختلاف را دور کنند به حضرت عالی چه ضرری خواهد رسید؟!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;در پایان از سایت کتابخانه عقیده تمنا می کنم این عریضه بنده را نشر کنند تا خدمت حضرت آیت الله سبحانی برسد. شاید ایشان خواستند بنده را ارشاد کنند و با دلایل قانع کننند پاسخ بنده را بفرمایند. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; مجتبی تهرانی&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;strong&gt;توضیح&amp;nbsp;ادارۀ کتابخانه عقیده&lt;/strong&gt;:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;دوست عزیز! از اینکه لطف کردید و ما را قابل دانستد که نامه شما را نشر کنیم سپاسگذاریم. و در ضمن خوشحالیم که خدمت شما و سایر دوستان عرض کنیم که چاپ چهارم کتاب وحدت و شفقت هم اینک در دست تهیه است که دوستان عزیز می توانند با فشار بر روی اسم کتاب نسخۀ چاپ چهارم کتاب را داونلود نمایند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Tahoma,sans-serif; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; FONT-WEIGHT: 700&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=234&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;کتاب وحدت و شفقت بین صحابه و اهل بیت&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;امیدواریم توانسته باشیم گامی در راستای وحدت امت اسلامی برداریم. شما هم اگر در این راستا سعی داشته باشید پس کتابخانه عقیده را به دوستان خود معرفی کنید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-tab-count: 6&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;mso-tab-count: 1&quot;&gt; &lt;/span&gt;ادارۀ کتابخانۀ عقیده&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>به یاد شهید همیشه جاوید حجه الاسلام مرتضی رادمهر</title>
<link>http://qalamlib.com/news/212</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;به یاد &lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;شهید&lt;/font&gt; همیشه جاوید&amp;nbsp;حجه&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; الاسلام&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;مرتضی رادمهر&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;همینکه از دانشگاه برگشتم پسرم به من اطلاع داد که عمو مصطفی دو سه بار از صبح تا حالا زنگ زده است. فورا گوشی تلفن را برداشتم و به مصطفی که در جنوب کراچی سکونت داشت تلفن کردم. از شنیدن صدایم بسیار خوشحال شد. با ذوق و شوق خاصی به من گفت: آقای دکتر، دوست بسیار عزیزی مهمان من است، می&amp;zwnj;خواهم اگر اجازه بدهید ایشان را به شما معرفی کنم. چه وقتی را مناسب می&amp;zwnj;دانید.&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot; lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Calibri; mso-ansi-language: EN-US; mso-fareast-language: EN-US&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;مصطفی از جمله علمای اهل سنت ایران است که سالهای مدیدی را بجرم فعالیت دینی و کوشش برای بیداری جوانان اهل سنت ایران در زندانهای آن کشور گذرانده و در اثر شکنجه یکی از چشمانش را از دست داده، و ساق پایش را هم شکسته&amp;zwnj;اند که تا حالا با وجود اینکه استخوانش بهم جوش خورده باز هم نمی&amp;zwnj;تواند درست راه برود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;سالهاست که از آشنائیم با مصطفی می&amp;zwnj;گذرد. مردی است بسیار صمیمی و با صفا. چهره&amp;zwnj;ای نورانی دارد که سالهای زندان و شکنجه با وجود تار کردن یکی از چشمانش هیچ نتوانسته از زیبائیش بکاهد. همیشه بشوخی به او می&amp;zwnj;گویم: خوشا بحالت، پارتیت کلفت است، یک چشمت پیش از تو به بهشت رفته، خودت هم به بهانه همین یک چشم هر طوری شده خودت را داخل بهشت می&amp;zwnj;کنی. دعایی بحال ما بیچارگان کن!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;او هم لبخندی می&amp;zwnj;زند وبشوخی می&amp;zwnj;گوید: شما برایم دعای استقامت کن. این نشود که چشمم از من اظهار بیزاری کند و پشت در بهشت بمانم!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;جوانی است بسیار شوخ طبع و با حال. روزهای سخت هجرت و زندگی در پاکستان هرگز نتوانسته کمر او را خم کند. می&amp;zwnj;گوید: در سخترین روزهای هجرت بسیار احساس خوشبختی می&amp;zwnj;کند. و خدا را شکر می&amp;zwnj;گذارد. با خود می&amp;zwnj;گوید: بردگی حضرت یوسف برایش بهتر از زندگی درچاه سیاه و تاریک بود!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;رابطه&amp;zwnj;ی من با مصطفی خیلی صمیمانه بود و هیچ تعارفی با هم نداشتیم. از اینکه در پشت تلفن خیلی محترمانه از من می&amp;zwnj;پرسید؛ چه وقت مناسب است برای دیدارتان تشریف بیاوریم. فهمیدم مهمانش برایش خیلی محترم و عزیز است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;به ایشان گفتم: بعد از نماز عصر تشریف بیاورید مناسب است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;وقتی از نماز عصر بخانه برگشتم دیدم که مصطفی با جوانی که حیا در سیمایش موج می&amp;zwnj;زند جلوی در خانه ایستاده&amp;zwnj;&amp;zwnj;اند. آنها را به اتاق پذیرائی راهنمایی کردم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;مصطفی دوستش را چنین معرفی کرد: برادر دکتر مرتضی رادمهر هستند. ایشان از علمای حوزه&amp;zwnj;ی علمیه قم بودند که چندی پیش پس از مطالعات و مناظراتی که با مولانا محمد عمر سربازی داشتند به مذهب اهل سنت و جماعت گرویدند. و بقول خودشان از شرک نجات یافته اسلام آورده&amp;zwnj;اند!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;مرتضی سرش را پایین انداخته هیچ نمی&amp;zwnj;گفت. من بطرف ایشان نگاهی انداخته گفتم: از آشنائیتان خیلی خوشبختم. سپس ادامه داده گفتم: برادر، چرا نمی&amp;zwnj;گویی سنی شده&amp;zwnj;&amp;zwnj;ام؟ و چرا اصرار داری خودت را مشرکی که مسلمان شده بدانی؟&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;ایشان آهی کشیده گفت: آقای دکتر، شاید شما با مذهب شیعه آشنائی کافی ندارید. من طلبه حوزه علمیه بودم و با توجه به آنچه از خود و مذهب خود می&amp;zwnj;دانم چنین استنتاج کرده&amp;zwnj;ام.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;خدا می&amp;zwnj;داند که در درون خود احساس می&amp;zwnj;کردم که جوانی است مخلص و راستگو. حرفش بدل می&amp;zwnj;نشست. در سیمایش جز صداقت و راستی هیچ نمی&amp;zwnj;دیدی. ولی من با توجه به تجربات سابق مار گزیده شده بودم. جوانان بسیاری از شیعه را دیده بودم که خود را سنی جا می&amp;zwnj;زدند و با ترفند &amp;quot;تقیه&amp;quot; در بین جماعتهای اسلامی رخنه کرده برای حکومت ایران جاسوسی می&amp;zwnj;کردند. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;زیاد به حرفهای این جوان اهمیت ندادم و با لحنی بسیار خشک و با بی مهری به او گفتم: ببین برادر، من نمی&amp;zwnj;گویم شما مثل خیلیهای دیگر دروغ می&amp;zwnj;گویید. و به من اجازه بدهید بگویم: نمی&amp;zwnj;خواهم حرفهایتان را هم باور کنم. چون همین برادر مصطفای عزیز با قلب پاکش چند وقت پیش پزشکی را به من معرفی کرد که مثل شما ادعاها می&amp;zwnj;کرد، و می&amp;zwnj;گفت: پسر آیت الله فلان است و سنی شده، و ما به او کمک کردیم. مدتی در اینجا ماند، سپس از ما خواست او را پیش یکی از رهبران اهل سنت ایران که در قندهار بود بفرستیم تا با همکاری ایشان بتواند بیمارستانی صحرائی برای مداوای زخمیهای طالبان افتتاح کند. از اینجا به قندهار رفت و مدتی هم در بین طالبان بود، و بعدها شنیدیم از آنجا غیبش زده. و مدتی بعد متوجه شدیم؛ اطلاعاتی بوده و به ایران بازگشته.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;حالا شاید شما هم نسخه&amp;zwnj;ای دیگر از او باشید. برای من هم هیچ مهم نیست. برادر عزیز، اگر اطلاعاتی هستی باش. و اگر هم مخلص و راستگو و با ایمان هستی باش. این دنیا ارزش اینرا ندارد که انسان با خیانت و مکر و نیرنگ دو روز زندگیش را فدا کند. فردای قیامت هر آنچه بودیم بر ملا می&amp;zwnj;شود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;ولی اگر اجازه بدهید من به شما دوستانه یک نصیحت می&amp;zwnj;کنم. اگر راست می&amp;zwnj;گویی و سنی شده&amp;zwnj;ای، بدان که ما سنیها کم نیستیم تا شما بخواهید یک عدد به ما اضافه کنید. و از نظر عالم و دانشمند هم هیچ کمی نداریم که روی شما حساب کنیم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;اگر راست می&amp;zwnj;گویی و قوم و خویشت مشرک و بی&amp;zwnj;دینند پس آنها به شما نیاز مبرم دارند. برگرد به ایران و قومت را از شرک نجات بده. این وظیفه اصلی توست!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;جوان صورتش را بالا گرفت، و برای یک لحظه درست چشمانش در چشمانم افتاد. برق چشمهایش مرا اسیر خود کرد، و صدق و صفای آنها باعث شد عرق سردی جسمم را بلرزاند، احساس کردم با حرفهایم به او ظلم کرده&amp;zwnj;ام. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;آرام گفت: بله برادر، دقیقا حق با شماست.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;مصطفی که هرگز چنین برخورد سردی را از من توقع نداشت، خواست کمی مجلس را صمیمی کند. به جوان نگاهی انداخته با لبخندی ساختگی گفت: برادر مرتضی، از آقای دکتر هیچ بدل نگیر. دکتر دلش از من پر است که آن جوان اطلاعاتی را قبلا پیش او آورده بودم. البته حق هم دارد. من ساده که غیب نمی&amp;zwnj;دانستم. او گفت و من هم باور کردم. حالا می&amp;zwnj;&amp;zwnj;خواهد تلافیش را از شما بگیرد. دکتر دلش صاف صاف است مثل دریا. روزی دیگر وقتی یک کم ابرهای آسمانش اینطرف و آنطرف بروند دوباره می&amp;zwnj;آئیم، و خواهی دید که گلی است خوشبو و بی خار..&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;با صدای اذان مغرب از من اجازه خواستند رفع زحمت کنند. هنگام رفتن جوان همین کتابی که الآن در دست شما خواننده&amp;zwnj;ی عزیز است را بمن هدیه داد (کتاب چرا سنی شدم؟) و گفت: برادر، این خاطرات زندگی من است. خواهش می&amp;zwnj;کنم اینرا بخوان و برایم دعای استقامت و پایداری کن. من از شما جز دعا هیچ نمی&amp;zwnj;&amp;zwnj;خواهم. و از خداوند می&amp;zwnj;خواهم که همه ما را در بهشت برین در کنار پیامبرانش دور هم جمع کند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;همدیگر را در آغوش گرفتیم. اشکهای مرتضی بر گونه&amp;zwnj;هایش جاری شد. صورتش را بوسیدم و به او گفتم: به امید دیدار...&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;مصطفی را هم در بغل گرفتم. آرام در گوشم گفت: از شما انتظار نداشتم. کجا رفت نرمی با تازه مسلمان!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;بعد صدایش را بلند کرد و گفت: آقای دکتر، گمان نکن این حرفهایت را ما بدل گرفتیم. شامی هم که تعارف نکردی بخیل، ولی مطمئن باش تا یک وعده غذا از جیب شما بزور هم بیرون نکشم نمی&amp;zwnj;گذارم برادر مرتضی از کراچی برود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;اینجا بود که تازه یادم آمد آنها را به شام هم تعارف نکرده بودم. با معذرت خواهی گفتم: ببخشید، اصلا حواسم نبود. خیلی معذرت می&amp;zwnj;خواهم. بسیار مایه سعادتم خواهد شد اگر شام را در این کلبه درویشی با من باشید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;مصطفی که از خانه بیرون شده بود خنده&amp;zwnj;&amp;zwnj;&amp;zwnj;ای سرداد و گفت: حالا پشیمانی فایده&amp;zwnj;ای ندارد. یک وقت دیگه باید در رستوران جبران کنی. البته دو روز پیش به شما اطلاع می&amp;zwnj;دهیم تا خوب آمادگی بگیری، و ما هم دو روز خودمان را گشنه نگه می&amp;zwnj;داریم تا از خجالت زحمتهایت بدرآئیم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;مرتضی لبخندی مؤدبانه زد و گفت: جلادان امام زمان مرا نکشتند اما شما مثل اینکه از گرسنگی می&amp;zwnj;خواهید مرا بکشید..&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;دو دوست دست در دست هم گذاشته از من دور شدند...&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;لحظه&amp;zwnj;ی جدایی و اشکهای مرتضی خیلی مرا بخود مشغول کرد. از برخورد سردم با او احساس گناه می&amp;zwnj;کردم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#000000&quot;&gt;بعد از مغرب به خانمم گفتم: من میلی به شام ندارم. لطفا مزاحم نشوید. داخل اتاق مطالعه رفتم و در را بروی خودم قفل کردم. کتابچه (چرا سنی شدم) را گرفته و شروع بخواندن کردم. از هر کلمه&amp;zwnj;ی آن بوی راستی و صداقت را احساس می&amp;zwnj;کردم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; DIRECTION: rtl&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA</description>
</item><item>
<title>معرفی استاد حيدر علی قلمداران رحمه الله و آثار ایشان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/211</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;معرفی استاد حیدر علی قلمداران رحمه الله&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
شاید کمتر کسانی باشند که بدانند روزی تمام ملت ایران کنونی اهل سنت بوده است، و اهل سنت یعنی دوستداران واقعی اهل بیت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و صحابه&amp;zwnj;ی جانفدای آن حضرت، که با چشم حقیقت به دین و زندگی می&amp;zwnj;نگرند، پس اهل سنت واقعی با شیعه&amp;zwnj;ی واقعی یعنی دوستدار علی رضی الله عنه هیچ فرقی نمی&amp;zwnj;کند، مشکل فقط در افراط و تفریط است، حقایق را وارونه جلوه دادن نه شیعیت است و نـه سنیت، صحابـه&amp;zwnj;ی فـداکار رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم را ملعون خواندن و یاران و همسران و خانواده&amp;zwnj;ی درجه یک پیامبر گرامی صلی الله علیه وآله وسلم را لعنت و نفرین کردن نه تنها پیروی از علی نیست بلکه دشمنی با علی و پیامبر و دین علی است، و غلو و افراط درباره&amp;zwnj;ی اهل بیت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم نه تنها محبت با پیامبر و اهل بیت حضرتش نیست که دشمنی با آنان است.&lt;br /&gt;
آری امروز نیز در جامعه&amp;zwnj;ی کنونی ایران علماء و دانشمندانی هستند که حاضر به تقلید کورکورانه از خرافات موجود در جامعه&amp;zwnj;ی کنونی ایران نیستند بلکه با حس حقیقت جویی در تلاش حق مخلصانه گام بر می دارند و آنچه از قرآن و سنت واقعی برایشان حق بنماید بدور از تعصب آن را با جان و دل می پذیرند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;مصلحان بزرگ معاصر:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
اما متأسفانه کمتر کسانی در ایران بزرگ با علماء و دانشمندانی همچون آیت الله شریعت سنگلجی و آیت الله العظمی سید رضا بن ابوالفضل البرقعی، و علامه اسماعیل آل اسحاق خوئینی و استاد حیدر علی قلمداران و دکتر علی مظفریان، ودکترمرتضی راد مهر و دهها عالم و دانشمند دیگری آشنا هستند که مذهب پدری را با تشخیص دقیق رها کرده ومکتب حق را برگزیده&amp;zwnj;اند، اگرچه شخصیتهای مذکور همگی به رحمت خدا رفته&amp;zwnj;اند اما آثار گرانبهایشان نشان دهنده و معرف شخصیت والای این بزرگواران است.&lt;br /&gt;
اینک کتابخانه عقیده به مناسبت نشر آثار گران سنگ استاد حیدر علی قلمداران رحمه الله شما را با چهره این مرد مجاهد و دانشمند، و متفکر و اسلام شناس بی نظیر ایران زمین آشنا می&amp;zwnj;کند (البته پیشاپیش از خانواده و شاگردان و دوستداران این استاد بزرگوار پوزش می&amp;zwnj;طلبیم به امید آنکه ما را ببخشند زیرا اطلاعات ما در این زمینه ناقص است و در ضمن عمده مطالب این مقاله از جزوه یادی از یار گرفته شده که نمی دانیم نویسنده آن کدام شاگرد استاد است).&lt;br /&gt;
تولد و تحصیل استاد قلمداران:&lt;br /&gt;
حیدر علی قلمداران فرزند اسماعیل در سال 1292 خورشیدی در روستای دیزیجان در 55 کیلو متری جاده قم- اراک از توابع شهرستان قم در خانواده&amp;zwnj;ای کشاورز و نسبتاً فقیر چشم به جهان گشود، در پنج سالگی مادرش را از دست داد، و به علت فقر و عاجز ماندن از پرداخت حتی دو قران پول مکتب خانه روستا از حضور در کلاس درس زن آخوند محروم بود، فقط پشت در می&amp;zwnj;ایستاد و مخفیانه به درس پیرزن گوش می&amp;zwnj;داد، باری بدلیل پاسخ دادن به همه&amp;zwnj;ی پرسشهای پیرزن که بچه&amp;zwnj;ها از آن عاجز مانده بودند اجازه یافت مجانی در کلاس شرکت کند.&lt;br /&gt;
به علت نداشتن قلم و کاغذ و شوق روز افزون خواندن و نوشتن از دوده&amp;zwnj;ی حمام به جای مرکب و از کاغذهای اضافی ریخته به جای دفتر استفاده می&amp;zwnj;کرد.&lt;br /&gt;
حیدر علی در سن پانزده سالگی پدرش را نیز از دست داد، پدر وی مردی خشن و تند مزاج و مخالف درس خواندن وی بود حیدر علی در سن بیست و هفت سالگی ازدواج کرد و در سی سالگی به خدمت اداره&amp;zwnj;ی فرهنگ قم در آمد از آن پس که دائره&amp;zwnj;ی تحقیقات و مطالعات وی گسترش یافته و قلمش از مهارت خوبی بهره یافته بود در روزنامه&amp;zwnj;های استوار و سرچشمه در قم و وظیفه، در تهران مقاله می&amp;zwnj;نوشت مجله یغما نیز مقالات و اشعار زیبای استاد را چاپ می&amp;zwnj;کرد وهمچنین مقالات فقهی و ارزشمندی در مجله&amp;zwnj;ی وزین حکمت که آیت الله طالقانی و مهندس مهدی بازرگان نیز در آن قلم می&amp;zwnj;زدند هم به چاپ می&amp;zwnj;رسید.&lt;br /&gt;
آشنایی قلمداران باشخصیتهای معاصر&lt;br /&gt;
1-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;quot; علامه شیخ محمد خالصی&amp;quot;&lt;br /&gt;
از علمای مجاهد و مبارز مقیم عراق، آشنایی استاد با علامه خالصی با ترجمه&amp;zwnj;ی &amp;nbsp;کتاب &amp;quot; المعارف المحمدیه&amp;quot; شروع شد و با ترجمه&amp;zwnj;ی کتاب &amp;laquo;الإسلام سبیل السعاده والسلام&amp;raquo; و کتاب سه جلدی إحیاء الشریعه و آثار دیگر علامه ادامه یافت، و دیدارهای بعدی و مکاتبات علمی را به دنبال آورد البته آقای خالصی مدتی بعد تحت تأثیر افکار روشنگرانه مرحوم قلمداران قرار گرفت وعلائم این تغییرات فکری او در آثار بعدی&amp;zwnj;اش مشهود است، همچنین از تقریظ یا مقدمه&amp;zwnj;ای که علامه خالصی بر کتاب ارمغان آسمان استاد نوشت این تأثر مشهود است ایشان می&amp;zwnj;نویسد:&lt;br /&gt;
جوانی مانند استاد حیدر علی قلمداران در عصر غفلت و تجاهل مسلمین و فراموشی تعالیم اسلامی بلکه در عصر جاهلیت پی به حقایق اسلامی می&amp;zwnj;برد و ما بین جاهلان معاند، این حقایق را بدون ترس و هراس، باکمال شجاعت و دلیری منتشر می&amp;zwnj;نماید چگونه ادای حق این نعمت را می&amp;zwnj;توان نمود؟&lt;br /&gt;
1-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;مهندس مهدی بازرگان:&lt;br /&gt;
آنگونه که خود استاد نقل می&amp;zwnj;کند نحوه آشنایی&amp;zwnj;اش با آقای بازرگان این گونه بود: &amp;laquo;یک روز که برای مراجعت از روستا به قم در کنار جاده منتظر اتوبوس ایستاده و مشغول مطالعه بودم متوجه شدم یک اتومبیل شخصی که چند مسافر داشت به عقب برگشت جلو بنده که رسید: آقایان تعارف کردند که سوار شوم در مسیر راه فهمیدم که یکی از سرنشینان آقای مهندس مهدی بازرگان است که گویا آن موقع [سال 1330یا 1331 خورشیدی] مسؤولیت صنعت نفت ایران را به عهده داشتند و از آبادان بر می&amp;zwnj;گشتند آقای بازرگان به بنده گفتند: برای من بسیار جالب بود که دیدم شخصی در حوالی روستا کنار جاده ایستاده غرق در مطالعه است&amp;raquo; این اتفاق بذر دوستی و مودت را در میان ما پاشید و بارور ساخت تا جایی که مهندس بازرگان در کتاب بعثت و ایدئولوژی خود ازکتاب &amp;laquo;حکومت در اسلام&amp;raquo; استاد استفاده فراوان نمود، وکتاب &amp;laquo;ارمغان آسمان&amp;raquo; استاد قلمداران نیز که قبلا چاپ شده بود مورد توجه و پسند مهندس بازرگان واقع گردیده و برای دکتر علی شریعتی وصف آنرا گفته بود.&lt;br /&gt;
مهندس مهدی بازرگان پس از آزاد شدن از زندان چهار مرتبه برای دیدار با آقای حیدر علی قلمداران به قم آمدند.&lt;br /&gt;
2-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;دکتر علی شریعتی:&lt;br /&gt;
کتاب &amp;laquo;ارمغان الهی&amp;raquo; را دیده بود و پس از شنیدن وصف کتاب آرمغان آسمان استاد قلمداران از زبان دانشمندان و دانشجویان روشنفکر دانشگاه بویژه مهندس بازرگان، بیشتر جذب افکار استاد گردید، همین امر باعث شد که دکتر در آذر ماه سال 1342 خورشیدی نامه ای در این خصوص از پاریس برای استاد قلمداران بنویسد. (عکس نامه شریعتی موجود است.)&lt;br /&gt;
بعدها که دکتر شریعتی به ایران بازگشت به یکی ازدوستان خود آقای دکتر اخروی که با استاد قلمداران آشنایی داشت گفته بود که قلمداران سهم بزرگی در جهت بخشیدن به افکار من دارد و مشتاق دیدار او هستم اگر می&amp;zwnj;توانید ترتیب این دیدار را بدهید اما متأسفانه این دیدار عملی نشد و دکتر شریعتی چشم از این دنیا فرو بستند.&lt;br /&gt;
3-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;استاد مرتضی مطهری:&lt;br /&gt;
نیز از اشخاصی بود که علاقه&amp;zwnj;ای پنهان به استاد قلمداران داشت ولی از بیم سرزنش دیگران این علاقه اش را علنی نکرد و طبق اظهار آقای قلمداران در یک ملاقات خیابانی باری به وی گفته بود: کتاب ارمغان آسمان شما را خواندم بسیار خوب بود.&lt;br /&gt;
حوادث ناگوار زندگی استاد قلمداران&lt;br /&gt;
پس از انتشار مخفیانه کتاب شاهراه اتحاد (بررسی نصوص امامت) و کمی پیش از پیروزی انقلاب یکی از آیات عظام قم به نام شیخ مرتضی حائری فرزند آیت الله شیخ عبد الکریم حائری مؤسس حوزه ی علمیه ی قم بواسطه ی شخصی از آقای قلمداران خواست که به منزل ایشان برود فردای آن روز که آقای قلمداران به خانه آقای حائری رفته بود ایشان به استاد گفته بود: آیا کتاب نصوص امامت را شما نوشته اید؟ استاد پاسخ می&amp;zwnj;دهد: بنده نمی&amp;zwnj;گویم من ننوشته ام اما در کتاب که اسم بنده به چشم نمی&amp;zwnj;خورد! آقای حائری گفتند: ممکن است شما را به سبب تألیف این کتاب به قتل برسانند! آقای قلمداران فرمود: چه سعادتی بالاتر از این که انسان به خاطر عقیده اش کشته شود سپس آقای حائری گفتند: اگر می&amp;zwnj;توانید همه را جمع آوری نموده و در خاک دفن کنید یا بسوزانید! ایشان پاسخ داد: در اختیار بنده نیست، فرد دیگری چاپ کرده، شما همه را خریداری کنید و بسوزانید! از طرفی این همه کتاب کمونیستی و تبلیغ بهائی&amp;zwnj;گری در این کشور چاپ و منتشر می&amp;zwnj;شود چرا شما در باره ی آنها اقدامی نمی&amp;zwnj;كنید؟!&lt;br /&gt;
جریان ترور استاد قلمداران:&lt;br /&gt;
پس از گذشت چند ماه از پیروزی انقلاب در تابستان 1358 خورشیدی شب بیستم رمضان سال 1399 هجری قمری که استاد قلمداران طبق عادت هر سال تابستان را در روستا می&amp;zwnj;گذراند جوان مزدوری که از جانب کوردلان متعصب تحریک و مسلح شده بود نیمه شب وارد خانه ی استاد شد و او رادر حالت خواب ترور کرده و گریخت، لیکن علی رغم فاصله بسیار کم گلوله فقط پوست گردن ایشان را زخمی کرد و در کف اتاق فرو رفت.&lt;br /&gt;
طبق اظهاراتی که از خود استاد نقل شده روز قبل از حادثه جوانی از قم نزد او آمده بود و در مورد پاره&amp;zwnj;ای عقاید و نظریات ایشان و نیز درباره ی کتاب سؤالاتی کرده بود! بدون شک نوشتن کتاب خمس و شاهراه اتحاد انگیزه ی قوی این ترور بوده است. در هر صورت مشیت و تقدیر الهی مرگ استاد قلمداران را اقتضا نکرده بود! با این وجود استاد رفت و آمدش به روستا و فعالیتش را ادامه می&amp;zwnj;داد.&lt;br /&gt;
حوادث تلخ دیگر:&lt;br /&gt;
2- حادثه تلخ دیگر در زندگی استاد وفات ناگهانی یکی از پسرانش در سال 1360 خورشیدی بود که منجر به تألم روحی عمیق وی گردید پس از این حادثه سکته مغزی آن مرحوم او را از فعالیت های قلمی وتحرک جسمی محروم ساخت ودیگر نتوانست کار تألیف را ادامه دهد لیکن مطالعه را حتی الامکان رها نساخت.&lt;br /&gt;
3- دیگر واقعه&amp;zwnj;ی تلخ زندگی استاد قلمداران زندانی کردن او در زندان ساحل قم بود.&lt;br /&gt;
اخلاق والا و آزاد منشی استاد قلمداران:&lt;br /&gt;
ایشان در طول زندگی شخصیتی راستگو، عفیف، راست کردار، عابد، زاهد، شجاع، سخاوتمند و صریح اللهجه بود و همه&amp;zwnj;ی کسانی که به نحوی با ایشان ارتباط نزدیک داشته&amp;zwnj;اند ایشان را انسانی والا، بی&amp;zwnj;پیرایه، بی&amp;zwnj;تکلف، و بی&amp;zwnj;اعتناء به خوراک و پوشاک می&amp;zwnj;شناختند. گویا استاد در این راستا به هم نامش علی علیه السلام و رضی الله عنه و سایر بزرگان دین اقتداء کرد. و زندگی اش شباهب زیادی به زندگی سلف و پیشگامان راستین این امت داشت.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آثار و تألیفات استاد قلمداران:&lt;br /&gt;
استاد حیدر علی قلمداران علاوه بر مقالات عدیده&amp;zwnj;ای که در روزنامه ها و مجلات مختلف به چاپ می&amp;zwnj;رساند، تعداد قابل توجهی تألیف و ترجمه نیز دارد که همگی کتابهای ارزنده و محققانه&amp;zwnj;ای است.&lt;br /&gt;
1-ترجمه کتاب &amp;laquo;المعارف المحمدیه&amp;raquo; که یکی از آثار علامه خالصی است، این کتاب قبل از سال 1325 خورشیدی ترجمه و چاپ شده است.&lt;br /&gt;
2-ترجمه سه جلد کتاب &amp;laquo;إحیاء الشریعه&amp;raquo; خالصی که تقریبا شبیه یک رساله&amp;zwnj;ی توضیح المسائل بوده و با عنوان &amp;laquo;آئین جاویدان&amp;raquo; در سالهای 1330، 36، و37 به چاپ رسیده است.&lt;br /&gt;
3- &amp;laquo;آیین دین یا احکام اسلام&amp;raquo; ترجمه کتاب &amp;laquo;الإسلام سبیل السعاده والسلام&amp;raquo; این نیز از آثار علامه خالصی است که در سال 1335 خورشیدی ترجمه و چاپ شده است.&lt;br /&gt;
4-&amp;nbsp;تألیف کتاب مشهور &amp;laquo;ارمغان آسمان&amp;raquo; در سال 1339 خورشیدی که قبلا به صورت سلسله مقالاتی در روزنامه ی وظیفه چاپ و منتشر شد.&lt;br /&gt;
5-&amp;laquo;ارمغان الهی&amp;raquo; در اثبات وجود نماز جمعه در سال 1339 که ترجمه کتاب &amp;laquo;الجمعه&amp;raquo; علامه خالصی است.&lt;br /&gt;
6-رساله ی حج یا کنگره&amp;zwnj;ی عظیم اسلامی در سال 1340 شمسی.&lt;br /&gt;
7-رساله ی &amp;laquo;مالکیت در ایران از نظر اسلام&amp;raquo; که دستنویس آن با خط خودش باقی مانده و هنوز چاپ نشده است.&lt;br /&gt;
8- قیام مقدس حسین علیه السلام ورضی الله عنه.&lt;br /&gt;
9-تألیف جلد اول کتاب ارزنده و معروف &amp;laquo;حکومت در اسلام&amp;raquo; درسال1343 خورشیدی که طی 68 مبحث اهمیت و کیفیت تشکیل حکومت از نظر اسلام را بررسی کرده است، و تا آن زمان در نوع خود بی سابقه و بی بدیل بود و شاید بتوان ادعا نمود که تاکنون نیز نظیر آن در ایران تألیف نشده است.&lt;br /&gt;
از استاد شنیده شده که می&amp;zwnj;فرمود آیت الله منتظری این کتاب را قبل از انقلاب در نجف آباد اصفهان درس می&amp;zwnj;داده است.&lt;br /&gt;
10- آیا اینان مسلمانند؟ در سال 1344 شمسی.&lt;br /&gt;
این کتاب کم حجم، ترجمه&amp;zwnj;ی وصیت نامه&amp;zwnj;ی علامه خالصی در بیمارستان است که در سال 1377 هجری قمری به منشی خود املا فرمود و بعدا تحت عنوان &amp;laquo;هل هم مسلمون&amp;raquo; به چاپ رسید، نیز به ضمیمه&amp;zwnj;ی آن رساله&amp;zwnj;ی کوتاهی است، به نام &amp;laquo;ایران در آتش نادانی&amp;raquo; که ترجمه&amp;zwnj;ی قسمتهایی از کتاب &amp;laquo;شر و فتنه الجهل فی ایران&amp;raquo; اثر علامه خالصی می&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
11- مجموعه&amp;zwnj;ی پنج قسمتی&amp;laquo;راه نجات از شر غلات&amp;raquo; که در سالهای پنجاه تا پنجاه و چهار نوشته شد و مباحث ذیل را شامل می&amp;zwnj;شود: علم غیب، امامت، بحث در ولایت و حقیقت آن(که تا کنون چاپ نشده) بحث در شفاعت، بحث در غلو و غالیان که به ضمیمه&amp;zwnj;ی شفاعت به چاپ رسید، و بحث در حقیقت زیارت و تعمیر مقابر، که به نام زیارت و زیارتنامه منتشر شد.&lt;br /&gt;
12- کتاب &amp;laquo;زکات&amp;raquo; که احتمالا در سال 1351 شمسی با همکاری مرحوم مهندس مهدی بازرگان در شرکت سهامی انتشار به چاپ رسید و تا مدتی از انتشار آن جلوگیری به عمل آمد.&lt;br /&gt;
13- کتاب &amp;laquo;خمس&amp;raquo; که تقریبا همگام با کتاب &amp;laquo;زکات&amp;raquo; یا کمی پس از آن نگارش یافت اما به علت حساسیت روحانیت شیعه نسبت به موضوع خمس کتاب تحویل چاپ خانه نگردید، و تعدادی از همفکران استاد در اصفهان آن را تایپ نموده و با هزینه خودشان تکثیر و منتشر کردند.&lt;br /&gt;
البته ردهایی نیز بر این کتاب به وسیله اشخاصی همچون آیت الله ناصر مکارم شیرازی، و رضا استادی و غیره نوشته که آن مرحوم پاسخ کلیه آن ردود را نوشته و تعدادی را ضمیمه ی کتاب خمس نموده است.&lt;br /&gt;
14- کتاب &amp;laquo;شاهراه اتحاد&amp;raquo; که این کتاب هم به سبب حساسیت شدید روحانیت شیعه نسبت به موضوع کتاب به صورت تایپ شده تکثیر و مخفیانه منتشر شد. اما نه توسط استاد بلکه توسط دوستانی در تهران این امر را به عهده داشتند. این کتاب حاوی بررسی حوادث پس از رحلت رسول خدا صلی الله علیه وآله وسلم واقعه&amp;zwnj;ی سقیفه&amp;zwnj;ی بنی ساعده و موضوع خلافت پیامبر اسلام صلی الله علیه وآله وسلم و بحث جنجال بر انگیز امامت بود.&lt;br /&gt;
15- شخصی روحانی به نام &amp;laquo;ذبیح الله محلاتی&amp;raquo; چند سال قبل از پیروزی انقلاب جزوه ای نوشت تحت عنوان &amp;laquo;ضرب شمشیر بر منکر غدیر&amp;raquo; و مطالب خلاف حقیقت در آن خبر درج کرد.&lt;br /&gt;
استاد قلمداران نیز رساله&amp;zwnj;ای در جواب آن نگاشت به نام &amp;laquo;پاسخ یک دهاتی به آیت الله محلاتی&amp;raquo;!&lt;br /&gt;
16- جلد دوم &amp;laquo;حکومت در اسلام&amp;raquo; که در سال 1358 خورشیدی انتشار یافت و به بررسی وظایف حکومت و حاکم اسلامی پرداخت.&lt;br /&gt;
17- سنت رسول از عترت رسول صلی الله علیه وآله وسلم.&lt;br /&gt;
این بود معرفی کوتاهی از آثار استاد حیدر علی قلمداران.&lt;br /&gt;
وفات استاد قلمداران:&lt;br /&gt;
این دانشمند محقق و چهره&amp;zwnj;ی کم نظیر ایران زمین پس از سالها تحمل مشقات و رنجهای زندگی، مجاهدت در راه نشر احکام و حقایق دین مبین اسلام و تحمل هشت سال بیماری طاقت فرسا که توأم با صبری ایوب وار بود در روز جمعه 15/02/68 بعد از سحر روز 29 رمضان المبارک 1409 قمری در سن هفتاد و شش سالگی دار فانی را وداع گفت. و به دیدار معبود یگانه اش شتافت، و عصر همان روز با حضور عده ای از همفکرانش و طی مراسمی ساده و عاری از هرگونه بدعت و تشریفات خرافی زائد پس از اقامه ی نماز به خاک سپرده شد.&lt;br /&gt;
خداوند متعال از ایشان و سایر دعوتگران و مصلحان راضی و خشنود گردد.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزیز می توانند کتابهای حیدر علی قلمداران رحمه الله را با فشار دادن بر روی اسم کتاب در این صفحه داونلود نمایند:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
استاد حیدر علی قلمداران, نابغه گمنام&lt;br /&gt;
یادی از یار - زندگینامه استاد حیدر علی قلمداران&lt;br /&gt;
آثار استاد قلمداران رحمه الله&lt;br /&gt;
ارمغان آسمان - در بیان عوامل و علل ارتقاء و انحطاط مسلمانان&lt;br /&gt;
بحث شفاعت&lt;br /&gt;
بحث عمیق فی مسـألة الخُمْـس&amp;nbsp;عربی&lt;br /&gt;
خلافت و امامت&lt;br /&gt;
زیارة المزارات وأدعیة الزیارات&amp;nbsp;&amp;nbsp;عربی&lt;br /&gt;
زیارت قبور بین حقیقت و خرافات&lt;br /&gt;
شاهراه اتحاد یا بررسی نصوص امامت&lt;br /&gt;
طریق النجاة من شر الغلاة - 1&amp;nbsp;&amp;nbsp;عربی&lt;br /&gt;
طریق النجاة من شر الغلاة - 2&amp;nbsp;&amp;nbsp;عربی&lt;br /&gt;
طـریـق الاتحـــاد&amp;nbsp;&amp;nbsp;عربی&lt;br /&gt;
مسأله خمس مأخوذ از کتاب و سنت&amp;nbsp;عربی&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;&amp;nbsp;نوید پیروزی:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
در پایان این نکته را باید عرض کنیم که ما معتقدیم دین الله و شریعت پاک وبی آلایش مصطفی صلی الله علیه وآله وسلم بالاخره غالب خواهد شد، و ازمیان توده ی مردم که عشق ومحبت دین در اعماق وجودشان ریشه دارد حتما راد مردانی بلند خواهند شد و گرد و غبار خرافات از چهره&amp;zwnj;ی نازنین اسلام عزیز را خواهند زدود و آئینه حق را با آب زلال ایمان و یقین و اخلاص و تقوا و مجاهدت صیقل خواهند بخشید اگر چه همانند آیت الله برقعی بر سر نماز گلوله برسرش شلیک کنند یا همانند استاد قلمداران در آغوش فرزندانش بر گلویش گلوله شلیک کنند یا صدها و هزارها نمونه&amp;zwnj;ی دیگر از فداکاری ها و مجاهدت هایی که در صفحات زرین تاریخ به ثبت رسیده است اما مطمئنا کسی که طعم شیرین حقیقت را بچشد از تیر و گلوله و مردن نمی&amp;zwnj;ترسد بلکه عاشقانه به آغوش مرگ و شهادت پر افتخار می&amp;zwnj;رود اما حاضر نیست تن به ذلت دهد یا دست از حق پرستی بردارد.&lt;br /&gt;
پس مژده باد به همه حق جویان و حق پرستان و عاشقان و شیفتگان حق و حقیقت و پیروان راستین اسلام خالص و دین بی آلایش و شریعت شامل و کامل محمدی صلوات الله وسلامه علیهم.&lt;br /&gt;
بارالها تو را سپاس که ما را با نعمت اسلام خالص و پاک از شرک و خرافات و بدعتها سر افراز کردی و افتخار بخشیدی پس بر روح پاک همه رهروان راه حق بویژه استاد حیدر علی قلمداران هزاران رحمت فرست.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;آمین.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>خدا حافظ رمضان!..</title>
<link>http://qalamlib.com/news/208</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خدا حافظ رمضان!..&lt;br /&gt;
فردای رمضانت را بنگر.. اولین روزهای شوال&amp;hellip; رابطه ات با خدایت چگونه است؟! طاعت و عبادتت کجاست؟!.. جایگاه گناه و عصیان در زندگیت چیست؟!..&lt;br /&gt;
با توجه به این نکات خودت درخواهی یافت: آیا رمضانت مورد قبول واقع شده است یا خیر؟! آیا یک ماه دوره&amp;zwnj;ی آموزشی برایت مؤثر بوده است یا خیر؟!..&lt;br /&gt;
کشتی ایمان پس از سفر تجارتی پرفروغ رمضان در ساحل شوال لنگر می&amp;zwnj;اندازد. مؤمنان شاد و خرم از این تجارت پرسود باردگر زندگی را البته با شیوه&amp;zwnj;ئی بسیار بهتر آغاز می کنند. هر یک از مسافران در این کاروان برای خود توشه و آذوقه ای از ایمان بر گرفته تا تمام سال را با آن بگذارند. خدای را شکر و سپاس بر نعمت ایمان و توحید&amp;hellip; خدای را شکر و سپاس بر نعمت رمضان.. خدای را شکر و سپاس بر همه نعمتهای بیدریغ و بزرگ و والایش&amp;hellip;&lt;br /&gt;
فضل خدای را که تواند شمار کرد؟&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;یا کیست آنکه شکر یکی از هزار کرد؟&lt;br /&gt;
چه بسیار عزیزانی که در رمضان سال گذشته در کنار ما بودند.. و امسال طعمه&amp;zwnj;ی خاک!.. و شاید رمضان سال آینده برسد و از ما خبری نباشد!..&lt;br /&gt;
این معنا را صالحان و پرهیزگاران خوب درک می&amp;zwnj;کردند. از اینرو ۶ ماه تمام بعد از رمضان یکریز دعا می کردند: بار الها طاعات و عباداتمان در رمضان را پذیرا باش. و پس از آن ۶ ماه دیگر دعا می کردند: بار خدایا رمضان آینده را نصیبمان کن&amp;hellip;&lt;br /&gt;
ای مؤمن بیا تا دست نیایش بسوی درگاه ابدیت دراز کنیم و اشک زاری بر سجاده ی تقوا ریزیم و از خدایمان بخواهیم: بار الها طاعات و عبادات و دعا و نیایش ما را در ماه رمضان پذیرا باش. و از گناهانمان درگذر و ما را از قبول شدگان درگاهت قرار ده&amp;hellip;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
رمضان آمد و رفت&amp;hellip;&lt;br /&gt;
در لحظاتی که تو ای مؤمن در مهمانی خدایت و در خانه&amp;zwnj;ی او به نماز و تلاوت قرآن مشغول بودی چه بسا محرومان نگون بختی بودند که وقتشان را در بازارها و در مقابل فیلمها و سریالهای پوچ و بی محتوا و در کارهای شیطانی و بی بها می گذراندند&amp;hellip; پس باید خدای را شکر و سپاس گوئیم که به ما توفیق طاعت داد&amp;hellip;&lt;br /&gt;
شکر و سپاس و منت و عزت خدای را&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;پروردگار خلق و خداوند کبریا&lt;br /&gt;
دادار غیب دان و نگهدار آسمان &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;رزاق بنده&amp;zwnj;پرور و خلاق رهنما&lt;br /&gt;
چقدر بدبخت و محروم بودند آنانیکه از لذت طاعت و عبادت پروردگارشان محروم ماندند&amp;hellip; خدایا تو را هزاران هزار سپاس و شکر بر نعمت توفیق برای طاعت و عبادتت.&lt;br /&gt;
آموزشگاه تربیتی رمضان&lt;br /&gt;
رمضان آموزشگاهی تربیتی برای مؤمن بشمار می آید. در یک دوره&amp;zwnj;ی ۳۰ روزه زندگی مؤمن بیکباره بهم می خورد تا از سر نو ترتیب یابد. عادتها و روتین زندگی او به کلی تغییر می یابد. و تغییر همیشه باعث نشاط و زندگی مجدد می گردد. گویا مسلمان پس از رمضان از نو زائیده شده، و از سر نو زندگی را آغاز می کند. رمضان او را بکلی شستشو داده با روحیه و توانی دیگر وارد جامعه می کند.&lt;br /&gt;
درس وحدت و همبستگی&lt;br /&gt;
در این آموزشگاه مؤمن طعم وحدت و همبستگی را می چشد. همه&amp;zwnj;ی مؤمنان در یک لحظه و با یک ندا روزه&amp;zwnj;ی شان را باز می کنند. و همه پس از یک روز گشنگی و تشنگی مشترک آبی سرکشیده از ته دل &amp;ldquo;الحمد لله&amp;rdquo; می گویند. و همه در هر جا که باشند با همان ندا بسوی خانه های خدا می شتابند و سربندگی بر زمین می مالند. و همه با هم در نیمه های شب که خواب مرگ بر غافلان سایه افکنده، رخت خواب گرم و نرم خود را رها کرده برای دعا و نیایش و سحر بر می خیزند.. همه ی مؤمنان دنیا یکپارچه و هماهنگ در حرکتند. این است لذت و زیبایی و جلال ایمان.. مؤمنان باید یک کالبد و یک تن باشند؛ این است پیام رمضان:&lt;br /&gt;
بنی آدم اعضای یکدیگرند&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;که در آفرینش ز یک گوهرند&lt;br /&gt;
چو عضوی به درد آورد روزگار&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;دگر عضوها را نماند قرار&lt;br /&gt;
تو کز محنت دیگران بی غمی&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;نشاید که نامت نهند آدمی&lt;br /&gt;
و آنچه امروز در جهان اسلام شاهد آنیم، تصویری است بسیار طبیعی از آنچه مؤمنان بدان مبتلا هستند!&lt;br /&gt;
فرموده&amp;zwnj;ی حق است: &amp;laquo;وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلاَ تَنَازَعُوا فَتَفْشَلُوا وَتَذْهَبَ رِيحُكُمْ وَاصْبِرُوا إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ&amp;raquo; (الأنفال۴۶).{ و از خدا و پيامبرش فرمان بريد و با هم كشمكش مكنيد كه شكست خواهيد خورد و نيرويتان از بين خواهد رفت، و شكيبايى كنيد زيرا خدا با شكيبايان است}.&lt;br /&gt;
درس وقت شناسی&lt;br /&gt;
وقت شناسی یکی دیگر از درسهای مهم این آموزشگاه ایمانی است. مؤمن درمی یابد که یک لحظه و یک ثانیه را چه نقش بسیار مهم و سازنده ای در زندگی اوست. درک می کند که اگر یک لحظه، و تنها یک ثانیه قبل از غروب آفتاب دهن به آب زند عبادت روزه ی تمام روزش به باد می رود. و اگر یک لحظه در سحر تأخیر کند و پس از طلوع آفتاب چیزی بچشد از کاروان روزه داران آن روز نامش را حذف می کنند!..&lt;br /&gt;
آری!..&lt;br /&gt;
اینست قیمت و بهای وقت. پس از این درس عاقلی را نخواهی دید که وقت گرانبهایش را لحظه&amp;zwnj;ای در بی&amp;zwnj;هدفی و پوچی ضایع سازد!..&lt;br /&gt;
درس بندگی&amp;hellip;&lt;br /&gt;
در این آموزشگاه مؤمن یک ماه تمام درس نماز و طاعت و تراویح و نیایش و دعا و قرآن و وقت شناسی و تحمل گرسنگی و تشنگی می&amp;zwnj;آموزد. کسی او را به گرسنگی و یا تشنگی مجبور نمی کند. خودش با اختیار خود جامه&amp;zwnj;ی بندگی به تن می کند و پیشانی بردگی بر زمین می نهد.&lt;br /&gt;
در این ماه انسان درمی یابد که باید همیشه ی زندگی بنده و برده و مطیع فرمان خدای خود باشد. و جام مست غرور و خودپرستی را بشکند و باده ی عصیان و سرکشی بر زمین ریزد&amp;hellip;&lt;br /&gt;
انس با قرآن&amp;hellip;&lt;br /&gt;
در این آموزشگاه قرآنی مؤمن با کلام پاک یزدان انس می گیرد. در تراویح قرآن می&amp;zwnj;شنود. شبانه روز خود بتلاوت مشغول است. او یاد می&amp;zwnj;گیرد که چگونه مردی قرآنی شود. و در می&amp;zwnj;یابد که خطاب قرآن بسوی اوست. و درک می&amp;zwnj;کند که؛ آنچه برخی جاهلان ادعا می کنند که قرآن قابل فهم نیست! ویا قرآن تنها برای علما و آخوندهاست دروغ و مکری شیطانی بیش نیست! قرآن برای همه است. و ندای آن متوجه همه&amp;zwnj;ی انسانهاست..&lt;br /&gt;
میوه&amp;zwnj;ی رمضان!..&lt;br /&gt;
پس از پایان دوره&amp;zwnj;ی آموزشی مؤمن به سادگی نتیجه ی کار و تلاشش در رمضان را درمی&amp;zwnj;یابد.&lt;br /&gt;
چگونه؟!..&lt;br /&gt;
فردای رمضانت را بنگر.. اولین روزهای شوال&amp;hellip; رابطه ات با خدایت چگونه است؟! طاعت و عبادتت کجاست؟!.. جایگاه گناه و عصیان در زندگیت چیست؟!..&lt;br /&gt;
با توجه به این نکات خودت درخواهی یافت:&lt;br /&gt;
آیا رمضانت مورد قبول واقع شده است یا خیر؟! آیا یک ماه دوره&amp;zwnj;ی آموزشی برایت مؤثر بوده است یا خیر؟!..&lt;br /&gt;
آنانی که رمضانی قرآنی و الهی بر سنت پیامبر خدا (صلی&amp;nbsp;&amp;nbsp;الله علیه و سلم) سپری کنند با آذوقه و توشه&amp;zwnj;ی آن تا آمدن رمضانی دیگر خود را در لباس تقوا حفظ می کنند.&lt;br /&gt;
ای مؤمن..&lt;br /&gt;
اگر خدای نکرده از جمله&amp;zwnj;ی غافلان بوده ایم باز هم درگاه رحمت الهی بروی ما باز است.. و دروازه توبه در انتظار&amp;hellip;&lt;br /&gt;
باز آی هر آنچه هستی باز آی&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;گر کافر و گبر و بت پرستی باز آی&lt;br /&gt;
اين درگه ما درگه نوميدی نيست&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;صد بار اگر توبه شکستی&amp;nbsp;&amp;nbsp;باز آی&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>اطلاعیه درباره کتاب های سایت عقیده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/205</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: right; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 13pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;تـوجـه!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 13pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;اطلاعیه درباره کتاب های سایت عقیده&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 13pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;به اطلاع همه دوستان عزیز و استفاده کنندگان از کتابخانه&amp;zwnj;ی الکترونیکی عقیده می رسانيم که کتابهای این کتابخانه فقط جهت نشر الکترونیکی و استفاده&amp;zwnj;ی علمی برادران و خواهران گرامی بر روی کامپیوتر بوده و هرگونه نشر و چاپ این کتابها برای اغراض تجارتی بدون اخذ مجوز كتبی از ناشر غیر مجاز می&amp;zwnj;باشد&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;دوستانی که مایل به نشر و چاپ این کتابها می باشند باید از ناشر این کتابها مجوز كتبی دریافت کنند در غیر این صورت ناشر حق دارد بر اساس قانون حقوق نشر و مالکیت پیگرد قانونی نماید&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;سایت عقیده هر گونه استفاده از خدمات این سایت ـ غیر از کتابهایی که حق نشرشان برای ناشران اصلی محفوظ است ـ را جهت برنامه&amp;zwnj;های دعوی با ذكر مصدر بلامانع اعلام می دارد&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;لازم به ذکر است که کتاب های این سایت همیشه به روز می شود و اگر قبلا این کتاب ها را در سایت یا وبلاگ یا به صورت سی دی نشر کرده اید خواهشمندیم این نسخه را مورد اعتماد قرار دهید و از پخش نسخه های سابق خودداری نماييد.&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;بيشتر کتاب های این سایت توسط بازدیدکنندگان سایت به ایمیل سایت ارسال شده است و اداره&amp;zwnj;ی سایت بنابر فتوای بسیاری از علمای عصر که نشر کتاب های مذهبی بدون اغراض تجاری را جایز می دانند، اقدام به نشر این کتاب ها نموده است&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;و اگر ناشر یا نویسنده یا مترجم، نسبت به نشر کتابي اعتراض دارند می توانند با اداره سایت عقیده تماس بگیرند.&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt&quot; lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;ادارۀ سایت عقیده&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;www.aqeedeh.com&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt; unicode-bidi: embed; direction: rtl&quot; dir=&quot;rtl&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt&quot; dir=&quot;ltr&quot;&gt;book@aqeedeh.com&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>آداب و سنن عید فطر</title>
<link>http://qalamlib.com/news/203</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;آداب و سنن عید فطر&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;الحَمْدُ لِلهِِ رَبِّ العَالمِينْ، وَالصَّلاَةُ وَالسَّلاَمُ عَلىَ نَبِينّا مُحَمّدٍ &amp;shy;&amp;shy;، وَعَلى آلِهِ وَأصْحَابهِ وَمَنْ دَعَا بِدَعْوَتِهِ إلىَ يَوْمِ الدِّيْن.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #0033cc; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;ادارۀ سایت عقیده فرا رسيدن عيد سعيد فطر را از صميم قلب خدمت همه&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #0033cc; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #0033cc; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان تبریک و تهنیت عرض می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #0033cc; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;کند و امیدواریم که الله جل جلاله طاعات و عبادات شما عزیزان را قبول نموده پاداش عظیم نصیبتان گرداند.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #0033cc; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;از انس رضی الله عنه روایت است که فرمود: هنگامی که پیامبر صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم به مدینه آمدند مردم دو روز را داشتند که به بازی و سرگرمی مشغول می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;شدند و جشن می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گرفتند. پیامبر صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم فرمود:&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;الله جل جلاله بجای آنها دو روز بهتری برای شما قرار داده است. روز عید فطر و روز عید قربان .&lt;/span&gt; (رواه النسائی وابن حبان- صحیح)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;*&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; &lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;زکات فطر&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;حکم زکات فطر:&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;زکات فطر بر هر مسلماني واجب است به دليل حديث ابن عمر رضى الله عنهما: &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;پيامبر صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم زکات فطر را که يک صاع&lt;/span&gt;(هر صاع برابر چهار مشت متوسط است.) &lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;خرما يا جو است بر هر مسلمان برده، آزاد، مرد، زن، کوچک و بزرگ واجب کرد و دستور داد که قبل از خروج مردم به طرف نماز عيد پرداخت شود&lt;/span&gt;&amp;raquo;. [ متفق عليه] &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;* &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;آداب و سنن عید&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;از سعید بن مسیب رضی الله عنه روایت است که فرمود: سنت عید فطر سه چیز است&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul type=&quot;disc&quot;&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; mso-list: l1 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; mso-margin-bottom-alt: auto; tab-stops: list 36.0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;پیاده رفتن به مصلی (محل برگزاری نماز).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; mso-list: l1 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; mso-margin-bottom-alt: auto; tab-stops: list 36.0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;خوردن خرما قبل از خروج به نماز عید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt; mso-list: l1 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; mso-margin-bottom-alt: auto; tab-stops: list 36.0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;رعایت نظافت، استعمال بوی خوش و مسواک زدن.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم در روز عید فطر، صبح زود قبل از خوردن چیزی، چند دانه خرما به تعداد فرد (وتر) می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;خوردند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;. (بخاری 953).&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم در راه رفتن به مسجد در روز عید تکبیر می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گفتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;. (المحاملی/ صحیح 2/ 142).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;و اصحابشان همچون ابن عمر رضی الله عنهما وابی امامه رضی الله عنه صدای خود را در این تکبیر بالا می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;بردند.(البیهقی/ صحیح 3/276).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;تکبیر عید فطر از غروب خورشید آخرین روز رمضان با تکمیل (30 روز یا رؤیت هلال ماه شوال) و به نص آیه (&lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;ولتکملوا العدة ولتکبروا الله على ما هداکم&lt;/span&gt;) شروع می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;شود و رسول الله صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم آخرین وقت آن را پایان نماز عید مشخص کردند طبق حدیثی که از رسول الله صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم نقل شده است. (المحاملی/صحیح 2/241).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;* &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;الفاظ تکبیر&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;الله اکبر الله اکبر، لا إله إلا الله، والله اکبر الله اکبر، ولله الحمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; (ابن شیبه).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;الله اکبر الله اکبرا لله اکبر، لا إله إلا الله، والله اکبر الله اکبر، ولله الحمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; (امام مالک وامام شافعی این لفظ را نیز جائز می دانند).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;* &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;اهمیت نماز عید وتاکید به رفتن به نماز عید&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;از ام عطیه رضی الله عنها روایت است که فرمود: &lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم به ما فرمودند که دختران بکر (ازدواج نکرده) و زنان قاعده را به مصلی ببریم تا کار نیک و دعوت مسلمانان را مشاهده کنند و زنان قاعده از مصلی کناره می&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گرفتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; (متفق علیه /بخاری /مسلم 89).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;حال وقتی پیامبر صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;به زنان چنین توصیه می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;کند مطمئنا این اهمیت و تاکید پیامبر صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم شامل حال مردان بیشتر می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;شود&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم در روز عید فطر وقتى نماز تمام می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;شد تکبیر را قطع می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;کردند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; (المحاملی).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;پیامبر صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم پیاده به مصلی می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;رفتند و برمی&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گشتند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;. (ابن ماجه / حسن 1294).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;برای مأمومین مستحب است که برای نماز عید زود به مصلی بروند اما برای امام سنت است دیرتر به مصلی برود. (بخاری956).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;برای نماز عید سنت قبلیه و بعدیه وجود ندارد. ولی وقتی وارد مسجد شدیم می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;توانیم سنت تحیه مسجد بخوانیم&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;* &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;نماز عید دو رکعت است که بصورت زیر خوانده می&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;شود&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;پس از تکبیرة الإحرام دعای استفتاح (وجهت) را می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;خوانیم و سپس هفت تکبیر دیگر می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گوییم در رکعت دوم بعد از تکبیر انتقال (بالا آمدن از سجود) پنج تکبیر دیگر می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گوییم در هر رکعت پس از تکبیرات دعای تعوذ &amp;laquo; أعوذ بالله &amp;raquo; و سوره حمد می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;خوانیم- در بین تکبیرات حمد و ثنای خدا را می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گوییم و او را مورد مجد و تعریف قرار می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;دهیم (&lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;سبحان الله والحمدلله و لا إله إلا الله والله اکبر&lt;/span&gt;) و بر رسول الله &lt;span style=&quot;COLOR: black&quot;&gt;صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt; &lt;/span&gt;صلوات می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;فرستیم&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; &lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;(طبرانی / صحیح 9519).&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;* &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;تبریک و تهنیت گفتن به یکدیگر&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;اصحاب رسول الله صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم هنگامی که روز عید همدیگر را ملاقات می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;کردند به یکدیگر می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;گفتند: &lt;span style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;تقبل الله منا ومنکم&lt;/span&gt; (الله از ما و شما قبول بگرداند) (المحاملی حسن).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;کسانی که به نماز عید همراه امام نرسند و همچنین زنانی که در خانه هستند می&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;توانند آن را بجا آورند.(بخاری987).&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;* &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;برخی از منکرات که در عید انجام داده می&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;شود و باید از آنها پرهیز کرد&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoListParagraphCxSpFirst&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: -18pt; MARGIN: 0cm 36pt 0pt 0cm; mso-list: l0 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Symbol; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: Symbol; mso-bidi-font-family: Symbol&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&amp;middot;&lt;span style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;تکبر و کوچک شمردن دیگران.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoListParagraphCxSpMiddle&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: -18pt; MARGIN: 0cm 36pt 0pt 0cm; mso-list: l0 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Symbol; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: Symbol; mso-bidi-font-family: Symbol&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&amp;middot;&lt;span style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;مصافحه و دست دادن به نامحرم.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoListParagraphCxSpMiddle&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: -18pt; MARGIN: 0cm 36pt 0pt 0cm; mso-list: l0 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Symbol; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: Symbol; mso-bidi-font-family: Symbol&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&amp;middot;&lt;span style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;تقلید مردان از زنان وبرعکس در حرکات و لباس.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoListParagraphCxSpMiddle&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: -18pt; MARGIN: 0cm 36pt 0pt 0cm; mso-list: l0 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Symbol; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: Symbol; mso-bidi-font-family: Symbol&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&amp;middot;&lt;span style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;رفتن زنان با آرایش و زینت و بوی خوش به اماکن عمومی و ایجاد اختلاط.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoListParagraphCxSpMiddle&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: -18pt; MARGIN: 0cm 36pt 0pt 0cm; mso-list: l0 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Symbol; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: Symbol; mso-bidi-font-family: Symbol&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&amp;middot;&lt;span style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;اسراف و زیاده&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: black; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;روی در تمام موارد خصوصا در لباس و سفره عید.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoListParagraphCxSpMiddle&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: -18pt; MARGIN: 0cm 36pt 0pt 0cm; mso-list: l0 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Symbol; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: Symbol; mso-bidi-font-family: Symbol&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&amp;middot;&lt;span style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;عدم توجه به فقراء و نیازمندان.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoListParagraphCxSpLast&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: -18pt; MARGIN: 0cm 36pt 10pt 0cm; mso-list: l0 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;span style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Symbol; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: Symbol; mso-bidi-font-family: Symbol&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&amp;middot;&lt;span style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;عدم رعایت صله رحم مخصوصا نسبت به کسانی که به کمک و یاری نیاز دارند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;اداره سايت عقيده يكبار &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;دیگر این عید سعید و فرخنده را خدمت همۀ برادران و خواهران مسلمان تبریک عرض نموده برای همۀ&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;آرزوی قبولی طاعات و عبادات می نماید.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font face=&quot;Calibri&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
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<title>صدقه فطر و عید سعيد فطر</title>
<link>http://qalamlib.com/news/202</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;صدقه فطر &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt;و عید&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; سعيد&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt; فطر&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;right&quot; class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: left; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&amp;laquo; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;والصدقة&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;تطفى الخطيئة كما يطفى الماء&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;النار &lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;PRS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-language: PRS-AF&quot;&gt;&amp;laquo; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;PRS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: PRS-AF&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;الترمذي &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: green; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;صدقه گناهان را&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;محو&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ونابود مى كند&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;همانطوريكه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;آب آتش را بى&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;اثر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;مى ماند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: navy; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;.)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: maroon; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;معنى لغوى فطر&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;روزه را&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;باز كردن ومعنى صدقه فطر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;:&lt;span style=&quot;COLOR: #993300&quot;&gt; صدقه&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;روزه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;باز كردن&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;است . در اصطلاح&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;مراد&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;از صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;آن صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;واجبى&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;است&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;كه با خاتمه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;يافتن&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;رمضان&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;وبه خاطر باز كردن&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;روزه داده&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ميشود . &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;حکم&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;زکات فطر:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;زکات فطر بر هر مسلمان آزادي که بيش از قوت يک شبانه روز خود و خانواده&amp;zwnj;اش داشته باشد، واجب است&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; (رواه بخاري1503- مسلم984)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;ورسول الله&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;صلى الله عليه و سلم به دادن زکات فطر از کوچک وبزرگ وآزاد وبرده وکساني&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;که نفقه آنها بر عهده شما است امر فرموده(صحيح ،دارالقطني220- بيهقي161/4&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;- &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;الاءرواءالغليل835)&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;از ابن عمر ( رض ) &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;روايت است: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;أمر رسول الله-صلى الله عليه وسلم- بصدقة الفطر عن الصغير والکبير والحر والعبد ممن تمونون&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt; (صحيح &amp;ndash; بيهقى &lt;a name=&quot;_ftnref1&quot;&gt;161/4&lt;/a&gt;)&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&amp;laquo;پيامبر صلى الله عليه وسلم به دادن زکات فطر از کوچک و بزرگ و آزاد و برده، و کساني که نفقه آنها بر عهده شما است امر فرموده است&amp;raquo;. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;دریک روایت ضع&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;ي&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;فی&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;از حضرت عثمان&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;رضی الله&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;آمده است&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;که د&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;رأ&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;ن&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;زمان &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;زكات جنين را &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;نیز&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;ميداد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;ند &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ansi-language: DE; mso-fareast-language: DE&quot;&gt;و نزد مذهب حنبلى دادن زكات فطر براى جنين مستحب است ولى واجب نيست.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; mso-bidi-font-size: 12.0pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;حکمت زکات فطر:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;در حديث متبركه كه راوي حديث &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;ابن عباس رضي الله عنه &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;ميباشد آمد ه است که : &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;رسول الله صلى الله&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-bidi-font-size: 12.0pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;عليه و سلم زکات فطر را به عنوان پاک کننده روزه دار ازسخنان بيهوده&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-bidi-font-size: 12.0pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;ودشنام ، به عنوان رزق وخوراکي براي مساکين واجب کرده است&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;والصدقة&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;تطفى الخطيئة كما يطفى الماء&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;النار&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; الترمذي &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; صدقه گناهان را&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;محو&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ونابود مى كند&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;همانطوريكه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;آب آتش را بى&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;اثر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;مى ماند&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Pokhto; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Times New Roman&quot;&gt; &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;در حدیثی آمده است که : اګر &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;كسى&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;كه قبل&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;از&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;نماز&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;عيد&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;فطر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;خويش&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;را&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;اداء&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;نمايد آن صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;به شرف&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;قبول&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;واقع&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;گرديده؛&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;اما&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;اگر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;بعد از نماز&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ادا&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;گردد&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;مانند&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ساير&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;خيرات وصدقات&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;يك صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;به حساب&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ميايد. &lt;span style=&quot;COLOR: #000001&quot;&gt;(وبه عنوان زکات فطر&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-bidi-font-size: 12.0pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-size: 12.0pt; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;محسوب نمي شود)(صحيح سنن ابن ماجه1480- ابوداوود1594) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;وقت&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;واجب گرديدن&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;فطر &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt;:&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;هنگام&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;طلوع&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;فجر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;روز عيد رمضان&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;است ليكن&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;تقاضاى&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;حكمت&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ونصب&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;العين&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;وجوب آن در اين&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;است كه اين وجيبه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;بايد چند&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;روز قبل&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;از عيد&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;رمضان&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;صورت گيرد تا به&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;مستحقين&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ونيازمندان برسد.&lt;/span&gt;&lt;font face=&quot;Courier New&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;انسان&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;متوسط الحال علاوه برخودش&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;بايدازجانب&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;اولاد نا بالغ&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;خود هم صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;فطر را&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ادا كند&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ومقدار&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;صدقه&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;فطر بر شخص بالغ ونابالغ&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;يكسان&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ميباشد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;مقدار&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;زکات فطر:&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;ابو سعيد خدري رضي الله عنه مي فرمايد: ما درزمان رسول الله صلى&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;الله عليه و سلم يک صاع از گندم يا جو يا خرما يا کشک يا کشمش را براي هر&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;نفرزکات فطر مي داديم(رواه بخاري1505- مسلم985&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;) &lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;ودر حديث ديگري مي فرمايد: ما يک صاع ازطعام خود را در عهد رسول الله صلى&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;الله عليه و سلم به عنوان زکات فطر مي داديم (رواه بخاري 1510&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;)&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;مقداری&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;صدقه فطر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;که همه علما ء&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;بران متفق القول &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;اند عبارتند &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: maroon; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;از يك كيلو ويكصدو ده گرام&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;كندم&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ويا قيمت&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;روز آن ميباشد.&lt;/span&gt;&lt;font face=&quot;Courier New&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; COLOR: maroon; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: maroon; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;ابن&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;قيم جوزي رحمه الله مي فرمايد: اين چند مورد از حبوبات (گندم- جو- خرما&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;و...)که در احاديث &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;ذکری از آن بعمل&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;آمده &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;است &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;نشانگر آن است که در&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; زمان پیامبر اسلام حضرت&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;محمد صلی الله علیه وسلم&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;در مدينه (قوت)غذاي&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;غالب مردم همين چيزها بوده و اگر درجايي يا زماني ديگر قوت غالب چيز ديگري&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;باشد بايد ازآن بپردازند اگرچه غذايشان غيرازحبوبات مثل شيروگوشت و ماهي&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;باشد واين قول جمهور علما وقول ارجح است ومقصود از پرداخت زکات فطر يکساني&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;با مساکين است، درطعام روزعيد، يعني غذاي مسکين هم درآن روز همانند بقيه&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;مردم باشد&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; (&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;اعلام الموقعين 3/12&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;) &lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;زکات&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;فطر به چه کساني داده مي شود:&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style=&quot;mso-ansi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: PS-AF&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;زکات فطر&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; مطابق به ګفتار وهدایت پیامبر اسلام حضرت محمد صلی الله علیه وسلم که میفرماید : &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;((زکات فطر رزق وخوراکي براي مساکين&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;است)) (صحيح سنن ابن ماجه1480- ابو داوود1594&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #000001; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #993300; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #993300; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #993300; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;عيد فــــطـــر :&lt;/span&gt;&lt;font face=&quot;Courier New&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; COLOR: #993300; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: #993300; FONT-SIZE: 12pt&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;كلمه &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: maroon; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;عيد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&amp;raquo; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;در اصل از&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;فعل عاد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: maroon; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;عود&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;يعود به معنى بازگشت است ، ولذا به روزه هايى كه مشكلات قوم وگروه بر طرف ميشود وبه راحت ها&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;وپيروزى هاى دست مى يابند ، عيد مسمى نموده اند.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Courier New&quot;&gt; &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;PS-AF&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-language: PS-AF; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoPlainText&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-KASHIDA: 0%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-ansi-font-weight: bold; mso-bidi-font-weight: normal&quot;&gt;عيد اسلامى فطر يكى از دو ع</description>
</item><item>
<title>معرفی کتاب هایی در توحید  و یکتاپرستی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/200</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;معرفی کتاب هایی در توحید&amp;nbsp;&amp;nbsp;و یکتاپرستی&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
درود و سلام الله بر بهترین آفریده ها، خاتم پیامبران، سیدنا محمد و خاندان پاک و یاران خوب و پیروان راستینش تا روز قیامت باد.&lt;br /&gt;
الله جل جلاله پیامبران علیهم السلام را فرستاد تا انسانها را از شرک وگمراهی&amp;nbsp;&amp;nbsp;به راه حق و نور الهی راهنمایی کنند، دعوت همۀ پیامبران الهی بسوی توحید ویکتا پرستی وهم وغم ایشان علیهم السلام از بین بردن بت پرستی شرک وبدعت بود و در این راستا پیامبر محبوبمان محمد مصطفی صلی الله علیه وآله وسلم زحمات فراوانی کشیدند و در این راه آزارها و اذیت های فراوانی را متحمل گردیدند حتی تا آخرین لحظات عمر شریف شان از هدایت و راهنمایی امت غافل نبودند.&lt;br /&gt;
و از همه مهمتر اینکه هدف از آفرینش زمین و آسمان و جن و انسان و فرشته و حیوانات و همۀ موجودات توحید و یکتا پرستی ذات یگانه الله عزوجل بوده است. یعنی ذات یگانه او را شناختن و او تعالی را به یگانگی پرستیدن و تنها از او کمک خواستن.&lt;br /&gt;
الله جل جلاله در آیات متعددی این موضوع را بطور واضح و روشن و آشکار بیان نموده است و حتی تقریبا در همۀ سوره های قرآن کریم مسأله مهم توحید بیان شده است.&lt;br /&gt;
الله تبارك و تعالی می فرماید:(وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِیعْبُدُونِ ). [ذاریات: 56].&amp;laquo;من جن و انس را نیافریدم جز براى اینكه عبادتم كنند&amp;raquo;&lt;br /&gt;
یعنی: جن و انس را برای هیچ هدفی جز اینكه مرا پرستش نمایند، &amp;zwnj;نیافریده&amp;zwnj;ام. این آیه بیانگر توحید است. زیرا گذشتگان نیك امت، آنرا چنین تفسیر كرده&amp;zwnj;اند كه &amp;laquo;لیعبدون&amp;raquo; یعنی &amp;laquo;لیوحدون&amp;raquo; &amp;laquo;تا مرا به وحدانیت بشناسند&amp;raquo;. بنابر این در می&amp;zwnj;یابیم كه هدف از بعثت همه پیامبران نیز توحید عبادت يا يكتاپرستی بوده است.&lt;br /&gt;
برای مومن بودن، توحید علمی و نظری كفایت نمی كند، بلكه لازم است كه الله متعال را به عنوان تنها معبود، عبادت کرد و جز او را نباید پرستش نمود.&lt;br /&gt;
زیرا آفریدگار روزی دهنده، نعمت دهنده بدون عوض، زنده كننده، میراننده، متصف به صفات كمال و پاک و منزه از تمام صفات نقص، تنها او تعالى است و جز او همه موجود، آفریده شده اند و تحت فرمان او تعالى هستند و برای خود مالك نفع و ضرر نمی باشند.&lt;br /&gt;
اساس و ركن توحيد و يكتاپرستی لا اله الا الله می باشد.&lt;br /&gt;
(لا اله الا الله) كلمه توحید است. این كلمه ایمان را در برگرفته و حاوی آن است، این كلمه عنوان و اساس اسلام است،&amp;nbsp;&amp;nbsp;معنی آن این است كه:&lt;br /&gt;
هیج معبودی نیست كه شایسته عبادت باشد، جز ذات الله.&lt;br /&gt;
در راستای تحقق توحید و یکتاپرستی در بین امت اسلامی کتابخانه سایت عقیده پایه گذاری شد. کتابخانه ای که در زمینه عقیده و باور اسلامی که از دو منبع اصلی یعنی قرآن و سنت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم برگرفته شده که این دو منبع سنگ زیرین و اساس عقیدۀ گروه نخستین این امت را بنا نهاده&amp;rlm;اند.&lt;br /&gt;
فکر نمی کنيم کسی بجز منافقين و دشمنان قسم خورده اسلام مخالف این واقعیت باشد که عقیده و باور گروه نخست این امت، عقیده ای پاک وصاف همچون آب دریاها و نیرومند و استوار همچون کوههای سر به فلک کشیده بوده است و الله متعال به وسیلۀ صاحبان این عقیده و باور، مسیر تاریخ بشریت را تغییر داد.&lt;br /&gt;
حال اگر عقیده و باور را به منبع های اصلی خود یعنی منابعی که نیاکان و سلف صالح از اهل بیت و صحابه کرام و تابعین و مصلحین این امت به وسیله آنها سیراب شده و از چشمه&amp;rlm;های آن بهرمند شدند بازگردانیم، امت اسلامی را به مجد و عظمت گذشته و از دست رفته رهنمون خواهیم شد.&lt;br /&gt;
قضیه بازگشت به قرآن و سنت مسئله&amp;rlm;ای است که امروزه گروههای زیادی با زبان وسخنرانی و مقالات و نوشته&amp;rlm;های خود ادعای آن را دارند اما در میدان عمل و کردار و در مجال استلال با آن مخالف بوده و آشکارا می بینیم که رأی و نظر انسان را بر نصوص قرآنی و احادیث نبوی ترجیح داده و مسیری جدا از مسیر حق و راهی غیر از راه اسلام و قرآن را در معامله و داد و ستدهایشان در پیش گرفته اند. به همین دلیل ما به توفيق الله متعال در سایت عقیده تلاش کرده&amp;rlm;ايم با نشر و پخش فرهنگ ناب اسلامی و سنت پاک محمدی صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;گامی در این راه برداشته باشیم&amp;nbsp;&amp;nbsp;و منهج و روش ما در سایت عقیده و شعار اصلی ما بازگشت به این دو مصدر یعنی قرآن و سنت صحیح پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;می باشد، و در این راستا مجبوریم به شبهات دشمنان اسلام نیز پاسخ دهیم تا در ضمن دعوت به سوی دین حق و یکتاپرستی مسلمانان را از بدعت و شرک و آنچه مخالف با یکتاپرستی است باز داریم.&amp;nbsp;&amp;nbsp;زيرا دربارۀ اینکه شرک گناهی بزرگ است و هرگز بخشیده نمی شود الله جل جلاله مي&amp;zwnj;فرمايد:(إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ). [نساء: 48].&amp;laquo;الله (هرگز) شرك را نمى&amp;rlm;بخشد! و پايين&amp;rlm;تر از آن را براى هر كس (بخواهد و شايسته بداند) مى&amp;rlm;بخشد&amp;raquo;&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان!&lt;br /&gt;
اينک که بیشتر از یک سال از افتتاح کتابخانه الکترونیکی عقیده می گذرد، ادارۀ کتابخانه افتخار دارد که مهمترین کتابهایی را که به مسالۀ مهم توحید و یکتاپرستی و بیان عقیده ناب اسلامی پرداخته است خدمت شما عزیزان معرفی نماید باشد که چراغ هدایتی در مسیر راه حقجویان گردد. ان شاء الله. شما مى توانید&amp;nbsp;از&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتابخانه الکترونیکی عقیده دریافت نمایید.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;ol&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;توحید - یکتا پرستی&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;توحید برای کودکان و نوجوانان&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;توحید عبادت&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;توحید محور زندگی&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;حقیقت توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;حقیقت توحید از دیدگاه ائمه&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;حمایت از توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;دعوت مسیحیان به توحید&amp;nbsp;&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;دلایل توحید - 50 سؤال و جواب در یگانه پرستی&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;دلایل توحید - 50 سوال و جواب دربارۀ عقیده&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;علمای شافعی و توحید در عبادت&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;غایة المرید شرح کتاب توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;فتح المجید شرح کتاب توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;فریب جدید در ائتلاف تثلیث و توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;وحدت کلمه بر اساس کلمه توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;پناهگاه توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;کتاب توحید&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;از قرآن و حدیث عقیده ات را بیاموز&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;شرح آسان عقیده طحاویه&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;شرح عقیده طحاویه&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;عقیده اهل بیت علیهم السلام&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;عقیده اهل سنت و جماعت&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;عقیده رستگاران&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;عقیده هر مسلمان&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;عقیده و ایمان از دیدگاه اسلام&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;مختصری در عقیده اسلامی&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;نود و نه سؤال و جواب در عقیده&lt;/li&gt;
	&lt;li dir=&quot;RTL&quot;&gt;عقیده و ایمان&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;</description>
</item><item>
<title>نامه‌ی یکی از خوانندگان به مناسبت حمله‌ی کوردلان به سایت عقیده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/195</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt;&quot;&gt;به نام خداوند بخشاینده&amp;zwnj;ی مهربان&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;با درود و سلام بی پایان بر سید بشر محمد بن عبدالله و اهل بیت و صحابۀ فداکارشان&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt;&quot;&gt;يُرِيدُونَ لِيُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَاللَّهُ مُتِمُّ نُورِهِ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt; &lt;font size=&quot;1&quot;&gt;(8) الصف&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 24pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;rlm;&lt;span style=&quot;color: green;&quot;&gt;مي&amp;zwnj;خواهند نور الله را با دهانهايشان خاموش گردانند، ولي الله نور (دین و عقیده ی برحق) خود را كامل مي&amp;zwnj;گرداند، هرچند كه كافران دوست نداشته باشند&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;raquo;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;برادران و خواهران عزیز&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;دست اندرکاران سایت عقیده&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;السلام علیکم ورحمه الله وبرکاته&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;پروردگار متعال دین حق را سبب سعادت و رستگاری هر دو جهان قرار داده است. از خصائص دین حق این است که دشمنان فراوانی دارد. خصوصیت دیگر دین حق این است که پیروانش همواره از اسباب و امکانات مادی کمتری نسبت به اهل باطل برخوردارند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;داستانهای پیامبران الهی در قرآن کریم بهترین شاهد و نمونه بر این ادعاست؛ &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;ابراهیم علیه السلام در برابر نمرود، موسی علیه السلام در برابر فرعون و محمد مصطفی صلی الله علیه و آله وسلم در برابر سران قریش و یهود و منافقین و مسیحیت و مجوسیت و سایر پیامبران و مجاهدان راه حق همه و همه تقریبا دست خالی بوده&amp;zwnj;اند اما قرآن کریم و تاریخ شاهد است که همیشه دست خالی و گروه اندک حق بر امکانات سرشار مادی و قوت و قدرت باطل غالب و پیروز شده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;از دیگر خصوصیات دین حق و اهل حق این است که هرگز در پی انتقام نیستند و هدف شان فقط رسیدن به رضایت و خوشنودی الله متعال و ادای مسئولیتی است که او بر عهده&amp;zwnj;ی آنها نهاده، لذا با هیچ کس حتی با بدترین دشمنان کینه و دشمنی ندارند، و برای همه آرزوی هدایت و رستگاری و&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;نیکی و خیر می کنند و ذات پاک یکتا برای همه سعادت و خوشبختی می طلبند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;تنها سلاحی که اهل حق در دست دارند دعاست. یعنی کمک خواستن از ذاتی که همه قدرتها و توانایی ها در اختیار اوست، خود دعا می کنند و از دیگران دعا می طلبند،&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;رسول گرامی صلی الله علیه و آله وسلم فرمودند:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;laquo; &lt;span style=&quot;color: blue;&quot;&gt;فَإِنَّكُمْ إنَّمَا تُرْزَقُونَ وَتُنْصَرُونَ بِضُعَفَائِكُمْ&lt;/span&gt; &amp;raquo; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;span style=&quot;color: green;&quot;&gt;جز این نیست که شما با دعای ضعیفانتان کمک و نصرت و یاری می شوید&lt;/span&gt;&amp;raquo;. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;به لطف و توفیق الله متعال در عصر علم و تکنولوژی و رسانه سرعت نشر حق نیز روز افزون است و الحمدلله این سرعت روز افزون موجی از بیداری را در میان امت اسلامی و از جمله مسلمانان فارسی زبان ایجاد کرده که باطل و باطل پرستان قدرت تحمل دیدن آنرا ندارند. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;از آنجایی که سربازان باطل و نیروهای خفاش صفت تاریک پرست همیشه نور و روشنایی را دشمن خویش می پندارد، لذا برای خاموش کردن نور همواره در تلاش اند با انواع توطئه و نیرنگها و مکر و حیله&amp;zwnj;های شیطانی چراغ حق را خاموش کنند اما سنت و وعده الهی این است که نور روشنایی بر ظلمت و تاریکی غالب گردد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;همچنانکه شاهد بودیم سایت های اهل حق و عقیده ی ناب محمدی طی چند روز گذشته مورد حمله بیماران قلبی قرار گرفت تا شاید بتوانند درد شان را تسکین دهند اما:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 24pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: blue; font-size: 12pt;&quot;&gt;فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ فَزَادَهُمُ اللَّهُ مَرَضًا وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: black; font-size: 12pt;&quot;&gt; (10)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 24pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;rlm;&amp;laquo;&lt;span style=&quot;color: green;&quot;&gt;در دلهايشان بيماري (حسودي و كينه&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: green; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: green; font-size: 12pt;&quot;&gt;توزي با مؤمنان) است و الله (نيز با ياري دادن و پيروز گرداندن حق) بيماري ايشان را فزوني مي&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: green; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: green; font-size: 12pt;&quot;&gt;بخشد، و عذاب دردناكي (در دنيا و آخرت) به سبب دروغگوئي و انكارشان در انتظارشان مي&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: green; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: green; font-size: 12pt;&quot;&gt;باشد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&amp;raquo;.&amp;rlm;&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;اما خوشبختانه با لطف و کمک پروردگار و دعای مظلومان و مستضعفان جهان شاهد آن بودیم که جز چند روز توقف هیچ مشکلی پیش نیامد. و فرزندان راستین ابوبکر و عمر و عثمان و علی توانستند دوباره با عزم و ارادۀ قوی پا به میدان گزارند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;این پیروزی و ثبات و ایستادگی و رادمردی را به همه&amp;zwnj;ی عزیزان دست اندرکار&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;در سایتهای حقیقت جو و آزاد اندیش و مؤمن و با خدا را تبریک و تهنئت عرض کرده برایتان آرزوی موفقیت و ایستادگی و ثبات و پایداری داشته از خداوند متعال مسألت دارم که همه&amp;zwnj;ی شما مهتران را در پناه خود حفظ نماید. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;و از شما عزیزان می خواهم که هرگز بفکر انتقام جویی از دشمنان حق نباشید و برای این بیماران قلبی نیز دعا کنید و همچنان برای هدایت و سعادت و خوشبختی آنان و تحقق اسلام ناب محمدی و&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;وحدت حقیقی تلاش خود را ادامه دهید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;از خداوند متعال می خواهم که شما سربازان توحید و یکتاپرستی، فرزندان سلمان فارسی، و پیروان اهل بیت رسول اکرم&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;( صلی الله علیه و آله وسلم) و یاران مؤمن و فداکار او را در راه حق توفیق روز افزون داده از بدیها و زشتیها بدور نگه دارد و در سایه فضل و کرم خویش پایدار گرداند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;پیروز و شادکام باشید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;برادر و دوستدارتان&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;جواد منتظری&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;(حجت الاسلام سابق و موحد و یکتاپرست امروز)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: right; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%;&quot;&gt;ادارۀ سایت عقیده:&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%;&quot;&gt;با تشکر از برادر عزیز و غمخوارمان جواد منتظری&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;b&gt;و سایر دوستانی که در این زمینه با ما از طریق ایمیل یا تلفن در رابطه بوده اند.&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%;&quot;&gt;به همه&amp;zwnj;ی این برادران و خواهران مؤمن و فداکارمان خاطر نشان می&amp;zwnj;سازیم که ما بیدی&amp;nbsp; نیستیم که با چنین بادهایی بلرزیم. ما در پشت کوههای استوار&amp;nbsp; ایمان و حمایت الله متعال از هیچ چیز و هیچ کسی هیچ هراسی نداریم. تنها از این ناراحتیم که چطور برخی به خود اجازه می دهند ملیونها دلار از سرمایه&amp;zwnj;ی مملکت را در راه فیلتر کردن و یا هک کردن برخی از سایتها خرج کنند در حالی که هیچ فایده و نتیجه&amp;zwnj;ای برایشان ندارد. &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%;&quot;&gt;و به اطلاع دوستان می رسانیم که سایت های ما چون سایر سایتها از این حمله&amp;zwnj;های شیطانی هیچ ضرری ندیده است و همه&amp;zwnj;ی برنامه ها و فایلهای ما کاملا محفوظ است و در اختیار علاقه مندان قرار دارد.&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; color: red; font-size: 12pt;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%;&quot;&gt;با تشکر مجدد از همه..&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center; line-height: 200%; margin: 0cm 0cm 10pt;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;line-height: 200%;&quot;&gt;ادارۀ سایت عقیده&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>عقيده من مسلمان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/194</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;عقیده من مسلمان&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;بقلم: شیخ اسحاق دبیری رحمه الله&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;من الله متعال، ملائکه و شما را شاهد قرار می&amp;zwnj;دهم که من به اعتقادات فرقه ناجیه &amp;laquo;اهل سنت و جماعت&amp;raquo; معتقدم که شامل ایمان به الله متعال، فرشتگان، کتابهای آسمانی، پیامبران، زنده شدن پس از مرگ، ایمان به قضا و قدر هستند. ایمان به الله متعال شامل ایمان به آن اموری است که الله متعال به وسیله آن در کتابش از زبان پیامبرش صلی الله علیه وآله وسلم بدون تحریف و تعطیل خود را وصف نموده است. بلکه معتقدم که الله ـ سبحانه وتعالی ـ بی&amp;zwnj;همتا و شنوا و بیناست پس صفاتی را که الله متعال خود را بدانها توصیف کرده است. انکار نمی&amp;zwnj;کنم و سخنان را نیز تحریف نمی&amp;zwnj;نمایم و در نامها و آیات آن الحاد نمی&amp;zwnj;ورزم. صفات او را با صفات مخلوقاتش مقایسه نمی&amp;zwnj;کنم. زیرا او، بی&amp;zwnj;نظیر، بی&amp;zwnj;همتا و بی&amp;zwnj;شریک است. و با مخلوقاتش قابل مقایسه نیست.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الله متعال نسبت به خود و دیگران داناترین، راست گفتارترین و دارای بهترین سخن است، الله متعال خود را از آنچه مخالفان اعم از اهل تکییف و اهل تمثیل بدان نسبت می&amp;zwnj;دهند و از آنچه اهل تعطیل و تحریف نفی می&amp;zwnj;کنند مبرا دانسته است. الله متعال می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(سُبْحَانَ رَبِّكَ رَبِّ الْعِزَّةِ عَمَّا یَصِفُونَ &amp;nbsp;وَسَلَامٌ عَلَى الْمُرْسَلِینَ). (الصافات:180-181).&amp;laquo;منزه است پروردگار تو، پروردگار عزّت (و قدرت و غلبه) از آنچه آنان (مشركان و جاهلان) توصیف می&amp;zwnj;كنند. و سلام بر رسولان&amp;raquo;. فرقه ناجیه دربارة افعال الله متعال حد وسط میان قدری&amp;zwnj;ها و جبری&amp;zwnj;ها هستند. آنان در زمینه تهدیدهای الله متعال بین مرجئه و وعیدیه قرار دارند. در زمینه ایمان حد وسط میان حروریه و معتزله، مرجئه و جهمیه هستند. دربارة یاران پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم اعتقادشان بین رافضه و خوارج قرار دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;معتقدم که قرآن کریم کلام الله متعال و غیر مخلوق است. از الله متعال شروع شده است و به او باز می&amp;zwnj;گردد. حقیقتاً آن را بر زبان جاری ساخته به وسیلة وحی سفیرش بین او و بندگانش آن را بر بنده و پیامبر و امینش حضرت محمد صلی الله علیه وآله وسلم نازل کرده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;معتقدم که الله متعال هر آنچه بخواهد انجام می&amp;zwnj;دهد و همه چیز تحت اراده اوست. هیچ چیز خارج از خواست او قرار ندارد. هیچ امری در جهان خارج از تقدیر و تدبیر او وجود ندارد. هیچ کسی از قَدَر تعیین شده برایش در امان نیست و از آنچه در لوح محفوظ برای او تعیین شده تجاوز نمی&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به همه آنچه پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم از امور پس از مرگ خبر داده است اعتقاد دارم. من به آزمایش و امتحان و نعمت&amp;zwnj;های قبر، بازگشت روح به کالبد معتقدم. مردم در برابر الله متعال جهانیان لخت و پا برهنه می&amp;zwnj;ایستند. خورشید به آنها نزدیک می&amp;zwnj;شود. ترازوی اعمال نصب می&amp;zwnj;شوند. و به وسیله آنها اعمال بندگان سنجیده می&amp;zwnj;شود. کسی که اعمالش فراوان و کفة اعمال نیکش سنگین باشد، (مؤمن) رستگارست. (اما كافری كه) کفه اعمال نیک او سبک و حسناتش اندک باشد زیانکار و در جهنم جاودان است. نامه اعمال انسانها توزیع و به آنان داده می&amp;zwnj;شود، گروهی آن را با دست راست، و گروهی دیگر با دست چپ دریافت می&amp;zwnj;کنند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به حوض پیامبرمان محمدصلی الله علیه وآله وسلم در زمین قیامت معقتدم که آب آن از شیر سفیدتر و از عسل شیرین&amp;zwnj;تر است، تعداد ظرفهای آن به اندازه تعداد ستارگان آسمان است. کسی که یک بار از آن بنوشد پس از آن هرگز تشنه نخواهد شد. معتقدم که [پل] صراط بر روی لبة [پرتگاه] جهنم قرار دارد که مردم با توجه به مقدار اعمالشان از روی آن عبور می&amp;zwnj;کنند. به شفاعت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم و اینکه اولین کسی است که شفاعت می&amp;zwnj;کند و مورد شفاعت قرار می&amp;zwnj;گیرد ایمان دارم. فقط بدعت گذاران و پیروان امیال و هوای نفسانی شفاعت را انکار می&amp;zwnj;کنند. اما شفاعت بعد از اذن و رضایت پروردگار انجام می&amp;zwnj;شود. الله متعال می&amp;zwnj;فرماید: (وَلَا یَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ارْتَضَى). (الأنبیاء: 28). &amp;laquo;آنان هرگز برای کسی شفاعت نمی&amp;zwnj;کنند مگر برای کسی که [بدانند] که الله از او خشنود است&amp;raquo;. همچنین می&amp;zwnj;فرماید: (مَنْ ذَا الَّذِی یَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ). (البقره: 255). &amp;laquo;کیست که در نزد او جز به فرمانش شفاعت كند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین می&amp;zwnj;فرماید:(وَكَمْ مِنْ مَلَكٍ فِی السَّمَاوَاتِ لَا تُغْنِی شَفَاعَتُهُمْ شَیْئًا إِلَّا مِنْ بَعْدِ أَنْ یَأْذَنَ اللَّهُ لِمَنْ یَشَاءُ وَیَرْضَى). (النجم: 26).&amp;laquo;و چه بسیار فرشتگان آسمانها (با آن مقام و منزلتشان) شفاعت آنها سودى نبخشد مگر پس از آنكه خدا براى هر كس بخواهد و راضى باشد اجازه (شفاعت) دهد! &amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الله متعال امری جز توحید را نمی&amp;zwnj;پسندد و فقط به اهل توحید اذن [شفاعت] می&amp;zwnj;دهد. اما مشرکان بهره&amp;zwnj;ای از شفاعت ندارند. چنانکه خداوند تعالی می&amp;zwnj;فرماید:(فَمَا تَنْفَعُهُمْ شَفَاعَةُ الشَّافِعِینَ). (المدثر: 48).&amp;laquo;از این رو شفاعتِ شفاعت كنندگان به حال آنها سودى نمی&amp;zwnj;بخشد&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به مخلوق بودن بهشت و جهنم معتقدم. همچنین اعتقاد دارم که آنها الآن وجود دارند و نابود نمی&amp;zwnj;شوند. و مؤمنان در روز قیامت پروردگارشان را رؤیت می&amp;zwnj;کنند همانگونه که ماه شب چهارده را می&amp;zwnj;بینند و رؤیت او باعث خستگی و ملال آنها نمی&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;معتقدم که پیامبرمان محمد صلی الله علیه وآله وسلم خاتم پیامبران و فرستادگان است. ایمان بنده جز با ایمان آوردن به رسالت و تأیید نبوت او کامل نمی&amp;zwnj;شود. بهترین افراد امت او به ترتیب، ابوبکر صدیق، عمر فاروق، عثمان ذی النورین، علی مرتضی و سپس بقیه عشره مبشره، آنگاه اهل بدر، سپس اهل بیعت رضوان و سپس همة صحابه ن هستند. اصحاب رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم را دوست می&amp;zwnj;دارم، و به ذکر محاسن آن می&amp;zwnj;پردازیم، و براى آنان از الله متعال خشنودى می&amp;zwnj;طلبم، و برایشان مغفرت می&amp;zwnj;خواهم، و از بر شمردن اشتباهات و بدیهایشان چشم پوشی، و از اظهار نظر درباره اختلافات آنها خودداری می&amp;zwnj;کنم و به فضل و بزرگواری همه آنان اعتقاد دارم. زیرا الله متعال می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(وَالَّذِینَ جَاءُوا مِنْ بَعْدِهِمْ یَقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِینَ سَبَقُونَا بِالْإِیمَانِ وَلَا تَجْعَلْ فِی قُلُوبِنَا غِلًّا لِلَّذِینَ آَمَنُوا رَبَّنَا إِنَّكَ رَءُوفٌ رَحِیمٌ). (الحشر: 10). &amp;laquo;كسانى كه بعد از آنها (مهاجرین و انصار) آمدند می&amp;zwnj;گویند: پروردگارا! ما و برادرانمان را كه در ایمان بر ما پیشى گرفتند بیامرز، و در دلهایمان حسد و كینه&amp;zwnj;اى نسبت به مؤمنان قرار مده، پروردگارا! تو مهربان و رحیمی&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امهات المؤمنین را که پاک و مطهر از هر گونه بدی و زشتی پاک و مبرا می&amp;zwnj;دانم. به کرامات اولیا و مکاشفات آنها اعتقاد دارم. اما نباید آنچه را که به الله متعال اختصاص دارد به آنها نسبت داد، و آنچه را که فقط الله متعال قادر به انجام آن است، از آنها طلب نمود. بر دخول هیچ مسلمانی در بهشت یا جهنم گواهی نمی&amp;zwnj;دهم مگر آنان که پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم بر آنان شهادت داده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما نسبت به نیکوکار امیدوار، و نسبت به گناهکار نگران و بیمناکم. هیچ کدام از مسلمانان را به خاطر ارتکاب گناهی تکفیر نمی&amp;zwnj;کنم، و او را از دایره اسلام خارج نمی&amp;zwnj;دانم، به جهاد به همراه رهبر نیکوکار و فاسق اعتقاد دارم، و نماز جماعت پشت سر آنها را جایز می&amp;zwnj;دانم، جهاد از زمان بعثت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم تا زمانی که آخرین فرد این امت با دجال می&amp;zwnj;جنگد ادامه دارد. ظلم ظالم و عدل عادل آن را باطل نمی&amp;zwnj;سازد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;پیروی و اطاعت از رهبر مسلمانان را خواه نیکوکار باشد یا فاسق چنانکه به نافرمانی الله متعال دستور ندهد واجب می&amp;zwnj;دانم. کسی که به خلافت رسید، و مردم بر او اجماع کردند. و به حکومت راضی شدند و به وسیله شمشیر و قدرت بر آنان غلبه کرد، اطاعتش واجب، و خروج بر او حرام است. دوری از بدعت گزاران و معتقدان به بدعتها را تا زمانی که توبه می&amp;zwnj;کنند. لازم می&amp;zwnj;دانم، و آنان را مسلمان می&amp;zwnj;دانم، و اعتقادات درونی آنها را به الله متعال واگذار می&amp;zwnj;کنم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بر این اعتقادم که هر امر جدیدی [به نام دین] وارد اسلام شود، بدعت است. معتقدم که ایمان: گفتن [شهادتین] با زبان، و عمل کردن به وسیلة اعضا و جوارح، و اعتقاد به امور غیبی است، که به وسیله اطاعت کردن بر آن افزوده، و به وسیلة گناه از آن کاسته می&amp;zwnj;شود. ایمان هفتاد و چند شاخه دارد، بالاترین آنها شهادت &amp;laquo;لا إله إلاَّ الله&amp;raquo; و پایین&amp;zwnj;ترین آن، دور کردن، اشیاء مزاحم از راه مردم است. به وجوب امر به معروف و نهی از منکر براساس تعلیم شریعت اسلام معتقدم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این خلاصه&amp;zwnj;ای از اعتقادات من است که به طور خلاصه آن را به رشته تحریر در آوردم. من دوست داشتم شما از اعتقادات من مطلع باشید. الله جل جلاله بر آنچه می&amp;zwnj;گوییم آگاه است.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی تفسیر تابشی از قرآن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/192</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;معرفی تفسیر تابشی از قرآن&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تفسیر تابشی از قرآن، تابشی است نوین از کرانه&amp;zwnj;های بی ساحل قرآن مجید. پرتوی است از نور حقیقت که از تنگه&amp;zwnj;های باریک اختلافهای مذهبی میلها فاصله داشته، خود را در رده&amp;zwnj;ی شاخصترین تفاسیر فارسی نوین بر تاریخ تحمیل کرده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تفسیر تابش کرامتی است الهی و شاهدی است گویا بر اخلاص و ایمان و یکتاپرستی ابراهیم بت شکن ایران معاصر...این تفسیر که شاهکار یکی از فرزندان خانه نبوت است سعی دارد قرآن را از چنگ آخوندهای جاه طلب و مغرور بیرون کشیده، جلوی روی هر انسان آزاده و آگاهی قرار دهد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام سید ابو الفضل ابن الرضا برقعی دارای مدرک علمی و تخصصی اجتهاد و آیت الله العظمائی پس از سالیان دراز دوستی و همنوائی با کلام الهی در پرتو ملکوتی آن راه بسوی حقیقت یافت و بر صراط مستقیم قدم نهاد. پس از آن بیاری حق این تفسیر را راهنمایی برای سالکان و چراغی بر فراز راه مؤمنان برافروخت..&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در پیشگفتار این تفسیر بزرگ از زبان ناشر آن چنین آمده است:&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;در هر سخنی از سخنان گهر بار رسول اكرم -صلی الله علیه وآله وسلم- معجزاتی ودنيايی از معانی نهفته است كه از پشت كوههای سر بفلك كشيده زمان يكی يكی طلوع می كنند. از آنجمله است؛ آن سخن گرانبهايی كه در حقيقت نشان فخری است برای ايرانيان؛ بدان افتخار می ورزند و آن را تاج سر خود می دانند!.. آن روزی كه پيام آور آسمان به سلمان فارسی؛ پيك هدايت سرزمين فارس، و معجزه و شهادت راستينی كه ايران زمين با او مهر &amp;quot;صدقت يا رسول الله&amp;quot; بر دعوت توحيد و يكتاپرستی زدند، خيره شده فرمودند:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;quot; لو كان هذا الدين بالثريا لبلغه رجال من هؤلاء&amp;quot;.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اگر اين دين در آسمانها می بود، مردانی از سرزمين فارس آنرا در می يافتند...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حقا! چه راست گفتاری ای رسول پاك هدايت... سلام ودرود الله بر تو بادا به عدد دانه های باران وقطره های اقيانوسها تا به روز قيامت، به بی&amp;zwnj;نهايتها بار...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سرزمين فارس از ابتدای طلوع خورشيد هدايت بر آن هميشه چون ستاره ای تابان در آسمان دعوت وعلم اسلامی تجلی كرده است. وبر فطرت زمين گَه گُداری مورد تاخت وتاز بدعتها وگمراهيها نيز بوده، ولی هميشه پرچم توحيد &lt;strong&gt;&amp;quot;لا إله إلا الله محمد رسول الله&amp;quot;&lt;/strong&gt; يگانه پرچمی بوده كه سقف اين سرزمين را زينت می بخشيده...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;وتنها سه قرن است كه پرچم توحيد با آمدن موج تكفيری وخون آشام صفويت سرنگون گشته است!..اما بايد كه صدق كلام رسالت همواره تجلی گرا باشد... وچنين است...در بين اين گرد بادهای هولناك بدعت وگمراهی هميشه مهره های تابانی از لعل وياقوت وزمرد درخشيده اند... حضرت آيت الله العظمی ابو الفضل برقعی يكی از اين ستاره های تابان آسمان تاريك اين سرزمين است. ايشان سالهای متمادی عمر خويش را در گمراهی وبدعتهای جامعه بسر بردند... ولی چون روحی پويا وقلبی شيدای حقيقت داشتند سلمان گونه در پی حقيقت از كتابی به كتابی و از شهری به دياری و از آيه ای&amp;zwnj; به حديثی پريدند، تا در نهايت شاهين وار بر فراز قله توحيد جای گرفتند...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ايشان چون از شراب حقيقت توحيد مدهوش شدند در راستای اصلاح هم كيشان خويش قلم بدست جهادی بزرگ را آغاز نمودند كه بر اثر آن موجی از خداپرستی واصلاح را در جامعه شرك آلود ايران شاهديم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاهكار علمی ايشان تفسير تابش است كه در آن امام توحيد ابراهيم وار سعی نموده واقعيت دين را با سخنان قرآن وكلام پاك يزدان به مسلمانان بفهماند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تفسير تابش به مردم می گويد كه كتاب الهی برای همگان آمده است. و برای همگان قابل فهم و درك و هضم است. اين تفسير سدهای ساختگی بين قرآن و ملت را درهم می شكند، و ترس و واهمه ای كه مردم از قرآن كتاب پروردگارشان دارند را به يكباره از بين می برد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از آنجا که امام ابو الفضل برقعی علیه الرحمه از متن جامعه تشیع برخواسته است، با بدعتها و تصورات جاهلانه ای که در این جامعه رسوخ پیدا کرده آشنائی کامل دارد در این تفسیر ایشان با اسلوبی بسیار شیوا و قابل فهم برای همگان عمده ترین قضایای فساد دینی را با استناد به کلام پاک الهی و فرموده هاي گهربار پیامبر اکرم -صلی الله علیه وآله وسلم- و روایات وارده از ائمه اهل بیت به بهترین وجهی اصلاح می نماید.&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;{&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و امروز پس از تلاشهای بیدریغ شاگردان آن امام، خداوند متعال این تفسیر را کرامتی از آن مؤمن راستگو قرار داده، پس از مفقود الأثر شدن آن نسخه&amp;zwnj;ای که توسط خود امام تصحیح و مراجعه شده است را به دست شاگردان آن حضرت می&amp;zwnj;رساند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این نسخه را عاشقان کلام ملکوتی پروردگار در سایه فرموده&amp;zwnj;ی حق ( ما قرآن را فرو فرستادیم و ما خود آنرا حفاظت و نگهداری می&amp;zwnj;کنیم) به لباسی زیبا آراسته&amp;zwnj;ی چاپ نموده برای سالکان درب حقیقت به ارمغان آورده&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند این تفسیر مبارک را از بخش&amp;nbsp;و علوم قرآن کریم در کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/82/&quot;&gt;برای داونلود تفسیر تابشی از قرآن اینجا را فشار دهید.&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ گفتگویی آرام با دوست شيعه ام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/189</link>
<description>&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;کتابِ گفتگویی آرام با دوست شيعه ام&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=774&quot;&gt;از اینجا کتاب را داونلود نمایید&lt;/A&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;بحث و گفتگو برای اثبات حق و نجات انسانها از گمراهی و ظلالت روش قرآنی می باشد که حتی رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم به آن امر شده اند:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;(&lt;SPAN style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;ادْعُ إِلَى سَبِيلِ رَبِّک بِالْحِکمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَجَادِلْهُمْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ&lt;/SPAN&gt;) &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 9pt&quot; lang=AR-SA&gt;النحل 125&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;«(اي پيغمبر!) &lt;SPAN style=&quot;COLOR: #006600&quot;&gt;مردمان را با سخنان استوار و بجا و اندرزهاي نيکو و زيبا به راه پروردگارت فراخوان، و با ايشان به شيوه هرچه نيکوتر و بهتر گفتگو کن&lt;/SPAN&gt;»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;همچنین الله سبحانه و تعالی آن عده از بندگان خود را چه زیبا می ستاید، کسانی را که با شنیدن همۀ سخن ها بهترین آنرا می پذیرند و چشم و گوش بسته خود را در اختیار دروغگویان و مکاران و شیادان قرار نمی دهند و از هر شخصی که با عبا و قبای دینی مردم را فریب می دهد تقلید و پیروی کورکورانه نمی کند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;(&lt;SPAN style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;فَبَشِّرْ عِبَادِ&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ أُولَئِک الَّذِينَ هَدَاهُمُ اللَّهُ وَأُولَئِک هُمْ أُولُو الْأَلْبَابِ&lt;/SPAN&gt;) &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 9pt&quot; lang=AR-SA&gt;الزمر:&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;17/18&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;«&lt;SPAN style=&quot;COLOR: #006600&quot;&gt;پس بشارت بده بندگان را کسانى که سخن [ها] را مى‏شنوند، آن گاه از بهترينش پيروى مى‏کنند. اينان کسانى اند که الله هدايتشان کرده و ايشانند خردمندان&lt;/SPAN&gt;»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;کتابی که اینک می خواهیم خدمت شما عزیزان معرفی کنیم گفتگویی فکری و مناظره‏ای عقلی و منطقی است که به صورت سؤالهای عقلی و استدلال منطقی؛ طرح شده و&amp;nbsp; نویسند آنرا به منظور رضای پروردگار، سپس بهره‏وری و استفاده برادران مسلمان، تدوین و تألیف کرده‏است که بر اساس گفتگو و مناظرۀ نویسنده با دوست شیعه مذهبش در عربستان سعودی نگاشته شده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;نویسندۀ محترم درباره کتابش می فرماید: «&lt;SPAN style=&quot;COLOR: blue&quot;&gt;این گفتگو و دعوت صادقانه‌ای است برای هر خواهر و برادر شیعه مذهبی دور از گفتار و کردار علمای شیعه امامیه، و نیز بدون در نظر گرفتن حوادث تلخ و فجایع تاریخ گذشته ی اسلام؛ برای هر خواهر و برادر شیعه مذهبی&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;که در جستجوی حق و حقیقت است و تابع هدایت و راه صحیح است و از آن پیروی می‏نماید&lt;/SPAN&gt;».&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;از الله متعال مسألت داريم که این کتاب را چراغ فروزاني بر فرار راه هر خواهر و برادر شیعی حق‏طلب قرار دهد که به دور از تأثیر عوامل تعصب‏آفرین موروثی و قدیم و بدون تأثر از سخنان علمای گمراه شیعه، در جستجوی حقیقت هستند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;برادران و خواهران گرامی می توانند &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=774&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;&lt;STRONG&gt;کتابِ گفتگویی آرام با دوست شيعه ام&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt; را از بخش های &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=27&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;مناظرات حق و باطل&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/A&gt;و&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=20&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;رد شبهات&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;در کتابخانه عقيده داونلود نمايند.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتابِ اخبار و راویان شیعه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/188</link>
<description>&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: center; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal align=center&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=801&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;معرفی کتابِ &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=AR-SA&gt;اخبار و راویان شیعه&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; dir=ltr&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;یکی از مذاهب گمراهی که دارای افکار&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;و روایات عجیب و غریب می باشد مذهب رافضه است که دارای شاخه های فراوان از جمله اثنا عشری می باشد، پس از اعلام رسمی غیبت امام مهدی (کشف الله سره) در سال 329 هجری، امور غریبی در طرز فكر شیعه پدیدار گشت كه در نتیجه، آن عهد را میتوان عهد جدال بین شیعه و تشیع و یا عهد انحراف نام نهاد و اولین انحرافی كه در این عصر بوجود آمد، ظهور آرائی بود كه عنوان میكرد : خلافت بعد از رسول خداصلی الله علیه وسلم&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;بنص الهی، مخصوص علی رضی الله عنه بوده است. و همه صحابه بجز چند نفری از آنان، با انتخاب ابابكر رضی الله عنه این نص را زیر پا گذاشته اند. و همزمان با عنوان شدن این نظریات نظریه دیگری نیز مطرح شد، كه این مسئله را اعلام میكرد : &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;ایمان به امامت، مكمل اسلام است&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;. و حتی برخی از علماء شیعه مسئله (امامت) و (عدل) را به اصول سه گانه دین، یعنی ( توحید ) ( نبوت ) و ( معاد ) اضافه نمودند. و برخی علماء نیز اینطور مسئله را توجیه كردند كه این دو اصل، جزو اصول دین نبوده، بلكه از اصول مذهب میباشند. و در همین زمان نیز روایاتی از ائمه شیعه نقل شد كه محتوای این روایات، ناسزاگوئی به خلفای راشدین و بعضی از زنان حضرت رسول اکرم صلی الله علیه وآله وسلم&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;بود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;در زمان امویان و اوایل خلافت عباسیان هیچ اثری از این آراء عجیب و غریب كه به یكباره پس از غیبت كبری در مجتمع اسلامی بروز نمود، دیده نمیشود همان آرائی كه بعضی از راویان شیعه و علمای مذهب، در نشر، كاشت و داشت آن در عقول ساده اندیشان شیعه با یكدیگر مشاركت نمودند. و هم در آن زمان بود كه نظریه (تقیه) در مذهب شیعه بروز نمود. وچون راویان شیعه میخواستند به آن روایات غریب پشتوانه دینی بدهند ، تا در صحت آن هیچ شكی بوجود نیاید در نتیجه آنان را به ائمه شیعه و بخصوص (امام باقر) و (امام صادق) منتسب نمودند. صحت این روایات احتیاج به تثبیت داشت تا مردم آنان را همانگونه كه هست قبول نموده و از تعمق و ژرف اندیشی در مضامین آن خود داری كنند. نتیجتا در اینجا بود كه نظریه ( عصمت ) ائمه شیعه پا به عرصه وجود گذاشت تا بتواند پشتوانه مذهبی دیگری برای اینگونه احادیث بوده، و از آنان روایات مقدسی بسازد كه هیچ جای جدل ، نقاش ، بحث ، و نقضی در آن نباشد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;نویسنده &lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=801&quot;&gt;کتاب اخبار و راویان شیعه&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt; در مورد هر كدام از این آراء غریب &lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;و وارداتی كه با تكوین مذهب شیعه ارتباطی مستقیم دارد، در فصل خاص مربوط به خودش به گفتگو پرداخته. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;اگر روایاتی را كه در فاصله بین قرن چهارم و پنجم هجری راویان شیعه در كتب خود نوشته اند، منصفانه مورد بررسی قرار دهیم، به این نتیجه اسف بار خواهیم رسید كه، كوششی را كه بعضی از راویان شیعه جهت اسانه به اسلام نموده اند، همانا در سنگینی از وزن آسمانها و زمینها برتری میگیرد، و اینطور بنظر میاید كه هدف آنان از نقل اینگونه روایات، جای دادن عقیده شیعه در قلبها نبوده است، بلكه آنان اسانه به اسلام و همه وابستگیهایش را هدف قرار داده بوده اند. و هنگامیكه به روایات نقل شده از ائمه شیعه و همچنین ابحاث منتشر شده آنان در رابطه با خلافت مینگریم، و میبینیم كه چگونه همه صحابه حضرت رسول ( صلی الله علیه و سلم ) عصر رسالت، و مجتمع اسلامی در رابطه با آن را زیر رگبار شتم و ناسزا میگیرند. تا حقانیت علی و اهل بیتش، و علوشان آنان را اثبات كنند، خواهیم دانست كه این راویان، &lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;به علی و اهل بیتش بیشتر از خلفاء و صحابه اسانت ورزیده، و همچنین تصویر عهد رسول بزرگوارمان ، و هر آنچیزی كه با ایشان در ارتباط بود ، از اهل بیتش گرفته ، تا اصحابش را به زشتی تمام مشوّه نموده اند . &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;و اینجاست كه لرزه بر اندام میافتد ، و حیرت تمام وجودم را فرا میگیرد و میپرسم:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;آیا درست نیست اگر بگوئیم كه این راویان و محدّثین در زیر پوشش عشقشان به اهل بیت، در حقیقت مسئولیت انهدام اسلام را بر دوش گرفته بودند ؟ &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;مقصود از نسبت دادن این روایات كه با سیرت امام علی و فرزندانش و حتی عقل و فطرت سالم انسانی تناقض دارد، به ائمه شیعه چه بوده است ؟ &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;کسی که به مطالعه و بررسی کتابهای اهل تشیع بپردازد در می‌یابد که تقسیم‌بندی احادیث نزد آنان، به صحیح و غیره ... علاوه بر کوشش آنان برای بازگرداندن اعتبار به برخی احادیثشان، از ارتباط و نزدیکی آنها با اهل سنت نشأت می‌گیرد. اگرچه در این حوزه‌ای که منتقدان و دانشمندان توانای اهل سنت پایه‌های آن را استوار ساختند، شیعیان راه خیانت، فریب و سردرگمی را پیمودند، به رغم اینکه تفکر شیعه‌گرایی به پرهیز از اهل سنت و عمل نمودن به هر آنچه مخالف ایشان است، دستور می‌دهد چنانچه به تفصیل آن می‌پردازیم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;«حر عاملی» در کتاب (وسائل الشیعة – ج 20، ص 100) می‌گوید:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;«&lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;اصلاح کنونی (تقسیم‌بندی احادیث) با اعتقاد و اصطلاحات عامه (اهل سنت) سازگار است، بلکه چنانکه از تحقیق و بررسی در این زمینه و از سخنان شیخ حسن و دیگران بدست می‌آید، از کتابهای آنان برگرفته شده است و ائمه ما را به پرهیز از راه و روش اهل سنت فرمان داده‌اند که در بحث ترجیح دو حدیث متضاد بدان اشاره نمودیم&lt;/SPAN&gt;.»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;نامبرده معتقد است این تقسیم‌بندی که از پیروی شیعه از اهل سنت سرچشمه می‌گیرد، اگر بر روایتها و راویانشان تطبیق گردد، آثار و عواقب زیانباری به بار خواهد آورد، چرا که – به گمان او – مستلزم بی‌اعتبار ساختن تمام اصول اهل تشیع از زمان امامان تا دوران غایب شدن امام دوازدهم می‌گردد و به صورت کویری در می‌آید، علاوه بر این ارزیابی راویان شیعه از طریق اصل «جرح و تعدیل» به مردود ساختن تعدیل و تأیید برخی از آنان از جانب امامان معصوم که شهادت اعتماد را بر ایشان داده‌اند، منجر می‌گردد. (وسائل الشیعه، ج 20- 101)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;سخنان فوق این را می‌رساند که شیعیان در اهتمام به این موضوع پس افتاده‌اند و انگیزه‌ی آن دست‌یابی به صحت حدیث نبوده بلکه هدف از آن حمایت مذهب از انتقادات مخالفان بوده است، لذا علم «&lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;جرح و تعدیل&lt;/SPAN&gt;» نزد آنان مالامال از تناقضات و اختلافات می‌باشد به گونه‌ای که «فیض کاشانی» می‌گوید: «&lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;در جرح و تعدیل و شرایط آنها ضد و نقیضها و اشتباهاتی وجود دارد که نمی‌شود آنها را به شیوه‌ی اطمینان بخش برداشت، چنانکه بر آگاهان پوشیده نیست&lt;/SPAN&gt;». (الوافی، ج 1/11-12)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;خود شیعیان اعتراف می‌کنند که هیچ گونه سهم و کوشش فکریی را در راستای پدید آوردن علم حدیث ندارند، بلکه آن را – چنانچه عادت دارند – از اهل سنت فرا گرفته‌اند و اینکه نخستین فرد شیعه مذهبی که به تقلید از اهل سنت در فن «درایت حدیث» به تألیف پرداخت، «زین الدین عاملی» مشهور به شهید دوم متوفای سال 965هـ‍ می‌باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;حائری در کتاب: «مقتبس الاثر – 3/73» در آن باره می‌گوید: «&lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;از جمله معلوماتی که هیچ کس در آن تردید ندارد اینکه پیش از شهید دوم هیچ کدام از دانشمندان ما به امر تألیف در دانش «درایت حدیث» نپرداخت و بلکه تنها در علوم عمومی می‌نگاشتند&lt;/SPAN&gt;».&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;یکی از علمای اهل سنت می فرماید:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-INDENT: 0cm; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharCharCharCharCharCharCharCharCharChar&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: blue; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&quot;به رغم تحقیق و کاوشی که در میان کتب اهل تشیع انجام دادم متأسفانه یک کتاب و یا حتی یک رساله‌ی کوچکی را هم در زمینه‌ی احادیث ضعیف و موضوع (جعلی) نیافتم، ولی اگر سری به نوشته‌های اهل سنت بزنیم می‌بینیم که کتابخانه‌ی عظیم اسلامی سرشار از کتابهای قدیم و جدید امثال این گونه تألیفات می‌باشد، البته چون مذهب اهل تشیع بر پایه‌ی دروغها و گمانه‌زنیها استوار گشته جای شگفت نیست که دارای هیچ تألیفی در این زمینه نمی‌باشند، زیرا اگر به تألیف کتابی در برگیرنده‌ی احادیث ضعیف و موضوع دست می‌زدند اساس دینشان فرو می‌ریخت. اقدامی که «مجلسی» در کتاب «مرآة العقول» در بارة کتاب «الکافی» نمود و به تضعیف صدها حدیث و روایت موجود در آن پرداخت، بدون برنامه و رعایت اصول و میزان دقیقی بود، چرا که او آن روایتها را ضعیف پنداشت ولی همانها را بدون اشاره به ضعیف بودنشان در نوشته‌های خود آورد لذا انسان مسلمان در شناخت روش اهل تشیع در راستای صحیح یا ضعیف قلمداد نمودن احادیث دچار حیرت و سردرگمی خواهد گشت و شگفت اینکه ایشان حتی روایات کسانی که به عقیده آنها کافرند می‌پذیرند اگر تأییدی برای عقایدشان باشند. بنابراین، دانش حدیث از لحاظ «درایت و روایت» نزد شیعیان از هیچ ضابطه و قاعده‌ای برخوردار نمی‌باشد، البته معذور هم می‌باشند چون بخش عمده‌ی احادیثشان زیر ذره‌بین «علم الحدیث» تاب مقاومت را از دست داده و فرو می‌ریزند&quot;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;برادر و خواهر گرامی! کتابی که می خواهیم برایتان معرفی کنیم: (&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; COLOR: red; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=AR-SA&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=801&quot;&gt;اخبار و راویان شیعه&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;) کتاب جالبی است که شما عزیزان را با مذهب باطل شیعیان رافضی بیشتر آشنا می کند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;این کتاب را می توانید از اینجا با فشار دادن بر روی اسم کتاب داونلود نمایید:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot; lang=AR-SA&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=801&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;اخبار و راویان شیعه&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;این کتاب در بخش &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt&quot; lang=AR-SA&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=19&quot;&gt;ادیان و مذاهب&lt;/A&gt; کتابخانه عقیده نشر شده است.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;TEXT-ALIGN: justify; LINE-HEIGHT: 200%; MARGIN: 0cm 0cm 10pt&quot; dir=rtl class=MsoNormal&gt;&lt;SPAN style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; FONT-SIZE: 12pt; mso-bidi-language: FA&quot; dir=ltr&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی کتابِ تاریخ شاه اسماعیل صفوی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/187</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;معرفی&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt; کتابِ &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span dir=&quot;rtl&quot;&gt;تاریخ شاه اسماعیل صفوی&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سرزمین ایران با توجه به قدمت تاریخی و باستانی که دارد، دارای تاریخی کهن و متنوع می&amp;zwnj;باشد که مهد انواع احزاب و گروهها و تمدن&amp;zwnj;ها بوده است که در این موضوع نویسندگان شرق و غرب کتابهای قطور و زیادی نوشته&amp;zwnj;اند. اما آنچه بیش از همه بررسی آن مورد نیاز است، تحقیق و تفحص تاریخ ایران بعد از اسلام می&amp;zwnj;باشد، زیرا ظهور اسلام در دنیا، به عنوان میزان سنجش احزاب، گروهها و تفکرها در هر جامعه&amp;zwnj;ای قرار گرفت.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ایران نیز بعد از ظهور اسلام و برافراشته شدن پرچم اسلام در آن، شاهد فراز و نشیب&amp;zwnj;هایی بوده است، انواع خوبی&amp;zwnj;ها را دیده و با انواع مشکلات دست و پنجه نرم کرده است. یکی از موارد و ادواری که ایران و ایرانیان بعد از اسلام، آن را تجربه کرده و با آن مواجه بوده&amp;zwnj;اند، دوران حکومت صفویه می&amp;zwnj;باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;درباره پیدایش صفویه و تأثیری که این سلسله بر مذهب و ملیت ایرانیان برجای گذاشت تحقیقات فراوانی صورت گرفته و قضاوتهای متفاوتی شده است. دکتر شریعتی نیز در رد صفویه سخنان تندی داشته و ظهورآنها را بر فرهنگ و تمدن ایران فاجعه&amp;zwnj;ای بزرگ عنوان می&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به طور کلی&amp;nbsp; آنچه از مطالب و کتب نوشته شده در این موضوع برداشت می&amp;zwnj;شود این است که صفویه به محض به قدرت رسیدن عمداً به محو شواهدی در مورد منشأ خود پرداختند تا مبادا دسترسی به حقیقت و اصل و ریشه آنها باعث ضعف&amp;nbsp; حکومت و ایدئولوژی آنها شده و مبنای آن را زیر سؤال ببرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما باز هم مطالبی به طور جسته و گریخته در بعضی کتاب&amp;zwnj;ها در مورد اصل سلسله صفوی و تغییر و تحولاتی که در این سلسله به وجود آمده،&amp;nbsp; به رشته تحریر درآمده است . یکی دیگر از مکرها و حیله&amp;zwnj;های صفویه، اثبات سیادت دروغین در حق خودشان بود، آنها برای اینکه بتوانند در ایران حکومت کرده و خود را مسلمانان راستین معرفی نمایند، شیخ صفی الدین را از نسل امام علی و از نوادگان امام موسی کاظم قلمداد کردند و بعد از این نسب دروغین و تحریف تاریخی، همواره با همین حربه در بین مردم حکومت می&amp;zwnj;کردند و به نام محبت با اهل بیت انواع ظلم و تجاوز را در حق انسانیت، روا می&amp;zwnj;داشتند. خلاصه اینکه در نتیجه همه این تغییر و تحولات، سلسله صفوی، به عنوان یک حکومت و سلطنت درآمد که پادشاهان در آن به طور موروثی یکی بعد از دیگری بر کرسی قدرت می&amp;zwnj;نشستند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;زمانی که صفویه ایران را اشغال کردند به جز فرقه&amp;zwnj;های معدودی، بقیه جمعیت ایران که آن را تا چهل میلیون نوشته&amp;zwnj;اند، اهل&amp;zwnj;سنت بودند.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;شاه اسماعیل به عنوان پایه گذار حکومت صفوی به عنوان یک حرکت سیاسی شناخته می&amp;zwnj;شود که صفویان و طرفداران صفویه، تمام قدرت و شوکت و گسترش حکومت صفوی را مدیون او بوده از او به عنوان یک شخصیت مبارز و حتی مقدس یاد می&amp;zwnj;کنند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آنچه صفحات دیگر تاریخ بیانگر آن است این است که شاه اسماعیل انسانی سفاک و خون&amp;zwnj;ریز و به شدت متعصب بوده است. او از همان ابتدا بنیاد سلطنت صفویه را بر خون ریزی بنا کرد و این خوی خون آشامی چهره کریه خود را به گونه&amp;zwnj;های متفاوت ظاهر کرده است. گاه در پوشش دین و منتشر کردن مذهب، گاه در جامه سیاست و اداره مملکت و گاهی هم برای تفریح و خوشگذرانی .او جنایاتی مانند: سر بریدن، دست و پا قطع کردن، مثله کردن، پوست کندن، کور کردن و در آتش انداختن و انواع شکنجه&amp;zwnj;ها را برای ارضای فطرت پست و ددمنشانه خود مرتکب می&amp;zwnj;شد.&amp;nbsp; هنگامی که به تبریز وارد شد با وجود اینکه با هیچ گونه مقاومتی مواجه نشد اما بسیاری از مردم شهر را قتل عام کرده مأمورانش زنان باردار را با جنین&amp;zwnj;هایی که در شکم داشتند به قتل رساندند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاه اسماعیل بعد از اینکه تبریز را تصرف کرد، مذهب شیعه اثنی عشری (دوازده امامی) را به عنوان مذهب رسمی اعلام کرد. این اعلام هنگامی صورت گرفت که بیش از 3/2جمعیت تبریز، اهل&amp;zwnj;سنت بودند. در همین دوران بود که شاه اسماعیل در خلال چند هفته، بیش از شش هزار نفر از مردم تبریز را به جرم سُنی بودن قتل عام کرد و مساجد تبریز را تبدیل به طویله نمود. در اردبیل نیز که همه مردم آن اهل&amp;zwnj;سنت بودند، هرکس نمی&amp;zwnj;خواست شیعه بشود، خانه&amp;zwnj;اش را برروی زن و فرزندش به آتش می&amp;zwnj;کشید. در مورد کشتار دسته جمعی شهر طبس توسط شاه اسماعیل چنین آمده است که سواران و نظامیان صفوی به محض ورود به شهر طبس، همه را از دم تیغ گذراندند. و بعد از آنکه هفت تا هشت هزار نفر را کشتند تا حدودی آتش حقد و کینه شاه اسماعیل فرو نشست.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاه اسماعیل هنگام تصرف بغداد نیز دستور&amp;nbsp; تخریب مقبره امام ابوحنیفه&amp;nbsp; و شیخ عبدالقادر گیلانی که هر دو از بزرگان و ائمه اهل&amp;zwnj;سنت هستند را صادر کرد. وی در کازرون و فیروزآباد نیز عده زیادی را به جرم سنی بودن قتل عام کرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خلاصه اینکه این پادشاه جلاد، برای ترویج مذهب تشیع و براندازی اهل&amp;zwnj;سنت، چنان جنایاتی را مرتکب شد که در&amp;nbsp; تاریخ حکومتها و مذاهب در نوع خود، بی&amp;zwnj;نظیر است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در ایام اولیه دولت صفوی و حکومت شاه اسماعیل، لعنت کردن سه خلیفه (ابوبکر و عمر و عثمان رضی&amp;zwnj;الله&amp;zwnj;عنهم) جزء قوانین و اجرائات الزامی آن به شمار می&amp;zwnj;رفت. طرفداران صفویه که به نام تبرّائیان- کسانی که به بهانه محبت آل علی از بقیه صحابه اظهار بیزاری می&amp;zwnj;کنند - شناخته می&amp;zwnj;شدند در کوچه و بازار راه می&amp;zwnj;افتادند و نه تنها سه خلیفه راشده، بلکه به طور کلی اهل&amp;zwnj;سنت را لعن می&amp;zwnj;کردند و هر کس در جواب آنان نمی&amp;zwnj;گفت: &amp;quot;بیش باد و کم مباد&amp;quot; بلافاصله خونش را می&amp;zwnj;ریختند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در حکومت و دولت صفوی که بر مبنای ترویج تشیع آن هم از نوع افراط گونه&amp;zwnj;اش پایه گذاری شده بود، اکثرمذاهب و ادیان به طور آزادانه مشغول انجام اعمال مذهبی و حتی تبلیغ مذهب خود بودند به جز اهل&amp;zwnj;سنت که همواره به عنوان دشمن اصلی و خار چشمی از جانب صفویه به شمار می&amp;zwnj;رفت. به عنوان مثال وقتی اصفهان در تصرف صفویه درآمد عده زیادی از اروپائیان و کشیشان مسیحی و راهبان یهودی به این شهر آمدند، سفرایی از اسپانیا، پرتغال و انگلستان، نمایندگانی از فرقه&amp;zwnj;های رهبانی غیرمسلمان و .... همه آنها اجازه تبلیغ آئین خود و تأسیس صومعه در ایران را داشتند در حالی که اهل&amp;zwnj;سنت مسلمان، نه تنها اجازه احداث مراکز مذهبی و انجام اعمال دینی خود را نداشتند بلکه همواره توسط صفویان سرکوب می&amp;zwnj;شدند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاه اسماعیل صفوی بعد از اینکه بر ایران مسلط شد، مذهب تشیع را رسمیت داد. او به این مقدار اکتفاء نکرد بلکه مردم اهل&amp;zwnj;سنت سرزمینهای مختلف را مجبور به تغییر مذهب کرد و آنها را با انواع تهدیدها و شکنجه&amp;zwnj;ها در خفقان کامل قرار داد.&amp;nbsp; شاه اسماعیل صفوی درنظر داشت تا مذهب تشیع را به وسیله زور و قدرت، ترویج داده و اهل&amp;zwnj;سنت را از بین ببرد. اینجا بود که خلافت عثمانی احساس مسئولیت کرده و برای جلوگیری از این فتنه تفرقه&amp;zwnj;انگیز، اقدام نمود. جنگ چالدران هم در نتیجه همین اقدام خلافت عثمانی رخ داد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این بود وضعیت ایران در دوران حکومت صفوی که اگر در هر یک از ابعاد جامعه آن زمان نگریسته شود، غیر از ظلم و چپاول و فحشا و بی&amp;zwnj;حیایی و خیانت چیز دیگری به چشم نمی&amp;zwnj;خورد. آیا آنانی که دوران حکومت صفویه در ایران را به عنوان دوران اقتدار و استقلال ملی می&amp;zwnj;دانند و با کمال افتخار از آن یاد می&amp;zwnj;کنند، به کدام برنامه و سیاست حکومت صفوی، دل خوش کرده&amp;zwnj;اند؟!&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حقا که فقط کسانی می&amp;zwnj;توانند این حکومت را قبول کرده و از آن به عنوان یک حکومت نمونه یاد کرده و به آن افتخار کنند که خود شیفته سیاست ظلم، قتل و تعصب بوده و خواهان ترویج فساد و فحشا در جامعه آن هم برای راضی نگه داشتن مردم و حفظ مقام و کرسی خود باشند. که البته سرانجام چنین حکومت&amp;zwnj;هایی بر مبنای چنین افکاری، غیر از رسوایی و انحطاط جامعه بشری، چیز دیگری را در پی نخواهد داشت. &amp;laquo;الملک یبقی مع الکفر و لا یبقی مع الظلم&amp;raquo; حکومت کافر امکان دوام دارد اما حکومت ظالم هرگز!&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;حکومت صفوی اگر چه در سال 1148هـ.ق سقوط کرد اما بعد از هفتاد و پنج سال، دوباره توسط انگلیسی&amp;zwnj;ها ، بازسازی شده و با همان سیاست تعصب و ترور شخصیتها و سرکوب کردن اقشار بیدار جامعه روی کار آمد که اثرات آن تاکنون در ايران مشاهده می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دوستان&amp;nbsp;می توانند &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=825&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ &lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/825/&quot;&gt;&lt;strong&gt;تاریخ شاه اسماعیل صفوی&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; را با فشار دادن بر روی اسم کتاب در این جمله و یا از &lt;strong&gt;بخش تاریخ اسلام و جهان&lt;/strong&gt; در کتابخانه عقیده داونلود نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>معرفی كتابِ استدلال های باطل شیعه  از قرآن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/185</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتابِ &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=812&quot;&gt;&lt;strong&gt;استدلال های باطل شیعه&amp;nbsp; از قرآن و بیان بطلان آن&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قرآن کریم کلام معجز الله سبحانه وتعالی و وحی نازل شدۀ وی برای پیامبر محبوبمان حضرت محمدبن عبدلله صلی الله علیه وآله وصحبه وسلم است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دشمنان اسلام در طی قرون متمادی کوشیده اند که با تحقیر و تحریف قرآن به اسلام ضربه بزنند اما چون الله سبحانه و تعالی حفظ این کتاب بزرگ را به عهده گرفته است دشمنان اسلام در این کوشش خود ناکام بوده اند زیرا الله متعال می فرماید:-إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَ إِنَّا لَهُ لَحافِظُونَ&amp;rlm; (حجر/ 9)&amp;nbsp;ما قرآن را نازل كردیم و ما آن را نگهبان هستیم&amp;rlm;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما عدۀ دیگری از دشمنان قسم خورده اسلام خواستند که با روش دیگری ضربه به اسلام بزنند، آنها برای رسیدن به این هدف شوم خود قرآن کریم را وسیله قرار دادند و برای عقاید باطل خود به قرآن کریم استدلال نمودند و یا آنرا بر اساس هوی و هوس خود تفسیر و یا تأویل کردند. که ما می خواهیم با معرفی كتابِ (&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=812&quot;&gt;استدلال های باطل شیعه&amp;nbsp; از قرآن و بیان بطلان آن&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; )&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;این حقیقت را برای شما عزیزان آشکار نماییم. حقیقتی که هرگز قابل انکار نیست، شاید باور نکنید که تمام اصولی که خاص مذهب شیعه است، هیچ کدام، دلیل و سندی از آیات محکم یا صریح کتاب الله عزوجل ندارند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;و هر آیه&amp;zwnj;ای که به عنوان دلیلی بر هر یک از اصول خودشان، بدان استدلال و استناد نموده&amp;zwnj;اند، امکان ندارد که به تنهایی بر مطلوب و مقصودشان دلالت کند مادام که به وسیلۀ تفسیر علماء و روایات آن&amp;zwnj; را توجیه نکنند. و این، شأن محکماتی نیست که الله متعال آن&amp;zwnj;ها را به عنوان تنها اساسی که بدان رجوع می&amp;zwnj;شود و به چیز دیگری ارجاع داده نمی&amp;zwnj;شوند، توصیف نموده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تمامی آیاتی که شیعه جهت اثبات اصول خود بدان استدلال و استناد نموده&amp;zwnj;اند، از نوع متشابه می&amp;zwnj;باشند. این حقیقتی است که نویسنده این کتاب جناب دکتر &amp;quot;طه الدلیمی&amp;quot; بعد از تحقیقاتی کامل بدان دست یافته است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ایشان در این کتاب ثابت نموده که روافض بدون هیچ شک و تردیدی از اهل باطل و باطل&amp;zwnj;گرا اند و منحرف و گمراهند و برای فتنه&amp;zwnj;انگیزی و تأویل نادرست به دنبال متشابهات می&amp;zwnj;افتند و آن&amp;zwnj; را بر هواها و خواسته&amp;zwnj;های نفسانی&amp;zwnj;شان تفسیر و تأویل می&amp;zwnj;کنند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و این حقیقتی انکار ناپذیر است که شیعیان رافضی نتوانستند و هرگز نخواهند توانست یک آیه محکم از کل قرآن بیاورند که ادعایشان&amp;zwnj;را تأیید نماید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این کتاب در مناقشه و بررسی دلایلی که هر گروه جهت اثبات اصول خود آورده&amp;zwnj;اند، از منهج و شیوه&amp;zwnj;ای عظیم- یعنی منهج قرآن كریم - پیروی می&amp;zwnj;نماید. ویژگی این منهج عظیم آن است که صاحبش را قادر می&amp;zwnj;سازد تا به آسانیِ هر چه تمام&amp;zwnj;تر و با نزدیک&amp;zwnj;ترین شیوه، دلایل و حجت&amp;zwnj;های باطل را نقض نماید. حتی اگرچه گوینده&amp;zwnj; آن، دانشمند متخصصی باشد و یا حجت الاسلام و آیت الله و یا شخص عادی و عامی باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در این کتاب، روشی نظری ریشه&amp;zwnj;ای و تطبیقی به کار گرفته شده تا بدون هیچ گونه پیچیدگی و ابهام و جدل بی&amp;zwnj;فایده، روشن گردد که از میان گروه&amp;zwnj;های اهل قبله کدام یک بر حق واضح و آشکار قرار دارد و کدام یک بر باطل، تا بتوان از این راه به حقیقت رسید؛ حقیقتی که دیگر امکان ندارد دو نفر در آن اختلاف داشته باشند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امیدواریم که الله سبحانه و تعالی به همه مسلمانان پیروی از قرآن کریم این کتاب نور و هدایت را نصیب نماید و در سایه این کتاب عظیم و سنت رسول محبوبمان صلی الله علیه وآله وسلم مسلمانان به وحدت حقیقی و پایدار برسند که در آن جایی برای شرک و بدعت و بغض و عداوت نباشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران عزیز می توانند كتابِ &lt;strong&gt;&amp;quot;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/812/&quot;&gt;استدلال های باطل شیعه&amp;nbsp; از قرآن و بیان بطلان آن&lt;/a&gt;&amp;quot; &lt;/strong&gt;را از کتابخانه عقیده و یا با فشار بر روی اسم کتاب در این صفحه بطور مستقیم داونلود نمایند&lt;strong&gt; .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ نقد و  بررسى اصول و پايه‌هاى مذهب شيعه دوازده امامى</title>
<link>http://qalamlib.com/news/184</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ نقد و&amp;nbsp; بررسى اصول و پايه&amp;zwnj;هاى مذهب شيعه دوازده امامى&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دشمنان در كمين نشسته&amp;rlm;ی امت اسلامي فرقه&amp;rlm;ها گمراه و باطل را ابزاري براي اجراي فتنه&amp;zwnj;گري&amp;zwnj;هاي خود ميان مسلمانان قرار داده&amp;zwnj;اند،&amp;nbsp; و بعيد نيست كه امروز (و در این شرایط بحرانی مسلمین) دشمن چنين مسئله&amp;zwnj;اي را براي مواجهه و رويارویي با جماعت&amp;zwnj;هاي اسلامي در حال رشد در تمام نقاط جهان؛ و و متوقف کردن موج بيداري اسلامي كه به داخل منازلشان نیز نفوذ کرده از فرقه&amp;rlm;های بدعت&amp;rlm;گرا بهره&amp;rlm;&amp;zwnj;&amp;zwnj;برداري و سوء استفاده نماید. و نيز دشمن از گزارش مستشارهاي خود- كساني كه اهمیت فراوانی به تاريخ و عقايد اين فرقه&amp;rlm;ها مي&amp;zwnj;دهند&amp;ndash; در راوبط با مسلمانان و دولتهای اسلامی استفاده مي&amp;zwnj;كند.لذا ملاحظه مي&amp;zwnj;شود که دشمنان اسلام و مسلمین برخی از اين فرقه&amp;zwnj;ها را تقویت وتغذیه می&amp;rlm;نماید؛ تا با استفاده از آنها در این ممالک قدرت را به دست گیرند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بدون تردید روشنگری و بيان حقيقت عملكرد اين فرقه&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;ها،&amp;nbsp; فرصت را از دست دشمن گرفته و مانع گسترش دامنه&amp;rlm;ی اختلاف بین امّت اسلامی و استمرار آن است،&amp;nbsp; زيرا به تأكيد اگر سران ملحدين و بدعت&amp;zwnj;گذاران به حال خود رها شوند؛ و از فعالیّت آنان جلوگيري به عمل نيايد،&amp;nbsp; مردم را به گمراهي کشیده و در راه افزايش هواداران و فريب&amp;rlm;خوردگان خود تلاش كرده و از سیاهی لشکر&amp;nbsp; خود مغرور شده و ادعا مي&amp;zwnj;نمايند كه اسلام واقعي راه و روش و دین آنهاست. و در راه گرویدن مردم به راه خدا سد و موانع ایجاد میکنند و آنان را از دين و شريعت پاک و صحیح اسلام بازمی&amp;rlm;دارند،&amp;nbsp; و به تأكيد مي&amp;zwnj;توان گفت يكي از عوامل خارج شدن ملحدان اسلام&amp;rlm;ستیز از اسلام این است كه گمان مي&amp;rlm;برند اسلام همان است كه فرقه&amp;rlm;ی بدعت&amp;zwnj;گرا ادعا می&amp;rlm;کنند،&amp;nbsp; لذا به اعتقاد و باورشان&amp;nbsp; چنين ایده و اعتقاداتی (که به نام اسلام آن را می شناختند) عقل و خرد انسان را هم تباه و فاسد می کند (چه رسد به این&amp;rlm;که عامل خوشبختی و نجات باشد)،&amp;nbsp; لذا به دين كافر گشتند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بخش عمده&amp;rlm;ی فرقه&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;هایی كه از اسلام خارج شدند امروزه از لحاظ رشد و بالندگي ضعيف و جنب &amp;zwnj;و &amp;zwnj;جوشی که داشتند كم&amp;rlm; رنگ شده&amp;rlm;اند و پيروانشان رو به كاهش است و کمتر با اهل سنّت سر ستيز و درگیری دارند،&amp;nbsp; اما هجوم شيعه عليه اهل سنّت و تجريح و اهانت و طعن&amp;zwnj;گویی ايشان نسبت به بزرگان و مذهب اهل سنّت،&amp;nbsp; و نيز تلاش آنان جهت توسعه شیعه&amp;rlm;گری در ميان اهل سنّت هر روز بيشتر و بيشتر می شود. شايد بتوان گفت شيعه اثناعشريه در راستای فعالیّت گمراه&amp;zwnj;سازي مردم اگر تنها فرقه و ممتاز نباشد؛ مي&amp;zwnj;توان گفت پرتلاش&amp;zwnj;ترين فرقه است كه به صورت مداوم تجاوز و گستاخی خود را در برابر اهل سنّت&amp;nbsp; افزایش داده&amp;nbsp; و همواره از نيرنگها و ترفندهايي استفاده می&amp;rlm;کنند كه ديگران ندارند. در این کتاب جناب دکتر ناصر القفاری به نقد و&amp;nbsp; بررسى اصول و پايه&amp;zwnj;هاى مذهب شيعه دوازده امامى پرداخته اند که امیدواریم مورد استفاده دعوتگران و محققان مسلمان واقع گردد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند &lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/794/&quot;&gt;کتابِ نقد و&amp;nbsp; بررسى اصول و پايه&amp;zwnj;هاى مذهب شيعه دوازده امامى &lt;/a&gt;را کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ پیروزی حق و شکست باطل</title>
<link>http://qalamlib.com/news/183</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ پیروزی حق و شکست باطل&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;با توجه به اینكه هر مكتبی به منظور گسترش عقاید خود از روش مهمی به نام تبلیغ بسیار استفاده می نمایند لذا مناظره نیز به عنوان یكی از روشهای تبلیغی انبیا عظام و مصلحین و داعیان دارای شیوه های خاص خود می باشد، تاریخ شاهد است که یک مناظره علمی سبب هدایت هزاران انسان شده است و در عصر حاضر هم می توان از مناظرات شبکه المستقله بین علمای اهل سنت و شیعیان رافضی نام برد که به زبان عربی برگزار گردید و همین مناظره سبب هدایت صدها هزار شیعه در خوزستان ایران و منطقه شرقیه عربستان و لبنان و عراق و دیگر کشورها گردید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این کتاب مناظره&amp;zwnj;ای علمی است با یکی از سران شیعه اثنا عشری در مورد اصول الهی هدایت بخش اهل سنت، و اصول شیطانی گمراه&amp;zwnj;کنندة شیعیان، و این مناظره الحمدلله با پیروزی حق و شکست باطل به پایان رسید، و اهل سنت همواره سربلند و پیروزند و شیعه امامیه سرشکسته، و خواری و ننگ از چهره&amp;zwnj;شان هویداست.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نگارنده مناظره درباره این کتاب می فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این کتاب مناظره&amp;zwnj;ای است که بین من و یکی از سادات شیعه دوازده امامی انجام گرفته است، تقدیر الهی چنین بود که من در این مناظره شرکت کنم. بدون آن که از پیش برای آن ترتیبی اتخاذ کرده باشم اما خواست الهی چنین بود که به بهانه این مناظره حق برای افرادی از اهل سنت که فریب دعوت پلید یکی از مؤسسات شیعه را خورده بودند واضح و روشن گردد، این مؤسسات به ظاهر دم از تقریب مذاهب و وحدت می&amp;zwnj;زنند اما در واقع برای گسترش مذهب شیعه در میان آن دسته از جوانان اهل سنت که اطلاعات کافی از عقاید خویش ندارند فعالیت می&amp;zwnj;کند. آنها می&amp;zwnj;خواهند با این فعالیت&amp;zwnj;ها جوانان را دربارة قرآن و سنت دچار شک و تردید نمایند و باور و اعتماد آنها را در مورد اصحاب پیامبر که مورد تأیید خدا هستند را به شک و تردید تبدیل کنند وجوانان را بر آن دارند تا درعدالت و مقام این الگوهای نیکو شک کنند و آنها را نفرین و ناسزا بگویند و تجاوز به جان و مال و ناموس هر مسلمانی را حلال بدانند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و خلاصه اینکه مؤسسه&amp;zwnj;های شیعی می&amp;zwnj;کوشند تا جوانان رااز حق به سوی باطل و از هدایت به سمت گمراهی بکشانند، و دراین راستا از هر مکر و فریبی استفاده می&amp;zwnj;کنند، اما هرگز حق نابودنخواهد شد و باطل پیروز نخواهد شد، زیرا خداوند متعال می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(وَقُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ إِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا)الإسراء: ٨١&amp;nbsp;&amp;laquo; و بگو حق آمد و باطل از میان رفت بی&amp;zwnj;گمان باطل نابودشدنی است.&amp;raquo;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این مناظره به دارازا کشید و همه جوانب اختلافی بین اهل حق (اهل سنت و الجماعت) و بین اهل باطل (شیعه) را در برگرفت، و حق روشن گردید، تا اینکه در پایان یکی از فریب&amp;zwnj;خوردگان فریاد کشید (ستایش خداوندی را سزاست که حق را آشکار گرداند، ستایش خداوندی را سزاست که حق را آشکار گرداند، اکنون تازه به دنیا آمدم و حق را شناختم، ستایش خداوندی را سزاست که حق را بر زبان تو آشکار گرداند)، و شیعه خوار و سرشکسته بودند، پس سپاس خداوندی را که حق را آشکار گرداند تا هر کس هلاک می&amp;zwnj;شود از روی دلیل هلاک بگردد و هر کس که زنده می&amp;zwnj;ماند از روی دلیل زنده بماند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتابخانه سایت عقیده با معرفی این کتاب آرزو می کند که الله سبحانه و تعالی این کتاب را سبب هدایت حقجویان شیعه قرار دهد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران عزیز می توانند &lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/734/&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ پیروزی حق و شکست باطل&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;راداونلود نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ نگرشي به احاديث حوض</title>
<link>http://qalamlib.com/news/182</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ نگرشي به احاديث حوض&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الله متعال پيامبر ما رسول الله صلی الله علیه و آله و سلم &amp;nbsp;را ويژگي&amp;zwnj;هاي بسيار و عطاياي گسترده&amp;zwnj;اي عنايت فرموده است؛ يكي از آنها كه با احاديث صحيح ثابت است، حوض كوثر، در صحراي قيامت، مي&amp;zwnj;باشد، كه آن تكريم و بزرگداشت الهي است به رسول الله صلی الله علیه و آله و سلم &amp;nbsp;و امت ايشان كه برگزيده امت&amp;zwnj;هاست.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه و آله و سلم &amp;nbsp;در آن احاديث اعلام فرموده&amp;zwnj;اند كه تعدادي از امت ايشان از حوض مباركش، رانده و دور كرده مي&amp;zwnj;شوند؛ زيرا پس از ايشان تغيير ايجاد كرده و مرتد شده&amp;zwnj;اند، و از آن دسته با الفاظي مانند: &amp;laquo;أصحابي&amp;raquo;، &amp;laquo;أعرفهم&amp;raquo;، &amp;laquo;منكم&amp;raquo;، و عباراتي ديگر تعبير فرموده&amp;zwnj;اند كه گوياي شناخت ايشان، از آن دسته مي&amp;zwnj;باشد، آنهايي كه هدفي جز طعن اصحاب محمد صلی الله علیه و آله و سلم &amp;nbsp;ندارند و هميشه در پي خورده گرفتن از آنان هستند، اين گونه احاديث را دستاويز خود قرار داده&amp;zwnj;اند و آن را ناظر بر (صحابه) بهترين نسل بشريت مي&amp;zwnj;دانند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تا سخني با آنان در ميان گذاشته شود، پيش از هر چيز، اين گونه احاديث را به عنوان دليل، عنوان مي&amp;zwnj;كنند و از طرفي ديگر، بسياري از دانشجويان و عامه&amp;zwnj;ي مردم نيز از آن پرس و جو مي&amp;zwnj;كنند، اهل علم، مفاهيم آن احاديث را تبيين كرده&amp;zwnj;اند و به هيچ گونه برخواسته&amp;zwnj;هاي شيطاني و برداشت نادرست آنان، دلالت نمي&amp;zwnj;كند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اگر اين نص نبوي نبود، به نوشتن پيرامون موضوع ارتداد صحابه نيازي نبود، اين يك ادعاي بي&amp;zwnj;جاني است كه مرده به دنيا آمده است و مرده نمي&amp;zwnj;تواند در ميان زندگان، زندگي كند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در اين دوران، افرادي كه شيفته&amp;zwnj;ي شكار لغزش&amp;zwnj;ها و تخريب شخصيت&amp;zwnj;ها هستند با ادعاي (بحث علمي آزاد و بي&amp;zwnj;طرفانه)! در آن روحي تازه دميده&amp;zwnj;اند، آغاز اين ادعا سفسطه و نهايتش زندقه و بي&amp;zwnj;ديني است! خداوند امام سيوطي را رحمت كند كه در موردي شبيه اين ادعا، فرمود: &amp;laquo;الله شما را رحمت كند، بدانيد كه برخي دانش&amp;zwnj;ها مانند دواء و برخي انديشه&amp;zwnj;ها، مانند اجابت مزاج هستند كه بايد فقط، هنگام نياز از آن ياد شود&amp;raquo;. مفتاح الجنة في الاحتجاج بالسنة ص: 5.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اگر از اينان خواسته شود كه درباره&amp;zwnj;ي نظريات آخوندها و يا باورهاي ديني&amp;zwnj;شان، بحث و گفتگو بشود، انگشت در گوش فرو مي&amp;zwnj;كنند و از آن طفره مي&amp;zwnj;روند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;طعن در صحابه رضی الله عنهم طعن در رسول الله صلی الله علیه و آله و سلم &amp;nbsp;است، كه آنان را پرورش داده و ستوده&amp;zwnj;اند، بلكه طعن در خداوند متعال است كه در قرآن آنان را بسيار ستوده و در تورات و انجيل برايشان مثال زده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شواهد و حقايق تاريخي، بر اين نظريه مهر بطلان مي&amp;zwnj;زند و بر بي&amp;zwnj;بنيادي و سستي آن شهادت مي&amp;zwnj;دهد، چه رسد به نصوص قرآن و سنت، اين نظريه نشان بي&amp;zwnj;اهميتي دين در دل هواداران آن و انحراف از راه مؤمنان و هم چنين راه پيروان كتاب&amp;zwnj;هاي آسماني پيشين است، زيرا آنان نيز به خود جرأت چنين كار زشتي را نداده&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آنان (اصحاب) پيروان و گروه&amp;zwnj; پيامبرند، اگر آنان نبودند، اكنون در زمين مسلماني وجود نداشت.اگر آنان نبودند، دنيا يكدست، تاريكي و ظلمت بود، اما آنان ماه و ستارگان دنيا هستند.اگر آنان نبودند، زمين آرام نمي&amp;zwnj;گرفت؛ آنان كوه&amp;zwnj;هاي استوار و ميخ&amp;zwnj;هاي (ثابت نگه دارنده&amp;zwnj;ي) زمين هستند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ما &amp;nbsp;كتابي مستقل كه به اين موضوع بپردازد، سراغ نداشتیم، مگر بسيار نادر و ناياب، همچنین کمتر کسی را سراغ دارم كه از احاديثي كه نویسنده این کتاب، بر بطلان اين نظريه استدلال كرده&amp;zwnj;، استدلال كرده باشد، امیدواریم که این کتاب چراغ هدایتی گردد برای کسانی که از اصحاب گرامی رسول الله صلی الله علیه وآله وصحبه اجمعین کینه ای به دل دارند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=729&quot;&gt;کتابِ نگرشي به احاديث حوض&lt;/a&gt; را می توانید در بخش &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=20&quot;&gt;رد شبهات &lt;/a&gt;کتابخانه عقیده مطالعه نمایید.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>سُرخاب و سفيد آب - شیعه پاسخ نمی دهد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/178</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;سُرخاب و سفيد آب&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;(&lt;strong&gt;شیعه پاسخ نمی دهد&lt;/strong&gt;)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;معمولاً علما و مراجع شیعه به شبهات و سوالاتی که مخالفین ایشان طرح می کنند به نحوی پاسخ می دهند، البته در برابر سوالات صحیح و بجا پاسخهای درستی ارائه نمی دهند و معمولاً با سفسطه و بازی با کلمات یا رجوع به احادیث و روایات باب میل خود به پاسخگویی می پردازند، یا با رجوع به عقاید خود مثلاً با استفاده از حربه تقیه یا علم غیب یا مصلحتها و غیره... به تمامی سوالات پاسخ می دهند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ولی یک سری از سوالات هستند که هیچگونه پاسخی ندارند و علمای شیعه در برابر این سوالات تنها می توانند سکوت کنند و نمی توانند آنها را توجیه و تفسیر کنند.در این كتاب به شرح و بیان یک سری از سوالات می پردازد تا خواننده گرامی متوجه شود مکتبی که آخوندهای شیعه به عنوان مکتب اهل بیت معرفی می کنند بی پایه و اساس است و دارای دروغها و خرافات فراوانی می باشد و در واقع با مکتب اهل بیت در تضاد کامل است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران گرامی می توانند کتاب ارزنده &lt;strong&gt;سُرخاب و سفيد آب&lt;/strong&gt; را&amp;nbsp; از بخش &lt;strong&gt;فکر و اندیشه&lt;/strong&gt; کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نشر دهها كتاب در مورد زندگانی خلفای راشدین رضی الله عنهم اجمعین</title>
<link>http://qalamlib.com/news/177</link>
<description>&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;عصر خلفای راشدین بهترین مقطع از تاریخ اسلام به شمار می&amp;zwnj;آید. و زمان حکومت ایشان مبارک&amp;zwnj;ترین زمان و نسل آنان نسلی بوده که برای مسلمانان پس از خود الگو به شمار می&amp;zwnj;آیند. حق هم این است، زیرا که آنان اصحاب و یاران رسول&amp;nbsp;الله بوده و قرآن در تعریف و تمجیدشان می&amp;zwnj;فرماید&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;وَالسَّابِقُونَ الْأَوَّلُونَ مِنَ الْمُهَاجِرِینَ وَالْأَنْصَارِ وَالَّذِینَ اتَّبَعُوهُمْ بِإِحْسَانٍ رَضِی اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(التوبة: 100)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;span style=&quot;COLOR: green&quot;&gt;پیشگامان نخستین مهاجرین و انصار و کسانی که به نیکی روش آنان را در پیش گرفتند و راه ایشان را به خوبی پیمودند، الله از ایشان خشنود است&lt;/span&gt;&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;خداوند متعال ما مسلمانان را به محبت و تمجید و دعای خیر و پاک گردانیدن قلب از حقد و کینه آنها دستور فرموده است: &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;وَالَّذِینَ&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;جَاءُوا مِنْ بَعْدِهِمْ یقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِینَ سَبَقُونَا بِالْأِیمَانِ&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(الحشر: 10).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;laquo;کسانی که پس از مهاجرین و انصار به دنیا می&amp;zwnj;آیند، می&amp;zwnj;گویند: پروردگارا ما و برادران ما را که در ایمان آوردن بر ما پیشی گرفته&amp;zwnj;اند، مورد مغفرت خویش قرار بده.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;همچنین رسول الله -صلى الله علیه وآله وسلم- در توصیف ایشان فرموده&amp;zwnj;اند: &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;خیر القرون قرنی، ثمّ الّذین یلونهم، ثمّ الذین یلونهم&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;raquo;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;laquo;&lt;span style=&quot;COLOR: green&quot;&gt;بهترین زمان، زمانی است که من در آن زندگی می&amp;zwnj;کنم، و سپس بعد از آن قرن بعدی و بعد از آن قرن بعدی&lt;/span&gt;&amp;raquo;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;برادران و خواهران عزیز در این کتابها صحنه&amp;zwnj;های موجود از ولادت تا جهاد و خلافت تا مرگ و شهادت&amp;nbsp; هر یک از خلفای راشدین رضی الله عنهم اجمعین را برای خوانندگان گرامی ارایه می&amp;zwnj;کنیم. این که مسلمانان رهبر خویش را چگونه برمی&amp;zwnj;گزیدند؟ و چگونه جانیان جان خویش را می&amp;zwnj;گرفتند. و شهیدشان می&amp;zwnj;کردند و به خداوند خویش می&amp;zwnj;پیوستند!؟ و همچنین به شبهاتی که دشمنان اسلام و برخی منافقین شایع نموده اند پاسخ داده شده است. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: large; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Times New Roman&quot;&gt;خاصتا &lt;i&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?wriID=279&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;کتاب های &lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;i&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?wriID=279&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: large; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Times New Roman&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;دکتر علی &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: large; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Times New Roman&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot;&gt;محمد صلابی&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;u&gt; &lt;/u&gt;&lt;/i&gt;که همه جوانب &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;زندگی تک تک خلفای راشدین را بررسی نموده و به تمامی شبهات وارده از طرف دشمنان اسلام پاسخ داده است.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;اداره سایت عقیده با معرفی این کتابها خدمت شما عزیزان از بارگاه الله متعال استدعا می کند که ما و شما را از جمله آن بندگانی بگرداند که الله متعال دربارۀ آنها فرموده است:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;)&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;وَالَّذِینَ&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;جَاءُوا مِنْ بَعْدِهِمْ یقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِینَ سَبَقُونَا بِالْأِیمَانِ&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 9pt; COLOR: navy; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(الحشر: 10).&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;laquo;کسانی که پس از مهاجرین و انصار به دنیا می&amp;zwnj;آیند، می&amp;zwnj;گویند: پروردگارا ما و برادران ما را که در ایمان آوردن بر ما پیشی گرفته&amp;zwnj;اند، مورد مغفرت خویش قرار بده.&amp;raquo;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;
&lt;p class=&quot;stylecomplexblotus12ptjustifiedfirstline05cmcharcharcharcharcharcharcharcharchar&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 0cm; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#ff0000&quot; size=&quot;5&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: Times New Roman&quot;&gt;با فشار بر رو&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: Times New Roman&quot;&gt;ی اسم کتاب شما می توانید کتاب مورد نظر خود را دریافت نمایید.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;1&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=535&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ابوبکر صدیق (تحلیل زندگی خلیفه اول) رضی الله عنه&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; نوشته: &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;دکتر علی محمد صلابی&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;i&gt; &lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;2&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=370&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ابوبکر صدیق رضی الله عنه برترین صحابی و مستحق ترین فرد به خلافت&lt;/a&gt;&amp;nbsp; نوشته: محمد بن عبدالرحمن بن قاسم، این کتاب مثل کتاب دکتر صلابی یکی از کتاب ها درباره زندگی نامه خلیفه اول ابوبکر صدیق رضی الله عنه می باشد.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;3&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=339&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;شیخین (ابوبکر و عمر)&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;4 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=599&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ازالة الخفاء عن خلافة الخلفاء&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; نوشته: شاه ولی الله دهلوی&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; این کتاب به زبان فارسی قدیم نوشته شده است و از مهمترین کتاب ها در مورد رد شبهات چگونگی خلیفه شدن خلفای راشدین می باشد.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;5&lt;/span&gt; . &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=295&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;خلفاء راشدین از دیدگاه علی بن ابی طالب رضی الله عنه&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;6&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=239&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;خلفای راشدین از خلافت تا شهادت&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; نوشته: صلاح الخالدی&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; یکی از کتابهای بسیار مهم و مختصر در زندگی نامه همه خلفای راشدین می باشد.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;7&lt;/span&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=575&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;خلفای راشدین&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;8&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; . &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=421&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;زندگانی حضرت محمد صلی الله علیه و آله وسلم و خلفای راشدین&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;9&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=371&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;زندگانی خلفای راشدین&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;10&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=293&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;زندگانی شبانه روزی خلفاء&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;11&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=243&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;بین النهرین در روزگار خلفای راشدین&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;12&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=536&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;زندگانی عمر بن خطاب رضی الله عنه&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma,sans-serif&quot;&gt;نوشته: &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;دکتر علی محمد صلابی&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;i&gt; &lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;13&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=167&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;زندگی نامه فاروق اعظم رضی الله عنه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;14&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=372&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;سیرت عثمان ذی النورین&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;15&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=537&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;در شناخت سیره عثمان بن عفان رضی الله عنه&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma,sans-serif&quot;&gt;&amp;nbsp;نوشته: &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;دکتر علی محمد صلابی&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;i&gt; &lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;16&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=712&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;انطباق عقاید ابن تیمیه رحمه الله با عقاید علی علیه السلام&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;17&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=740&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_parent&quot;&gt;زندگی نامه علی بن ابی طالب رضی الله عنه&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma,sans-serif&quot;&gt;نوشته: &lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;دکتر علی محمد صلابی&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;i&gt; &lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;18&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=552&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;چرا نام حضرت علی رضی الله عنه در قرآن نیست؟&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; نوشته: مهتدی و استاد گرانقدر محمد باقر سجودی&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;19&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=245&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;محل شهادت علی بن ابی طالب رضی الله عنه&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;20&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=775&quot; style=&quot;TEXT-DECORATION: none&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ذو النورين عثمان بن عفان رضی الله عنه&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; نوشته: محب الدین خطیب&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;span style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma,sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;و به زودی زندگی نامه حسن بی علی رضی الله عنه که یکی از نور چشمان اهل سنت می باشند نشر خواهد شد.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;span style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma,sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;لازم به ذکر است که در این کتاب ها خصوصا کتابهایی که اسمهای نویسندگان ذکر شده است مهمترین کتاب ها در زمینه خلافت صدر اسلام و پاسخ به شبهات وارده به بهترین انسان ها بعد از پیامبران می باشد. &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب سیرت أمیرالمؤمنین علی بن أبی طالب رضی الله عنه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/176</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب سیرت أمیرالمؤمنین علی بن أبی طالب رضی الله عنه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در این کتاب زندگی علی رضی الله عنه از تولد تا شهادت، مورد بررسی قرار گرفته و با سخن از نام، نسب، لقب، محل تولد، خانواده و قبیله&amp;zwnj;ی او آغاز می&amp;zwnj;شود. سپس با مهمترین کارهای ایشان در مکّه و هجرت و زندگی همگام و همدم او با قرآن و نقش آن در زندگی او آشنا می&amp;zwnj;شنویم و می&amp;zwnj;فهمیم که عقیده و دیدگاه &amp;zwnj;او درباره&amp;zwnj;ی &amp;laquo;الله&amp;raquo; جل جلاله، نظام هستی، زندگی، بهشت، جهنّم، قضاء و قدر چگونه &amp;zwnj;است و قرآن كريم نزد او از چه&amp;zwnj; ارزش و مقامی&amp;zwnj; برخوردار بوده &amp;zwnj;است، چه&amp;zwnj; آیاتی از قرآن درباره&amp;zwnj;ی او نازل شده&amp;zwnj;است و نیز با اصول و مبانیّ که&amp;zwnj;ایشان برای استنباط احکام و فهم معانی قرآن به کار گرفته و نظر ایشان در تفسیر برخی از آیات آشنا می&amp;zwnj;شویم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علی از کودکی همراه و ملازم رسول&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;الله صلی الله علیه وآله وسلم بود، لذا نسبت به مقام نبوّت و روش لازم و شایسته در رفتار و تعامل با رسول&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;الله صلی الله علیه وآله وسلم شناخت عمیقی داشت و نشانه&amp;zwnj;های همکاری و تلاش خود را با گفتار و رفتارش نمایان می&amp;zwnj;کرد، مردم را به پیروی از رسول&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;الله صلی الله علیه وآله وسلم تشویق می&amp;zwnj;کرد و به وضوح شرح می&amp;zwnj;داد که&amp;zwnj;اطاعت از رسول خدا صلی الله علیه وآله وسلم و عمل به سنّت قولی و هم فعلی و هم تقریری ایشان واجب است. در ادامه در می&amp;zwnj;بابیم که علی به چه صورت دلایل نبوّت و حقوق پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم بر امّت را به مردم توضیح می&amp;zwnj;داد، همچنین به برخی نمونه&amp;zwnj;های پیروی امیر مؤمنان از سنّت اشاره شده و نام برخی از راویان صحابه، تابعین و اهل بیت از ایشان را نیز ذکر کرده&amp;zwnj;ایم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این کتاب خواننده را به زندگی علی &amp;nbsp;رضی الله عنه در مدینه در دوران زندگی رسول&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;الله صلی الله علیه وآله وسلم می&amp;zwnj;برد، در مورد ازدواج ایشان با فاطمه رضي الله عنها و درس و پندهایی که در این پیوند مبارک وجود دارد سخن می&amp;zwnj;گوید که با بحث مهریه و جهیزیه و زناشویی و زندگی مشترک آنها و نیز زُهد و پارسایی و صداقت در گفتار سیده فاطمه که در دنیا و آخرت سردار زنان مسلمانان است، شروع می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در ضمن این مباحث به گوشه&amp;zwnj;ای از زندگی حسن و حسین، دو فرزند علی و فاطمه و احادیثی که&amp;zwnj;از رسول&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;الله صلی الله علیه وآله وسلم در فضایل این دو بزرگوار روایت است، اشاره شده است. مفهوم &amp;laquo;اهل بیت&amp;raquo; را از دیدگاه&amp;zwnj;اهل سنت شرح داده&amp;zwnj; شده، همچنان که &amp;zwnj;احکام خاص آنها مانند حرام بودن زکات برای اهل بیت و عدم دریافت ارث رسول&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;الله صلی الله علیه وآله وسلم و دارا بودن سهم ایشان از یک پنجم خُمس اموال فئ و غنائم جنگی را توضیح و تفصیل داده&amp;zwnj;ایم، در مورد درود فرستادن به اهل بیت و محبّت و احترام به آنها که واجب است، اشاره شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;در ادامه&amp;zwnj;ی بحث با نقش امیرمؤمنان علی &amp;nbsp;رضی الله عنه در سریه&amp;zwnj;ها و غزوه&amp;zwnj;های رسول&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;&amp;lrm;&lt;/span&gt;الله صلی الله علیه وآله وسلم، مانند: جنگهای بدر، احد، خندق، بنی قریظه، حدیبیه، خیبر و حنین آشنا می&amp;zwnj;شویم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نويسنده حقیقت داستان نامه&amp;zwnj;ی پیامبر در آخرین روزهای زندگی و در بستر بیماری وفات ایشان را روشن و واضح نموده و بعد از این موارد به رابطه&amp;zwnj;ی علی با خلفای راشدین در دوران خلافت ایشان اشاره&amp;zwnj;ای داشته&amp;zwnj;است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در ادامه موضوعات به بررسی زندگی علی رضی الله عنه در متن اجتماع پرداخته شده و شرح داده که علی به نشر و تبلیغ توحید و مبارزه با شرک اهمیّت ویژه&amp;zwnj;ای قائل بود و الله تعالی را با اسمهای زیبا و صفات والا و نعمتهایی که شکر الهی آنها را بر همگان واجب می&amp;zwnj;گرداند، معرفی می&amp;zwnj;کرد، بر زدودن و نابودی آثار و نشانه&amp;zwnj;های جاهلیّت حریص بود، برای باطل کردن اعتقاد به تأثیر ستارگان و ایده&amp;zwnj;های دیگر تلاشی پیگیر مبذول داشت، کسانی را که با ادعای محبّت و احترام افراطی راه&amp;zwnj;اغراق گویی و غلو را در پیش گرفتند و تا حد و مزر ادعای خدا بودن او جلو رفتند با آتش مجازات می&amp;zwnj;نمود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در ادامه پاره&amp;zwnj;یی از سخنرانیها، کلمات قصار علی رضی الله عنه و برخی اشعار منسوب به او و پند و حکمت&amp;zwnj;های ارزنده که به ایشان نسبت می&amp;zwnj;دهند و در میان مردم به صورت ضرب المثلی در آمده بود را نقل شده و همچنین مسایل مهم دیگری نیز بیان شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتاب سیره أمیرالمؤمنین علی بن أبی طالب رضی الله عنه در حدود 1800 صفحه مي باشد كه برادران و خواهران محترم مي توانند آنرا از بخش اهل بيت رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم در كتابخانه عقيده دريافت نمايند.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>دروغگویان را بشناسید، ردی بر کتابهای معروف تیجانی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/174</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;دروغگویان را بشناسید&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;(&lt;strong&gt;ردی بر کتابهای معروف تیجانی&lt;/strong&gt;)&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتابهاي زيادي از جانب رافضه نوشته شده است كه در آنها به مقدسات اهل سنت بويژه اهل بيت و صحابه حضرت محمد صلي الله عليه وآله وسلم اهانت شده است، همان كسانی كه رسول اكرم صلی الله عليه وآله وسلم بيست و سه سال تمام زحمت كشيدند، آنها را تربيت كردند و در حالى از دنيا رفتند كه از آنها راضى بودند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;يكي از اين رافضی های دروغگو كه در كتبش بسيار بي ادبي و زبان درازي و دروغ پردازی كرده است و انديشه هاي اهل سنت را به باد انتقاد گرفته است شخصى بنام محمد تيجانى سماوى است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تيجاني مي گويد: وي اهل سنت بوده و با تحقيق و بررسي عميق، هدايت شده است و خاطراتش را در كتاب (آنگاه هدایت شدم) به رشته تحرير در آورده تا ديگران از اين هدايت! وي بهره مند گردند..&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تیجانی ادعا مي كند كه او از دانشگاه زيتونه در تونس فارغ التحصيل شده است و فردی صوفي و منسوب به فرقة تيجانی بوده است لازم به تذکر است که فرقه تیجانی یکی از فرق صوفیه غالی می باشد که افکار آنها به شیعیان خیلی نزدیک است و علمای اسلام آنها را جزو مسلمانان به حساب نمی آورند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سپس تیجانی ادعا می کند که به عربستان سعودی رفته و وهابی خالص شده است و از آنجا به تونس برگشته و مشغول نشر وهابيت و انكار انديشة تصوف و ساير انديشه ها شده است!! بعد از آن به بيروت مسافرت كرده و در كشتي با فردي بنام منعم ملاقات كرده و از آن متأثر شده است سپس مسافرتي به عراق داشته و بعد از آن رافضی اثنا عشری شده است وي مدعي است كه او بعد از یک جستجوي جدى از حقيقت، سرانجام به حقيقت دست يافته است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ای کاش! اين مرد در ادعايش صادق بود اگر ادعاهاي او درست می بود ما دست در دست او گذاشته با او بيعت مي كرديم و از هدایتش مستفید می شدیم! اما او متاسفانه كتابهايش را از دروغ، خدعه، فريبكاري، عيبجويي و بد گويي و اهانت پر كرده است و حقيقت اين است كه اين كتابها برای تیجانی در قم و تهران نوشته شده است و سپس به نام او چاپ گردیده و اين آن چيزي است كه در لابلاى كتاب هاي وى مشاهده مى شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تاكيد تیجانی در كتابهاي چهارگانه اش بر يك مسئله، آن هم طعن در صحابه رسول الله -صلی الله عَليه و آله و سلم- است و واقعيت اينست كه رافضه هنگام بحث و گفتگو با اهل سنت، چيزي غير از اين ندارند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب (آنگاه هدايت شدم) و چندين كتاب ديگر که به نام تیجانی نشر شده است توسط رافضی اثنی عشری دیگری بنام سيد محمد جواد مهری به زبان فارسي ترجمه شده است تا با بد و بيراه گفتن صحابه رسول الله صلي الله عليه و آله و سلم ، بويژه خلفاي سه گانه و عشره مبشره و همچنين اهانت و زبان درازي نسبت به ام المومنين حضرت عايشه صديقه رضي الله عنهم اجمعين دين خود را نسبت به ميليونها اهل سنت فارسي زبان ايران و جهان ادا كند و پايه هاي وحدت و تقريب بين مذاهب! را بيش از پيش استحكام بخشد. بنياد معارف اسلامي قم براي اين كتاب ها و كتابهاي ديگر ضد وحدت و ضد اسلام، سرمايه گذاري زيادي كرده است. البته اگر چه اين سرى كتابها در بنياد فوق الذكر نوشته شده است و بنام هدايت يافته ها! منتشر شده است. چنانچه مهرى در مقدمه كتاب (آنگاه هدايت شدم) مي گويد: ((اكنون بنياد معارف اسلامي با تعداد زيادي از محققين و علما، مشغول خدمت در زمينه هاي مختلف و آماده سازي براي طرح مهم تاريخ نگاري مي باشد. تاكنون كارهاي ارزشمند و شايان تقديري به اتمام رسيده . . .)) شايد کتابهای تیجانی هم، يكي از آن كارهای ارزشمند باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آري، اين كتاب ها&amp;nbsp;كليه كساني را كه باور داشتند كه اين آدمان پست نابكار زماني معتقد به وحدت ميان شيعه و سني بودند، مات و مبهوت كرد. آري تاريخ ثابت كرد كه اينان دعوتگر تخريب اند نه تقريب. چرا چنين نباشد. زيرا، آنها هيچ كتابي نمي نويسند مگر اينكه آن را به وسيله عقايد باطل خود مزين ساخته و با باورهاي دروغين آراسته مي كنند و كتاب هاى تيجاني كه بر دو اصل و پايه يعني، دروغ و تضاد استوار است و نويسنده تمام قضاوت هاي خود را در اين كتاب بر اين دو اصل مذكور پايه ريزي نموده است و هر خواننده در جريان مطالبي كه ارائه مي گردد نشانه هاي روشني از دروغ و تضاد را در كتابهاى او&amp;nbsp;خواهد ديد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;و هر انسان خردمند و عاقل مي داند كه دروغ و تضاد دليل بطلان است نه حق ـ ما سوگند ياد مي كنيم و مطمئنيم كه حانث هم نمي شويم، درباره ي اينكه&amp;nbsp;تيجانی در مورد مذهب ((اماميه)) كه او بدان هدايت شده و حق تملق را ادا نموده است، كوچكترين اطلاعي ندارد و هم چنين او اندك آگاهي درباره كتب مرجع فرقه اماميه نيز ندارد. علاوه بر اين او هرگز پيرو مذهب اهل سنت نبوده است بلكه او از مذهب ((صوفي هاي افراطي)) پيروي كرده است و تفاوت ميان مذهب اهل سنت و غلاة صوفيه مانند روز روشن است و هر انسان عاقلي فرق آنها را مي داند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به طور كلي خواستيم به اهميت اين كتاب ها نزد تشيع اشاره كنيم زیرا آنها در هر مجلسی با آب و تاب بسیاری از تیجانی و کتابهای وی یادآوری می کنند. سال گذشته تلويزيون دولتی ایران هم به نوبه خود گامی در جهت وحدت اسلامی برداشت و با معرفی تیجانی به عنوان سنی که رافضی اثنی عشری شده است از این دروغگو قدردانی نمود. درحالیکه در برنامه مناظراتی که در شبکه المستقله بین تیجانی و همراهانش و علمای اهل سنت رخ داد، تیجانی و گروه همراه وی به سختی رسوا شدند و همین مناظرات سبب هدایت صدها هزار شیعه در سراسر جهان خصوصا عربهای ایران گردید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و اینک کتابخانه عقیده مجموعه ای از کتابهای ارزشمندی را که در رد کتابهای تیجانی رافضی دروغگو نوشته شده را خدمت برادران و خواهران مسلمان در بخش رد شبهات كتابخانه عقيده معرفی می کند تا باشد كه مسلمانان حقجو با دروغهاي تیجانی گمراه و بنياد معارف اسلامي(رافضى) قم بیشتر آشنا شوند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1- بلكه گمراه شدى (در جواب کتاب آنگاه هدایت شدم)&lt;br /&gt;
2- عيانات &amp;ndash; (نقدى بر كتاب تيجانى آنگاه هدايت شدم)&lt;br /&gt;
3- دروغگويان را بشناسيد. (پاسخي کوتاه به دروغهاي تيجاني)&lt;br /&gt;
4- دفاع از آل و اصحاب پيامبر&amp;nbsp;&amp;nbsp;صلى الله عليه وآله وسلم&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
5- بازسازی باورها&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب زندگینامه آیت الله العظمی علامه ابوالفضل ابن الرضا برقعی قمی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/173</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب زندگینامه آیت الله العظمی علامه ابوالفضل ابن الرضا برقعی قمی&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علامه سيد ابو الفضل ابن الرضا برقعى قمي تهراني(رحمه الله) در سال 1329هـ ق مطابق با 1287 هـ ش در شهر قم- ايران- در خاندان شيعه مذهبي به دنيا آمد و پدرش سيد حسين شخص فقير و زاهدي بوده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;جد او سيد احمد بن رضي الدين عالم مجتهد و مبارزي بوده كه از شاگردان شيرازي كسي كه فتواي تحريم تنباكو- ضد نفوذ بريطانيا در ايران- را صادر كرده است ميباشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مادرش سكينه سلطان دختر شيخ غلام رضا قمي نويسنده ي كتاب رياض الحسيني ميباشد علامه، از اولين روز هاي حيات پاي در مكتب گذاشته، تعليم و قراءت قرآن مجيد و خواندن و نوشتن را فرا گرفت.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سپس به نزد شيخ عبدالكريم يزدي حائري كه در آن وقت يكي از بزرگترين علماي شيعه بود رفت تا مراحل تحصيلش را ادامه دهد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علامه برقعي در حكايت از احوال خويش ميگويد:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به مدرسه رضويه قم كه در آن زمان معروف بود رفتم ولي از اينكه خرد سال بودم به من اطاقي ندادند ولي با اصرار زياد اطاق كوچكي به من دادند كه نه از گرمي محفوظ بودم و نه از سردي.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به هر حال از خانه ي خودم حصير و فرشي آوردم و در اين حجره ي كوچك و يا در اين زاويه شب و روزم را گذراندم تا كه الحمد لله دروس علوم شرعي را كسب نمودم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از صرف ونحو شروع كردم وآخرين كتاب مغني البيب وكتاب الأعاريب ابن هاشم وشرح جامي بر كافية ابن حاجب را به انتها رساندمبعد از اين خود شيخ حائري مدير از من امتحان گرفت والحمدلله از موفقيت كامل برخوردار شدم كه سپس از طرف حوزه ي برايم حقوقي تعيين شده تا ادامه ي تحصيل دهم .&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;وبه دنبال آن تحصيلم را در علم فقه واصول فقه كه در حوزه هاي علمي رايج است ادامه دادم،در اثناي تحصيل به تدريس درسهاي ابتدايي نيز مشغول بودم ورفته رفته يكي از مدرسين حزوه ي قم فائز گرديدم بعدا براي تخصص در علم فقه واصول فقه به نجف اشرف رفتم ودر نزد كبار مراجع شيعه مراحل عالي دروس فقه واصول فقه را طي كردم سه سال در نجف اشرف گذراندم واز بسياري از علماي كبار آن ديار منجمله: مرجع بزرگ شيعه در آن وقت سيد ابوالحسين موسوي اصفهاني كسب علم كردم.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سپس علامه برمي گردد ودر قم نيز اجازه ي اجتهاد را از آيت الله عبدالنبي نجفي عراقي كه يكي از مراجع بزرگ شيعه بود اخذ مي كند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;علامه برقعي در شروع از جمله ي علما ي مذهب شيعه اثنا عشري بوده و از مجتهدين اعلامشان به شمار مي رفت، ولي اخلاص، صدق و مبارزه او با بدعتها و خرافات و تمسك شديد علامه به قرآن كريم نهايت او را به طرف حق رهبري كرد.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علامه از سن 45 سالگي از مذهب و عقايد شيعه اثنا عشري دست كشيده و با حكم به ظاهر قرآن و سنت صحيح و آن چه از سلف صالح اين امت باقي مانده به ويژه خلفاي راشدين و همگي ياران رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم خاتصتا مهاجرين و انصار و پيروانشان عمل كرده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;علامه برقعي مي گويد اگر ما خواسته باشيم سنت صحيح را در روايات و كتب شيعه بيابيم ممكن نيست. ولي بايستي در كتب مسانيد و مصنفات حديث كه در نزد جمهور مسلمين است جستجو كرد، هر چه از رسول اكرم صلى الله عليه و سلم باشد، سند و متن آن صحيح باشد و مخالف قرآن كريم نباشد گرفته مي شود و گر نه متروك است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اداره سايت عقيده به تمامي نسل جوان و روشنفكر و اهل قلم و سياست چه شیعه و چه سنی پیشنهاد می کند این کتاب را بخوانند زیرا علامه برقعی قمی حوادث بسیار مهمی از بزرگان نظام جمهوری اسلامی و شاهنشاهی را ذکر می کنند و در زمان نقطه تحول عظیمی که در ایران رخ داده است زندگی کرده اند، بله، انقلاب ایران در اواسط حیات ایشان رخ داد و این بیانگر این است که ایشان در هر دو&amp;nbsp; دوره شاهد نزدیک بر حوادث تاریخی قبل و بعد از انقلاب بوده اند (متولد: 1287 شمسي متوفاي: 1372 شمسي و محل زندگی ایشان در تهران و قم بود) و ایشان غالب حوادث این دوره از تاریخ مهم کشورمان را در این خاطرات ذکر می کنند و احوال و اوضاع مردم و سردمداران هر دو دوره و برخورد هر دو نظام با مردم را در این دو دوره به تصویر می کشند و کسانی که میخواهند از تاریخ انقلاب و بررسی اوضاع آن وقت بنویسند از این کتاب مستغنی نخواهند بود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین از خصوصیات بارز این کتاب بسیار با ارزش، صداقت و راستی و شجاعت در گفتن حقائق است که هر خواننده ی منصفی پس از خواندن این کتاب به این دو واقعیت شهادت خواهد داد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان مي توانند &lt;strong&gt;كتاب زندگینامه علامه ابوالفضل ابن الرضا برقعي رحمه الله&lt;/strong&gt; را از بخش &lt;strong&gt;هدایت یافتگان&lt;/strong&gt; در کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ بازسازی  باورها</title>
<link>http://qalamlib.com/news/172</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ بازسازی &amp;nbsp;باورها&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مهمترین و محوری&amp;zwnj;ترین عامل تاثیرگذار در شکل&amp;zwnj;گیری &amp;laquo;بینش، منش و روش&amp;raquo; و نوع تعامل در عرصه&amp;zwnj;های گوناگون زندگی، ماهیت دین، مکتب، اندیشه و فلسفه ای است که انسان به آن باور پیدا می&amp;zwnj;کند و دریچه&amp;zwnj;ای برای نگاه به &amp;laquo;خدا، جهان و انسان&amp;raquo; و روابط آنان با یکدیگر قرار می&amp;zwnj;دهد. از آنجا که بدون پذیرش و قناعت درونی هیچ دین و مکتبی نمی&amp;zwnj;تواند باورها، رویکردها و رفتارهای آدمیان را به صورت مطلوب تحت تاثیر خود قرار بدهد، آفریدگار انسان و جهان او را در انتخاب دین و مکتب و فلسفه زندگی &amp;laquo;آزاد&amp;raquo; گذاشته است، همانگونه که میفرماید: (وَقُلِ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكُمْ فَمَنْ شَاءَ فَلْيُؤْمِنْ وَمَنْ شَاءَ فَلْيَكْفُرْ) (الكهف: ٢٩&lt;span dir=&quot;ltr&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&amp;nbsp;(ای پیامبر!) به ایشان ابلاغ کن که (دین) درست و حق همان دین فرود آمده از جانب پروردگارتان است، پس هرکس می&amp;zwnj;خواهد ایمان بیاورد، و هرکس که می&amp;zwnj;خواهد کافر شود&amp;raquo;...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما پیش شرط لازم برای استفاده درست از &amp;laquo;آزادی&amp;raquo; و انتخاب صحیح نوع زندگی، &amp;laquo;آگاهی&amp;raquo; از ماهیت دین و محتوای مکتبی است که برگزیده می&amp;zwnj;شود، اگر انسان&amp;zwnj;ها با بانی، مبانی، محاسن و ویژگی&amp;zwnj;ها و نقش و ماحصل کوتاه و دراز مدت گزینه&amp;zwnj;هایی که پیش&amp;zwnj; رو دارند آشنا نباشند و نقاط &amp;laquo;قوت و ضعف، سود و زیان و مصلحت و مفسدت&amp;raquo; مترتب بر آنها را از منابع مورد اعتماد نشناسند، و آگاهانه- و به تعبیر قرآن علی بصیره در باره این انتخاب مهم حساس و سرنوشت ساز خود تصمیم&amp;zwnj;گیری نکنند و جوانب فردی، اجتماعی، فکری و رفتاری زندگی خود را با توجه به اولویت&amp;zwnj;ها و اهداف آن آیین برنامه ریزی و ساماندهی ننمایند، و انتظارات خویش را با بهره&amp;zwnj;گیری از توانایی&amp;zwnj;های مادی و معنوی خود در جهت تحقق اهداف کوتاه و دراز مدت دین برگزیده خود، پی&amp;zwnj;گیری نکنند و در مسیر عمر و پیش از پایان آن، هدف از آفرینش خود را درنیابند و به مسئولیت&amp;zwnj;هایشان عمل نکنند، خام و خوار و خُرد از بیرون خاک به درون آن نقل مکان خواهند کرد و فرصت&amp;zwnj;گرانبها و تکرارناشدنی عمر را به سادگی از دست خواهند داد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اینجاست که نقش و اهمیت کار اصحاب &amp;laquo;رسالت، اصلاح و هدایت&amp;raquo; و در رأس آنها انبیای الهی در جهت تبیین خدا پسندانه دین و تعالیم تعالی بخش آن بیشتر معلوم می&amp;zwnj;شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امروزه بسیاری از ادیان و مکاتب و فرهنگ&amp;zwnj;ها برای عرضه جهانی آنچه در بساط دارند، از پیشرفته&amp;zwnj;ترین امکانات علمی و رسانه&amp;zwnj;ای بهره می&amp;zwnj;گیرند؛ هرچند این حق مسلم آن هاست، اما اشکال کار در این است که متاسفانه بیشترشان به عرضه کالای فکری و فرهنگی خویش اکتفاء نکرده و در رقابتی غیرمنصفانه و غیراخلاقی به تخریب و تحریف باورها، فرهنگ و تاریخ و دست&amp;zwnj;آوردهای دیگر ادیان و مکاتب اقدام نموده و در پاره&amp;zwnj;ای از موارد با زیر پانهادن اصل &amp;laquo;آزادی انتخاب دین و مکتب&amp;raquo; از راهکارهای غیراخلاقی همچون: توطئه&amp;zwnj;های سیاسی، تهاجم نظامی و حربه&amp;zwnj;های اقتصادی بهره گرفته و با زیرپانهادن تمامی معیارهای مقبول و موجود در ادیان و مکاتب و دور زدن قوانین و مقررات پذیرفته شده جامعه جهانی، برای تحمیل باورها و فرهنگ خود بر دیگران تلاش می&amp;zwnj;کنند که قضیه &amp;laquo;جهانی&amp;zwnj;سازی&amp;raquo; و تلاش برای تحمیل فرهنگ آمریکایی و غربی بر ملت&amp;zwnj;های غارت&amp;zwnj;شده جهان سوم، بخشی از آن تلاش&amp;zwnj;های متضاد با &amp;laquo;کثرت&amp;zwnj;گرایی&amp;raquo; و دمکراسی&amp;zwnj;خواهی است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خردمندان و میانه روان دو مذهب &amp;laquo;شیعی و سنی&amp;raquo; تاکنون گام&amp;zwnj;هایی را هرچند در عمل کافی به نظر نمی&amp;zwnj;رسند در این راستا برداشته و تلاش&amp;zwnj;هایی را صورت داده اند که آخرین آنها نشست &amp;laquo;مجمع جهانی تقریب بین مذاهب&amp;raquo; و &amp;laquo;اتحاد جهانی علمای مسلمان&amp;raquo; در کشور قطر و مناظره مستقیم هاشمی رفسنجانی و دکتر قرضاوی در تلویزیون الجزیره بود که تا حدودی می&amp;zwnj;توانند جای امیدواری باشند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما گرایش&amp;zwnj;هایی از فریقین با توجه به باورهای &amp;laquo;دگم و تمامیت خواهانه&amp;raquo; خویش بدون توجه به بسیاری از نصوص غیرقابل انکار و رهنمودهای ائمه دین و دیدگاه&amp;zwnj;های اهل &amp;laquo;اعتدال و اصلاح&amp;raquo; دو طرف هرچند گاهی به بهانه&amp;zwnj;های مختلف اقدامات ناصوابی را صورت می&amp;zwnj;دهند، و خواسته یا ناخواسته پایشان درلای دام&amp;zwnj;های شیاطین پیدا و پنهان&amp;zwnj;گیر می&amp;zwnj;افتد و برطبل تفرقه می&amp;zwnj;کوبند، و همه چیز را فدای توهمات خویش می&amp;zwnj;نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این کتاب در مورد عوامل پیدایش فرقه ها و بعد از آن مسأله خلافت و امامت و اینکه چه کسانی اهل بیت هستند بحث میکند. سپس در مورد صحابه و رابطه آنها با اهل بیت مناقشه میکند. از دیگر موضوعات بسیار جالب این کتاب بررسی مهدویت و پاره ای از مسائل فقهی و توسل و استعانت می باشد. و در پایان کتاب منشور وحدت واقعی را بیان می کنند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نویسنده این کتاب درباره ی این تألیفش می گوید: (در اینجا توضیح این مطلب را نیز بر خود لازم می&amp;zwnj;بینم که تحقیقات صورت گرفته، در این کتاب اساساً مدیون زحمات نویسندگان منابع اصلی آن به ویژه آقایان: &amp;laquo;ابراهیم توحیدی&amp;raquo; نویسنده پرتلاش و ناآشنای کتاب &amp;laquo;عیانات&amp;raquo; و استاد &amp;laquo;احمد کاتب&amp;raquo; پژوهشگر شیعی عراقی و نویسنده کتاب &amp;laquo;سیر دگرگونی اندیشه شیعی&amp;raquo; و آیة الله سید ابوالفضل برقعی در کتاب: &amp;laquo;عرضه روایات اصول بر قرآن و عقول&amp;raquo; است، اما کار اینجانب در &amp;laquo;تعدیل، تبویب، تلخیص و ویرایش&amp;raquo; مطالب آنان خلاصه می&amp;zwnj;شود).&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران گرامی می توانند&amp;nbsp; &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=645&quot;&gt;کتابِ بازسازی &amp;nbsp;باورها&amp;nbsp; &lt;/a&gt;را از بخش &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=20&quot;&gt;رد شبهات&lt;/a&gt; کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب گفتگویی آرام با دكتر محمد حسينى قزوينى شيعه اثناعشرى به زیور طبع آراسته شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/171</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب گفتگویی آرام با دكتر محمد حسينى قزوينى شيعه اثناعشرى به زیور طبع آراسته شد&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;امروزه از آن جا که دایره فرهنگ گسترش یافته و بسیاری از موانع برطرف شده&amp;zwnj;اند و دیدار مخالفان با یکدیگر آسان گردیده و شرایط گفتگو آماده است. مخالفان در درون جوامع اسلامی به راحتی می&amp;zwnj;توانند با یکدیگر گفتگو کنند و همچنین شرایط گفتگو با مخالفاني که خارج از جامعه اسلامی هستند مهیاست، بنابراین می&amp;zwnj;بایست از این فرصت استفاده شود و با بحث و گفتگوی آرام و به نیکی و به دور از فحش و ناسزا برای بررسی اختلافات تلاش شود و به قضایای مورد اختلاف و دلایلی که از آن استدلال می&amp;zwnj;شود تمرکز شود زیرا هر مخالفی شبهه و دلیلی دارد (چه صحیح و چه ضعیف) که از آن استدلال می&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;همچنین نباید در گفتگو و مناظره از احادیث نادرست و دروغین استدلال کرد و همچنین به کتاب&amp;zwnj;های تاریخ و ادب که آکنده از روایات درست و نادرست هستند نباید استناد کرد. چون وقتی که روایات منسوب به پیامبرص و اهل بیت از دروغ در امان نمانده است پس چگونه می&amp;zwnj;توان به دیگر روایتها بدون تحقیق و بررسی اعتماد کرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;کتابی که پیش رو دارید گفتگویی است که &amp;nbsp;بین پروفسور احمد&amp;nbsp; بن سعد حمدان الغامدی استاد آموزش عالی دانشکدة عقیده -&amp;nbsp; دانشگاه أم القری در مکه مکرمه &amp;nbsp;و یکی از علمای شیعه رافضی به نام دكتر محمد حسينى قزوينى &amp;nbsp;صورت گرفته است. قزوینی در میان روافض ایران از جایگاه علمی بالایی برخوردار است و در ضمن اینکه استاد حوزه و دانشگاه های دینی شیعه می باشد در سایتی به نام موسسه تحقیقاتی حضرت ولی عصر (کشف الله سره) همیشه با پخش و نشر مسایل اختلافی و توهین به صحابه و اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم بزرگترین خدمت به یهود و نصارا را انجام می دهد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;این اولین بار نیست که قزوینی رافضی در مقابل علمای اهل سنت رسوا می شود بلکه وی در مناظرات المستقله توسط علمای اهل سنت به سختی رسوا شد و دروغگویی و تدلیس وی به همه مسلمانان عیان گردید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;اینک بار دیگر کتاب گفتگویی آرام با دكتر محمد حسينى قزوينى شيعه اثناعشرى به همت دار الدراسات العلمیه چاپ و نشر شده است که الحمدلله با استقبال بینظیر دانشمندان و جوانان حقجو روبرو گردید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=461&quot;&gt;&lt;strong&gt;این کتاب را از بخش رد شبهات&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; کتابخانه عقیده دریافت نمایند&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;کتاب گفتگویی آرام با دكتر محمد حسينى قزوينى شيعه اثناعشرى به زیور طبع آراسته شد&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;امروزه از آن جا که دایره فرهنگ گسترش یافته و بسیاری از موانع برطرف شده&amp;zwnj;اند و دیدار مخالفان با یکدیگر آسان گردیده و شرایط گفتگو آماده است. مخالفان در درون جوامع اسلامی به راحتی می&amp;zwnj;توانند با یکدیگر گفتگو کنند و همچنین شرایط گفتگو با مخالفاني که خارج از جامعه اسلامی هستند مهیاست، بنابراین می&amp;zwnj;بایست از این فرصت استفاده شود و با بحث و گفتگوی آرام و به نیکی و به دور از فحش و ناسزا برای بررسی اختلافات تلاش شود و به قضایای مورد اختلاف و دلایلی که از آن استدلال می&amp;zwnj;شود تمرکز شود زیرا هر مخالفی شبهه و دلیلی دارد (چه صحیح و چه ضعیف) که از آن استدلال می&amp;zwnj;کند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;همچنین نباید در گفتگو و مناظره از احادیث نادرست و دروغین استدلال کرد و همچنین به کتاب&amp;zwnj;های تاریخ و ادب که آکنده از روایات درست و نادرست هستند نباید استناد کرد. چون وقتی که روایات منسوب به پیامبرص و اهل بیت از دروغ در امان نمانده است پس چگونه می&amp;zwnj;توان به دیگر روایتها بدون تحقیق و بررسی اعتماد کرد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;کتابی که پیش رو دارید گفتگویی است که &amp;nbsp;بین پروفسور احمد&amp;nbsp; بن سعد حمدان الغامدی استاد آموزش عالی دانشکدة عقیده -&amp;nbsp; دانشگاه أم القری در مکه مکرمه &amp;nbsp;و یکی از علمای شیعه رافضی به نام دكتر محمد حسينى قزوينى &amp;nbsp;صورت گرفته است. قزوینی در میان روافض ایران از جایگاه علمی بالایی برخوردار است و در ضمن اینکه استاد حوزه و دانشگاه های دینی شیعه می باشد در سایتی به نام موسسه تحقیقاتی حضرت ولی عصر (کشف الله سره) همیشه با پخش و نشر مسایل اختلافی و توهین به صحابه و اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم بزرگترین خدمت به یهود و نصارا را انجام می دهد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;این اولین بار نیست که قزوینی رافضی در مقابل علمای اهل سنت رسوا می شود بلکه وی در مناظرات المستقله توسط علمای اهل سنت به سختی رسوا شد و دروغگویی و تدلیس وی به همه مسلمانان عیان گردید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;اینک بار دیگر کتاب گفتگویی آرام با دكتر محمد حسينى قزوينى شيعه اثناعشرى به همت دار الدراسات العلمیه چاپ و نشر شده است که الحمدلله با استقبال بینظیر دانشمندان و جوانان حقجو روبرو گردید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=461&quot;&gt;&lt;strong&gt;این کتاب را از بخش رد شبهات&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; کتابخانه عقیده دریافت نمایند&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>آيا لازم است ميلاد رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم را جشن بگيريم؟</title>
<link>http://qalamlib.com/news/170</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
آیا لازم است میلاد رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم را جشن بگیریم؟&lt;br /&gt;
اسحاق بن عبدالله بن محمد دبیری رحمه الله. الحمد لله وسلام على&amp;nbsp;&amp;nbsp;عباده الذین اصطفى&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;أما بعد: [یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آمَنُواْ اتَّقُواْ اللّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلاَ تَمُوتُنَّ إِلاَّ وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ(102)]. [آل عمران].&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
[ای مؤمنان، از الله چنانكه سزاوار پروای اوست بترسید و جز در مسلمانی نمى رید].&lt;br /&gt;
این مقاله را درباره جشن تولد حضرت رسول نوشته ام تا با خواندن آن، مردم به حقیقت این بدعت پی ببرند و بدانند كه دین الله متعال كامل است و احتیاج به كم یا زیاد كردن آن نیست؛ زیرا كه صحابه و تابعین و مسلمانان سه قرن اول اسلام خیلی بیشتر و بهتر از ما به سوی نیكى ها و خوبى ها میل داشته اند، و هرگز نیكی و سنتی از رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم را رها نكرده اند تا این كه ما در این زمان به آن سنت رسیده باشیم.&lt;br /&gt;
امید است با مطالعه این مطلب و دوری از تعصب كوركورانه، به سوی حقیقت و راستی بازگردیم وهوی و هوس را كنار گذاشته و فقط پیرو قرآن و سنت رسول باشیم، تا در روز قیامت از رستگاران باشیم.&lt;br /&gt;
از جمله اصولی كه ما باید به آن اعتقاد راسخ داشته باشیم این است كه &amp;nbsp;الله جل جلاله با بعثت پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم، دین اسلام را كامل كرد و آن را كامل ترین دین ها قرار داد و نعمـت خود را بر ما تمام نمود؛ در نتیجه بعد از پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم كم یا زیاد كردن دین، در حیطه اختیار هیچ فردی نیست.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;الله جل جلاله مى فرماید: (الْیَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِینَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَیْكُمْ نِعْمَتِی وَرَضِیتُ لَكُمُ الإِسْلاَمَ دِینًا)- &amp;nbsp;المائدة 3.&lt;br /&gt;
[امروز دینتان را برای شما كامل كردم و نعمت خویش را بر شما تمام نمودم واسلام را (به عنوان) دین برای شما پسندیدم].&lt;br /&gt;
و رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم مى فرماید: ((تركتكم على&amp;nbsp;&amp;nbsp;البیضاء لیلها كنهارها لا یزیغ عنها بعدی إلاَّ هالك)). [أحمد وابن ماجه و غیرهما].&lt;br /&gt;
شما را بر بهترین راه ترك كردم، شب آن مانند روز آن واضح و آشكار است، از آن راه منحرف نمى شود مگر آن كه هلاك و گمراه شود.&lt;br /&gt;
پس هر مسلمانی كه به دنبال راه نجات است باید كه فقط و فقط پیرو آن چه خدا و رسولش آورده اند باشد و اجازه ندهد چه خود و چه كسی دیگر(هركسی كه خواهد باشد) چیزی به دین خدا بیفزاید، یا از آن كم كند .&lt;br /&gt;
بنابراین طالب حق و دوستدار سنت پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم، هیچ كاری انجام نمى دهد جز آن كه خدا و رسول خدا صلى الله علیه وآله وسلم به آن امر فرموده باشند.&lt;br /&gt;
و این جاست كه علما و دانشمندان اسلامی مى گویند: (العبادات توقیفیة) (واجب شدن عبادتها را &amp;nbsp;الله جل جلاله تعیین فرموده است و هیچ انسانی حق دخالت در آن ها را ندارد) .&lt;br /&gt;
چنانكه باریتعالی مى فرماید: (وَمَا اخْتَلَفْتُمْ فِیهِ مِن شَیْءٍ فَحُكْمُهُ إِلَى&amp;nbsp;&amp;nbsp;اللَّهِ)&amp;nbsp;- الشورى آیه 10 .&lt;br /&gt;
[و در هر چیزی كه در آن اختلاف پیدا كنید، حكمش به &amp;nbsp;الله جل جلاله احاله مى گردد].&lt;br /&gt;
و همچنین مى فرماید: (قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللّهَ فَاتَّبِعُونِی یُحْبِبْكُمُ اللّهُ وَیَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ)&amp;nbsp;- آل عمران 31.&lt;br /&gt;
[بگو: اگر الله را دوست مى دارید، از من پیروی كنید تا الله شما را دوست بدارد و گناهان شما را بیامرزد].&lt;br /&gt;
و رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم مى فرماید: ((من أحدث فی أمرنا هذا ما لیس منه فهو رد)) متفق علیه .&lt;br /&gt;
هركس در دین ما چیزی نو بیاورد كه در دین نباشد، آن عمل نزد ما مردود و غیر قابل قبول است.&lt;br /&gt;
و مى فرماید: ((&amp;hellip; وإیاكم ومحدثات الأمور فإنَّ كل محدثة بدعة وكل بدعة ضلالة)). [متفق علیه].&lt;br /&gt;
بپرهیزید از آن چه در دین، جدید و نو آورده شده است؛ زیرا هر نو و جدیدی در دین، بدعت است و هر بدعت، ضلالت و گمراهی است.&lt;br /&gt;
و باید دانست كه ((كل)) در حدیث فوق همه چیز و همه كس را در برمى گیرد و شامل انواع بدعت ها مى شود.&lt;br /&gt;
برادر و خواهر مؤمن!&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;اگر آن چه تاكنون در بالا آورده شده، برای تو واضح و روشن است و از روی یقین به آن اعتقاد داری، بدان كه هر گفتار و كرداری كه جزیی از عبادت ها محسوب مى شود را باید با ترازوی دین سنجید كه آیا این عمل برگرفته از اسلام است، یا تازه وارد دین شده است، آیا از سنت های پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم است، یا از بدعت هاست؟&lt;br /&gt;
اكنون با ذكر نمونه، موضوع را روشن مى كنم.&lt;br /&gt;
جشن گرفتن ولادت حضرت رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم، امام و قدوه و قائد و خاتم الأنبیاء والمرسلین ورحمت للعالمین .&lt;br /&gt;
زمان پـیدایش جشن میلاد حضرت رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ابن كثیر در (البدایة والنهایة 11/172) مى گوید كه دولت الفاطمیه (العبیدیه) ـ كه نسبت آنها به عبیدالله بن میمون القداح یهودی مى رسد و در مصر از سال (375 تا 567 هـ.ق) حكم فرمایی مى كردند ـ جشن هایی را روی كار آوردند كه از جمله آن ها جشن تولد حضرت رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم مى باشد.&lt;br /&gt;
همچنین المقریزی در كتاب (المواعظ والاعتبار 1/490)، وشیخ محمد بخیت المطیعی مفتی مصر در كتاب (أحسن الكلام فیما یتعلق بالسنة والبدعة من الأحكام ص 44 ـ 45)، وشیخ علی محفوظ در كتاب (الإبداع فی مضار الابتداع ص251) والشیخ الإمام أبی حفص تاج الدین الفاكهانی در كتاب: (المورد فی عمل المولد) والشیخ عبدالسلام خضر الشقیری در كتاب: (السنن والمبتدعات المتعلقة بالأذكار والصلوات ص138ـ139)، والسید علی فكری در كتاب: (المحاضرات الفكریة ص128)، والعلامه أحمد بن یحیی الونشریسی در كتاب: (المعیار المعرب والجامع عن فتاوى&amp;nbsp;&amp;nbsp;علماء أفریقیة والأندلس والمغرب 7/99ـ101)، والشیخ ابن الحاج در كتاب: (المدخل 2/11ـ12)، والشیخ محمد یوسف الصالحی الشامی در كتاب: (سبل الهدى&amp;nbsp;&amp;nbsp;والرشاد فی سیرة خیر العباد ص349 نقل از الإمام السخاوی) والإمام الملا علی القاری در كتاب: (المورد الروی فی المولد النبوی ص24)، والشیخ نصیرالدین المبارك الشهیر بابن الطباخ، والشیخ ظهیرالدین جعفر التزمنتی، نگا(1/441ـ442 در كتاب: سبیل الهدى&amp;nbsp;&amp;nbsp;والرشاد فی سیر خیر العباد)، وابن تیمیه در كتاب: (اقتضاء الصراط المستقیم ص294ـ295) وكتاب: (الفتاوى&amp;nbsp;&amp;nbsp;الكبرى&amp;nbsp;&amp;nbsp;1/312)، وابن القیم در كتاب: (الإعلام الموقعین)، وكتاب: (المولد) والإمام الشوكانی در كتاب: (رسالة فی المولد)، والشیخ إسماعیل بن محمد الأنصاری المالی در كتاب: (القول الفصل فی حكم الاحتفال بمولد خیر الرسل)، و بسیاری افراد دیگر ذكر كرده اند كه جشن های مولودی یك نوع بدعت بشمار مى رود، و آغاز پیدایش آن، از عهد دولت عبیدیه بوده است.&lt;br /&gt;
پـس اولیـن كسانی كه ایـن بـدعت را گذاشته اند، ملحدین عبیدیه فرزندان عبدالله بن سبأ یهودی بوده اند، و آنها مُحال است كه این كار را به خاطر محبت و دوستی حضرت رسول صلى الله علیه وآله وسلم انجام داده باشند.&lt;br /&gt;
حكم و نظر اســـلام نسبت به جشن های مولودی&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;از آن چه گفته شد نتیجه مى گیریم كه تمام خوبى ها در پیروی از رسول اكرم، تا سه قرن پس از او مى باشد، و هركس عبادتی انجام دهد كه در زمان رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم و عصرهای فضیلت ((خیر أمتی قرنی ثم الذین یلونهم ثم الذین یلونهم &amp;hellip;.)) [متفق علیه].&lt;br /&gt;
بهترین مردمان، مردم قرن من است، سپس مردمی كه بعد از قرن من مى آید، سپس مردمی كه بعد از قرن دوم مى آید(سه قرن پس از پیامبر) مرسوم نباشد، آن عبادت ها مردود و غیر قابل قبول است، و گناه آن بر گردن كسی خواهد بود كه آن را به دین افزوده باشد و همچنین كسانی كه آن را رواج داده و به آن عمل مى كنند.&lt;br /&gt;
پس نتیجه مى گیریم كه:&lt;br /&gt;
1 ـ مولودی و یا جـشن تولد حضرت رسول اكرم را نه آن حضرت، و نه خلفای راشدین، و نه هیچ یك از صحابـه و یاران، و نه تابعین در عصرهای فضیلت، آن را انجام نداده اند تا ما از آنان پیروی كنیم؛ زیرا آنان از ما داناتر، و به سنت پیامبر نزدیكتر، و به پیروی از آن بهتر و ارجح بوده اند، و اگر در اجرای آن جشن ها خیری مى بود، آنها در گرفتن آن خیـر، بر ما پیشی مى گرفتند.&lt;br /&gt;
2 ـ اولین كسانی كه آن جشـن ها را برپا كرده اند زنادقه و ملحدین عبیدیه بوده اند.&lt;br /&gt;
3 ـ این اعمال شبیه به جشن های مسیحیان است كه برای حضرت عیسی علیه السلام مى گیرند، و ما مسلمانان از تقلید و پیروی كردن از آنان نهی شده ایم.&lt;br /&gt;
4 ـ در صورت برگزار كردن جشن های مولودی، بر این اعتقاد هستیم كه &amp;nbsp;الله جل جلاله دین خود را كامل نفرموده ـ والعیاذ بالله ـ و این كه رسول خدا صلى الله علیه وآله وسلم دین را به طور كامل به ما نرسانیده است ـ والعیاذ بالله ـ و این كه مسلمانانِ عصرهای فضیلت، موجبات محبت و دوستی نسبت به رسـول خدا صلى الله علیه وآله وسلم را بـه ما نرسانیده اند.&lt;br /&gt;
و این سخنان را جز زندیق و ملحد و بى دین كسی دیگر نمى گوید.&lt;br /&gt;
5 ـ جشن گرفتن در این شب، دلیل بر محبت و دوستی رسول نیست؛ زیرا بسیاری از كسانی كه شب میلاد رسول را جشن مى گیرند پیروان واقعی آن حضرت نیستند، بلكه افرادی فاسق، فاجر و بى دین اند كه ربا مى خورند و در ادای نمازها سستی و كاهلی مى ورزنـد، به فحشا و بدی ها روی مى آورند و گناهان بسیار انجام مى دهند.&lt;br /&gt;
و دلیل محبت آنحضرت صلى الله علیه وآله وسلم چنان است كه &amp;nbsp;الله جل جلاله مى فرماید: (قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللّهَ فَاتَّبِعُونِی یُحْبِبْكُمُ اللّهُ وَیَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ)&amp;nbsp;- آل عمران آیه 31 .&lt;br /&gt;
[بگو: اگر خدا را دوست مى دارید، از من پیروی كنید تا خدا شما را دوست بدارد و گناهان شما را بیامرزد].&lt;br /&gt;
و چنان است كه خود آنحضرت صلى الله علیه وآله وسلم مى فرماید: ((كلكم یدخل الجنة إلاَّ من أبى&amp;nbsp;&amp;nbsp;قالوا: ومن یأبى&amp;nbsp;&amp;nbsp;یا رسول الله؟ قال: من أطاعنی دخل الجنة ومن عصانی فقد أبى )) رواه البخاری .&lt;br /&gt;
همه شما به بهشت وارد خواهید شد مگر كسى كه خود امتناع ورزد. گفتند: چه كسی است كه از داخل شدن به بهشت امتناع مى ورزد ای رسول خدا؟! آن حضرت صلى الله علیه وآله وسلم فرمودند: كسى كه از من اطاعت كند، به بهشت وارد خواهد شد، و هركس از دستورات من سرپیچی كند، او همان كسی است كه خود از وارد شدن به بهشت امتناع ورزیده است.&lt;br /&gt;
بنابراین محبت و دوست داشتن پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم، در پـیروی كردن از او(در ظاهر و باطن) و سنت صحیح، و دنبال كردن راه اوست، و آن چه از آن خبر داده است از گفتار و كردار و اخلاق و... .&lt;br /&gt;
6 ـ بسیاری از علما و دانشمندان متأخر، مفاسد بزرگی كه در این شب (شب تولد رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم) رخ مى دهد را بیان كرده اند؛ مانند: بعضی از اعمال شرك گونه، و غلو و زیاده روی در اشعار، و طلب یاری و كمك از پیامبر كردن، و اختلاط (جمع شدن زن و مرد در یك جا)، واستعمال ترانه و موسیقی، و شراب خواری، و غیر از این مفسده ها.&lt;br /&gt;
7 ـ روز تولد رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم همان روز رحلت اوست؛ یعنی روز12 ربیع الأول؛ چنان كه در كتب سیره وارد شده است. پس در این روز، خوشحالی بر ناراحتی هیچ مزیتی ندارد، و اگر ما در اعمال دین حق انتخاب داشتیم، به یقین ناراحتی و سوگواری و گریه و زاری در این روز و شب، اولی بر جشن و شادی بود.&lt;br /&gt;
وصلى&amp;nbsp;&amp;nbsp;الله على&amp;nbsp;&amp;nbsp;عبده ورسـوله نبینا محمد وعلى&amp;nbsp;&amp;nbsp;آله وأصحابه وأتباعه بإحسان.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>بياييد تا حقيقت امام زمان شيعه را كشف كنيم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/168</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بیایید تا حقیقت امام زمان شیعه را كشف كنیم&lt;br /&gt;
از جمله، اصول فرقه شیعه دوازده امامی، عقیده امامت است که عبارت است از اعتقاد به اینکه الله متعال دوازده امام را معین کرده که اولین آنها علی بن ابی طالب&amp;nbsp;&amp;nbsp;رضی الله عنه و آخرین آنها مهدی، محمد بن حسن عسکری، است و این عقیدۀ امامت در نزد شیعه محور دین و روح آن است. و معتقدند امامت &amp;laquo;منصبی الهی مانند نبوت است&amp;raquo;. (اصل الشیعة وأصولها کاشف الغطاء، ص211)&lt;br /&gt;
این عقیده قضیه امامت که بخشی از جایگاه آن را بیان کردیم به شخصیت مهدی موعود محمد بن حسن عسکری ختم می&amp;rlm;شود.&lt;br /&gt;
در این مقاله و كتابهایی كه به شما عزیزان معرفی می كنیم &amp;nbsp;به طور صریح و آشکار از این شخصیت صحبت می شود. و آنچه که بر آن تأکید می&amp;lrm;کنیم این است که قضایای اعتقادی باید مبتنی بر دلایل محکم و ثابت باشند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;پس شخصیت مهدی همان آرزوی امروز شیعیان و کسانی که خیلی مشتاق دیدار او هستند، است. همان کسانی که اسم او را بدون گفتن (عج) نمی&amp;rlm;آورند. این شخصیتی است که در مورد او بسیار سخن گفته شده است. در این مقاله و كتابهابی كه به شما عزیزان معرفی می گردد به جوانبی از آن پرداخته شده و حقیقت آن روشن شده است و در مورد تفاوت میان مهدی اهل سنت و مهدی شیعه سخن گفته شده است.&lt;br /&gt;
این كتابها را به هر &amp;nbsp;مسلمان و خاصتا شیعیان عاقل تقدیم می كنیم:&lt;br /&gt;
وگمان نمی&amp;rlm;کنم که طرح این موضوع باعث شعله&amp;rlm;ور شدن آتش اختلاف میان مردم شود یا به هدف برتری مذهبی بر مذهب دیگر باشد بلکه در راه توحید امت بر راه حق و خیر است و تنها انگیزه این كتابها این است.&lt;br /&gt;
داستان مهدی طبق عقیده شیعه دوازده امامی داستان عجیبی است که تار و پود آن توسط خیال بافته شده و حوادث و حالات آن خیالی است و بعد از آن به یکی از اسطوره&amp;rlm;های زمان تبدیل می&amp;rlm;شود، که عقل سالم و فطرت صحیح آن را نمی&amp;rlm;پذیرد تا جایی که سایر فرقه&amp;lrm;های شیعیان غیر از خودشان آن را نمی&amp;rlm;پذیرند. پس شایسته نیست که فرد عاقل این سخن را بپذیرد که به او گفته شود: بخواب که شب طولانی است.&lt;br /&gt;
ای شیعیان عاقل:&lt;br /&gt;
ما مطمئنم که شما چیزهای بسیاری را در حسینیه&amp;rlm;ها و مجالس علمای شیعه در مورد مهدی شنیده&amp;rlm;اید و از افراد بسیاری شنیده&amp;rlm;ای که ادعای رؤیت مهدی و همنشینی با او را کرده&amp;rlm;اند یا اینکه مهدی این گونه به آنها فتوا داده است یا... آیا از خودت پرسیده&amp;rlm;ای که ممکن است این شخصیت غیرحقیقی باشد؟! و آیا دلایل وجوب ایمان به آن صریح و صحیح هستند؟!&lt;br /&gt;
ای شیعیان عاقل:&lt;br /&gt;
در مورد شخصیت مهدی، محمد بن حسن عسکری، شک و تردیدهای فراوانی وجود دارد با وجود اینکه این عقیده از لوازم ایمان محسوب می&amp;rlm;شود که تارک آن از دیدگاه شیعه دوازده امامی کافر محسوب می&amp;rlm;شود، پس این شک و تردیدها چیست؟! شیعیان در این عقیده می&amp;rlm;خواهند از دشمنانشان انتقام بگیرند!!&lt;br /&gt;
ای شیعیان عاقل:&lt;br /&gt;
شاید بعضی&amp;lrm;ها این مسأله را برای این به تصویر بکشند که علت طرح این مسأله بغض و کینه نسبت به اهل بیت یا تقلیل جایگاه و منزلت آنان است. چرا که این دلیل و برهان کسانی است که می&amp;lrm;خواهند میان تو و حقیقت جدایی بیاندازند، پس هرگاه کسی بخواهد که از حقیقت بعضی از عقاید مخالف کتاب خدا اطلاع پیدا کند، به او گفته می&amp;lrm;شود که: دشمن اهل بیت است!!&lt;br /&gt;
در حالی که جایگاه اهل بیت علیهم السلام نزد مسلمانان واضح و روشن است و علما بر وجوب محبت آنها و تبعیت از آنها اتفاق نظر دارند و واقعیت آنها شاهد این امر است.&lt;br /&gt;
ای شیعیان عاقل:&lt;br /&gt;
این كتابها دعوتی است برای هر کس که به محمد بن حسن عسکری ایمان دارد و اشتیاق خروج او را دارد و با زبانش دعای تعجیل فرج را می&amp;rlm;خواند.&lt;br /&gt;
این كتابها هر شیعه&amp;rlm;ای را دعوت به خواندن صفحات آن و تأمل در آن برای رسیدن به حقیقت می&amp;rlm;کند تا در خواب عمیق نمانند. و تا وقتی بیدار نشوند که دیگر وقت گذشته و نامه اعمال انسانها پخش شده باشد.&lt;br /&gt;
این كتابها عقل را دعوت می&amp;rlm;کند تا نشانه&amp;rlm;های این شخصیت را بشناسد تا علتی برای بیداری از خواب زیبا و سنگین باشد...&lt;br /&gt;
این كتابها دعوتی برای پاسخ به این سؤال مهم است که... چه وقت نورت شروع به تابیدن می&amp;lrm;کند ای مهدی منتظر؟&lt;br /&gt;
برادران و خواهران عزیز می توانند با فشار بر روی اسم كتاب آنرا داونلود نمایند:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
بررسى علمى در احادیث مهدى&lt;br /&gt;
آمدن مهدی افسانه است&lt;br /&gt;
مهدی موعود یا مهدی موهوم؟&lt;br /&gt;
عجیب ترین دروغ تاریخ&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادر وخواهر گرامی:&lt;br /&gt;
این آفتاب حقیقت است که از افق سرزده است که تا حقیقتی را برای شما روشن &amp;lrm;کند که نمی&amp;lrm;توانی خود را به نادانی بزنی، پس از الله متعال مى&amp;lrm;خواهیم که ما را به حقیقت هدایت کند و بر آن ثابت قدم نگهدارد. چرا که او قادر بر این کار است و سلام و درود الله بر پیامبر ما محمد صلی الله علیه وآله وسلم و بر آل و خاندان پاک و مطهر و صحابه گرانقدرش.&lt;br /&gt;
خداوندا ما را با آنها محشور گردان، آمین یا رب العالمین.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب حقيقت توحيد از ديدگاه ائمه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/166</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب حقیقت توحید از دیدگاه ائمه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
این كتاب در مورد وحدانیت و یكتا پرستی الله سبحانه و تعالى از دیدگاه ائمه اهل بیت علیهم السلام می&amp;zwnj;باشد، این كتاب مهم&amp;nbsp;&amp;nbsp;تألیف شیخ محمد سالم الخضر و ترجمه استاد بزرگوار شیخ اسحاق دبیری رحمه الله می باشد. در این روزها که شیخ اسحاق دبیری رحمه الله در بین ما نیست با معرفی این کتاب خدمت برادران و خواهران مسلمان یاد او را گرامی می داریم.&lt;br /&gt;
لازم به یادآوریست که این کتاب در حج امسال 1429هـ - 1387 هـ ش به زیور طبع آراسته گردید.&lt;br /&gt;
نویسنده این كتاب جناب شیخ محمد سالم الخضر در مقدمه این كتاب می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ابتدا باید از یكی از بزرگان اهل بیت پیامبر (صلى الله علیه وسلم) كسانی كه بزرگشان می&amp;zwnj;پنداریم و به وسیله محبت آنها خود را به الله تعالى نزدیك می&amp;zwnj;كنیم- تشكر كنم كه به من پیشنهاد كرد رساله&amp;zwnj;ای آراسته به آیات قرآن و احادیث فرموده&amp;zwnj;ی پیشوایان اهل بیت بنویسم چون نفع زیادی برای همه امت در پی دارد پس به خاطر شوقی كه داشتم به درخواست او پاسخ دادم. با وجود اینكه شرم داشتم از اینكه بر كسانی كه از نظر علم و تقوا بر من برتری دارند پیشی گیرم.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;امّا دیدم که سستی من از نوشتن این رساله همان کتمان علم است مخصوصاً هنگامی كه به روایاتی از اهل بیت نبی (صلی الله علیه وآله وسلم) که مخالف ادعای برخی ها که امروزه خود را به آیین و اعتقاد آنها نسبت می&amp;zwnj;دهند آگاهی پیدا کردم.&lt;br /&gt;
براستی که در این زمان فتنه&amp;zwnj;ها پشت سر هم آمده&amp;zwnj;اند. چنانچه اگر کسی كه دارای دلی زنده باشد آنچه را که می&amp;zwnj;بیند و می&amp;zwnj;شنود ناپسند می&amp;zwnj;دارد و از الله سبحانه و تعالى می&amp;zwnj;خواهد که فتنه&amp;zwnj;اش را در دینش قرار ندهد.&lt;br /&gt;
و کدام فتنه بزرگتر از فتنة روی گردانی از آنچه معنی شهادتین &amp;laquo;شهادة أن لا إله إلا الله، و أنَّ محمداً رسول اللهِ&amp;raquo; را حقیقت می&amp;zwnj;بخشد. چه بسیارند کسانی که با علم، دیگران را نسبت به شهادتین در فتنه انداخته&amp;zwnj;اند و چه بسیارند آنهایی که از روی تقلید در آن به فتنه دچار شده&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
در این كتاب روایاتی از اهل بیت نبی صلی الله علیه وسلم که مخالف ادعای برخی ها که امروزه خود را به آیین و اعتقاد آنها نسبت می&amp;zwnj;دهند جمع آوری شده است، باشد كه حقجویان مستفید شوند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;این كتاب را دوستان عزیز در بخش عقیده و ایمان كتابخانه سایت عقیده مطاله نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>یادی از یار</title>
<link>http://qalamlib.com/news/165</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
بسم الله الحمن الرحیم&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;یادی از یار&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;الحَمْدُ لِلهِِ رَبِّ العَالمِینْ، وَالصَّلاَةُ وَالسَّلاَمُ عَلىَ نَبِینّا مُحَمّدٍ &amp;shy;&amp;shy;، وَعَلى آلِهِ وَأصْحَابهِ وَمَنْ دَعَا بِدَعْوَتِهِ إلىَ یَوْمِ الدِّیْن.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قال تعالى:&amp;nbsp;(مِنَ الْمُؤْمِنِینَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَیْهِ فَمِنْهُمْ مَنْ قَضَى نَحْبَهُ وَمِنْهُمْ مَنْ یَنْتَظِرُ وَمَا بَدَّلُوا تَبْدِیلًا) &amp;nbsp;(23 الأحزاب) (از میان&amp;zwnj; مؤمنان&amp;zwnj; مردانی&amp;zwnj; هستند كه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; آنچه&amp;zwnj; با الله بر آن&amp;zwnj; پیمان&amp;zwnj; بسته&amp;zwnj; بودند، صادقانه &amp;zwnj;وفا كردند پس، از آنان&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; هست&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; قرار داد خود را به&amp;zwnj; انجام&amp;zwnj; رسانید و از آنان&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; هست&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; انتظار می&amp;zwnj;كشد و هیچ&amp;zwnj;گونه&amp;zwnj; تغییر و تبدیلی&amp;zwnj; نیاورده&amp;zwnj;اند).&lt;br /&gt;
هنگامی که خواستم درباره ابوعبدالله (شیخ اسحاق دبیری) بنویسم بغض گلویم را گرفت و گریه امانم نداد زیرا امثال شیخ اسحاق دبیری در بین هزاران بلکه صدها هزار یکی پیدا می شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دقیقا به یاد ندارم اما شاید بیشتر از 15 سال قبل بود که توسط بعضی از کتابهای کوچک که بویسله ایشان ترجمه و تألیف شده بود با ایشان آشنا شدم. آنچه از کتابهای ایشان برداشت نمودم این بود که جوانی با احساس و غیرتی دینی در راه خدمت به اسلام گام برداشته است و همین احساس و غیرت و اخلاص و ایمان ایشان بود که با کمک الله متعال در مدت زمانی اندکی او را به نویسنده ای توانا و مترجمی باتجربه تبدیل نمود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نخستین تماس تلفنی من با ایشان در سال 1424هـ ق بود که جهت&amp;nbsp;&amp;nbsp;مشکلی که در امور دعوت پیش آمده بود، به ایشان زنگ زدم و&amp;nbsp;&amp;nbsp;چون شناخت قبلی با ایشان نداشتم یقین نمی کردم که به من جواب مثبت بدهند اما از همان کلمات اولیه که رد وبدل شد پی به شخصیت والا و اخلاق نیکوی ایشان بردم، بعد از احوالپرسی خودم را معرفی کردم و مشکلی را که پیش آمده بود بیان کردم و او رحمه الله با جبینی گشاده وعده همکاری داد و در ظرف مدت کوتاهی آن مشکل را برطرف نمود، از این تواضع و فروتنی و اخلاق والای ایشان کاملا متاثر شدم و بعد از بارها وبارها هرگاه مشکلی پیش می آمد ویا نیاز به همکاری علمی ایشان در امور دعوت احساس می شد بدون معطلی تماس می گرفتم و شیخ رحمه الله هم تا حد توان و حتی بیش از آن هم همکاری می نمود، آنچه که وی را از دیگر&amp;nbsp;&amp;nbsp;علماء &amp;nbsp;و دعوتگران متمایز می ساخت این بود که اگر از ایشان طلب همکاری می کردیم هرگز کلمۀ &amp;quot;کار دارم و یا مشغول هستم&amp;quot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;را نشنیدیم و در اداره یا منزل و حتی گاهی اتفاق افتاده که نیمه های شب نیز با تواضع و خوشرویی و اخلاق اسلامی به تماسها جواب می دادند و مشکلات برادران را حل می کردند. اما كسی كه در ارتباط با سنت &amp;zwnj;ها و قوانین الهی به اندیشه می &amp;zwnj;پردازد در می &amp;zwnj;یابد كه مورد آزمایش واقع شدن یا ابتلا یكی از سنت&amp;zwnj;های مقدر الله متعال است برای بنده ها می باشد. زیرا می &amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;﴿وَلَنَبْلُوَنَّكُمْ بِشَیءٍ مِنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنْفُسِ وَالثَّمَرَاتِ وَبَشِّرِ الصَّابِرِینَ﴾ (البقرة:155).&lt;br /&gt;
&amp;laquo;قطعاً شما را با پاره ای از امور مانند ترس و گرسنگی و زیان مالی و جانی و كمبود میوه (مواد غذایی) مورد آزمایش قرار می&amp;zwnj;دهیم و به صابران مژده بده&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
كسی كه گمان می&amp;zwnj;برد انسان های صالح و پرهیزگار از ابتلاء دور و مصون می&amp;zwnj;مانند در اشتباهند، زیرا مورد آزمایش قرار گرفتن نشانه ایمان است زیرا از رسول الله -صلى الله علیه وآله وسلم- سوال شده كه: &amp;laquo;كدام انسان ها بیشتر مورد ابتلاء قرار می&amp;zwnj;گیرند او پاسخ فرمود:&lt;br /&gt;
پیامبران و پس از ایشان صالحان و پس از آنها كسانی كه بیشتر به ایشان نزدیكند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
هركس به اندازه میزان دینداریش مورد آزمایش قرار می&amp;zwnj;گیرد، اگر در دین او استواری باشد به میزان آزمایش او افزوده می&amp;zwnj;گردد و چنانچه در دینداری او ضعف و نرمی باشد از آن كاسته می&amp;zwnj;شود.&lt;br /&gt;
در واقع ابتلاء، علامت محبت الله متعال در مورد بنده خویش است.&lt;br /&gt;
رسول الله -صلى الله علیه وآله وسلم- فرموده اند:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;وَإِنَّ اللَّهَ إِذَا أَحَبَّ قَوْمًا ابْتَلاهُمْ&amp;raquo;. (أحمد والترمذی)،&lt;br /&gt;
الله هرگاه ملتی را دوست بدارد آنان را مورد ابتلاء قرار می&amp;zwnj;دهد.&lt;br /&gt;
شیخ اسحاق دبیری رحمه الله هم از جمله این انسانهای صالح بود، الله متعال او را به مشکلات گوناگونی مبتلا کرده بود که می توان از مهاجرت و آوارگی&amp;nbsp;&amp;nbsp;و دوری از خانواده و وطن &amp;nbsp;گرفته تا بیماری&amp;nbsp;&amp;nbsp;سرطان که شیخ رحمه الله به آن مبتلا شده بودند یاد کرد اما ایشان به این فرموده رسول گرامی اسلام -صلى الله علیه وآله وسلم-&amp;nbsp;&amp;nbsp;یقین كامل داشتند آنجا كه می&amp;zwnj;فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;laquo;مَا مِنْ مُسْلِمٍ یصِیبُهُ أَذًى شَوْكَةٌ فَمَا فَوْقَهَا إِلا كَفَّرَ اللَّهُ بِهَا سَیئَاتِهِ كَمَا تَحُطُّ الشَّجَرَةُ وَرَقَهَا &amp;raquo; (متفق علیه).&lt;br /&gt;
هیچ مسلمانی نیست كه بخاطر فرورفتن خار یا بیشتر از آن دچار اذیت و درد شود مگر آنكه الله همچون ریزش برگ درختان آنها را كفاره گناهانش می&amp;zwnj;گرداند.&lt;br /&gt;
واین ایمان ویقین را هر كه با شیخ رحمه الله دیدار می نمود احساس می كرد.&lt;br /&gt;
اما اولین دیدار من با شیخ رحمه الله در 24 رمضان 1429هـ ق بود یعنی تقریبا 5 ماه قبل، در آن روزها شیخ شدیدا بیمار بودند اما وقتی با ایشان روبرو شدم اصلا فراموش کردم که ایشان بیمار هستند آثار بیماری در ایشان دیده نمی شد با لبخندی محبت آمیز مرا در آغوش گرفتند، انگار که سالهاست همدیگر را می شناسیم&amp;nbsp;&amp;nbsp;راست گفته اند که (إن الأرواح جنود مجندة ) این درحالی بود که مدتها قبل از این دیدار با ایشان مدیریت سایت عقیده&amp;nbsp;&amp;nbsp;www.aqeedeh.com را به من سپرده بودند. و از نکات جالبی که در این دوران احساس کردم این بود که هیچوقت به من امر نکردند که این کار را این طور انجام بده&amp;nbsp;&amp;nbsp;و یا چرا فلان کار را آنطور انجام داده ای؟ بلکه اگر گاهی می خواستند نکته ای را یادآوری نمایند به این شکل عنوان می کردند که (نظرتان چیست که فلان مسأله اینطور شود) كه این برخورد &amp;nbsp;ایشان منتهای اخلاق اسلامی و ادب رفیع ایشان را نمایان می کرد.&lt;br /&gt;
و از نکات مهمی که در زندگی&amp;nbsp;&amp;nbsp;احساس کردم خسته نشدن ایشان در&amp;nbsp;&amp;nbsp;امور دعوت بود، کم می خوابیدند و بیشتر اوقات خود را صرف تحقیق ترجمه و مراجعه کتب می نمودند و پربارترین روزهای زندگی شیخ رحمه الله&amp;nbsp;&amp;nbsp;از نگاه تألیف و ترجمه زمانی بود كه ایشان به شدت بیمار بودند و حتى نمی توانستند به اداره بروند به همین دلیل همه وقت خود را صرف کارهای علمی می کردند.&lt;br /&gt;
دومین دیدار من با شیخ رحمه الله در ایام حج سال 1429هـ ق بود&amp;nbsp;&amp;nbsp;در این دیدار وضعیت جسمانی شیخ بهتر شده بود و احساس آرامش بیشتری می کردند، از ایشان خاطرات فراموش نشدنی از زیارت مسجد النبی صلی الله علیه وآله وسلم و شهدای احد و مسجد قباء دارم، در این دیدار که مدت یک هفته دوام کرد بیشتر با شیخ رحمه الله از نزدیک آشنا شدم&amp;nbsp;&amp;nbsp;و توجه و اهتمام بیش از حد ایشان را در امور دعوت ملاحظه نمودم&amp;nbsp;&amp;nbsp;و بعد از این دیدار محبت من به شیخ دوبرابر شد و همیشه به بهانه های مختلف به ایشان زنگ می زدم و جویای حالشان می شدم.&lt;br /&gt;
آخرین تماس با ایشان در شبی بود که فردایش&amp;nbsp;&amp;nbsp;دارفانی را وداع گفتند... حالشان بهتر شده بود و احساس نشاط می کردند اما:&lt;br /&gt;
نشان مرد مؤمن با تو گویم &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;چو مرگ آید تبسم برلب اوست&lt;br /&gt;
آری این نشاط و احساس آرامش از نزدیکی وصال بود، این نشاط و آرامش از نزدیکی سفر از جهان فانی با همه رنجها و غمهایش به سرای باقی و جاوید با همه آرامش و نعمتهایش بود.&lt;br /&gt;
آری شیخ اسحاق دبیری ما را تنها گذاشت و رفت اما یاد او&amp;nbsp;&amp;nbsp;و راه او برای همیشه تا دنیاست زنده و جاوید خواهد بود یاد و خاطره او با نوشته هایش و آثار گرانبهایش در خاطر هر مسلمان زنده است.&lt;br /&gt;
سلام به تو ای ابو عبدالله، سلام به تو که زندگیت را فدای عقیده ات کردی، سلام به تو که الگو و سرمشقی برای داعیان مخلص دین حق بودی، بدان که برادرانت راهت را ادامه خواهند داد و نخواهند گذاشت پرچمی را که تو برافراشتی به زمین بیافتد.&lt;br /&gt;
مدیر سایت عقیده&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ</title>
<link>http://qalamlib.com/news/164</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify; margin-left: 0cm; margin-right: 0cm; margin-top: 0cm; margin-bottom: 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;color: blue; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;صبح&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;امروز دوشنبه 21 صفر 1430هـ.ق برابر با 28/11/1387هـ ش&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt; عالم رباني و دانشمند و نويسنده برجسته اهل سنت و جماعت ایران &lt;span style=&quot;color: blue;&quot;&gt;شيخ إسحاق بن عبدالله بن محمد دبيري العوضي&lt;/span&gt; دار فاني را وداع گفت.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ایشان در سال 1962میلادی در روستای بلغان از توابع لارستان استان فارس در جنوب ایران دیده به جهان گشود.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;و بعد از اکمال مراحل ابتدایی و دبیرستان در دانشگاه اسلامی مدینه منوره مشغول تحصیل علوم شرعی شد و در سال 1408هـ ق از دانشکده حدیث و علوم اسلامی بدرجه لیسانس فارغ التحصیل گردید. ایشان به دلیل اشتیاق شدیدی که به آموختن علوم اسلامی داشت وارد معهد (&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-size: 10.5pt; color: black; line-height: 200%; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;انستیتوت&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;) عالى آموزش ائمه و دعوتگران در مكه مكرمه شده و در سال 1412هـ ق مدرک فوق لیسانس را بدست آورد. ایشان ازدواج نموده و دارای چهار دختر و سه پسر می باشند.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ایشان یکی از دعوتگران مخلص و از جمله علمای بزرگ اهل سنت و نویسنده ای توانا و مترجمی چیره دست در عصر حاضر محسوب می گردید. &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;شیخ دبیری رحمه الله در مسیر دعوت و خدمت به اسلام و مسلمین ده ها کتاب تألیف نموده و همچنین تعداد زیادی از کتابهای عربی در زمینه های مختلف را به زبان فارسی ترجمه کرده است که مجموع آن به بیش از 500 کتاب میرسد و بسیاری از اين كتابها به زیور طبع آراسته گردیده است که در وب سایت رسمی ایشان &lt;/span&gt; &lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;color: blue; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;http://www.aqeedeh.com&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;در دسترس مسلمانان فارسى زبان مي باشد.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify; margin-left: 0cm; margin-right: 0cm; margin-top: 0cm; margin-bottom: 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?wriID=36&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;لینک تألیفات شیخ اسحاق دبیری رحمه الله&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify; margin-left: 0cm; margin-right: 0cm; margin-top: 0cm; margin-bottom: 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?transID=7&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;لینک کتبی که شیخ اسحاق دبیری رحمه الله ترجمه نموده&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify; margin-left: 0cm; margin-right: 0cm; margin-top: 0cm; margin-bottom: 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;همچنین ده ها کتاب ایشان از جمله ترجمه قرآن کریم بزودی آماده نشر می شود.&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;همجنین ایشان به عنوان مجری برنامه های دینی در رادیوی عربستان سعودی فعالیت می کرد که صدای گرم ایشان در برنامه های &amp;quot;سراب شبهات در شاهراه حقیقت&amp;quot; و &amp;quot;اسلام و خانواده&amp;quot;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;و &amp;quot;اسلام و زندگی&amp;quot; و &amp;quot;حقوق انسان در اسلام&amp;quot; &lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;آرام بخش دلهای ميليونها مسلمان فارسي زبان بود.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;جناب شيخ اسحاق دبيري رحمه الله تمام نمای اخلاق اسلامی و رفتار اسلامی به شمار می رفت، به همه احترام می گذاشت، جامع بودن و پرهیز از تنگ نظری در مسایل دینی و شرعی و فکری، رمز بزرگ موفقیت اهل دین به شمار می&amp;rlm;رود به همين دليل ايشان حتى به مخالفين خود با احترام برخورد مي كرد و به دعوت عشق می ورزید حتى در زمانیکه به مرض خطرناك سرطان نيز مبتلا بود هرگز امور دعوت و بخصوص تألیف و ترجمه را رها نکرد و بار ها از ایشان شنیده شده که می فرمود: &lt;span style=&quot;color: blue;&quot;&gt;کار و خدمت در راه دین آرام بخش روح و روان من می باشد.&lt;/span&gt; &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;از خصوصیات بارز این رادمرد مبارز دلسوز بودن برای دین و دعوت به سوی الله متعال بود تا جایی که از اموال شخصی &lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;خود در راه امور دعوت مصرف می نمود و حتی از قرض گرفتن در جهت مصارف امور دعوت دریغ نمی کردند. &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;این توجه و اخلاق نيكوى ايشان نمونه ای ارزنده از یک انسان مؤمن و مجاهد است که به عقيده و ارزشهاى اسلامي ارج مي نهد حقا كه ايشان شاگرد راستین مکتب عقیدۀ توحید بود.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;برخی از نزدیکان شیخ ذکر میکنند که شیخ همیشه در برابر مشکلات با آرامش و خونسردی برخورد نموده و مسائل را حل میکرد و در سخت ترین موقعیت از زیر بار مشکلات شانه خالی نمی کردند.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;یکی از دوستان شیخ ذکر میکنند که: وقتی که حال ایشان خیلی وخیم میشد به ایشان میگفتیم استراحت کنید، میگفتند راحتی من در کار دعوت است، من روی تخت بیمارستان آرامش ندارم و همه اش به فکر ترجمه و تألیف هستم.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;یکی دیگر از همکاران شیخ میگویند: روزی شیخ بیش از حد بیمار بودند و به زحمت سخن بر زبان جاری میکردند و کار ضروری پیش آمد با ایشان تماس گرفتیم و درخواست همکاری کردیم ایشان در نیمه شب بلند شده و مشکل را حل کردند تا جایی که از تماس با ایشان پشیمان شدیم.&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;color: red; font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;اداره سایت عقیده رحلت اين شخصيت برجسته و عالم بزرگوار را به&amp;zwnj; خانوادۀ گرامی و بازماندگان ایشان، جامعه اهل&amp;zwnj;سنت ایران و تمامی مسلمانان فارسی زبان جهان تسليت گفته و از الله متعال براي ايشان بهشت برين، رفع درجات و غفران الهي مسئلت دارند و همچنین اداره سایت عقیده با پروردگار متعال جل جلاله تعهد می کند که در راه دعوت و دفاع از رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم و اهل بیت مطهر و اصحاب مکرم ایشان رضوان الله علیهم اجمعین راه شیخ اسحاق دبیری رحمه الله و دیگر علمای مبارز اهل سنت را ادامه خواهد داد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify; margin-left: 0cm; margin-right: 0cm; margin-top: 0cm; margin-bottom: 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;quot;&lt;span style=&quot;color: blue;&quot;&gt;اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ، وَارْحَمْهُ، وَعَافِهِ، واعْفُ عَنْهُ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهُ، وَوَسِّعْ مُدْخَلَهُ، وَاغْسِلْهُ بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ، وَنَقِّهِ مِنَ الْخَطَايَا كَمَا يُنَقَّى الثَّوْبُ الأَبْيَضُ مِنَ الدَّنَسِ، وَأَبْدِلْهُ دَارًا خَيْرًا مِنْ دَارِهِ، وَأَهْلا خَيْرًا مِنْ أَهْلِهِ، وَزَوْجًا خَيْرًا مِنْ زَوْجِهِ، وَأَدْخِلْهُ الْجَنَّةَ، وَأَعِذْهُ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ عَذَابِ النَّارِ&lt;/span&gt;&amp;quot;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;line-height: 200%; text-align: justify; margin-left: 0cm; margin-right: 0cm; margin-top: 0cm; margin-bottom: 10pt&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;(بار الها! او را ببخش، و بر او رحم كن، و عافيت نصيبش بگردان، و از گناهانش بگذر. الهى! و او را گرامی بدار، و قبرش را وسيع بگردان، و او را با آب و برف و تگرگ بشوى، و از گناهان، چنان پاكش بگردان كه لباس سفيد از آلودگى، پاك و تميز می شود. پروردگارا! به او خانه اى بهتر از خانه&amp;rlm; اش، و خانواده &amp;rlm;اى بهتر از خانواده &amp;rlm;اش، و همسرى بهتر از همسرش، عنايت بفرما، و او را وارد بهشت كن، و از عذاب قبر و دوزخ پناهش ده).&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب نقش اسلام در جلوگيري از گدايي</title>
<link>http://qalamlib.com/news/163</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب نقش اسلام در جلوگیری از گدایی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اسلام به شدت دربرابر گدایی مبارزه می كند وآن را یكی ازاسباب ذلت،خواری وسرافگندگی برای غیرخدا می داند، واین كارمنافی عقیده توحید است،كه بواسطه آن مسلمانان سربلندگردیده اند،دین مقدس اسلام رضایت ندارد،كه مسلمانان به خواری تن دردهند،بعدازآن،كه خداوند آنهارا به اسلام عزت وكرامت بخشیده آن هادست خودرا به گدایی بدیگران درازكنند،بدست آرندویاخیر. روی هم رفته گدایی یك امرنامناسب وزشت است؛ زیرا ازآن احسان كردن ومنت گذاشتن بمیان می آید. دست بلند وتواناازدست ناتوان ونادار بهتر است،اگرحرفه به هراندازه بی اهمیت وكم ارزش باشدنزد اسلام بهتروشریف تر ازگدایی وتلخی محتاجی است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام شافعی(رحمه الله علیه)می فرماید:&amp;zwnj;چگونه بغیرخداجل جلاله خودرا ذلیل سازم، درحالی كه پارچه نانی مرا كفایت می كند؛ وهمچنان می فرماید:&amp;zwnj;اگرسنگها را ازقله های كوه انتقال دهم بهتر است ازآن كه مردم برمن احسان كنندومنت گذارند، برایم گفتندكه كسب وكارننك است، درپاسخ آنها گفتم:&amp;zwnj;نه خیر ننگ درسوال كردن وگدایی است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گدایی مشكل عارضی است، كه درجوامع بوجود میایدومشكلی نیست كه حل آن امكان پذیرنباشد،حل این مشكل بسیارساده وآسان است، مشروط به این كه، نیت سالم باشد وباعزم راسخ وكوشش جدی، میتوان آن را حل نمود واین كارزمانی تحقق می پذیرد ، كه فرد و جامعه&amp;nbsp;&amp;nbsp;به دساتیر اسلام عملاًگام بردارند،علاج مثمروفیصله كن بدست اسلام است ومیتوان ازاین راه ازآثاربدنتایج نامیمونش به سهولت رهائی یافت، دین مقدس اسلام عزم انسانی را تقویت بخشیده همتش را بالامی برد وراجع به كسب وكارنظر ویژه دارد ونمی خواهد كه آبروی كسی دراثرسوال وگدایی كردن بریزد وذلت وخواری به اوبرسد، اسلام درپهلوی آن كه ازطمع وآزمندی مردم را باز میدارد،گدایی را نیزنیكوهش می كند، به كارتشجیع می نماید، ولوعملی باشدكه آنرا مردم حقیر می شمارند. دین مقدس اسلام عواقب سوالگری را بد دانسته وآن را سبب عذاب درقیامت قلمداد كرده است، چنانچه عبدالله بن عمر رضى الله عنه ازپیامبر اسلام صلی الله علیه وسلم روایت كرده است كه فرمودند:&amp;zwnj;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;انسانیكه ازمردم سوال وگدایی میكنددر روزقیامت درحالتی با خداوندجل جلاله روبرومی شودكه دررویش پارچه گوشت هم نمی باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;گدایی تعداد زیادی را بدون دلیل معقول معطل وبیكار میسازد درحالیكه ملت به كارآنها نیاز دارند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;گدایی دلیل تاخیر، پشیمانی ومانع پیشرفت وتقدم ولانه فساد برای&amp;nbsp;&amp;nbsp;انتشارجرایم وجنایات، مصدر ومنشأشرارت، بی قانونی و بی امنیتی است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان می توانند&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتاب نقش اسلام در جلوگیری از گدایی را از بخش علمى و اجتماعى كتابخانه سایت عقیده بدست آورند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>ترجمه فارسی ریاض ‌الصّالحین</title>
<link>http://qalamlib.com/news/162</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 0pt; direction: rtl; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;دو ترجمه فارسى ریـاضُ &amp;zwnj;الصّــالحـیـن&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;برادران وخواهران مسلمان! حدیث شریف را&amp;nbsp;&amp;nbsp;ـ در طول تاریخ اسلام ـ پیروان پیامبر&amp;nbsp;&amp;nbsp;بزرگ اسلام صلى الله علیه وآله وسلم و حافظان و محدثان و عالمان دین وی، گرد آورده و حفظ کرده و نوشته و سنجیده و تنظیم و تبویب کرده و منتشر ساخته و اینچنین و با مشقت زیاد، به مردمان پس از خود رسانده&amp;zwnj;اند. اثر این حدیث آسمانی در زندگی مسلمانان نقطا مختلف جهان، چنان آشکار است که اکنون هم با وجود همه&amp;zwnj;ی تغییر و تحولات قرن&amp;zwnj;های اخیر ـ که عقاید و زندگی مسلمانان را هم تحت تأثیر قرار داده است ـ هنوز آثار و شواهد حدیث پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم را در فرهنگ و آداب و رسوم و زندگی و رفتار مسلمانان می&amp;zwnj;توان یافت و نشان داد و هر مسلمان اهل اندیشه&amp;zwnj;ای که با حدیث آشنایی دارد، قادر است که نشانه&amp;zwnj;های حدیث را در طی ریشه&amp;zwnj;یابی عقاید و رفتارها و آداب ملت خود، بیابد و علت بعضی باورها و رسوم پدر بزرگان و مادربزرگان خود را بداند.&lt;br /&gt;
یکی از کتاب&amp;zwnj;هایی که مجموعه&amp;zwnj;ای ضروری از این احادیث را در خود دارد، کتاب ارزشمند &amp;laquo;ریاض&amp;zwnj;الصالحین&amp;raquo; نوشته&amp;zwnj;ی &amp;laquo;امام یحیی بن شرف نووی&amp;raquo; از علما و محدثان و زاهدان و مفتیان قرن هفتم هجری است که از دیرباز، مورد توجه و اقبال علمای دین و زاهدان و بقیه&amp;zwnj;ی مسلمانان بوده است.&lt;br /&gt;
اكنون كتابخانه عقیده افتخار دارد كه دو ترجمه گرانبها از کتاب ریاض الصالحین را خدمت دوستداران سنت نبوی صلى الله علیه وآله وسلم تقدیم نماید نخستین ترجمه:&lt;br /&gt;
در دو جلد ترجمۀ استاد احمد حواری نسب ابوسعید رحمه الله با تقریظِ استاد شادروان برهان&amp;zwnj;الدّین حمدی و مقدّمه&amp;zwnj;ای از استاد دکتر وهبه زُحیلی و بازنویسی، ویرایش و مقابله: محمدمهدی چوری و عثمان نقشبندی است که شما میتوانید با فشار دادن بر لینکهای ذیل این دو جلد را داونلود نمایید:&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;ریاضُ&amp;zwnj;الصّالحین&amp;nbsp;&amp;nbsp;در سخنان پیامبر امین صلى الله علیه وآله وسلم جلد1&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;ریاضُ&amp;zwnj;الصّالحین&amp;nbsp;&amp;nbsp;در سخنان پیامبر امین صلى الله علیه وآله وسلم جلد2&lt;br /&gt;
و دومین ترجمه:&lt;br /&gt;
&amp;middot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;ترجمه فارسى ریاض الصالحین&lt;br /&gt;
مجموعه گرانمایه احادیث پیامبر بزرگ اسلام صلى الله علیه وآله وسلم&lt;br /&gt;
تألیف: أبی زكریا یحیى بن شرف نووى دمشقى شافعى و ترجمه: عبدالله خاموش هروى می باشد که در یک جلد ترجمه شده است&lt;br /&gt;
امیدواریم الله سبحانه وتعالی به همۀ مسلمانان توفیق پیروی از قرآن کریم و سنت نبوی صلى الله علیه وآله وسلم را عنایت فرماید.&lt;br /&gt;
سروران گرامی می توانند این دو ترجمۀ گرانبها را در بخش سنت نبوی صلى الله علیه وآله وسلم کتابخانۀ عقیده مطالعه نمایند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ إزالة الخفاء عن خلافة الخلفاء - در 4 جلد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/161</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ إزالة الخفاء عن خلافة الخلفاء - در 4 جلد&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مؤلف محترم كتاب محدث هند شاه ولی الله دهلوی رحمه الله در مقدمه این کتاب نفیس می فرماید:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اما بعد میگوید فقیر حقیر ولی الله عفی عنه كه در این زمانه بدعت تشیّع آشكار شد ونفوس عوام به شبهات ایشان متشرّب گشت و اكثر اهل این اقلیم در اثبات خلافت خلفای راشدین رضوان الله تعالی علیهم اجمعین شکوك بهم رسانیدند، لاجرم نور توفیق الهی در دل این بنده ضعیف علمی را مشروح و مبسوط گردانید تا آنكه بعلم الیقین دانسته شد كه اثبات خلافت این بزرگواران اصلی ست از اصول دین تا وقتی كه این اصل را محكم نگیرند هیچ مسئله از مسائل شریعت محكم نشود؛ زیرا&amp;nbsp;&amp;nbsp;كه اكثر احكامی كه در قرآن عظیم مذكور شده مجمل است، بدون تفسیر سلف صالح بحل آن نتوان رسید. و اكثر احادیث خبر واحد محتاج بیان، بغیر روایت جماعه ی از سلف آنرا و استنباط مجتهدان از آن متمسَّك به نگردد و تطبیق احادیث متعارضه بدون سعی این بزرگواران صورت نگیرد و همچنین جمیع فنون دینیه مثل علم قراء ة، تفسیر، عقائد و علم سلوك بغیر آثار این بزرگواران متاصّل نشود و قدوه سلف در این امور خلفای راشدین است و تمسك ایشان بأذیال خلفاء.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;أخرج ابن ماجه عن جابر رضی الله عنه قال قال رسول الله صلی الله علیه وسلم: &amp;quot;إذا لَعَنَ اخر هذه الامّهِ اَوَّلَهَا فَمن كَتَمَ حدیثاً فقد كتم ما اَنزَل اللهُ عزوجل&amp;quot; بناءً علی ذلك ورقی چند درین مسئله نوشته شد و به ازالة الخفاء عن خلافة الخلفاء مسمی گشت و بر دو مقصد منقسم كرده آمد (تقسیم شد).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مقصد اول&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در بیان معنی خلافت عامه و خاصه و شرط آن و آنچه متعلق بآن است و سردِ ادله بر خلافت ایشان و حل اختلاف اهل در میان خویش كه خلافت بنص بود یا باجتهاد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مقصد ثانی&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در مآثر خلفای اربعه وهذا أوان الشروع فی المقصود، وبنور توفیقه اتمسّكُ وعلی فضله اتوكلُ والی كِلایته وحفظه كلَّ امرٍ اُفوّض حَسبُنا الله ونعمَ الوكیلُ ولا حولَ ولاقوهَ الا بالله العلیِّ العظیم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>بانوان نمونه عصر  پيامبر صلی الله علیه وآله وسلم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/160</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتابِ بانوان نمونه عصر پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اصلاح وضعیت اسلام معاصر تنها با پیروی از همان روشی که مسلمانان صدر اسلام بر آن بودند میسر خواهد شد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بررسی تاریخ اسلامی به طور عام و تاریخ مردان و زنان صحابی به طور خاص، گام بزرگی را در راه انتخاب و گزینش امت اسلامی، به نمایش می&amp;zwnj;گذارد؛ زیرا این امر زن مسلمان را بیدار می&amp;zwnj;کند تا بار دیگر برخیزد و غبار غفلت را کنار نهد تا مجد و بزرگی&amp;zwnj;هایش را برگرداند و بار دیگر برگردد تا همه جهان را به خیر دنیا و آخرت هدایت نماید.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اصحاب و یاران پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم بهترین نسلی هستند که تمام بشریت آن را شناخته است، و پس از پیامبران و رسولان ـ درود و سلام خداوند بر آنان باد! ـ بهترین مردمان هستند. قومی که خداوند، آنان را برای مصاحبت و همراهی پیامبرش برگزیده است. آنان از همه مردمان، قلبی نیکوتر و فکری عمیق&amp;zwnj;تر داشتند و از همه بی&amp;zwnj;آلایش&amp;zwnj;تر بودند. آیندگان باید فضل و برتری گذشتگان و پیشینیان را بشناسند، به دلیل اینکه ما در روزگاری زندگی می&amp;zwnj;کنیم که زنان الگو و صالح نداریم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;به همین خاطر نوشتن درباره&amp;zwnj; این بزرگان و کنار زدن پرده از صفحات روشنی که بر پیشانی تاریخ با نور نوشته&amp;zwnj;اند، از واجباتی است که این عصر بر ما لازم گردانیده، عصری که ما در اختلاف افکار و ناسازگاری موازین و دوستی با کافران بسیار به چشم می&amp;zwnj;خورد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همه این&amp;zwnj;ها بدین خاطر است که امت اسلامی از منبع عزت و سرچشمه شرف و یاریگر کرامتش دور شده است، در نتیجه خداوند این امت را ذلیل و خوار نموده است ... در حالی که وقتی اصحاب پیامبر محبوب صلی الله علیه وآله وسلم راه و روش صحیح و مطابق قرآن و سنت را پی گرفتند، خداوند آنان را عزیز و موفق گرداند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اینک ما از خلال این سطور، همراه با باقیمانده بوی خوش زندگی و روش زنان صحابی ـ خداوند از آنان راضی باد! ـ سفر می&amp;zwnj;کنیم. سفری که جای جای آن به عطر دل انگیز این بزرگواران معطر شده است، کسانی که کتاب&amp;zwnj;های سیرت را با سیرت مبارکشان عطرآگین نموده&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هر زن صحابی به مثابه گُلی است که در مزرعه اسلام می&amp;zwnj;روید، و هنگامی که این گل با ابر ایمان بیاید آبیاری شود، آنگاه آن گُل پاک را می&amp;zwnj;بینی که از خلال دو چشمه صاف ـ یعنی قرآن و سنت پیامبر صلی الله علیه وآله وسلم ـ تغذیه می&amp;zwnj;شود. و آن موقع عطر و بوی خوش آن پراکنده شده تا همه هستی پر از عطر ایمان و توحید شود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ زندگی حضرت علی رضي الله عنه - ویژه‌ نوجوانان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/158</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتابِ زندگی حضرت علی رضي الله عنه - ویژه‌ نوجوانان&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;1-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; اولین کودکی بود که مسلمان شد و با پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم نماز گزارد.&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;2-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم شب هجرت او را در بستر خود نهاد و وی را مسئول کرد تا امانت‌های مشرکین را پس دهد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;3-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; در سال دوم هجرت پیغمبر صلى الله عليه وآله وسلم دخترش فاطمه رضی الله عنها را به عقد نکاح او در آورد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;4-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; تا فاطمه رضی الله عنها زنده بود زن دیگری را عقد نکرد، فاطمه رضی الله عنها شش ماه بعد از رحلت رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم فوت کرد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;5-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; وقتی که مسلمان شد ده سال داشت و موقع هجرت بیست و دو ساله بود، هنگام رحلت پیامبر صلى الله عليه وآله وسلم سی و سه سال داشت و زمانی که به شهادت رسید شصت و سه سال از عمر شریفش می‌گذشت. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;6-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; در بیست و پنجم ماه ذی الحجه 35 هجری به خلافت رسید. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;7-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; جنگ جمل با ام المؤمنین عایشه رضی الله عنها در ماه جمادی سال 36 هجری رخ داد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;8-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; جنگ صفین با معاویه رضي الله عنه در سال 37 هجری بود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;9-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; جنگ نهروان با خوارج در سال 38 هجری پیش آمد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;10-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; در کوفه در شب هفدهم ماه رمضان سال چهلم هجری به شهادت رسید. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;11&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;- مدت خلافتش چهار سال و هشت ماه و بیست و دو روز بود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;12-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; بعد از فوت فاطمه رضی الله عنها با هشت زن ازدواج نمود و چند ام ولد نیز داشت. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;13-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; بیست و نه فرزند داشت: چهارده پسر و پانزده دختر.&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;14-&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; نسل او از طریق فرزندان حسن و حسین و محمد بن حنیفه و عباس و عمررضي الله عنهم ادامه یافت.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;برادران و خواهران محترم مي توانند اين كتاب را در بخش &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=589&quot;&gt;اهل بيت رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم &lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;در كتابخانه عقيده مطالعه نمايند.&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>شيعه و بيت المقدس</title>
<link>http://qalamlib.com/news/157</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;شیعه و بیت المقدس&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
فضیلت، مقام و منزلت بیت المقدس را خداوند متعال در قرآن کریم ذکر نموده است و همچنین پیامبر ص در اقوال گرانبهایش آنرا بیان فرموده&amp;zwnj;اند و مورد قبول امت اسلامی قرار گرفته، پس یک حقیقت و واقعیت مسلم است که از آن نمی&amp;zwnj;توان چشم پوشید و در آن، جایی برای مناقشه و جدال نبوده و نیست.&lt;br /&gt;
فضیلت، مقام و منزلت بیت المقدس به نص قول خداوند متعال در قرآن کریم ثابت شده است و همچنین پیامبر ص در اقوال گرانبهایش آنرا بیان فرموده اند و امت اسلامی هم با اتفاق آنرا قبول نموده اند، پس یک حقیقت و واقعیت مسلم است که از آن چشم پوشی شده نمی تواند و در آن برای مناقشه و جدال جا نبوده و نیست.&lt;br /&gt;
از اینرو وقتی ما در بارة بیت المقدس می نویسیم، شاید مورد توجه خوانندة عزیز قرار نگیرد چون چیزی که عیان است حاجت به بیان نیست، مگر ما باور کامل داریم، هرگاه خوانندة گرامی این مقاله را مطالعه نماید و حقایق پوشیده برایش آشکار شود و از حجم و پیمانة فریب کاری کسانیکه مدعی نصرت بیت المقدس و سرزمین آن بوده اند و خود را علم برداران دفاع از مستضعفین اهل فلسطین و مقدسات آن می شمارند، آگاهی حاصل کند، در آنوقت آنچه ما در این کتاب ذکر کرده ایم، برایش جالب و خواندنی خواهد بود و ما را حق بجانب خواهد یافت.&lt;br /&gt;
ما لازم دیدیم از منزلت و مکانت بیت المقدس دفاع شود، و باید به همگان گوشزد شود که دیدگاه شیعه در باره بیت المقدس مخالف و مغایر با دیدگاه مسلمانان است، در کتابها و منابع معتمد شیعه و در دستخط های شان به صراحت و وقاحت از مقام و منزلت آن کاسته شده و از موقعیت فعلی آن انکار نموده تصریح می نمایند که منظور و مقصود از بیت المقدس مسجدی در آسمان است و مردم در وهم و خیال قرار گرفته و می گویند که در قدس واقع است!!&lt;br /&gt;
ما تا حدی کوشش نمودیم تا اینگونه مزاعم و ادعاهای بی بندبار را بدون رد رها نکرده خباثت و دروغ آن را خنثی و برملا نماییم، تا به همگان حجم و پیمانة فریب و توطئه های این دروغ بافان که کوشش دارند آنرا در مؤلفات خود پنهان نمایند کشف و آشکار شود. و مسروریم با قلم خویش در کشف حقایق و دور نمودن پرده ها از آن سهمی داشته باشیم.&lt;br /&gt;
و الحمدلله از لابلای پژوهش و بررسی خویش مصدر فتنه ها را کشف نمودیم و اینرا به اثبات رسانیدیم که هرکس منزلت و فضیلت بیت المقدس را مورد سؤال قرار داده و در آن شک و شبهه را ایجاد کرده مانند یهود و خاورشناسان و غیره دشمنان قسم خورده مسلمانان، از منابع شیعیان که حاوی افتراءات است، چون شمشیر بران برای خدشه دار ساختن عقیدة مسلمانان و تشکیک مقام بیت المقدس در قلوب مسلمانان، استفاده نموده اند.&lt;br /&gt;
بیت المقدس در کجاست؟&lt;br /&gt;
این عنوان کتاب یک علامه شیعی بنام جعفر مرتضی العاملی است.&lt;br /&gt;
در این کتاب چنین آمده است: &amp;laquo;برای ما چندین حقیقت راجع به بیت المقدس آشکار شده که به تأکید بر آن دارد که بیت المقدس در فلسطین نیست&amp;raquo;!!.&lt;br /&gt;
وی از کتاب های معتمد سیرت و تفسیر شیعه روایات زیادی را نقل کرده که مهر تأیید را بر صحت تأویلات آن راجع به الإسراء زده است و دال بر این است که بیت المقدس در آسمان می باشد.&lt;br /&gt;
و وی تصریح نموده که بیت المقدس مسجدی در آسمان بوده!! و آنچه را مردم معتقدند کو گویا در قدس است، درست نیست!!.&lt;br /&gt;
و در کتابش بنام &amp;laquo;الصحیح من سیرة النبی الأعظم&amp;raquo; مدعی است:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;وقتی عمر داخل بیت المقدس شد، اصلا مسجدی در آنجا وجود نداشت، که آن هم به أقصی مسمی باشد&amp;raquo; (الصحیح من سیرة النبی الأعظم (3/137)، چاپ پنجم هجری-2006عیسوی، المرکز الإسلامی للدراسات.)؛&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;بعد از تألیف این کتاب نه اینکه مورد انتقاد بخاطر تأویلات باطل اش مبنی براینکه أقصی در آسمان است، قرار نگرفت بلکه&amp;nbsp;&amp;nbsp;احمدی نژاد شخصا از او استقبال کرد و حایز جایزة کتاب ایران هم شد!.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;laquo;و بیت المقدس که اسراء بآنطرف صورت گرفته و خداوند پیرامون آنرا با برکت ساخته، در آسمان می باشد&amp;raquo; !!. (الصحیح من سیرة النبی الأعظم (3/106).)&lt;br /&gt;
العاملی در جای دیگری از کتابش بازهم افزوده است: &amp;laquo;بیت المقدس مسجدی که بسویش اسراء واقع شده و خداوند پیرامونش را با برکت ساخته، آن مسجد در آسمان است&amp;raquo;. الصحیح من سیرة النبی الأعظم (3/128، 129).&lt;br /&gt;
و هنگامی که دیدگاههای را که در مورد دو بار فساد نمودن یهود در زمین که در سوره الإسراء ذکر شده، نقل نموده تأکید می کند: هرکس گفته که بیت المقدس در قدس است، ادعای محض است و می افزاید: اینها اظهارات و ادعاهای محض، بی دلیل و غیر مؤثق است که گویا مراد از بیت المقدس همان مسجدی الأقصی که در قدس فعلا وجود دارد، باشد... الصحیح من سیرة النبی الأعظم (3/128، 129)..&lt;br /&gt;
العاملی از روایات زیرین برای به اثبات رساندن مدعای خویش استفاد برده است:&lt;br /&gt;
در اثبات ادعای شان مبنی بر موقعیت بیت المقدس در آسمان:&lt;br /&gt;
در کتاب بحار الأنوار از مجلسی (بحاو الأنوار للمجلسی (22/90).) آمده است: &amp;laquo;عن أبی عبدالله علیه السلام قال: سألته عن المساجد التی لها الفضل فقال: المسجد الحرام، و مسجد النبی، قلت: والبیت المقدس جعلت فداک؟ فقال: ذاک فی السماء، إلیه أسری برسول الله، فقلت: إن الناس یقولون إنه بیت المقدس؟ فقال: مسجد الکوفه أفضل منه&amp;raquo;!!&lt;br /&gt;
از أبی عبدالله علیه السلام روایت است که گفت: از فضیلت مساجد از او پرسیدم، فرمود: مسجد الحرام، و مسجد رسول الله، گفتم: و بیت المقدس فدایت شوم؟ فرمود: در آسمان است که پیامبر بسوی آن برده شد، گفتم: مردم می گویند، آن مسجد بیت المقدس است؟ فرمود: مسجد کوفه از آن افضل است&amp;raquo;!!&lt;br /&gt;
سؤالی مطرح می شود، آیا به آنچه العاملی مدعی است از دیدگاه شیعه سخنان نوپیداست!! یا اینکه عقیدة راسخ آنهاست؟! پس به تفاسیر آنها مراجعه می کنیم تا ببنیم، بیت المقدس در کجاست؟!&lt;br /&gt;
منزلت بیت المقدس در تفاسیر شیعه:&lt;br /&gt;
1- تفسیر الصافی:&lt;br /&gt;
در تفسیر الصافی از فیض کاشانی چنین آمده است:&lt;br /&gt;
سُبْحَانَ الَّذِی أَسْرَى بِعَبْدِهِ لَیْلًا مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِی بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِیَهُ مِنْ آَیَاتِنَا إِنَّهُ هُوَ السَّمِیعُ الْبَصِیرُ (سوره الإسراء: 1.):&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;یعنی در ملکوت بیت المقدس که در آسمان است، طوریکه از روایات و اخبار آشکار می شود&amp;raquo;. (تفسیر الصافی، الفیض الکاشانی (3/166)، مؤسسة الأعلمی للمطبوعات.) و در ادامة سخنانش این روایت را ذکر کرده است: قمی از باقر روایت می کند که هنگامی او (باقر) در مسجد الحرام نشسته بود یکبار بسوی آسمان نگاه کرد و بار دیگر بسوی کعبه سپس این آیت: سُبْحَانَ الَّذِی أَسْرَى بِعَبْدِهِ لَیْلًا مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِی بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِیَهُ مِنْ آَیَاتِنَا إِنَّهُ هُوَ السَّمِیعُ الْبَصِیرُ (سوره الإسراء: 1.)&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;را سه بار این تکرار کرده بعد از آن بسوی اسماعیل الجعفی نگاه کرده گفت: &amp;laquo;چه می گویند اهل عراق در بارة این آیت، ای عراقی؟&lt;br /&gt;
گفت: آنها می گویند: - پیامبر - از مسجد الحرام به بیت المقدس برده شده، فرمود: آنطور نیست که آنها می گویند، بلکه برده شده از این به این، و به دست خود بسوی آسمان اشاره کرده فرمود: در بین ایندو حرم است. (تفسیر الصافی، الفیض الکاشانی (3/166)، مؤسسة الأعلمی للمطبوعات.)&lt;br /&gt;
2- تفسیر نور الثقلین:&lt;br /&gt;
تفسیر نور الثقلین از حویزی است، وی در آغاز تفسیر سوره الإسراء به نقل روایات گذشته پرداخته است تا بر تمسک خود بر آنها تأکید ورزد. از سالم الحناط و او از یک مرد و او از أبی عبدالله علیه السلام روایت کرده اند، گفت: از فضیلت مساجد از او پرسیدم، فرمود: مسجد الحرام، و مسجد رسول الله، گفتم: و بیت المقدس فدایت شوم؟ فرمود: آن در آسمان است که بسوی آن پیامبر برده شده، گفتم: مردم می گویند، آن مسجد بیت المقدس است؟ فرمود: مسجد کوفه از آن افضل است&amp;raquo;!!. (تفسیر نور الثقلین، عبد علی الحویزی، تصحیح و تعلیق هاشم المحلانی (3/97)، الطبعه الأولی 1424ﮪ، دار التفسیر- قم (ایران).&lt;br /&gt;
و حویزی در ادامه می افزاید: در تفسیر علی بن ابراهیم، برایم خالد از حسن بن محبوب و او از محمد بن یسار و او از أبی مالک ازدی و او از اسماعیل الجعفی، گفت: در مسجد نشسته بودم و ابو جعفر در گوشة دیگری بود، یکبار سر خود را بالا کرده بسوی آسمان نگاه کرد و بار دیگر بسوی کعبه نگاه کرد و گفت: &amp;laquo; سُبْحَانَ الَّذِی أَسْرَى بِعَبْدِهِ لَیْلًا مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِی بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِیَهُ مِنْ آَیَاتِنَا إِنَّهُ هُوَ السَّمِیعُ الْبَصِیرُ (سوره الإسراء: 1.)&amp;raquo;، و سه بار آنرا تکرار کرد، سپس بسوی من نگاه کرده گفت: چه میگویند اهل عراق در بارة&amp;nbsp;&amp;nbsp;این آیت ای عراقی؟ گفتم، می گویند: برده شده - پیامبر - از مسجد الحرام به بیت المقدس، گفت: نیست چنانکه می گویند، بلکه او از این به این برده شده و به دست خود به آسمان اشاره کرد و گفت در میان ایندو حرم است. (تفسیر نور الثقلین (3/98).)&lt;br /&gt;
3- تفسیر العیاشی:&lt;br /&gt;
العیاشی در تفسیر اولین آیت سوره الإسراء روایتی را که تأکید بر موقعیت مسجد اقصی در آسمان می کند، ذکر کرده و چنین گفته است: &amp;laquo;از سالم خیاط و او از یک مرد و او از أبی عبدالله ؛ روایت کرده است، گفت: پرسیدمش از مساجدیکه دارای فضیلت هستند؟ فرمود: مسجد الحرام، و مسجد الرسول ص، گفتم: و مسجد اقصی فدایت بگردم؟ فرمود: آن در آسمان است که پیامبر بسویش برده شد، گفتم، مردم می گویند که او بیت المقدس است؟&lt;br /&gt;
گفت: مسجد کوفه از آن افضل است. (تفسیر العیاشی، لمحمد ابن عیاش السلمی السمرقندی، تحقیق هشام المحلانی (2/302)، الطبعه الأولی1411ﻫ-1991ﻤ، مؤسسه الأعلمی للمطبوعات.&amp;nbsp;&amp;nbsp;)&lt;br /&gt;
4- البرهان فی تفسیر القرآن:&lt;br /&gt;
بحرانی نیز در البرهان فی تفسیر القرآن روایتی را که در تمامی تفاسیر شیعه تکرار شده، ذکر کرده است و همچنین طباطبایی در تفسیر المیزان همین روایت را که گویا بیت المقدس در آسمان است آورده است. &amp;laquo;از سالم خیاط و از یک مرد و او از أبی عبدالله ؛ روایت کرده است، گفت: پرسیدمش از مساجدیکه دارای فضیلت هستند؟ فرمود: مسجد الحرام، و مسجد الرسول ص، گفتم: و مسجد اقصی بگردم فدایت؟ فرمود: آن در آسمان است که پیامبر بسویش برده شد، گفتم، مردم می گویند که او بیت المقدس است؟ گفت: &amp;laquo;مسجد کوفه از آن افضل است&amp;raquo;. (البرهان فی تفسیر القرآن، لهاشم البحرانی (4/522) الطبعه الأولی، 1419ﮪ-1999ﻤ، مؤسسه الأعلمی للمطبوعات.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;)&lt;br /&gt;
5- بیان السعاده:&lt;br /&gt;
سلطان الجنابذی در کتاب &amp;laquo;بیان السعادة فی مقامات العبادة&amp;raquo; اقوال زیرین را راجع به اولین آیت سوره الإسراء جمع آوری نموده: &amp;laquo; سُبْحَانَ الَّذِی أَسْرَى بِعَبْدِهِ لَیْلًا مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِی بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِیَهُ مِنْ آَیَاتِنَا إِنَّهُ هُوَ السَّمِیعُ الْبَصِیرُ (سوره الإسراء: 1.) &amp;raquo;؛ الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِی بَارَكْنَا حَوْلَهُ &amp;nbsp;که در بیت المقدس است و یا بسوی بیت المقدس که در بیت المعمور در آسمان چهارم است، بیت المقدس مظهر بیت المعمور بوده و بیت المعمور ملکوت آن چنانکه مسجد الحرام مظهر بیت المعمور است و بیت المعمور ملکوت آن می باشد&amp;raquo;. (بیان السعاده فی مقامات العباده، سلطان الجنابذی، الملقب بسلطان علی شاه (2/431) الطبعه الثانیه 1408ﻫ- 1988ﻤ،مؤسسه الأعلمی للمطبوعات)&lt;br /&gt;
و سلطان الجنابذی در تفسیر این آیه گفته است: &amp;laquo;در حول بیت المقدس شام و مصر واقع است که هر دو از بابت هرگونه نعمتها بر دیگر کشورها برتری دارند و بیت المعمور که در آسمان چهارم قرار دارد معلومدار است که پیرامون آن برکات وافر وجود دارد&amp;raquo;. (بیان السعاده (2/431).&lt;br /&gt;
از لابلای آنچه گذشت در میابیم که سخن در بسیاری از تفاسیر شیعه دال بر آن است، مسجدی که پیامبر بسوی آن برده شده در آسمان و در بیت المعمور و به بیت المقدس مسمی بوده که نام شبیه به نام مسجد قدس است.&lt;br /&gt;
و حالا یکجا با خوانندة گرامی بر گوشة دیگری از منابع معتمد شیعه مکث می کنیم تا حقیقت و موقعیت بیت المقدس را در معتقدات آنان دریابیم؟!&lt;br /&gt;
موقعیت بیت المقدس در منابع شیعه&lt;br /&gt;
کدام فرق و تفاوتی در میان منابع روایتی شیعه و آنچه در تفاسیر شان ذکر است به چشم نمی خورد، با وجود آنهم اینک موقعیت بیت المقدس را از بارزترین منابع شیعه برایتان نقل می نمایم.&lt;br /&gt;
1- بحار الأنوار:&lt;br /&gt;
مجلسی روایت می کند: &amp;laquo;از أبی عبدالله علیه السلام روایت است که گفت: از مساجدیکه فضیلت دارند پرسیدمش، فرمود: مسجد الحرام، و مسجد پیامبر، گفتم: و بیت المقدس فدایت گردم؟ گفت: آن در آسمان است، بسوی آن پیامبر برده شده، گفتم، مردم می گویند که آن مسجد در بیت المقدس است، گفت: مسجد کوفه از آن افضل تر است&amp;raquo;. بحار الأنوار، لمحمد باقر المجلسی (97/405) الطبعه الثالثه 1403ﻫ- 1983ﻤ، دار إحیاء التراث العربی&lt;br /&gt;
2- منتهی الآمال:&lt;br /&gt;
در کتاب منتهی الآمال از عباس قمی آمده است: &amp;laquo;مشهور اینست که بیت المقدس بیت المقدس است، مگر از لابلای بسیاری از احادیث هویدا می گردد که مراد از بیت المقدس بیت المعمور بوده که در آسمان چهارم واقع است و آن از جملة دور ترین مسجد می باشد&amp;raquo;. (منتهی الآمال لعباس القمی ص 70.)&lt;br /&gt;
3- کامل الزیارات:&lt;br /&gt;
ابن قولوبه در کتاب کامل الزیارات از أبی عبدالله الصادق علیه السلام روایت کرده است که گفت: مردی نزد أمیر المؤمنین علیه السلام در مسجد کوفه آمد و گفت: السلام علیک أی امیر المؤمنین ورحمت الله و برکاته، امیر المؤمنین جواب سلام او را داد، سپس آن مرد گفت: فدایت گردم من ارادة مسجد اقصی را دارم، و خواستم بر شما سلام گفته سپس خدا حافظی نمایم، امیرالمؤمنین علیه السلام برایش گفت: چه چیز را خواستی؟ گفت: فضیلت را، فدایت گردم، امیر المؤمنین گفت: پس شتر و توشه ای خود را بفروش و در این مسجد نماز بخوان، چون اداء نمودن نماز فرضی در این مسجد حج مبرور، و اداء نمودن نماز نافله عمرة مبرور است. و برکت در آن تا مسافه دوازده میل وجود دارد. طرف راست آن سعادت و برکت است و چپ آن کید و مکر است و در وسط چشمه ای از روغن و چشمة از شیر و چشمة از آب، نوشیدنی و چشمة از آبی، که پاک است برای مؤمنان، وجود دارد. از آن کشتی نوح حرکت کرده است و در آن نسر و یغوث و یعوق وجود داشتند، و هفتاد نبی در آن نماز خوانده اند و هفتاد وصی که یکی ار آنها منم نماز ادا کرده ایم، و ادامه داده در حالیکه دستش به سینه، گفت هیچ رنج دیده ای حاجتی از حوائج خود را نخواسته مگر آنکه خداوند آنرا اجابت کرده و اندوهش را به راحتی مبدل ساخته است&amp;raquo;. (کامل الزیارات ص80، و بحار الأنوار (97/404)، و فروع الکافی لأبی جعفر الکلینی (3/491).&lt;br /&gt;
4- الصحیح من سیرة الرسول الأعظم:&lt;br /&gt;
جعفر العاملی در کتاب الصحیح من سیرة الرسول الأعظم تأکید کرده که بیت المقدس در آسمان است و برای مدعای خود حدیثی جعلی را به پیامبر منسوب نموده که نه سند آن درست است و نه متن آن صحت دارد. که گویا پیامبر فرموده اند: &amp;laquo;لما أسری بی إلی السماء إذا علی العرش مکتوب: لا إله إلا الله محمد رسول الله، أیدته بعلی علیه السلام&amp;raquo; الصحیح من سیرة الرسول الأعظم (3/101).&lt;br /&gt;
&amp;laquo;وقتی بسوی آسمان برده شدم دیدم که در بالای عرش نوشته بود لا إله إلا الله محمد رسول الله، او را به علی علیه السلام قوت و تقویت دادم &amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و در کتاب خویش بنام &amp;laquo;بیت المقدس در کجاست&amp;raquo;؟ برای تأویلات غلط خود به روایات زیرین استدلال نموده: &amp;laquo;بسیار ساده و بسیط!، کلمة اقصی در لغت به معنای دور است و بهترین شاهد در این مورد قرآن کریم، با بلاغت عالی خود، می باشد. خداوند متعال می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;laquo; سُبْحَانَ الَّذِی أَسْرَى بِعَبْدِهِ لَیْلًا مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِی بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِیَهُ مِنْ آَیَاتِنَا إِنَّهُ هُوَ السَّمِیعُ الْبَصِیرُ (سوره الإسراء: 1.) &amp;raquo; و معنای الإسراء، حرکت در شب را گویند خواه افقی باشد یا عمودی، و الأقصی بمعنای دور است، پس اگر فرض کنیم که بیت المقدس بیت المقدس باشد پس از اهل حجاز دور، مگر به اهل شام نزدیک است... باید اقصی از تمام مردم یکسان دور باشد. ازینرو در احادیث و روایات گذشته تأکید کردیم که بیت المقدس در آسمان چهارم و در بیت المعمور قرار دارد&amp;raquo;!!.&lt;br /&gt;
5- الکافی:&lt;br /&gt;
در روایت کافی آمده است: پس برایش گفتم، خبر شده ام که اسمی از اسمای خداوند متعال در نزد توست که بوسیلة آن هر روز و شب به بیت المقدس میروی و بخانه باز میگردی، برایم گفت: و آیا بیت المقدس را میشناسی؟ گفتم: نمیشناسم بجز بیت المقدسی که در شام است. گفت: بیت المقدس نه بلکه البیت المقدس است و آن خانه آل محمد می باشد. گفتم: اما من تا امروز که بیت المقدس شنیده ام. سپس گفت: آنجا محراب های انبیاء بوده و برایش حظیرة المحاریب می گفتند. تا اینکه زمان انقطاع بین محمد و عیسی علیهماالسلام فرا رسید، &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;و اهل شرک به بلاها و آفات دچار شدند و غضب و بدبختی ها در مقرها و اقامتگاهای شیاطین فرو ریخت پس آنها هم تحویل و تبدیل و نقل را در اسماء آوردند&amp;raquo; الکافی للکلینی (1/481).&lt;br /&gt;
6- علل الشرائع:&lt;br /&gt;
در کتاب علل الشرائع با سندی از علی بن سالم و او از پدرش و او از ثابت بن دینار روایت نموده که گفت: از زین العابدین علی بن الحسین بن علی بن أبی طالب علیهم السلام پرسیدم، آیا خداوند به&amp;nbsp;&amp;nbsp;مکان وصف می شود، فرمود: پاک و منزه است از این، گفتم: پس چرا فرستادة او &amp;nbsp;به آسمان برده شد. فرمود: تا برایش ملکوت آسمانها و آنچه در بین آنها از عجایب و شگفتی ها وجود دارد نشان بدهد.&amp;nbsp;&amp;nbsp;علل الشرائع، محمد بابویه القمی (1/160) الطبعه الأولی 1408ﮪ- 1988ﻤ، مؤسسه الأعلمی للمطبوعات بیروت &amp;ndash; لبنان.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;7- المصباح فی الأدعیة و الصلوات و الزیارات:&lt;br /&gt;
در پاورقی دعاء معراج در کتاب المصباح فی الأدعیه و الصلوات و الزیارات از تقی الدین الکفعمی چنین ذکر شده است.&lt;br /&gt;
&amp;laquo;این دعای عظیم الشأن را امیر المؤمنین از پیامبر گرامی روایت نموده که خلاصة آن این است: &amp;laquo;وقتی به آسمان برده شدم، پرده ها را یکی بعد دیگرش پاره می می کردم تا اینکه هفتاد هزار پرده را قطع نمودم، که فاصله میان هر دو پرده هفتاد هزار بار از شرق تا غرب بود&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;المصباح فی الأدعیه و الصلوات و الزیارات و الأحراز و العوذات، لتقی الدین إبراهیم بن علی العاملی الکفعمی المتوفی 900ﻫ، صححه&amp;nbsp;&amp;nbsp;أشرف علی طباعته حسین الأعملی ص363. الطبعه الثانیه 1424ﮪ- 2003ﻤ، مؤسسه الأعلمی للمطبوعات، بیروت- لبنان.&lt;br /&gt;
8- تفصیل و سائل الشیعه:&lt;br /&gt;
بوب محمد بن الحسن الحر العاملی متوفای سال 1104ﮪ ، مؤلف کتاب &amp;laquo;تفصیل وسائل الشیعه إلی تحصیل مسائل الشریعه&amp;raquo; می باشد که بابی را در کتاب خویش به &amp;laquo;وجوب احترام مکه، مدینه و کوفه و استحباب سکونت در این جاها و صدقه دادن و نماز خواندن بسیار و تمام نمودن سفر بآنجاها، اختصاص داده است. (تفصیل و سائل الشیعه إلی تحصیل مسائل الشریعه، تألیف محمد بن الحسن الحر العاملی (14/360) الطبعه الأولی 1413ﻫ- 1993ﻤ، تحقیق مؤسسه أل البیت علیهم السلام لإحیاء التراث- بیروت- لبنان.)&lt;br /&gt;
و در آن باب روایاتی را هم جعل نموده که گویا &amp;laquo;مکه حرم خداوند تعالی است، و مدینه حرم رسول الله است، و کوفه حرم امیر المؤمنین علی است، هیچ مستبدی قصد رویدادی را در آن نکند مگر اینکه خداوند او را قطع کند&amp;raquo;!!&lt;br /&gt;
و روایات جعلی ذیل را نیز در کتاب خود ذکر نموده است:&lt;br /&gt;
محمد بن علی بن الحسین در (معانی الآثار) از پدر شان، و او از محمد بن یحیی و او از احمد بن محمد بن خالد و او از أبی عبدالله الرازی و او از الحسن علی بن أبی عثمان، و او از موسی بن بکر و او از أبی الحسن موسی بن جعفر و او از اجداد خود علیهم السلام روایت کرده گفت: پیامبر فرمودند: خداوند چهار شهر را از میان شهرها انتخاب کرده است، و فرموده است: وَالتِّینِ وَالزَّیْتُونِ وَطُورِ سِینِینَ وَهَذَا الْبَلَدِ الْأَمِینِ (التین 1-3) ، التین یعنی مدینه، والزیتون یعنی بیت المقدس، و طور سینین یعنی کوفه، و هذا البلد الأمین (سوگند به این شهر ایمن) یعنی مکه. تفصیل وسائل الشیعه (14/361).&lt;br /&gt;
و از أبی جعفر علیه السلام روایت است که گفت: امیر المؤمنین علیه السلام در بارة این آیت، وَآَوَیْنَاهُمَا إِلَى رَبْوَةٍ ذَاتِ قَرَارٍ وَمَعِینٍ - سوره المؤمنون: 50.&lt;br /&gt;
فرمودند: &amp;laquo;الربوه&amp;raquo; یعنی کوفه و &amp;laquo;القرار&amp;raquo; یعنی مسجد، و &amp;laquo;المعین&amp;raquo; یعنی فرات&amp;raquo;. تفصیل وسائل الشیعه (14/362).&lt;br /&gt;
فضیلت مساجد کوفه بر سه مسجد در نزد شیعه&lt;br /&gt;
علاوه بر اینکه در نزد شیعه مسجد کوفه بر بیت المقدس برتریت دارد، روایاتی دیگری نیز در نزد شان دال بر افضلیت و برتریت مسجد کوفه بر تمام مساجد جز کعبه شریفه، وجود دارد. و بر مبنای ادعای آنها کوفه مکانی است که خداوند در آن برکت نازل فرموده، و عبادتگاه ملائکه قبل از خلقت آدم بوده است، بعد از آن عبادتگاه آدم علیه السلام قرار گرفته سپس عبادتگاه تمام انبیاء و مرسلین و اولیا و صدیقین بوده است!! و به تحقیق در قسمت وسط آن باغی از باغهای جنت است که از آنجا مخلوق در روز قیامت حشر می شوند!!&lt;br /&gt;
و عجیب تر از این، مسجد کوفه از جملة سه مسجدی است که بسوی آنها عزم سفر به نیت عبادت جائز می باشد!!.&lt;br /&gt;
و ادعای شانرا روایاتی زیرین در کتابهای شان تأیید می کند:&lt;br /&gt;
شیخ صدوق در الخصال روایت کرده است که: &amp;laquo;لا تشد الرحال إلا إلی ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، و مسجد رسول الله، و مسجد الکوفه&amp;raquo;!! کامل الزیارات، ص137&lt;br /&gt;
&amp;laquo;عزم سفر -به نیت عبادت- جز سه مسجد به هیچ جای دیگری جایز نیست، مسجد الحرام و مسجد پیامبر و مسجد کوفه&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و شیخ صدوق همچنین در کتاب خویش &amp;laquo;من لا یحضره الفقیه و الخصال، با سندی از امیر المؤمنین علیه السلام روایت کرده که گفت: &amp;laquo;عزم سفر -به نیت عبادت- جز سه مسجد به هیچ جای دیگری جایز نیست، مسجد الحرام و مسجد پیامبر و مسجد کوفه&amp;raquo;. الوسائل (3/525).&lt;br /&gt;
مسجد کوفه، طوریکه از روایات باطل درج شده در کتابهای معتمد شان آشکار می گردد، از فضیلت و جایگاه ویژه ای در نزد آنها برخوردار بوده که به مراتب از بیت المقدس بیشتر است. و اینک به ذکر برخی از آن روایات می پردازم:&lt;br /&gt;
کلینی در کتابش الکافی با سندی از خالد الفلانسی روایت کرده که گفت: از أبا عبدالله صادق علیه السلام شنیدم که می گفت: &amp;laquo;یک نماز در مسجد کوفه برابر به هزار نماز است&amp;raquo;!!. (الوسائل (3/547).)و از حسان بن مهران روایت است که گفت: امیر المؤمنین علیه السلام فرمود: (مکه حرم الله، و المدینه حرم رسول الله، والکوفه حرمی لا یریدها جبار بحادثه إلا قصمه الله) (تفصیل وسائل الشیعه (14/360).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;مکه حرم خداوند است، و مدینه حرم رسول الله و کوفه حرم من است، هیچ مستبدی ارادة رویدادی را در آن نکند مگر خداوند او را قطع کند&amp;raquo;. و در روایت دیگری آمده است: به تحقیق کوفه حرم خداوند و حرم رسولش و حرم امیر المؤمنین است، و یک نماز در آن برابر به هزار نماز، و یک درهم، برابر به هزار درهم است&amp;raquo;، کامل الزیارات صفحه 73-74.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;و همچنین در روایت دیگری: &amp;laquo;برای خداوند حرمی است و آن مکه است، و برای رسولش حرمی است و آن مدینه، و برای امیر المؤمنین حرمی است کوفه، و برای ما حرمی است، قم. و در آنجا از فرزندم زنی دفن می شود بنام فاطمه، هرکس او را زیارت کند جنت برایش واجب می گردد&amp;raquo;!!. بحار الأنوار (102/267).&lt;br /&gt;
کربلا برتر از کعبه و بیت المقدس است!!.&lt;br /&gt;
عادتا شیعیان اماکنی را مقدس می پندارند که در قرآن و سنت پیامبر مقدس بودن آن قطعا ثابت نمی باشد. از جمله مقدس کردن کربلا، خصوصا قبر حسین رضی الله عنه؛ فعن أبی عبدالله قال: &amp;laquo;إذا أردت الحج و لم یتهیأ لک، فائت قبر الحسین فإنها تکتب لک حجة، و إذا أردت العمرة و لم یتهیأ لک فائت قبر الحسین فإنها تکتب لک عمره&amp;raquo; وسائل الشیعه (10/332).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;از أبی عبدالله روایت است که فرمود: اگرخواستی حج کنی و برایت مهیا نشد، پس به قبر حسین بیا، و به تأکید برایت یک حج نوشته می شود، و اگر خواستی عمره کنی و برایت مهیا نشد پس به قبر حسین بیا، به تأکید یک عمره برایت نوشته می شود&amp;raquo;. و در بحار الأنوار ذکر شده است که: خداوند بیست و چهار هزار سال قبل از اینکه سرزمین کعبه را خلق کند و آنرا حرم قرار دهد، سرزمین کربلا را حرم آمن و مبارک قرار داده بود. پس کربلا همانطوریکه قبل از خلق کردن مخلوقات، مقدس و مبارک بوده بهمان منوال فعلا هم مقدس است تا اینکه خداوند آنرا بهترین سرزمین و بهترین محل سکونت برا اولیاء در جنت قرار دهد&amp;raquo;. بحار الأنوار (101/107).&lt;br /&gt;
علاوة بر اینهمه دروغ پراکنی ها، غلو و افراط رافضه به حدی رسیده که کربلاء را بر بیت الله ترجیح داده اند و معتقد هستند که فضیلت زیارت کردن قبر حسین بر حج بیت الله بیشتر است. از أبی عبدالله روایت شده که گفت: کسیکه قبر حسین را در روز عرفه زیارت کند، خداوند برایش-اجر- هزار هزار حج را همرای قائم علیه السلام و هزار هزار&amp;nbsp;&amp;nbsp;عمره را همرای پیامبر و اجر رهایی هزار رقیق، و هزار اسب پر بار در راه خداوند متعال را برایش نوشته و داده می شود و او را بندة راستگو که به لقاء خداوند ایمان دارد مسمی میسازد، و ملائکه گویند: فلان راستگو است که&amp;nbsp;&amp;nbsp;خداوند او را از فوق عرش خود پاک و منزه گردانیده و در روی زمین به حزین مسمی شده می باشد&amp;raquo; وسائل الشیعه (10/360)&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;علاوتا زیارت قبر حسین در نزد آنها نه تنها از حج برتری داشته بلکه از بهترین و با فضیلت ترین أعمال محسوب می شود.&lt;br /&gt;
طوریکه در روایت دیگری ذکر است که: محبوبترین أعمال، زیارت قبر حسین است&amp;raquo; (کامل الزیارات ص146، بحار الأنوار (101/49).).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;و مجلسی در کتابش بابی را بهمین عنوان اختصاص داده و مجموعه ای از اینگونه روایات را ذکر کرده است. (و هو بعنوان: &amp;laquo;باب أن زیارته علیه السلام من أفضل الأعمال&amp;raquo;، بحار الأنوار (101/49).&lt;br /&gt;
و شیخ ایشان فیض کاشانی در تقریظ روایاتی که فضیلت زیارت قبر حسین را بیان کرده، گفته است: این- فضائل- چیزی بسیار نیست، برای کسیکه خداوند او را امام مؤمنین گردانیده، و بخاطر او آسمانها و زمین ها را خلق کرده، و او را راه و وسیلة خود و ناظر و نشانة خود قرار داده و او را دری که از آن اعطا می کند و ریسمانی میان خود و بنده گانش، از جمله پیامبران و انبیاء و حجت الله ها و اولیاء، قرار داده. و مقابر ایشان امور ذیل را در بر دارد: مصرف اموال، امید و آرزوها، نارام کردن اجسام، هجران وطن، تحمل مشقت ها، تجدید عهد و پیمان، حضور در طقوس و حضور برهم رساندن در اماکن مقدسه&amp;raquo;. (الوافی المجلد الثانی(8/224).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;واینبود ذکر مختصری از فضائل مسجد کوفه و کربلا در نزد شیعه و بخاطر اینکه سخن به درازا نکشد به همین قدر اکتفا می کنم و برای معلومات بیشتر می توانید به کتابهای فقهی، مزارات و اخبار شیعة امامیه مراجعه نمایید.&lt;br /&gt;
واقعیت اینست که بنی امیه بیت المقدس را ترمیم و بازسازی کرده اند و در قدس و ماحول آن پروژه های عمرانی را برپا نمودند و پیشرفتهای در این زمینه داشته اند، که برای شیعه قابل برداشت نبود چون آنها کینه، کدورت و عداوت شدیدی را بر ضد بنی امیه در قلبهای شان می پروراندند، که همین یکی از انگیزه های اساسی است که شیعه را وادار ساخت از فضیلت بیت المقدس بکاهند و در مقابل اماکن دیگری را بر آن ترجیح داده فضائل بسیاری را بآن اماکن قائل شوند. بالآخره غلو و افراط شان به حدی شدت گرفت که حتی مقدسات ساخته گی شانرا از مساجد سه گانه &amp;ndash; که شد الرحال به نیت عبادت بسوی شان اجر دارد- ترجیح داده، به آنها فضیلت و تفوق بیشتر بخشیدند.&lt;br /&gt;
و سعی نمودند تا زهر بپاشند و آنچه نزد اهل سنت و جماعت ثابت است مورد توهین و تحقیر قرار بدهند و در فضائل بیت المقدس که در قرآن کریم و سنت نبوی ثابت است شکوک را ایجاد کنند!!&lt;br /&gt;
بدیهی است، چرا چنان نکنند! جای تعجب نیست، چگونه بیت المقدس در نزد شیعه فضیلت و منزلت اعلی داشته باشد؟ وقتی فاتح آن&amp;nbsp;&amp;nbsp;عمر الفاروق رضی الله عنه باشد. و آزاد کنندة آن از صلیبی ها صلاح الدین ایوبی باشد و برای سالیان متمادی منارة علم و علماء اهل سنت بوده باشد!!.&lt;br /&gt;
با در نظرداشت تمام روایات ذکر شده، با وجود آنهم تصریح کرده می توانیم که در دیدگاه های علماء شیعه در قبال بیت المقدس و منزلت آن و موقعیت آن که در آسمان است و یا در زمین، مغایرت و دگرگونی های آشکارا به چشم میخورد، زیرا برخی از علماء ایشان امثال طوسی در &amp;laquo;الخلاف&amp;raquo; و &amp;laquo;الحلی&amp;raquo; در کتاب &amp;laquo;تحریر الأحکام&amp;raquo; و همچنین در &amp;laquo;تذکرة الفقهاء&amp;raquo; تأکید کرده اند که بیت المقدس در فلسطین است و حتی فضائل آنرا یکایک بیان داشته اند مگر جمهور علماء شیعه بر برتریت و تفوق مسجد کوفه و فضیلت آن بر بیت المقدس اتفاق نظر دارند.&lt;br /&gt;
اظهارات شیعیان معاصر در بارة موقعیت و منزلت بیت المقدس&lt;br /&gt;
تصریحات و اظهارات شیعه در کاهش دادن از مقام و منزلت بیت المقدس از هم متفاوت است زیرا هر کدام به نوبة خود سعی ورزیده تا برای مقدسات خویش جایگاه ویژه ای را که ما فوق بیت المقدس باشد، برگزیند البته مقامی که سه مسجد &amp;ndash; که عزم سفر به نیت عبادت تنها بسوی آنها جائز است- به آن رسیده نتواند. و اکنون برای خوانندة عزیز اظهارات برخی از آنان را نقل می کنم:&lt;br /&gt;
کربلا پیش از قدس!!&lt;br /&gt;
در سرمقالة یکی از شماره های مجلة المنبر تحت عنوان &amp;laquo;پیش از قدس...کربلا را آزاد کنید&amp;raquo; چنین آمده است: &amp;laquo;... در حقیقت کربلاء مقدس ترین منطقة با شکوه در روی زمین است، حتی برتر از مکه و مدینه، البته با استناد به اظهارات معصومین که در این زمینه تصریح کرده اند زیرا کربلا شرف و قداست خود را، از آغوش گیری جسد امام أبی عبدالله حسین که خون پاک او با ذرات ریگ آن دیار مخلوط شده است، کسب کرده است. پس به شرفی نائل گردیده که مانند ندارد ازینرو به کعبة آزادگان، و هدف و غایت هواداران و مقصود هر حاجتمند و فقیر مبدل شده است. نویسنده در ادامه می افزاید: &amp;laquo;قدس علاوه بر اینکه دارای قداست، شرف و منزلت است مگر بآنهم در ردیف دوم، بعد از کربلا قرار دارد، پس نیست قدس مانند کربلا و نه صخره مانند حسین، و نه مسجد مانند حرم است... و قدس قضیه اولی&amp;nbsp;&amp;nbsp;ما نیست... قضیه کربلا در اولویت قرار دارد و قضیه اساسی ما می باشد. و قبل ازینکه قدس را آزاد سازیم، لازم است اول کربلا را آزاد کنیم، و از آنجا به فلسطین برویم و از آنجا با مشعل فروزان نور و هدایت بسوی سایر کشورها در حرکت شویم...&amp;nbsp;&amp;nbsp;(این مقاله قبل از سقوط عراق به دست اتحاد صلیبی رافضی نوشته شده است)&amp;nbsp;&amp;nbsp;قبلا هم بیان کردیم که بازگشت قدس به پیکر این امت امکان پذیر نیست تا این امت به محمد و علی علیهما السلام باز نگردد&amp;raquo;!! و همچنین می افزاید: &amp;laquo; باز گردید به محمد و علی... برمیگردد به شما قدس با مهدی... و آزاد کنید کربلا را اولا و قبل از همه، سپس در بارة قدس و غیره باندیشید&amp;raquo;!! (مجله المنبر، عدد23، فی محرم، 1423ﻫ- مارس 2002ﻤ)&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
قبة سامراء مهمتر از آزادی قدس است&lt;br /&gt;
پس از تفجیر قبة سامراء در عراق یاسر الحبیب شیعی در یک سخنرانی که در لندن ایراد نموده بود در بارة رویداد مذکور چنین گفت: &amp;laquo;حرم عسکری شریف غصب و سلب گردید و به ویرانه مبدل شد و تا این لحظه اجساد امامان معصوم در زیر خاکها مانده اند و فعلا این حرم شریف در چنگال نواصب &amp;ndash; سنی ها- افتاده است، پس آیا کمک کنندة است که این خاکها را دور کند؟ این حرم باید دوباره مسترد گردد، و استرداد حرم فعلا در اولویت قرار گرفته و اهمیت استرداد آن بیشتر از استرداد قدس است. استرداد این حرم در نزد خداوند بسیار بزرگ است!! و جسد امام معصوم بزرگتر از آن صخره است ولو که رسول الله هم از آن به آسمان صعود کرده باشد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
بلندی مقام و منزلت سامرا و بقیع نسبت به قدس در نزد شیعه&lt;br /&gt;
برخی از واعظین شیعه اهتمام سیاستمداران و رهبران سیاسی خود را در قبال قضیة قدس مورد انتقاد شدید قرار داده، تأیید نمی کنند و آنرا مقاصد سیاسی محسوب می کنند.&lt;br /&gt;
از متون کتابهای شیعه معلوم می شود که دیدگاههای شیعیان در قبال منزلت قدس موجب اختلاف در میان شان شده است، چون آنها اهتمام شانرا به معضله قدس بر موارد سیاسی ارتباط می دهند نه عقیدوی!!.&lt;br /&gt;
یاسر الحبیب نوشته است: &amp;laquo; مؤمنان باید توجه و التفات شان را به سرزمین مقدس هرچه بیشتر معطوف دارند، زیرا اماکن مقدسه در شرف و قداست از بیت المقدس برتری دارند، و اصلا امکان مقایسه میان شان وجود ندارد، پس بر کدام اساس شرعی اینهمه هیاهوی و تحرکات مردمی شیعیان بخاطر قضیه قدس برپا شده؟ و آنهم به گونه ایکه تصور میرود قدس قضیه ای است که در اولویت مان قرار دارد؟! هرگز نه!.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;ما با وجود اهتمامی که به قضیه ای قدس شریف داریم مگر مطابق به اساسات و میزان شرعی باید اولویت به قضیه سامراء مقدس و بقیع الغرقد داده شود، سپس به قدس و غیره جاها توجه کنیم. باید در قدم اول سامرا و بقیع از چنگ نواصب- اهل سنت- آزاد شوند سپس آزادی قدس از چنگ یهود، و عجب است به شیعیان مؤمن که چگونه از این حقایق و واقعیتها غافل اند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
انجمنهای &amp;laquo;یا حسین&amp;raquo;... مقام و منزلت الأقصی را مشکوک می سازد&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;انجمنهای موسوم به یا حسین که در شبکه جهانی انترنت فعالیت می کنند. نویسندة از روش جالبی کار گرفته سؤالی را که بیت المقدس در کجاست؟ عنوان موضوع خود قرار داده و بدینوسیله آنرا در میان خوانندگان مطرح ساخته بود که به گفتگو و مناقشة طولانی در میان حاضرین در انجمن تبدیل شد. ایشان در شرح سؤال خود ذکر کرده بودند، آیا بیت المقدسی که در فلسطین موقعیت دارد همان بیت المقدس است که قرآن از آن یاد کرده طوریکه خداوند متعال می فرماید: &amp;laquo; سُبْحَانَ الَّذِی أَسْرَى بِعَبْدِهِ لَیْلًا مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِی بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِیَهُ مِنْ آَیَاتِنَا إِنَّهُ هُوَ السَّمِیعُ الْبَصِیرُ (سوره الإسراء: 1.) &amp;raquo; ؟! و پاسخ ها&amp;nbsp;&amp;nbsp;و اظهار نظرها از قرار ذیل بود:&lt;br /&gt;
یکتن از شرکت کنندگان نوشته بود: آشکار و روشن است که بیت المقدس در فلسطین کدام اساسی در روایات اهل بیت ندارد ، بلکه آن مسجد در آسمان است، و هر پژوهشگر اینرا می داند که صخره اصلا در نزد یهود مقدس است، و بسیاری از فضائل که در حقیقت به مسجد امیر المؤمنین صلوات الله علیه- مسجد کوفه- تعلق میگیرد آن فضائل را تحریف و تبدیل نموده اند و به بیت المقدس، قبلة اجداد شان که یهودهاهستند ضمیمه و چسپانده نموده اند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;و دیگری نوشته است که منزلت بیت المقدس از بدعت های یهودی ها است که اهل سنت بر آن مواظبت نموده و عمل کرده اند!! و بهمین منوال، دیگری همه هست و بود خود را فدای مرجع تقلید می کند و می افزاید که توجه و اهتمام به بیت المقدس و دیدگاه شریعت در قبال مقدسات فلسطین مشروط بر این نیست که بیت المقدس در بیت المعمور است و یا در بیت المقدس، بلکه اینگونه مسائل همه به فتوای مرجع تقلید ارتباط میگیرد که بالای ما اطاعت اوامر آنها واجب است، پس اگر مرجع تقلید پشتیبانی از قضیة فلسطین و اهل فلسطین و دفاع از آنها را به هرگونه وسائل ممکنه واجب دانست، بالای ما هم بدون چون و چرا واجب است که اطاعت کنیم حتی اگر بیت المقدس در بیت المقدس هم نباشد بلکه حتی اگر در فلسطین هیچ نشانه ای از معالم اسلامی هم نباشد&amp;raquo;!!.&lt;br /&gt;
و شخصی دیگری چنین تصریح کرده است: اگر بیت المقدس که در فلسطین موقعیت دارد، دارای این قدر ارزش و اهمیت می بود، پس چرا هیچ ثنا گویی در اهل بیت را سراغ نداریم که از آن وصف نیکو کرده باشد، لکن برعکس آنها صلوات الله علیهم فرموده اند که مسجد کوفه دارای اهمیت بیشتر از آن است.&lt;br /&gt;
و شخص دیگری چنین تصریح کرده: &amp;laquo; در خصوص بیت المقدس باید گفت که در نزد شیعه و در نزد طوائف گمراه، اتفاق نظر است که تهداب گذار و بانی آن مسجد غاصب دومی(منظور شان خلیفه دوم عمر الفاروق بن الخطاب می باشد) بوده، و در آنجا عصاهای وجود داشت که در آن خطبة مهتریه(منظور شان منبر صلاح الدین ایوبی است) را خراب الدین ایوبی&amp;nbsp;&amp;nbsp;می خواند. (صلاح الدین ایوبی افتخار این امت است و برفضل او همه شهادت می دهند مگر این رافضی او را به خراب الدین وصف می کند، تا بدینترتیب از او انتقام بگیرد زیرا صلاح الدین رحمه الله در نابودی دولت فاطمی های باطنی نقش بارز داشت) و جای تأسف است که برخی از شیعیان روزی را برای قدس اختصاص داده اند و بخاطر قدس حزین می شوند و هرگاه یهود حفریاتی را براه اندازند فغان و گریان می کنند.&lt;br /&gt;
و فردی دیگری در همین انجمن چنین می افزاید: ظاهرا والله اعلم، بیت المقدس آن نیست که در&amp;nbsp;&amp;nbsp;فلسطین واقع است. و اگر می بود و چنین قدر و منزلت میداشت، حتما اهل البیت ما را باخبر می کردند و ما را به زیارت آنجا امر می فرمودند قسمیکه در بارة اماکن مقدسه چنین کرده اند، پس انسان عاقل باید در اینقسم مسائل دقت نماید تا در شبهات واقع نشود&amp;raquo;!!.&lt;br /&gt;
پس اینست عقیدة شیعیان راجع به منزلت بیت المقدس که از لابلای مناقشات و گفتگو ها و مناظرات آزاد آنها در رسانه های گوناگون آشکار می شود، بنگرید، که به چه می اندیشند و چه عقیدة در بارة منزلت بیت المقدس دارند!!.&lt;br /&gt;
با وجود این معتقدات شان باز هم بی شرمانه دغدغه کنان می گویند که قضیه فلسطین در اولویت ما قرار دارد و قضیه اولی و اساسی ما است- البته تقدیس سیاسی- و گویا طرفدار مستضعفین فلسطین هستند و مبارزه را تا آزادی اقصی بدوش خواهند گرفت!! و برای جلب عوام الناس روزی را بنام روز قدس مسمی نموده اند و برای آزادی اقصی قوت عسکری تشکیل داده اند و آنرا جیش قدس و لشکر قدس نام گذاری کرده اند، و حتی برای قدس رادیو تأسیس نموده و آنرا رادیوی قدس نامیده اند، علاوه بر این خیابانی را بنام خیابان بسوی قدس نام گذاری کرده اند در حالیکه آن خیابان به استقامت افغانستان و صوب عراق میرود، اشکالی ندارد ما هنوز هم منتظریم و دیدیم و می بینیم&amp;nbsp;&amp;nbsp;که&amp;nbsp;&amp;nbsp;کی خون خود را&amp;nbsp;&amp;nbsp;برای قدس میریزد و جان خود را قربان می کند!!.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ سيري در جهان تشيع يا كشف اسرار پنهان حوزه هاي علميه شيعيان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/155</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ سیری در جهان تشیع یا كشف اسرار پنهان حوزه های علمیه شیعیان&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این كتاب زنگ خطری است كه برای همه به صدا در آورده شده، همانند كسی که وسط دریا در حال غرق شدن است و با صدای بلند فریاد كمك می&amp;zwnj;زند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;موج&amp;zwnj;های بلند وحشتناك كشتی را احاطه كرده&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تا لحظاتی نه چندان دور كشتی به قهر دریاها فرو می&amp;zwnj;رود دریایی كه ابتدا و انتهایی ندارد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ولی از دور مناره&amp;zwnj;های نجات در حال نمایان شدن است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هنوز امید باقی است و از ساحل زیاد دور نشده&amp;zwnj;ایم.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;از اینجاست كه نویسنده با صدای بلند فریاد می&amp;zwnj;زند خود را و هر آن كس كه می&amp;zwnj;توانید نجات دهید.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و سكان كشتی را با قدرت متوجه ساحل نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تا به مقصد و ساحال امان برسیم كه پشیمانی در درگاه ایزد منان دیگر سودی نخواهد داشت.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ولی با این حال عده&amp;zwnj;اى سودجو ناراحت هستند و نمی&amp;zwnj;خواهند مردم نجات پیدا كنند!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;حاضرنند كشتی با سرنشینانش غرق دریا شود ولی از مكاسب و سود شخصی آنها ذره&amp;zwnj;اى كم نگردد.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مؤلف محترم دربارۀ اینکه چرا این&amp;zwnj; كتاب&amp;zwnj; را نوشته است می فرماید!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(سالها از عمر خویش&amp;zwnj; را گذراندم&amp;zwnj; در حالی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; من&amp;zwnj; بر این&amp;zwnj; باور بودم&amp;zwnj; و همواره&amp;zwnj; بر این&amp;zwnj; باور هستم&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; روش&amp;zwnj; اهل&amp;zwnj; بیت&amp;zwnj; با شریعت&amp;zwnj; الله موافق&amp;zwnj; است&amp;zwnj; همانگونه&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; با عقل&amp;zwnj; و ذوق سالم&amp;zwnj; و شیوه&amp;zwnj; ارزشمند انسانیت&amp;zwnj; مطابق&amp;zwnj; است،&amp;zwnj; و نیز بر این&amp;zwnj; باور بودم&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; در آنچه&amp;zwnj; از آنها روایت&amp;zwnj; می&amp;zwnj;شود چیزی&amp;zwnj; وجود ندارد كه&amp;zwnj; با كتاب&amp;zwnj; الله یا سنت&amp;zwnj; پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم مخالف&amp;zwnj; باشد، و اگر چنین&amp;zwnj; باشد با آن&amp;zwnj; مخالفت&amp;zwnj; خواهیم&amp;zwnj; كرد و آن&amp;zwnj; را نمی&amp;zwnj;پذیریم&amp;zwnj;، و به&amp;zwnj; همان&amp;zwnj; چیز چنگ&amp;zwnj; خواهیم&amp;zwnj; زد كه&amp;zwnj; با كتاب&amp;zwnj; خدا موافق&amp;zwnj; باشد، همانگونه&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; امام&amp;zwnj; صادق ؛&amp;zwnj; چنین&amp;zwnj; راهنمایی&amp;zwnj; نموده&amp;zwnj; است،&amp;zwnj; آری،&amp;zwnj; هنگامی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; دروغهای&amp;zwnj; زیادی&amp;zwnj; ساخته&amp;zwnj; و پرداخته&amp;zwnj; می&amp;zwnj;شد و به&amp;zwnj; او نسبت&amp;zwnj; داده&amp;zwnj; می&amp;zwnj;شد فرمود: &amp;laquo;آنچه&amp;zwnj; با كتاب&amp;zwnj; خدا موافق&amp;zwnj; است&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; را بپذیرید و آنچه &amp;zwnj;كه&amp;zwnj; با كتاب&amp;zwnj; خدا مخالف&amp;zwnj; است&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; را رها كنید&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روزها همچنان&amp;zwnj; می&amp;zwnj;گذشت&amp;zwnj; و من&amp;zwnj; رخدادها را زیر نظر داشتم،&amp;zwnj; و وضعیت&amp;zwnj; حاكم&amp;zwnj; بر پیرامون&amp;zwnj; خود و حركتهای&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; را تحت&amp;zwnj;نظر داشتم&amp;zwnj;. مردم&amp;zwnj; را نگاه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كردم&amp;zwnj; و كارهایشان&amp;zwnj; را بررسی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;نمودم&amp;zwnj; و افكارشان&amp;zwnj; را مورد آزمایش&amp;zwnj; قرار می&amp;zwnj;دادم&amp;zwnj;، خداوند شخصیتی&amp;zwnj; به&amp;zwnj; من&amp;zwnj; ارزانی&amp;zwnj; نموده&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; آنچه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;بیند یا می&amp;zwnj;شنود بدون&amp;zwnj; بررسی&amp;zwnj; و پژوهش&amp;zwnj; قانع&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;شود، و باور دارم&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; خداوند به&amp;zwnj; هر انسانی&amp;zwnj; عقلی&amp;zwnj; داده&amp;zwnj; تا بیاندیشد و از عقل&amp;zwnj; خود كار بگیرد، نه&amp;zwnj; اینكه&amp;zwnj; عقل&amp;zwnj; خویش&amp;zwnj; را بی&amp;zwnj;&amp;zwnj;كار بگذارد و از آن&amp;zwnj; استفاده&amp;zwnj; نكند و با عقل&amp;zwnj; دیگران&amp;zwnj; بیاندیشد، به&amp;zwnj; ویژه&amp;zwnj; در امور مهم&amp;zwnj; و بزرگ&amp;zwnj; مانند اصول&amp;zwnj; دین&amp;zwnj; و عقیده&amp;zwnj; و ضرورت&amp;zwnj;های&amp;zwnj; زندگی&amp;zwnj; انسان&amp;zwnj;، و من&amp;zwnj; هموراه&amp;zwnj; مقولة امیر المؤمنین&amp;zwnj; ؛ را با خود تكرار می&amp;zwnj;كردم:&amp;zwnj; (بار خدایا، از خامگی&amp;zwnj; و در خواب&amp;zwnj; فرو رفتن&amp;zwnj; عقلها به&amp;zwnj; تو پناه&amp;zwnj; می&amp;zwnj;برم&amp;zwnj;).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بسی&amp;zwnj; جای&amp;zwnj; تعجب&amp;zwnj; است&amp;zwnj; این&amp;zwnj; قوم&amp;zwnj; از عقل&amp;zwnj; خود در فهمیدن&amp;zwnj; كتاب&amp;zwnj; الله و سنت&amp;zwnj; پیامبر استفاده&amp;zwnj; نكرده&amp;zwnj;اند، و زمام عقلهای&amp;zwnj; خویش&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; دست&amp;zwnj; بزرگان&amp;zwnj; و رؤسا و علما سپرده&amp;zwnj;اند. بنابر این،&amp;zwnj; سرنوشت&amp;zwnj; همگی&amp;zwnj; آن&amp;zwnj;ها به&amp;zwnj; سوی&amp;zwnj; جهنم&amp;zwnj; رقم&amp;zwnj; خورده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آری،&amp;zwnj; باید دانست&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; تقلید كردن&amp;zwnj; از علماء این&amp;zwnj; طور نیست&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; در همه&amp;zwnj; چیزها باید از آنها تقلید كرد، بلكه&amp;zwnj; تقلید از علماء منحصر در فروع&amp;zwnj; دین&amp;zwnj; و جزئیات&amp;zwnj; آن&amp;zwnj; است،&amp;zwnj; و نیز در امور پیچیدة&amp;zwnj; دینی&amp;zwnj; كسی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; توانایی&amp;zwnj; پژوهش&amp;zwnj; و اجتهاد را ندارد می&amp;zwnj;تواند از علماء تقلید نماید، باز هم&amp;zwnj; به&amp;zwnj; این&amp;zwnj; شرط&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; نظر علماء با نصوص&amp;zwnj; قرآنی&amp;zwnj; یا سنت (صحیح) اصطكاك&amp;zwnj; پیدا نكند.....&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران محترم می توانند&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتابِ سیری در جهان تشیع یا كشف اسرار پنهان حوزه های علمیه شیعیان&amp;nbsp;&amp;nbsp;را از بخش مستندات كتابخانه عقیده بدست آورند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ قرآن کتابي شگفت انگيز</title>
<link>http://qalamlib.com/news/154</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتابِ قرآن کتابی شگفت انگیز&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شگفت انگیز دانستن قرآن فقط به مسلمانانی که این کتاب برایشان ارجمند ومورد احترام است، مربوط نمی شود بلکه غیر مسلمانان نیز آن را کتابی شگفت انگیز می دانند و حتی افرادی نیز که به شدت از اسلام متنفرند، به شگفت انگیز بودن آن اقرار می کنند .&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;آن چیزی که مایه ی تعجب غیر مسلمانانی که این کتاب را به دقت مورد مطالعه قرار داده اند،می باشد اینست که قرآن،خود را آنگونه که آنان انتظار داشتند،نشان نداد.آنچه که آنان در ابتدا تصور می نمودند این بود که آنان سرگرم بررسی کتابی قدیمی هستندکه چهارده قرن پیش از صحرای عربستان سر بر آورده است و انتظار داشتند که این کتاب نیز خود را اینگونه نشان دهد یعنی کتابی قدیمی از دل صحرا. اما به زودی در یافتند که این کتاب به هیچوجه با آنچه که آنان انتظار داشتند، شباهت ندارد. علاوه بر این یکی از اولین فرضیاتی که در مورد قرآن به ذهن بعضی از افراد می رسید، این بود که چون این کتاب قدیمی از دل صحرا آمده است لذا باید مطالبش در مورد صحرا [و زندگی در بیابان] باشد.آری اگر چه در بعضی از آیات هنرمندانه در مورد صحرا موضوعاتی بیان شده است، در مورد دریاها و به ویژه حالت طوفانی آن نیز سخن به میان آمده است .&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتاب &amp;quot;قرآن کتابی شگفت انگیز&amp;quot; که مجموعه ای است از مقالات در باب قرآن و اعجاز آن.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این مقاله به ابعادی متفاوت از اعجاز در کتاب الله جل جلاله می پردازد که شاید کمتر به آن پرداخته شده است. کتاب مورد نظر را آقای صلاح الدین توحیدی به فارسی ترجمه کرده است. این کتاب نام خود را از مقاله ی اول این کتاب که همین مقاله &amp;quot;قرآن کتابی شگفت انگیز&amp;quot; است و نوشته آقای گری میلر می باشد، برگرفته است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بررسی این موضوع که قرآن چیست؟ و اینکه اگر وحی الهی نیست پس ممکن است چه چیزی باشد و به عبارتی دیگر چگونه می توان آن را توجیه نمود دغدغه ی اصلی نویسنده ی این مقاله می باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این كتاب را می توانید در بخش قرآن كریم كتابخانه عقیده مطالعه نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب و كتابخانه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/153</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتاب و كتابخانه&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;نقش كتاب در انتقال علوم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتاب، محصول تجربه‏هاي بشري و خلاقيت‏هاي ذهني و آموخته‏هاي دراز مدت انسان است. سهم كتاب در انتقال دانش‏ها گاهي به مراتب بيشتر و فراتر از ديگر ابزار آموزشي است. پديد آوردن آثار علمي و فرهنگ مكتوب از توصيه‏هاي مهم اولياي دين است و به گسترش دانش كمك مي‏كند و به عنوان يك ميراث فرهنگي براي نسل‏هاي آينده ماندگار مي‏شود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتاب وسيله‏اي است كه دانش بشري به مدد آن از تباه شدن مصون مي‏ماند و به آيندگان منتقل مي‏شود. از اين‏رو پيشوايان امت اسلامى توجه ويژه‏اي به فرهنگ مكتوب داشتند و همواره پيروان خويش را به حفظ دانش و نوشتن آن سفارش مي‏فرمودند. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;توجّه اسلام به حفظ و گسترش ميراث علمي، جايگاه والاي دانش و كتاب را از ديدگاه اين دين مبين نشان مي‏دهد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتاب‏هاي ناسالم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;بي‏ترديد، به همان اندازه كه مي‏توانيم از كتاب بهره بگيريم، ممكن است در معرض آفت‏ها و خطرهاي نوشته‏هاي سست و بيمار و مسموم و انحرافي هم قرار گيريم. راه دادن كتاب‏هاي ناسالم به مدرسه‏ها و خانه‏ها، در واقع مسموميت فكري و اخلاقي نسل ما را به دست خودمان فراهم مي‏آورد. بنابراين، نظارت بر چاپ كتاب و بررسي محتواي آن، در جامعه سلامت خواه و دورانديش ضروري است. آنان كه به سلامت انديشه و باورها و گرايش‏هاي افراد جامعه دل‏بستگي دارند، نمي‏پذيرند كه در عرضه آثار منتشر شده، حدّ و مرز و نظارت و محدوديتي نباشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتاب و كتاب‏خانه&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;وقتي كتاب، حاصل انديشه‏ها و تجربه‏هاي اهل انديشه و معرفت باشد، كتابخانه نيز كانون همايش صاحب نظران و موزه پرطراوت و شاداب دانشمندان و صاحبان معارف خواهد بود. همان‏گونه كه در باغ و بوستان، خاطر انسان نشاط مي‏يابد، سير در بوستان كتاب نيز مشام جان را شاداب و معطر مي‏سازد. بي‏مناسبت نيست كه در روايات ما، از كتاب به عنوان بوستان دانشمندان ياد شده4 و همدم و سخن‏گويي شايسته به شمار آمده است. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;كسي كه قدم در كتابخانه مي‏گذارد، به گلگشت دل‏انگيز و مجمع دانشمندان و دانايان قدم نهاده است. طبيعي است كه در چنين محيطي، انسان احساس نشاط مي‏كند و روحش بالنده مي‏شود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;مطالعه و كتابخواني&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;وقتي جهل و بي‏خبري، جامعه‏اي را از پاي درآورد، يا شبهه‏ها ذهن جوانان را فلج كند، بدون شك يكي از مهم‏ترين كارهايي كه مي‏تواند آفت جهل را بزدايد، مطالعه است و آنچه مي‏تواند شبهه‏هاي ذهني را دفع كند و ايمان و اطمينان را به قلب‏ها باز آورد، كتاب‏خواني است. گرفتاران در چنبره پرسش‏ها و محاصره شدگان در ميان انبوه شبهه‏ها، مي‏توانند براي استمداد فكري به كتابخانه مراجعه كنند و از آن‏جا نيرو گيرند و به جنگ شبهه‏ها بروند و پاسخي در برابر القائات و شبهه‏افكني‏هاي ديگران بيابند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;آثار روحيِ انس گرفتن با كتاب&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;بي‏گمان، هيچ ذخيره و ميراثي سودمندتر و با ارزش‏تر از كتاب نيست؛ چرا كه كتاب، مايه آرامش روحي انسان است. كسي كه به كتاب‏ها تسلّي و آرامش بيابد، هرگز آرامش را از دست نخواهد داد. &lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;كتاب همدمي است كه اندوه را مي‏زدايد و مطالعه كننده را از تنهايي در مي‏آورد و به او حكمت‏هاي جان‏پرور مي‏آموزد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;بردباري كتابدار در برخورد با كودكان&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;در كتابخانه‏هايي كه در مدرسه‏ها، مسجدها و روستاها تأسيس مي‏شود، نحوه برخورد متوليان كتابخانه با مراجعه‏كنندگان بسيار مهم است. مراجعه‏كنندگان به كتابخانه‏ها، گاهي كودكان و نوجوانانند و گاهي بزرگ‏ترها و حتي دانش‏آموختگان و اهل معرفت. نحوه برخورد با هريك از اين گروه‏ها متفاوت است و آيين مناسب خود را مي‏طلبد. اگر سر و كار كتابدار با كودكان است، حوصله و بردباري بيشتري لازم است تا هم بازيگوشي كودكان، زيان‏هايي به بار نياورد و هم آنان به كتابخانه و مطالعه رغبت كنند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;امين بودن كتابدار&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;يكي از وظايف اخلاقي كتابدار، امين بودن و متعهد بودن است. كتابدار، نسبت به كتاب‏ها بايد امين باشد و از ضايع شدن و مفقود شدن آنها ناراحت شود و خراب شدن كتاب‏ها او را رنج دهد و كتاب‏ها را مثل فرزندان خود بداند. او بايد در امانت دادن كتاب دقت و تعهد لازم را نشان دهد، تا با گم شدن و كم شدن كتاب‏ها مواجه نشود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;شناخت كافي از سلامت و صحت كتاب&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;يكي از مفيدترين اطلاعات براي كتابخوان، شناختن آثار خوب و جديد، شناخت نويسندگان متعهد و سالم و آگاهي از مؤسسات انتشاراتي متعهد است. نشان «استاندارد» به عنوان نشانه مرغوبيت كالا، نبايد تنها در فرآورده‏هاي خوراكي و مصرفي و كالاهاي خانگي و صنعتي مورد نظر باشد، بلكه آثار فرهنگي و فرآورده‏هاي علمي و فكري هم بايد مطابق استانداردهاي عقلاني و ديني و ارزشي تهيه شود تا جامعه را به فساد و تباهي و بيماري نكشد. روشن است كه خوانندگان آثار و خريداران كتاب و مشتريان مطبوعات و جرايد نيز بايد به اين علايم استاندارد توجه كنند و هر كتاب را نخرند و نخوانند و به هر نويسنده و ناشر، اطمينان صد در صد نكنند و تا شناخت كافي از سلامت و صحت كتاب خاصي پيدا نكرده‏اند، در روح و انديشه خود و فرزندانشان را به روي كالاهاي ناسالم و زيان‏بار فكري نگشايند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;علت عمده كتاب‏گريزي در جامعه&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;يكي از مشكلات و كاستي‏هاي جامعه ما گريز از كتاب و پايين بودن سطح فرهنگ مطالعه است. اين نقيصه، ريشه‏ها و علت‏هاي مختلفي مي‏تواند داشته باشد كه شايد در رأس آنها «عدم احساس ضرورت» است. تا وقتي انسان در وضعيت «نياز» قرار نگيرد، در پي رفع آن نخواهد افتاد. اگر در پاسخ شبهه‏هاي اعتقادي و پرسش‏هاي سياسي دربمانيم، يا در مجلس و محفلي كه از موضوع خاصي صحبت به ميان مي‏آيد، احساس كنيم در آن زمينه بي‏اطلاعيم و شرمسار شويم و احساس كنيم از چرخه زمان و گردونه پرشتاب مسايل علمي و فكري جامعه عقب مانده‏ايم، نسبت به خلأ و نياز آگاه مي‏شويم و اين مي‏تواند شوق به مطالعه و كتابخواني را در ما تقويت كند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;شناخت سير مطالعاتي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;بدون شك تناسب محتوا و سبك كتاب، با مخاطبي كه آن را به دست مي‏گيرد و مي‏خواند، عامل مهمي براي برقراري رابطه و لذت بردن از خواندن است. كتاب دشوار، گاهي به جاي جاذبه، دافعه دارد و به جاي شوق‏آفريني، بيزار كننده مي‏شود. در اين‏جا هوشياري و دقت كسي كه كتاب را براي مخاطب، انتخاب مي‏كند، نقش عمده دارد. براي كودك و نوجوان مطالعه كننده، مراعات سلسله مراتب و سير تدريجي مطالعه نيز مؤثر است. نوجوانان به مطالعه داستان علاقه‏مندند. بهره‏گيري از اين علاقه و عرضه كتاب‏هاي قصه در مرحله نخست، عامل ايجاد علاقه به مطالعه است. وقتي نوجوان داستان‏هاي جذّاب خواند، با كتاب مأنوس مي‏شود و انس با كتاب و مطالعه، او را در مراحل بعدي به خواندن كتاب‏هاي متنوع علمي، تاريخي و اخلاقي مي‏كشاند. مربّي موفق و كتابدار پخته و هنرمند كسي است كه اين سير مطالعاتي را بشناسد و به كار گيرد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;نظم و برنامه‏ريزي در كتابخواني&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;بي‏ترديد، از مهم‏ترين عوامل مفيد ساختن كتابخواني، برخورداري از نظم و برنامه است. تخصيص وقت مناسب و منظم براي مطالعه، بسيار كارساز است. مطالعه نامنظم، ملال‏آور و ناپايدار است. در هر كاري از جمله مطالعه، كار اندك ولي پيوسته و منظم، بسيار ثمربخش‏تر از كار پرحجم، ولي مقطعي و گذراست. با برنامه‏ريزي منظم براي مطالعه، مشكل كمبود وقت كه خيلي‏ها آن را وسيله و بهانه فرار از مطالعه قرار مي‏دهند، حل مي‏شود. بسياري از بزرگان از همين رهگذر، در حركتي آرام امّا مستمر، توانسته‏اند كارهاي عظيم صورت دهند. بسياري از اثرهاي ماندگار و جاويدان، محصول همين‏گونه كار دراز مدت و با صبر و حوصله و خسته نشدن و شتاب نداشتن است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;خواندن بهترين‏ها&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;از آن‏جا كه امروزه دامنه علوم و موضوعات و كتاب‏ها گسترش يافته است، بنابراين بر كتابخوانان عزيز است كه فرصت و نيرو و مجال را به خواندن بهترين‏ها و لازم‏ترين‏ها اختصاص دهند. دانش، بيش از آن است كه بتوان بر آن احاطه يافت؛ پس از هر دانشي بهترين آن را برگيريد. عمل به اين سخن سبب مي‏شود تا مطالعه كنندگان و كتابخوانان ارجمند با مشكل كمبود وقت، كم‏تر مواجه شوند، به اهداف مطالعاتي بهتر دست يابند، و از هرز رفتن فرصت‏ها و صرف شدن سرمايه در پاي كارهاي بيهوده و مطالعات كم ارزش و بي‏ثمر، جلوگيري نمايند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;آفت كتابخواني&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;يكي از آفت‏هاي هركار برنامه‏دار، برخورد با حوادث و پيشامدها و كارهاي پيش‏بيني نشده است. به تعبير ديگر، با وجود برنامه مطالعاتي يا درسي، ممكن است كارهايي براي انسان پيش آيد كه، در آن برنامه وقفه يا اختلال پديد آورد و فرد را از رسيدن به هدف باز دارد. اراده و تصميم جدي، مي‏تواند انسان را بر اين موانع غلبه دهد. خود فرد است كه اگر بخواهد، مي‏تواند از برهم خوردن نظم مطالعاتي جلوگيري كند و مصمم و استوار، بر ادامه و استمرار كار، پافشاري كند. اگر بنا باشد مسايلي همچون بي‏حالي، آمدن مهمان، بيماري يكي از بستگان، برخورد با يك دوست صميمي، و خستگي از كار روزانه، و... روند مطالعه را مختل سازد، هرگز انسان به هدف‏هاي متعالي دست نخواهد يافت.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;غذاي روح&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;مطالعه، غذاي روح و درمان بيماري‏هاي فكري است. كتاب، معلمي ساده و صميمي و هميشه در دسترس است كه بي‏ادعا و بدون تكلف و منّت، آنچه دارد در اختيار ما مي‏گذارد. مطالعه، با نيّت خالص، عبادتي بزرگ است. لحظه‏اي نشستن در كتابخانه، حضور در محضر انديشمندان قرون و فرزانگان زمان است. كتابخانه، معبد اهل علم و محراب پاكِ دانشجويي و علم‏آموزي است. هركه از كتاب و مطالعه بيگانه است، غريب و بي‏مونس است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;نقش كتاب و كتابخانه در بالندگي جوامع&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتاب و كتابخانه، مجموعه ارزشمندي را شكل مي‏دهد كه مي‏تواند در راه شكوفايي و بالندگي افراد و جوامع نقش سازنده‏اي ايفا نمايد. كتاب، يكي از راه‏هاي كسب دانايي و توانايي است كه آدمي را در فهم و درك راست از ناراست، مدد مي‏رساند. كليد گذر از زندان و محدوديت و ورود به دنيايي گسترده و ژرف، بهره‏وري از كتاب است. كتابخانه‏ها را مي‏توان نهادهايي ديرينه و تأثيرگذار دانست كه در فرآيندهاي آموزشي و پژوهشي، ايجاد و توسعه عادت به مطالعه، پايدارسازي همبستگي‏هاي اجتماعي، حفظ ارزش‏ها، احياي تفكر ديني، ايجاد اعتماد به نفس و استقلال فردي و اجتماعي، و حتي در فرآيندهاي اقتصادي نقش مهم و مؤثري دارند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتابخانه، حافظ ميراث‏هاي فرهنگي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;كتابخانه‏ها، حافظان ميراث‏هاي فرهنگي و مالكيت‏هاي فكري، مكان‏هايي امن براي غني سازي اوقات فراغت و ابزاري براي ايجاد تعادل و گسترش عدالت به‏شمار مي‏روند. بر همين اساس است كه «كارلايل» كتابخانه را «دانشگاهي براي همه» مي‏نامد. برخي نيز كتابخانه عمومي را به «قلب جامعه» تشبيه كرده و زندگي افراد را بدان وابسته دانسته‏اند. در هر حال كتابخانه‏ها نمادهايي از ارزش‏هاي معنوي، فرهنگي، اجتماعي، سياسي و اقتصادي جامعه تلقي مي‏شوند. از اين‏رو كتابخانه‏ها بايد داراي كتاب‏ها و منابع و مواد ديداري و شنيداري مناسب، متنوع و مفيد باشند؛ چرا كه پربار بودن مجموعه كتابخانه، سبب اقبال هرچه بيشتر مردم به آن مراكز و رويكرد فعال آنان به امر مطالعه و گسترش فرهنگ كتاب مي‏شود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;خانواده، نقطه آغازين ايجاد عشق به كتابخواني&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;براي ايجاد علاقه به كتاب و كتابخواني، عوامل متعددي نقش دارند كه نخستين آنها «خانواده» است. در واقع نقطه آغازين ايجاد عشق و علاقه به كتاب و كتابخواني از خانواده آغاز مي‏گردد؛ زيرا طبق ديدگاه روان‏شناسان، شخصيت و هويت كودك در قدم اول در خانواده شكل مي‏گيرد. به طور طبيعي والدين علاقه‏مند به كتاب فرزنداني دوستدار مطالعه خواهند داشت و عكس آن نيز صادق است. تجربه نشان داده است كه فرزنداني كه در خانواده‏هاي اهل دانش بزرگ مي‏شوند، ميزان مطالعه و گرايش به كتابخواني در آنان نسبت به خانواده‏هايي كه تمايلي به كتاب و مطالعه ندارند بسيار بيشتر است. اكثر علما و دانشمندان در خانواده‏هايي رشد نموده‏اند كه والدين آنان اهل مطالعه و پژوهش بوده‏اند. زماني كه فرزندي مي‏بيند كه كتابخانه‏اي در خانه هست و پدر و مادر و همگي اعضاي خانواده، ساعاتي را به مطالعه اختصاص مي‏دهند، ديگر، حتي نياز به گفتن اين‏كه «بايد مطالعه كني» وجود ندارد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;نقش آموزش و پرورش در ترويج فرهنگ كتابخواني&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;آموزش و پرورش به عنوان بزرگ‏ترين مجموعه آموزشي كشور، مي‏تواند با بسترسازي بنيادين و برنامه‏ريزي دقيق و بلند مدت، علاقه به كتاب و كتابخواني را در بين نسل جوان و نوجوان تقويت نمايد. اگر در برنامه آموزشي كشورهاي پيش‏رفته تأمل كنيم متوجه مي‏شويم كه فرهنگ‏سازي براي مطالعه را از آموزش و پرورش آغاز مي‏نمايند. بنابراين ضروري به نظر مي‏رسد كه با بهره‏گيري از مشاوران و روان‏شناسان برجسته، فرهنگ مطالعه و كتاب‏خواني در شخصيت كودكان مستحكم و بنيادين گردد. مطمئن باشيم كه اگر زمينه ترويج فرهنگ كتاب‏خواني را در آموزش و پرورش ايجاد كنيم، ديري نمي‏پايد كه جامعه‏اي كتابخوان و توسعه يافته خواهيم داشت و ثمره آن پيشرفت همه‏جانبه كشور خواهد بود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;هديه فرهنگي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;بدون شك پدر و مادر نقش مهمي در ترويج فرهنگ كتاب‏خواني در خانواده دارند. آنان براي اين‏كه حس كتاب‏خواني را در فرزندانشان تقويت نمايند، مي‏توانند از كتاب به عنوان اهرمي براي تشويق استفاده نمايند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;بسيار مناسب خواهد بود كه كتاب را به عنوان هديه‏اي معنوي در لابه‏لاي ديگر هدايا فراموش ننماييم و با اين عمل قدمي بسيار مهم در اعتلاي فرهنگ كتاب‏خوانيِ فرزندانمان برداريم. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT size=3&gt;&amp;nbsp;&lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>اختلاف مسلمین در مورد حدیث غدیر خم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/141</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;اختلاف مسلمین در مورد حدیث غدیر خم&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;در هنگام تحقیق وقایع تاریخ اسلام و بررسی احادیث رسول الله صلی الله علیه و سلم متوجه روایاتی می شویم که در موقعیت ها و ظروفی ویژه و جهت بیان یا تاکید بر موضوعاتی خاص ایراد شده است. این گونه موارد، مجالی مناسب برای کسانی فراهم می آورد که در پی آنند تا بر اعتقادات و ادعاهای خویش دلیلی مناسب و محکم بیاورند لذا آن گونه که خود خواسته اند از این روایات بهره برده و چه بسا دیگران را نیز مورد نکوهش قرار داده اند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بارزترین نمونه از این نوع روایات و وقایع، واقعه ی غدیر خم و حدیث مشهور به حدیث غدیر خم است که در سال پایانی حیات رسول الله صلی الله علیه و سلم در هنگام برگشت از حجة الوداع روز هجدهم ذی الحجة سال دهم هجری به وقوع پیوست که بعدها به عنوان اساس و ریشه اعتقادات شیعه در بحث امامت مورد توجه خاص قرار گرفت. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;سعی بر آن داریم تا در این مختصر به بحث و بررسی تاریخی این واقعه از یک سوی و تحقیق معنای لغوی و اصطلاحی الفاظ حدیث از دیگر سوی بپردازیم و در ادامه دلایل هر قول را نیز مختصراً بیان کنیم لذا بحث را به &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۶&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بخش جداگانه تقسیم می کنیم: &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;روایات وارده و تحقیق اسناد حدیث غدیر خم &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;معنای لغوی و اصطلاحی لفظ ولی در قرآن و سنت و لغت &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;سبب ورود حدیث غدیر &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۴- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;احتجاج به حدیث غدیر &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;قول شیعه و بررسی ادله آن &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۶- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;قول اهل سنت و جماعت و بررسی ادله آن.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بخش اول: روایات وارده و تحقیق اسناد حدیث غدیر خم: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;حدیث غدیر از طریق بعضی از صحابه و غالباً همراه با سبب ایراد آن در کتب حدیث آورده شده به گونه ای که اصل ورود آن را تایید می کند هر چند بخاری و مسلم آن را به این لفظ روایت نکرده اند. ذیلاً به نمونه هایی از این روایات از مشهورترین کتب حدیث اشاره می کنیم:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;الف) مسند امام احمد: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;براء بن عازب روایت می کند: در سفری همراه پیامبر بودیم، هنگام ظهر در منطقه ای به نام غدیر خم منزل کردیم، بعد از آن که نماز ظهر را خواندیم رسول الله صلی الله علیه و سلم دست علی بن ابی طالب را گرفتند و فرمودند: ( مَن کُنتُ مولاه فعلیّ مولاه، اللهم وال مَن والاه و عادِ مَن عاداه) سپس عمر بن خطاب علی را ملاقات کردند و به ایشان گفتند: (هنیئاً یا ابن ابیطالب أصبحتَ و أمسیتَ مولی کلّ مومن و مومنة)/ مسند امام احمد &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۴/۲۸۱. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;این حدیث را به خاطر وجود علی بن زید که همان إبن جدعان باشد ضعیف دانسته اند. در روایتی دیگر عبدالرحمن بن ابی لیلی می گوید: در منطقه رَحبه (منطقه ای در عراق در نزدیکی قادسیه) علی را دیدم که مردم را سوگند می داد هر کس سخن پیامبر را در غدیر خم شنیده است بلند شود و گواهی دهد. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۲&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;نفر که همگی از اهل بدر بودند بلند شدند و بر شنیده خود گواهی دادند (مسند امام احمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱/۱۱۹). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بُریدة أسلمی این حدیث را همراه واقعه ای دیگر روایت می کند و می گوید: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;همراه علی بن ابیطالب در سریه یمن بودیم و چون برگشتیم من به نزد پیامبر رفتم و از علی شکایت کردم، پیامبر چهره اش تغییر کرده و فرمودند: ای بریدة! آیا من أولی تر به مومنین از خودشان نیستم؟ گفتم: بله ای رسول خدا، ایشان فرمودند: (من کنت مولاه فعلی مولاه)/مسند امام احمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/۳۴۷.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ب) جامع الصحیح (سنن) ترمذی:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ترمذی این حدیث را یک جا بدون ذکر سبب خاص از زید بن أرقم روایت می کند (سنن ترمذی&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/۶۳۷) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;و در جایی دیگر از عمران بن حصین حدیث را با لفظی دیگر به بعد از سریه یمن، وقایع رخ داده در آن و شکایات مردم از علی نسبت می دهد که رسول الله صلی الله علیه و سلم را ناراحت کرده و فرمودند: ( ما تریدون مِن علی؟ ما تریدون من علی؟ إن علیّاً منّی و أنأ منه و هو ولی کلّ مومن بعدی) ترمذی این حدیث را حسن غریب می داند زیرا تنها از طریق جعفر بن سلیمان روایت شده که بسیاری از محدّثین او را به بدگویی ابوبکر و عمر متهم کرده اند (سنن ترمذی&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/۶۳۷ &amp;ndash; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;المستدرک حاکم&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳/۱۱۰). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ج) سنن ابن ماجه:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ابن ماجه این حدیث را یک جا از ابن جدعان روایت می کند که بیان علت ضعفش گذشت (سنن ابن ماجه&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱/۴۵) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;و در جایی دیگر روایت می کند که معاویه در مجلسی از علی نالید اما سعد بن ابی وقاص که در آنجا حاضر بود خطاب به او گفت: آیا درباره مردی سخن می گویی که رسول الله صلی الله علیه و سلم درباره او فرمود: ( مَن کنت مولاه فعلی مولاه) و ( أنت مِنّی بمنزلة هارون من موسی إلا أنه لا نبیّ بعدی ) و ( لأعطینّ الرایة رجلاً یحب الله و رسوله )/ سنن ابن ماجه&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱/۴۵.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;د) الخصائص نسأئی:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;نسأئی از زید بن أرقم بعد از بیان قصه غدیر خم و اجتماع مردم، از پیامبر روایت می کند که فرمودند: ( من کنت ولیه فهذا ولیه، اللهم وال من والاه و عاد من عاداه)/خصائص ص&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۵. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;همچنین شبیه به روایت این حدیث را از طریق زید بن یثیع از عبدالرحمن بن ابی لیلی در رحبه روایت می کند/خصائص ص&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۶.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ابن جریر طبری مجموع طرق این حدیث را در دو مجلد صرفنظر از صحت و سقم آن جمع آوری کرده است. همچنین شیخ ناصر الدین ألبانی در سلسلة الصحیحة اکثر روایات وارده در مورد این حدیث را جمع آوری کرده و غالب آنها را صحیح دانسته است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بخش دوم: معنای (ولی) در قرآن و سنت و لغت:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ماده (ولی) دارای مشتقات متعددی در لغت عرب است که هر کدام خود معانی مختلفی دارند و بسیاری از این معانی در احادیث و بعضی در قرآن استفاده شده است. ذیلاً به بعضی از مشتقات این لفظ و معانی هر کدام اشاره می شود:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الف) مَولی&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;: که دارای معانی مختلفی است مثل: &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;صدیق و نصیر و مُحب ( فإخوانکم فی الدین و موالیکم/ أحزاب&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵) (&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ذلک بأن الله مولی الذین آمنوا و أن الکافرین لا مولی لهم/ محمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۱) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;، &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;(مُزینة و جُهینة و أسلم و غفار موالی الله و رسوله /بخاری مناقب&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;و&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۶) (&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;إنما أولیائی المتقون/ابوداود فتن&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱). ۲- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;عصبیّت و ابن عم: (و إنی خفت الموالی من ورائی /مریم&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵). ۳- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;حلیف و هم پیمان. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۴- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;معتِق و معتَق: (نهی رسول الله صلی الله علیه و سلم عن بیع الولاء و هبته /نسأئی&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۶/۱۲۳). ۵- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ناصر: (نعم المولی و نعم النصیر /حج&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۷۸). ۶- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ولی نعمت: (و هو کَلّ علی مولاه /نحل&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۷۶). ۷- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;مالک و عبد. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۸- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ولی شرعی (أیما امرأة نکحت بغیر إذن مولاها - و فی روایة ولیّها &amp;ndash; فنکاحها باطل /ترمذی نکاح&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۴) (&amp;hellip;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;فلیملل ولیّه بالعدل /بقره&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲۸۸) (&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;السلطان ولیّ من لا ولیّ له /ترمذی نکاح&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۴).&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ب) موالاة ضد معاداة: به معنای متابعت و پیروی کردن.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ج) وِلایة (با کسره واو) به معنای امارت و نصرت، و با فتحه واو (وَلایة) به معنای نسب و نصرت، &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;یعنی معنای نصرت برای لفظ ولایۀ در هر دو صورت (کسر و فتح واو) مشترک است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;د) أولی: به معنای تهدید و وعید (أولی لک فأولی /قیامة&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳۴).&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بعضی دیگر از مشتقات این ماده عبارتست از: التّولیه، وَلّی، استَولی، التَولّی.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;با توجه به تعدد معنای (وَلی) در می یابیم که اطلاق معنایی خاص برای لفظ (مَولی) در حدیث غدیر کاری بسیار دشوار است و نیاز به قرینه دارد. امام شافعی رحمة الله علیه می گوید: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;مقصود ولایت اسلام است چنانچه خداوند می فرماید: (ذلک بأن اللهَ مولی الذین آمنوا و أن الکافرین لا مولی لهم /محمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۱). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بخش سوم: سبب ورود حدیث&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;چنانچه در بخش بررسی روایات حدیث غدیر نیز بیان شد تعدادی از طرق روایت این حدیث به صورت مطلق و بدون اشاره به سببی خاص نقل شده است اما گروه دیگری از روایات همراه با سبب ورود برای این حدیث نقل شده است که مجموع آنان به دو سبب بر می گردد: &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;سریه علی بن ابیطالب به سوی یمن &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲- &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;برگشت پیامبر از حجة الوداع و نزول آیه (یا أیها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربّک&amp;hellip; /مائده&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۶۷). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ذیلاً به هر کدام از این دو سبب ورود به صورت خلاصه اشاره می کنیم:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;الف) سریه علی بن ابیطالب به سوی یمن: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;رسول الله صلی الله علیه و سلم در سال دهم هجری خالد بن ولید را به سوی اهل یمن فرستاد تا آنان را به اسلام دعوت کند اما چون بعد از شش ماه نتیجه ای نگرفت علی بن ابیطالب را با تعدادی به یمن فرستاد تا جانشین خالد شود. علی بن ابیطالب می گوید: به پیامبر گفتم: مرا به سوی قومی می فرستی که مُسن تر از من هستند و من جوانم و قضاوت نمی دانم. پیامبر دست بر سینه ام گذاشت و فرمود: (اللهم ثبّت لسانه واهد قلبه). علی بن ابیطالب چون به نزدیکی یمن رسید مردم به استقبال او آمدند و علی نیز بعد از نماز صبح، نامه پیامبر را برای ایشان قرائت کرد و سبب شد قبیله همدان مسلمان شوند و دیگر طوائف یمن نیز در پی آنان مسلمان شدند. علی قضیه اسلام آنان را طی نامه ای به رسول الله صلی الله علیه و سلم خبر داد و ایشان نیز از این خبر بسیار خوشحال شدند. (تاریخ الأمم و الملوک طبری &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳/۱۳۲).&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بخاری شبیه به این حکایت را روایت می کند اما علت فرستاده شدن علی را گرفتن خُمس می داند و از بُریده أسلمی روایت می کند: من به سبب اینکه علی بن ابیطالب بهره ای از خمس را برای خود برداشته بود ناراحت شدم لذا بعد از برگشت قضیه را برای پیامبر بازگو کردم اما ایشان فرمودند: ای بریده! آیا از علی ناراحت شدی؟ گفتم: آری، ایشان فرمودند: از او ناراحت مباش زیرا او بیش از آن در مال صدقه حق دارد. (فتح الباری &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۸/۵۴). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ابن حجر و امام احمد (مسند&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/ &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳۴۷) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;روایات دیگری را نیز از سبب ناراحتی بریده آورده اند. ترمذی از عمران بن حصین روایتی را ذکر می کند که علی از مال خمس کنیزی را برای خود برداشت و همین سبب ناراحتی دیگران شد و چون به پیامبر رسیدند به نزد ایشان شکایت کردند اما پیامبر در پاسخ فرمودند: (ما تریدون من علی؟ ما تریدون من علی؟ إن علیّاً منّی و أنأ منه و هو ولی کل مومن بعدی). (سنن ترمذی&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/۶۳۲).&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ابن کثیر از یزید بن رکانۀ ضمن حکایت سریه علی به یمن روایت می کند: علی برای اینکه زودتر به مکه برسد و در حجۀ الوداع همراه پیامبر باشد شخصی را جانشین خودش ساخت و خود به مکه رفت. چون لشکر به مکه نزدیک شد علی به استقبال آنان رفت اما مشاهده نمود که آنان از لباس بیت المال (جزیه) پوشیده اند لذا از آنان ناراحت شد و امر کرد که لباس ها را بیرون بیاورند. همین امر سبب ناراحتی آنان شد و آن گاه که به نزد پیامبر رسیدند از علی شکایت کردند. إبن کثیر در تحلیل این قضیه می گوید: چون قیل و قال و شکایت درباره علی زیاد شد پیامبر در راه برگشت از حجۀ الوداع به مدینه، آنان را در غدیر خم جمع کرد تا ذهنیت آنان را نسبت به علی اصلاح کند. (البدایۀ و النهایۀ مجلد سوم ص&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۰۶). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;روایات دیگری از این حدیث، حاکی از آن است که پیامبر بعد از برگشت به مدینه نیز به مناسبتی این حدیث را تکرار کرده است. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ب) نزول آیه تبلیغ (یا أیها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربک فإن لم تفعل فما بلّغت رسالته والله یعصمک من الناس والله لا یهدی القوم الکافرین /مائده&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۶۷).&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بعضی از محدثین و مفسرین روایات ضد و نقیضی را از أبی سعید خدری، عبدالله بن مسعود و عبدالله بن عباس در مورد سبب نزول آیه ذکر کرده اند. ابن مردویه و ابن أبی حاتم و إبن عساکر روایتی را از أبی سعید خدری نقل می کنند مبنی بر اینکه این آیه در غدیر خم در مورد علی بن ابیطالب نازل شده است (تاریخ دمشق&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۴۲/۲۳۷) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;اما در روایتی دیگر ابن ابی حاتم از عنتره روایت می کند که افرادی به ابن عباس گفتند: اگر چیز ناگفته ای نزد توست برای ما باز گوی؛ ایشان در جواب گفتند: آیا نمی دانید که خداوند فرمود: (یا أیها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربک &amp;hellip;) و&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;رسول الله نیز چیزی را برای ما ناگفته نگذاشت (فتح القدیر&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲/۵۷). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;همچنین ابن أبی حاتم از جابر بن عبدالله انصاری در ضمن حکایتی از یکی از غزوه های پیامبر (غزوه ذات الرقاع و نقشه قتل پیامبر)، نزول این آیه را به آن حکایت نسبت می دهد (تفسیر ابن کثیر&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲/۷۹). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;همچنین ابن مردویه از ابن عباس روایت می کند که از پیامبر در مورد سخت ترین آیه ای که بر ایشان نازل شده پرسیدند و ایشان پاسخ دادند: من در منطقه مِنی در موسم حج (اوائل بعثت) بودم و مشرکین مرا احاطه کرده بودند که جبرئیل این آیه را بر من نازل کرد؛ من نیز بر خاستم و مردم را به توحید و قبول رسالت فرا خواندم اما هیچ کس باقی نماند مگر آن که بر صورت من سنگ و خاک و آب دهان پاشید (فتح القدیر&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲/۵۷). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;همچنین ابن مردویه در روایتی دیگر از عائشه و ابی سعید خدری به سبب نزول دیگری برای این آیه اشاره می کند. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;امام فخر رازی در تفسیر کبیر به &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۰&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;سبب مختلف درباره نزول این آیه اشاره می کند و نهایتاً یک روایت را ترجیح می دهد و می گوید: با وجود تعدد روایات، اما أولی تر آنست که آیه را به ایمن داشتن پیامبر از مکر یهود و نصاری نسبت دهیم تا اینکه پیامبر بعد از نرول این آیه بدون ترس به تبیلغ دین بپردازد، و این با قبل و بعد آیه نیز مناسبتی کامل دارد (تفسیر کبیر&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱۲/۴۹).&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;اکثر روایاتی که سبب نزول آیه را قبل از واقعه غدیر خم می داند در ادامه به نزول آیه (الیوم أکملت لکم دینکم و أتممت علیکم نعمتی و رضیت لکم الإسلام دینا /مائده&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بعد از حدیث غدیر خم اشاره می کند زیرا امامت علی بن ابیطالب را در حکم کامل شدن دین و إتمام نعمت پروردگار بر بندگان می دانند (تاریخ دمشق&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۴۲/۲۳۷) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;در حالی که در صحیح بخاری آمده است: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;یهود به عمر بن خطاب گفتند: شما در کتابتان آیه ای را می خوانید که اگر درباره ما نازل شده بود آن روز را عید می گرفتیم. عمر به آنان گفتند: من می دانم که آن آیه کی و کجا نازل شده و پیامبر در آن زمان کجا بوده است؛ آن در روز عرفه بود و ما نیز در سرزمین عرفه بودیم (فتح الباری&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۸/۲۱۸). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;امام مسلم به این روایت اضافه می کند: و آن روز جمعه بود (مسلم تفسیر&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۴). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;در همین معنا از امام احمد و ترمذی نیز احادیثی نقل شده است. ابن جریر از طریق سفیان بن وکیع از عنتره روایت می کند که چون در روز حج اکبر آیه (الیوم اکملت لکم دینکم &amp;hellip;) نازل شد عمر گریه کرد؛ پیامبر از ایشان پرسیدند: چه چیزی تو را به گریه انداخت؟ ایشان گفتند: (أبکانی أنّا کنّا فی زیادۀ من دیننا فأما إذا کمل فإنه لم یکمل شیء إلا نقص) تفسیر طبری&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۶/۵۲.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;با توجه به روایاتی که بعضی از آنها ذکر شد در می یابیم که نسبت دادن نزول آیه ( یا ایها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربک &amp;hellip;) و همچنین آیه (الیوم أکملت لکم دینکم و أتممت علیکم نعمتی و رضیت لکم الإسلام دینا) به قضیه غدیر خم و بحث امامت و خلافت علی بن ابیطالب نیاز به توجیهات و تاویلات فراوانی دارد که چه بسا سبب ردّ و یا تضعیف روایات صحیح تر دیگری شود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بخش چهارم: احتجاج به حدیث غدیر خم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بررسی احتجاج به مضموم و مفهوم حدیث غدیر خم می تواند طریقی مهم و مفید جهت رسیدن به نتایج مناسب در مورد مقصود از ایراد این حدیث باشد. اما روایات صحیحی که در این زمینه بتوان بر آن اعتماد نمود وجود ندارد و مجموع روایات دارای صورت هایی از ضعف و غرابت هستند اما به بعضی از این روایات به فرض صحت آنها اشاره می کنیم:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;الف) مناشده علی بن ابی طالب در رحبه: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بارزترین روایت در این زمینه روایت منسوب به عبدالرحمن بن ابی لیلی در مسند امام احمد (&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱/۱۱۹) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;است که در بخش اول به آن اشاره شد (روایت مناشده علی بن ابی طالب در رحبه که از اهل بدر خواست بر شنیده ی خود در روز غدیر گواهی دهند). این روایت را ابن حجر نیز نقل می کند اما بعضی از رجال سند آن را منسوب به رفض و حدیث را ضعیف می داند. (الاصابۀ فی تمییز الصحابۀ&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲/۴۰۸-۴/۸۰) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;همچنین ابن کثیر این روایت را از امام احمد نقل می کند و آن را غریب می داند (البدایۀ و النهایۀ&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/۲۴۳) &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;و حتی هیثمی نیز در کتابش این روایت را ضعیف دانسته است (مجمع الزوائد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۹/۱۰۷). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;با وجود چشم پوشی از ضعف این روایت، اگر به تاریخ و مکان ایراد این روایت برگردیم در می یابیم علی بن ابیطالب در کوفه و در سال &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳۵&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;هجری یعنی در زمان خلافتش به حدیث غدیر احتجاج می کند تا&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;بدین وسیله توجه مردم شرور کوفه را به خود جلب کند تا چه بسا از عناد و مخالفت های خویش دست بردارند لذا بعید است که علی خواسته باشد در آن موقعیت و در میان آن قوم، سخنی از غصب خلافت و حقوق خویش و آن نیز در میان آن قوم زده باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ب) احتجاج علی به حدیث غدیر در روز جمل:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;مسعودی در مروج الذهب روایت می کند: سپس علی طلحه را صدا زد و گفت: ای أبا محمد! چه چیزی تو را خارج کرده است؟ طلحه گفت: طلب خون عثمان. علی گفت: خداوند هلاک کند آن را که مستحق تر به خون عثمان است، آیا نشنیدی که رسول الله صلی الله علیه و سلم فرمودند: (اللهم وال مَن والاه و عاد من عاداه) و تو نیز اولین کسی بودی که بیعت کردی اما نقض عهد کردی؟ پس طلحه با شنیدن این سخنان استغفار کرده و برگشت (مروج الذهب&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲/۳۷۳). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;این حدیث را مسعودی روایت کرده و حاکم در مستدرک آن را ضعیف دانسته است اما با وجود آن، چون به مضمون روایت بنگریم در می یابیم که مناظره علی با طلحه قبل از واقعه جمل صرفاً به خاطر پیشگیری از وقوع جنگ بین مومنین و لزوم نصرت علی به عنوان امیر المومنین است و بدین خاطر نیز علی بن ابی طالب به قسمت اول حدیث (من کنت مولاه فعلی مولاه) اشاره ای نمی کند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;ج) سلام انصار به علی در رحبه:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;امام احمد از ریاح بن حرث روایت می کند: گروهی در رحبه به نزد علی بن ابیطالب آمدند و گفتند: (السلام علیک یا مولانا!) علی در جواب گفتند: چگونه من مولای شما هستم در حالی که شما قومی عرب هستید؟ آنان گفتند: شنیدیم که پیامبر در روز غدیر فرمودند: (من کنت مولاه فعلی مولاه). ریاح بن حرث می گوید: چون رفتند در پی آنان رفتم و پرسیدم اینان چه کسانی بودند؟ گفته شد: گروهی از انصار که ابوایوب انصاری نیز در میان آنان بود (مسند امام احمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/۴۱۹). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ظاهر این روایت نشان می دهد که برداشت آنان از معنای مَولی غیر از معنایی بود که در لغت عرب استعمال می شد و بدین سبب بود که علی بر قول آنان اعتراض کرد. در روایتی دیگر آمده است که آنان از لفظ مَوالی استفاده کردند (مَوالیک یا أمیر المومنین) و علی نیز معنای حقیقی لفظ مَولی را برای آنان بیان کرد اما راوی از ذکر آن معنا خودداری کرده است (مسند امام احمد&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۵/۴۱۹). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شاید مقصود آنان معنای رعیت و مرئوس بود در حالی که علی بر اساس لغت معنای ناصر و مُحب را در نظر داشت و در این صورت از این روایت می توان در بحث معنای لغوی لفظ (مَولی) استفاده کرد. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;بخش پنجم: قول شیعه در مورد حدیث غدیر خم و دلائل آن: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;شیعه این حدیث را نص و دلیلی قاطع بر خلافت علی بن ابیطالب می داند و بر گفته ی خویش دلائلی می آورد که مهمترین آن در ذیل آورده می شود و مورد بررسی قرار می گیرد: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;دلیل اول:&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; نزول آیه (یا أیها الرسول بلّغ ما أنزل إلیک من ربک &amp;hellip;) &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;روایتی که نزول آیه را به قضیه غدیر خم نسبت می دهد در بخش سوم ذکر شد لذا در اینجا به کیفیت استدلال به این آیه می پردازیم: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;علامه مجلسی در بحارالأنوار می گوید: (خبرهای گذشته در مورد نزول آیه ( یا ایها الرسول بلغ &amp;hellip;) بیانگر آنست که مراد از مَولی (در حدیث غدیر) همان أولی به تصرف یعنی امام و خلیفه است زیرا تهدید پروردگار به اینکه اگر امر خداوند را ابلاغ نکنی هیچ امری از رسالتت را ابلاغ نکرده ای و همچنین ضمانت عصمت برای او اقتضاء می کند مقصود آیه ابلاغ حکمی مهم باشد که ابلاغش اصلاح دین و دنیا را برای همه مردم در بر داشته باشد تا به وسیله ی آن حلال و حرام تا روز قیامت مشخص شود. لذا پذیرش آن بر مردم سخت آمد؛ در احتمالات معنای مَولی نیز معنای خلافت از همه قوی تر است و مقصود خلافت علی است زیرا به وسیله آن احکام دین باقی می ماند و امور مسلمانان سامان می یابد و چون کینه مردم (که غالب آنان نیز منافق بودند) مظنّه برپایی فتنه بود پس خداوند تضمین نمود که پیامبر را از شر آنان مصون بدارد (بحار الانوار&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۳۷/۲۴۹). &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;Mso</description>
</item><item>
<title>عجيب‎ترين دروغ تاريخ</title>
<link>http://qalamlib.com/news/138</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;عجیب&amp;lrm;ترین دروغ تاریخ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قرائتی از شخصیت امام مهدی محمد بن حسن عسکری&amp;nbsp;&amp;nbsp;از دیدگاه شیعه دوازده امامی&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;احادیث زیادی در مورد مهدی از پیامبرصلى الله علیه وآله وسلم ثابت شده است، از جمله حدیثی که امام ابوداود از پیامبرصلى الله علیه وآله وسلم روایت کرده است که فرمود: اگر تنها یک روز از عمر دنیا باقی مانده باشد خداوند آن روز را آنقدر طولانی می&amp;rlm;کند تا مردی از اهل بیت من که اسمش مترادف اسم من است و اسم پدرش مترادف اسم پدر من است، برانگیخته شود و دنیا را آن طور که پر از ظلم و ستم شده، پر از عدل و داد کند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین در سنن ابوداود از قول پیامبرصلى الله علیه وآله وسلم آمده است که: &amp;laquo;مهدی جزء عترت من و از فرزندان فاطمه است&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;همچنین امام احمد در مسند خود از قول پیامبرصلى الله علیه وآله وسلم آورده است: &amp;laquo;مهدی از ما اهل بیت است که خداوند او را در شبی برای اصلاح می&amp;rlm;فرستد&amp;raquo;.و همچنین ابوداود نیز آورده است که پیامبرصلى الله علیه وآله وسلم فرمود: &amp;laquo;مهدی از من است، با پیشانی برجسته و بینی عقابی، زمین را چنانکه پر از ظلم و ستم شده بود، پر از عدل و داد می&amp;rlm;&amp;rlm;کند و هفت سال حکومت می&amp;rlm;کند&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و در صحیح مسلم نیز اشاره&amp;rlm;ای به مهدی شده است آنجا که پیامبرصلى الله علیه وآله وسلم فرمود: همیشه گروهی از امت من بر حق هستند و بر سر آن مبارزه می&amp;rlm;کنند و آن را تا روز قیامت اظهار می&amp;rlm;کنند و عیسی بن مریم نازل می&amp;rlm;شود، پس امیر آنها گفت: بیا و با ما نماز بخوان و می&amp;rlm;گوید: خیر، بعضی از شما بر بعضی دیگر امیر هستید و خداوند این امت را گرامی داشته است. علما فرموده &amp;rlm;اند که این مردی که جلو می&amp;rlm;آید و با عیسی نماز می&amp;rlm;خواند، همان مهدی است و بعد از عیسی زمام امور را به دست می&amp;rlm;گیرد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;داستان مهدی طبق عقیده شیعه دوازده امامی داستان عجیبی است که تار و پود آن توسط خیال بافته شده و حوادث و حالات آن خیالی است و بعد از آن به یکی از اسطوره&amp;rlm;های زمان تبدیل می&amp;rlm;شود، که عقل سالم و فطرت صحیح آن را نمی&amp;rlm;پذیرد تا جایی که سایر فرقه&amp;lrm;های شیعیان غیر از خودشان آن را نمی&amp;rlm;پذیرند. پس شایسته نیست که فرد عاقل این سخن را بپذیرد که به او گفته شود: بخواب که شب طولانی است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ای شیعیان:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در مورد شخصیت مهدی، محمد بن حسن عسکری، شک و تردیدهای فراوانی وجود دارد با وجود اینکه این عقیده از لوازم ایمان محسوب می&amp;rlm;شود که تارک آن از دیدگاه شیعه دوازده امامی کافر محسوب می&amp;rlm;شود، پس این شک و تردیدها چیست؟! شیعیان در این عقیده می&amp;rlm;خواهند از دشمنانشان انتقام بگیرند!!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ای شیعیان:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاید بعضی&amp;lrm;ها این مسأله را برای این به تصویر بکشند که علت طرح این مسأله بغض و کینه نسبت به اهل بیت یا تقلیل جایگاه و منزلت آنان است. چرا که این دلیل و برهان کسانی است که می&amp;lrm;خواهند میان تو و حقیقت جدایی بیاندازند، پس هرگاه کسی بخواهد که از حقیقت بعضی از عقاید مخالف کتاب خدا اطلاع پیدا کند، به او گفته می&amp;lrm;شود که: دشمن اهل بیت است!!در حالی که جایگاه اهل بیت (علیهم السلام) نزد مسلمانان واضح و روشن است و علما بر وجوب محبت آنها و تبعیت از آنها نص دارند( ) و واقعیت آنها شاهد این امر است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ای شیعیان:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این رساله دعوتی است برای هر کس که به محمد بن حسن عسکری ایمان دارد و اشتیاق خروج او را دارد و با زبانش دعای تعجیل فرج را می&amp;rlm;خواند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این رساله هر شیعه&amp;rlm;ای را دعوت به خواندن صفحات آن و تأمل در آن برای رسیدن به حقیقت می&amp;rlm;کند تا در خواب عمیق نمانند. و تا وقتی بیدار نشوند که دیگر وقت گذشته و نامه اعمال انسانها پخش شده باشد.این رساله عقل را دعوت می&amp;rlm;کند تا نشانه&amp;rlm;های این شخصیت را بشناسد تا علتی برای بیداری از خواب زیبا و سنگین باشد...این رساله كه بنام عجیب&amp;lrm;ترین دروغ تاریخ در بخش اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم در كتابخانه عقیده نشر شده جواب و دعوتی برای پاسخ به این سؤال مهم است که... چه وقت نورت شروع به تابیدن می&amp;lrm;کند ای مهدی منتظر؟&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ تضاد مفاتيح الجنان با قرآن به زيور طبع آراسته گردید</title>
<link>http://qalamlib.com/news/137</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 0pt; line-height: 200%; text-align: justify;&quot;&gt;كتابِ تضاد مفاتیح الجنان با قرآن&lt;br /&gt;
مفاتیح الجنان یكی از كتب ادعیه معروف شیعه می باشد كه همیشه همراه زوار شیعه در اماكن مقدس دیده می شود، جالب است بدانید كه این كتاب مملو از كفریات و شركیاتی است كه مؤلف محترم كتاب تضاد مفاتیح الجنان با قرآن جناب آیت الله العظمى سید ابوالفضل ابن الرضا برقعی قمی كه خود قبل از هدایت به مذهب اهل سنت یكی از مجتهدین مذهب باطل رافضه اثناعشری بوده آنرا افشا می نماید.&lt;br /&gt;
خدای تعالی برای مسلمین قرآن را میزان قرار داده تا مطالب دینی خود را با آن بسنجند و باطل و غیرباطل را از یکدیگر جدا سازند و دین او را آلوده ننمایند و هم&amp;zwnj;چنین رسول خداصلى الله علیه و آله و سلم و سایر بزرگان بسیار سفارش کرده&amp;zwnj;اند که هر خبری از ما رسید فوری قبول نکنید و با کتاب الهی بسنجید اگر موافق آن بود بپذیرید وگرنه نپذیرید، چگونه مسلمانان به انحراف افتاده&amp;zwnj;اند؟! و کتاب خدا را رها نموده&amp;zwnj;اند؟!! از آن جمله حضرت رسول صلى الله علیه و آله و سلم چنانکه در (جلد 18 وسائل الشیعه ص 78)، و هم کتاب کافی روایت کرده&amp;zwnj;اند فرموده: &amp;laquo;فما وافق کتاب الله فخذوه وما خالف کتاب الله فدعوه&amp;raquo; یعنی، &amp;laquo;آنچه موافق کتاب خداست بگیرید و آنچه مخالف کتاب خداست رها کنید&amp;raquo;. و در همین کتاب از حضرت صادق ؛ روایت کرده که فرموده: &amp;laquo;فما لم یوافق من الحدیث القرآن فهو زخرف&amp;raquo;. و نیز فرموده: &amp;laquo;کل شیء مردود إلى الکتاب والسنة وکل حدیث لا یوافق کتاب الله فهو زخرف&amp;raquo;. &amp;laquo;بازگشت و مرجع همه&amp;zwnj;ی سخنان کتاب خدا و سنت رسول الله است، و هر حدیثی که با کتاب خدا مخالف باشد پس آن زخرف و بیهوده است&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
پس بر فرد فرد از مسلمین واجب است احادیث و یا دعاها و زیاراتی را که مخالف قرآن، یعنی بر خلاف هدایت الهی وارد شده ترک کنند، و در واقع با کتاب الهی جنگ و مبارزه ننمایند، و بدانند که هر متاعی میزانی دارد، یعنی، اگر شما به دکان عطاری بروی و بخواهی مقداری زعفران یا چیز دیگری خریداری کنی باید مقدار متاع و کم و زیاد آن با میزان و ترازویی معلوم باشد. و همچنین اگر مغازة بزازی رفتی و خواستی پارچه و طاقه&amp;zwnj;ای از فاستونی خریداری کنی باید متری باشد که اندازة آن را معلوم کند که اگر در کم و زیاد آن نزاعی روی داد میزانی برای تعیین کم و یا زیاد باشد که صدق و کذب فروشنده را معلوم کند. آیا دین اسلام که دینی الهی است، و خدا آن را برای بندگان خود تا قیامت مقرر داشته می&amp;zwnj;توان گفت: میزانی برای آن معین نکرده که هر کس هر چه در این دین وارد کند و یا کم و زیاد نماید و بنام دین به مردم عرضه بدارد صدق و کذب آن معلوم نشود؟ و یک میزان الهی که با آن میزان بسنجند نباشد، و هر چه کم و زیاد کنند معلوم نباشد؟ البته خیر. زیرا اسلام از یک دکان عطاری کمتر نیست و خدا برای دفع کم و یا زیادی مطالب آن میزانی معین کرده، و در قرآن فرموده:. &amp;laquo;خدا ذاتى است که این کتاب را نازل نموده بحق و میزان&amp;raquo;.(الشوری: 17)&lt;br /&gt;
که قرآن را میزان قرار داده برای دین خود تا مسلمین هر چه بنام دین به ایشان عرضه می&amp;zwnj;شود با قرآن بسنجند و دین خود را از کم و زیاد و ورود مطالب ضد دینی حفظ نمایند. ولی مسلمین در اینجا کوتاهی کرده و هر چه بنام دین به دست ایشان رسیده پذیرفته و با این میزان نسنجیده&amp;zwnj;اند. از آن جمله، کتب دعاهای دینی و زیارات دینی ایشان است که راویان ساده دل و محدثین و مقدسین خوشباور هر چه کفر و زندقه و خرافات و موهومات بوده بنام دعا و یا زیارت در میان مردم منتشر ساخته&amp;zwnj;اند و گویا مسلمین خواب بوده و کسی در صدد نبوده این احادیث و ادعیه و یا زیارات را با عقل و تفکر با قرآن بسنجد. هر خرافه&amp;zwnj;ای را بنام دعا و زیارت در میان مسلمین نشر ندهد. در اینجا تمام مسلمین مقصرند و در این امر، بسیار کوتاهی شده است.&lt;br /&gt;
نویسنده این کتاب جناب آیت الله العظمى علامه سید أبوالفضل بن الرضا برقعى قمى در مقدمه این کتاب خود می فرماید:&lt;br /&gt;
نویسنده این کتاب که خود را مسلمان می&amp;zwnj;دانم و سالها در علوم دینی زحمت کشیده و بتصدیق مراجع دینی و علمی چهل و پنج سال است که مجتهد می&amp;zwnj;باشم، برای رضای خدا و خدمت به سایر مسلمین این وظیفة دینی را بر خود لازم و واجب دانستم و چندین کتاب در این مرحله نوشته&amp;zwnj;ام و برای دفع خرافات و موهومات و حفظ دیانت اسلام از غبار اوهام، کتاب بت&amp;zwnj;شکن و یا عرض احادیث اصول بر قرآن و عقول، و هم کتاب خرافات وفور در زیارات قبور و هم کتاب بررسی علمی در احادیث مهدی و کتب دیگری را نوشتم، و همچنین این مختصر را بنام تضاد مفاتیح الجنان با قرآن تحریر نمودم. ولی متأسفانه دکانداران مذهبی از ترس کساد دکان&amp;zwnj;های خود تاکنون نگذاشته&amp;zwnj;اند کتب اینجانب طبع و نشر گردد و مانع چاپ آن شده&amp;zwnj;اند. ولی چون قصد نویسنده رضای الهی و انجام تکلیف دینی و بیداری هم&amp;zwnj;وطنان بوده، امیدوارم خدای تعالی تفضل کند و توسط نشر این کتب مردم و ملت را بیدار و هشیار سازد و از خرافات و موهومات نجات عطا فرماید. آمین یارب العالمین.&lt;br /&gt;
بدانکه حاج شیخ عباس قمی عالمی بود متبع و بسیار ساده و خوش باور و قوه&amp;zwnj;ی اجتهاد نداشت، و میزان صدق و کذب اخبار و احادیث و ادعیه و زیارات را فقط نقل شیخ طوسی و یا شیخ کفعمی و یا ابن طاووس و یا مجلسی و یا شیخ نوری و یا صدوق و کلینی و یا ابن المشهدی و امثال اینها دانسته و اعتماد می&amp;zwnj;کرد. و به کسانی که ایشان از آنان روایت کرده&amp;zwnj;اند نظر نداشت با اینکه راویان قبل از ایشان اکثرا یا غلات یا ضعفاء و یا کذابین و یا مردمان مجهول المذهب و یا فطحی و یا ناوسی و یا مهمل بوده&amp;zwnj;اند. و متاسفانه در کتاب مفاتیح الجنان نام راویان را ذکر نکرده تا شخص ملاحظه کند و ارزش روایات و منقولات ایشان را بداند. اکثر راویان ادعیه و زیارات از غلات بوده که هم بی&amp;zwnj;سواد بوده و هم به قول حضرت صادق ؛ بدتر از مشرکین می&amp;zwnj;باشند. و ما با مراجعه به احوال ایشان دیدیم که اکثر این راویان یا مجهول و یا مهمل و یا غالی می&amp;zwnj;باشند، مانند: سهل بن زیاد کذاب و عباس بن عامر مجهول و احمد بن رزق الکوفی مجهول و علی بن حسن بن فضال واقفی و محمد بن مشعل المشعل مجهول و قطرب بن علیف مهمل و عبدالرحمن سابط مهمل و جابر بن یزید غالی و عثمان بن جنید مهمل و محمد بن ابی زید مجهول و سهل بن یعقوب مجهول و محمد بن سلیمان الدیلمی فاسق ضعیف و ابراهیم بن مامون مهمل و اسحق بن یوسف مهمل و اسحاق بن عمار فطحی و امثال اینان می&amp;zwnj;باشند. و اگر در مفاتیح نام راویان را ذکر می&amp;zwnj;&amp;zwnj;کرد اهل تحقیق به بی&amp;zwnj;ارزشی مطالب آن واقف می&amp;zwnj;شدند.&lt;br /&gt;
شیخ عباس قمی معلوماتش منحصر بوده به اخبار مذهبی و خرافاتی که از مجعولات غلات می&amp;zwnj;باشد. خصوصا افکار باطله بعضی از اخباریین، زیرا استاد و معلم او که دانش خود را از او فراگرفته، حاجی میرزا حسین نوری صاحب کتاب &amp;laquo;مستدرک الوسائل&amp;raquo; می&amp;zwnj;باشد، و او کتابی نوشته است بنام: &amp;laquo;فصل الخطاب فی تحریف کتاب رب الأرباب&amp;raquo; و کتاب خدا قرآن را تحریف شده می&amp;zwnj;داند، و به نوشتن آن کتاب چشم یهود و نصاری را روشن نموده و می&amp;zwnj;گوید قرآن کم و زیاد شده، مانند: تورات و انجیل، و اتفاقاً این شاگرد با استاد خود هم عقیده است، زیرا در مفاتیح در اعمال روز جمعه می&amp;zwnj;نویسد: &amp;laquo;و بدانکه از برای خواندن آیة الکرسی علی التنزیل در روز جمعه فضیلت بسیار روایت شده&amp;raquo;، و در حاشیة آن می&amp;zwnj;نویسد: &amp;laquo;علامة مجلسی فرموده که بروایت علی بن ابراهیم و کلینی آیه الکرسی علی التنزیل چنین است: (اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَیُّ الْقَیُّومُ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ لَهُ مَا فِی السَّمَاوَاتِ وَمَا فِی الْأَرْضِ). و ما بینهما و ما تحت الثری عالم الغیب و الشهادة الرحمن الرحیم&amp;nbsp;&amp;nbsp;(مَنْ ذَا الَّذِی یَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ یَعْلَمُ مَا بَیْنَ أَیْدِیهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا یُحِیطُونَ بِشَیْءٍ مِنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ وَسِعَ كُرْسِیُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَلَا یَئُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِیُّ الْعَظِیمُ).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;این محدثین ما به اخبار منافقین و معاندین دین اسلام معتقد شده و خیال می&amp;zwnj;کنند که قرآن دست خورده و کم و زیاد شده است. غافل از آنکه خدای تعالی ضمانت نموده که کتاب خود را از کم و زیاد حفظ کند، و از آن جمله در قرآن فرموده: (إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ) (الحجر: 9). &amp;laquo;البته ما خودمان این قرآن را نازل نمودیم و بی&amp;zwnj;گمان که البته آن را نگهبانیم&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و اخباری که دلالت بر تحریف قرآن دارد تماماً ضعیف و قرائن جعل در آنها زیاد است، چنانکه آیت الله خوئی در کتاب البیان خود کاملاً مرقوم داشته، و ما نیز در مقدمة کتاب تابشی از قرآن مستدلا نوشته&amp;zwnj;ایم، هر کس خواهد مراجعه نماید.&lt;br /&gt;
و قمی چنانکه اشاره شد. به مطالب مندرجة در متن دعا و یا زیارت و یا سایر احادیث کاری نداشت، و لذا ایشان مانند بسیاری از محدثین، هر چه از راویان محل وثوق و یا غیروثوق خودشان دیده جمع کرده و منتشر ساخته و از دقت در متون آنها غفلت نموده است.&lt;br /&gt;
ما در این کتاب و سایر کتب خود با دلیل و برهان ثابت کرده&amp;zwnj;ایم که اکثر این روایات و احادیث ساخته و پرداختة اهل &amp;laquo;غلو و کذابین و جعالین&amp;raquo; است، اگرچه راویان و ناقلان آنها مردمان زاهد و عابد و عادل باشند، بصرف آنکه راوی و ناقل عادل است نباید گول خورد و باید متن حدیث و مطالب آن را مطالعه و با قرآن سنجید. به بسیار احادیث باطله که راویان آنها مردمان ساده و عادلی بوده&amp;zwnj;اند ولی سازندة آن حقه بازی کرده و بدست دیگران منتشر ساخته است. اگرچه اکثر راویان این احادیث طبق علم رجال معلوم می&amp;zwnj;باشد که از &amp;laquo;کذابین و جعالین و اهل غلو&amp;raquo; می&amp;zwnj;باشند، و حضرت صادق ؛ فرموده: (إن الغلاة شر من الیهود والنصاری والمشرکین) یعنی، &amp;laquo;البته غلوکنندگان از یهود و نصاری و مشرکین بدترند&amp;raquo;. و همین غلات اکثر این روایات را در میان مردم ساده و عوام زمان&amp;zwnj;های قبل منتشر ساخته&amp;zwnj;اند. خصوصاً در قرن سوم که حوزة علمیه و یا دانشگاهی در میان مسلمین نبوده و هر کس هر چه خواسته بدست مردم زاهد و عابد جعل و منتشر ساخته و باعث گمراهی و نادانی مسلمین گردیده است.&lt;br /&gt;
به هر حال، کتاب مفاتیح الجنان چنانچه مختصراً بعرض خواهد رسید مملو است از خرافات و موهومات و ساخته&amp;zwnj;&amp;zwnj;های &amp;laquo;جعالین وکذابین وغلاة&amp;raquo; اولیه که بنام دعا و یا زیارت بدست محدثین و ثقات و راویان مذهبی منتشر ساخته&amp;zwnj;اند.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند این کتاب گرانقدر &amp;nbsp;كتابِ تضاد مفاتیح الجنان با قرآن&amp;nbsp;&amp;nbsp;را از بخش مستندات کتابخانه عقیده بدست آورند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مناجات حاجى با پروردگار متعال در حرمین شریفین</title>
<link>http://qalamlib.com/news/134</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;مناجات حاجى با &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;پروردگار متعال در حرمین شریفین&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; من آمده ام عضويت خودم را در دين حنيف ابراهيم از اينجا اعلام كنم ، آري ابراهيم حنيف اولين عضو دين حنيف بود، حنيف يعني اعراض كننده از تمام اديان باطل و خدايان باطل و روي آورنده به دين حق و خداي حق ، طبيعي است حاجي آمده است در اينجا بگويد كه:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; ابراهيمِ خليل، آن موحد بزرگ براي قبولي در امتحان تو ، نه تنها از همه چيزش گذشت كه حتي حاضر شد با كارد گلوي تنها فرزند عزيزش را بِبُرد، و او با اين عمل بر گلوي تمام خواسته هاي خودش كارد كشيد كه از خودش و براي خودش هيچ كاري نكند هر چه مي كند از تو و براي تو باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt; ابراهيم خليل با زدن تبر بر سر بت ها ،فقط بت هاي بي جان را نشكست، او با اين كار بر سر تمام بتهاي جان دار و بي جان ، دروني و بيروني ، خودي و غير خودي تبر زد، همه را شكست ونابود كرد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt; اينكه تو تمام حركات ابراهيم و همسر و فرزندش را در ريگستان داغ عربستان، در حرم كعبه، صفا و مروه، مِنا و مزدلفه وعرفات، همه را از علامات توحيد و يكتا پرستي قرار دادي نه به خاطر ابراهيم و اسماعيل و هاجر بلكه بخاطر آنكه آنها در تمام اين مراحل فقط ترا به يكتايي مي پرستيدند، و دستورات ترا بدون چون و چرا اجرا مي كردند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; قبر هيچكدام از بندگان پاكت بشمول خود ابراهيم خليل و همسر و فرزند فداكارش و بشمول پيامبر عزيز و دوست داشتني ات محمد مصطفي ـ صلي الله عليه و آله وسلم ـ كه آخرين و بهترين پيامبرانت بود، را جزو مناسك حج قرار ندادي تا به ما بندگان گنهكارت بفهماني كه در ميدانِ ايمان و عمل مقصود خدا محوري است، نه پيامبر محوري و بنده محوري، و تا اينكه به ما بفهماني كه وقتي قبر ابراهيم خليل و محمد مصطفي عليهما السلام مركز توجه بندگان و جاي عرضة مشكلات و جاي آه و ناله و زاري نيست پس هيچ قبر ديگري در هيچ نقطه ديگري از جهان نمي تواند چنين باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; ما مي دانيم كه تو كه خدا محوري را مقصود قرار دادي هرگز با اوليايت دشمن نيستي آنها بهترين دوستان تو هستند پيامبران صادق و اولياي پاكت چونكه ترا به يكتايي مي پرستيدند&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;و حل هر مشكلشان را از تو مي خواستند تو آنها را بشدت دوست مي داري اما چونكه پرستش ويژه توست نخواستي كه ما آنها را با تو شريك بگردانيم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; ما مي دانيم كه تو حكيم و دانا و شنوا وبينايي، هر سخن و مناجاتي را مي شنوي، هر راز نهان وآشكاري را مي داني، هر دعايي را مي شنوي و اجابت مي كني، چونكه تو قادر وتوانايي، به ما نزديكي بدون پارتي و رشوت ، آه ونالة همة بندگانت را مي شنوي، هيچ احتياجي به وسيله و واسطه نداري ، حتي اگر فقيرترين بنده ات در هر گوشه اي از دنيا بدور از تمام وسيله ها و واسطه ها و بدون نيازها و نذرانه ها در دل شب يا در بخشي از روز دستانش را عاجزانه&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;بسوي تو بلند كند و ترا براي رفع حاجتش بخواند ، ما ايمان كامل داريم كه تو فرياد او را مي شنوي و اجابت مي كني.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; ما ميدانيم كه دين تو براي همة مردم است و همه در نزد تو برابرند نژاد و رنگ و پول ومنصب و امتيازهاي مختلف مادي دنيا و حتي مدارك عالي و القاب مقدس هيچ كسي را در نزد تو ازكس ديگري جلو نمي اندازد ، معيار سنجش خوب و بد فقط تقوا است، پس از ايمان صادقانه ، هر كس تقوا و پرهيزگاريش بيشتر باشد در نزد تو محبوبتر است و لو اينكه فقير و تنگدست باشد وحتي نان شبش را هم نداشته باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; پس ترا شاهد و گواه مي گيريم كه ما حج را عبادت مي دانيم نه گردش و تفريح ، و وسيله شهرت و افتخار بر ديگران، بنابر اين به همة مان اخلاص عنايت فرما و حج وتمامي عبادات ما را براي خودت خالص گردان ، و ما را از هر گونه شرك و رياكاري و بدعت و معصيت پاك بدار.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; ما بخاطر رضاي تو آمده ايم تا دعوت تو را لبيك گوئيم و اينك كه از همه چيز دل بريده ايم از تو مي خواهيم كه به ما توفيق توبه نصوح&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;عنايت فرمايي تا اينكه زندگي پس ازحج ما چون زندگي قبل از حجمان ملوث به گناهان و تقصيرات نگردد، ما تصميم گرفته ايم و از تو توفيق مي طلبيم كه از هم اكنون ديگر نافرماني ترا نكنيم .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پس &lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;الهى!&lt;/SPAN&gt; گواه باش كه فرايضت را ترك نخواهيم كرد &lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;و براي زنده كردن سنتهاي &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;پ&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;يامبرت ـ صلي الله عليه وآله وسلم ـ تلاش خواهيم كرد، كار حرام انجام نخواهيم داد، ظلم نخواهيم كرد، حق كسي را تلف نخواهيم كرد، دروغ نخواهيم گفت، تهمت نخواهيم زد، گمان بد نخواهيم برد، خبر چيني نخواهيم كرد، با خويشان وهمسايگان رابطه نيك خواهيم داشت، قرآن را مهجور&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;و متروك نخواهيم گذاشت ، به فقرا و مستمندان كمك خواهيم نمود، همواره در طلب علم سعي و تلاش خواهيم كرد ، اگر خود نتوانيم فرزندانمان را براي خدمت قرآن آماده خواهيم كرد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;بارالها!&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; خلاصه اينكه من تصميم جدي دارم كه از اين پس زندگي صد در صد اسلامي داشته باشم توفيق و راهنمايي از تو مي خواهم، پس الهى! از من و مسلمانان بپذير و ثبات و استقامت عنايت فرما.&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ بهترين انسان‌ها بعد از يامبران</title>
<link>http://qalamlib.com/news/132</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;كتابِ &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;بهترين انسان&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: blue; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;ها بعد از يامبران&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;الله جل جلاله پیامبرش را در میان گروهی از خلق خود یعنی اصحاب برگزیده است که او را بر جان و مال خود برتری داده&amp;zwnj;اند و در هر حال خود را فدای ایشان نموده&amp;zwnj;اند &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;آنان آموزه&amp;rlm;های دین را رساندند و دلسوزانه مسلمانان را نصیحت نمودند و با اجتهادات زیبا و پر برکت خود، راه&amp;rlm;های دین را تهذیب و پاک نمودند و اسباب آن را تقویت نموده تا آثار نعمت&amp;rlm;های الله بر مردم تبلور شد، و دینش پابرجا و استوار گردید و خط و نشانه&amp;rlm;هایش واضح و آشکار گردید .و شرک و بت&amp;rlm;پرستی را خوار و زبون نموده و شاخه&amp;rlm;هایش را پایین آورده و ساقه&amp;rlm;هایش را نابود نمودند. و دین الله برتری خود را یافت و دین و کیش کافران را پَست و فرومایه و بی&amp;rlm;ارزش نمود. پس درود و رحمت و برکت الله بر جان پاک و روح بلند و پاکیزه&amp;rlm;اشان.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;آنها در زندگی خود اولیاء و دوست الله بودند و پس از مردن نامشان زنده و جاوید ماند. و برای بندگان خدا نصیحت&amp;rlm;گر و خیرخواه شدند. آنها پیش از اینکه به دنیای آخرت برسند بدانجا سفر نموده بودند، و از دنیا رفتند در حالی نامشان در آن جاويدان است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;آنان یاران پیامبر، بهترینان امت&amp;rlm;اند. اهل عمل و کردار نیک و جوانمردی و بخشندگی بودند. با عدالت خود ریاست و فرمانروایی جهان را به دست گرفتند و با نور خود تاریکیها را زدودند......&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 10pt; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;اينك كه كتابخانه عقيده در بخش اصحاب رسول الله صلي الله عليه وآله وسلم &lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/view_book.php?rowID=558&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;كتابِ &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;COLOR: red; TEXT-DECORATION: none; text-underline: none&quot;&gt;كتابِ &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-DECORATION: none; text-underline: none&quot;&gt;بهترين انسان&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;EN-US&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-DECORATION: none; text-underline: none&quot;&gt;&amp;zwnj;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-DECORATION: none; text-underline: none&quot;&gt;ها بعد از يامبران&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; را خدمت شما عزيزان تقديم مي كند از بارگاه الله سبحانه وتعالی می خواهیم که کینه و بغض و عداوت نسبت به بهترین انسانهای روی زمین را از دل مسلمانان بزداید. آمین&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ چرا نام حضرت علي رضي الله عنه در قرآن نيست؟</title>
<link>http://qalamlib.com/news/128</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ چرا نام حضرت علی رضی الله عنه در قرآن نیست؟!&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;در قرآن کریم ذکری از حضرت علی نیست، پس نتیجه میگیریم که حضرت محمد صلی الله علیه وآله وسلم اصلاً جانشینی نداشته اند.&lt;br /&gt;
الله جل جلاله حفاظت حدیث را تضمین نفرموده لذا همین است که می بینیم شیعه هزاران حدیث را در باره علی وباقی امامانشان جعل کرده بلکه امامها را مصدر حدیث دانسته و از زبان پیغمبر هر چه خواسته دروغ بافته و حتی علی را از حضرت ابراهیم بالاتر دانسته حضرت علی که هیچ، حتی امام تقی و نقی را از حضرت عیسی و حضرت موسی بهتر دانسته و همه این گفته ها را به روز احادیث ساختگی ثابت کرده ولی در قرآن چونکه حریم ممنوع بوده نتوانسته اباطیل خود را داخل کند.&lt;br /&gt;
اگر به راستی حضرت علی جانشین پیغمبر می بود اگر امامت از اصول دین باشد اگر علی معصوم و از ابراهیم بالاتر باشد بالاخره اگرائمه مصدر قانون گذاری در اسلام باشند باید در قرآن حد اقل دهها آیه دراین باره میبود.&lt;br /&gt;
ولی عملاً یک آیه هم نیست. این یعنی چه؟ از نظر ما یعنی اینکه الله جل جلاله برای پیغمبر خویش جانشینی برنگزید و هرچه که دراین باره در بین شیعه ها منتشر است همانا حرفهای (مَا أَنْزَلَ اللَّهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍ) است حرفهای که سند از طرف خداوند ندارد.........برادران و خواهران مسلمان می توانند این کتاب جالب را از بخش اهل بیت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم بدست آورند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ زيارت قبور بين حقيقت و خرافات</title>
<link>http://qalamlib.com/news/126</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ زیارت قبور بین حقیقت و خرافات&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;استاد حیدر على قلمداران قمى، كسى كه با خرافات و بدعت هاى موجود در مذهب شیعه به مقابله پرداخت و در این راستا كتابها نوشته است در كتاب &amp;laquo;راه نجات از شر غلات&amp;raquo; پنج بحث به میان آورده كه یك بحث آن موضوع زیارت است زیرا غالیان این زمان در ادعای خود به ولایت تكوینی و تصرف چهارده معصوم به ملكوت زمین و آسمان به پاره ای از فقرات زیارتنامه ها تمسك جسته اند چون فقرة: &amp;laquo;السلام علیكم یا عین الله الناظرة و یده الباسطة&amp;raquo; ترجمه: (سلام بر شما ای چشم بینای خداوند و ای دستش كه آنرا می گشاید). و امثال آن, از این رو ناگزیریم كه در اصل مسألة &amp;laquo;زیارت&amp;raquo; و مشروعیت آن به طریق علمی به تحقیق بپردازیم:&lt;br /&gt;
مسلم است كه &amp;laquo;زیارت&amp;raquo; بدین كیفیت در دین مقدس اسلام حقیقتی ندارد و قطعاً از احكام &amp;laquo;ما أنزل به الكتاب و أرسل به الرسول&amp;raquo; نیست و هیچ پیغمبری در شریعت خود حكمی برای زیارت نیاورده و در هیچ دینی از ادیان حق إلهی, عبادتی به عنوان زیارت قبور تشریع نشده است. شاهد این مطلب كتب موجودة آسمانی و عدم وجود قبور انبیای بیشمار إلهی و نوادگان آنان است. و قرآن مجید و فرقان حمید نیز نه تنها در هیچ آیـه ای اشاره بدین عمل ندارد بلكه از این عمل مذمت نیز شده است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;اگر روزی هم زیارت مرقد اولیاء برای رضای خدا بوده باری امروز اكثراً برای اعمالی است مورد نهی شرع كه سبب ملامت و مذمت خدای اكبر و موجب حسرت و ندامت در روز محشر است زیرا چنانكه گفتم در كتاب الله, زیارت از ابتدای بعثت حضرت ختمی مرتبت صلی الله علیه وآله وسلم مورد نفرت و كراهت شریعت بوده است .چنانچه فقرة متواترة:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;إنی نهیتكم عن زیارة القبور&amp;raquo;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;(من شما را نهی کردم از زیارت قبور).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;براین مدعی دلیلی روشن و برهانی متقن است. و اگر جملة بعد از آن مورد استناد مدعی قرار گیرد كه مقام رسالت پس از نهی امر بعد الحظر فرموده است كه: &amp;laquo;ألا فزوروها فإنها تذكركم الآخرة ( الموت )&amp;raquo;. اكنون قبرستانها را زیارت كنید كه آن آخرت (مرگ) را به یاد شما میاورد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;بدیهی است اینگونه زیارت قبور كه انسان را به یاد مرگ و آخرت می افكند در این زیارتگاههای پر جلال و جبروت و آراسته به انواع زینتهای دنیا از ضرایح سیمین و گنبدها و نیز گلدسته های زرین و ایوانهای طلا و آئینه كاری و فرشهای گرانبها و لوسترها و شمعدانهای زیبا, نه تنها خاصیت تذكر آخرت و یاد مرگ را ندارد, بلكه تماشای آنها خود محركی قوی برای جمع آوری زینتها و توجه شدید به دنیاست.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند این كتاب گرانبها را از بخش رد شبهات کتابخانه عقیده&amp;nbsp;&amp;nbsp;دریافت نمایند.&lt;br /&gt;
وبرای آشنایی با مؤلف محترم&amp;nbsp;&amp;nbsp;این صفحه را مطالعه فرماید.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ اسلام و نابسامانيهاي روشنفکران</title>
<link>http://qalamlib.com/news/125</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 0pt; direction: rtl; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ اسلام و نابسامانیهای روشنفکران&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 0pt; direction: rtl; line-height: 200%; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;بسیاری از روشنفکران و فرهنگیان امروز در باره دین دچار مشکلات فراوان و افکار پریشان شده اند؛ و در این فکراند که آیا دین یکی از حقایق حیات و ارکان زندگی است؟ و بفرض اینکه چنین بوده در آینده نیز چنان خواهد بود؟ در صورتیکه امروز علم و دانش مسیر زندگی را تغیر داده و در همه شئون اجتماعی وارد شده است. امروز جهان برای درک مطالب علمی آماده گشته و در روی زمین جز برای علم و حقایق علمی پایگاهی نیست، آیا دین هم دوشادوش دانش پیش میرود؟ و یا اینکه با پیدایش علوم، خاصیت خود را از دست میدهد و سرانجام موضوع آن خود بخود از میان رفته و مقامش بعلم و دانش واگذار میگردد؟ و بعبارت دیگر، در جهان امروز پایگاهی دین برچیده شده؟ و بجای آن حقایق علمی به رسمیت شناخته خواهد شد.&lt;br /&gt;
آیا دین مورد احتیاج جامعه بشریت است؟ و یا اینکه یک سلیقه شخصی است؟ هرکس بخواهد دیندار و هرکس بخواهد بی دین میشود، و هردو یکسانند!؟&lt;br /&gt;
سپس این قوم نسبت به دین اسلام نیز از دریچه همین افکار مینگرند، و با مشکل بزرگتری روبرو میشوند؛ زیرا که رهبران اسلام به مردم میگویند که این دین یک قماش مخصوصی است، تنها عقیده نیست، تنها تهذیب روح و تربیت فضائل اخلاق نیست، بلکه با همهء اینها یک نظام عدالت اجتماعی و اقتصادی متوازن و قانون جزائی و سیاسی و مدنی متناسب است، یک آئین روشنفکری و تربیت بدنی مترقی است، که یک رشته هم آهنگی های کامل جزئیات آنرا با هم بافته و بر اساس عقیدۀ فطری استوار ساخته، و با فضائل اخلاق و تهذیب روح آمیخته است، همینطور این گروه روشنفکر در میان امواج این افکار پریشان سرگردانند، سپس در سراشیب این افکار ناگهان با رهبران اسلام روبرو میشوند!! آنان میگویند که این دین از آثار باستانی نیست، تا امروز آنرا در موزه افکار و نمایشگاه عقاید به تماشا بگزاریم، بلکه یک موجود زنده ایست که هنوز هم با دقت کامل نظر به زندگی آینده بشریت دارد، در این هنگام ناراحتی آنان شدیدتر شده، عنان گسیخته و بی تابانه نعره میزنند، آیا این همان دین است که آئین تیول و بردگی&amp;nbsp;&amp;nbsp;را مباح کرد و سیستم سرمایه داری را برسمیت شناخت؟ آیا این همان آئین است که زن را نصف مرد قرار داده؟ و حال آنکه بشر، بشر است، چه مرد و چه زن!!&lt;br /&gt;
آیا این همان نظام است که سنگسار کردن و تازیانه زدن و دست بریدن را جزو قوانین کیفری خود قرار داد؟&lt;br /&gt;
آیا چنین نظامی ممکن است در مقابل قوانین علمی پایدار بماند؟ آیا امید هست که چنین دینی در این مبارزه پیروز شده و مقام خود را حفظ نماید؟&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند برای دریافت جواب این سوالات كتابِ اسلام و نابسامانیهای روشنفکران را از بخش فکر و اندیشه کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;br /&gt;
&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; LINE-HEIGHT: 200%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ مقدمه ابن خلدون شامل کِتاب العِبَرِ وَ دِیوانُ اَلمُبتَدإ وَ الخبَرِ فی أَیامِ اَلعَرَبِ وَ العَجَمِ وَ البَربَرِ وَ مَن عاصَرَهُم مِن ذَوِی السُّلطانِ الأَکبَر</title>
<link>http://qalamlib.com/news/124</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 150%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;u&gt;كتابِ مقدمه ابن خلدون شامل کِتاب العِبَرِ وَ دِیوانُ اَلمُبتَدإ وَ الخبَرِ فی أَیامِ اَلعَرَبِ وَ العَجَمِ وَ البَربَرِ وَ مَن عاصَرَهُم مِن ذَوِی السُّلطانِ الأَکبَر.&lt;/u&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0cm 0cm 10pt; line-height: 150%; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
متفكر برجسته و تاريخ نگار نامي اسلام، ابوزيد عبدالرحمن بن احمد معروف به ابن خلدون كه در سال 732 ه. ق در تونس متولد و به سال 808 ه. ق در مصر درگذشت از شاخص ترين انديشمندان و نويسندگان مسلمان در سده هشتم هجري و بنيانگذار اصلي فلسفه تاريخ است، چرا كه او بسان مورخان پيشين، تاريخ را در كتاب خويش تنها از لحاظ ظاهر كه عبارت از جمع آوري حوادث و وقايع رخ داده در طول زمان است بررسي نكرد بلكه از منظر بررسي علل و منشا پيدايش حوادث و رويدادها نيز آن را مورد تفقد قرار داد.&lt;br /&gt;
تاريخي كه ابوزيد عبدالرحمن بن محمد معروف و نامور به ابن خلدون نگاشته است همواره در سطح گسترده اي مورد بحث، حمايت، مناقشه و گاه حتي حمله انديشمندان و پژوهشگران مختلف قرار گرفته است، برخي او را به سبب نوانديشي و نوآوري هايش در شيوه هاي نگارش تاريخ ستوده اند، برخي ديگر دعوي داشته اند كه او نوگرايي نكرده بلكه از سنت هاي تاريخ نگاري باستاني روم و يونان باستان استفاده كرده است، شماري ديگر نيز او را با وجود نگارش كتابي ارزشمند و ارزنده چون مقدمه به سبب آنكه در نگارش تاريخ خود، پا را فراتر از چارچوب تمدن و شيوه اسلافش ننهاده است نكوهيده اند&lt;br /&gt;
به نحو كلي در گفته هاي ابـن خلـدون كـه از بـزرگ تـريـن نظريه پردازان فلسفه تاريخ در معارف اسـلامي است گاهي مطالبي ديده مي شود كه فكر او را به سنت هاي تاريخ نويسي باستاني يوناني و رومي نزديك مي كند، ولي به هر ترتيب هيچ سند معتبري در مورد شناسايي مستقيم ابن خلدون از اين سنت ها در دست نيست و در ضمن از جهات بسيار ديگر هم به نظر مي رسد كه او در كار خود بيشتر آغازگر است نه دنباله رو.&lt;br /&gt;
كتاب ابن خلدون كه اسباب نامداري و شهرت عالمگير او را فراهم آورد كتاب &amp;laquo;العبر و ديوان المبتدا و الخبر في ايام العرب و العجم و البربر و من عاصرهم من دوي السلطان الاكبر&amp;raquo; است، اما آنچه بيش از همه مورد توجه محققان و انديشمندان واقع شده و اذهان پژوهشگراني نامي چون برنارد لوئيس، كلود كاهن، محسن مهدي، فرانتز روزنتال و... را به خود مشغول داشته مفهوم و مقام برجسته واژه عبر در عنوان و همچنين در متن كتاب ابن خلدون است. به عنوان نمونه، دكتر عبدالحسين زرين كوب در كتاب تاريخ در ترازو، آورده كه ابن خلدون نام كتاب خود را بدين سبب العبر نهاد تا نشان دهد كه چقدر به تجربه تاريخ اهميت و اعتبار مي دهد. محسن مهدي نيز در كتاب فلسفه تاريخ ابن خلدون، از عبر به عنوان رشته پيوندي ميان تاريخ و حكمت و همچون پلي ميان جنبه هاي ظاهري و باطني تاريخ و همچنين پلي ميان آرا و عقايد مقبول العامه درباره موجودات لاهوتي و ناسوتي و ماهيت واقعي آن ها البته از ديدگاه ابن خلدون ياد كرده است.&lt;br /&gt;
ابن خلدون بدون شك در فراز و نشيب زندگاني پرماجراي خود و با تامل در وقايع تاريخي كه اغلب خــود شــاهـد آن بـوده اسـت و مسافرت هاي زيادي كه كرده است، اندوخته هاي زيادي درباره نحوه معيشت و زندگاني افراد و اقوام كسب كرده كه مبناي كار و تحقيق خود قرار داده است. ابن خلدون با اين كه نسبت به فلسفه خوش بين نيست، به معنايي بنيانگذار فلسفه تاريخ به معناي جديد كلمه است. از طرف ديگر با اين كه هيچ سند رسمي در دست نيست كه افرادي چون ويكو منتسكيو و بسياري ديگر از ابن خلدون الهام گرفته باشند، ولي روش و موضع گروه زيادي از اين متفكران شباهت غيرقابل انكاري نه فقط با بعضي از گفته هاي ابن خلدون دارد، بلكه با توجه به تقدم زماني ابن خلدون، گويي روح علمي او دوباره در آثار آن ها به تمامه ميدان مساعدي براي بروز و خودنمايي به دست آورده است.&lt;br /&gt;
دوستان عزيز مي توانند&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتاب مقدمه ابن خلدون را از بخش تاريخ اسلام در كتابخانه سايت عقيده دريافت نمايند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>گلزارهای شاداب در دفاع از سنت ابو القاسم صلى الله عليه وآله وسلم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/122</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;گلزارهای شاداب در دفاع از سنت ابو القاسم صلى الله علیه وآله وسلم&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این کتاب صدایی است از صنعاء یمن، که به سنت کمک می&amp;zwnj;کند، و از حمله&amp;zwnj;های که بر علیه آن می&amp;zwnj;شود دفاع می&amp;zwnj;کند، و از اهل سنت و سنت حمایت می&amp;zwnj;کند، که آن را علامه بزرگوار ابن الوزیر المحلی تدوین کرد. و در شرح حالش آمده که نزد عامه مردم به امام مجتهدین لقب گرفته است،. مرحوم محمد بن ابراهیم بن علی قاسمی صنعانی رحمه الله &amp;nbsp;که در سال 840 فوت کرده چند سطری را درباره مجادله او با استادش علامه ابن ابی قاسم یمانی نوشته است که علماء زیدیه گفته&amp;zwnj;اند: او مجتهد آن مذهب در زمان خودش بوده است، و اسم او علی ابن محمد الهادی بود و در سال 837 فوت کرده و آن هنگامی بود که ابوالقاسم رساله&amp;zwnj;ای را برای شاگردش ابن وزیر نوشت که در آن رساله او را نصیحت کرده بود که هنگامی به سنت و اهل سنت کمک می&amp;zwnj;کند به مذهب زیدیه کاری نداشته باشند.&lt;br /&gt;
و این رساله شامل مطالب بیهوده&amp;zwnj;ای بود که در این مجادله با نگرشی اعتزالانه، و دلیل&amp;zwnj;های عقلی و تعصب، وعمل&amp;zwnj;های ناپسند، و ایراد در وارد کردن به آیه&amp;zwnj;های قرآن و روایت&amp;zwnj;های مأثور و قواعد شرعی عمل&amp;zwnj; کرده بود. در حالی که در آن مجادله بسیار بی&amp;zwnj;پروا به مردی که شاگردش و از سرزمین و نژاد او بود، تهمت&amp;zwnj;زده بود، و آن چند لحظه بود، به شاگردش نگاه می&amp;zwnj;کند و شاگرد با بینش او مخالفت می&amp;zwnj;کند در حالی که او به خدا و رسم و آیین آن دو وحی شریف متمسک می&amp;zwnj;شود و گفتارهای انسانهای بزرگوار را برای او نقل می&amp;zwnj;کند، شیخ از آن شاگرد ناراحت می شود و او را ابله می&amp;zwnj;پندارد و رساله خود را بلند می&amp;zwnj;کند و به او می&amp;zwnj;دهد، و شاگردش او را دریافت می&amp;zwnj;کند و به خاطر آن خوشحال و شاد می&amp;zwnj;شود و چند مرتبه به آن مراجعه می&amp;zwnj;کند و مانند زمان به آن روی می&amp;zwnj;آورد، و آن رساله را با این جمله شروع کرده بود (فریاد زدن حق در مقابل فریاد باطل) (تا اینکه آن را تمام کرده بود خداوند)، &amp;nbsp;و شاگرد دنبال دلیلی بود که شیخ او را کودن پنداشته بود و او رساله استادش را با کتاب طولانی که چاپ شده بود و اسمش &amp;laquo;العواصم و القواصم&amp;raquo; بود رد کرد، سپس آن را خلاصه کرد و نکته&amp;zwnj;های مهم به آن اضافه نمود، و بیشترین مطالب مهم آن را آورده بود و نام آن را &amp;laquo;الروض الباسم فی الذب عن سنة أبی القاسم صلى الله علیه وآله وسلم &amp;raquo; یعنی: گلزارهای شاد و خندان در دفاع از سنت ابوالقاسم صلى الله علیه وآله وسلم نامیده بود. عنوانی که چشم&amp;zwnj;ها را به خود خیره می&amp;zwnj;کند و قلب&amp;zwnj;ها را می&amp;zwnj;رباید، چه! درحالی که اسم آن با مسمایش مطابقت کرده بود چون شامل مطالبی بود در دفاع از سنت و حمله&amp;zwnj;ها و شبه&amp;zwnj;های که به آن ایراد شده بود و از جهت سند و متن، و از او حمایت کرده بود. ابحاث جدید و کلام حق را به تفصیل در آن بیان کرده بود و شبه&amp;zwnj;ها و اعتراض&amp;zwnj;های را رد می&amp;zwnj;کند که مناقشه&amp;zwnj;های زیاد و گسترده&amp;zwnj;ای در آن شده بود، از جمله&amp;nbsp;&amp;nbsp;آن: عدالت راوی و رد این دعوی است که می&amp;zwnj;گویند: شناخت راوی مشکل و غیرممکن است، و باطل&amp;zwnj;کردن این گفته که راه&amp;zwnj;های احتجاج به عقل بر نقل از معصوم متقدم است،. و بحث اینکه روایت باید به کتب جرح و تعدیل متصل و مشخص شود، وبحث مفیدی درباره دلیل&amp;zwnj;های از پروردگار بر عدالت کسانی که خداوند سبحانه و پیامبرش که صحابه رضی الله عنهم او بودند آنها را عادل دانسته بودند، و غوره را به چهره کسانی انداخته بود که در این باره شک ایجاد می&amp;zwnj;کنند، و ابطال آراء آنها آورده بود، و بحثی درباره طعنه به کسانی که صحیح را در صحیحین حصر کرده&amp;zwnj;اند، و بحثی دیگر درباره اعتراض به کسانی که گفته&amp;zwnj;اند: تمام آنچه در صحاح سته (شش&amp;zwnj;گانه) می&amp;zwnj;باشند صحیح هستند.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند این کتاب را از بخش سنت نبوی صلى الله علیه وآله وسلم در کتابخانه عقیده دریافت نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ تاريخ قرآن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/121</link>
<description>&lt;p&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;کتابِ تاریخ قرآن&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;قرآن کریم در میان کتاب&amp;zwnj;های آسمانی و وحیانی، تنها کتابی است که هم از حیث لفظ و هم از حیث معنا آن گونه که بر پیامبر اسلام صلى الله علیه وآله وسلم نازل شده است، در میان پیروان آن قرار دارد. زندگی و تاریخ اسلام گواه آن است که پس از بعثت رسول&amp;nbsp;الله صلى الله علیه وآله وسلم به رسالت در چهل سالگی، به مدت بیست و سه دوران رسالت آن حضرت صلى الله علیه وآله وسلم بر ایشان نازل شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;نزول تدریجی حفظ و تدوین آن را نیز می&amp;zwnj;طلبید و لذا پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم در مرتبه نخست خود به حفظ کردن آن و حتی شتاب ورزیدن در این امر مبادرت می&amp;zwnj;ورزیدند. در میان مهاجران و انصار نیز گروهی از صحابه به حفظ آن می&amp;zwnj;پرداختند. سپس قرآن به صورت نوشته درآمد و از روزگار خود پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم و به دستور ایشان به کتابت آن همت گماشته شد. کثرت قاریان و کاتبان وحی و جدیت و حساسیت مسلمانان به این کتاب آسمانی باعث شد که از هر گونه تحریف مصون ماند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;گردآوری و نگارش قرآن کریم از دیرباز مورد توجه مسلمانان بوده است. گردآوری قرآن دو مرحله را پشت سر گذراند. نخست به معنای حفظ آن در سینه&amp;zwnj;ها بوده است که نخستین حافظ آن شخص پیامبر اکرم صلى الله علیه وآله وسلم بوده&amp;zwnj;اند. بعد از ایشان حافظانی از اصحاب بودند که به این امر مبادرت می&amp;zwnj;ورزیدند. اما مرحله دوم، می&amp;zwnj;توان به امام علی، ابوبکر، عمر، عثمان، زیدبن ثابت، ابی&amp;zwnj;بن کعب و ... اشاره کرد. این نوشته&amp;zwnj;ها معمولاً بر روی &amp;laquo;لخاف&amp;raquo; (سنگ نازک یا صفحه&amp;zwnj;های سنگی) و &amp;laquo;عسیب&amp;raquo; (شاخه&amp;zwnj;های درخت خرما) و &amp;laquo;أکتاف&amp;raquo; (استخوان&amp;zwnj;های پهن شتر) و &amp;laquo;أقتاب&amp;raquo; (تکه چوبی که بر پشت شتر می&amp;zwnj;گذاشتند و بر روی آن سوار می&amp;zwnj;شدند) و بر تکه&amp;zwnj;های پوست بوده است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;این همه تلاش و مجاهدت در حفظ و نگارش قرآن تردیدی باقی نمی&amp;zwnj;گذارد که این کتاب همان است که بر پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم نازل شده و به دست ما رسیده است. از طرفی مفاهیم و معانی قرآن چنان است که راه هر گونه تحریف را بسته است. کتابی که خود را &amp;laquo;انور&amp;raquo; معرفی می&amp;zwnj;نماید و جن و انس را از آوردن آن ناتوان می&amp;zwnj;شمارد، نباید برای اثبات تحریف&amp;zwnj;ناپذیری آن از خارج از آن کمک گرفت. علاوه بر این خداوند نیز مصونیت آن را از هر گونه تحریف تضمین نموده است: (إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ&amp;nbsp;)(حجر:&amp;nbsp;9) &amp;nbsp;&amp;laquo;ما قرآن را نازل كردیم و ما بطور قطع نگهدار آنیم!&amp;raquo;.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اما تاریخ قرآن، تاریخ نزول تدریجی و شیوه گردآوری و کتابت آن است که نیاز به حجت و دلیل دارد. برادران و خواهران مسلمان می توانند&amp;nbsp;کتاب تاریخ قرآن را در بخش قرآن کریم کتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ شرح اسمای حسنی در پرتو قرآن و سنت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/120</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ شرح اسمای حسنی در پرتو قرآن و سنت&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
معرفت&amp;nbsp;الله متعال، نخستین تكلیف هر انسانی است و این معرفت، تنها با شناخت اسماء و صفات باری تعالی میسر می&amp;zwnj;گردد؛ آن هم درصورتی&amp;zwnj;كه برخاسته از داده&amp;zwnj;های قرآنی و آموزه&amp;zwnj;های نبوی و بدور از هرگونه تأویل و انكاری باشد. سخن از صفات الله جل جلاله بسیار دشوار است و پرداختن به این موضوع نیز بسی مهم و در عین حال خطیر و حساس می&amp;zwnj;باشد. از این&amp;zwnj;رو كسی كه بدون دانش كافی بدین موضوع بپردازد و چیزهایی را به خداوند نسبت دهد كه شایسته&amp;zwnj; صفات كمالش نیست، در واقع دچار انحراف شده و راه اتباع از گذشتگان نیك را رها كرده و راه بدعت و نوآوری را در پیش گرفته است و این، همان چیزی است كه&amp;nbsp;الله متعال در قرآن كریم نكوهش كرده و پیامبرش را از همنشینی با چنین كسانی بازداشته و فرموده است:&amp;nbsp;(إِذَا رَأَیْتَ الَّذِینَ یَخُوضُونَ فِی آیَاتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ )&amp;nbsp;(انعام:68) .&amp;nbsp;&amp;laquo;هرگاه كسانی را دیدی كه به یاوه&amp;zwnj;گویی در آیات ما می&amp;zwnj;پردازند از آنان روی بگردان&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
گفتنی است از آنجا كه اسمای نیك الله، توقیفی است و مجال اجتهاد در آن وجود ندارد&amp;rlm;&amp;rlm;، لذا ضرورت تلاش برای دستیابی به بینشی صحیح درباره اسما و صفات الهی&amp;rlm;، نمایان&amp;zwnj;تر می&amp;zwnj;گردد و این، تنها از طریق در پیش گرفتن روش نیكان گذشته، میسر می&amp;zwnj;باشد. البته این بدان معنا نیست كه عقل، هیچ جایگاهی در حوزه تفكر دینی ندارد؛ بلكه منظور، شناخت الله جل جلاله بدور از مباحث پیچیده فلسفی و كلامی و اكتفا به آموزه&amp;zwnj;های قرآنی و رهنمودهای نبوی در این زمینه می&amp;zwnj;باشد و این، روش صحابه رضی الله عنهم و سایر نیكان گذشته است. چراكه عقل سلیم&amp;rlm;، همان چیزی است كه در مخلوقات الهی می&amp;zwnj;اندیشد و از این طریق به وحدانیت خالق هستی پی می&amp;zwnj;برد.&lt;br /&gt;
هرچند توحید اسما و صفات، یكی از زیرساخت&amp;zwnj;های عقیدتی اسلام است و موضوعی بس مهم و در عین حال دشوار می&amp;zwnj;باشد&amp;rlm;، اما متأسفانه به علت دوری مسلمانان از علوم اسلامی در عصر حاضر و نیز جدایی امت از سنت رسول&amp;zwnj;الله صلی الله علیه وآله وسلم و روش صحابه رضی الله عنهم و سایر گذشتگان نیك، اینك امت اسلامی، از عقیده ناب و خالص اسلامی دور افتاده و همین، ضرورت توجه جدی به فراگیری عقیده اسلامی را بر اساس فهم نیكان گذشته، افزایش داده است.&lt;br /&gt;
در این راستا كتابخانه سایت عقیده تصمیم گرفت که كتابِ شرح اسمای حسنی در پرتو قرآن و سنت&amp;nbsp;&amp;nbsp;را خدمت برادران و خواهران مسلمان تقدیم نماید و&amp;nbsp;&amp;nbsp;به لطف و عنایت الله متعال اینک می توانید این کتاب را در بخش عقیده و ایمان&amp;nbsp;&amp;nbsp;مطالعه و یا دریافت نمایید.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ قرآن برای همه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/119</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ قرآن برای همه&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
شاهكار دیگری از آيت الله العظمى علامه سيد ابوالفضل ابن الرضا برقعي قمی&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
اکثر اهل زمان ما که نام مسلمانی برخود گذاشته&amp;zwnj;اند از کتاب دینی و آسمانی خود بی&amp;zwnj;خبرند و لذا بعقائد متفرقة باطله و ذلّت نفاق و تفرقه گرفتار شده و برای تمیز بین حق و باطل بمیزانی چنگ نزده&amp;zwnj;اند، و هر کس بدنبال هر عالم نمائی رفته و بواسطة دین تقلیدی تحقیقات دینی را جائز نمی&amp;zwnj;شمرد، و درصدد تحقیق نمی&amp;zwnj;باشد. و اگر گاهی به فکر تحقیق افتاده معیاری که حق را از ناحق جدا سازند ندارند، و می&amp;zwnj;توان گفت در امر دین حیران و سرگردانند و راه&amp;zwnj;نمایان دلسوز خیرخواه بیداری که از میزان و معیار دین آگاه باشند ندارند، و غالباً دنیا طلبانی بنام دین برگردن ایشان سوار بوده&amp;zwnj;اند. و عالم و جاهل توجّهی که شاید و باید بکتاب إلهی ندارند و آنرا مهجور و متروک نموده و بهره شایسته از آن نبرده&amp;zwnj;اند، و حتّی در حوزه&amp;zwnj;های علمی دینی تدریس آن جزء برنامه نیست، در صورتیکه الله و رسولش و سایر پیشوایان اسلام تماماً قرآن را میزانِ حقّ و باطل و رهنمای سعادت و برای همه آنرا امام و حجّت، و پیشوای خود و سایرین دانسته و برای تصفیة حقایق دین از خرافات : قرآن را معرّفی کرده&amp;zwnj;اند. متأسّفانه علل فراوانی باعث شده که مردم را از این واقعیّات دور و بی&amp;zwnj;خبر داشته&amp;zwnj;اند، و از راهنمائی قرآن در امور دین و دنیا بی&amp;zwnj;اطلاعند. و بهمین جهت است که در سورة فرقان آیة 30 ذکر شده که رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم روز قیامت در پيشگاه عدل إلهی از قوم و از أمّت در عوض شفاعت شکایت می&amp;zwnj;کند، در سورة فرقان فرموده :&lt;br /&gt;
) وَقَالَ الرَّسُولُ يَا رَبِّ إِنَّ قَوْمِي اتَّخَذُوا هَـذَا الْقُرْآنَ مَهْجُورًا&amp;nbsp;( (فرقان : 30) &amp;laquo;رسول الله گوید پروردگارا قوم من این قرآن را متروک نمودند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
یکی از علل بی&amp;zwnj;خبری مردم از حقائق قرآنی همانا کسانیند که از بیداری مردم بتوسط قرآن وحشت دارند، و برای حفظ خرافات خود مردم را از فهم قرآن دور داشته&amp;zwnj;اند. همان گویندگانی که گاهی خود را مبلغ قرآن می&amp;zwnj;دانند، در صورتیکه باقرار خود قرآن را قابل فهم نمی&amp;zwnj;دانند، و می&amp;zwnj;گویند: باید امام بیاید و آنرا بیان کند. کسی نیست به آنان بگوید: پس چرا رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم و یازده امام بیان نکردند؟! و اگر بیان کردند پس قابل فهم شده چرا می&amp;zwnj;گوئید نمی&amp;zwnj;فهمیم؟.......&lt;br /&gt;
برادران و خواهران قرآن دوست ما می توانند این کتاب نفیس را در بخش قرآن کریم کتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایند&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب روزهاي پيشاور ردى بر کتاب شبهاى پيشاور با ویرایش جدید</title>
<link>http://qalamlib.com/news/118</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب روزهاى پیشاور ردی بر کتاب شبهاى پیشاور&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کتاب شبهای پیشاور نوشته &amp;nbsp;مردی دروغگو به نام &amp;laquo;سلطان الواعظین شیرازی&amp;raquo; &amp;nbsp;می باشد که مدعی شده است که در سال 1345 هـ .ق؛ یعنی، تقریبا 83 &amp;nbsp;سال پیش&amp;nbsp;&amp;nbsp;سفری به شهر پیشاور پاکستان داشته و در آن شهر ،10 شب با علمای سنی دربارۀ حق بودن مذهب شیعه و باطل بودن مذهب اهل سنت بحث و گفتگو کرده است و حاصل این مناظره را در کتابی به نام &amp;laquo;شبهای پیشاور&amp;raquo; جمع آوری نموده و 30 سال بعد آن را برای اولین بار در تهران به چاپ رسانده است. کتاب او چندین بار تجدید چاپ شده و در محافل شیعیان شهرتی به هم زده است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;این کتاب به خاطر اینکه مملو از دروغ و فریب و حیله گری بود و هیچگونه اهمیت علمی نداشت، اهل سنت به آن توجهی ننمودند اما بعد از اینکه شیعه این کتاب را بار ها چاپ نمودند و برای آن تبیلیغات وسیعی را انجام دادند، تصمیم گرفته شد که ردی قوی بر این کتاب نوشته شود.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;نویسنده کتاب شبهای پیشاور 15 سال بعد از چاپ اول کتابش از جهان رخت بربست و به جمع مردگان پیوست! اما کتابش پیوسته تجدید چاپ می شود و شیعیان به آن می بالند و آن را بسیار باور دارند و هر جا با آنها بحث می کنی، می گویند: کتاب شبهای پیشاور را بخوان.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;استاد محمد باقر سجودی كه یكی از روشنفكران شیعه بود كه سالها قبل به مذهب حقه اهل سنت گرویده است ایشان در مقدمه رد خویش برکتاب شبهای پیشاور می فرماید:&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;برای من که در 23 سالِ گذشته در پیشاور زندگی می کنم، مثل روز روشن است که مناظره به صورتی که نویسنده مدعی است، محال است که انجام شده باشد، مثلاً یک جا طرف مناظرۀ اش خود را شافعی مذهب معرفی می کند در حالی که در پیشاور که سهل است در تمام پاکستان هم یک نفر شافعی مذهب نیست؛ البته در هند شافعی هست و اگر خیلی خوش گمان باشیم، می توانیم بگوییم: چیزکی بوده و نویسنده از آن یک مناظرۀ عظیم ساخته است که خودش هم قاضی است و هم مدعی!.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;این کتاب، پر از دروغ و حیله و فریب&amp;nbsp;است. وقتی مقدمۀ رد بر کتاب شبهای پیشاور را می نوشتم، به طور تصادفی از صفحۀ 501 تا 520 کتاب را بررسی کردم و متوجه شدم که در این 20 صفحه در کمتر از یک صفحه سخنان اهل سنت و در 19 صفحۀ دیگر ، گفته های این مرد پرحرفست!.&lt;br /&gt;
فقط نمی دانم چرا نام این سخنرانی را مناظره گذاشته است؟! تازه در آن نیم صفحه هم، مناظره گران&amp;nbsp;سنی یا از او می خواهند بیشتر توضیح دهد یا حرفش را تایید می کنند یا ایراد های مبهم و ناقص و کوتاه می گیرند! یا سوالاتی می پرسند که باب دل اوست&amp;nbsp;یا دلایلی ارائه می دهند که خلاف عقیدۀ اهل سنت است و دلیلی است بر جعلی بودن مناظره!.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
اکنون 83 &amp;nbsp;سال از زمان&amp;nbsp;&amp;nbsp;این مناظره می گذرد! &amp;nbsp;اما هنوز دیر نشده است و من به جای آن سنی های&amp;nbsp;خیالی جواب ایراد های او را می گویم! کسانی که کتاب او را حلوا حلوا می کنند، اگر تعصب را یک سو نهند، با خواندن جواب ما قانع خواهند شد که نویسندۀ کتاب شبهای پیشاور طرار و حلیه گر و شیاد و&amp;nbsp;&amp;nbsp;حقه بازی&amp;nbsp;بیش نبوده است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
البته آنچه او گفته به اعتراف خودش&amp;nbsp;&amp;nbsp;تکرار نوشته های پیشینیانش است که به سبکی نو نگاشته شده است و جای بسی شگفتی است، آنانی که بعد از او آمده اند نیز، همین ایراد ها را تکرار کرده اند؛ گویی حرف جدیدی ندارند. پس پاسخ به این کتاب،&amp;nbsp;&amp;nbsp;پاسخ به بسیاری از کتابهاى شیعه است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;از الله می خواهم، چشم بصیرت مخالفان را باز کند تا دریابند که دیر یا زود همۀ ما به جمع مردگان می پیوندیم شاید این بصیرت باعث شود که&amp;nbsp;&amp;nbsp;حق را بپذیرند و بدانند حافظ و رازق فقط و فقط الله است. این دو صفت الهی را که بدانند، پذیرش حق آسانتر می شود!&lt;br /&gt;
از الله تبارک و تعالی می خواهم در این عمل، برکتی قرار دهد تا این کتاب سبب هدایت شیعیان حیران و سر در گم شود.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند&amp;nbsp;این کتاب را با ویرایشی دوباره در بخش رد شبهات کتابخانه عقیده مطالعه نمایند.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ جواب شبهات در مسائل زنده ى روز</title>
<link>http://qalamlib.com/news/114</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ جواب شبهات در مسائل زنده ى روز&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
نویسنده محترم ! درباره این كتاب می فرماید: از جانب یكی از مراكز اسلامی&amp;zwnj;فعال در كشورهای غربی، تعدادی سؤال به دستم رسید كه یك مؤسسه صلیبی مسیحیّت به اسم &amp;laquo;الآباء البیض&amp;raquo; انتشار داده بود.&lt;br /&gt;
با آگاهی&amp;zwnj;یافتن از این سؤالات، كاری جز پاسخگویی به آنها برایم میسّر نشد و نوع سؤالات و فضایی كه حاكم بر گرایش&amp;zwnj;های اسلامی جوانان و غیرجوانان است، لزوم این كار را برایم روشن كرد.&lt;br /&gt;
از سوی دیگر تلاش یاران كلیسا در انتشار این گونه سؤالات، دارای ابعاد واضحی استلإ و یكی دیگر از حلقه&amp;zwnj;های فعالیت&amp;zwnj;های مداوم مسیحیان است&amp;zwnj;كه هركس تاریخ فعالیت و پیشرفت&amp;zwnj;های سریع آنان و وسائل متنوعی را كه برای هجوم به همه&amp;zwnj;ی سرزمین&amp;zwnj;ها به كار گرفته&amp;zwnj;اند، مطالعه كند، آن را در می&amp;zwnj;یابد.&lt;br /&gt;
پس به كمك خداوند بزرگ كه صاحب عرش عظیم است، این كار را به خاطر یاری دین خدا و به دلیل غیرتم نسبت به مسلمانان و به عنوان مبارزه با قلم و زبان انجام می&amp;zwnj;دهم. مسائلی كه در این سؤالات مطرح شده است را می&amp;zwnj;توان در موارد زیر خلاصه كرد:&lt;br /&gt;
ـ برابری&lt;br /&gt;
ـ آزادی دینی و اجتماعی (مسئله&amp;zwnj;ی برده&amp;zwnj;داری)&lt;br /&gt;
ـ زن&lt;br /&gt;
ـ اجرای شریعت&lt;br /&gt;
ـ جهاد.&lt;br /&gt;
این سؤالات جدید نیستند، بلكه از زمان آغاز هجوم بر اسلام چنین سؤالات و شبهه&amp;zwnj;هایی مطرح بوده است. و كسی كه از آن آگاه است در می&amp;zwnj;یابد كه مطرح&amp;zwnj;كنندگان این مسائل - با وجود اختلاف زمان و هدف- قصد دریافت جواب و رسیدن به حقّ را ندارند؛ بلكه چنین سؤالات و شبهه&amp;zwnj;هایی را در محیطی شلوغ و بزرگ و در اعماق جامعه و زمینه&amp;zwnj;های فكری آن منتشر می&amp;zwnj;كنند و با سرعت زیاد آن را بر زبان می&amp;zwnj;رانند و بلافاصله گوش&amp;zwnj;های خود را می&amp;zwnj;گیرند، از ترس این كه مبادا پاسخ درستی دریافت كنند. كار آنان مانند این است كه بمب&amp;zwnj;های ساعتی را در پُر جمعیّت&amp;zwnj;ترین نقاط، كار گذاشته و به سرعت از آنجا فرار می&amp;zwnj;كنند تا تركش&amp;zwnj;های انفجار، آنان را در بر نگیرد.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند این كتاب را در بخش رد شبهات كتابخانه عقیده مطالعه نمایند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ حقيقت تصوف</title>
<link>http://qalamlib.com/news/113</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ حقیقت تصوف&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لفظ تصوف و صوفیه در صدر اسلام لفظی ناشناخته بود و مطمئناً بعد از آن دوره به وجود آمده است، و یا از ملت&amp;zwnj;های دیگری وارد دین اسلام شده است. شیخ الإسلام ابن تیمیه در مجموع الفتاوی می&amp;zwnj;گوید: &amp;laquo;لفظ صوفیه تا قرن سوم مشهور نبود و بعد از آن سر زبان&amp;zwnj;ها افتاد، و روایت شده است که افرادی مانند امام احمد حنبل و ابوسلیمان دارانی و دیگران دربارة آن سخن گفته&amp;zwnj;اند. روایت شده است که سفیان ثوری آن را به کار برده است. و برخی نیز این امر را به حسن بصری نسبت می&amp;zwnj;دهند. در معنی کلمه صوفی اختلاف نظر دارند، بعضی معتقدند این کلمه از اسم&amp;zwnj;های نسب است، مثل قریشی و مدنی و امثال آن. و گفته&amp;zwnj;شده که منسوب به اهل صُفّه است، ولی این رأی اشتباه است، زیرا اگر این چنین بود، صُفِّیّ گفته می&amp;zwnj;شد، و یا به صف مقدم در پیشگاه خداوند منسوب است که آن نیز غلط است چون اگر چنین بود صَفِّیّ گفته می&amp;zwnj;شد، و یا منسوب به صفوه (بهترین خلق خدا) است که این هم صحیح نیست. زیرا اگر چنان باشد صَفَویّ گفته می&amp;zwnj;شد، و یا گفته شده منسوب به صوفه بن بشر بن أد بن بشر بن طابخه است، که قبیله&amp;zwnj;ای از عرب بودند، در زمان&amp;zwnj;های قدیم در نزدیکی مکه زندگی می&amp;zwnj;کردند و نساک (پارسایان) به آنها نسبت داده می&amp;zwnj;شوند، هرچند که این با لفظ نسب موافق است ولی با این وجود نیز ضعیف است، زیرا اینها نزد بیشتر پارسایان معروف و مشهور نیستند، و اگر نُساک به این افراد نسبت داده می&amp;zwnj;شدند، این منسوب شدن در زمان اصحاب پیامبر ص و تابعین و پیروان نخستین آنان وجود می&amp;zwnj;داشت. بیشتر کسانی که از این نام استفاده کرده&amp;zwnj;اند این قبیله را نمی&amp;zwnj;شناسند و راضی نخواهند بود که آن را به نام قبیله&amp;zwnj;ای در دوران جاهلیت که در دوره اسلامی از آن اثری نیست، نسبت دهند. گفته شده است ـ بنابر قول مشهور ـ که به صوف منسوب است و اولین بار صوفیه در بصره ظاهر شدند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;دوستان عزیز می توانند این كتاب را در بخش رد شبهات كتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ تضاد در عقيده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/112</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: 150%; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; mso-layout-grid-align: none&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;كتابِ تضاد در عقيده&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
كتابِ تضاد در عقيده به بررسي تضاد هاي موجود در عقيده شيعيان می پردازد وبا دلايل عقلي و قرآني به آن پاسخ می دهد، زیرا بعضی از روحانیون شيعه می گویند: (ياران پيامبر صلی الله علیه وآله وسلم پس از رحلت آن حضرت، حق امير المؤمنين علی رضی الله عنه را غصب نمودند و دانسته دستور و سفارش رسول الله درباره جانشينی آن حضرت را، پنهان ساختند و راه نافرمانی در پيش گرفته وهمگی آنها براين كار متفق شدند.)&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
نویسنده محترم این کتاب که خود زمانی پیرو مذهب شیعه بوده و اکنون مدت ها است که به مذهب حقه اهل سنت گرویده به همه شبهات شیعه در مورد اصحاب کرام به دقت جواب داده است. برادران و خواهران مسلمان می توانند این کتاب ارزشمند را در بخش رد شبهات کتابخانه عقیده مطالعه نمایند&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ بلكه گمراه شدى</title>
<link>http://qalamlib.com/news/111</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ بلكه گمراه شدى&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از جانب تشیع كتابهای زیادی نوشته شده است كه در آنها به مقدسات اهل سنت بویژه صحابه و یاران آن حضرت صلی الله علیه وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;اهانت شده است، همان كسانی كه رسول اكرم صلی الله علیه وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;بیست و سه سال تمام زحمت كشید، آنها را تربیت كرد و در حالی از دنیا رفت كه از آنها راضی بود.&lt;br /&gt;
یكی از این كتابها كه مولفش در آن بسیار بی ادبی و زبان درازی كرده است و اندیشه های اهل سنت را به باد انتقاد گرفته است كتاب ((آنگاه هدایت شدم)) محمد تیجانی سماوی است. مولف این كتاب، آقای تیجانی می گوید: وی اهل سنت بوده و با تحقیق و بررسی عمیق، هدایت!! شده است و خاطراتش را در این كتاب به رشته تحریر در آورده است تا دیگران از این هدایت!! وی بهره مند گردند..&lt;br /&gt;
و این كتاب با نام ((آنگاه هدایت شدم)) و چندین كتاب دیگر از همین مولف توسط شخصی بنام سید محمد جواد مهری به زبان فارسی ترجمه شده است تا با بد و بیراه گفتن صحابه رسول الله صلی الله علیه وسلم ، بویژه خلفای سه گانه و عشره مبشره البته به استثناء علی بن ابی طالب رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;و همچنین اهانت و زبان درازی نسبت به او المومنین حضرت عایشه رضی الله عنه&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;دین خود را نسبت به میلیونها اهل سنت فارسی زبان ایران و جهان ادا كند و پایه های وحدت و تقریب بین مذاهب!!! را بیش از پیش استحكام بخشد. بنیاد معارف اسلامی قم برای این كتاب و كتابهای دیگر مولف، سرمایه گذاری زیادی كرده است. البته اگر چه چنین به نظر می رسد كه این سری كتابها در بنیاد فوق الذكر نوشته شده است و بنام این هدایت یافته!!! منتشر شده است. چنانچه آقای مهری در مقدمه ی كتاب مذكور می گوید: ((اكنون بنیاد معارف اسلامی با تعداد زیادی از محققین و علما، مشغول خدمت در زمینه های مختلف و آماده سازی برای طرح مهم تاریخ نگاری می باشد. تاكنون كارهای ارزشمند و شایان تقدیری به اتمام رسیده . . .)) شاید این كار، یكی از آن كارهای ارزشمند باشد. بهر حال این مطلب بسیار مهم نیست، مهم مطالب و محتویات كتاب است.&lt;br /&gt;
به طور كلی خواستیم به اهمیت این كتاب نزد تشیع اشاره كنیم البته كسانی كه داخل ایران زندگی می كنند خودشان اهمیت این كتاب را به خوبی می دانند. &amp;nbsp;و اینك این كتاب (بلكه گمراه شدى)&amp;nbsp;&amp;nbsp;را خدمت برادران و خواهران مسلمان&amp;nbsp;&amp;nbsp;در بخش رد شبهات كتابخانه عقیده&amp;nbsp;&amp;nbsp;تقدیم می كنیم تا باشدكه با دروغهای تیجانی گمراه بیشتر آشنا شوند&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب زيارت قبر از ديدگاه قرآن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/110</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب زیـارت قبــر از دیدگاه قرآن&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
زیارت قبور بخش کوچکی از شریعت بزرگ و وسیع اسلام می باشد که عملی مباح به شمار رفته و انجام دادن و یا ترک آن با هم برابر است. و اگر همراه با نیت صالح و بدور از اعمال شرک آمیز انجام گیرد عملی مستحب و نیکو می باشد.&lt;br /&gt;
زیارت قبور در روزهای نخستین قانونگذاری اسلامی ممنوع اعلام شد، تا آنکه رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم با این سخن مبارک خود به آن اجازه دادند:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;نَهَیْتُكُمْ عَنْ زِیَارَةِ الْقُبُورِ فَزُورُوهَا&amp;raquo;. صحیح مسلم 2305 &amp;laquo;شما را از زیارت قبرها منع کرده بودم، اکنون آنها را زیارت نمائید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و جالب است بدانید که در قرآن کریم ذکری از زیارت قبور نیامده است. و اگر مسلمانی از دنیا برود و قبری را زیارت نکرده باشد و یا به زیارتگاهی قدم ننهاده باشد مورد بازخواست باری تعالی قرار نمی گیرد و در هنگام سوال و جواب از او نمی پرسند که چرا به زیارت قبری نرفته است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;لکن در نزد شیعه زیارت قبر جایگاه مخصوصی دارد طوریکه می گویند:&lt;br /&gt;
&amp;laquo;اگر انسانی همة اعمال أنبیاء علیهم السلام را انجام دهد و لکن قبر مخصوصی را زیارت نکرده باشد خداوند از او هیچ عمل نیک و پسندیده ای را نمی پذیرد و بر او خشم گرفته و مورد لعنت قرار می دهد و برایش عذاب جهنم و سرانجام بدی را مهیا می سازد&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
مؤلف محترم! این رسالة کوتاه را بر اساس همین وهم و گمان شیعه نوشته است، که در آن از روش قرآن مجید در اثبات امور مهم پیروی نموده و همچنان کوشیده تا این وهم و گمان باطل را با دلیل و برهان نقض نموده و باطل بودن آنرا هویدا سازد.&lt;br /&gt;
برادران وخواهران عزیز می توانند این كتاب را در بخش قرآن كریم كتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ قاتلان حسين رضى الله عنه را بشناسيد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/109</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ قاتلان حسین رضى الله عنه را بشناسید&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
این کلماتی صادقانه و مخلصانه و بر آمده از قلب است که با شما برادر و خواهری که دوستدار اهل بیت هستید در میان می گذاریم ، در حقیقت محبتی که نسبت به شما دارم اینگونه و با این سخنان می خواهم آنرا ابراز نمایم ، و همچنین همزمان میخواهم در زمینه دعوت به وحدت و اتحاد با برادران اهل سنت که کمربند وطن دوستی و اتحاد و امنیت کشورمان آنها را گرد هم می آورد قدمی برداشته و مسئولیت خود را ادا کرده باشم .&lt;br /&gt;
تردیدی نیست که کشته شدن حسین علیه السلام&amp;nbsp;&amp;nbsp;مصیبتی سترگ و لکه ننگ بزرگی در تاریخ امت اسلامی به شمار می آید ، اما با کمال تأسف باید گفت که امروزه تا حدود زیادی از این حادثه برای افزایش تفرقه میان یک کشور بهره برداری شده است .&lt;br /&gt;
این كتاب سرشار از حقایقی&amp;nbsp;&amp;nbsp;است که از ائمه و مراجع بزرگ نقل شده ، نویسنده با دلیل قاطع و با ذکر صفحه و جلد این حقایق را متذکر شده بود ، هر چند این کتاب را یکی از مخالفان شیعه اما خیر خواه شیعه نوشته است ، اما باید گفت که حکمت و اندیشه درست گمشده من و گمشده هر مومن است که هرکجا آن را بیابد به پذیرفتن آن از همه مردم سزاوارتر است چنان که امام ائمه پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم به این نکته اشاره فرموده است . از این رو برخورد و بر شما لازم می بینم که از دلیل پیروی کنیم زیرا خداوند از ما بازخواست خواهد کرد.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ در شناخت سيره عثمان بن عفّان رضى الله عنه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/108</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ در شناخت سیره عثمان بن عفّان رضى الله عنه&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
این کتاب در ادامه مطالعه تاریخ خلفای راشدین و بعد از کتابهای ابوبکر صدّیق رضى الله عنه و عمر فاروق رضى الله عنه &amp;nbsp;درموردشخصیت و دوران خلافت حضرت عثمان بن عفّان رضى الله عنه &amp;nbsp;نگاشته شده است. هدف از تألیف این سلسله کتابها، آن است که با مطالعه عصرآن بزرگواران درسها گیریم و پندها پذیریم و با شناخت سنتها و قوانین ثابت الهی در جهت احیای جوامع، تشکیل حکومتها و پرورش رهبران و افرادی که در راستای گسترش دین خداوند در میان مردم مثمرثمر باشد، حرکت کنیم.&lt;br /&gt;
باید دانست که بازگشت امت اسلام به جایگاه رهبریت کاروان بشریت که در سالهای اولیه تاریخ خود بدان دست یافته بود تنها در گرو تبعیت از راه و روش نبی&amp;zwnj;اکرم صلى الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;و خلفای راشدین آن حضرت صلى الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;است.&lt;br /&gt;
در واقع شناخت عمیق و درست دوران خلفای راشدین و راه و روش نبوت، گامی است که برای تحقق اهداف امت اسلام، ناگزیر به رعایت و تبعیت آن می&amp;zwnj;باشیم، همانطور که رسول&amp;zwnj; اکرم صلى الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;چنین فرموده&amp;zwnj;اند : &amp;laquo;علیکم بسنتی و سنّة الخلفاء الراشدین المهدیین من بعدی&amp;raquo; از سنت من و راه و روش خلفای راشدین و هدایت یافته&amp;zwnj;ای که پس از من می&amp;zwnj;آیند تبعیت کنید.&lt;br /&gt;
تاریخ خلفای راشدین مملو از درسها و عبرتهایی است که در لابه&amp;zwnj;&amp;zwnj;لای کتابها و منابع تاریخی، حدیثی، فقهی، ادبی و تفسیری به طور پراکنده ثبت شده و ما نیازمند آنیم که آنها را جمع&amp;zwnj;آوری کنیم، مرتب سازیم، صحت و سقم آنها را معین نماییم و به تجزیه و تحلیل آنها بپردازیم، زیراکه این تاریخ، اگر خوب و به نحو أحسن عرضه گردد، می&amp;zwnj;تواند روح را تغذیه کند، جانها را تهذیب نماید، قلبها را روشن سازد، عقلها را پرورش دهد، همّتها را بلند گرداند، افکار را نضج دهد، پندهاو درسها عرضه دارد و ویژگیهای آن عصر، خصوصیات رهبرانش، نظام حکومتش، اخلاق مردمانش، عوامل شکوفایی و پیشرفتشو دلایل زوال و سقوطش را بیان می&amp;zwnj;دارد و ما تنها با شناخت این مسائل است که می&amp;zwnj;توانیم نسلی مسلمان را بر اساس شیوه و سنت پیامبر صلى الله علیه وآله وسلم&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;و خلفای راشدین تربیت کنیم و تنها با مطالعه آن دوران است که می&amp;zwnj;توان مردمان آن عصر را شناخت.&lt;br /&gt;
دوستان عزیز می توانند این كتاب را در بخش اصحاب رسول الله در&amp;nbsp;&amp;nbsp;كتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایند.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>قرضاوی یک بهانه است</title>
<link>http://qalamlib.com/news/107</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;قرضاوی یک بهانه است!!..&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;دکتر یوسف قرضاوی یکی از شاخص ترین چهره های علمی جهان اسلام معاصر است، که از سوی همه مکاتب فکری ومذاهب فقهی مسلمانان جهان مورد احترام وتقدیر می باشد&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ایشان سالهای متمادی عمر خویش را در راستای به ثمر رساندن وحدت اسلامی و در راستای حل مشکلات عمده جهان اسلام سپری کرده اند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;مسأله اختلاف آمیز شیعه و سنی همواره در رأس کاری برنامه دکتر یوسف قرضاوی که به میانه روی مشهور بوده است. ایشان همگام با انقلاب ایران همواره دیدگاههای آنرا در برابر دشمنان خارجی تأیید نموده، مسلمانان جهان را تشویق نموده تا با حکومت جمهوری اسلامی (در واقع&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شیعی صفوی اسماعیلی) در مقابله با استکبار جهانی هم پیمان گردند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ودر پشت صحنه بارها و بارها بصورت دوستانه و دلسوزانه رهبران مذهبی سیاسی ایران را نصیحت نموده تا از فشارها وظلم وستمها و تمییز نژادیهایی که بر علیه اقلیت سنی مذهب این کشور روا می دارند بکاهند. وفضایی از آزادی را در کشور ایران حاکم سازند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ایشان از حکومت تهران همواره می خواستند که به بیش از یک ملیون سنی مذهبی که در تهران بسر می برند اجازه اقامه نماز و بنای مسجد جامعی داده شود تا دشمنان اسلام از این تمییز نژادیهای این کشور علیه این اقلیت بزرگی که یک سوم جمعیت کشور را در بر می گیرد سوء استفاده نکنند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ولی متأسفانه رهبران ایران هیچ گاه سعی نکردند از دیدگاههای خشونت گرایشان در برابر سنیها بکاهند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;با آمدن نیروهای اشغالگر به کشورهای افغانستان و عراق، وهمکاری جمهوری اسلامی با آمریکا در اشغال کشورهای مسلمان و همسایه، وکمک کردن آن به گروهکهای تروریستی شیعه و رهبری آنها در کشتارهای دسته جمعی سنیهای عراق، وهمکاری تنگاتنگشان با نیروهای استعمارگر آمریکایی برای دست یافتن به حکومت دست نشانده و&amp;hellip; آتش تشنج میان شیعه وسنی را شعله ورتر ساخت&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;علامه قرضاوی رئیس اتحادیه جهانی علمای اسلام در یک مناظره تلویزیونی با رئیس شورای مصلحت نظام ایران آقای هاشمی رفسنجانی وارد مذاکره شدند که همه شیعه وسنی آنرا بصورت پخش مستقیم شاهد بودند. ایشان از کشور ایران خواستند که آتش فتنه و خونریزی را در عراق خاموش کنند چرا که نتیجه این بازی هر چه که باشد به ضرر هر دو گروه خواهد بود و تنها آمریکا واسرائیل برنده این بازی تلخ وخونین خواهند شد. ولی آقای رفسنجانی نخواستند از دیدگاه خود پایین آیند وتنها سعی کردند با جملاتی روتینی و ثابت و عوام پسندانه از موضوع اصلی کناره گیری کنند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;!!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;در کنفرانس جهانی &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲۰۰۷&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;که در قطر انعقاد یافت باز هم آقای دکتر قرضاوی، شیعه را به نقض وحدت اسلامی متهم ساختند، واز ایران خواستند با سوء استفاده از ثروت و دارایی خود مناطقی از اهل سنت که در فقر و جهالت بسر می برند را به تشیع دعوت نکنند. ایشان در بیانیه ای که اخیرا صادر کرده اند سیاست حکومت ایران را بصورت بسیار جدی مورد انتقاد قرارد داده، از ایرانیها خواستند که در جهان اسلام آتش خاموش فتنه را دوباره شعله ور نکنند، وبا استفاده از ثروت و دارایی خود سنیهای کشورهای فقیر را به قبول دعوت تشیع وادار نکنند. واز کشتار انسانهای بی گناه در عراق دست بکشند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;hellip;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;این بیانیه دکتر یوسف قرضاوی روحانی ارشد میانه روی سنیهای جهان چون بمبی اتمی در جهان تشیع بصدا درآمد. شیعیان جهان به رهبری دولت ایران همه با هم و یکصدا بر علیه یوسف قرضاوی شعارها دادند و رسانه های گروهی ایران و جهان تشیع تبلیغات دشمنانه ی بسیار تندی را بر علیه او آغاز نموده و او را فردی منافق، دروغگو، فتنه جو، متعصب، ملی گرا، بوق صهیونیست جهانی، زبان استعمار، وماسونی وغیره &amp;hellip; معرفی کرده و با لهجه تند و دشنام و ناسزا و بد گویی به جنگ این شخصیت عمده و قابل احترام جهان اسلام کمر بستند&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;وشیعیان قطر خواستار بیرون راندن او از این کشور کوچک عربی گردیدند! هر چند که مکانت و منزلت علامه قرضاوی بالاتر از این حرفهاست که چند نفر اقلیت مهاجر شیعه که هیچ مکانت و منزلتی در دستگاه حکومتی قطر ندارند بتوانند به ایشان در دولت قطر کوچکترین بی احترامی کنند جدا از اینکه بتوانند درخواست اخراج ایشان بکنند. در حالی که قرضاوی مفتی قطر است و مورد احترام مخالفان قبل از موافقان قرار دارد. ولی شیعیان ایران این قضیه را طوری جلوه دادند انگار که شیعیان قطر چیزی به حساب می آیند و یا گوش شنوایی در قطر برای این ادعای پوچ و باطل آنها وجود دارد&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;این هماهنگی شیعه در مقابل یوسف قرضاوی دو نکته را برای جهانیان روشن ساخت&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۱&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;یکی اینکه این رد فعل نمی توانست بی برنامه باشد، وگویا که شیعیان مدتها برای این هجوم گسترده آمادگی گرفته اند، واین هجوم از سوی ارگانی برنامه ریزی و اداره شده است&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۲&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;همه شیعیان جهان ایران را قبله خود می دانند. وهر گونه اعتراض بر سیاست کشور ایران را نوعی نقد بر مذهب تشیع تلقی می کنند! وگویا سیاستهای کشور ایران برای دنیای تشیع به گونه ای قداست مذهبی دارد&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;قرضاوی و تغییر زاویه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;!..&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;پرسشی که ناخودآگاه در اذهان هر کسی که از پشت صحنه این جنجال بی اطلاع است مطرح می شود این است که؛ چگونه شخصیتی چون قرضاوی که تا دیروز علم بردار وحدت اسلامی بود، در یک آن اینچنین دیدگاهی را اتخاذ کرد؟&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;با یک دید گذرا بر تاریخ وحدت اسلامی معاصر می بینیم که قرضاوی صورتی است تکراری از تجربه هایی تلخ و شکستی است دیگر در مقابل تعصب وخودخواهی علمای شیعه&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شاید شیخ امام محمد عبده دانشمند مصری اولین شخصیت شبه معاصری باشد که در قرن گذشته بسوی وحدت وتقارب دو مذهب شیعه وسنی دعوت نمود، سپس شاگردش شیخ رشید رضا راه امام را ادامه دادند، دعوت رشید رضا که بر صفحات مجله &amp;ldquo;المنار&amp;rdquo; به دنیا می رسید نزدیک بود نوعی وحدت ایجاد سازد. اینجا بود که علمایی که از این فتنه وجدایی ارتزاق می کنند وتاب دیدن اتحاد اسلامی را ندارند بر علیه او قیام</description>
</item><item>
<title>كتابِ شاگردان مكتب نبوت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/106</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ شاگردان مكتب نبوت&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
تردیدی نیست که خداوند متعال پیامبر گرامی&amp;rlm;اش صلى الله علیه وآله وسلم را بهترین انسان روی زمین قرار داد، و طبیعی است که برای بهترین پیامبری که با کاملترین کلام خدا و برای بهترین امت مبعوث شده، بهترین یاران و صحابه برگزیده شوند. لذا همچنان که از بین صد و بیست و چهار هزار پیامبر، رسول گرامی ما بهترین پیام&amp;rlm;آور الهی هستند، قطعا صحابه ایشان هم بهترین یاران و جان نثارانی هستند که خداوند آنها را پس از پیامبران از میان بشریت گلچین کرده است، به همین دلیل مانند پیامبر گرامی اسلام صلى الله علیه وآله وسلم نه تنها مژده صحابی بودن که حتی صفات و خصوصیات آنان در تورات و انجیل آمده است. چقدر شگفت&amp;rlm;انگیز و فخرآفرین است! خوشا به سعادت این انسانهای نمونه تاریخ!&lt;br /&gt;
آری عشق و محبت فوق&amp;rlm;العاده صحابه رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم به آن حضرت در تاریخ بشر نمونه و مانند ندارد، ایشان را از همه چیز بیشتر دوست می&amp;rlm;داشتند. داستانهای دوستی و محبت و ارادت صحابه به رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم آنقدر جذاب و گیرا و شگفت&amp;rlm;انگیز و رشک آفرین است که حتی دشمنان اسلام اعتراف می&amp;rlm;کنند که این محبت و ارادت در طول تاریخ بی&amp;rlm;همتاست. إن شاء الله در یک فرصت مناسب سعی خواهیم کرد نمونه&amp;rlm;هایی از آن را برای شما عزیزان به تصویر بکشیم.&lt;br /&gt;
اما شگفت&amp;rlm;انگیز این است که متأسفانه در برابر این همه فداکاری و جانبازی و ارادت آنان به اسلام و قرآن و پیامبر گرامی اسلام صلى الله علیه وآله وسلم ما مسلمان نماها نسبت به آنان جفای فراوان روا می&amp;rlm;داریم. بی&amp;rlm;مهری و بی&amp;rlm;وفایی و احیانا جسارت ما نسبت به بعضی از آنان حیرت&amp;rlm;انگیز است. و فراتر از آن متأسفانه روایات دروغینی در تاریخ جعل شده و قلم&amp;rlm;های مسمومی دست به کار شده&amp;rlm;اند تا چهره روشن و درخشان این بزرگواران را مخدوش جلوه دهند، و بعضی از ما مسلمان&amp;rlm;نماها آنقدر غلو و افراط می&amp;rlm;کنند که در برابر دشمنان اسلام احساس شرمندگی می&amp;rlm;کنیم که چرا آنان به عنوان انسانهای بی&amp;rlm;طرف حقایق روشن زندگی صحابه را درک کرده و به تصویر کشیده&amp;rlm;اند، و در برابر عظمت و کارنامه فخرآفرین آنان سر تسلیم و ارادت فرود آوردند، ولی ما نه تنها حق آنان را نشناختیم و پاس نداشتیم بلکه در عوض به آنان جسارت هم روا می&amp;rlm;داریم!&lt;br /&gt;
برای آشنا شدن با این انسانهای نمونه کافی است که قرآن کریم را بی&amp;rlm;غرض و بدون پیش داوری بخوانیم، و سیرت زندگی رسول مکرم اسلام صلى الله علیه وآله وسلم را از ولادت تا وفات مطالعه کنیم تا ببینیم که آنها چه جایگاه عظیمی را در مقدس&amp;rlm;ترین صفحات زرین تاریخ به خود اختصاص داده&amp;rlm;اند، ای کاش بعضی از ما نه به عنوان مسلمان که فقط به عنوان انسانهای آزاده و مستقل قرآن را می&amp;rlm;خواندیم و به جایگاه رفیع و عظمت و بزرگواری این ستارگان درخشان آسمان هدایت و شاگردان بی&amp;rlm;نطیر مکتب نبوت پی می&amp;rlm;بردیم.&lt;br /&gt;
بیایید صفحاتى از سیرت این بزرگواران را در کتاب&amp;nbsp;شاگردان مكتب نبوت که اینک در بخش اصحاب رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم، در کتابخانه سایت عقیده نشر شده مطالعه نماییم.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>بیانیه علمای پاکستان در حمایت از دکتر یوسف قرضاوی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/105</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;&lt;font size=&quot;2&quot;&gt;بیانیه علمای پاکستان در حمایت از دکتر یوسف قرضاوی&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot; size=&quot;2&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/font&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-tab-count: 1&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;علمای پاکستان طی بیانیه ی مشترکی از سوی همه مکاتب فکری ومدارس فقهی حمایت خود را از شیخ یوسف قرضاوی که او را رمز مقاومت و وحدت اسلامی معرفی کرده اند اعلام داشتند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;در این بیانیه که قرار است بیش از بیست هزار عالم پاکستانی آنرا امضا کنند و&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;در مساجد سراسر کشور قراءت شده از مردم این کشور بر آنچه در بیانیه آمده موافقت گرفته شود آمده است که:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ol style=&quot;MARGIN-TOP: 0in&quot; type=&quot;1&quot;&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.5in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; mso-list: l0 level1 lfo1; tab-stops: list .5in&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;علمای پاکستان شدیدا سیاستهای ایران را در همکاری با نیروهای اشغالگر در عراق وافغانستان مورد انتقاد قرار می دهند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.5in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; mso-list: l0 level1 lfo1; tab-stops: list .5in&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;برنامه ایران در سوء استفاده از اقلیتهای شیعه در کشورهای اسلامی برای آتش زدن فتیله فتنه را شدیدا محکوم می کنند.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.5in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; mso-list: l0 level1 lfo1; tab-stops: list .5in&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;آنها حمایت وپشتیبانی ایران از گروهکهای تروریستی شیعه در عراق و افغانستان وپاکستان را مورد مذمت شدید قرار می دهند.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.5in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; mso-list: l0 level1 lfo1; tab-stops: list .5in&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;آنها سوء استفاده ایران از ثروت نفت را برای شیعه کردن ملتهای فقیر وعقب مانده سنی در کشورهای اسلامی مورد مذمت قرار می دهند.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.5in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; mso-list: l0 level1 lfo1; tab-stops: list .5in&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;آنها سیاستهای ایران در از بین بردن جامعه اهل سنت این کشور و شیعه کردن آنها وکشتار علماء و تخریب مساجد و مدارس دینی &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;آنها را محکوم می کنند.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
	&lt;li class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.5in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; mso-list: l0 level1 lfo1; tab-stops: list .5in&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;آنها پشتیبانی وحمایت مالی ایران از رسانه های گروهی وشبکه های اطلاع رسانی جهانی را که در بین ملتهای اسلامی فتنه اندازی نموده و&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;یاران رسول خدا صلی الله علیه و آله و سلم را مورد شتم ولعن ونفرین قرار می دهند را شدیدا محکوم می کنند.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.25in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;همچنین علمای پاکستان ایران را از گول زدن ملتهای ساده لوح با مطرح ساختن شعار وحدت اسلامی از یکسو و&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;حمله ناجوانمردانه با خنجر نفاق از پشت سر را شدیدا &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;بر حذر داشتند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.25in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;در این بیانیه که تاکنون صدها عالم و خطیب و ائمه مساجد آن را امضاء کرده اند علماء پاکستان بر این نقطه اصرار داشته اند که این سیاستهای دشمنانه چهره ایران را در افکار عمومی جهان کاملا زشت و ناپسند جلوه داده واز همسایگان دور و منزوی خواهد ساخت.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.25in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0.25in 0pt 0in; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;تا کنون بیش از &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;پنج هزار 5000 عالم پاکستانی این بیانیه را امضا نموده اند. و قرار است تعداد این امضاها تا چند روز دیگر به دهها هزار &lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;برسد. لازم به تذکر است که بیانیه های مشابهی نیز از سوی علمای مصر و تمام کشورهای عربی و ترکیه و اندونزی و مالزی و سایر کشورهای اسلامی نیز تا کنون صادر شده است. و همچنین تقریبا همه جنبشهای اسلامی جهان حمایت و تضامن خود را با دکتر قرضاوی اعلان داشته اند.&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 11pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ عمر بن خطاب رضى الله عنه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/104</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ عمر بن خطاب رضى الله عنه&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
کتابی كه اینك معرفی می شود، به تحلیل وقایع زندگی سیدنا عمر بن خطاب &amp;nbsp;رضی الله عنه و شخصیت و دوران ایشان می پردازد.&lt;br /&gt;
به طور قطع تاریخ خلفای راشدین، سرشار از آموزه های ارزش مندی است. از اینرو اگر ما، دوران خلفای راشدین را بدون استفاده از روایات ضعیف و ساختگی و کتابهای خاورشناسان و پیروانشان اعم از خودباختگان فکری و مادی گرایان، مورد بررسی قرار دهیم، در این صورت روش درستی را در پیش گرفته ایم و به شناخت و بینش درستی پیرامون زندگانی و دوران آن بزرگ مردان دست خواهیم یافت؛ همان بزرگوارانی که خداوند متعال، در باره ی آنان فرموده است:&lt;br /&gt;
(وَالسَّابِقُونَ الْأَوَّلُونَ مِنَ الْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنصَارِ وَالَّذِينَ اتَّبَعُوهُم بِإِحْسَانٍ رَّضِيَ اللَّـهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي تَحْتَهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ&amp;nbsp;) (توبه:100)&amp;gt;&amp;nbsp;&amp;laquo;پیشگامان نخستین مهاجران و انصار و کسانی که روش آنان را به نیکی در پیش گرفتند و راه ایشان را به خوبی پیمودند، خداوند، از آنان خشنود است و ایشان هم از خدا خشنودند. و خداوند، برای آنان بهشت را آماده ساخته است که زیر (درختان و کاخهای آن) رودخانه ها جاری است و جاودانه در آنجا می مانند؛ این است رستگاری سترگ&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
همچنین می فرماید:مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ اللَّـهِ وَالَّذِینَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَیْنَهُمْ تَرَاهُمْ رُكَّعًا سُجَّدًا یَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّـهِ&amp;nbsp;&amp;nbsp;)[ فتح: &amp;nbsp;29 ] &amp;laquo;محمد، رسول الله است و کسانی که با او هستند، بر کفار، سخت و خشن و نسبت به یکدیگر، مهربانند؛ تو، آنان را در حال رکوع و سجده می بینی&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
عمر فاروق رضی الله عنه خلیفه ی دوم و برترین صحابی رسول الله صلی الله عله وآله وسلم پس از ابوبکر صدیق رضی الله عنه می باشد. او، یکی از خلفای راشدین است که رسول الله صلی الله عله وآله وسلم ما را به پیروی از آنان امر نموده و فرموده است: (علیکم بسنتی و سنه الخلفاء الراشدین المهدیین من بعدی): &amp;laquo;به سنت من و سنت خلفای راشدین پس از من، چنگ بزنید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
اینک کتاب سیرت عمر فاروق رضی الله عنه که دومین کتاب از مجموعه ی سیرت خلفای راشدین است، در بخش صحابه رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم, در كتابخانه عقیده تقدیم می گردد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>راهنماى استفاده از سايت و دانلود كتابها</title>
<link>http://qalamlib.com/news/103</link>
<description>&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;برادران و خواهران گرامی! لازم به تذكر است كه تمامى كتابهای این سایت به صورت مجانی قابل دریافت می باشد و اگر بعد از مطالعه این صفحه باز هم نتوانستید کتابی را دریافت کنید حتما با ما تماس بگیرید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;:: &lt;a href=&quot;../../../../contactus.shtml&quot;&gt;تماس با ما&lt;/a&gt; ::&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;راهنمای دریافت کتاب&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;کتابهای کتابخانه عقیده در 5 فرمت مختلف به صورت رایگان در اختیار شما قرار دارد. در صفحه دانلود، مشخصات کتاب، لینکهای دانلود کتاب با فرمت های مختلف، تصویر جلد کتاب و خلاصه کتاب نمایش داده می شود. مطالب و کتابهای مرتبط با هر کتاب در پایین صفحه قرار داده شده اند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در این صفحه با کلیک بر روی نام نویسنده یا مترجم به زندگینامه و نیز تمام تالیفات و آثار آنها دسترسی پیدا می کنید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;5 آیکون برای دانلود این 5 نوع نوع فایل در صفحه دانلود کتاب قرار دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;فرمت های کتاب:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در صورتی که هر فرمت در دسترس باشد، آیکون آن به صورت رنگی نمایان می شود. در غیراینصورت آیکونهای بی رنگ نمایش داده می شوند.&lt;/p&gt;

&lt;ol&gt;
	&lt;li&gt;فرمت ورد &amp;quot;Word&amp;quot; &lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;فرمت وورد&quot; height=&quot;27&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/word.gif&quot; width=&quot;27&quot; /&gt;&lt;/sub&gt;: جهت مشاهده و مطالعه کتابهای با این فرمت باید برنامه Microsoft Word را نصب کنید. فرمت های ورد با پسوند فایلهای doc و docx مشهور هستند.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;فرمت PDF &lt;sub&gt;&lt;a href=&quot;../../../../pro/FoxitReader411_enu_Setup.exe&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; height=&quot;24&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/pdf.gif&quot; width=&quot;23&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/sub&gt;: برای مشاهده کتابهای PDF برنامه Adobe Reader و یا برنامه دیگری مانند &lt;a href=&quot;../../../../pro/FoxitReader411_enu_Setup.exe&quot;&gt;Foxit Reader&lt;/a&gt; نصب کنید.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;فرمت HTML &lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;اچ تی ام ال&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/html.gif&quot; /&gt;&lt;/sub&gt;: برای مشاهده این کتابها می توانید از مرورگرهای IE، &lt;a href=&quot;http://www.mozilla.com/en-US/firefox/firefox.html&quot;&gt;FireFox&lt;/a&gt;، &lt;a href=&quot;http://www.google.com/chrome/?hl=en&quot;&gt;Chrome&lt;/a&gt; و یا سایر مرورگرها استفاده کنید.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;فرمت eBook &lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;ایبوک&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/exe.gif&quot; /&gt;&lt;/sub&gt;: فرمت اجرایی (exe) کتاب در محیط ویندوز قابل استفاده است و نیاز به هیچ برنامه جانبی ندارد.&lt;/li&gt;
	&lt;li&gt;&lt;big&gt;فرمت موبایل &lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/zip.gif&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/zip.gif&quot; style=&quot;width:29px;height:29px;&quot; /&gt;&lt;/sub&gt;: این فرمت مخصوص موبایلهای دارای قابلیت اجرای برنامه های جاوا است. اکثر موبایلها از این فرمت پشتیبانی می کنند. این فرمت شامل دو فایل است (با پسوند jar و jad) که به صورت فشرده در یک فایل قابل دانلود است. پس از دانلود، فایل فشرده را باز کرده و دو فایل کتاب را (با Bluetooth، Wireless و یا کابل USB) به موبایل خود بفرستید. سپس به راحتی آن را در موبایل باز کرده و مطالعه کنید.&lt;/big&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;

&lt;p&gt;در صورتی که هر کدام از این فرمت ها آماده نباشد، آیکونها به شکل بی رنگ و مانند اشکال مقابل خواهند بود: &lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;ایبوک&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/exe_1.gif&quot; /&gt;&lt;/sub&gt; &lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;اچ تی ام ال&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/html_1.gif&quot; /&gt;&lt;/sub&gt; &lt;img alt=&quot;پی دی اف&quot; height=&quot;28&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/pdf_1.gif&quot; width=&quot;28&quot; /&gt; &lt;img alt=&quot;وورد&quot; height=&quot;30&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/word_1.gif&quot; width=&quot;30&quot; /&gt; &lt;img alt=&quot;موبایل&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/zip_1.gif&quot; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;نکته مهم: اگر کتابی را دانلود کردید ولی نتوانستید آن را باز کنید، حجم آن را با حجم نوشته شده در سایت مقایسه کنید. در اکثر موارد فایلهایی که باز نمی شوند، به صورت کامل دانلود نشده اند. مثلا اگر کتابی 800 کیلوبایت حجم داشت و پس از دانلود باز نشد، حتما اندازه فایلی که دانلود کرده اید کمتر از 800kb است. دانستن حجم فایل و مقایسه آن پس از دانلود با حجم نوشته شده در سایت شما را مطمئن می کند که فایل را سالم دانلود کرده اید. اگر اندازه فایل شما درست بود ولی باز هم نتوانستید آرا باز کنید ما را از طریق فرم تماس با ما در جریان قرار دهید تا آن را اصلاح کنیم. ضمنا هنگام تماس نام کتاب را ذکر کنید و مشکل خود را دقیقا توضیح دهید تا راهنمایی های لازم برایتان ارسال شود.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;بیشتر کتابهای عقیده برای کمتر شدن حجم و سهولت دریافت، به صورت فشرده و با پسوند zip هستند. برای باز کردن این نوع فایل از برنامه &lt;a href=&quot;../../../../pro/winzip90.exe&quot;&gt;WinZip&lt;/a&gt; &lt;img alt=&quot;برنامه زیپ برای باز کردن فایل های فشرده&quot; src=&quot;file:///E:/Aqeedeh-Temp/aqeedeh-help/helpimages/icon_zip.gif&quot; /&gt; یا &lt;a href=&quot;../../../../pro/wrar393fa.exe&quot;&gt;WinRar&lt;/a&gt; &lt;img alt=&quot;برنامه رار برای باز کردن فایل های فشرده شده&quot; src=&quot;file:///E:/Aqeedeh-Temp/aqeedeh-help/helpimages/icon_rar.gif&quot; /&gt; استفاده کنید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img alt=&quot;Bookmark and Share&quot; src=&quot;file:///E:/Aqeedeh-Temp/aqeedeh-help/helpimages/lg-share-en.gif&quot; /&gt; با استفاده از دکمه ارسال به شبکه های اجتماعی می توانید هر کتاب را به دوستان خود معرفی کنید (با گزینه Email) و یا در سایتهای اجتماعی به اشتراک بگذارید.&lt;/p&gt;

&lt;div&gt;قبل از تماس مطمئن شوید که فایل مورد نظر به طور کامل دانلود شده باشد و به همین جهت ما در زیر هر فایل حجم دقیق آن قرار داده ایم زیرا اگر فایل به طور کامل دانلود نشده باشد از حالت زیپ خارج نشده و پیام خطا می دهد، این مشکل برای کسانی که سرعت اینترنت آنها پایین می باشد بیشتر رخ می دهد.&lt;/div&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;توجه: اگر از برنامه های فایروال firewall استفاده می کنید ممکن است به خاطر تنظیمات برنامه های فایروال نتوانید دانلود کنید.&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;&lt;/div&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;نصب خطها :&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;برای مطالعه کتابهای کتابخانه عقیده باید فونتهای فارسی و فونتهای قرآنی را بر روی رایانه یا همان کامبیوترتان نصب نمایید تا در مطالعه کتابها دچار مشکل نشوید زیرا بیشتر کتابها به خطهای مخصوص فارسی نوشته شده است و علاوه بر این بیشتر آیات قرآن کریم از مصحف مدینه منوره گرفته شده که برای خواندن آن باید حتما فونتهای قرآن کریم را هم نصب نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;لازم به ذکر است که ما دو نوع خط های قرآنی داریم:&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;الف: خط های قرآن کریم شرکت حرف که این خط ها همراه با خط های فارسی قرار داده شده اند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ب: خط های قرآن کریم چاپخانه قرآن کریم مدینه منوره که این خط ها به نام خط های قرآنی می توانید دریافت نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;/fonts/aqeedeh-persian-fonts.zip&quot;&gt;::دریافت خط های فارسی::&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ::&lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;/fonts/quran-osman-taha-fonts.zip&quot;&gt;دریافت خط های&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;/fonts/quran-osman-taha-fonts.zip&quot;&gt; قرآنی&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;/fonts/quran-osman-taha-fonts.zip&quot;&gt;::&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;لازم به ذکر است که نسخه پی دی اف(PDF) &lt;sub&gt;&lt;a href=&quot;/pro/FoxitReader411_enu_Setup.exe&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; height=&quot;24&quot; src=&quot;/ebook/images/pdf.gif&quot; width=&quot;23&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/sub&gt; کتاب ها نیاز به هیچ کدام از خط هایی که در بالا ذکر کردیم ندارد و اگر در هنگام خواندن یا استفاده از فایل های پی دی اف سایت با مشکل مواجه شدید حتما با ما تماس بگیرید، سعی ما بر این است که تا یک ماه آینده تمامی کتاب های سایت با فرمت پی دی اف در دسترس باشند.&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;
&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&amp;nbsp;چگونگی دریافت کتاب:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;شما برای پیدا کردن کتاب مورد نظر می توانید از طریق جستجوی سایت یا قسمت موضوعات کتاب مورد نظر را پیدا کنید، بعد از پیدا کردن کتاب روی اسم کتاب فشار داده تا صفحه دریافت کتاب ظاهر شود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;شما در این صفحه می توانید کتاب را با فرمت های مختلف دریافت نمایید، فرمت وورد (WORD) &lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;فرمت وورد&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/word.gif&quot; style=&quot;width:27px;height:27px;&quot; /&gt;&lt;/sub&gt; و پی دی اف &lt;sub&gt;&lt;a href=&quot;/pro/FoxitReader411_enu_Setup.exe&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; height=&quot;24&quot; src=&quot;/ebook/images/pdf.gif&quot; width=&quot;23&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/sub&gt;&amp;nbsp; (PDF) معمولا در دسترس هستند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;شما برای خواندن یا چاپ کردن کتاب لازم است که فایل را از حالت زیپ خارج نمایید زیرا تمامی کتاب های سایت به صورت زیپ ZIP&lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;زیپ&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/zip-pic.JPG&quot; style=&quot;width:28px;height:31px;&quot; /&gt;&lt;/sub&gt;&amp;nbsp;&lt;sub&gt;&lt;img alt=&quot;رار&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/rar-pic.JPG&quot; style=&quot;width:26px;height:24px;&quot; /&gt;&lt;/sub&gt; در سایت قرار داده شده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;برنامه هایی که برای استفاده از کتابهای سایت لازم است:&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/pro/FoxitReader411_enu_Setup.exe&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;برنامه آکروبات ریدر (Acrobat reader):&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;برای خواندن یا چاپ کردن کتابهایی که با فرمت پی دی اف (PDF) می باشد و با این تصویر&amp;nbsp; &lt;sub&gt;&lt;a href=&quot;/pro/FoxitReader411_enu_Setup.exe&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; height=&quot;24&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/images/pdf.gif&quot; width=&quot;23&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/sub&gt; نمایش داده شده، نیاز به این برنامه دارید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.rarlab.com/download.htm&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;برنامه زیپ یا وین رار&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://www.rarlab.com/download.htm&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt; (ZIP and WINRAR):&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;تمامی كتابهای این كتابخانه برای سهولت دریافت با این برنامه فشرده شده است، برای اخراج كتابها از این حالت به این برنامه نیاز دارید، لازم به یادآوری است كه ویندوز هم دارای نوع ساده این برنامه می باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot;&gt;&lt;a href=&quot;/pro/winzip90.exe&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;برنامه زیپ برای باز کردن فایل های فشرده&quot; src=&quot;http://www.aqeedeh.com/pro/icon_zip.gif&quot; /&gt;&lt;/a&gt; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href=&quot;/pro/wrar393fa.exe&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;برنامه رار برای باز کردن فایل های فشرده شده&quot; src=&quot;/pro/icon_rar.gif&quot; style=&quot;width:24px;height:24px;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;
&lt;div&gt;&amp;nbsp;اگر بعد از مطالعه این صفحه باز هم مشکل شما حل نشد:&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;لطفا در هنگام تماس ذکر بفرمایید که دقیقا مشکل شما چیست، آیا مشکل در دانلود کردن کتاب ها دارید یا بعد از دانلود کتاب ها و همچنین لینک کتابی که در هنگام دریافت یا بعد از دریافت با مشکل مواجه شده اید برای ما ارسال کنید.&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابِ ابوبکر صديق رضى الله عنه - تحليل وقايع زندگي خليفه اول</title>
<link>http://qalamlib.com/news/101</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتابِ ابوبکر صدیق رضى الله عنه - تحلیل وقایع زندگی خلیفه اول&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان! ناگفته پیداست که شكاف و فاصله&amp;zwnj;ی زیادی میان مسلمانان امروزی و دوران شكوفای خلفای راشدین ایجاد شده و كار به جایی رسیده كه اولویت&amp;zwnj;بندی درستی در این زمینه صورت نگرفته و همین، موجب آمیختگی برنامه&amp;zwnj;ریزی و ردیف&amp;zwnj;بندی علمی و اصولی در پهنه&amp;zwnj;ی سیره&amp;zwnj;نگاری و سیرت&amp;zwnj;پژوهی شده است. نمونه&amp;zwnj;ی بارز آن، این&amp;zwnj;كه بسیاری از جوانان، بیش از آن&amp;zwnj;كه به مطالعه و بررسی زندگی و سیرت خلفای راشدین، بپردازند، به سیرت دعوت&amp;zwnj;گران، علما و اصلاح&amp;zwnj;گران روی آورده&amp;zwnj;اند. این، در حالی است كه سیرت خلفا، از غنا و پرباری قابل توجهی در زمینه&amp;zwnj;های سیاسی، اخلاقی، اقتصادی، فكری، جهادی و فقهی برخوردار است و ما نیز در حال حاضر، نیاز شدیدی به بررسی نظری و كاربردی زمینه&amp;zwnj;های مذكور داریم و باید هم&amp;zwnj;سو با حركت رو به جلوی زمان، در پی ایجاد مؤسساتی اسلامی در راستای سامان&amp;zwnj;دهی امور قضایی، مالی و اقتصادی، حكومتی و نظامی و لشكری خود بر مبنا و الگوی نظام عصر خلفا باشیم كه در آن زمان توانست رویاروی دو تمدن روم و ایران بایستد و حركت فتوحات اسلامی را به&amp;zwnj; پیش ببرد.&lt;br /&gt;
به امید اینکه مسلمانان با سیرت این رادمردان بیشتر آشنا شوند&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتاب ابوبکر صدیق رضى الله عنه - تحلیل وقایع زندگی خلیفه اول را خدمت شما عزیزان تقدیم می کنیم.&amp;nbsp;&amp;nbsp;این کتاب را می توانید در بخش اصحاب رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم در کتابخانه عقیده مطالعه نمایید.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب علماى شافعى و توحيد در عبادت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/100</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب ِ علماى شافعى و توحید در عبادت&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;برادران وخواهران مسلمان!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;اهمیّت مذهب شافعی و انتشار آن در آفاق بر هیچکس پوشیده نیست، قرنها است که از این مذهب پیروی می&amp;zwnj;شود، و در قسمت&amp;zwnj;های فراوانی از کره&amp;zwnj;ی زمین رواج دارد و هزاران نفر از عرب و عجم بدان گرویده&amp;zwnj;اند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;تعداد کثیری از ائمه&amp;zwnj;ی این مذهب کسانی هستند که جلالت و امامتشان مورد اتّفاق، و جایگاه علمی و مرتبه&amp;zwnj;ی رفیعشان ـ نه تنها نزد شافعی&amp;zwnj;ها بلکه در نزد جمهور مسلمانان ـ محرز است. تعداد کثیری از افراد، توحید در عبادت را بخصوص به علمای حنبلی ربط می&amp;zwnj;دهند، و برخی گمان می&amp;zwnj;برند که مبتکر آن علمای حنبلی هستند و این یک سوء فهم عجیب مسئله از طرفی، و نادیده گرفتن تلاش دیگران دراین زمینه از طرف دیگر، به شمار می&amp;zwnj;آید.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;این امر سوء فهم موضوع است، چون کسی که تصوّر کند این نوع از توحید از ابتکارات علمای طرفدار یک مذهب معیّن است در واقع حقیقت دین الله جل جلاله را درک نکرده، و مهمترین مبحث رسالت رسولان، و مطلبی که همه&amp;zwnj;ی کتاب&amp;zwnj;های آسمانی برای تحقّق آن فرود آمده&amp;zwnj;اند،را درک نکرده است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;علاوه بر این،در این گمان نادرست، نادیده گرفتن و ستم روا داشتن بر علمای امّت محمّد صلد الله علیه وأله وسلم ـ چه آنهایی که طرفدار مذاهب چهارگانه&amp;zwnj;ی معروف بوده&amp;zwnj;اند، چه کسانی که قبل از آنان آمده&amp;zwnj;اند ـ وجود دارد. و در ارتباط با آنچه که به علمای شافعی مربوط می&amp;zwnj;شود ـ در حالیكه آنها محور موضوع و بحث ما چر این کتاب بشمار می&amp;zwnj;آیند ـ می&amp;zwnj;پرسیم: آیا کسی که ـ درك&amp;zwnj;كننده&amp;zwnj;ی حقیقت گفتار خود باشد ـ به خود جرأت و جسارت می&amp;zwnj;دهد بگوید امام بزرگواری چون ابو عبدالله محمّد بن ادریس شافعی تلاش چندانی در زمینه&amp;zwnj;ی توحید در عبادت مبذول نداشته است و همّت خویش را مقصور امور غیر آن نموده است؟&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;و مثل همین را در مورد یاران بزرگوار شافعی ـ چون ابو یعقوب بویطی کسی که در محنت قول به خلق قرآن، ثابت قدم و استوار تا پای جان ایستاد و سرانجام به خاطر مقاومتش مظلومانه در زندان جان داد بگو. ومثل همین را در مورد ابو ابراهیم مزنی، و ابو محمّد ربیع بن سلیمان مرادی، و ابن نصر مروزی و ابو العباس بن سریج و ابوبکر بن خزیمه و ابومظفر سمعانی، و قوام السنه اصفهانی و محی السنه البغوی وغیر آنها ـ که اگر نام همه&amp;zwnj;ی آنها را بیاوریم مطلب به درازا می&amp;zwnj;کشد .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;توجه كم محقّقین به جمع آوری اقوال مربوط به توحید در عبادت توسط علمای شافعیه و توجّه به نقل اقوال علمای دیگر مذاهب، این گمان را تقویت می&amp;zwnj;بخشد که علمای بزرگوار شافعیّه تلاش آن چنانی در این باب انجام نداده باشند.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;در این راستا کتابخانه سایت عقیده تصمیم گرفت تا كتاب ِ علماى شافعى و توحید در عبادت را در بخش عقیده و ایمان خدمت شما عزیزان تقدیم نماید امیدواریم که این کتاب برای دوستداران علوم اسلامی مفید واقع گردد.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>برائت سايت عقيده از هك نمودن سايتهاى فارسى</title>
<link>http://qalamlib.com/news/98</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بسم الله الرحمن الرحيم&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;چند روز به این طرف بعضی از سایتهای فارسی و خاصتاً سایتهای ایرانی توسط هکرهای مجهول، هک شده و در صفحه اول این سایتها جملاتی به عربی و در ذیل آن این جمله نوشته شده است:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;read about the really Islam here&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;http://www.aqeedeh.com/ebook&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;به این وسیله اداره سایت عقیده به اطلاع دوستان و برادران عزیز می رساند که:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;اداره سایت عقیده با قاطعیت این عمل زشت و غیر اخلاقی این هکرها را محکوم نموده و آنرا خلاف دستورات دین مبین اسلام می داند و برا&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ئت و بيزاري خود را از اين عمل اعلان مي كند و به اطلاع همه عزيزان مي رساند كه سايت عقيده &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;هیچگونه دخالتی در این عمل نداشته و گذاشتن آدرس سایت&amp;nbsp;عقيده در ذیل نامه هکرها عملی تحریضی بوده و هدف از آن بدنام نمودن سایت عقیده می باشد.&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;اداره سایت عقیده&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>فرا رسيدن عيد سعيد فطر بر شما مبارك باد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/97</link>
<description>&lt;p&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot; face=&quot;Tahoma&quot;&gt;سه شنبه 9 مهر يا ميزان 1387هـ ش برابر با&amp;nbsp;30 سبتامبر 2008 م برابر با 1 شوال 1429اولين روز عيد سعيد فطر مى باشد فرا رسيدن اين عيد فرخنده را خدمت همه مسلمانان جهان تبريك وتهنيت عرض مي كنيم&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ مسأله خمس در بخش فقه و احكام كتابخانه عقيده نشر شد</title>
<link>http://qalamlib.com/news/94</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;كتابِ مسأله خمس&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;ایجاد و تقویت بدعت&amp;zwnj;های معموله و ضلالت&amp;zwnj;های موجوده و خرافات شایعه و اوهام متبعه چون شخص&amp;zwnj;پرستی&amp;zwnj;ها که پاره&amp;zwnj;ای از مشاهیر اسلام را بصورت خدا و ابناء&amp;zwnj;الله درآورده&amp;zwnj;اند به&amp;zwnj;طوری&amp;zwnj;که حتی شرک جاهلیت بر آن رجحان دارد، و عزاداری&amp;zwnj;های نامشروع و توسلات شرک&amp;zwnj;آفرین و زیارت&amp;zwnj;های ناصواب که شبیه همان ایاب و ذهاب مجوسیت و جاهلیت به آتشکده&amp;zwnj;ها و بتخانه&amp;zwnj;هاست و تعمی مقابر و تزیین و ترغیب ضرایح سجین و زرین و اعتکاف و اقامت در قبور و مزارها که مورد نهی عقل و شرع است و وقف اراضی و اموال بچنین امکنه و بقاع بمنظور تحکیم و تزئین آن و زنده کردن افتخارات موهوم نسب و نژاد و قومیت که اسلام با شدیدترین اراده و قدرت با آن مبارزه داشت و تعیین حقوق و مزایای خاصی به نژادی مخصوص که از آن جمله خمس کذایی است که بهمان قدرت و شدت بدعت&amp;zwnj;های دیگر بلکه از آن شدیدتر در میان شیعه امامیه شایع است ...&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
خمس که بنص صریح قرآن و سنت روشن پیغمبر آخرالزمان و سیره عموم مسلمانان نام یک پنجمی است که از غنیمت جنگ با مشرکین که عاید اردوی مجاهد مسلمین می&amp;zwnj;شود، زمامدار و پیشوای آن جنگ می&amp;zwnj;تواند به این مقدار از غنائم بردارد و چهار پنجم دیگر آن را طبق دستور اسلامی به مجاهدین واگذارد امروز بصورت مالیات ظالمانه&amp;zwnj;ای درآمده است که نه از اموال مشرکین بلکه از دسترنج طبقات قوی وضعیت شیعیان با اخلاص امیرالمؤمنین برای طبقه خاصی از انگلان گرفته می&amp;zwnj;شود و آن&amp;zwnj;چنان با شدت و دقت از مردم حتی از ضعفا چون حمال و هیزم کن و چرخ ریس و با تهدیدات شدیدی از عذاب اخذ می&amp;zwnj;شود تا مجالس سور و بساط سرور عده&amp;zwnj;ای مخصوص را دائر و گرم دارد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
این مالیات عجیب و سنگین که اگر صورت عمل بخود گیرد با آن می&amp;zwnj;توان سفره&amp;zwnj;های رنگین و بسترهای ننگین برای یک طبقه خاص معدودی پهن کرد! هرگاه در کشوری مثل ایران که از حیث درآمد چندان غنی نیست و از حیث وجود سادات غنی&amp;zwnj;ترین کشورهاست اگر حقوق اموال مشمول خمسش پرداخته شود بلکه همان درآمد تنها معادن او، به هر سیدی روزانه یکهزار تومان میرسد باز اگر گفته میشد که هر گاه از نفقه این طبقه زیادتر می&amp;zwnj;شد میتوان در امور اجتماعی و عام&amp;zwnj;المنفعه دیگر آنرا مصرف کرد. لکن صریح فتوای فقهای بزرگ شیعه آن است که آن را بجز این طبقه بر احدی نباید داد و به هیچ امری نمی توان مصرف نمود.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
اما مصرف نیمه دیگر که بنام سهم امام گرفته می&amp;zwnj;شود: صرفنظر از اینکه در شریعت حقه اسلامیه از این عنوان نام و نشانی نیست، و در صدر اول اسلام هیچ مسلمانی بنام سهم امام دیناری به احدی از ائمه اسلام از حق و باطل نداده است و مصرفی نداشته است. بدبختانه امروز هم سرش بیکلاه است: یعنی امامی بظاهر وجود ندارد که از آن بهره&amp;zwnj;مند شود زیرا مال شخص برای مصرف خود اوست.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
با صرفنظر از اینکه اکثر فقهای اقدم شیعه پرداخت چنین مالی را بلکه کلیه خمس کذایی را واجب ندانسته و در زمان غیبت آنرا بر شیعیان مباح و حلال میشمردند بنا بر فتوای پاره&amp;zwnj;ای از آنان که از باب احتیاط پرداخت آنرا لازم می&amp;zwnj;دانستند عقل و اندیشه خود را سر هم کرده چنین می&amp;zwnj;گفتند. سهم امام را می&amp;zwnj;باید از مال خود جدا کرده و در انتظار ظهور آن&amp;zwnj;حضرت بود تا بمجرد ظهور آنرا تقدیم حضور موفورالسرور نمود! و اگر نه در هنگام احتضار آنرا بوصی امین خود سپرد تا در صورت دست یافتن به امام غائب آنرا بوی پرداخت وگرنه آن وصی نیز در موقع احتضار بوصی امین خود واگذارد همچنین تا هر چند نسلی که ادامه یابد تا شاید روزی بدین فیض عظیم نائل آید و مال امامت چند صد ساله یا چند هزار ساله را بصاحب اصلی آن رد کند، و حق بمن له&amp;zwnj;الحق برسد؟ این یک راه!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
راه دیگر آسانتر آنکه سهم امام&amp;zwnj; را در بیابانی دفن کند تا هنگامی که امام ظهور می&amp;zwnj;کند آن دفینه فریاد برآورده امام&amp;zwnj; را بجانب خود دعوت کند تا امام آنرا تصاحب نماید و بمصارف لازمه عمر امامت هفت ساله یا حداکثر چهل ساله برساند (عمر امامت حضرت مهدی را احادیث هفت و حداکثر چهل سال معین می&amp;zwnj;کنند).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
راه بهتر و آسانتر و مطمئن&amp;zwnj;تر آنکه آن را بدریا افکند، چه در بیابان خوف آن است که دزدانی بدان دست یابند اما در قعر دریا از این آفت مصون است و این پول در قعر دریا میماند تا روزی که امام آنرا برون آورده مصرف نماید.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
می&amp;zwnj;فهمید نتیجه این حکم نازنین که از عقل زرین! مروجین دین مبین مایه می&amp;zwnj;گیرد و بدبختانه آنرا بشریعت آسمانی و الهی سید&amp;zwnj;المرسلین نسبت می&amp;zwnj;دهند چیست؟&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
آن&amp;zwnj;است که همه ساله یک درهم ثروت روی زمین را باید بدریا افکند تا پس از چند هزار سال امام غائب بیاید و آنرا برداشته (در دنیایی که می&amp;zwnj;گویند معامله با صلوات انجام می&amp;zwnj;گیرد و کسی را بدرهم و دینار احتیاجی نیست) مگر با آن آسمان&amp;zwnj;خراشهای طلا و نقره بنیاد کند!!&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
باز خدا پدر ملایان و مراجع تقلید امروز را بیامرزد که برای مصرف این بودجه عظیم هر چند به اخلاص کمال کاملاً پرداخته نمی&amp;zwnj;شود. (زیرا بنای غلطی است که ادنی شعوری هم به بطلان آن پی می&amp;zwnj;برد). راهی پیدا کردند هر چند اکثر آن را بعده&amp;zwnj;ای عطله و بطله برای ترویج همان اباطیل و بدعت&amp;zwnj;های سابق الذکر بنام طلبه می&amp;zwnj;دهند. وگرنه با این حکم امروز ماهیان دریا هم از انبار شدن نقره و طلای سهم امام به پیسی و زکام مبتلی می&amp;zwnj;شدند. اگر تمام این ننگ&amp;zwnj;ها که از خفت عقل و شدت جهل و آلودگی مذهب و اضلال مطلب نصیب مسلمان شیعی مذهب میشود تحملش ممکن باشد آنچه بر وجدان ما سنگین و عملش بسیار ننگین است آن&amp;zwnj; است که نسبت جعل این حکم را به پروردگار حکیم و تبلیغ آنرا به نبی اکرم (ص)&amp;nbsp;که رحمه للعالمین است می&amp;zwnj;دهند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
اما آنچه باعث سرگردانی فقهاء شیعه شده است آن&amp;zwnj;است که احادیثی که در باره خمس غنائم جنگ است و این خمس در زمان رسول خدا از اموال مشرکین در جنگ اخذ می&amp;zwnj;شد و شاید از آن، خانواده رسول خدا در زمان حیات آن&amp;zwnj;حضرت بهره&amp;zwnj;ور می&amp;zwnj;شدند از آن جهت که کلمه خمس که نامی از یک کسر متعارفی است و آن را امروز بصورت یک حقیقت شرعیه درآورده&amp;zwnj;اند با خمسی که رسول خدا و خلفا از پاره&amp;zwnj;ای از معادن و کنوز و امثال آن از مسلمانان از بابت زكات می&amp;zwnj;گرفتند و بعداً اینگونه مسائل مورد ابتلای مسلمین بوده و از فقهای زمان خود از آن سؤال می&amp;zwnj;کردند که مثلاً از درآمد معدن نفت و کبریت و مس و آهن باید چه مقدار زکات داد؟ در جواب سائلان، فقیهان آن &amp;zwnj;زمان هر یک بنظر خود فتوائی می&amp;zwnj;دادند مشتبه شده چنانکه مالک در زكات معادن و رکاز یک عشر قائل بود و شافعی یک خمس.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
همچنین پاره&amp;zwnj;ای از شیعیان از ائمه معصومین سلام&amp;zwnj;الله علیهم از این مسائل پرسش می&amp;zwnj;نمودند و آن بزرگواران نیز می&amp;zwnj;فرمودند یک خمس. این&amp;zwnj;گونه احادیث باعث شده که زكات معادن را که یک خمس است و مصرف آن مصرف زکات است اشتباهاً خمسی گرفته&amp;zwnj;اند که مصرف آن خمس غنائم جنگ است وگرنه هرگز ائمه شریعتی در طول شریعت سیدالمرسلین نیاورده و حکمی غیر از آنچه قرآن مجید و سنت رسول، مبین آن است نگفته&amp;zwnj;اند و چنین نسبتی العیاذ بالله به آن بزرگواران هزار مرتبه بدتر از قتل آنان بسیف و سنان است زیرا در این&amp;zwnj;صورت آنان &amp;zwnj;را با پیغمبری بعد از خاتم&amp;zwnj;الانبیاء العیاذ بالله یا محرفین کتاب خدا باید شمرد و چنین عقیده&amp;zwnj; و گفتاری کفر صریح است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;اگر مبنای دین، کتاب خدا و سنت رسول&amp;zwnj;الله است. کتاب خدا و سنت رسول الله را از چنین خمسی آگاهی نیست. وگرنه راه ضلالت بسی فراخ است!خدا اسلام را از شر چنین مفتریان نجات بخشد.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمانان می توانند این كتاب را در بخش فقه واحكام كتابخانه عقیده مطاله نمایند&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ حسن مجتبى رضى الله عنه تحليل وقايع زندگي خليفه پنجم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/92</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ حسن مجتبى رضى الله عنه تحلیل وقایع زندگی خلیفه پنجم&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این كتاب، ادامه&amp;zwnj;ى پژوهشی است كه در موضوع سیرت پیامبر اكرم صلى الله علیه وآله وسلم و خلفای راشدین آغاز شده است. در این مجموعه، سیرت رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم با نام الگوی هدایت و نیز سیرت خلفای راشدین رضی الله عنهم را به نگارش درآورده&amp;zwnj; شده است&amp;nbsp;و اینك در كتاب پیش رویتان، به شرح حال پنجمین خلیفه یعنی حسن بن علی بن ابی&amp;zwnj;طالب رضی الله عنهما و تحلیل وقایع زندگانی وی از تولد تا شهادتش می&amp;zwnj;پردازم. نخستین مبحث این كتاب، به بیان نام، نسب، كنیه، صفت و لقب حسن بن علی رضی الله عنهما می&amp;zwnj;پردازد و در همین مبحث بیان می&amp;zwnj;گردد كه شخص رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم ، حسن رضی الله عنه را به بدین اسم، نامگذاری كرد و در گوشش اذان گفت و موی سرش را تراشید و برایش عقیقه فرمود. همچنین در این كتاب به بیان این موضوع پرداخته می&amp;zwnj;شود كه ام&amp;zwnj;فضل رضی الله عنها به این نوزاد عزیز شیر داد. در ادامه از ازدواج حسن بن علی رضی الله عنهما و تعداد همسرانش و روایاتی كه در این زمینه آمده، بحث می&amp;zwnj;شود و مجموعه&amp;zwnj;ی روایاتی مورد بررسی قرار می&amp;zwnj;گیرد كه خاستگاه این پندار قرار گرفته كه حسن رضی الله عنه زنان زیادی را به ازدواج خویش در آورده و آنها را طلاق داده است. این كتاب، پیرامون فرزندان، برادران، خواهران، عموها، عمه&amp;zwnj;ها، دایی&amp;zwnj;ها و خاله&amp;zwnj;های حسن و نیز مادر بزرگوارش فاطمه&amp;zwnj;ی زهرا رضی الله عنها بحث می&amp;zwnj;كند و موضوع مهریه، جهیزیه، عروسی، چگونگی زندگانی، شكیبایی و نیز محبت رسول الله &amp;nbsp;صلى الله علیه وآله وسلم با فاطمه&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی زهرا رضی الله عنها و همچنین غیرت ایشان نسبت به این بانوی بزرگوار را مورد بررسی قرار می&amp;zwnj;دهد و از راستگویی و صراحت گفتار دخت گرامی رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم و جایگاه رفیعش در دنیا و آخرت سخن می&amp;zwnj;گوید. در این كتاب همچنین از روابط حسنه&amp;zwnj;ی فاطمه&amp;zwnj;ی زهرا رضی الله عنها با ابوبكر صدیق رضی الله عنه سخن به میان می&amp;zwnj;آید و موضوع میراث رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم تبیین و تشریح می&amp;zwnj;گردد و سپس به مسأله&amp;zwnj;ی وفات فاطمه&amp;zwnj;ی زهرا می&amp;zwnj;پردازد. این كتاب، به جایگاه والای حسن رضی الله عنه نزد رسول الله &amp;nbsp;صلى الله علیه وآله وسلم اشاره می&amp;zwnj;كند و میزان محبت پدربزرگ بزرگوارش، محمد مصطفی صلى الله علیه وآله وسلم به حسن و نیز چگونگی مهرورزی به كودكان را به تصویر می&amp;zwnj;كشد و رهنمود نبوی در زمینه&amp;zwnj;ی محبت به فرزندان را نمایان می&amp;zwnj;كند و پیرامون بازی و شوخی با كودكان، بوسیدن و در آغوش گرفتن آنها و نیز نثار مهر و محبت و هدیه به فرزندان، مطالبی ارائه می&amp;zwnj;دهد و سپس درباره&amp;zwnj;ی احادیثی بحث می&amp;zwnj;كند كه به شباهت حسن بن علی رضی الله عنهما به رسول الله &amp;nbsp;صلى الله علیه وآله وسلم اشاره نموده و به روایاتی می&amp;zwnj;پردازد كه حسن و حسین رضی الله عنهما را سرور و آقای جوانان بهشت معرفی كرده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این كتاب را در بخش اهل بیت رسول الله در كتابخانه عقیده مطالعه نمایید&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ عقيده امام ابوحنيفه رحمه الله</title>
<link>http://qalamlib.com/news/91</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ عقیده امام ابوحنیفه رحمه الله&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;كتابی كه&amp;nbsp;&amp;nbsp;پیش رو دارید خلاصه&amp;zwnj;ى عقیده&amp;zwnj;ى امام ابوحنیفه رحمه الله علیه درباره&amp;zwnj;ی توحید، صفات الله متعال، ایمان و صحابه و نیز موضع&amp;zwnj;گیری ایشان در برابر متكلمان است.&lt;br /&gt;
در این خلاصه؛ موضع&amp;zwnj;گیری امام در رابطه با علم كلام، بیان می&amp;zwnj;شود، در&amp;nbsp;این كتاب می&amp;zwnj;خوانید كه امام از شرك و آن&amp;zwnj;چه منجر بدان می&amp;zwnj;شود، نهی كرده و از آن بر حذر داشته است. و با برخی از اشكال شركی كه بوقوع پیوسته و امام و پیروان راستینش از آن&amp;zwnj;ها نهی كرده&amp;zwnj;اند، آشنا می&amp;zwnj;شویم.&lt;br /&gt;
اداره كتابخانه عقیده با نشر این كتاب مهم آرزو دارد كه برادران و خواهران مسلمان با عقیده این امام بزرگ بیشتر أشنا شوند.&lt;br /&gt;
این کتاب را می توانید در بخش مشاهیر اسلام&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتابخانه عقیده مطالعه نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتابِ آيا معبودى  با الله جل جلاله است؟</title>
<link>http://qalamlib.com/news/88</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتابِ آیا معبودى&amp;nbsp;&amp;nbsp;با الله جل جلاله است؟&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بی گمان دین- معتبر و پسندیده- در نزد خداوند جل جلاله دین اسلام است و دینی بنام یهودیت یا مسیحیت در نزد خداوند جل جلاله مدار اعتبار نبوده، بلکه این اصطلاحات را پیروان موسی علیه السلام&amp;nbsp;&amp;nbsp;و عیسی علیه السلام بعد از وفات شان بوجود آورده اند، اما در زمان حیات شان همچو نام ها وجود نداشت و هیچ کدام آنها به آن معترف نبودند. خداوند جل جلاله این دو امت را در قرآن کریم بنام یهود و نصاری معرفی کرده می فرماید:&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;(وَقَالَتِ الْیَهُودُ لَیْسَتِ النَّصَارَى عَلَى شَیْءٍ وَقَالَتِ النَّصَارَى لَیْسَتِ الْیَهُودُ عَلَى شَیْءٍ وَهُمْ یَتْلُونَ الْكِتَابَ&amp;nbsp;) البقرة&amp;nbsp;&amp;nbsp;113 .&amp;nbsp;یهودیان گفتند که مسیحیان برحق نیستند و مسیحیان گفتند که یهودیان برحق نیستند، حال آن که کتاب آسمانی را می خوانند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در حقیقت دین پسندیده در نزد خداوند جل جلاله دین اسلام است. آری دین همۀ بشریت بعد از فرود آمدن آدم علیه السلام به زمین و پیامبران واپسین تا پیامبر آخر زمان حضرت مصطفی صلی الله علیه وآله وسلم اسلام بود. خداوند جل جلاله میفرماید:&amp;nbsp;مَا كَانَ إِبْرَاهِیمُ یَهُودِیًّا وَلَا نَصْرَانِیًّا وَلَـكِن كَانَ حَنِیفًا مُّسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِینَ)&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ابراهیم نه یهودی بود نه نصرانی، بلکه حنیف مسلمان بود و ازمشرکان نبود. آل عمران 67&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاید کسی بپرسد که چرا اسلام دین همۀ پیامبران است؟ برای چنین سوال کننده جوابی کوتاه میدهیم که خداوند جل جلاله یکتا و بی همتاست و دین نیز در نزد اوتعالی یک دین است، و درست نیست اینکه خالق و پروردگار همه بشریت چه در گذشته وچه در حاضر و آینده، یک ذات باشد، ولی دین آنها مختلف. حال آنکه همه یک رب را می پرستند، پس الله جل جلاله واحد است و دین نیز نزد اوتعالی یک دین می باشد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خوانندگان گرامی! از شما خواهشمندم که همه فصول این کتاب را مطالعه نمایید تا سیاه و سفید، پوسیده و نفیس، گمراهی و هدایتی که میان مبادی بزرگوار اسلام و مبادی فاسد غرب وجود دارد برایتان واضح گردد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این كتاب را می توانید در بخش عقیده و ایمان كتابخانه عقیده مطالعه نمایید.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب گزيده‌اى از اعتقادات سلف</title>
<link>http://qalamlib.com/news/86</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب گزیده&amp;zwnj;ای از اعتقادات سلف&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کسی که آثار بجا مانده&amp;zwnj;ی سلف صالح در زمینه اصول دین را دنبال کرده باشد. می&amp;zwnj;بیند که در بیشتر مسائل با هم متفق القول هستند، و متوجه می&amp;zwnj;شود که آنان به مسائل اعتقادی بسیار اهمیت می&amp;zwnj;دادند خصوصاً در زمینه تعلیم و تربیت، برعکس امروز که می&amp;zwnj;بینیم در میان برخی فرق و گروههای اسلامی، مسائل اعتقادی باعث اختلاف و کشمکشهای زیادی شده است&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مؤلف این كتاب درباره كتابش می فرماید:&lt;br /&gt;
من این گروههای اسلامی را با منهج و راه و روش سلف صالح و افکار و ایده&amp;zwnj;های مدارس فکری و علمی امروز در بیشتر ممالک اسلامی مطابقت داده و آن را در مناسبتها، دیدارها و همایشهای گوناگون دنبال کرده&amp;zwnj;ام و بعضیها خیلی شگفت زده می&amp;zwnj;شدند از اتفاق نظر علمای سلف در بیشتر مسائل اعتقادی، و از من درخواست می&amp;zwnj;کردند که برخی از این نصوص را جمع&amp;zwnj;آوری کنم. خصوصاً آنچه مربوط می&amp;zwnj;شود به ائمه اربعه یعنی:&lt;br /&gt;
امام ابوحنیفه، امام مالک، امام شافعی و امام احمد بن حنبل: و این باعث شد که در این کتاب برخی از این نصوص را جمع&amp;zwnj;آوری نمایم و نظرات بعضی از علمای معتبر و برجسته مانند امام بخاری، طحاوی، ابن تیمیه، محمد بن عبدالوهاب و غیره را به آن بیافزایم.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;برادران وخواهران محترم می توانند این&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتاب گرانبها را در بخش عقیده و ایمان کتابخانه عقیده مطالعه فرمایید&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب ديدگاه اهل سنت درباره مشاجرات و اختلافات ميان صحابه کرام رضي الله عنهم أجمعين</title>
<link>http://qalamlib.com/news/85</link>
<description>&lt;p class=&quot;StyleComplexBLotus12ptJustifiedFirstline05cmCharCharChar3Char&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; line-height: normal; text-align: justify;&quot;&gt;كتاب دیدگاه اهل سنت درباره مشاجرات و اختلافات میان صحابه کرام رضی الله عنهم أجمعین&lt;br /&gt;
متأسفانه در سال&amp;zwnj;های اخیر ایراد و بدگویی از اصحاب رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم از جانب رافضی&amp;zwnj;های جدید افزایش یافته و بعضی از نویسندگان و روزنامه&amp;zwnj;نگاران هم با آنان همسو شده&amp;zwnj;اند، و کار به جایی رسیده که شخصی مثل أسامه انور عکاشه در ملأ عام و روی بعضی از تلویزیون&amp;zwnj;های ماهواره&amp;zwnj;ای به طعن و بدگویی از یاران پیامبران خدا صلى الله علیه وآله وسلم می&amp;zwnj;پردازد.&lt;br /&gt;
در حقیقت این تهاجم ننگین بخشی از نقشه&amp;zwnj;ای می&amp;zwnj;باشد که جهت دور نمودن و فاصله گرفتن مسلمانان از اصحاب کرام رضی الله عنهم پی&amp;zwnj;ریزی شده است. و علت چنین تهاجمی از قدیم معلوم بوده و بزرگ مردی همچون امام ابو زرعه (رحمه الله) پرده از روی آن برداشته آنگاه که می&amp;zwnj;فرماید اگر کسی را دیدی که از اصحاب رسول اکرم صلى الله علیه وآله وسلم عیبجوئی می&amp;zwnj;کند بدان که آن کس کافر و زندیق است که می&amp;zwnj;خواهد سلف صالح این امت را لکه&amp;zwnj;دار کند. و در واقع کلام امام ابو زرعه &amp;nbsp;رحمه الله هدف کج اندیشان و گمراهان را روشن می&amp;zwnj;کند که می&amp;zwnj;خواهد از راه لعن و عیب جویی از جیل اولیه و پرورش یافته مدرسه وحی به اصل شریعت مقدس اسلام عیب وارد کنند. آن را فاقد اعتبار و ناکار آمد برای این دور و زمانه جلوه دهند. چون توانایی آن را ندارند که مستقیماً به شریعت اسلام حمله&amp;zwnj;ور شوند و به امید خدا هیچ گاه موفق نخواهند بود. و بدین خاطر این رساله را&amp;nbsp;تهیه نمودیم&amp;nbsp;كه اسم آن&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;laquo;کف العصابه عما شجربین الصحابه&amp;raquo; بود&amp;nbsp;و به فارسی اسم آن را دیدگاه اهل سنت درباره مشاجرات و اختلافات میان صحابه کرام رضی الله عنهم أجمعین گذاشتیم که موقف و آراء اهل سنت را در خصوص آن روشن نموده&amp;zwnj;ایم.&lt;br /&gt;
اداره كتابخانه سایت عقیده با تقدیم این كتاب خدمت برادران و خواهران مسلمان از خداوند منان&amp;nbsp;مى خواهد&amp;nbsp;که آن را در میزان حسناتمان قرار دهد و عاقبت ما را ختم به خیر نماید.&lt;br /&gt;
شما می توانید این كتاب را در بخش اصحاب رسول الله&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;مطالعه نمایید&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب راه هاي نفوذ شيطان بر صالحان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/84</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: 150%; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: #0033cc; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;كتاب راه هاي نفوذ شيطان بر صالحان&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: #0033cc; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: 150%; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;از جمله مصيبتهايي كه امت اسلامي درعصرحاضر به‌آن مبتلا&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;شده است گرايش فكري بعضي از فرزندان اين امت مي باشد، كساني كه به اصطلاح پرچمهاي روشنگري&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;وروشنفكري را بر دوش داشته وحمل مي كنند، وبعضي از آنان اين نوع گرايش فكري را به دين نسبت مي‌دهند، وتمامي سعي وتلاش آنان بر اين است كه ميان دين اسلام وشرايط واحوال وقوانين مختلف ناشي از تراوشهاي فكري فرهنگ معاصر وجديد اروپايي درميدان انديشه وفلسفه وهمچنين در ميدان&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;علوم وتجربه هماهنگي وسازگاري ايجاد كنند. وشاخص اصلي ومهم در مسير اين تلاش وكوشش، تغيير وتحول روشنگريهاي عقلي اسلامي&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;بر حسب ظن وگمان&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;وفهم و برداشت آنان است. ودراين راستا به معاني ومفاهيم زيادي در رابطه با اسلام، آنچه را كه دركتاب الله (قرآن) وسنت رسول اكرمص ثابت شده است، استناد كرده اند وبدين ترتيب آن را بصورتي نادرست وناشايست تأويل كرده ويكسري معاني عقلاني به آن اضافه كرده اند&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;تا فرهنگ جديد اروپايي آن را هضم و قبول كند وبا آن هماهنگ وسازگار باشد. وبا وجود اشتباه اساسي در اين روش، يعني انحراف شرعي وخارج شدن از راه وروش اهل سنت وجماعت در ارتباط با قرآن وسنت صحيح رسول اكرمص جز اين نيست كه مي‌گوييم: درحقيقت بكارگيري اين روش جديد، به اسلام واظهارات ودلايل قاطع وبلند آن ضربه زده است وبا توجه به روش وگرايش فكري جديد&amp;nbsp;آنطور كه آنان مي‌پنداشتند، هيچگونه فائده وسودي حاصل نشد جز اينكه موجب جدايي ميان درك وفهم اسلامي وادراكات آگاهي‌هاي صحيح دين اسلام شده است. درصورتيكه درك وفهم اروپايي به اندازه اي جزئي ازموضوعات وحي الهي ومسير اسلام نزديك شده است. بحث در موردشيطان در قرآن كريم يكي از موارد اجرايي دراين روش تفسيري منحرف مي باشد، تا حدي كه بعضي از اين به اصطلاح روشنفكران، غيرمستقيم وجود شيطان را براحتي انكار كردوآن رابه عنوان نمادي از نيروهاي شردروني وبعضي ديگر آن را به وسوسه‌هاي نفس تعبير وتوصيف كرده اند، وساير افكار جديد وتاويلات عجيب&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;وشگفتي كه هيچگونه ارتباطي با بحث مورد نظر، (بحث شيطان) وآگاهيهاي موجود در كتاب الله (قرآن ) واصول وبديهيات ديني ندارند. يكي از نتايج وپيامدهايي كه اين نوع تفسير منحرف در اين رابطه با موضوع شيطان بدنبال داشته است، اهميت وتوجه بعضي از مسلمانان را نسبت به مساله شيطان كم كرده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: 150%; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ادار&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;ۀ کتابخانۀ سایت عقیده ضمن اینکه آرزو دارد مسلمانان از وساوس شیطان در امان باشند &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;كتاب راه هاي نفوذ شيطان بر صالحان را تقدیم خوانندگان محترم می کند، شما می توانید این کتاب را از بخش&lt;/FONT&gt; &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=14&quot;&gt;اخلاق و تربیت&lt;/A&gt; &lt;FONT color=#0000ff&gt;کتابخانه بدست آورید.&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب تجلی قرآن در عصر علم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/83</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin-right: 7.5pt; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب تجلی قرآن در عصر علم&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin-right: 7.5pt; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;(أَفَلا یَتدبّرونَ الْقُرْءَانَ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَیْرِ اللَّهِ لَوَجَدُواْ فِیهِ اخْتِلافًا كَثِیرًا) &amp;laquo;آیا در معانی قرآن نمى اندیشند؟ زیرا اگر از جانب غیر الله می بود قطعا در آن اختلاف بسیاری می یافتند&amp;raquo; [نساء/ 82].&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;بیگمان کتابی که هزار و چهارصد سال قبل در بیشتر از هزار آیه، از اموری سخن بگوید که به راز آفرینش انسان، چگونگی شکل&amp;shy;گیری ابرها، نقش بادها در تعاملات هستی، ویژگیهای زمین، مأموریت کوه ها، ساختار هندسی آسمانها و بسی دیگر از پدیده های طبیعی می پردازند و سپس در هیچ یک از عبارات و اشارات خود پیرامون این امور، با حقایق علمی جدید&amp;nbsp;&amp;nbsp;تصادم هم نکند؛ سزاوار آن می&amp;shy;باشد تا دانشوران منصف در پیشگاه آن با کمال احترام وخضوع بایستند.&lt;br /&gt;
آری! موضوع به یک یا چند آیة محدود از قرآن تعلق نمی گیرد تا مترددان و شک برانگیزان بتوانند حقایق و روشنگریهای علمی قرآن را به تصادف نسبت دهند بلکه قضیه به بخش بزرگی از آیات قرآن كریم که نزدیک به یک ششم آن را احتوا می&amp;shy;کند مربوط می شود. اعجاز قرآن در اینجاست که علم جدید با تمام سلطه و شکوهی که دارد نتوانسته است چیزی از اشارات یا عبارات علمی آن را رد نماید.&lt;br /&gt;
مگر می توان کتابی را به چالش کشید که گوینده و فرودآورندهء آن آفریدگا ر کائنات بزرگ است و خود بر حقانیت آن گواه بوده و آن را به علم خویش نازل کرده است؟:&lt;br /&gt;
(لَكِنِ اللَّهُ یَشْهَدُ بِمَآ أَنزَلَ إِلَیْكَ أَنزَلَهُ بِعِلْمِهِ وَالْمَلآئِكَةُ یَشْهَدُونَ وَكَفَى بِاللَّهِ شَهِیدًا)&amp;nbsp;[نساء/ 166]. &amp;laquo;لیكن الله به حقانیت آنچه برتو نازل کرده است گواهی می دهد. او آن را به علم خویش نازل کرده است؛ و فرشتگان نیز گواهی می دهند. و کافی است كه خدا گواه باشد&amp;raquo;&lt;br /&gt;
برای روشن شدن جایگاه مبحث اعجاز علمی قرآن کریم در عرصهء علوم تجربی و آشنایی با بعد علمی اعجاز قرآن، که در دلهای مسلمانان اثر بلیغی برجای می گذارد؛ زیرا وقتی این حقایق درخشان را در کتابی که به آن ایمان دارند ببینند، ابهت و عظمت این كتاب، بیش از پیش در اعماق جان و روانشان رسوخ یافته و موجب تمسک بیشتر آنها به آموزه&amp;shy;های این کتاب هدایت و نور خواهد گردید.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
بنابر این به مناسبت ماه قرآن، ماه مبارک &amp;nbsp;و پر قیض و برکت رمضان تصمیم گرفتیم کتاب تجلی قرآن در عصر علم&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;أثر استاد بزرگوار&amp;nbsp;&amp;nbsp;عبدالرؤوف مخلص حفظه الله را خدمت شما عزیزان تقدیم نماییم.&lt;br /&gt;
دوستان عزیز می توانند این کتاب را در بخش قرآن کریم کتابخانۀ عقیده مطالعه نمایند&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب اسماء و صفات خداوند متعال</title>
<link>http://qalamlib.com/news/82</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;کتاب اسماء و صفات خداوند متعال&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
به خاطر اهمیت و منزلت اسماء الله و این &amp;zwnj;كه مباحثات مردم در این موضوع گاهی حق و احیاناً باطلی است که منشاء آن جهل یا تعصب می باشد بنا بر این به توفیق الله متعال برای روشن شدن و تمییز حق از باطل، تصمیم گرفتیم این کتاب مبارک را در این ماه مبارک و فضیل در کتابخانۀ عقیده نشر نماییم از الله تعالی &amp;nbsp;می خواهم كه این عمل را برای ما و نویسنده و مترجم آن خالصانه و موافق رضایش و سودمند برای بندگانش قرار دهد.&lt;br /&gt;
توحید&amp;nbsp;الله متعال&amp;nbsp;شامل سه قسمت بوده كه عبارتند از:&lt;br /&gt;
1- توحید در ربوبیت،&lt;br /&gt;
2-توحید در الوهیت،&lt;br /&gt;
3- توحید در اسماء و صفات.&lt;br /&gt;
علم به اسما و صفات جلاله اش جایگاهی رفیع و اهمیت بسزایی دارد، و برای هیچ&amp;zwnj;كس ممكن نیست بدون علم به اسماء و صفات خداوند، او را به نحو اكمل بندگی كند و در این صورت است كه عبادت همراه با بصیرت خواهد بود. خداوند متعال می&amp;zwnj;فرماید: (وَلِلَّـهِ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى فَادْعُوهُ بِهَا )&amp;nbsp;(اعراف / 180)&amp;nbsp;&amp;laquo;و اسماء&amp;zwnj;حسنی تنها از آن الله است پس او را با این اسماء بخوانید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
و این شامل دعای خواستن و دعای عبادت می&amp;zwnj;شود.&lt;br /&gt;
دعای خواستن بدین معنی است كه قبل از بیان خواسته&amp;zwnj;ات به یكی یا چند تا از اسماء الله كه متناسب با آن درخواست است متوسل شوید، مثلاً بگوئید: &amp;laquo;یا غفور اغفرلی، یا رحیم ارحمنی&amp;raquo; ای آمرزنده! مرا بیامرز،&amp;zwnj; ای مهربان! به من رحم كن. &amp;laquo;یا حفیظ احفظنی&amp;raquo; ای نگهدارنده! مرا نگهداری فرما.&lt;br /&gt;
و دعای عبادت یعنی او را به مقتضای این اسماء عبادت نمایید و در پیشگاه او توبه كنید، چون تنها او تواب است. و با زبان او را یاد کنید چون فقط او شنوا و پذیرای اعمال است. و با اعضاء و جوارح وی را بندگی كنید زیرا تنها او بیننده اعمال است. و در نهان از وی بترسید چون فقط او لطیف است و خبیر. و بدین&amp;zwnj;گونه بقیه اسماء را بخوانید.&lt;br /&gt;
برادران و خواهران مسلمان می توانند&amp;nbsp;&amp;nbsp;این کتاب را در بخش&amp;nbsp;&amp;nbsp;عقیده و&amp;nbsp;&amp;nbsp;ایمان&amp;nbsp;در&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتابخانه عقیده مطالعه نمایند.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب فقه خانواده در جهان معاصر</title>
<link>http://qalamlib.com/news/79</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;كتاب فقه خانواده در جهان معاصر&lt;/FONT&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;به لطف و يارى الله متعال &lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;كتاب&lt;/FONT&gt; فقه خانواده در جهان معاصر&lt;/FONT&gt; به كتابخانه عقيده اضافه گردید&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;اين كتاب پاسخگوي همه نيازهاي &lt;FONT color=#0000ff&gt;خانواده‌هاي مسلمان&lt;/FONT&gt; نه تنها در عصر حاضر بلكه در هر عصر و زمان ديگري، در ارتباط با احكام حلال، حرام و مسائل شرعي و اخلاقي از زاويه صرفاً‌ مساوي است، كه در راستاي ساختن خانواده مسلمان براساس نگرشي عملي و واقع ‌بينانه استوار بوده و برمبناي همان روش صدر اسلام قرار گرفته است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-INDENT: 14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: right 368.55pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;اهدافي كه شريعت اسلام در احكام مربوط به خانواده دنبال مي‌نمايد، به طور خلاصه عبارتند از:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 32.2pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -0.25in; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.2pt right 368.55pt; mso-list: l0 level1 lfo1&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;استحكام پايه‌هاي جامعه اسلامي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 32.2pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -0.25in; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.2pt right 368.55pt; mso-list: l0 level1 lfo1&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;پرورش نسلي توانا، تلاشگر، مجاهد، مؤمن و نسلي كه توانايي ادامه دادن به سازندگي، كار، تلاش و پاسداري از حريم دين خداوند و حقوق مردم و استوار نمودن پايه‌هاي عزت، كرامت و تسليم‌ ناپذيري در جامعه را داشته باشد.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 32.2pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -0.25in; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.2pt right 368.55pt; mso-list: l0 level1 lfo1&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-bidi-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;فراهم نمودن شرايطي كه خانواده راه انحراف را در پيش نگيرد و دچار تزلزل و فروپاشي نگردد و همچنان به عنوان ستوني ستبر و سالم براي بناي كاخ جامعه‌اي اسلامي پايدار بماند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-INDENT: 14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: right 368.55pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌راهكاري كه در اين كتاب دنبال مي‌شود، بررسي‌هاي كلي و مختصر براي عمل و اقدام ريشه‌اي، پالايش شده و مستند است و به خاطر سهولت استفاده از مطالب، از طول و تفصيل پرهيز شده تا براي ده‌ها ميليون از افراد خانواده‌ها قابل استفاده باشد و با بهره‌گيري از منابع اسلامي مورد اطمينان، معلومات لازم را در اختيار آنان قرار دهد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-INDENT: 14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: right 368.55pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;همه نيازهاي خانواد‌ه‌ها را كه با جهان معاصر و خواسته‌هاي فراوان و متنوع آن سازگاري دارد، مورد بررسي قرار مي‌دهد، خواسته‌ها و ضرورت‌هايي كه بسياري از آنها پيامبر رويارويي‌هاي تبليغاتي و تهاجم فرهنگي غرب يا سازمان‌هايي است كه صرفاً خانواده اسلامي را نشانه گرفته‌اند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-INDENT: 14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: right 368.55pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;اهدافي كه اين كتاب دنبال مي‌كند، از لابه‌لاي محورهاي زير متجلي مي‌شود:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 28.4pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.25pt 43.0pt right 368.55pt; mso-list: l1 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;1-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;اقدام و پيگيري عملي و ارائه رهنمودهاي لازم براي پاسداري از نظام خانواده اسلامي و تقويت داخلي آن براي رويارويي قوي و فراگير با خراب‌كاري سازمان‌هاي بيگانه و تلاش‌هاي جديدي كه براي فروپاشي كاخ &lt;FONT color=#0000ff&gt;خانواده مسلمان&lt;/FONT&gt; صورت مي‌گيرد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 28.4pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.25pt 43.0pt right 368.55pt; mso-list: l1 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;2-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;بالا بردن سطح آگاهي افراد خانواده به ويژه پدر، مادر و پس از آنان فرزندان و متوجه نمودن‌شان به اين حقيقت كه محافظت از خانواده اسلامي، منافع و آسودگي‌هاي بسياري را به دنبال دارد و چنانچه خانواده مسلمان در سلامت و آسودگي قرار داشته باشد، در چارچوب آن اسلام نيز در سلامت قرار خواهد داشت و در صورتي كه دچار اختلال، فساد و ناهنجاري بشود، مايه خواري و مشكلات فراواني گرديده و به زيان خانواده و هم‌چنين شريعت خداوند تمام خواهد شد.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 28.4pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.25pt 43.0pt right 368.55pt; mso-list: l1 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;3-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;اين كتاب بيانگر سماحت، واقع‌نگري، ميانه‌روي، اعتدال، ارزش و منزلت والاي اسلام در جهت پاك، سالم و مرتب نگاه داشتن خانواده و ايجاد كمربند امنيتي استواري براي جلوگيري از لغزش، تنش و فروپاشي آن مي‌باشد.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 28.4pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.25pt 43.0pt right 368.55pt; mso-list: l1 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;4-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;خانواده يكي از مهم‌ترين پايه‌هاي نظام اجتماعي اسلام است، نظامي كه خود بر پايه‌هاي استواري مانند: سلامت، فضيلت، آداب ارزشمند، هماهنگي و سازگاري توانمندانه با جامعه براي جلوگيري از ذوب و ضايع گرديدن قرار گرفته است.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 28.4pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.25pt 43.0pt right 368.55pt; mso-list: l1 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;5-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;از مقايسه اصول و قواعد &lt;FONT color=#0000ff&gt;نظام خانوادگي&lt;/FONT&gt; در اسلام و واقعيت‌هاي موجود در آن با ديگر سيستم‌هاي موجود در شرق و غرب معلوم مي‌شود كه &lt;FONT color=#0000ff&gt;نظام خانواده&lt;/FONT&gt; در اسلام، نظامي معنوي، ارزشي، اصلح و براي همه بشريت ماندگارتر است؛ زيرا ريشه‌ها، رهنمودها و احكام آن از منبع و مصدري اسلامي سرچشمه مي‌گيرد و ارتباطي با قوانيني كه ريشه در اهواء و كشش‌هاي نارواي نفساني دارند، ندارد.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 28.4pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.25pt 43.0pt right 368.55pt; mso-list: l1 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;6-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;تار و پود جامعه اسلامي برگرفته از قرآن و رهنمودهاي صحيح سنت رسول خدا.و تبلور اخلاق و آداب اسلامي است.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 28.4pt 0pt 0in; TEXT-INDENT: -14.2pt; TEXT-ALIGN: justify; tab-stops: list 32.25pt 43.0pt right 368.55pt; mso-list: l1 level1 lfo2&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; COLOR: red; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-list: Ignore&quot;&gt;7-&lt;SPAN style=&quot;FONT: 7pt &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;خانواده مسلمان با جامعه اسلامي ارتباطي تنگاتنگ و مستحكم دارد و با رويكردها و اهداف آن خود را هماهنگ مي‌سازد و در عين حال با انحراف جامعه از راه و رسم موردپسند خداوند ـ‌ در راستاي محافظت از خيرات،‌ منافع و سعادت خانواده و حمايت از آن، از ذوب شدن، فروپاشي، درهم ريختگي و خروج از اطاعت خداوند ـ هم ميسر نمي‌گردد.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;در كنار مطالبي كه گفته شد يادآوري اين موضوع را لازم مي‌دان&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ي&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;م كه همه احاديثي را كه &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;مؤلف&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;محترم در اين كتاب ذكر كرده، مورد تحقيق و بررسي قرار داده شده و آنها را از منابع معتمد آورده است.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;دوستان عزيز مي توانند اين كتاب را از&lt;/FONT&gt; &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=15&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;بخش فقه و احكام&lt;/FONT&gt; &lt;/A&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;كتابخانه سايت عقيده به دست آورند&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب كليات اسلام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/78</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;كتاب كلیات اسلام&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كلیات اسلام كتاب جدیدی است كه به شما برادران و خواهران اهل دین و دانش تقدیم می داریم، این كتاب ترجمه كتاب &amp;quot;منهاج المسلم&amp;quot; استاد بزرگوار ابوبكر الجزایری است كه یكی از مدرسین گرانقدر مسجد نبوی در مدینه منوره می باشد، این كتاب دارای ویژگیهایی است كه در كتابهایی دینی که نگارش یافته اند،كمتر وجود دارند.&lt;br /&gt;
&amp;bull;&amp;nbsp;باسبكی ساده وروان و قابل درك برای همه نوشته شده است.&lt;br /&gt;
&amp;bull;&amp;nbsp;تقریبا همه مسایل مربوط به عقیده، عبادت، اخلاق، آداب و احكام اسلامی در آن آمده است.&lt;br /&gt;
&amp;bull;&amp;nbsp;مؤلف محترم همه مطالب كتاب را با استناد به آیات قرآن وسنت صحیح رسول الله-صلی الله علیه و سلم- بیان نموده است.&lt;br /&gt;
&amp;bull;&amp;nbsp;نویسنده محترم در این كتاب از &amp;quot; ایجاز مخل&amp;quot; و &amp;quot; إطناب ممل &amp;quot; پرهیز نموده و اعتدال را در همه فصلهای آن مراعات كرده است.&lt;br /&gt;
این كتاب در بر گیرنده پنج بخش است و هر بخش شامل فصل های متعددی است وهر یك از فصلها&amp;nbsp;&amp;nbsp;دو بخش عبادات و معاملات كم و بیش بندهایی را در برمی گیرند. بخش اول كتاب در&amp;nbsp;&amp;nbsp;ارتباط با عقاید، بخش دوم: آداب، بخش سوم: اخلاق، بخش چهارم: عبادات و بخش پنجم در مورد معاملات و روابط اجتماعی است. و به همین خاطر همه اصول و فروع شریعت اسلامی را شامل می شود.&lt;br /&gt;
امیدواریم که این کتاب مفید و مثمر واقع گردد و برادران وخواهران محترم از آن استفاده نمایند.&lt;br /&gt;
این کتاب را در بخش فقه و احکام کتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب توضيحاتی در مورد زكات</title>
<link>http://qalamlib.com/news/74</link>
<description>&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: center; mso-pagination: none; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot; align=center&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;STRONG&gt;کتاب توضيحاتی در مورد زكات&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-pagination: none; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;برادران و خواهران مسلمان!&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;ماه رمضان ماه خير و بركت و ايثار و فداكاري و بخشش و كمك به مستمندان است و خيلى از مسلمانان كوشش مي كنند با استخراج &lt;FONT color=#0000ff&gt;زكات&lt;/FONT&gt; اموالشان در اين ماه مبارك از ثواب زمان مقدس نيز مستفيد شوند و همه مي دانيم كه زكات يكى از اركان اسلام است، كه شخص توانگر بدون پرداخت زكات اسلامش كامل نمى&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;شود، رسول الله صلى&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; الله عليه وآله وسلم&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt; مى&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;فرمايد: &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-pagination: none; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;«&lt;FONT color=#0000ff&gt;بُنِيَ الإِسلامُ عَلى خَمْسٍ: شَهادَةِ أَنْ لا إِلهَ إلاَّ الله، وَأَنَّ محمداً رسولُ الله، وَإقامِ الصلاةِ، وإِيتاءِ الزَّكاةِ، وَحَجِّ الْبيْتِ، وصَوْمِ رَمَضان&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;َ&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;» &lt;/FONT&gt;بخاري. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-pagination: none; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;«اسلام بر&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; پنج اصل بنا نهاده شده است: شهادت دادن به اينكه نيست معبودى كه شايسته پرستش باشد بحق مگر الله، و اينكه محمد &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;ص&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;لى الله عليه وآله وسلم&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; فرستاده الله است، و نمازگزاردن، و دادن &lt;FONT color=#0000ff&gt;زكات&lt;/FONT&gt;، و رفتن بسوى کعبه شریفه براى اداى حج و عمره، و روزه رمضان گرفتن». &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-pagination: none; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;و چنانچه كسى وجوب زكات را انكار نمايد كافر و مرتد شناخته مى&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شود. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;و همچن&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;ين ا&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;گ&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;ر&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; فرد&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;ى&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt; در پرداخت آن بخل ورزد و &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;يا &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;كامل پرداخت ننمايد مستحق عذاب خداوند خواهد شد، الله جل جلاله مى&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;فرمايد:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: Calibri; mso-fareast-theme-font: minor-latin&quot;&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَبْخَلُونَ بِمَا آَتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ هُوَ خَيْرًا لَهُمْ بَلْ هُوَ شَرٌّ لَهُمْ سَيُطَوَّقُونَ مَا بَخِلُوا بِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلِلَّهِ مِيرَاثُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt; [آل عمران:180&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;]&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;«آنان كه نسبت به آنچه الله از فضل خويش به آنان عطا فرموده&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;بخل مى&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;ورزند، گمان نكنند كه اين كار به سود آنها است، بلكه براى آنها شر است؛ بزودى در روز قيامت&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;آنچه را در باره آن بخل ورزيد&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;ه‌&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;اند طوق گردنشان مى&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;شود و ميراث&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;آسمانها و زمين از آنِ الله است، و الله، از آنچه انجام مى&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;‌&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;دهيد، آگاه است»&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify; mso-line-height-alt: 1.0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=AR-AE style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: AR-AE&quot;&gt;به اين سبب ادار&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=newsbodytext1&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;COLOR: windowtext; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;ۀ کتابخانۀ عقیده تصمیم گرفت تا کتاب توضيحاتي در مورد &lt;FONT color=#0000ff&gt;زكات&lt;/FONT&gt; را در این ماه پر فیض و برکت به نشر رساند که امیدواریم مورد استفاده شما عزیزان قرار گیرد، این کتاب را در بخش &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=15&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;فقه و احکام&lt;/FONT&gt; &lt;/A&gt;مطالعه نمایید.&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب حكمت و فقه روزه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/72</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب حكمت و فقه روزه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
برادران وخواهران مؤمن! به مناسبت فرارسیدن ماه مبارك رمضان دومین كتاب متعلق به روزه و احكام و فقه آن را خدمت شما عزیزان تقدیم می كنیم,&lt;br /&gt;
ماه مبارک رمضان، ماه نزول قرآن کریم، و بعثت پیامبر اسلام صلی الله علیه وآله وسلم است.&lt;br /&gt;
ماه مغفرت و آمرزش، ماه جود و کرم و بخشش، ماه عبادت و آبادی مساجد و منابر، ماه صبر و استقامت، ماه ایثار و از خود گذشتگی، ماه جهاد و تلاش، ماه رحمت و آزادی مسلمانان از آتش جهنم، و ماه سازندگی و تهذیب نفس که مسلمان می&amp;zwnj;تواند در پرتو قرآن، کلام الله مجید، و در سایة عبادات صیام و قیام به معنویات و الطاف ربانی دست یابد و خود را مهذب و مصفی سازد و چنانکه سزاوار بندگان شایسته و نیکوکار خداست، تقصیر و نقص گذشتة خود را جبران نماید. چنین ماهی فرصتی است بسیار ارزشمند که نباید لحظه&amp;zwnj;ای از آن را در غفلت گذراند. از این روی رسول&amp;zwnj;الله صلی الله علیه وآله وسلم می&amp;zwnj;فرمایند: &amp;laquo;آن کس که رمضان سبب آمرزش گناهانش نگردد، و از دنیا بدون استفاده از ماه مبارک رمضان برود، خداوند او را از رحمتش دور می&amp;zwnj;گرداند&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
چه قدر غافلند کسانی که از این ماه پر خیر و برکت و از فرصت مناسب آن استفاده نمی&amp;zwnj;نمایند.&lt;br /&gt;
این كتاب مسایل مختلفی دربارۀ روزه را مورد بحث و بررسی قرار می دهد و با توجه به آرا و نظریات مختلف علمای اسلام در مسایل فقهی عموماً و در مورد زکات فطر خصوصاً که محل احترام و ارزش هستند، از جهاتی قابل نقد، بررسی، تجزیه، تحلیل و ترجیح نیز می&amp;zwnj;باشند، چون همة مردم قدرت استنباط احکام را ندارند و همچنین توانایی نقد و بررسی آرا و نظریات را ندارند، با مشاهده شدن بلاتکلیفی بسیاری از مردم در چگونگی پرداخت فطریة خود و تماس مکرر و اصرار عده&amp;zwnj;ای بر اظهار نظر در این فریضة الهی، شرعاً نوشتن این مطالب را هر چند کم است ولى مورد لوزم مى&amp;zwnj;باشد.&lt;br /&gt;
الله عزوجل توفیق عبادت و استقامت بر شریعت نصیب همة ما فرماید، و در راه خدمت به اسلام و مسلمین همگی را موفق و مؤید بفرماید.&lt;br /&gt;
به مناسبت ماه مبارک رمضان، مصلحت ایجاب می&amp;zwnj;کرد که این کتاب را در بخش فقه و احکام خدمت شما عزیزان عرضه نماییم که امیدواریم مورد استفادۀ عزیزان قرار گیرد.&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب گرانبهاى حياه الصحابه</title>
<link>http://qalamlib.com/news/71</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;حیاه الصحابه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
كتاب گرانبهاى &amp;laquo;حیاه الصحابه&amp;raquo; ، آیینه و تصویر گویایى از زندگى داعیانه و مجاهدانه پیامبر خدا صلى الله علیه وآله وسلم و یاران پاك طینتش مى&amp;rlm;باشد، و در ردیف مفصّل&amp;rlm;ترین و معتمدترین كتاب&amp;rlm;هاى سیرت قرار دارد، و به گفته دانشمندى، انعكاس دهنده زندگى &amp;laquo;نخستین مردانى است كه در دشوارترین شرایط به محمّد صلى الله علیه وآله وسلم گرویدند، و در راه او از شكنجه، تبعید، از دست دادن جان، مال و خانواده و سعادت و آرامش زندگى دریغ نكردند. و زندگى&amp;rlm;نامه، كسانى است كه اگر ظهور اسلام در تاریخ به بیدارى و كمال معنوى و تمدّن و فرهنگ بشرى خدمتى بزرگ بوده است، اینان نه تنها به گردن مسلمانان بلكه به گردن بشریّت و تمدّن و اخلاق بشرى حقى بزرگ دارند، و شناخت اینان نه تنها ما را در شناخت اسلام در سرچشمه زلال نخستینش كمك مى&amp;rlm;كند، بلكه سیماى راستین محمّد صلى الله علیه وآله وسلم را در چشم&amp;rlm;هاى اینان روشن&amp;rlm;تر مى&amp;rlm;توان دید&amp;raquo;.&lt;br /&gt;
با در نظر داشت و توجّه به این نكته، كه كتاب مذكور توسط مؤلّف گرانقدر از مراجع معتمد و مختلف جمع آورى شده، و مجموعه&amp;rlm;اى از نصوص را تشكیل مى&amp;rlm;دهد، مشكلاتى را در ترجمه فارسى با خود همراه داشت. مترجم كه تلاش نهایى خود را در امر برگردانیدن این كتاب به فارسى به خرج داده است، با این همه براین باور است كه شاید اشكالاتى در كارش مشهود باشد، لذا امیدوار است با دریافت انتقادها و پیشنهادهاى سالم و سازنده علماى كرام، دانشمندان و دانشجویان عزیز، در رفع این نقیصه خود تلاش نماید، و متمنّى است تا او را با ارسال نظریه&amp;rlm;هاى خود، در چاپ آینده كتاب مساعدت و یارى رسانید.&lt;br /&gt;
و اینك كتابخانه عقیده افتخار دارد كه این كتاب بزرگ را خدمت برادران وخواهران مسلمان تقدیم نماید باشد که عزیزان ما با سیرت صحابه گرانقدر رضی الله عنهم اجمعین بیشتر آشنا شوند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;کتاب حیات صحابه را در 6 جلد می توانید از بخش اصحاب رسول الله دریافت نمایید&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب تاريخ طبرى يا تاريخ الرسل و الملوک</title>
<link>http://qalamlib.com/news/70</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;تاریخ طبرى یا تاریخ الرسل و الملوک&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;صحابه رضی الله عنهم و تابعین از صدر اسلام , اخبار مربوط به سنت و سیره و اقوال و افعال و معجزات رسول اكرم صلى الله علیه وآله وسلم و شرح احوال نیاكان و قبیله او و اخبار كعبه و مكه و احوال اولاد و اهل بیت و اصحاب و كاتبان وحى و مشاوران و سرداران و خادمان آن حضرت را براى هم روایت میكردند و این كار را از مقوله عبادت و حفظ شعائر دین میشمردند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;اخبار انبیاء و امم پیشین نیز كه مفسر قصص قرآن و اطلاع بر آنها براى هر مسلمان لازم بود ضبط و روایت میشد.&lt;br /&gt;
در اواخر قرن اول هجرى و اوائل قرن دوم بعض تابعین و تبع تابعین به جمع آورى احادیث سیره و مغازى رسول الله صلى الله علیه وآله وسلم همت گماشتند, مانند عروة بن زبیر رضی الله عنه (م ح 92 ق ) خواهر زاده عایشه صدیقه رضی الله عنها و ابان بن عثمان بن عفان (م 105 ق ) و وهب بن منبه یمنى (م 110 ق ) ـ كه جزئى از مغازى او در هایدلبرگ آلمان محفوظ است ـ و عاصم بن عمر بن قتادة (م 120 ق ) و محمد بن مسلم بن شهاب زهرى (م 124 ق ) و موسى بن عقبه (م 124 ق ) و عبداله بن ابیبكر بن حزم (م 135 ق ) ...&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ویكی از دانشمند مسلمان كه تاریخ اسلام را به تفصیل جمع آورى كرد و كتاب معتبر را به نام &amp;nbsp;تاریخ الرسل والملوك جمع آوری نمود محمد بن جریر طبری رحمه الله می باشد وی گرچه همه روایات تاریخی را جمع آوری نموده اما درباره صحت و یا بطلان این روایات تحقیق&amp;nbsp;&amp;nbsp;نکرده و این وظیفه را به دوش علمایی که بعد از وی آمدند گذاشته است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;طبری در&amp;nbsp;&amp;nbsp;صفحه 6 جلد اول کتاب تاریخ خود می نویسد:&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(بینندۀ کتاب ما بداند که بنای من در آنچه آورده ام و گفته ام بر راویان بوده است و نه حجت عقول و استنباط نفوس، به جز اندکی، که علم اخبار گذشتگان به خبر و نقل به متأخران تواند رسید،نه استدلال و نظر، وخبرهای گذشتگان که در کتاب ما هست و خواننده عجب داند یا شنونده نپذیرد و صحیح نداند، از من نیست، بلکه از ناقلان گرفته ام و همچنان یاد کرده ام) -- تاریخ طبری جلد1 صفحه 6&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امیدواریم کتاب تاریخ طبری مورد استفاده شما عزیزان واقع گردد. این کتاب را در بخش تاریخ اسلام کتابخانه عقیده مطالعه فرمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب روزه سپر پارسايان</title>
<link>http://qalamlib.com/news/69</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب روزه سپر پارسایان&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برادران و خواهران گرامی! همانطور که قول داده بودیم که کتابهایی را در&amp;nbsp;&amp;nbsp;ماه مبارک رمضان در مورد احکام روزه خدمت شما عزیزان تقدیم می کنیم، اینکه اولین کتاب را به عنوان روزه سپر پارسایان&amp;nbsp;&amp;nbsp;در کتابخانه عقیده نشر نمودیم و امیدواریم مورد استفاده شما سروران گرامی قرار گیرد.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در این شکی نیست که ماه مبارك رمضان بهترین و بزرگ&amp;rlm;ترین موسم كسب خیرات و بركات است، ماهى كه آخرین برنامه عالم&amp;rlm;تاب و هدایت بشرى در آن فروفرستاده شده است. در این ماه بنده مسلمان مهمان خداوند متعال است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;رمضان موسم پرهیزگاران و بازار تجارى صالحان است. براى هر كالایى بازارى هست كه طرفداران و علاقمندان خاصش انتظار آن را مى&amp;rlm;كشند تا سود فراوانى بدست بیاورند، مسلمانان نیز منتظر فرا رسیدن رمضان هستند تا براى بدست آوردن سود ارزشمند و توشه سفر آخرت، یعنى تقوا، تلاش كنند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ماه رمضان فرصت خوبى است كه شخص مسلمان بتواند نیكیهاى فراوانى كسب و براى زندگى ابدى ذخیره كند. درهاى بهشت در رمضان به روى مؤمنان روزه&amp;rlm;دار باز و درهاى جهنم بسته و شیاطین به غل و زنجیر بسته مى&amp;rlm;شوند تا به مؤمنان روزه&amp;rlm;دار و مهمانان خدا آسیبى نرسانند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روزه روش عملى درست ربانى است، روشى كه تأثیر بسیار عمیقى در بازسازى دل و درون دارد و فرد مؤمن را عبد پروردگارش مى&amp;rlm;گرداند. روزه به روزه&amp;rlm;دار اخلاص و پاكدامنى مى&amp;rlm;آموزد، زیرا این عبادت سرّى است بین خدا و بنده.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روزه جهاد با نفس است و موجب تقویت اراده&amp;rlm;ى شخص مى&amp;rlm;گردد. روزه&amp;rlm;دار نفس خود را از سركشى بازمى&amp;rlm;دارد و از تمام آرزوها و امیالش مى&amp;rlm;گذرد و بدین&amp;rlm;وسیله خویشتن&amp;rlm;دارى&amp;rlm;اش را تقویت مى&amp;rlm;كند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;روزه همچون سپرى است كه روزه&amp;rlm;دار را در دنیا از انجام گناه بازمى&amp;rlm;دارد و در روز رستاخیز او را از آتش جهنم حفظ مى&amp;rlm;كند.&amp;nbsp;&amp;nbsp;اینك براى اینكه بدانید چگونه سپری می باشد کتاب&amp;nbsp;روزه سپر پارسایان ترجمه كتاب: (الصوم جنة) نوشتۀ: دكتر خالد بن عبدالرحمن الجریسى و ترجمه استاد إسحاق دبیرى را در بخش فقه و احکام مطالعه فرمایید.&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>نسخۀ الکترونیکی تفسیر انوارالقرآن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/68</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;تفسیر انوارالقرآن&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;قرآن كریم سرچشمۀ اصلى دین الله جل جلاله و قانون اساسی وبرنامۀ جاودان امت محمد صلى الله علیه وآله وسلم است. از این رو اهمیت قرآن كریم ونقش منحصر به فرد آن در بناى هویت و حیات دو جهانى انسان مسلمان و اعمار كاخ سعادت جاودانى او بركسی بوشیده نیست.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;طبیعى است كه میدان بزرگ و وسیع سعادت دوجهانی را فقط در صورتى مى توان پیمود كه از چشمه سار &amp;nbsp;زلال معارف ومفاهیم قرآن كریم بهره گرفت و در پرتو فهم آیات بینات، شناخت اسرار ، عمل به احكام ، بایندى به فرامین و نهایتاً قرار &amp;nbsp;گرفتن در محیط انوار تابناك آن، پلكان عروج به سوى كمالات انسانی&amp;nbsp;&amp;nbsp;را درنوردید&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شكى نیست كه تنها در یجۀ ورود به این میدان و كاراترین ابزار كسب این شناخت&amp;nbsp;&amp;nbsp;تفسیر قرآن کریم است. نیاز هر فرد مسلمان به فهم و فراگیری تفسیر، از آنجا ناشی می شود که هر كمال دینى و دنیوى اى&amp;nbsp;&amp;nbsp;ناگزیر باید باشرع الهى موافق باشد و این موافقت یقینا برعلم به كتاب الهى متوقف است .&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;تفسیر در حقیقت عبارت ا ست از بیان معانى، احكام، فواید و دیگر راز و رمزهاى كتاب الله جل جلاله. &amp;nbsp;بنابر این علم تفسیر از بزرگترین علوم شریعت اسلامى &amp;nbsp;و برترین آنها از روى قدر و منزلت و شریف ترین آنها از نظر موضوع است، زیرا موضوع آن كلام الله ذو الجلال مى باشد كه معدن هر حكمت و منشأ هر فضیلتی است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و از آنجا كه بروردگار عزوجل خود حفظ و تبیین كتاب عزیزش را ضمانت نموده است در طول تاریخ علما ودانشمندانى را از این توفیق مفتخر گردانیده تا با بهره گیرى از اقیانوس بیكران آیات محكمات قرآن كه تفسیر كنندۀ یكدیگرند و نیز اقتباس از انوار زلال سنت بیامبر صلى الله علیه وآله وسلم می باشد، تفاسیرى از قرآن كریم را در هر عصر و زمانى به سلك تحریر كشیده وتقدیم امت اسلامى نمایند و در راه توضیح معانی و بیان اسرار و كشف دقایق و استخراج فواید آن از هیچ تلاشی فروگذار نكنند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;یکی از این دانشمندان گرامی جناب استاد عبدالرؤف مخلص می باشد که باتهیه تفسیر مبارک انوارالقرآن خدمت شایانی را به مسلمانان فارسی زبان نموده است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;سایت عقیده در راستای خدمت به علوم اسلامی خاصتاً قرآن کریم&amp;nbsp;&amp;nbsp;نسخۀ الکترونیکی این تفسیر مبارک را خدمت برادران و خواهران مسلمان فارسی زبان تقدیم می کند که امیدواریم&amp;nbsp;&amp;nbsp;تهیه کننده و کسانی را که راستای نشر این تفسیر بزرگ زحمت کشیده اند از دعا فراموش نکنید و لازم به یادآوری می باشد که حقوق نشر این تفسیر برای انتشارات شیخ الاسلام احمد جام محفوظ است.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ولازم به تذکر است که برای صحت آیات مبارک قرآن کریم و تبین احکام&amp;nbsp;&amp;nbsp;قرائت از مصحف مدینه منوره استفاده شده که کاربران محترم &amp;nbsp;برای خواندن آیات قرآن کریم باید در قدم اول خط های قرآنی را بر روی کامپیوتر خویش نصب نمایند.&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;التماس دعا&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ادارۀ سایت عقیده&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب تشيع و معتقدات آن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/63</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; direction: rtl; text-indent: 22.7pt; line-height: normal; unicode-bidi: embed; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;تشیع و معتقدات آن&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; direction: rtl; text-indent: 22.7pt; line-height: normal; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
برادر عزیز و خواهر گرامی!&lt;br /&gt;
در ابتدا&amp;nbsp;&amp;nbsp;می خواهیم از شما بپرسیم آیا شما مذهب تشیع را می شناسید؟ مطمئناً پاسخ شما مثبت خواهد بود. شما در پاسخ این سؤال خواهید گفت: مذهب تشیع مذهبی است كه پیروان آن، علی بن ابی طالب و فرزندان ایشان را امامان خود می دانند، نمازهای خود را در سه نوبت می خوانند و روزهای تاسوعا و عاشورا به سینه زنی و نوحه خوانی می پردازند، و صیغه را نیز روا می دانند.&lt;br /&gt;
بدون هیچ شك و تردیدی بیش از 90 % از كسانیكه جواب آنها مثبت بوده است، بیش از آنچه ما ذكر كردیم، &amp;zwnj;چیز دیگری در مورد مذهب تشیع نمی دانند. در حالیكه آنچه آنها می بایست در مورد معتقدات مذهب تشیع بدانند خیلی بیشتر و در بسیاری موارد مهمتر از مسائل مزبور هستند.&lt;br /&gt;
آری، &amp;zwnj;بسیاری از سنی مذهبان و حتی بسیاری از شیعیان نیز در مورد اعتقادات مذهب تشیع چیزی نمی دانند.&lt;br /&gt;
این حقیقت ما را بر آن داشت تا این كتاب را در مورد معتقدات مذهب شیعه اثنی عشری تألیف كرده و در آن به نقد و مناقشه معتقدات این مذهب بپردازیم.&lt;br /&gt;
از آنجائیكه ما می دانستیم آنچه در مورد معتقدات تشیع در بخشهای مختلف این كتاب بیان می شود برای بسیاری از برادران و خواهران تازگی داشته و پذیرفتن وجود چنین معتقداتی در مذهب تشیع برای آنها سخت و دشوار خواهد بود، تمام سخنان و ادعاهای خویش را مستدل به روایاتی قرار داده ایم كه در مراجع و مصادری روایت شده اند كه بزرگان و سردمداران مذهب تشیع آنها را مهمترین و موثق ترین مراجع مذهب خود می دانند و تا به امروز آنها را در حوزه های علمیه خویش تدریس می كنند. ما به این عمل از یكسو صحیح بودن سخنان و ادعاهای خود را به برادران و خواهران خویش ثابت كرده ایم و از سوی دیگر راه انكار را بر بزرگان و سردمداران تشیع بسته ایم. زیرا بسیاری از بزرگان مذهب تشیع بر ملا شدن معتقدات خویش را سدی در برابر تبلیغات پر زرق و برق خود می بینند و سعی بر آن دارند تا فرا رسیدن زمان مناسب این معتقدات را از دیگران مخفی نگاه دارند.&lt;br /&gt;
مطمئناً اكنون این سؤال در اذهان برادران و خواهران مطرح خواهد شد كه مگر در مذهب تشیع چه اعتقاداتی وجود دارند كه پذیرفتن وجود چنین معتقداتی در این مذهب، برای ما سخت و دشوار خواهد بود؟&lt;br /&gt;
جواب این سؤال بسیار مهم را در بخشهای مختلف این كتاب مطالعه نمایید.&lt;br /&gt;
این كتاب در بخش ادیان ومذاهب كتابخانه عقیده نشر شده است.&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب سنت و جايگاه آن در شريعت اسلامي</title>
<link>http://qalamlib.com/news/61</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;كتاب سنت&amp;nbsp;&amp;nbsp;و جایگاه آن در شریعت اسـلامی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;كتاب سنت&amp;nbsp;&amp;nbsp;و جایگاه آن در شریعت اسـلامی نوشته&amp;nbsp;&amp;nbsp;دكتر مصطفى سباعی ترجمه&amp;nbsp;&amp;nbsp;استاد اسحاق دبیری&amp;nbsp;&amp;nbsp;ان شاء الله به زودی در بخش سنت نبوى كتابخانه عقیده نشر خواهد .&lt;br /&gt;
این كتاب به دلیل اینكه جایگاه سنت نبوی را در اسلام مورد بحث قرار می دهد دارای اهمیت بزرگی است همه می دانیم که از آنجائی كه الله متعال بیان و تفسیر كتابش را بعهده پیامبرش واگذار نموده، برای او نیز گواهی داده است كه آنچه كه می گوید وحی ازطرف الله متعال است: ﴿وَمَا یَنْطِقُ عَنِ الْهَوَى * إِنْ هُوَ إِلاَّ وَحْیٌ یُوحَى﴾. (النجم: 4).&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;هنگامی كه پیامبر علیه السلام دارای چنین شأن ومنزلتی از طرف الله متعال است، الله متعال تعالی پیروی وفرمانبرداری ایشان را واجب، وعصیان ونافرمانی آن حضرت را حرام گردانده است، و می فرماید: ﴿أَطِیعُوا اللَّهَ وَأَطِیعُوا الرَّسُولَ﴾. (النساء: 59).. ((خدا را اطاعت كنید ورسول الله را اطاعت نمائید)).&lt;br /&gt;
وهمچنین خدای متعال از آن كسانی كه پیامبر را میانجی وحاكم در میان خود قرار نمی دهند، ودر مقابل فرمان ایشان سر تسلیم فرو نمی آورند ایمان را نفی می كند ومی فرماید:&lt;br /&gt;
﴿فَلا وَرَبِّكَ لا یُؤْمِنُونَ حَتَّى یُحَكِّمُوكَ فِیمَا شَجَرَ بَیْنَهُمْ ثُمَّ لا یَجِدُوا فِی أَنْفُسِهِمْ حَرَجاً مِمَّا قَضَیْتَ وَیُسَلِّمُوا تَسْلِیماً﴾. (النساء: 65). ((نه! سوگند به پروردگارت كه آنان مومن بشمار نمی آیند تا زمانیكه در اختلافاتشان تو را حكم و داور قرار ندهند، وسپس ملالی در دل خود از داوری تو نداشته وكاملا تسلیم تو باشند)).&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
امیدواریم که این کتاب مورد استفاده برادران وخواهران مسلمان واقع گردد&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مشكل داونلود كتابهاى سايت عقيده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/60</link>
<description>&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: normal; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: normal; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: normal; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: normal; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: normal; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;عده اى از دوستان عزيز با فرستادن ايميل از داونلود نشدن كتابهاى كتابخانه شكايت نموده اند كه براى رفع اين مشكل به شكل تصويرى خواستيم اين مشكل دوستان عزيز را برطرف نماييم اميدواريم كه موفق و &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;پیروز باشید.&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;تصاوير راهنمايى دريافت كتابها را&amp;nbsp;دريافت نماييد&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/help-1.jpg&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;تصوير شماره 1&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/help-2.jpg&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;تصوير شماره 2&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/images/help-3.jpg&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;تصوير شماره 3&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;ادارۀ سایت عقیده&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-no-proof: yes&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-no-proof: yes&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 16pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>دریافت فونتهای فارسی و قرآنی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/59</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;برادران وخواهران گرامی!&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;السلام علیکم ورحمه الله وبرکاته&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;برای مطالعه کتابهای کتابخانه عقیده باید فونتهای فارسی و فونتهای قرآنی را بر روی رایانه یا همان کامبیوترتان نصب نمایید تا در &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;مطالعه کتابها دچار مشکل نشوید زیرا بیشتر&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;کتابها به خطهای مخصوص فارسی نوشته شده است و علاوه بر این بیشتر آیات قرآن کریم از مصحف مدینه منوره گرفته شده که برای خواندن آن باید حتما فونتهای قرآن کریم را هم نصب نمایید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://old.aqeedeh.com/userfiles/files/fonts/aqeedeh-persian-fonts.zip&quot;&gt;فونتهای فارسی&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;a href=&quot;http://old.aqeedeh.com/userfiles/files/fonts/quran-osman-taha-fonts.zip&quot;&gt;فونتهای قرآنی&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;امیدواریم که از کتابخانه سایت عقیده استفاده کامل را بنمایید و&amp;nbsp;رضایت خاطر شما عزیزان را حاصل نموده باشیم .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;التماس دعا&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;اداره سایت عقیده&lt;/span&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>دریافت فونتهای فارسی و قرآنی</title>
<link>http://qalamlib.com/news/58</link>
<description>&lt;p&gt;برادران وخواهران گرامی!&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;السلام علیکم ورحمه الله وبرکاته&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;برای مطالعه کتابهای کتابخانه عقیده باید فونتهای فارسی و فونتهای قرآنی را بر روی رایانه یا همان کامبیوترتان نصب نمایید تا در &amp;nbsp;مطالعه کتابها دچار مشکل نشوید زیرا بیشتر&amp;nbsp; کتابها به خطهای مخصوص فارسی نوشته شده است و علاوه بر این بیشتر آیات قرآن کریم از مصحف مدینه منوره گرفته شده که برای خواندن آن باید حتما فونتهای قرآن کریم را هم نصب نمایید.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;unicode-bidi: embed; direction: rtl; text-align: center;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://old.aqeedeh.com/userfiles/files/fonts/aqeedeh-persian-fonts.zip&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman&quot;&gt;فونتهای فارسی&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;http://old.aqeedeh.com/userfiles/files/fonts/quran-osman-taha-fonts.zip&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Times New Roman&quot;&gt;فونتهای قرآنی&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امیدواریم که از کتابخانه سایت عقیده استفاده کامل را بنمایید و&amp;nbsp;رضایت خاطر شما عزیزان را حاصل نموده باشیم .&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;التماس دعا&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;اداره سایت عقیده&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب فاطمه‌‌ زهراء رضي الله عنها از خود دفاع‌ مي‌كند</title>
<link>http://qalamlib.com/news/56</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; direction: rtl; text-indent: 14.2pt; line-height: normal; unicode-bidi: embed; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;كتاب فاطمه&amp;zwnj;&amp;zwnj; زهراء رضی الله عنها از خود دفاع&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كند&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0in 0in 0pt; DIRECTION: rtl; TEXT-INDENT: 14.2pt; LINE-HEIGHT: normal; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;br /&gt;
به&amp;zwnj; راستی&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;دانم&amp;zwnj; با كدام&amp;zwnj; قلم&amp;zwnj; و دوات&amp;zwnj; بنویسم&amp;zwnj;! نمی&amp;zwnj;دانم&amp;zwnj; چگونه&amp;zwnj; شروع&amp;zwnj; كنم&amp;zwnj;؟! از كدام&amp;zwnj; زاویه&amp;zwnj; به&amp;zwnj; تماشایش&amp;zwnj; بنشینم&amp;zwnj;؟! با كدام&amp;zwnj; زبان&amp;zwnj; وصفش&amp;zwnj; نمایم&amp;zwnj;؟! او كسی&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; نسل&amp;zwnj; پیامبر r را برایمان&amp;zwnj; حفظ&amp;zwnj; كرد! او سرور زنان&amp;zwnj; بهشتی&amp;zwnj; است&amp;zwnj;! او پاره&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; تن&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; خدا است&amp;zwnj;! او چهارمین&amp;zwnj; لؤلؤیی&amp;zwnj; است&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; خدیجه&amp;zwnj; - رضی&amp;zwnj;الله عنها- تقدیم&amp;zwnj; پیامبر &amp;nbsp;صلى الله علیه وآله وسلم نمود، او به&amp;zwnj; منزله&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; &amp;laquo;ختام&amp;zwnj; مسك&amp;zwnj;&amp;raquo; است&amp;zwnj; برای&amp;zwnj; &amp;laquo;سید أنام&amp;zwnj;&amp;raquo;، او به&amp;zwnj; منزله&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; مادری&amp;zwnj; مهربان&amp;zwnj; است&amp;zwnj; برای&amp;zwnj; پدر رنج&amp;zwnj; دیده&amp;zwnj;اش&amp;zwnj;! او تربیت&amp;zwnj; كننده&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; سرور جوانان&amp;zwnj; بهشت&amp;zwnj; است&amp;zwnj;! او مادر &amp;laquo;حسن&amp;zwnj;&amp;raquo; و &amp;laquo;حسین&amp;zwnj;&amp;raquo; است&amp;zwnj;، ریحانه&amp;zwnj;های&amp;zwnj; پیامبر و مایه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; خنكی&amp;zwnj; چشم&amp;zwnj; و دل&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; سرور ـ صلى الله علیه وآله وسلم ـ.&lt;br /&gt;
آری&amp;zwnj;! او &amp;laquo;فاطمه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; زهراء&amp;raquo; دختر&amp;zwnj; گران&amp;zwnj;قدر رسول&amp;zwnj;الله صلى الله علیه وآله وسلم و خدیجه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; كبریل&amp;zwnj; است&amp;zwnj;.&lt;br /&gt;
ای&amp;zwnj; سرور زنان&amp;zwnj; بهشت&amp;zwnj;! ای&amp;zwnj; پشتیبان&amp;zwnj; رسول&amp;zwnj; اعظم&amp;zwnj; ـ صلى الله علیه وآله وسلم ـ !&lt;br /&gt;
ای&amp;zwnj; مادر مهربان&amp;zwnj; حسن&amp;zwnj; و حسین&amp;zwnj;! ای&amp;zwnj; همسر فداكار و دلسوز حیدر كرّار!&lt;br /&gt;
ای&amp;zwnj; زاهد دنیا و راغب&amp;zwnj; عُقبی&amp;zwnj;! ای&amp;zwnj; فاطمه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; بتول&amp;zwnj;!&lt;br /&gt;
با كدام&amp;zwnj; قلم&amp;zwnj; داستان&amp;zwnj; زندگی&amp;zwnj;ات&amp;zwnj; را بنویسم&amp;zwnj;؟!&lt;br /&gt;
با مداد نقره&amp;zwnj;ای&amp;zwnj; و یاقوتی&amp;zwnj;! تو بسیار گران&amp;zwnj;قدرتری&amp;zwnj; از آنی&amp;zwnj;!&lt;br /&gt;
كدام&amp;zwnj; كاغذ لیاقت&amp;zwnj; ثبت&amp;zwnj; كردن&amp;zwnj; سیرتت&amp;zwnj; را دارد؟!&lt;br /&gt;
كاغذ طلایی&amp;zwnj;! تو خود از آن&amp;zwnj; درخشنده&amp;zwnj;تر و پر بهاتری&amp;zwnj;!&lt;br /&gt;
و یا با عرق&amp;zwnj; گل&amp;zwnj;های&amp;zwnj; خوشبو و ناب&amp;zwnj;! تو خود از همه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; گل&amp;zwnj;ها خوشبوتر و خوش&amp;zwnj; رنگ&amp;zwnj;تری&amp;zwnj;!&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;laquo;مسكین&amp;zwnj;&amp;raquo; عذر شرمندگی&amp;zwnj; آورده&amp;zwnj; است&amp;zwnj;! و سر تسلیم&amp;zwnj; را در مقابل&amp;zwnj; عظمت&amp;zwnj; سیره&amp;zwnj;ات&amp;zwnj; فرود می&amp;zwnj;آورد! هر چند قطعاً مطمئنم&amp;zwnj; نمی&amp;zwnj;توان&amp;zwnj; حتی&amp;zwnj; گوشه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; كوچكی&amp;zwnj; از آن&amp;zwnj; همه&amp;zwnj; عظمت&amp;zwnj; و فضایلت&amp;zwnj; را به&amp;zwnj; تصویر بكشم&amp;zwnj;، از آن&amp;zwnj; روزهایی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; در دامان&amp;zwnj; خدیجه&amp;zwnj; و رسول&amp;zwnj; الله صلى الله علیه وآله وسلم بازی&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كردی&amp;zwnj;! از آن&amp;zwnj; روزهایی&amp;zwnj; كه&amp;zwnj; دست&amp;zwnj; و پای&amp;zwnj; پدر رنج&amp;zwnj; دیده&amp;zwnj;ات&amp;zwnj; را می&amp;zwnj;مالیدی&amp;zwnj; تا خستگی&amp;zwnj; را از تنش&amp;zwnj; به&amp;zwnj; در كنی&amp;zwnj;! از آن&amp;zwnj; گریه&amp;zwnj;ها و دعاهایت&amp;zwnj; برای&amp;zwnj; پشتیبانی&amp;zwnj; بابای&amp;zwnj; مهربانت&amp;zwnj;! از غم&amp;zwnj; و غصّه&amp;zwnj;، شادی&amp;zwnj; و فرح&amp;zwnj; روزهای&amp;zwnj; با محبوب&amp;zwnj; بودن&amp;zwnj; را!&lt;br /&gt;
كتاب فاطمه&amp;zwnj;ی&amp;zwnj; زهراء از خود دفاع&amp;zwnj; می&amp;zwnj;كند كه تحقیق&amp;zwnj; و گردآوری&amp;zwnj; استاد محترم ایوب&amp;zwnj; گنجی&amp;zwnj; در بخش اهل بیت رسول الله در كتابخانه سایت عقیده نشر شد&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>مختصر صحيح بخاري    فارسي</title>
<link>http://qalamlib.com/news/55</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;مختصر صحیح بخاری&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;امام بخاری رحمه الله تعالی آثار زیادی از خود بجای گذاشت و در این زمینه، علم، ضریب هوشی بالا و ذکاوت وی کمک شایانی به او کرد. وی هر چه را که می خواند، فوری از بر می کرد. و همانگونه که شرح آن گذشت، برای کسب علم و دانش به شهرهای زیادی مسافرت کرد. این عوامل، دست به دست هم داد و از وی نویسنده و محققی توانا ساخت.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ایشان خیلی زود به تألیف و تصنیف روی آورد. وی در سن هجده سالگی تألیف کتاب &amp;laquo;قضایا الصحابه والتابعین و أقاویلهم&amp;raquo; را آغاز نمود و سپس کتاب &amp;laquo;التاریخ الکبیر&amp;raquo; را در شبهای مهتابی میان قبر و روضه رسول اکرم به رشته تحریر در آورد. و بعد از آن، کتابهای زیادی نوشت که از آن جمله الجامع الصحیح من المسند من حدیث رسول الله و سننه و ایامه معروف به صحیح بخاری، می باشد كه اكنون مختصر آن خدمت شما عزیزان &amp;nbsp;در بخش سنت نبوی كتابخانه سایت عقیده &amp;nbsp;تقدیم می گردد&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>صفات انسان در قرآن یا انسان‌شناسی در قرآن</title>
<link>http://qalamlib.com/news/54</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;FA&quot; style=&quot;FONT-SIZE: 15pt; FONT-FAMILY: &apos;Tahoma&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;!--?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /--&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;صفات انسان در قرآن یا انسان&amp;zwnj;شناسی در قرآن&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
مؤلف این كتاب درباره این تألیفش می فرماید:&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
با توجه به این که کتاب صفات انسان در قرآن یا انسان&amp;zwnj;شناسی در قرآن &amp;nbsp;برگرفته از صفات متعدد است که قرآن انسان&amp;zwnj;ها را با آن مورد خطاب قرار می&amp;zwnj;دهد و به زبان صراحت بیان می&amp;zwnj;دارد که اینها صفات مثبت هستند پس اگر می&amp;zwnj;خواهی که جزء این گروه برگزیدگان قرار گیری لازم است که این صفات را در خود پرورش داده و از حالت بالقوه به بالفعل درآوری تا در زمره صالحین قرار گیری و یا اینکه اینها صفات منفی هستد خود را از آن برحذر داری و مرتکب این اعمال نگردی که پست و خوار می&amp;zwnj;شوی. پس تصمیم گرفتم آن را صفات انسان در قرآن بنامم و همچنین آقای یحیی پرتوی مسئول انتشارات پرتو بیان انسان&amp;zwnj;شناسی در قرآن را برای آن مناسب دیدند و اینجانب با توجه به صفات ذکر شده در قرآن و پیشنهاد آقای پرتوی آن را صفات انسان در قرآن و یا انسان&amp;zwnj;شناسی در قرآن نام&amp;zwnj;گذاری نمودم باشد که قبول خداوند متعال و شما ملت مسلمان قرار گیرد.&lt;br /&gt;
انسان&amp;zwnj;ها همواره سعی دارند که الگویی برای هدایت و راهیابی داشته باشند و بدین طریق راه&amp;zwnj;های کمال و سعادت را بپیمایند.&lt;br /&gt;
بدین جهت بر آن شدم که بهترین الگو، ارزیاب&amp;zwnj;کننده&amp;zwnj;&amp;zwnj;ی تطبیق&amp;zwnj;دهنده را از قرآن کریم که وحی الهی برای هدایت بشر است برگیرم و صفات مثبت و منفی که انسان&amp;zwnj;ها می&amp;zwnj;توانند آن را کسب و یا طرد کنند تفکیک و استخراج نمایم که چراغی باشد برای راهیابی درست&amp;zwnj;تر. لذا با توکل بر خداوند متعال جهت رضای الهی به شناخت صفات و ویژگی&amp;zwnj;های انسان، برای انسان به این فعالیت پژوهشی پرداختم باشد که مورد لطف و قبول الهی قرار گرفته و پله&amp;zwnj;ای باشد برای انسان&amp;zwnj;ها که خود را با آن محاسبه و ارزیابی کنند و پله&amp;zwnj;های کمال را جهت رسیدن به قرب الهی یکی بعد از دیگری بپیمایند.&lt;br /&gt;
این كتاب اكنون در بخش قرآن كریم كتابخانه سایت عقیده&amp;nbsp;&amp;nbsp;نشر شده است&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب علوم قرآن كريم</title>
<link>http://qalamlib.com/news/53</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;علوم قرآن&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;
علوم جمع علم است و مقصود از آن در اینجا علومی است که از جوانب مختلف از جمله درک معنا و حفظ از تحریف، به قرآن خدمت می&amp;zwnj;کند و می&amp;zwnj;تواند شامل علوم زیر باشد: 1- ناسخ و منسوخ 2- محکم و متشابه 3- اسباب نزول 4- غریب قرآن 5- اعراب قرآن 6- تجوید و قرائت 7- تفسیر.&lt;br /&gt;
مهمترین کتابهایی که تا به حال در رشته&amp;zwnj;ی علوم قرآن نوشته شده عبارتند از : (البرهان فی علوم القرآن) زرکشی، (الاتقان فی علوم القرآن) تألیف : جلال&amp;zwnj;الدین سیوطی و از کتب جدید، (مباحث فی علوم القرآن) تألیف : دکتر مناع خلیل القطان و (مباحث فی علوم القرآن) نوشته&amp;zwnj;ی دکتر صبحی الصالح.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
كتاب علوم قرآن كریم نیز در همین راستا توسط استاد عبدالکریم أحمد محمّدی نوشته شده است كه اكنون در بخش قرآن كریم كتابخانه سایت عقیده نشر می شود&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتابخانه عقیده</title>
<link>http://qalamlib.com/news/51</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: center;&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;font face=&quot;times new roman, times, serif&quot;&gt;بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;times new roman, times, serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;الحَمْدُ لِلهِِ رَبِّ العَالمِينْ، وَالصَّلاَةُ وَالسَّلاَمُ عَلىَ نَبِينّا مُحَمّدٍ &amp;shy;&amp;shy;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;المَبعٌوثُ رَحْمَة لِلعَالمِين، وَعَلى آلِهِ وَأصْحَابهِ وَمَنْ دَعَا بِدَعْوَتِهِ إلىَ يوْمِ الدِّين.&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;أمّا بعد:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;font face=&quot;times new roman, times, serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#0033ff&quot;&gt;فَبَشِّرْ عِبَادِ الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ أُولَئِكَ الَّذِينَ هَدَاهُمُ اللَّهُ وَأُولَئِكَ هُمْ أُولُو الْأَلْبَابِ&lt;/font&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;الزمر١٧ - ١٨ &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; size=&quot;3&quot;&gt;&amp;laquo;پس به [آن&amp;rlm;] بندگانم مژده بده، كسانى كه سخن [ها] را مى&amp;rlm;شنوند، آن گاه از بهترینش پیروى مى&amp;rlm;كنند. اینانند كسانى كه الله هدایتشان كرده و ایشان خردمندانند&amp;raquo; &lt;/font&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;font face=&quot;times new roman, times, serif&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;برادران وخواهران عزیز!&lt;/font&gt; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-size: 16pt; line-height: 115%; font-family: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;به یاری الله متعال بخش کتابخانۀ سایت عقیده راه اندازی شد، کتابخانۀ سایت عقیده بزرگترین کتابخانۀ فارسی و بیانگر عقیدۀ ناب و اصیل اسلامی برپایۀ قرآن و سنت می باشد که در نوع خود بی نظیر است. هدف ما از تاسیس این کتابخانه كسب رضا و خوشنودی الله جل جلاله و&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;نشر یكتاپرستی و سنت رسول الله صلى الله عليه وآله وسلم&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;در میان مسلمانان و&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;فراهم کردن یک کتابخانه سالم و اسلامی&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;برای فرهنگ دوستان، به زبان فارسی می باشد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;لازم به یادآوری است که که ما کوشش نمودیم هر کتابی را &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;تا حد توان &lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;به صیغه های مختلف WORD &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;و &lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;PDF &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;و EBOOK&lt;/span&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;و &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;HTML&lt;/span&gt;&lt;span&gt; &lt;span lang=&quot;AR-SA&quot;&gt;تهیه نماییم تا عزیزان بتوانند استفاده کامل بنمایند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;دوستان عزیز توجه داشته باشند که در صورت مشاهدۀ هرگونه اشتباه&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;املائي و يا مشكلات فنى مراتب را به مسئولان سايت از طریق گزینه ای&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;که در پایان بیانات هر کتاب وجود دارد &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/add_comment.php?rowID=142&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;تماس با مدير درباره اين كتاب &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;اطلاع دهند تا در جهت اصلاح آن اقدام&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;نماییم همچنین انتقادات و پیشنهادات سازندۀ خود را با ما &lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;در بخش &lt;/span&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/contactus.php&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-family: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;تماس با ما&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;درمیان بگذارید و در بهتر شدن این عمل بزرگ با ما همکار باشید و از اجر و ثواب دنیوی و اخروی آن مستفید گردید. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;AR-SA&quot; style=&quot;font-size: 16pt; line-height: 115%; font-family: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;در پایان شایسته است این حقیقت را خدمت شما عزیزان به عرض برسانيم که این کار بزرگ نتیجه کوشش و فداکاری شبانه روزی برادران و خواهران مؤمنی می باشد که با اخلاص وایمان در راستای بیداری امت اسلامی واعلای کلمه الله می کوشند ، &lt;span style=&quot;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;الله تعالی به همۀ کسانی که در راستای تهیه این سايت و دعوت به اسلام عزیز و توحيد و يكتاپرستی قدم بر میدارند اجر و پاداش عظیم عنایت فرماید. &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;والسلام علیکم ورحمة الله وبرکاته&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p align=&quot;center&quot; class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;margin: 0in 0in 10pt; direction: rtl; unicode-bidi: embed; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;font size=&quot;3&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;font color=&quot;#0000ff&quot;&gt;ادارۀ کتابخانۀ سايت عقيده&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>تاريخ و اسباب جرح راويان در اصطلاح محدثين</title>
<link>http://qalamlib.com/news/50</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;بحث سنت پيامبر در بالاترين درجه‌ي اهميت قرار داشته و از&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;مباحث بنيادين عقيده‌ي اسلامي است. به ويژه زماني كه آنرا از زاويه‌ي وجود دسيسه‌ها&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;ونيرنگهايي كه به قصد منحرف نمودن امت اسلامي از سنت پيامبر و القاي ترديدها درآنچه&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;نسلها را به پيامبرشان مرتبط مي‌كند، مورد توجه و بررسي قراردهيم&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;.&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;سخن از نقد&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;راويان و روايات مسأله‌اي ساده وآسان نيست. ومباحث جرح وتعديل واسبابي كه موجب آن&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;مي‌گردد بسيار زيادند&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;.&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;از اموري كه محدثان در اولويت قرار داده و در تحقيق&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;وتأليف، نهايت تلاش‌شان را بكار گرفته‌اند، شناسائي احاديث ضعيف و موضوع است،&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;تاجائي كه موجب شده محدثان براي بيان حق در باب جرح وتعديل عمرشان را وقف نمايند. و&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;بيان كنند كه همه‌ي آنچه به پيامبر نسبت داده شده، صحيح نبوده ونيز اين طور نيست كه&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;تمام احاديث پيامبر مورد بازيچه‌ي دسيسه‌گران واقع شده باشد، طوري‌كه گمان رود&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;همه‌ي سنت مشكوك ومحتمل است&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;.&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;هدف ما اين است مجموعه‌ قواعدي كه دركتابها و&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;نوشته‌هاي محدثان درخصوص شرح وتوضيح اسباب طعن در راويان است،گردآوري وترجمه كنيم&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;تا عموم مسلمانان به ويژه جواناني كه پس از جمود فكري‌ طولاني وارد صحنه‌ي بيداري&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;اسلامي شده‌اند، با آنها آشنا شوند، آناني كه زندگي اسلامي، وجودشان را جان تازه‌اي&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;بخشيده، و بيداريشان با دلهاي مشتاق و هدف‌هايي همراه است كه مي خواهند به مردم&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;سخنان پيامبر را بازگو كنند ليكن به دليل عدم آگاهي از احاديث صحيح و اهميت آن وخطر&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;پيامدهاي دروغ گفتن بر پيامبر، روايات جعلي و دروغ را به نام حديث پيامبر نقل&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;مي‌كنند&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt1&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13.5pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;,&apos;serif&apos;; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-ascii-theme-font: major-bidi; mso-hansi-theme-font: major-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;/SPAN&gt;. اين كتاب را به زودي در بخش &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=8&quot;&gt;سنت نبوي &lt;/A&gt;سايت مطالعه فرماييد&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>بزرگداشت سنت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/49</link>
<description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;ابوبکر صدیق رضی الله عنه فرموده است هیچگاه آنچه را که پیامبر بدان عمل نموده است ترک نکرده&amp;zwnj;ام و حقیقتاً بیمناکم از اینکه چنانچه یکی از سنتهای او را ترک کنم گمراه شوم. ابن بطه در شرح این کلام گفته است، ای برادران من، صدیق اکبر نگران این هستند چنانچه یکی از سنتهای پیامبر را ترک نماید به گمراهی کشیده شود، پس تکلیف کسانی که در این زمان به سنت پیامبر و حتی به خود پیامبر استهزاء می&amp;zwnj;کنند و به مخالفت با پیامبر و سنت پیامبر مباهات می&amp;zwnj;نمایند چه می&amp;zwnj;شود..... برادران و خواهران مسلمان می توانند برای آشنایی بیشتر با اهمیت سنت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم این کتاب مهم را در بخش سنت نبوی کتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایندابوبکر صدیق رضی الله عنه فرموده است هیچگاه آنچه را که پیامبر بدان عمل نموده است ترک نکرده&amp;zwnj;ام و حقیقتاً بیمناکم از اینکه چنانچه یکی از سنتهای او را ترک کنم گمراه شوم. ابن بطه در شرح این کلام گفته است، ای برادران من، صدیق اکبر نگران این هستند چنانچه یکی از سنتهای پیامبر را ترک نماید به گمراهی کشیده شود، پس تکلیف کسانی که در این زمان به سنت پیامبر و حتی به خود پیامبر استهزاء می&amp;zwnj;کنند و به مخالفت با پیامبر و سنت پیامبر مباهات می&amp;zwnj;نمایند چه می&amp;zwnj;شود..... برادران و خواهران مسلمان می توانند برای آشنایی بیشتر با اهمیت سنت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم این کتاب مهم را در بخش سنت نبوی کتابخانه سایت عقیده مطالعه نمایند&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>زندگي نامه علامه محدث ناصرالدين آلباني</title>
<link>http://qalamlib.com/news/48</link>
<description>&lt;SPAN class=excerpt&gt;&lt;FONT size=3&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN class=excerpt&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana; mso-bidi-font-family: Arial; mso-bidi-theme-font: minor-bidi&quot;&gt;علامه‌ي محدث محمد ناصر الدين آلباني سال 1332 هـ .ق. برابر با 1914 م در شهر اشكودار پايتخت آنروز كشور آلباني«&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Verdana&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;Albania&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana; mso-bidi-font-family: Arial; mso-bidi-theme-font: minor-bidi&quot;&gt;&lt;SPAN dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;» واقع در جنوب قاره‌ي اروپا چشم به جهان گشود.1 خانواده‌اي كه شيخ در آن متولد شد از لحاظ مادي فقير اما از لحاظ معنوي پربار بود، خانواده‌اي متدين، اهل علم، برخوردار از حميت ديني و...&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 13pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Verdana&apos;,&apos;sans-serif&apos;&quot;&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 10pt; DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;SPAN class=excerpt&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 13pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana; mso-bidi-font-family: Arial; mso-bidi-theme-font: minor-bidi&quot;&gt;هنوز بيست بهار از عمر شيخ نگذشته بود كه با متأثر شدن از سلسله بحث‌هاي مجله‌ي «المنار» كه توسط شيخ محمد رشيد رضا منتشر مي‌شد، به سوي علم حديث روي آورد. شيخ محمد المجذوب در كتاب خود تحت عنوان «علماء و مفكرون» در گفتاري كه با شيخ ناصرالدين داشته است مي‌گويد: شيخ ناصرالدين فرمودند: ابتدا، به خواندن داستان‌هاي عربي علاقه‌مند شدم، سپس به تاريخ گرايش پيدا كردم و روزي در يكي از كتابفروشي‌ها در ميان كتابها يك شماره از مجله‌ي‌ «المنار» را ديدم كه در آن سيد رشيد رضا درباره‌ي‌ كتاب احياء علوم الدين شيخ غزالي، محاسن و مآخذ آن بحثي علمي نموده بود. من براي اولين بار بود كه چنين نقد علمي را مي ديدم، همين مسئله باعث شد تا تمام مجله را بخوانم و به دنبال آن تخريج حافظ عراقي را بر كتاب احياء‌علوم الدين مورد مطالعه و بررسي قرار دادم، چون توانايي خريد كتاب را نداشتم آنرا به امانت گرفته و مطالعه نمودم. با ديدن اين تخريج دقيق، تصميم گرفتم تا از آن نسخه برداري كنم برادران و خواهران محترم مي توانند &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=excerpt&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 13pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ascii-font-family: Verdana; mso-hansi-font-family: Verdana; mso-bidi-font-family: Arial; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;زندگینامه این عالم جلیل القدر را در بخش &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=10&quot;&gt;مشاهیر اسلام &lt;/A&gt;کتابخانه عقیده مطالعه نمایند&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 13pt; LINE-HEIGHT: 115%; FONT-FAMILY: &apos;Arial&apos;,&apos;sans-serif&apos;; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-bidi-font-family: Arial; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-hansi-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&amp;nbsp;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب خلفاي راشدين از خلافت تا شهادت</title>
<link>http://qalamlib.com/news/47</link>
<description>&lt;p align=&quot;center&quot;&gt;&amp;nbsp;كتاب خلفای راشدین از خلافت تا شهادت&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;دکتر صلاح عبدالفتاح الخالدی&lt;br /&gt;
ترجمه: عبدالعزیز سلیمی&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;این کتاب به بررسی تاریخی دوران خلافت خلفای راشدین می پردازد. از آنجایی که دوران خلافت عثمان و علی رضی الله عنهما آبستن حوادث و فتنه هایی گردید که تاثیرات آن تاکنون بر پیکره جامعه اسلامی مشهود است مناسب دیدیم بخش سوم و چهارم آن را که دربرگیرنده حوادث دوران خلافت آن دو خلیفه راشد است برای مطالعه دوستان اهل نظر در کتابخانه بیداری قرار دهیم.&lt;br /&gt;
امیدواریم این شروعی برای مطالعه تاریخی دقیق آن دوران قرار گیرد زیرا عدم اطلاع از آنچه در آن برهه روی داده است یکی از مشکلات کنونی جامعه اهل سنت است.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب ابوهريره شاگرد مکتب پیامبر</title>
<link>http://qalamlib.com/news/46</link>
<description>&lt;div&gt;... براستی كه اسلام چه كارهای بزرگی را برای این مردان و امت اسلام انجام نداد!؟ اگر اسلام نمی&amp;lrm;بود، آنها می&amp;lrm;مردند و ضایع می&amp;rlm;شدند و تاریخ، آنها را به فراموشی می&amp;rlm;سپرد. اما در سایه اسلام بود كه آنها جاودان شدند و نامشان برای همیشه باقی ماند.&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;ابوهریره یكی از نوابغ و بزرگان اسلام بود كه از ابتدا هدفش را مشخص كرده بود و در راه رسیدن به آن هدف، از هیچ كوششی فرو گذر نبود و برای حصول آن، مشكلات جانفرسایی را تحمل كرد و سرانجام به هدف خود رسید. او در زمان حیات پیامبر اكرم(صلی الله علیه و سلم) همیشه تلاش می&amp;lrm;كرد كه شاگرد رشید پیامبر(صلی الله علیه و سلم) و عالمی فقید و آ&amp;lrm;گاه به دین خدا باشد. بدین جهت او هر لحظه از آن حضرت(صلی الله علیه و سلم) علمی می&amp;rlm;آموخت و حفظ می&amp;rlm;كرد و برای حصول این مهم، گرسنگی شدید و فقر و تنگدستی غیر قابل وصفی تحمل كرد... &amp;nbsp;&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;كتاب: &amp;nbsp;ابوهریره شاگرد مکتب پیامبر :http://www.aqeedeh.com/book/view/456/&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;&amp;nbsp;مؤلف:محمد علی دوله&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;ترجمه: محمد گل گمشادزهی&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;انتشارات حرمین 1382&lt;/div&gt;

&lt;div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب پیروی از کتاب، سنت و فهم سلف صالح</title>
<link>http://qalamlib.com/news/45</link>
<description>&lt;P align=right&gt;&lt;FONT size=3&gt;&amp;nbsp;پیروی کردن از أولی الأمر ـ عالمان و حاکمان اسلامی ـ در راستای پیروی کردن آنها از خدا و رسولش است و به همین دلیل است که خداوند در این آیة سورة نساء عامل ـ أطیعوا ـ را در هنگام ذکر أولی الأمر تکرار نکرده، ولی در هنگام ذکر «رسول» عامل ـ أطیعوا ـ را تکرار کرده است، تا این طور تصور نشود همچنانکه أولی الأمر پیروی می‌شود پیامبر نیز آنگونه پیروی می‌شود، و نتیجه گرفته شود که پیروی از اولی الأمر و پیامبر در یک راستا قرار دارند، که این گمان نادرستی است...&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;&lt;FONT size=3&gt;نام کتاب: پیروی از کتاب، سنت و فهم سلف صالح&lt;BR&gt;نویسنده: محمد بن حمد الحمود النجدی&lt;BR&gt;مترجم: علی صارمی&lt;BR&gt;اين كتاب به زودي در بخش &lt;A href=&quot;http://www.aqeedeh.com/ebook/list_book.php?catID=8&quot;&gt;سنت نبوي كتابخانه سايت عقيده &lt;/A&gt;نشر خواهد شد&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
</item><item>
<title>كتاب جایگاه و منزلت سنّت رسول‌الله (صلی الله علیه و آله وسلم) در اسلام</title>
<link>http://qalamlib.com/news/44</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;نام کتاب: جایگاه و منزلت سنّت رسول&amp;zwnj;الله (صلی الله علیه و آله وسلم) در اسلام&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
نویسنده: محمد ناصر الدین الألبانی رحمه&amp;zwnj;الله&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;مترجم: علی صارمی&lt;br /&gt;
... مـتأسفانه امروزه کتابهای زیادی درباره شریعت و اعتقادات اسلامی و عقیدة اهل سنت و جماعت نوشته می&amp;zwnj;شوند. و نویسندگان این کتابها، به اقرار خودشان می&amp;zwnj;گویند که ما برای نوشتن این کتابها هیچگونه مراجعه&amp;zwnj;ای به احادیث پیامبر (صلی الله علیه وسلم) نداشته و فقط به قرآن مراجعه کرده&amp;zwnj;ایم، در حالیکه می&amp;zwnj;دانیم شریعت و اعتقادات اسلامی تنها قرآن نیست بلکه احادیث پیامبر(صلی الله علیه وسلم) هم جزو شریعت اسلام است، و قرآن و حدیث پیوسته و همیشه با هم هستند و مانند دو بال، برای پرواز عمل می&amp;zwnj;کنند و پرواز با یک بال ممکن نیست، کسی که به یکی از آن دو دست بگیرد و از آن، پیروی کند در اصل به هیچکدام دست نگرفته و از هیچکدام پیروی نکرده است، زیرا هر یک از آن دو به پیروی و دست گرفتن به دیگری امر می&amp;zwnj;کنند، همچنانکه خداوند در آیات متعددی به این مطلب اشاره کرده است و می&amp;zwnj;فرماید&lt;br /&gt;
&lt;strong&gt;&amp;laquo;من يطع الرسول فقد أطاع الله&amp;raquo;&lt;/strong&gt; (نساء / 80)&lt;br /&gt;
&amp;laquo;هر کس از پیامبر اطاعت کند به حقیقت از خداوند اطاعت کرده است&amp;raquo;.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/view/759/&quot;&gt;لینک کتاب&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</description>
</item><item>
<title>کتاب ترجمه  فارسی ریاض الصالحین</title>
<link>http://qalamlib.com/news/43</link>
<description>&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;کتاب &amp;quot;ترجمه ی فارسی ریاض الصالحین&amp;quot;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;نام کتاب: ترجمه ی فارسی ریاض الصالحین&lt;br /&gt;
نویسنده: امام ابی زکریا یحیی بن شرف نووی دمشقی&lt;br /&gt;
ترجمه و شرح: استاد عبد الله خاموش هروی&lt;br /&gt;
---------------------------&lt;br /&gt;
ریاض الصالحین مجموعه ای زیبا از احادیث رسول الله صلی الله علیه وسلم است که توسط امام نووی جمع آوری شده است. هدف امام نووی از جمع آوری این مجموعه از احادیث گردآوری کتابی است جامع برای تزکیه ی نفس و سلوک رهپویان خوشبختی بسوی بهشت و رضایت الهی.&lt;br /&gt;
این مجموعه ی ارزشمند از باب اخلاص نیت شروع می شود و قدم به قدم سالک را بر اساس هدایت و روش نبوی صحیح به سوی سرمنزل مقصود می رساند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
روش امام نووی در این کتاب بدینصورت است که نخست آیاتی از کلام الله را که مرتبط با باب مورد نظر است آورده و سپس به ذکر احادیث مربوط به آن باب می پردازد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این کتاب به دستان توانای استاد خاموش هروی به فارسی ترجمه شده و به زودی در بخش &lt;a href=&quot;http://aqeedeh.com/book/cat/25&quot;&gt;سنت نبوی کتابخانه سایت عقیده&amp;nbsp;&lt;/a&gt;در اختیار شما عزیزان قرار می گیرد.&lt;/div&gt;</description>
</item><item>
<title>شاهکار امام مهدی!....</title>
<link>http://qalamlib.com/news/40</link>
<description>&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;strong&gt;شاهکار امام مهدی!....&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; امام سید مهدی علی فرزند سید ضامن علی حسینی (1253هـ ـ 1325هـ ) یکی از شاخصترین چهره های علمی سرزمین هندوستان است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ایشان در راه علم و معرفت سالهای متمادی عمر خویش را قربانی نموده و در خدمت به ملت خویش رنجهای طاقت فرسایی را متحمل شده است. از اینروست که او را به امام، محسن الملک، و نواب، و محسن الدوله، ملقب ساخته اند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ایشان در یکی از خانواده های مذهبی رده ی اول شیعه اثنا عشری یا دوازده امامی چشم بجهان گشود و از محضر علمای شیعه فیضها برد. شخصیت پویایی و حس کنجکاویی که در او بود، از اینکه مهار عقل خویش را به دست دیگران بیندازد تا چون گوسفندی او را بهر سو که خواهند برند ابا داشت!&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ایشان پس از خواندن و هضم نمودن همه کتابهای مذهب خود، دایره مطالعاتش را گسترش داده در قرآن کریم&amp;nbsp; و حدیث پیامبر اکرم (ص) تبحر پیدا نمود.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;خارج شدن ایشان از دایره تنگ کتابهای مذهبی و مطالعه یشان در اقیانوس قرآن هوش و عقل او را دو صد چندان بزرگتر نمود تا اینکه نهایتا دریافت که این چهار چوب ساختگی مذهب در حقیقت چهار دیواری است که دکانداران و تاجران دین آنرا بافته اند و دین خدا از آن بیزار است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;و این نقطه تحول بسیار بزرگی بود که این امام و آیت علم و دانش را بر شاهراه حقیقت و هدایت نهاد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;بدون شک این جهش سترگ او جامعه تعصب پیشه و دلالان دین فروش را بر او برافروخت و تهمتهایی چون وهابیگری و سنیگری را نثار جانش کردند.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;این بزرگ مرد تاریخ هندوستان معاصر چون می دید که مذهب چگونه در زیر زنجیرهای اسارت تقلید کورکورانه گروهی از آخوندهایی که از دکان دین می خورند قرار گرفته، برای راهیابی قوم و ملت خویش کتابی بی مانند برشته تحریر درآورد. که یکی از عمده ترین کتابهای روشنگری است که در رابطه با خرافات مذهب شیعه نگاشته شده و در میدان خود نظیری ندارد. و تا کنون با وجود اینکه تاجران دین چشم دیدن آن کتاب را ندارند قلمهایشان از رد زدن بر آن عاجز و ناتوان مانده است.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;شاهکار امام مهدی که &amp;quot;&lt;strong&gt;آیات بینات&lt;/strong&gt;&amp;quot; نام دارد کتابی است که تداول آن در ایران اسلامی (!) حکم اعدام دارد! و در سایر کشورهایی که شیعه را سلطانی است اکیدا ممنوع است!..&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;امام مهدی در &amp;quot;&lt;strong&gt;آیات بینات&lt;/strong&gt;&amp;quot; که خود یک دانشمند و عالم برجسته شیعه بود تنها با استناد به کتابهای شیعه ثابت نموده که همه عقائد و افکار شیعه معاصر در مورد یاران رسول خدا صلی الله علیه و آله و سلم از سب و شتم و نفرین گرفته تا تکفیر ساخته و پرداخته مشتی انسانهای دین فروش دسیسه گر بوده و هیچ حقیقتی ندارد. و از کتابهای خود شیعه ثابت نموده که خلیفه دوم پیامبر اکرم (ص) عمر بن الخطاب داماد امیر مؤمنان علی (ع) بوده و در بین این دو شیر مرد دین خدا و سایر یاران پیامبر اسلام و اهل بیت ایشان رابطه شیر و شکر بوده و هیچ اختلافی بین آنها نبوده، و افسانه شکستن سینه دخت رسول خدا فاطمه زهراء و افسانه &amp;quot;فدک&amp;quot; و ظلم به ایشان همه و همه ساخته و پرداخته آخوندهایی بوده که همیشه در تلاش بوده اند با این مزخرفات بین مسلمانان اختلاف انداخته از آب گل آلود ماهی بگیرند!...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;متأسفانه این شاهکار امام مهدی در زیر تازیانه های خفاشان شب پرست خاموش مانده است. و شایسته است که صاحبان قلم و ادیبان سخن قلم از نیام برکشند و این گنجینه ی بزرگ تاریخی شیعه را از اردو به زبانهای فارسی و عربی و انگلیسی و سایر زبانهای دنیا ترجمه کنند تا همانگونه که اصل کتاب سبب هدایت هزارها دانش ور و دانشجو بوده ترجمه های این کتاب نیز در ملتهای مختلف انقلابی به پا کند. و زنگ خطر را در گوشهای مردم تقلید پرستی که در خواب عمیق فرو رفته و مهار عقل خود را بدست آخوندهای دین فروش داده اند به صدا در آورد. و آنها را با کلام الهی و ریسمان آسمانی قرآن آشتی دهد!...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;که ای مردمان قرآن کتاب هدایت است، سدهای ساخته شده دسیسه گران را از میان خود و قرآن بردارید. مستقیما به کلام الهی رجوع کنید. و خود را در زیر خروارها حدیث دروغین ائمه و سخنان پوچ آخوندهای مکار تلف نکنید. تا در روز رستاخیز در محشر پروردگار یکتا شرمسار نشوید....&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;البته شاید اشاره بدین نقطه که یک فصل از چهار فصل کتاب توسط یکی از اندیشمندان هندوستانی به نام عبد الشکور لکهنوی به فارسی با عنوان &amp;quot;باقیات الصالحات&amp;quot; برگردانده شده است که آن با وجود اینکه خدمتی است بسیار ارجمند ـ که صاحبش کمر همت بدان بسته وکتابی را بزبانی غیر از زبان خود ترجمه کرده ـ نیاز به بازنگری مجدد دارد تا برای فارسی زبانان امروزی قابل استفاده گردد. و به نظر بنده کار ارزشمند این مترجم هندوستانی شایان آن است که در قلبهای اندیشمندان سرزمین فارس روح همت بدمد وآنها را بسوی ترجمه کامل این کتاب پر ارج تشویق کند!&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;متأسفانه خفاشان شب پرست و تاجران دین همیشه در پی پوشیدن حق بوده وهستند و از اینرو چون سدی محکم سر راه طالبان حق می ایستند. امید واریم که این مقاله مختصر بتواند حق جویان را در پی حق طلبی کوشاتر سازد.&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;در پایان چند جمله از حضرت آیت الله العظمی ابو الفضل برقعی (نویسنده شاهکار تفسیر تابش) ـ علیه الرحمه ـ را که در رد کتاب الغدیر نوشته آقای باصطلاح علامه عبد الحسین أمینی ایراد داشته را در اینجا می آوریم تا شاهدی باشد بر آنچه گذشت:&amp;laquo; ... بسیاری از مستندات این کتاب ( کتاب الغدیر) از منابع نامعتبر که به صدر اسلام اتصال وثیق ندارند اخذ شده که این کار در نظر اهل تحقیق اعتبار ندارد. برخی از احتجاجات او هم قبلا پاسخ داده شده، ولی ایشان به روی مبارک نیاورده ومجددا آنها را ذکر کرده است. گمان دارم که اهل فن در باطن می دانند که با الغدیر نمی توان کار مهمی به نفع مذهب صورت داد و به همین سبب است که طرفداران ومداحان کتاب که امروز زمام امور در چنگشان است به هیچ وجه اجازه نمی دهند کتبی از قبیل تألیف محققانه آقای حیدر علی قلمداران به نام (شاهراه اتحاد یا نصوص امامت) یا کتاب (باقیات صالحات) که توسط یکی از علمای شیعه شبه قاره، موسوم به امام محسن الملک مهدی، ویا کتاب تحفه اثنا عشریه تألیف عبد العزیز غلام حکیم دهلوی فرزند امام ولی الله الدهلوی، ویا جزوه مختصر راز دلبران که آقای عبد الرحمان سربازی آن را خطاب به موسسه ـ د ر راه حق واصول دین ـ در قم نوشته وکتاب (رهنمود سنت در رد اهل بدعت ) ترجمه این حقیر ونظایر آنها که برای فارسی زبانان قابل استفاده است چاپ شود. بلکه اجازه نمی دهند اسم این کتب به گوش مردم برسد. در حالیکه اگر مغرض نبوده وحق طلب می بودند اجازه می دادند که مردم هم ترجمه الغدیر را بخوانند وهم کتب فوق را، تا بتوانند آنها را با یکدیگر مقایسه و از علما در باره مطالب آنها سؤال کنند و پس از مقایسه اقوال، حق را از باطل تمییز داده و بهترین قول را انتخاب کنند. فقط در این صورت است که به آیه ی : (فَبَشِّرْ عِبَادِ ﴿١٧﴾ الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ) = بشارت ده بندگانی را که سخن را بشنوند و نیکوترینش را پیروی کنند ـ الزمر 17/18 عمل کرده اند. اما نه خود چنین می کنند ونه اجازه می دهند که دیگران اینگونه عمل کنند بلکه جواب امثال مرا با گلوله و یا به زندانی کردن می دهند!!...&lt;/p&gt;

&lt;p dir=&quot;rtl&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;لازم به ذکر است که تمامی کتابهایی که اینجا ذکر شده است از کتابخانه عقیده قابل دریافت می باشد.&lt;/p&gt;</description>
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